शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

चित्रशाला - 04 :फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें

चित्रशाला - 04

फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। मिर्ज़ा ग़ालिब की लोकप्रियता जितनी है शायद और किसी शायर की नहीं। हिन्दी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में भी ग़ालिब हर दौर में आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे। आज ’चित्रशाला’ में हम चर्चा करने जा रहे हैं उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों का जो या तो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें हैं या फिर जिनमें ग़ालिब की ग़ज़लों या शेरों का असर है। प्रस्तुत है आपके इस दोस्त सुजॉय चटर्जी द्वारा शोध किए हुए इस विषय पर यह लेख।





1931 में 'इम्पीरियल मूवीटोन' नें पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ का निर्माण कर इतिहास रच दिया था। इसी कम्पनी की 1931 की एक और फ़िल्म थी 'अनंग सेना' जिसमें मास्टर विट्ठल, ज़ोहरा, ज़िल्लो, एलिज़र, हाडी, जगदीश और बमन ईरानी ने काम किया। फ़िल्म में अनंग सेना की भूमिका में ज़ोहरा और सुनन्दन की भूमिका में हाडी ने अभिनय व गायन किया। फ़िल्म में दो ग़ालिब की ग़ज़लें शामिल थीं – “दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है” और “दिल ही तो है न संगो-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यूं”। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें बोलती फ़िल्मों के पहले साल ही फ़िल्मों में प्रवेश कर गया। हाडी अभिनेता और गायक होने के साथ साथ एक संगीतकार भी थे और ग़ालिब की इन ग़ज़लों को उन्होंने ही कम्पोज़ किया था। १९४३ की 'बसन्त पिक्चर्स' की फ़िल्म ‘हण्टरवाली की बेटी’ में छन्नालाल नाइक का संगीत था, इस फ़िल्म में ख़ान मस्ताना ने ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “दिले नादां तुझे हुआ क्या है” को गाया जिसे ख़ूब सफलता मिली थी। 


Jaddanbai
जद्दनबाई, जिन्होंने पिछले साल ‘संगीत फ़िल्म्स’ की स्थापना कर अपनी बेटी नरगिस (बेबी रानी) को 'तलाश-ए-हक़’ में लॉन्च किया था, की 1936 में इस बैनर तले दो फ़िल्में आईं - ‘हृदय मंथन’ और ‘मैडम फ़ैशन’। जद्दनबाई निर्मित, निर्देशित, अभिनीत और स्वरबद्ध ‘हृदय मंथन’ में जद्दनबाई के गाये तमाम गीतों में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यों” को भी शामिल किया गया था। इसी ग़ज़ल को 1940 में फिर एक बार फ़िल्म-संगीत में जगह मिली जब कलकत्ता के ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया’ की फ़िल्म ‘कैदी’ में संगीतकार भीष्मदेव चटर्जी नें इसे फिर एक बार कम्पोज़ किया। बल्कि इस फ़िल्म में ग़ालिब की दो ग़ज़लों शामिल हुईं; दूसरी ग़ज़ल थी “रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो, हमसुखन कोई न हो और हमज़बां कोई न हो”। संगीतकार रामचन्द्र पाल के भतीजे सूर्यकान्त पाल ने भी अपने चाचा की तरह फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में क़दम रखते हुए एस. के. पाल नाम से संगीतकार बने और पहली बार 1942 में ‘शालीमार पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘एक रात’ में संगीत दिया। इस फ़िल्म की अभिनेत्री नीना गाने में कमज़ोर थीं, और उनका पार्श्वगायन ताराबाई उर्फ़ सितारा (कानपुर) ने किया। पर रेकॉर्ड पर नीना का ही नाम छपा था। ‘हमराज़’ के ‘गीत कोश’ में भी नीना का ही नाम दिया गया है। कुछ गीत राजकुमारी ने भी गाए। ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं” को इस फ़िल्म के लिए नीना (सितारा) ने गाया था। 


