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पुण्य तिथि पर पण्डित विष्णु गोविन्द (वी.जी.) जोग को एक स्वरांजलि

स्वरगोष्ठी – ५५ में आज जुगल बन्दी के बादशाह वायलिन वादक पण्डित जोग   भारतीय संगीत के प्रातःकालीन रागों में एक बेहद मधुर और भक्तिरस से सराबोर राग है- अहीर भैरव। हिन्दी फिल्मों में इस राग का प्रयोग बहुत अधिक तो नहीं हुआ किन्तु जिन संगीतकारो ने इस राग का उपयोग किया , उन्होने फिल्म-संगीत-जगत को अपने सदाबहार गी तों से समृद्ध कर दिया। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में सुप्रसिद्ध वायलिन वादक पण्डित वी.जी. (विष्णु गोविन्द) जोग का अत्यन्त प्रिय राग अहीर भैरव ही था। ३१ जनवरी को पण्डित जी की आठवीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर आज के अंक में हम उनके प्रिय राग ‘ अहीर भैरव ’ के माध्यम से उन्हें स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं।      आ ज ‘ स्वरगोष्ठी ’ में एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र , आप सभी संगीत- प्रेमियों की बैठक में उपस्थित हुआ हूँ। दोस्तों , आज की बैठक में हम सुप्रसिद्ध वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके प्रिय राग ‘ अहीर भैरव ’ के माध्यम से चर्चा करेंगे। परन्तु चर्चा की शुरुआत हम दो ऐसे फिल्मी गीत से करेंगे , जिन्हें राग ‘ अहीर भैरव ’ के ...

२९ जनवरी- आज का गाना

गाना:  मिल गए मिल गए आज मेरे सनम चित्रपट: कन्यादान संगीतकार: शंकर जयकिशन गीतकार:  हसरत जयपुरी गायिका: लता मंगेशकर मिल गए मिल गए आज मेरे सनम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम ऐ नज़रों ज़रा काम इतना करो ऐ नज़रों ज़रा काम इतना करो तुम मेरी मांग में आज मोती भरो तुम मेरी मांग में आज मोती भरो एक उजाला हुआ ढल गई शाम-ए-ग़म एक उजाला हुआ ढल गई शाम-ए-ग़म आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम वो कहाँ छुप रहे थे मैं हैरान थी वो कहाँ छुप रहे थे मैं हैरान थी मेरी सदियों से उनसे ही पहचान थी मेरी सदियों से उनसे ही पहचान थी ऐसे किस्से ज़माने में होते हैं कम ऐसे किस्से ज़माने में होते हैं कम आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम मिल गए मिल गए आज मेरे सनम आज मेरे ज़...

रेडियो प्लेबैक आर्टिस्ट ऑफ द मंथ - कुहू गुप्ता

कुहू गुप्ता  कवर गीतों से लेकर ढेरों ओरिजिनल गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया है कुहू ने, इन्टरनेट पर सक्रिय अनेकों संगीतकारों की धुनों में अपनी आवाज़ का रंग भरने वाली गायिका कुहू गुप्ता है रेडियो प्लेबैक की आर्टिस्ट ऑफ द मंथ...अपने अब तक के करियर के कुछ यादगार गीत और गायन के अपने खट्टे मीठे अनुभव बाँट रही है आपके साथ गायिका कुहू गुप्ता.

२८ जनवरी- आज का गाना

गाना:  वो शाम कुछ अजीब थी चित्रपट: ख़ामोशी संगीतकार: हेमंत कुमार गीतकार:  गुलज़ार गायक: किशोर कुमार वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो वो शाम कुछ अजीब थी मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में खिली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है

अकबर के नवरत्न - इब्ने इंशा की लघुकथा

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने सलिल वर्मा की आवाज़ में गिरिजेश राव की एक कहानी " भूख " का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं इब्ने इंशा की लघुकथा " अकबर के नवरत्न ", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।  कहानी " अकबर के नवरत्न " का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 19 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस कथा का टेक्स्ट बैरंग पर उपलब्ध है।  यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का। ~ इब्ने इंशा (1927-1978) हर शुक्रवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी अकबर अनपढ़ था। ( इब्ने इंशा की "अकबर के नवरत्न" से एक अंश ) नीचे के प्लेयर से सुनें। (प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें...

