शनिवार, 10 मई 2014

गायिका जुथिका रॉय के पहली बार रेडियो पर गाने का अनुभव



स्मृतियों के स्वर - 01

गायिका जुथिका रॉय के पहली बार रेडियो पर गाने का अनुभव



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। आज से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लायूंगा कुछ अनमोल मोतियाँ और आपके साथ बाँटूंगा हमारे इस नये स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। हम और आप साथ मिल कर गुज़रेंगे स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। तो आइये आज इसकी पहली कड़ी में मिलें गुज़रे ज़माने की सुप्रसिद्ध भजन गायिका जुथिका रॉय से और जानें कि बरसों बरस पहले जब पहली बार उन्होंने रेडियो पर अपना पहला गीत गाया था, वह अनुभव कैसा था।




सूत्र: विविध भारती, मुंबई

कार्य्रक्रम: आज के महमान - जुथिका रॉय से उद्‍घोषक कमल शर्मा की बातचीत

प्रसारण तिथि: 18 फ़रवरी 2009




जुथिका जी, आपका इस कार्यक्रम में बहुत-बहुत स्वागत है, नमस्कार!


आज तो बहुत ही आनन्द का दिन है। बहुत बरस पहले मैं आकाशवाणी में आयी थी, आज फिर से विविध भारती में आ रही हूँ।


और हमारे लिये भी ऐतिहासिक पल है, विविध भारती के श्रोताओं के लिये भी, मेरे लिये भी, और हमारे पूरे परिवार के लिए भी, कि आप हमारे इस कार्यक्रम में पधारीं हैं और आप से बातचीत करने का मौका हमें मिला है। क्योंकि बात रेडियो की है और रेडियो के स्टुडियो में आप आयीं हैं और आकाशवाणी का एक महत्वपूर्ण लोकप्रिय चैनल है विविध भारती, मुझे जहाँ तक मालूम है, और बहुत से श्रोताओं को भी मालूम होगा, कुछ लोग शायद यह नहीं जानते होंगे कि आपके गायन की शुरुआत एक तो बचपन से हुई और रेडियो से हुई, तो कितनी बरस की थीं आप जब पहली बार रेडियो पर गाना गाया?

जब मैं सात बरस की थी, उस वक़्त मैं रेडियो पर पहली दफ़े गायी हूँ। मेरे पिताजी का बहुत शौक था कि मैं छोटी उम्र से ही रेडियो पर ग्रामोफ़ोन में गाना करूँ। इसलिए जब मैं सात बरस की हुई तो पिताजी मुझे रेडियो पर ले आये और ऑडिशन दिया मैंने, और पास भी हो गई, और एक दिन के बाद हमको कॉनट्रैक्ट मिल गया। पहले मेरी पाँच मिनट का कॉनट्रैक्ट था और उसमें मेरा एक गाना था। तो मैं रबीन्द्र संगीत गायी थी, जिसके बोल थे "आर रेखो ना आँधारे आमाय, देखते दाओ" (अनुवाद - "और मुझे अंधेरे में मत रखो, मुझे देखने दो")।


क्या बात है! आपको अभी भी याद है आपने क्या गाया था?

हाँ, थोड़ा-थोड़ा याद है।


81 या  82 साल पहले आपने यह गाया होगा, और रेडियो पर मैं समझता हूँ कि यह 1927 के आसपास का गाना होगा। तब आकाशवाणी की बस शुरुआत ही हुई थी।

जी, एकदम शुरुआत में।


आपको कुछ याद है कौन कौन लोग थे उस वक़्त आपके ऑडिशन में, कोई दिग्गज हस्ती?

नहीं, एक घटना है जो बहुत अच्छी तरह अभी तक मुझे याद है। मैं जब गाने लगी तो उधर इन्स्ट्रुमेण्ट नहीं था, खाली, क्योंकि एकदम शुरू के समय में मैं गायी थी, कोई यन्त्र या कोई ऐकोम्पनिस्ट हमारे साथ नहीं बजाये। मैंने बिल्कुल खाली गले से यह गाना गायी।


