शनिवार, 20 दिसंबर 2014

"नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ..." - 15 साल बाद भी उतना ही सार्थक है यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 48 


"बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाएँ कहाँ..."





"आज पेशावर पाक़िस्तान में इंसानियत को शर्मिन्दा करने वाला जो हत्याकाण्ड हुआ, जिसमें कई मासूम लोगों और बच्चों को बेरहमी से मारा गया, वह सुन के मेरी रूह काँप गई। उन सभी के परिवारों के दुख में मैं शामिल हूँ" 
- लता मंगेशकर, 16 दिसम्बर 2014


"हमसे ना देखा जाए बरबादियों का समा, 
उजड़ी हुई बस्ती में ये तड़प रहे इंसान, 
नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ, 
बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाएँ कहाँ..."। 

रीब 15 साल पहले फ़िल्म ’पुकार’ के लिए लिखा गया यह गीत उस समय के परिदृश्य में जितना सार्थक था, आज 15 साल बाद भी उतना ही यथार्थ है। हालात अब भी वही हैं। आतंकवाद का ज़हर समूचे विश्व के रगों में इस क़दर फैल चुका है कि करीबी समय में इससे छुटकारा पाने का कोई भी आसार नज़र नहीं आ रहा है। आतंकवाद का रूप विकराल से विकरालतम होता जा रहा है। इससे पहले सार्वजनिक स्थानों पर हमला कर नागरिकों या फिर फ़ौजी जवानों पर हमला करने से बाज़ ना आते हुए अब लाचार और बेबस मासूम बच्चों को अपना निशाना बना कर आतंकवादियों ने न केवल इन्सानियत को ज़बरदस्त धक्का मारा है बल्कि अपनी कायरता और खोखलेपन का नमूना भी पेश किया है पूरी दुनिया के सामने। पेशावर की दुखद और कल्पनातीत घटना ने समूचे विश्व के लोगों के दिलों को दहला कर रख दिया है, विश्व के हर नागरिक को ऐसी चोट पहुँची है कि हम यह सोचने पर विवश हो गए हैं कि क्या हम वास्तव में इतने लाचार हो गए हैं कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ अब कुछ भी नहीं किया जा सकता? क्या यह बिल्कुल ही असम्भव है कि इस दुनिया के मुखपृष्ठ से आतंकवाद का नामोनिशाँ मिट जाए? और अगर यह मुमकिन है तो फिर कैसे? मज़हबी आतंकवाद भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्यपूर्व एशिया (इराक़, सीरिया आदि देशों) से लेकर अफ़्रीका के नाइजीरिया, केनिया तक अपनी जड़े फैला चुका है। किसी एक देश के लिए इसका खात्मा कर पाना सम्भव नहीं। ज़रूरत है एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के गठन की जिसके सदस्य हों इन तमाम देशों की सरकारें, और संयुक्त रूप से एक ठोस प्रणाली बना कर आतंकवाद पर इस तरह से शिकंजा कसा जाए कि कोई भी आतंकवादी फिर सर ना उठा सके। यह काम असम्भव सा प्रतीत ज़रूर हो रहा है पर मुमकिन है अगर हर देश की सरकार पूरी इमानदारी से इस काम में जुट जाए। इंसान आज मंगल की दर तक जा पहुँचा है, ऐस्टरॉयड के उपर अन्तरिक्ष यान लैण्ड करवा चुका है, तो क्या अपनी ही धरती से आतंकवाद जैसी बीमारी को दूर नहीं कर सकता? फ़िल्म ’पुकार’ के इसी गीत की शुरुआती पंक्तिओं की तरह ईश्वर-अल्लाह से हम बस यही प्रार्थना कर सकते हैं कि-

आ जा के सब मिल के रब से दुआ माँगे,
जीवन में सुकूँ चाहे, चाहत में वफ़ा माँगे,
हालात बदलने में अब देर ना हो मालिक,
जो दे चुके फिर ये अन्धेर ना हो मालिक।

और इस गीत के आख़िर की पंक्तिओं में प्रेम और अमन के सन्देश पर ज़ोर देते हुए जैसे कहा गया है कि "इन्हें फिर से याद दिला दें सबक वही प्यार का, बन जाये गुलशन फिर से काँटों भरी दुनिया", यही बात अगर हर एक इंसान की समझ में आ जाती तो यह संसार हमारे सपनों का संसार हो गया होता।