२७ जनवरी- आज का गाना

गाना:  वादा रहा सनम चित्रपट: खिलाड़ी संगीतकार: जतिन-ललित गीतकार:  अनवर सागर गायक,गायिका: अभिजीत, अलका याग्निक आ हा हा हा हा, आ हा हा हा हा आ आ आ हा हा हा हा हा वादा रहा सनम, होंगे जुदा ना हम चाहे ना चाहे ज़माना हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना कैसी उदासी तेरे चेहरे पे छायी क्या बात है जो तेरी आँख भर आई कैसी उदासी तेरे चेहरे पे छायी क्या बात है जो तेरी आँख भर आई देखो तो क्या नज़ारे हैं तुम्हारी तरह प्यारे हैं हंसो ना मेरे लिए तुम सभी तो ये तुम्हारे हैं ओ जाने जान हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना वादा रहा सनम, होंगे जुदा ना हम चाहे ना चाहे ज़माना हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना इन वादियों में यूँ ही मिलते रहेंगे दिल में वफ़ा के दिए जलते रहेंगे इन वादियों में यूँ ही मिलते रहेंगे दिल में वफ़ा के दिए जलते रहेंगे यह माँगा है दुआओं में कमी ना हो वफाओं में रहें तेरी निगाहों में लिखो ना ये फिजाओं में ओ साजना हमारी चाहतों का ...

शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट.. बाबा नागार्जुन की हुंकार के साथ आईये करें गणतंत्र दिवस का स्वागत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल ०२ बचपन बीत जाता है, बचपना नहीं जाता। बचपन की कुछ यादें, कुछ बातें साथ-साथ आ जाती हैं। उम्र की पगडंडियों पर चलते-चलते उन बातों को गुनगुनाते रहो तो सफ़र सुकून से कटता है। बचपन की ऐसी हीं दो यादें जो मेरे साथ आ गई हैं उनमें पहली है कक्षा सातवीं से बारहवीं तक (हाँ मेरे लिए बारहवीं भी बचपन का हीं हिस्सा है) पढी हुईं हिन्दी कविताएँ और दूसरी है साल में कम-से-कम तीन दिन देशभक्त हो जाना। आज २६ जनवरी है तो सोचा कि इन दो यादों को एक साथ पिरोकर एक ऐसे कवि और उनकी ऐसी कविताओं का ताना-बाना बुना जाए जिससे महफ़िल की पहचान बढे और आज के लिए थोड़ी बदले भी (बदलने की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आज की महफ़िल में उर्दू की कोई ग़ज़ल नहीं, बल्कि हिन्दी की कुछ कविताएँ हैं) मैंने बचपन की किताबों में कईयों को पढा और उनमें से कुछ ने अंदर तक पैठ भी हासिल की। ऐसे घुसपैठियों में सबसे आगे रहे बाबा नागार्जुन यानि कि ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा के वैद्यनाथ मिश्र। अभी तक कंठस्थ है मुझे "बादल को घिरते देखा है"। शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल  मुखरित देवदारु कनन में,  शोणित धवल भोज पत्रों...

छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम...

