Saturday, November 12, 2016

"या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो"


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 18
 
सोनू निगम



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक सोनू निगम पर।  
  

सोनू निगम का जन्म फ़रिदाबाद में हुआ था, परवरिश उनकी दिल्ली में, और बाद में मुम्बई में हुई। पिता
माता-पिता के साथ बालक सोनू एक शादी के शो में गाते हुए
अगम कुमार निगम और माँ शोभा निगम भी गायक थे पर फ़िल्म जगत में दाखिल नहीं हो सके, और दोनों की गायिकी स्टेज शोज़, शादी और जागरण तक ही सीमित रह गई। सोनू के पिता अगम जी शुरु शुरु में मुंबई फ़िल्मी पार्श्वगायक बनने आए ज़रूर थे, जेब में पैसे नहीं, रेल्वे प्लैटफ़ॉर्म पर सोया किए। अगम कुमार निगम गायक बनने के लिए वो सब नहीं कर सके जो सोनू ने किया। लोगों के पीछे भागना, स्टुडियो के बाहर घंटों इन्तज़ार करना, चपरासी तक के पाँव छूना और ऐसे लोगों के पाँव पकड़ना जो उन जगहों पर विराजमान थे जहाँ होने की उनकी काबलियत ही नहीं थी, ये सब ना कर पाने की वजह से अगम कुमार निगम को किसी ने नहीं पूछा, और हार मान कर वो दिल्ली वापस चले गए और स्टेज शोज़, जागरण और शादी-व्याह में गाने लगे। इसी दौरान स्टेज शोज़ करते हुए गायिका शोभा से उनकी जान-पहचान बढ़ी, दोनों में प्यार हो गया और घर से भाग कर दोनों ने शादी कर ली। जल्दी ही सोनू का जन्म हुआ; और चार वर्ष की आयु से सोनू भी अपने माता-पिता के साथ शोज़ में गाने लगे। 7 से 10 वर्ष की उम्र में सोनू ने कुछ फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार अभिनय किया जैसे कि ’प्यारा दुश्मन’, ’उस्तादी उस्ताद से’, ’हमसे है ज़माना, ’तक़दीर’ और ’बेताब’। सोनू एक होनहार बच्चा था, अपनी कक्षा में वो अव्वल आता था। कक्षा दसवीं तक अव्वल आने के बाद उनके मन में एक वैज्ञानिक बनने की चाह जागृत हुई। लेकिन होनी को कुछ और मंज़ूर थी। 15 वर्ष की आयु में सोनू की आवाज़ खुल गई और उनकी गाती हुई आवाज़ बेहद सुन्दर सुनाई देने लगी, बिलकुल एक फ़िल्मी गायक जैसी।


जब सोनू 15 वर्ष के थे, तब माता, पिता और उनके द्वारा प्रस्तुत शो के लिए कुल 50 रुपये मिला करते थे।
धीरे धीरे राशि बढ़ी और 175 रुपये तक पहुँची। सोनू मुंबई जाकर संघर्ष करने के लिए पैसे बचाने लगे। उनकी दृष्टि लक्ष्य पर थी। बारहवीं उत्तीर्ण करते ही सोनू ने पढ़ाई से किनारा कर लिया और अपने पिता के साथ 18 वर्ष की आयु में 1991 में मायानगरी मुंबई चले आए। सोनू ने संगीत ऑडियो कैसेट्स सुन सुन कर ही सीखा था, पर मुंबई में लोग उनकी तालीम के बारे में सवाल ना खड़ा कर सके, सिर्फ़ इस वजह से उन्होंने दिल्ली में रहते चार महीनों का एक कोर्स किया जिसमें राग और ताल की प्राथमिक शिक्षा उन्हें मिली। पिता अगम कुमार निगम को फ़िल्म-इंडस्ट्री का सबकुछ पता था, इसलिए उनकी दूर-दृष्टि से उन्होंने अपने बेटे की हर क़दम पर मदद की, उन्हें गाइड किया। पिता ने उन्हें चेतावनी दी कि चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे कितने भी पैसे मिले, पार्श्वगायक बनने से पहले मुंबई में कभी स्टेज शोज़ या शादी में नहीं गाना। अगम जी को पता था कि अगर एक बार सोनू शोज़ करते हुए पैसे कमाने लग गया तो पार्श्वगायक बनने का जुनूं ख़त्म हो जाएगा और वो भी उन जैसा नाकामयाब गायक बन कर रह जाएगा। मुम्बई में पिता-पुत्र शुरु-शुरु में उनके किसी रिश्तेदार के घर पर ठहरे हुए थे। बाद में उन्होंने दिल्ली का अपना मकान बेच दिया और मुंबई के अन्धेरी में एक कमरे का एक फ़्लैट ख़रीद कर मुंबई शिफ़्ट हो गए। माँ अभी भी दिल्ली में ही थीं क्योंकि उनके शोज़ वहाँ हुआ करते थे। पिता-पुत्र अन्धेरी के एक कमरे वाले फ़्लैट में रहने लगे। सोनू ही खाना पकाते, झाडू लगाते, कपड़े धोते, बरतन माँजते, घर की तमाम साफ़-सफ़ाई करते। आलम यह था कि वहाँ आस-पड़ोस के कुछ लोग उन्हें घर का नौकर समझ बैठे थे!