फ़िल्म ’पुकार’ साल 2000 की फ़िल्म थी। फ़िल्म में लता मंगेशकर का गाया यह एकमात्र गीत है और इसे उन्हीं पर फ़िल्माया गया है। स्कूली बच्चों के साथ गाया गया यह एक प्रार्थना गीत है जिसमें ईश्वर से प्रार्थना के साथ-साथ युद्ध या आतंकवाद के खिलाफ़ आवाज़ भी है; ठीक वैसे जैसे लता जी ने बरसों पहले फ़िल्म ’हम दोनों’ में "अलाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" गाया था। वैसे तो गीत के गायक कलाकारों के रूप में लता मंगेशकर और कोरस कहा गया है, पर विश्वसनीय सूत्र के हवाले से यह जानकारी मिली है कि जिन चार बाल-गायिकाओं ने लता जी के साथ अपनी आवाज़ें मिलाई थीं, उनके नाम हैं के. विद्या, आर. सुरविहि, आर. प्रिया और सुभिक्षा रंगराजन। इनमें से सुभिक्षा रंगराजन एक शास्त्रीय गायिका बन कर उभरी हैं, बाकि तीन बच्चियों भी क्या आगे चलकर गायिकाएँ बनीं, इसका पता नहीं लगाया जा सका। गायक कलाकारों के बाद अब गीतकार की बारी। फ़िल्म ’पुकार’ के गीतकार के रूप में मजरूह सुल्तानपुरी और जावेद अख़्तर के नाम दिए गए हैं, पर किन्होंने कौन सा गीत लिखा है इसकी जानकारी रेकॉर्ड लेवल पर नहीं दिया गया। सम्भवत: साल 2000 में मजरूह के निधन के बाद जावेद अख़्तर से अधूरा कार्य सम्पन्न करवाया गया होगा। IMDB Database के अनुसार "एक तू ही भरोसा" गीत को मजरूह ने लिखा है, पर कुछ फ़िल्म विश्लेषकों का यह मानना है कि इस गीत के शब्दों पर ग़ौर करने से ऐसा लगता है कि ये जावेद अख़्तर के लिखे बोल हैं। ऐसा मानने का यह भी कारण हो सकता है कि इसी फ़िल्म के आसपास बनने वाली दो और फ़िल्मों - ’1947 अर्थ' और ’बॉर्डर' में उन्होंने इसी तरह के देशभक्ति और विश्वशान्ति के गीत लिखे थे। और आख़िर में बात इस गीत के संगीत की। लता और बच्चों की आवाज़ों के साथ-साथ पियानो के arpeggios का जो संगम ए. आर. रहमान ने किया है, उसने गीत को एक अलग ही मुकाम तक जा पहुँचाया है। इस गीत की धुन रहमान ने इस फ़िल्म के बनने के चार साल पहले, यानी कि 1996 में कम्पोज़ किया था, बोसनिआ के सिविल वार में मरने वाले लाखों लोगों की याद में, जिसे उन्होंने "Oh Bosnia" शीर्षक गीत के माध्यम से मलयेशिया के एक कॉनसर्ट में प्रस्तुत किया था। इसी धुन का इस्तेमाल कर "एक तू ही भरोसा, एक तू ही सहारा" का यह भजन बना, जिसे सभी ने हाथों हाथ ग्रहण किया। 2000 के दशक में लता जी के गाए चन्द गीतों में यह एक महत्वपूर्ण रचना है जो आज के विश्व में एक मार्गदशक गीत है, जिसके बोलों को अगर सही मायने में समझा जाए तो शायद इस विश्व से आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा। आइए ऐसी ही दुआ करें।

फिल्म - पुकार : 'आजा कि सब मिल के रब से दुआ मांगे...' : लता मंगेशकर और बच्चे 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से 16 दिसम्बर 2014 के दिन पेशावर में हुए हत्याकाण्ड में मृत  132 बच्चों की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन और अश्रुपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित है।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी, कृष्णमोहन मिश्र

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