अकेले, यानी आपके साथ कोई संगत नहीं था।

नहीं, पेटी (हारमोनियम) भी नहीं। गाया मैंने, ब्रॉडकास्ट हुआ, सभी ने सुना। लेकिन मैं नहीं सुन पायी, मेरी बहुत इच्छा हुई कि कैसे मैं यह सुनूंगी, किस के पास से मैं जान सकूंगी कि मेरा गाना कैसा हुआ, सबको कैसा लगा, यही चिन्ता लेकर मैं घर वापस आयी। वापस आने के बाद मैंने देखा कि सारे खड़े हैं, किसी के चेहरे पर आनन्द नहीं है, सभी निराश बन कर खड़े हैं। तो मैंने पूछा कि मेरा गाना कैसा लगा? पहले को पूछा, उन्होंने आहिस्ते आहिस्ते बोला कि "दीदी, मैंने तो सिर्फ़ दो लाइन ही सुना है"। तो फिर मैंने दूसरे को पूछा कि आपको कैसा लगा? तो बोले कि "दीदी, मैं कान में देने के बाद...", उस वक़्त रेडियो में हेडफ़ोन होता था, कोई साउण्ड बॉक्स नहीं होता था, इसलिए कान में लगाकर सुनना पड़ता था, तो बोले, "देखिये दीदी, एक लाइन सुनने के पहले ही किसी ने मेरे कान से ले लिया, मैं बराबर सुन नहीं पाया कि कैसा हुआ"। तो तीसरे को मैंने पूछा कि कैसा लगा, तो बोली कि "देखिये बहुत देर तक मैं अपेक्षा करते करते जब कान में ले लिया तो पीछे से कौन छो मार कर ऐसे ले लिया"।


मतलब हेडफ़ोन छीन लिया।

"एक वर्ड भी नहीं सुना"। तो मैं शेष जो वहाँ पे खड़ा था, उससे पूछा कि बताइये न कैसा लगा मेरा गाना, मुझे बहुत इच्छा है कि मुझे पता चले कि कैसा हुआ गाना, तो बोले कि "रेणु, जब तक मैं कान में लिया तो कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा चल रही थी"। वो तो नाराज़ हो गया (जुथिका जी ये सब कहते कहते हँस पड़ीं)। तो यह घटना मुझे अभी तक याद है। उस वक़्त इसी तरह हम लोग सुनते थे। सब लोग एक दो लाइन सुनते थे, सुनने के लिए सब लोग खड़े रहते थे लेकिन सबको थोड़ा-थोड़ा ही सुनने को मिलता था।


अच्छा, तो क्योंकि आपने पहली रचना बांगला में गायीं और वह रबीन्द्र संगीत था, घर में आपके संगीत का माहौल था? आपके पिताजी या माँ संगीत में रुचि रखते थे? किसने सिखाया आपको? कहाँ से संस्कार मिले इसके आपको?

मेरे घर में संगीत तो सब कोई पसन्द करते थे, सुनते थे, मेरे पिताजी के पिताजी थे प्रियनाथ रॉय, मेरे पिताजी सत्येन्द्रनाथ रॉय, और मेरे काकाजी, माताजी, सभी को गाने का बहुत शौक था। लेकिन वह ज़माना ऐसा था कि कोई लड़की तो गाना नहीं गा सकती थी। हमारे देश में, शेनहाटी में हम रहते थे, तो उधर तो गाना नहीं गा सकते थे। बाहर तो नहीं गा सकते थे, लेकिन घर में हमारे पिताजी सिखाते थे। ऑफ़िस से वापस आने के बाद हमें साथ में लेकर बैठते थे, सुनाते थे। और रेकॉर्ड्स, उस ज़माने के जो सब बड़े-बड़े शिल्पि थे, वो पिताजी ले आते थे और बजाते थे, और उन रेकॉर्ड्स से हमें गाना सिखाते थे। के. सी. डे, कानन बाला, इन्दु बाला, और भी बहुत अच्छे-अच्छे गाने हमको सिखाते थे। इसी तरह हम चलते थे, लेकिन बाहर जा कर गाना नहीं हो सकता था। मेरी माँ बहुत फ़ाइट करती थी कि क्यों नहीं जायेगी बाहर? बाहर नहीं जायेगी, पढ़ाई नहीं करेगी, गाना नहीं गायेगी, तो कैसे चलेगा? माताजी ने बहुत फ़ाइट करके हम लोगों को स्कूल भेजा, गाना भी सिखाया, सब कुछ माताजी ने किया।


मतलब माताजी बहुत ही प्रगतिशील विचारों की थीं और उस दौर में जब समाज में इस तरह का नज़रिया नहीं था लड़कियों के बारे में, वो सोचती थीं कि लड़कियों को भी इस तरह का मौका मिले।

जी।


और आपके पिताजी भी, हमें मालूम है कि एडुकेशन इन्स्पेक्टर थे। तो उनका भी बड़ा योगदान रहा आपको पढ़ाने लिखाने में, है न?

हाँ, पिताजी का ऐसा मानना था कि समाज में कोई गोलमाल होगा, लोग नाराज़ होंगे, इसमें नहीं जाना, चुपचाप रहो, इस तरह का था उनका। लेकिन माताजी का ऐसा नहीं था। समाज में गोलमाल होगा तो बाद में ठीक हो जायेगा, पिताजी ना नहीं करते थे लेकिन वैसे भी नहीं थे।


माँ ढाल बन के खड़ी थीं।

हाँ, माताजी ने सब कुछ किया, हमको स्कूल भी भेजा और मास्टर भी रखा पढ़ाने के लिए। हमने इन्स्ट्रुमेण्ट्स भी सीखा - वायलिन, एसराज, दिलरुबा।

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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार विविध भारती के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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