सोनू के पिता ने उन्हें यह सीख दी थी कि या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो। यह सीख सोनू ने सदा याद रखी। अन्धेरी के फ़्लैट में उनका कोई टेलीफ़ोन नहीं था, उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं आया था, इसलिए सोनू को PCO जाकर सारे म्युज़िक कंपनियों और संगीतकारों को फ़ोन लगा कर उनसे समय माँगना पड़ता था। कई बार दूसरी तरफ़ से बिना कोई जवाब दिए ही फ़ोन काट दिया जाता, कभी कोई ग़लत तरीक़े से जवाब दे देता। पर सोनू ने हिम्मत
नहीं हारी। इन सब बातों को नज़रन्दाज़ करते हुए अपनी नज़र को सिर्फ़ अपनी मंज़िल की तरफ़ रखा, बाक़ी सब भूल गए। संघर्षरत सोनू सुबह से ही संगीतकारों के दफ़्तरों में जाकर बैठ जाते थे, कि आप आओ और मुझे सुनो। सात-आठ घंटे बिना खाये पीये रेकॉर्डिंग् स्टुडिओज़ के बाहर बैठे रहते इस उम्मीद से कि शायद आज मुझे कोई सुन ले। थकने का सवाल ही नहीं था। और अगर जुनून सवार है सर पे कुछ बनने की तो थकावट तो आती ही नहीं। इन्डस्ट्री में सोनू का कोई Godfather नहीं था, उन्हें ख़ुद अपना रास्ता बनाना था, तमाम चुनौतियों का ख़ुद ही मुक़ाबला करना था। सोनू ने एक इन्टरव्यू में यह बताया कि ट्रेन से उतर कर पिता के साथ वो सीधे बान्द्रा के उसी कॉकरोच वाले मानसरोवर होटल में ठहरने के लिए गए जहाँ धर्मेन्द्र ठहरे थे जब वो पहली बार मुंबई आए थे। धर्मेन्द्र की तरह उनकी क़िस्मत का सितारा भी चमका दे यह होटल, क्या पता! पिता-पुत्र ने होटल के कमरे में सामान रखा और सीधे सचिन पिलगाँवकर के पास चल दिए। सचिन ने सोनू को दिल्ले के एक प्रतियोगिता में सुन सुन रखा था और सोनू के पिता को उस समय यह कहा भी था कि जब ये बड़ा हो जाए तो उनके पास ले आएँ। सचिन पिता-पुत्र से बहुत अच्छी तरह से मिले। फिर वो गए अनु मलिक के पास जिन्होंने सोनू को दिल्ली के ही एक अन्य प्रतियोगिता में सुना था। जब सोनू ने उन्हें याद दिलाया कि वो वही लड़का है जिसनी टूटीघुई टाँग के साथ गाना गाया था, तब अनु मलिक को याद आ गया। हालाँकि अनु मलिक के पास सोनू के लिए कोई काम नहीं था उस समय, पर वो अच्छी तरह से मिले।

सचिन और अनु मलिक के बाद सोनू और अगम साहब पहुँचे उषा खन्ना के पास। उन्हें ख़बर थी कि उषा जी
नए कलाकारों को ब्रेक देती हैं। सात घंटे इन्तज़ार करने के बाद सोनू को उषा खन्ना के दर्शन हुए और अपना गीत सुनाने का मौक़ा भी मिल गया। उषा खन्ना को सोनू की आवाज़ बहुत अच्छी लगी और जल्दी ही उनके संगीत में सोनू से उनका पहला गाना गवाया। लेकिन यह गीत सोनू के करीअर में कोई कमाल नहीं दिखा
सका। पिता-पुत्र पूरे मुंबई शहर में बसों में और बाद में एक टू-व्हीलर पर घूमा करते काम की तलाश में। उसके बाद 1992 में सोनू को एक डमी गीत गाने का मौका मिला जो एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम् द्वारा गाया जाने वाला था। शूटिंग् डमी वर्ज़न से हुई और इस तरह से फ़िल्म के सेट पर गाना बार बार बजने की वजह से गुल्शन कुमार के दिल-ओ-दिमाग़ पर सोनू की आवाज़ रच बस गई। गुल्शन कुमार को संगीत की समझ थी, हीरा परखना जानते थे, और उन्होंने सोनू को बुलवा भेजा। सोनू को देख कर गुल्शन कुमार बोले, "ओय, कोहली तो कह रहा था कि आप छोटे हो, लेकिन आप तो बहुत छोटे हो!" लेकिन गुलशन कुमार ने सोनू वाला डमी वर्ज़न को ही अप्रूव कर दिया और "ओ आसमाँ वाले" गीत सोनू का पहला ब्रेक सिद्ध हुआ। गुल्शन कुमार ने सोनू से यह वादा लिया कि चाहे वो बाहर कितने भी मूल गीत गाए, लेकिन कवर वर्ज़न सिर्फ़ उन्हीं के लिए गाए। टी-सीरीज़ की कुछ फ़िल्मों में गाने बावजूद सोनू को किसी महत्वपूर्ण फ़िल्म में गाने का मौक़ा नहीं मिला। उस समय कुमार सानू, उदित नारायण और अभिजीत शीर्ष पर चल रहे थे। सोनू ने इसी दौरान टेलीविज़न पर ’अन्ताक्षरी’ में हिस्सा लिया और फिर ’सा रे गा मा’ को होस्ट कर ख़ूब लोकप्रियता हासिल की और घर-घर वो पहचाने जाने लगे। और फिर 1997 में उन्होंने गाया वह गीत जिसके बाद फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। "संदेसे आते हैं, हमें तड़पाते हैं" गीत ने उन्हें बतौर पार्श्वगायक फ़िल्म जगत में स्थापित कर दिया। सोनू के माता-पिता ने अपने बेटे का साथ देते हुए अपने बेटे के ज़रिए वह मुकाम हासिल किया जो मुकाम वो दोनों हासिल न कर सके। माँ-बाप के लिए इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात भला और क्या हो सकती है!  ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम सोनू निगम को ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं, साथ ही सलाम करते हैं उनके माता-पिता शोभा निगम और अगम कुमार निगम को। 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



1 comment:

sanjay patel said...

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