‘ वन्देमातरम् ’ गीत के रचनाकार  बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय   ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में बलिदानी क्रान्तिकारियों और आन्दोलनकारियों के हम सदैव ऋणी रहेंगे, परन्तु  इस दौर में कलम के सिपाहियों का योगदान भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम कुछ ऐसे कवियों और शायरों का स्मरण करने जा रहे हैं, जिनकी कलम ने तलवार का रूप धारण कर ब्रिटिश हुकूमत के छक्के छुड़ा दिये। इन गीतों के उग्र तेवर से भयभीत होकर तत्कालीन सरकार ने इन्हें प्रतिबन्धित तक कर दिया। स्वरगोष्ठी – ५४ में आज – गणतन्त्र दिवस विशेषांक स्वतन्त्रता संग्राम के प्रतिबन्धित गीतों पर एक चर्चा आज गणतन्त्र दिवस के अवसर पर ‘स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ। मित्रों, आज हम आपसे किसी फिल्म संगीत, राग, ताल या किसी वरिष्ठ कलासाधक पर चर्चा नहीं, बल्कि कुछ ऐसे दुर्लभ गीतों पर चर्चा करेंगे, जिन्हें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान लिखे और गाये गए। इन गीतों के रचनाकारों ने कलम को तलवार बना कर गीतों से जनमानस को उद्वेलित कर दिया। आज...

२६ जनवरी- आज का गाना

गाना:  जहाँ डाल डाल पर चित्रपट: सिकंदर-ए-आज़म संगीतकार: हंसराज बहल गीतकार: राजिंदर कृशन गायक: मोहम्मद रफी जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा वो भारत देश है मेरा ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा वो भारत देश है मेरा अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा वो भारत देश है मेरा जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा वो भारत देश है मेरा

"ऐ मेरे वतन के लोगों" - इस कालजयी देशभक्ति गीत को न गा पाने का मलाल आशा भोसले को आज भी है

कालजयी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" के साथ केवल पंडित नेहरू की यादें ही नहीं जुड़ी हुई हैं, बल्कि इस गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। आज गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर इसी गीत से जुड़ी कहानियाँ सुजॉय चटर्जी के साथ 'एक गीत सौ कहानियाँ' की चौथी कड़ी में... एक गीत सौ कहानियाँ # 4 देशभक्ति गीतों की बात चलती है तो कुछ गीत ऐसे हैं जो सबसे पहले याद आ जाते हैं, चाहे वो फ़िल्मी हों या ग़ैर-फ़िल्मी। लता मंगेशकर की आवाज़ में एक ऐसी ही कालजयी रचना है "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा करो क़ुर्बानी"। कवि प्रदीप के लिखे और सी. रामचन्द्र द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को जब भी सुनें, रोंगटे खड़े हुए बिना नहीं रहते, आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं, हमारे वीर शहीदों के आगे नतमस्तक हुए बिना हम नहीं रह पाते। इस गीत को १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों को समर्पित किया गया था। कहते हैं कि रेज़ांग् ला के प्रथम युद्ध में १३ - कुमाऊं रेजिमेण्ट, सी-कंपनी के आख़िरी मोर्चे में परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी के दुस्साहस और बलिदान से प्रभावित ...

२५ जनवरी- आज का गाना

गाना:  बालम आए बसो मोरे मन में चित्रपट: देवदास संगीतकार: तिमिर बरन गीतकार:  केदार शर्मा गायक: के. एल.सहगल बालम आए बसो मोरे मन में बालम आए बसो मोरे मन में बालम आए बसो मोरे मन में बालम सावन आया तुम न आए बालम आए बसो मोरे मन में बालम आए बसो मोरे मन में सावन आया तुम न आए सावन आया तुम न आए तुम बिन रसिया कुछ न भाये तुम बिन रसिया कुछ न भाये मन में मोरे हूक उठत जब मन में मोरे हूक उठत जब कोयल कूकती बन में बालम आए बसो हाँ तो तुम आ गईं पूजा के लिए मंदिर में जा रही थी तो फिर यहाँ क्यूँ आयीं मुझे मेरे देवता ने बुलाया इसलिए मैं आ गयी ..... ...... ..... सूरतिया जा की मतवारी सूरतिया जा की मतवारी पतली कमरिया उमरिया बारी सूरतिया जा की मतवारी पतली कमरिया उमरिया बारी एक नया संसार बसा है एक नया संसार बसा है जिनके दो नैनन में बालम आए बसो मोरे मन में बालम आए बसो मोरे मन में