Saigal
ग़ालिब की मशूर ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने” कई बार फ़िल्मों में सुनाई दी है। संगीतकार बी. आर. देवधर ने पहली बार 1933 की फ़िल्म 'ज़हर-ए-इश्क़' के लिए इसे कम्पोज़ किया था। मज़ेदार बात यह है कि इसी साल, यानी 1933 में फ़िल्म  ‘यहूदी की लड़की’ में 'न्यु थिएटर्स' में संगीतकार पंकज मल्लिक नें इसी ग़ज़ल को कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में रेकॉर्ड किया। राग भीमपलासी में स्वरबद्ध यह ग़ज़ल सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इम्पीरियल के अनुबंधित संगीतकारों में एक नाम अन्नासाहब माइनकर का भी था जिन्होंने 1935 के वर्ष में ‘अनारकली’ और ‘चलता पुतला’ जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था। ‘अनारकली’ में ग़ालिब की इसी ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल” को एक अन्य अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। 1934 की फ़िल्म ‘ख़ाक का पुतला’ में मास्टर मोहम्मद ने ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदबर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुइयाँ है, नींद क्यों रात भर नहीं आती” को कम्पोज़ किया था जिसे अच्छी सराहना मिली थी। 1935 में महबूब ख़ान निर्देशित फ़िल्म ‘जजमेण्ट ऑफ़ अल्लाह’ में संगीतकार प्राणसुख नायक का संगीत था। अन्य गीतों के साथ ग़ालिब की इसी मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदवर नहीं आती” को उन्होंने भी स्वरबद्ध किया था। 1949 की फ़िल्म 'अपना देश' में भी यही ग़ज़ल सुनने को मिली जिसके संगीतकार थे पुरुषोत्तम और गायिका थीं पुष्पा हंस। 1942 की ‘फ़ज़ली ब्रदर्स’ की फ़िल्म ‘चौरंगी’ (अंग्रेज़ी में Chauringhee) में काजी नज़रूल इस्लाम और हनुमान प्रसाद शर्मा संगीतकार थे। हनुमान प्रसाद की यह पहली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के लिए प्रसाद नें इस ग़ज़ल को कम्पोज़ किया था। 1941 में  ‘फ़ज़ली ब्रदर्स कलकत्ता’ ने मुन्शी मुबारक हुसैन को संगीतकार लेकर फ़िल्म बनाई ‘मासूम’। अन्य गीतों के अलावा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” को इस फ़िल्म के लिए कम्पोज़ किया गया था। 


A scene from Mirza Ghalib (1954)
1954 में मिर्ज़ा ग़ालिब पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनी, जिसमें भारत भूषण नें ग़ालिब का रोल अदा किया। साथ में थीं सुरैया। फ़िल्म में संगीत था मास्टर ग़ुलाम मुहम्मद का, और कहने की ज़रूरत नहीं, सभी ग़ज़लें ग़ालिब की लिखी हुई थीं। फ़िल्म में ग़ालिब की इन ग़ज़लों को शामिल किया गया था -
१. आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक (सुरैया)
२. दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है (तलत-सुरैया)
३. है बस कि हर एक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत (रफ़ी)
४. इश्क़ मुझको न सही वहशत ही सही (तलत)
५. नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल (सुरैया)
६. फिर मुझे दीद-ए-तर याद आया (तलत)
७. रहिए अब ऐसी जगह चलकर (सुरैया)
८. ये न थी हमारी क़िस्मत (सुरैया)


Gulzar
"ये न थी हमारे क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता", इस ग़ज़ल को उषा मंगेशकर नें शंकर जयकिशन की धुन पर फ़िल्म 'मैं नशे में हूँ' में गाया था। उधर गुलज़ार नें ग़ालिब का एक शेर लिया "दिल ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुरे जाना किए हुए", और इसी को ईलाबोरेट करते हुए फ़िल्म 'मौसम' का वह ख़ूबसूरत गीत लिख डाला। नए दौर में ग़ालिब की जिस ग़ज़ल को फ़िल्म में जगह मिली, वह थी "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"। फ़िल्म का नाम भी था 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' जो आई थी साल 2003 में। संगीतकार शान्तनु मोइत्रा नें शुभा मुदगल से इस ग़ज़ल को गवाया था इस फ़िल्म में। 


ग़ालिब की एक बेहद मशहूर शेर है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है यह वह आतिश ग़ालिब, कि लगाये ना लगे और बुझाये ना बने"। इस शेर का सहारा समय-समय पर फ़िल्मी गीतकारों ने लिय अपने गीतों को सजाने-सँवारने के लिए। उदाहरण स्वरूप, 1981 की फ़िल्म ’एक दूजे के लिए’ के मज़ेदार गीत "हम बने तुम बने एक दूजे के लिए" में एक पंक्ति है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं ग़ालिब ने कहा है इसीलिए, उसको क़सम लगे जो बिछड़ के एक पल भी जिये..."। इसके गीतकार थे आनन्द बक्शी। वैसे बक्शी साहब ने इस गीत से 10 साल पहले, 1970 में, फ़िल्म ’इश्क़ पर ज़ोर नहीं’ के शीर्षक गीत में भी इस जुमले का इस्तमाल किया और ख़ूबसूरत गीत बना "सच कहती है दुनिया इसक पे जोर नहीं, यह पक्का धागा है यह कच्ची डोर नहीं, कह दे कोई और है तू मेरा चितचोर नहीं, जो थम जाए वो ये घटा घनघोर नहीं, इस रोग की दुनिया में दवा कुछ और नहीं..."। 1995 की फ़िल्म ’तीन मोती’ में नवाब आरज़ू के कलम से निकले "इश्क़ पे कोई ज़ोर चले ना ना कोई मनमानी, फँस गई मैं तो प्रेम भँवर में अब क्या होगा जानी"। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें हर दौर में फ़िल्मों में आती रही हैं। कुछ तो है इन ग़ज़लों में कि इतने पुराने होते हुए भी आज की पीढ़ी को पसन्द आते हैं। दरसल ये कालजयी रचनाएँ हैं जिन पर उम्र का कोई असर नहीं। ग़ालिब नें जैसे लिखा था कि "आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक", ठीक वैसे ही इन ग़ज़लों का असर सदियों तक यूंही बना रहेगा। 

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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी



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