ब्लोग्गर्स चोईस विद रश्मि प्रभा - मेहमान है सलिल वर्मा

रश्मि प्रभा  बड़ा जोर है सात सुरों में बहते आंसू जाते हैं थम. संगीत तो वाकई जादू है. दुःख हो सुख हो डूबती कश्ती हो ख्यालों के गीत सुकून देते हैं, राह देते हैं...मैं रश्मि प्रभा अब तक ब्लौगरों की कलम से आपको मिलवाती रही हूँ, इस मंच पर मैं उनकी पसंद के कम से कम 5 गाने आपको सुनाऊंगी, आप भी तो जानिए इनकी पसंद क्या है ! आँखें बन्द कर उनकी पसंद की लहरों में खुद को बहने दीजिये, और बताइए कैसा लगा...क्रम से लोग आ रहे हैं गीतों की खुशबू लिए - ये पहला नाम है सलिल वर्मा जी का,.... रुकिए रुकिए ब्लॉग प्रसिद्द 'चला बिहारी ब्लॉगर बनने' से आप ज्यादा परिचित हैं . थी तो मैं भी , पर ध्यान गया जब मैं बुलेटिन टीम में आई तो इनकी बगिया में भी सैर कर आई. घूमकर आई तो देखा बिहारी भाई बिहारी बहन के बगीचे में घूम रहे हैं .... मैंने पूछा - कौन ? , रश्मि दी .... इस संबोधन के बाद कुछ अनजाना नहीं रहता. लिखते तो सलिल जी बहुत ही बढ़िया हैं, आप मिले होंगे इनसे http://chalaabihari.blogspot.com/ पर . सोच पैनी, कलम ज़बरदस्त... और गानों की पसंद भी ज़बरदस्त.... तो अब देर किस बात की . ये रहे गाने और उनके लिए एक ख...

२४ जनवरी- आज का गाना

गाना:  चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चित्रपट: बंधन संगीतकार: सरस्वती देवी गीतकार:  कवि प्रदीप गायक: अरुण कुमार चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चने जोर गरम चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चने जोर गरम मेरे चने हैं चटपट भैया और बड़े लासानी और कैसे चाव से खाते देखो राम और रमजानी और चुन्नू मुन्नू की जबान भी हो गई पानी पानी और कहें कबीर सुनो भाई साधो सुनो गुरु की बानी चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चने जोर गरम चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चने जोर गरम अरे मदरसे का जीवन तो चाँद दिनों का ठाठ और पढ़ लिख कर सब चल दोगे अपनी अपनी बाट फिर कोई तुममे होगा अफसर कोई गवर्नर लाट तब मैं आऊंगा दफ्तर तुमरे लिए चने की चाट चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चने जोर गरम चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चने जोर गरम

सिने-पहेली # 4

सिने-पहेली # 4 (23 जनवरी 2012) रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, 'सिने-पहेली' की चौथी कड़ी लेकर मैं हाज़िर हूँ। दोस्तों, एक और नई सप्ताह की शुरुआत हो चुकी है और आज से हम और आप, सभी, फिर एक बार ज़िन्दगी की भागदौड़ में मसरूफ़ हो जायेंगे। किसी को पढ़ाई-लिखाई, तो किसी को दफ़्तर, और किसी-किसी को व्यापार-वाणिज्य आदि की फ़िक्र होती होगी। लेकिन हम सब में एक बात जो समान है, वह यह कि हम सभी को फ़ुरसत के कुछ पलों में मनोरंजन की चाहत होती है। और यह ज़रूरी भी तो है! इसीलिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पूरे सप्ताह भर में आपके मनोरंजन के लिए लेकर आता है कई स्तंभ, जो केवल मनोरंजक ही नहीं, बल्कि ज्ञानवर्धक भी होते हैं। ऐसी ही एक ज्ञानचर्धक स्तंभ है 'सिने पहेली' जो आज़माता है आपके फ़िल्मी ज्ञान को। आप सभी से यह अनुरोध है कि इस प्रतियोगिता में पूरे उत्साह से भाग लें और अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, सह-कर्मचारियों को भी इसमे भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। चलिए, बातें तो बहुत हो गईं, अब शुरू किया जाये आज की 'सिने-पहेली'। ...

२३ जनवरी- आज का गाना

गाना:  तेरी गठरी में लागा चोर चित्रपट: धूप-छाँव संगीतकार: राय चन्द्र बोराल गीतकार:  पंडित सुदर्शन गायक: के. सी. डे तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा, जाग ज़रा तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा, जाग ज़रा आज ज़रा सा फ़ितना है ये तू कहता है कितना है ये आज ज़रा सा फ़ितना है ये तू कहता है कितना है ये दो दिन में ये बढ़कर होगा मुंहफट और मुंहजोर दो दिन में ये बढ़कर होगा मुंहफट और मुंहजोर मुसाफिर जाग ज़रा तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा, जाग ज़रा नींद में माल गँवा बैठेगा अपना आप लुटा बैठेगा नींद में माल गँवा बैठेगा अपना आप लुटा बैठेगा फिर पीछे कुछ नहीं बनेगा फिर पीछे कुछ नहीं बनेगा लाख मचाये शोर, शोर मुसाफिर जाग ज़रा तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा, जाग ज़रा तेरी गठरी में लागा चोर, चोर

‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : गीत के बहाने, चर्चा राग- भीमपलासी की

महात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। १९४३ में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई। फिल्म ‘रामराज्य’ में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में एक गीत संगीतबद्ध किया था। आज हमारी गोष्ठी में यही गीत, राग और इसके रचनाकार, चर्चा के विषय होंगे। SWARGOSHTHI – 53 – Pandit Shankar Rao Vyas ‘स्व रगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार फिर इस सांगीतिक बैठक में उपस्थित हूँ। आज हम लगभग सात दशक पहले की एक फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ और इस गीत के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चा करेंगे। कल २३ जनवरी को इस महान संगीतज्ञ की ११३वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए हम आज उन्हें स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं। कोल्हापुर में २३ जनवरी, १८९८ में ...

२२ जनवरी- आज का गाना

गाना:  किसका रस्ता देखे चित्रपट: जोशीला संगीतकार: राहुल देव बर्मन गीतकार:  साहिर गायक: किशोर कुमार किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई मीलों है ख़ामोशी, बरसों है तन्हाई भूली दुनिया कभी की, तुझे भी मुझे भी फिर क्यों आँख भर आई हो, किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई कोई भी साया नहीं राहों में कोई भी आएगा ना बाहों में तेरे लिए मेरे लिए, कोई नहीं रोनेवाला ओ झूठा भी नाता नहीं चाहों में हाय, तू ही क्यों डूबा रहे आहों में कोई किसी संग मरे, ऐसा नहीं होने वाला कोई नहीं जो यूँ ही जहाँ में, बाँटे पीर पराई हो, किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई तुझे क्या बीती हुई रातों से मुझे क्या खोई हुई बातों से सेज नहीं चिता सही, जो भी मिले सोना होगा गई जो डोरी छूटी हाथों से हो, लेना क्या टूटे हुए साथों से खुशी जहाँ माँगी तूने, वहीं मुझे रोना होगा ना कोई तेरा ना कोई मेरा, फिर किसकी याद आई हो, किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई मीलों है ख़ामोशी, बरसों है तन्हाई भूली दुनिया कभी की, तुझे भी मुझे भी फिर क्यों आँख भर आई किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौ...