Showing posts with label saturday special. Show all posts
Showing posts with label saturday special. Show all posts

Saturday, February 11, 2012

पुस्तक प्रिव्यू - उपन्यास “आमचो बस्तर” पर एक दृष्टि तथा कुछ उपन्यास अंश



उपन्यास –आमचो बस्तर
लेखक- राजीव रंजन प्रसाद
प्रकाशक – यश प्रकाशन, नवीन शहादरा, नई दिल्ली

अभी बहुत समय नहीं गुजरा जब बस्तर का नाम अपरिचित सा था। आज माओवादी अतिवाद के कारण दिल्ली के हर बड़े अखबार का सम्पादकीय बस्तर हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैय्यर के शब्द हैं – ‘बस्तर अनेक सूरदास विशेषज्ञों का हाथी है, सब अपने अपने ढंग से उसका बखान कर रहे हैं। बस्तर को वे कौतुक से बाहर बाहर को देखते हैं और वैसा ही दिखाते हैं।‘ माओवाद पर चिंता जताते हुए इस अंचल के वयोवृद्ध साहित्यकार लाला जगदलपुरी कहते हैं कि ‘नक्सली भी यदि मनुष्य हैं तो उन्हें मनुष्यता का मार्ग अपनाना चाहिये।‘ अब प्रश्न उठता है कि इस अंचल की वास्तविकता क्या है? क्या वे कुछ अंग्रेजी किताबें ही सही कह रहे हैं जिनमें गुण्डाधुर और गणपति को एक ही तराजू में तौला गया है, भूमकाल और माओवाद पर्यायवाची करार दिये गये हैं। बस्तर में माओवाद के वर्तमान स्वरूप में एसे कौन से तत्व हैं जो उन्हें ‘भूमकाल’ शब्द से जोडे जाने की स्वतंत्रता देते हैं? क्या इसी जोडने मिलाने के खेल में बस्तर के दो चेहरे नहीं हो गये? एक चेहरा जो अनकहा है और दूसरा जिसपर कि एक बस्तरिया कहावत ही सही बैठती है – “कावरा-कोल्हार” (काक-कोलाहल)। लेखक का मानना है कि इन्ही प्रश्नों के मनोमंथन के दौरान ही उपन्यास “आमचो बस्तर” की संकल्पना हुई।

उपन्यास में दो समानांतर कहानियाँ हैं। पहली कहानी है जो प्रागैतिहासिक काल से आरंभ करते हुए प्राचीन बस्तर में संघर्ष के चिन्ह तलाशती है, प्रचलित मिथकों में संघर्ष के मायने ढूंढती है। नल-वाकाटक-नाग-गंग तथा काकतीय/चालुक्य वंश के शासनकाल (जिसमें मराठा आधिपत्य एवं ब्रिटिश आधिपत्य का काल सम्मिलित है) में हुए सशस्त्र विद्रोहों के पीछे के कारण और भावनायें तलाश करती है।.....शताब्दियों से बस्तर के आदिवासियों को अपनी लडाईयाँ लडते हुए इतनी समझ रही है कि उन्हें क्या चाहिये और शत्रु कौन है। यह चाहे 1774 की क्रांति में कंपनी सरकार का अधिकारी जॉनसन हो या कि 1795 के विद्रोह में कम्पनी सरकार का जासूस जे. डी. ब्लंट। 1876 के हमलों के पीछे आदिवासियों के हमलों का लक्ष्य सरकारी कर्मचारी (मुंशी) थे जिससे भिन्न किसी भी व्यक्ति पर आक्रमण नहीं किया गया तो 1859 के कोई विद्रोह में केवल उनकी ही हत्या की गयी जिन्होंने चेतावनी के बावजूद भी सागवान के वृक्ष काटे। पुनश्च, अपने राजा, मराठाओं, ब्रिटिश सरकार तथा स्वतंत्र भारत सरकार के विरुद्ध जो भूमकाल हुए वे हैं – हलबा विद्रोह (1774-1779), भोपालपट्टनम संघर्ष (1795), परलकोट विद्रोह (1825), तारापुर विद्रोह (1842-1854), मेरिया विद्रोह (1842-1863), महान मुक्ति संग्राम (1856-57), कोई विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी-चो-रिस (1878-1882), महान भूमकाल (1910), महाराजा प्रबीर चंद्र का विद्रोह (1964-66)। इस सभी क्रांतियों के सूत्रधार उपन्यास के पात्र हैं। उपन्यास की समानांतर चलने वाली दूसरी कहानी बस्तर के शिक्षित नवयुवकों के संघर्ष की है। इन पात्रों और उनके जीवन संघर्ष की अनेकों घटनाओं के माध्यम से शोषण, हत्याओं तथा वर्गसंघर्ष के माओवाद से संबंध को समझने का एक प्रयास भी है। उपन्यास में कोशिश की गयी है कि घटनाओं का वर्णन करते हुए ही बस्तर के पर्यटन स्थल, यहाँ की सांस्कृतिक विशेषतायें, तीज त्यौहार, देवी-देवता और आस्था, पहनावा, लोक नृत्य, दशहरा आदि का विवरण भी हो जिससे इस उपन्यास के पाठक के मन में बस्तर क्षेत्र की एक स्पष्ट तस्वीर उभर सके। उपन्यास में लेखक नें विषय की जटिलता के कारण रिपोर्ट और कहानी को जोडने का प्रयोग किया है। लेखक नें रिसर्च आधारित इस उपन्यास के निष्कर्षों के सर्वे- तकनीक का भी प्रयोग किया है जिसमें बस्तर के लगभग सभी हिस्सों से सभी उम्र के शिक्षित आदिवासियों, अशिक्षित आदिवासियों, गैर-आदिवासियों से सामाजिक-आर्थिक स्थिति, विकास को ले कर उनकी सोच, पर्यावरण पर उनका दृष्टिकोण आदि को ले कर कई प्रश्न उनके सम्मुख रखे। उपन्यास में पंडा बैजनाथ, नरोन्हा से ले कर ब्रम्हदेव शर्मा तक जो प्रशासक रहे हैं उनकी नीतियों और दूरगामी प्रभावों पर भी बात की गयी है।

आतीत के आन्दोलन यह बताते हैं कि आदिवासी जागरूक हैं और अपनी लडाई स्वयं लडना जानते हैं उन्हें विचारचाराओं की घुट्टी पिला कर हो सकता है हम उनके भीतर के मूल तत्व से ही वंचित हो जायें या कि इस अंचल की पहचान ही बदल जाये। स्वत:स्फूर्त आन्दोलनों और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिये होने वाले सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध के बीच की बारीक रेखा पर उपन्यास में चर्चा की गयी है। वस्तुत: यह उपन्यास माओवाद का विश्लेषण करने की अपेक्षा बस्तरियों की वह दिशा और दशा को चित्रित करता है जो थोपे गये युद्ध के कारण हो गयी है। उपन्यास यह विश्लेषित करता है कि किस तरह मुलुगु के जंगलों में मिल रही असफलता के बाद तथा कई राज्यों से सीमा जुड़े होने के कारण नक्सलवादी अबूझमाड क्षेत्र में प्रविष्ठ हुए। स्वयं को बनाये रखने के लिये मुद्दो की पहचान बाद में की गयी तथापि पैंतीस वर्ष से अधिक की अपनी उपस्थिति में उपलब्धि के नाम पर तेन्दू पत्ता के दाम निर्धारण के अलावा कोई ठोस उपलब्धि गिनाने के लिये नहीं है। बस्तर क्षेत्र में किसी मजदूर या किसान आन्दोलन में प्रतिनिधित्व का श्रेय भी माओवादियों को नहीं जाता। अपनी भैगोलिक विवशताओं के कारण वाम-अतिवादियों की शरणस्थली बना अबूझमाड़ देख रहा है किस तरह आदिम परम्परायें, जीवनशैली और भाषा सभी नष्ट होते जा रहे हैं।

कुछ अंश उपन्यास से –

“तुमने झारखण्ड में कभी सुना है कि माओवादी उलगुलान कर रहे हैं? नहीं न? तो फिर बस्तर में वे ‘भूमकाल’ शब्द को कैसे ओढ़ सकते हैं? इस शब्द में आत्मा है। यह बस्तर के आदिवासियों की एकता, संगठन क्षमता और संघर्ष का प्रतीक शब्द है। इस शब्द की अपनी मौलिकता है। माओवादियों द्वारा भूमकाल शब्द के इस्तेमाल पर मुझे आपत्ति है।“


“क्या इससे कुछ फर्क पड़ता है?”


“हाँ कल कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढियाँ यह समझें कि भूमकाल 2004 को आरंभ हुआ। भूमकाल सलवा जुडुम के खिलाफ लड़ाई थी। भूमकालिये गणपति, किशनजी, गुडसा उसेंडी आदि आदि हैं। मैं यह मानता हूँ कि भूमकाल शब्द का इस्तेमाल आदिवासियों की पहचान मिटाने की साजिश है। जब तक गुण्ड़ाधुर की वीरता, काल कालेन्द्र के संघर्ष या ड़ेबरीधुर के बलिदान की कहानियाँ धूमिल नहीं होंगी बारूदी सुरंग में मारी जा रही लाशो पर लाल सलाम का जयघोष भूमकाल नहीं कहा जा सकता।” दीपक ने अपने भावावेश को दबाने के लिये निधि की हथेली जोर से दबा दी।


“क्या तुमको नहीं लगता कि बस्तर पर जो लेखन हो रहा है उससे लोगों की रुचि....”


“ठहरो ठहरो। तुम गलत ट्रैक पर जा रही हो। बस्तर पर कम, इन दिनों माओवादियों और उनके आधार क्षेत्र पर अधिक लिखा जा रहा है। आश्चर्य की बात है न कि किसी की रुचि यहाँ के लोग, उनकी परम्परायें, उनकी जीवन शैली, उनकी चाहत, उनके सपने....किसी में नहीं है। हालिया लेखन ने घर-घर तक पहुँचाया है कि माओवादी कैसे रहते हैं, क्या खाते हैं क्या सोचते हैं...”
-----------


“तो आप माओवाद का बस्तर में क्या भविष्य देखते है?” दीपक ने पूछा।


“मैं ड़रा हुआ हूँ। मुझे बुरे सपने आते हैं। तुम लोग माड़ इलाके से आ रहे हो। दीपक क्या वहाँ तुम्हे वही गाता गुनगुनाता बस्तर दिखा? बंदूख ताने पीटी करते और लाल सलाम चीखते लोग वो हैं जिनसे मिट्टी की खुशबू ने मुँह मोड़ लिया है। तुमने वहाँ माँदर की थाप पर गाये जाते लोग गीत सुने? अब तो साम्राज्यवाद से विरोध के गीत होते है। इन गीतों में जीवन नहीं है, मस्ती नहीं है बस्तरियापन नहीं है। घोटुल मर गये। धीरे धीरे अपना अस्तित्व खो रहे हैं भीमादेव, आंगादेव, पाटदेव, भैरवदेव, लिंगो और माँ दंतेश्वरी भी। भूत-प्रेत, जादू-तोना, झाड़-फूक, सिरहा-गुनिया, पँजियार, पेरामा, गायता....कुछ भी नहीं रहा। मेले मड़ई और मुर्गा लड़ाई के बिना कैसा बस्तर? और कुछ ऐसा भी बदलाव हुआ है जो कभी सोचा नहीं था। अरुन्धति राय का लेख पढ़ना ‘वाकिंग विद द कामरेडस’; वो खुलासा करती हैं कि ‘आदिवासी औरतें केवल वर्ग-शत्रु की नृशंस हत्या दिखाने वाला वीडियो देखना पसंद करती हैं।‘ क्या यह बस्तर की आदिवासी औरतों की बात हो रही है? क्या इतना बदलाव हो गया है? क्या तुममे यह हिम्मत है कि अपने अखबार में यह सवाल खड़ा करो कि वो कौन लोग है जो आदिवासी युवतियों को नृशंस हत्याओं के वीडियो दिखा रहे हैं? साफ है कि किस तरह मासूम दिमाग से खेला जा रहा है और उनके भोलेपन की हत्या की जा रही है।”
-----------


“तो क्या आप सलवा जुडुम के समर्थक हैं?” निधि नें चुभने वाला सवाल किया।


“निधि यह एक खेमा पकडने वाली बात है जो सही नहीं है। एसा ही सवाल है जैसे कि अरे आप वामपंथी नहीं हैं तो निश्चित ही दक्षिणपंथी हैं? अगर मुझे इन दोनों साँचों में ढ़लने से इनकार हो तो? तुम्हें मैं एक कहानी बताता हूँ शायद उसके बाद हमें बहस में पड़ने की जरूरत न रह जाये।“


“जी...”


“कहानी मंगलू की है जिससे मैं दंतेवाड़ा में मिला था। तब वह सलवाजुडुम कैम्प में रह रहा था। मैने पूछा कि अपना घर-बाड़ी छोड कर क्यों भाग आये? उसने बताया कि उसके गाँव में माओवादी लोगों का हुकुम चलता है इससे उसे शिकायत नहीं थी। समस्या शुरु हुई जब उसके दो मुर्गों में से एक मुर्गा उसके ही पड़ोसी को बटाई में मिल गया। तुम्हें मालूम ही होगा कि किसी गाँव को अपने कब्जे में लेने के बाद जन-जानवर गणना की जाती है फिर माओवादी सभी धन-पशुधन को बराबरी के आधार पर बाँट देते हैं। रोज आधा पेट सोने वाला मंगलू पूंजीपति हो गया था क्योंकि अपने खून-पसीने से उसने दो मुर्गे सम्पत्ति बना ली थी। मंगलू इस बटाई के लिये सहमत नहीं था। उसने विरोध किया लेकिन दो चार थप्पड खाने के बाद उसे समानता का सिद्धांत समझ में आ गया। मंगलू के कुछ दिन भीतर ही भीतर कुढ़ते हुए बीते। दुर्भाग्य से उसका मुर्गा मर गया। अब उसकी पीड़ा और बढ़ गयी थी। बटाई में चला गया मुर्गा वापस पाने के लिये वह पडोसी से रोज झगड़ने लगा। बात सरकार चलाने का दावा करने वालों तक भी पहुँची लेकिन मंगलू को मुर्गा वापस नहीं किया गया। मंगलू के लिये यह मुर्गा दिन की तड़प और रात का सपना बन गया था। एक दिन जब बर्दाश्त नें जवाब दे दिया तो वह उठा और अपने मुर्गे की गर्दन मरोड़ कर गाँव से भाग गया.....।“ मरकाम नें कहानी को शून्य में छोड़ दिया।

सुनिए पुस्तक का एक अध्याय, लेखक राजीव रंजन प्रसाद के स्वर में - चावल के दाम 


सुनिए एक और अध्याय - नक्सलवाद और समकालीनता (स्वर: राजीव रंजन प्रसाद )


उपन्यास "आमचो बस्तर" का विमोचन दिल्ली में १५ फरवरी को होने जा रहा है, जिसमें आप सब सादर आमंत्रित हैं. रेडियो प्लेबैक के सभी श्रोता जो दिल्ली और आस पास के क्षेत्रों में रहते हैं इस साहित्यिक कार्यक्रम अवश्य पधारें. लीजिए पुस्तक के लेखक राजीव रंजन का आमंत्रण आपके सबके नाम -

आदरणीय स्वजन

बस्तर के अतीत और वर्तमान की त्रासदी पर केन्द्रित मेरा उपन्यास "आमचो बस्तर" यश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है जिसका लोकार्पण 15.02.2012 को छत्तीसगढ राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह करेंगे। इस अवसर पर आपकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है। विस्तृत कार्यक्रम की जानकारी संलग्न आमंत्रण पत्र में दी गयी है


विनीत-
राजीव रंजन प्रसाद
07895624088

Saturday, December 31, 2011

सिमटी हुई ये घड़ियाँ फिर से न बिखर जाएँ - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के महफ़िल की शमा बुझाने आया हूँ मैं, आपका दोस्त, सुजॉय चटर्जी

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए जब मैं संगीतकार तुषार भाटिया का इंटरव्यू कर रहा था अनिल बिस्वास जी से संबंधित, तो तुषार जी नें मुझसे कहा कि उनके पास एक एल.पी है अनिल दा के गीतों का, जिसे अनिल दा नें उन्हें भेंट किया था, और जिसके कवर पर अनिल दा नें बांगला में उनके लिए कुछ लिखा था, पर वो उसे पढ़ नहीं पाये; तो क्या मैं उसमें उनकी कुछ मदद कर सकता हूँ? मैंने हाँ में जवाब दिया। उस एल.पी कवर पर लिखा हुआ था "तुषार के सस्नेह आशीर्बादाने अनिल दा" (तुषार को सनेह आशीर्वाद के साथ, अनिल दा)। इस अनुवाद को भेजते हुए मैंने तुषार जी को लिखा था "Wowwww, what a privilege you have given me Tushar ji to translate something Anil da has written for you!!! cant ask for more."

Saturday, December 24, 2011

फ़िल्म संगीत में ग़ालिब की ग़ज़लें - एक अवलोकन

'ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, फ़िल्म-संगीत में ग़ज़लों का चलन शुरु से ही रहा है। गीतकारों नें तो फ़िल्मी सिचुएशनों के लिए ग़ज़लें लिखी ही हैं, पर कई बार पुराने अदबी शायरों की ग़ज़लें भी फ़िल्मों में समय-समय पर आती रही हैं, और इन शायरों में जो नाम सबसे उपर आता है, वह है मिर्ज़ा ग़ालिब। ग़ालिब की ग़ज़लें सबसे ज़्यादा सुनाई दी हैं फ़िल्मों में। आइए आज इस लेख के माध्यम से यह जानने की कोशिश करें कि ग़ालिब की किन ग़ज़लों को हिन्दी फ़िल्मों नें गले लगाया है। पेश-ए-ख़िदमत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेषांक' की ७३-वीं कड़ी।

Saturday, December 17, 2011

बड़ी बेटी संगीता गुप्ता की यादों में पिता संगीतकार मदन मोहन

संगीता गुप्ता 
मुझसे मेरे पिता के बारे में कुछ लिखने को कहा गया था। हालाँकि वो मेरे ख़यालों में और मेरे दिल में हमेशा रहते हैं, मैं उस बीते हुए ज़माने को याद करते हुए यादों की उन गलियारों से आज आपको ले चलती हूँ....

Saturday, December 3, 2011

विशेष - सिने-संगीत के कलाकारों के लिए उस्ताद सुल्तान ख़ाँ का योगदान

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 70
एक बार सुल्तान ख़ाँ साहब नें कहा था कि जो कलाकार संगत करते हैं उन्हें अपने अहम को त्याग कर मुख्य कलाकार से थोड़ा कम कम बजाना चाहिए। उन्होंने बड़ा अच्छा उदाहरण दिया था कि अगर आप बाराती बन के जा रहे हो किसी शादी में तो आपकी साज-सज्जा दुल्हे से बेहतर तो नहीं होगी न! पूरे बारात में दुल्हा ही केन्द्रमणि होता है। ठीक उसी तरह, संगत देने वाले कलाकार को भी (चाहे वो कितना भी बड़ा कलाकार हो) मुख्य कलाकार के साथ सहयोग देना चाहिए।

Saturday, November 26, 2011

मिलिए २३-वर्षीय फ़िल्मकार हर्ष पटेल से

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 69

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष' में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का फिर एक बार स्वागत करता हूँ। दोस्तों, आज हम आपकी मुलाक़ात करवाने जा रहे हैं एक ऐसे फ़िल्म-मेकर से जिनकी आयु है केवल २३ वर्ष। ज़्यादा भूमिका न देते हुए आइए मिलें हर्ष पटेल से और उन्हीं से विस्तार में जाने उनके जीवन और फ़िल्म-मेकिंग् के बारे में।

सुजॉय - हर्ष, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'आवाज़' पर। यह साहित्य, संगीत और सिनेमा से जुड़ी एक ई-पत्रिका है, इसलिए हमने आपको इस मंच पर निमंत्रण दिया और आपको धन्यवाद देता हूँ हमारे निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए।

हर्ष - आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद!

Saturday, November 19, 2011

"बुझ गई है राह से छाँव" - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि (भाग-२)

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 68

भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे पिछले हफ़्ते हमने श्रद्धांजलि अर्पित की स्वर्गीय डॉ. भूपेन हज़ारिका को। उनके जीवन सफ़र की कहानी बयान करते हुए हम आ पहुँचे थे सन् १९७४ में जब भूपेन दा नें अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' में संगीत दिया था। आइए उनकी दास्तान को आगे बढ़ाया जाये आज के इस अंक में। दो अंकों वाली इस लघु शृंखला 'बुझ गई है राह से छाँव' की यह है दूसरी व अन्तिम कड़ी।

भूपेन हज़ारिका नें असमीया और बंगला में बहुत से ग़ैर फ़िल्मी गीत तो गाये ही, असमीया और हिन्दी फ़िल्मों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। १९७५ की असमीया फ़िल्म 'चमेली मेमसाब' के संगीत के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। आपको याद होगा उषा मंगेशकर पर केन्द्रित असमीया गीतों के 'शनिवार विशेषांक' में हमने इस फ़िल्म का एक गीत आपको सुनवाया था। १९७६ में भूपेन दा नें अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा निर्मित हिन्दी फ़िल्म 'मेरा धरम मेरी माँ' को निर्देशित किया और इसमें संगीत देते हुए अरुणाचल के लोक-संगीत को फ़िल्मी धारा में ले आए। मैं माफ़ी चाहूंगा दोस्तों कि 'पुरवाई' शृंखला में हमने अरुणाचल के संगीत से सजी इस फ़िल्म का कोई भी सुनवा न सके। पर आज मैं आपके लिए इस दुर्लभ फ़िल्म का एक गीत ढूंढ लाया हूँ, आइए सुना जाए....

गीत - अरुणाचल हमारा (मेरा धरम मेरी माँ)


१९८५ में कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'एक पल', जो असम की पृष्ठभूमि पर निर्मित फ़िल्म थी, में भूपेन दा का संगीत बहुत पसन्द किया गया। पंकज राग के शब्दों में 'एक पल' में भूपेन हज़ारिका ने आसामी लोकसंगीत और भावसंगीत का बहुत ही लावण्यमय उपयोग "फूले दाना दाना" (भूपेन, भूपेन्द्र, नितिन मुकेश), बिदाई गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे" (उषा, हेमंती, भूपेन्द्र, भूपेन) जैसे गीतों में किया। "जाने क्या है जी डरता है" तो लता के स्वर में चाय बागानों के ख़ूबसूरत वातावरण में तैरती एक सुन्दर कविता ही लगती है। "मैं तो संग जाऊँ बनवास" (लता, भूपेन), "आने वाली है बहार सूने चमन में" (आशा, भूपेन्द्र) और "चुपके-चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं" (लता) जैसे गीतों में बहुत हल्के और मीठे ऑरकेस्ट्रेशन के बीच धुन का उपयोग भावनाओं को उभारने के लिए बड़े सशक्त तरीके से किया गया है।

गीत - चुपके-चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं (एक पल)


१९९७ में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी लेख टंडन की फ़िल्म आई 'मिल गई मंज़िल मुझे' जिसमें उन्होंने एक बार फिर असमीया संगीत का प्रयोग किया और फ़िल्म के तमाम गीत आशा, सूदेश भोसले, उदित नारायण, कविता कृष्णमूर्ति जैसे गायकों से गवाये। कल्पना लाजमी के अगली फ़िल्मों में भी भूपेन दा का ही संगीत था। १९९४ में 'रुदाली' के बाद १९९७ में 'दरमियान' में उन्होंने संगीत दिया। इस फ़िल्म में आशा और उदित का गाया डुएट "पिघलता हुआ ये समा" तो बहुत लोकप्रिय हुआ था। १९९६ की फ़िल्म 'साज़' में बस एक ही गीत उन्होंने कम्पोज़ किया। २००० में 'दमन' और २००२ में 'गजगामिनी' में भूपेन हज़ारिका का ही संगीत था। पुरस्कारों की बात करें तो पद्मश्री (१९७७), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रीय नागरिक सम्मान, असम का सर्वोच्च शंकरदेव पुरस्कार जैसे न जाने कितने और पुरस्कारों से सम्मानित भूपेन दा को १९९३ में दादा साहब फालके पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है। लेकिन इन सब पुरस्कारों से भी बड़ा जो पुरस्कार भूपेन दा को मिला, वह है लोगों का प्यार। यह लोगों का उनके प्रति प्यार ही तो है कि उनके जाने के बाद जब पिछले मंगलवार को उनकी अन्तेष्टि होनी थी, तो ऐसा जनसैलाब उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने उस क्षेत्र में उमड़ा कि असम सरकार को अन्तेष्टि क्रिया उस दिन के रद्द करनी पड़ी। अगले दिन बहुत सुबह सुबह २१ तोपों की सलामी के साथ गुवाहाटी में लाखों की तादाद में उपस्थित जनता नें उन्हें अश्रूपूर्ण विदाई दी। भूपेन दा चले गए। भूपेन दा से पहली जगजीत सिंह भी चले गए। इस तरह से फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कलाकार हम से एक एक कर बिछड़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में तो बस यही ख़याल आता है कि काश यह समय धीरे धीरे चलता।

गीत - समय ओ धीरे चलो (रुदाली)


'आवाज़' परिवार की तरफ़ से यह थी स्वर्गीय डॉ. भूपेन हज़ारिका की सुरीली स्मृति को श्रद्धा-सुमन और नमन। भूपेन जैसे कलाकार जा कर भी नहीं जाते। वो तो अपनी कला के ज़रिए यहीं रहते हैं, हमारे आसपास। आज अनुमति दीजिए, फिर मुलाकात होगी अगर ख़ुदा लाया तो, नमस्कार!

चित्र परिचय - भुपेन हजारिका को अंतिम विदाई देने को उमड़ा जनसमूह

Saturday, November 12, 2011

बुझ गई है राह से छाँव - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 67
बुझ गई है राह से छाँव - भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे आज श्रद्धांजलि उस महान कलाकार को जिनका नाम असमीया गीत-संगीत का पर्याय बन गया है, जिन्होने असम और उत्तरपूर्व के लोक-संगीत को दुनियाभर में फैलाने का अद्वितीय कार्य किया, जिन्होंने हिन्दी फ़िल्म-संगीत में असम की पहाड़ियों, चाय बागानों और वादियों का विशिष्ट संगीत देकर फ़िल्म-संगीत को ख़ास आयाम दिया, जो न केवल एक गायक और संगीतकार थे, बल्कि एक लेखक और फ़िल्मकार भी थे। पिछले शनिवार, ४ नवंबर को ८५ वर्ष की आयु में हमें अलविदा कह कर हमेशा के लिए जब भूपेन हज़ारिका चले गए तो उनका रचा एक गीत मुझे बार बार याद आने लगा..... "समय ओ धीरे चलो, बुझ गई है राह से छाँव, दूर है पी का गाँव, धीरे चलो...." आइए आज के इस विशेषांक में भूपेन दा के जीवन सफ़र के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों पर नज़र डालें।

भूपेन हज़ारिका का जन्म १ मार्च १९२६ को असम के नेफ़ा के पास सदिया नामक स्थान पर हुआ था। पिता संत शंकरदेव के भक्त थे और अपने उपदेश गायन के माध्यम से ही देते थे। बाल भूपेन में भी बचपन से ही संगीत की रुचि जागी और ११ वर्ष की आयु में उनका पहला ग़ैर-फ़िल्मी गीत रेकॉर्ड हुआ। फ़िल्म 'इन्द्र मालती' में उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया और इसी फ़िल्म में अपना पहला फ़िल्मी गीत "विश्व विजय नौजवान" भी गाया। तेजपुर से मैट्रिक और गुवाहाटी से इंटर पास करने के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया और साथ ही साथ शास्त्रीय संगीत भी सीखते रहे। १९४२ में साम्प्रदायिक एकता पर लिखा उनका एक गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा जो बाद में 'शीराज़' फ़िल्म में भी लिया गया। गुवाहाटी में कुछ दिनों के लिए अध्यापन करने के बाद वो जुड़े आकाशवाणी से और यहीं से छात्रवृत्ति लेकर वो गए अमरीका के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी 'मास कम्युनिकेशन' में एम.ए. करने। वहीं फ़िल्म माध्यम का भी गहन अध्ययन किया, रॉबर्ट स्टेन्स और रॉबर्ट फ्लैहर्टी से भी बहुत कुछ सीखा। वापसी में जहाज़ी सफ़र में जगह जगह से लोक-संगीत इकट्ठा करते हुए जब वो भारत पहुँचे तो उनके पास विश्वभर के लोक-संगीत का ख़ज़ाना था।

गुवाहाटी वापस लौट कर फिर एक बार उन्होंने अध्यापन किया, पर जल्दी ही पूर्ण मनोयोग से वो गीत-संगीत-सिनेमा से जुड़ गए। इप्टा (IPTA) के वे सक्रीय सदस्य थे। असम के बिहू, बन गीत और बागानों के लोक संगीत को राष्ट्रीय फ़लक पर स्थापित करने का श्रेय भूपेन दा को ही जाता है। असमीया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से वो फ़िल्म-संगीतकार बने। उसके बाद 'मनीराम देवान' और 'एरा बाटोर सुर' जैसी फ़िल्मों के गीतों नें चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। उसके बाद उनके लिखे, निर्देशित और संगीतबद्ध 'शकुंतला', 'प्रतिध्वनि' और 'लटिघटि' के लिए उन्हे लगातार तीन बार राष्ट्रपति पदक भी मिला। भूपेन हज़ारिका का व्यक्तित्व उसी समय इतना विराट बन चुका था कि १९६७ में विधान सभा चुनाव उनसे लड़वाया गया और उन्हें जीत भी हासिल हुई। १९६७-७२ तक विधान सभा सदस्य के रूप में उन्होंने असम में पहले स्टुडियो की स्थापना करवाई।

बांगलादेश के जन्म के उपलक्ष्य में भूपेन हज़ारिका की रचित 'जय जय नवजात बांगलादेश' को अपार लोकप्रियता मिली थी। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के दिनों में प्रसिद्ध अमरीकी बीग्रो गायक पॉल रोबसन के मित्र रहे हज़ारिका अश्वेतों के अधिकारों के लिए लड़ाई से बहुत प्रभावित रहे हैं। रोबसन की प्रसिद्ध रचना 'Old man river' से प्रेरणा लेकर हज़ारिका ने ब्रह्मपुत्र पर अपनी यादगार रचना "बूढ़ा लुई तुमि बुआ कियो" (बूढ़े ब्रह्मपुत्र तुम बहते क्यों हो?)। इसी गीत का हिन्दी संस्करण भी आया, जिसमें ब्रह्मपुत्र के स्थान पर गंगा का उल्लेख हुआ। "विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार, निशब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों?" आइए भूपेन दा की इसी कालजयी रचना को यहाँ पर सुना जाए।

गीत - गंगा बहती हो क्यों (ग़ैर फ़िल्म)


१९६३ में भूपेन दा के संगीत में असमीया फ़िल्म 'मनीराम देवान' में उन्होंने एक गीत रचा व गाया जो उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में दर्ज हुआ। गीत के बोल थे "बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई"। इसी गीत की धुन पर दशकों बाद कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'रुदाली' में भूपेन दा नें "दिल हूम हूम करे गरजाए" कम्पोज़ कर इस धुन को असम से निकाल कर विश्व भर में फैला दिया। आइए इन दोनों गीतों को एक के बाद एक सुनें, पहले प्रस्तुत है असमीया संस्करण।

गीत - बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई (मनीराम देवान - असमीया)


फ़िल्म 'रुदाली' में इस गीत को लता मंगेशकर और भूपेन हज़ारिका, दोनों नें ही अलग अलग गाया था। सुनते हैं भूपेन दा की आवाज़। ख़ास बात देखिये, यह संगीत है असम का, पर 'रुदाली' फ़िल्म का पार्श्व था राजस्थान। तो किस तरह से पूर्व और पश्चिम को भूपेन दा नें एकाकार कर दिया इस गीत में, ताज्जुब होती है! कोई और संगीतकार होता तो राजस्थानी लोक-संगीत का इस्तेमाल किया होता, पर भूपेन दा नें ऐसा नहीं किया। यही उनकी खासियत थी कि कभी उन्होंने अपने जड़ों को नहीं छोड़ा।

गीत - दिल हूम हूम करे घबराए (रुदाली)


हिन्दी फ़िल्म जगत में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी १९७४ की 'आरोप'। दोस्तों, आपको याद होगा अभी हाल ही में 'पुरवाई' शृंखला में हमने दो गीत भूपेन दा के सुनवाये थे, जिनमें एक 'आरोप' का भी था "जब से तूने बंसी बजाई रे..."। इसी फ़िल्म में उन्होंने लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया युगल गीत "नैनों में दर्पण है, दर्पण में कोई देखूँ जिसे सुबह शाम" ख़ूब ख़ूब चला था। भूपेन दा के संगीत की खासियत रही है कि उन्होंने न केवल असम के संगीत का बार बार प्रयोग किया, बल्कि उनका संगीत हमेशा कोमल रहा, जिन्हें सुन कर मन को सुकून मिलती है। आइए फ़िल्म 'आरोप' के इस युगल गीत को सुना जाये, पर उससे पहले लता जी की भूपेन दा को श्रद्धांजलि ट्विटर के माध्यम से... "भूपेन हज़ारिका जी, एक बहुत ही गुणी कलाकार थे, वो बहुत अच्छे संगीतकार और गायक तो थे ही, पर साथ-साथ बहुत अच्छे कवि और फ़िल्म डिरेक्टर भी थे। उनकी असमीया फ़िल्म (एरा बाटोर सुर) में मुझे गाने का मौका मिला यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। ऐसा महान कलाकार अब हमारे बीच नहीं रहा इसका मुझे बहुत दुख है, ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।"

गीत - नैनों में दर्पण है (आरोप)


भूपेन हज़ारिका से संबंधित कुछ और जानकारी हम अगले सप्ताह के अंक में जारी रखेंगे। भूपेन दा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज की यह प्रस्तुति हम यहीं समाप्त करते हैं, नमस्कार!

Saturday, November 5, 2011

कुछ एल पी गीतों की क्वालिटी तो आजकल के डिजिटल रेकॉर्डिंग् से भी उत्तम थी -विजय अकेला

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 66 गीतकार विजय अकेला से बातचीत उन्हीं के द्वारा संकलित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' पर (भाग-२)
भाग ०१ यहाँ पढ़ें

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे पिछले सप्ताह हम आपकी मुलाकात करवा रहे थे गीतकार विजय अकेला से जिनसे हम उनके द्वारा सम्पादित जाँनिसार अख़्तर साहब के गीतों के संकलन की किताब 'निगाहों के साये' पर चर्चा कर रहे थे। आइए आज बातचीत को आगे बढ़ाते हुए आनन्द लेते हैं इस शृंखला की दूसरी और अन्तिम कड़ी।

सुजॉय - विजय जी, नमस्कार और एक बार फिर आपका स्वागत है 'आवाज़' के मंच पर।

विजय अकेला - धन्यवाद! नमस्कार!

सुजॉय - विजय जी, पिछले हफ़्ते आप से बातचीत करने के साथ साथ जाँनिसार साहब के लिखे आपकी पसन्द के तीन गीत भी हमनें सुने। क्यों न आज का यह अंक अख़्तर साहब के लिखे एक और बेमिसाल नग़मे से शुरु की जाये?

विजय अकेला - जी ज़रूर!

सुजॉय - तो फिर बताइए, आपकी पसन्द का ही कोई और गीत।

विजय अकेला - फ़िल्म 'नूरी' का शीर्षक गीत सुनवा दीजिए। ख़य्याम साहब की तर्ज़, लता जी और नितिन मुकेश की आवाज़ें।

गीत - आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा (नूरी)


सुजॉय - विजय जी, पिछले हफ़्ते हमारी बातचीत आकर रुकी थी इस बात पर कि जाँनिसार साहब के गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स तो आपको मिल गए, पर समस्या यह आन पड़ी कि इन्हें सूना कहाँ जाये क्योंकि ग्रामोफ़ोन प्लेयर तो आजकल मिलते नहीं हैं। तो किस तरह से समस्या का समाधान हुआ?

विजय अकेला - जी, ये रेकॉर्ड्स सुनना बहुत ज़रूरी था क्योंकि गानों को करेक्टली और शुद्धता के साथ छापना भी तो इस किताब को छापने की एक अहम वजह थी बिना किसी ग़लती के!

सुजॉय - बिल्कुल! ऑथेन्टिसिटी बहुत ज़रूरी है।

विजय अकेला - जी!

सुजॉय - तो फिर रेकॉर्ड प्लेयर का इंतज़ाम हुआ?

विजय अकेला - प्लेयर का इंतज़ाम करना ही पड़ा। महंगी क़ीमत देनी पड़ी।

सुजॉय - महंगी क़ीमत देनी पड़ी, मतलब ऐन्टिक की दुकान में मिली?

विजय अकेला - जी, ठीक समझे आप। मगर एक एक लफ़्ज़ को सौ सौ बार सुन कर पर्फ़ेक्ट होने के बाद ही किताब में लिखा।

सुजॉय - जी जी, क्योंकि ऑडियो क्वालिटी अच्छी नहीं होगी।
विजय अकेला - बिल्कुल सही। पर हमेशा नहीं, कुछ गीतों की क्वालिटी तो आजकल के डिजिटल रेकॉर्डिंग् से भी उत्तम थी।

सुजॉय - सही है! क्या है कि उन गीतों में गोलाई होती थी, आजकल के गीतों में शार्पनेस है पर राउण्डनेस ग़ायब हो गई है, इसलिए ज़्यादा तकनीकी लगते हैं और जज़्बाती कम। ख़ैर, विजय जी, यहाँ पर जाँनिसार साहब के लिखे एक और गीत की गुंजाइश बनती है। बताइए कौन सा गीत सुनवाया जाये?

विजय अकेला - "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया", फ़िल्म 'सी.आई.डी' का गीत है।

सुजॉय - नय्यर साहब के संगीत में रफ़ी साहब और गीता दत्त की आवाज़ें।

गीत - आँखों ही आँखों में इशारा हो गया (सी.आई.डी)


सुजॉय - विजय जी, 'निगाहों के साये' किताब का विमोचन कहाँ और किनके हाथों हुआ?

विजय अकेला - जुहू के 'क्रॉसरोड' में गुलज़ार साहब के हाथों हुआ। जावेद अख़्तर साहब और ख़य्याम साहब भी वहाँ मौजूद थे।

सुजॉय - विजय जी, हम अपने पाठकों के लिए यहाँ पर पेश करना चाहेंगे वो शब्द जो गुलज़ार साहब और जावेद साहब नें आपके और आपके इस किताब के बारे में कहे हैं।

विजय अकेला - जी ज़रूर!

गुलज़ार - मुझे ख़ुशी इस बात की है कि यह रवायत अकेला नें बड़ी ख़ूबसूरत शुरु की है ताकि उन शायरों को, जिनके पीछे काम करने वाला कोई नहीं था, या जिनका लोगों नें नेग्लेक्ट किया, या जिनपे राइटर्स ऐसोसिएशन काम करती या ऐसी कोई ऑरगेनाइज़ेशन काम करती, उन शायरों के कलाम को सम्भालने का एक सिलसिला शुरु किया, वरना फ़िल्मों में लिखा हुआ कलाम या फ़िल्मों में लिखी शायरी को ऐसा ही ग्रेड दिया जाता था कि जैसे ये किताबों के क़ाबिल नहीं है, ये तो सिर्फ़ फ़िल्मों में है, बाक़ी आपकी शायरी कहाँ है? ये हमेशा शायरों से पूछा जाता था। यह एक बड़ा ख़ूबसूरत क़दम अकेला नें उठाया है कि जिससे वो शायरी, जो कि वाक़ई अच्छी शायरी है, जो कभी ग़र्द के नीचे दब जाती या रह जाती, उसका एक सिलसिला शुरु हुआ है और उसका आग़ाज़ उन्होंने जाँनिसार अख़्तर साहब से, और बक्शी साहब से किया है, और भी कई शायर जिनका नाम उन्होंने लिया, जैसे राजेन्द्र कृष्ण है, और भी बहुत से हैं, ताकि उनका काम सम्भाला जा सके।


जावेद अख़्तर - सबसे पहले तो मैं विजय अकेला का ज़िक्र करना चाहूँगा, जिन्होंने इससे पहले ऐसे ही बक्शी साहब के गीतों को जमा करके एक किताब छापी थी और अब जाँनिसार अख़्तर साहब के १५१ गीत उन्होंने जमा किए हैं और उसे किताब की शक्ल में 'राजकमल' नें छापा है। ये बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और हमारे जो पुराने गीत हैं और मैं उम्मीद करता हूँ कि इसके बाद जो दूसरे शायर हैं, राजेन्द्र कृष्ण हैं, राजा मेहन्दी अली हैं, शैलेन्द्र जी हैं, मजरूह साहब हैं, इनकी रचनाओं को भी वो संकलित करने का इरादा करेगें


सुजॉय - विजय जी, गुलज़ार साहब और जावेद साहब के विचार तो हमने जाने, और यह भी पता चला कि आगे आप किन गीतकारों पर काम करना चाहते हैं। फ़िल्हाल जाँनिसार साहब का लिखा कौन सा गीत सुनवाना चाहेंगे?


विजय अकेला - 'रज़िया सुल्तान' का "ऐ दिल-ए-नादान"

गीत - ऐ दिल-ए-नादान (रज़िया सुल्तान)


सुजॉय - विजय जी, बहुत अच्छा लगा आपसे बातचीत कर, आपकी इस किताब के लिए और इस साहसी प्रयास के लिए हम आपको बधाई देते हैं, पर एक शिकायत है आपसे।

विजय अकेला - वह क्या?

सुजॉय - आप फ़िल्मों में बहुत कम गीत लिखते हैं, ऐसा क्यों?

विजय अकेला - अब ज़्यादा लिखूंगा। सुजॉय - हा हा, चलिए इसी उम्मीद के साथ आज आपसे विदा लेते हैं, बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएँ।

विजय अकेला - शुक्रिया बहुत बहुत!

तो ये थी बातचीत गीतकार विजय अकेला से उनके द्वारा सम्पादित जाँनिसार अख़्तर के गीतों के संकलन की किताब 'निगाहों के साये' पर। अगले सप्ताह फिर किसी विशेष प्रस्तुति के साथ उपस्थित होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिये, पर आप बने रहिये 'आवाज़' के साथ! नमस्कार!

Saturday, October 29, 2011

जाँनिसार अख्तर की पोयट्री में क्लास्सिकल ब्यूटी और मॉडर्ण सेंसब्लिटी का संतुलन था - विजय अकेला की पुस्तक से

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 65
गीतकार विजय अकेला से बातचीत उन्हीं के द्वारा संकलित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' पर (भाग-१)

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' के साथ मैं एक बार फिर हाज़िर हूँ। दोस्तों, आपनें इस दौर के गीतकार विजय अकेला का नाम तो सुना ही होगा। जी हाँ, वो ही विजय अकेला जिन्होंने 'कहो ना प्यार है' फ़िल्म के वो दो सुपर-डुपर हिट गीत लिखे थे, "एक पल का जीना, फिर तो है जाना" और "क्यों चलती है पवन... न तुम जानो न हम"; और फिर फ़िल्म 'क्रिश' का "दिल ना लिया, दिल ना दिया" गीत भी तो उन्होंने ही लिखा था। उन्हीं विजय अकेला नें भले ही फ़िल्मों में ज़्यादा गीत न लिखे हों, पर उन्होंने एक अन्य रूप में भी फ़िल्म-संगीत जगत को अपना अमूल्य योगदान दिया है। गीतकार आनन्द बक्शी के गीतों का संकलन प्रकाशित करने के बाद हाल ही में उन्होंने गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों का संकलन प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है 'निगाहों के साये'। आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम विजय अकेला जी से बातचीत करें और जानने की कोशिश करें इस पुस्तक के बारे में।

सुजॉय - विजय जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'आवाज़' के इस मंच पर। मैं सुजॉय चटर्जी, आप का इस मंच पर स्वागत करता हूँ, नमस्कार!

विजय अकेला - नमस्कार सुजॉय जी!

सुजॉय - सबसे पहले मैं आपको बधाई देता हूँ 'निगाहों के साये' के प्रकाशित होने पर। आगे कुछ कहने से पहले मैं आपको यह बता दूँ कि जाँनिसार साहब का लिखा यह जो गीत है न "ये दिल और उनकी निगाहों के साये", यह बचपन से मेरा पसन्दीदा गीत रहा है।

विजय अकेला - जी, बहुत ही सुकून देने वाला गीत है, और संगीत भी उतना सुकूनदायक है इस गीत का।

सुजॉय - क्या इस किताब के लिए यह शीर्षक 'निगाहों के साये' आप ही नें सुझाया था?

विजय अकेला - जी हाँ।

सुजॉय - यही शीर्षक क्यों?

विजय अकेला - क्योंकि यह उनका न केवल एक हिट गीत था, बल्कि कोई भी इस गीत से उन्हें जोड़ सकता था। यही शीर्षक मुझे सब से बेहतर लगा।

सुजॉय - तो चलिए इसी गीत को सुनते हैं, फ़िल्म 'प्रेम पर्बत' का यह गीत है लता जी की आवाज़ में, जयदेव का संगीत है।
गीत - ये दिल और उनकी निगाहों के साये (प्रेम पर्बत)


सुजॉय - अच्छा विजय जी, यह बताइए कि आप नें संकलन के लिए आनन्द बक्शी जी के बाद जाँनिसार साहब को ही क्यों चुना?

विजय अकेला - बक्शी जी ही की तरह जाँनिसार साहब की भी फ़िल्मी गानों की कोई किताब नहीं आई थी। जाँनिसार साहब भी एक ग़ज़ब के शायर हुए हैं और मैं उनसे मुतासिर रहा हूँ, इसलिए मैंने उन्हें चुना। गोल्डन ईरा उनकी वजह से महकी है, रोशन हुई है ऐसा मैं मानता हूँ।

सुजॉय - विजय जी, इससे पहले कि मैं आप से अगला सवाल पूछूँ, मैं अपने पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ पर 'निगाहों के साये' किताब की भूमिका में वो शब्द प्रस्तुत करता हूँ जो किसी समाचार पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं इसी किताब के बारे में।

'निगाहों के साये' मशहूर शायर जाँनिसार अख़्तर की फ़िल्मी यात्रा का एक ऐसा संकलन है जिसमें ग़ज़लों की रवानी है तो गीतों की मिठास भी और भावनाओं का समन्दर है तो जलते हुए जज़्बात भी। इसीलिए इस संकलन के फ़्लैप पर निदा फ़ाज़ली नें लिखा है: "जाँनिसार अख़्तर एक बाहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोयेट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मॉडर्ण सेंसब्लिटी का ऐसा संतुलन किया है कि उनके शब्द ख़ासे रागात्मक हो गए हैं।" १९३५-३६ में ही जाँनिसार अख़्तर तरक्के पसंद आंदोलन का एक हिस्सा बन गए थे। सरदार जाफ़री, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और साहिर लुधियानवी की तरह अख़्तर साहब फ़िल्मी दुनिया के इल्मी शायर थे। विजय अकेला द्वारा संपादित यह संकलन कई अर्थों में विशिष्ट है। २१८ गीतों को तिथिवार सजाया गया है। पहला गीत 'शिकायत' फ़िल्म से है जिसकी रचना १९४८ में हुई थी और अंतिम गीत 'रज़िया सुल्तान' से है जिसे शायर नें १९८३ में रचा था। यानी ३५ वर्षों का इतिहास इस संकलन में है। कई ऐसी फ़िल्मों के नग़में भी इस संग्रह मे हैं जो अप्रदर्शित रहीं जैसे 'हम हैं राही प्यार के', 'मर्डर ऑन हाइवे', 'हमारी कहानी'। यह विजय अकेला का साहसिक प्रयास ही है कि ऐसी दुर्लभ सूचनाएँ इस पुस्तक में पढ़ने को मिलती हैं। इसके साथ डॉ. गोपी चंद नारंग का संस्मरण 'इंकलाबों की घड़ी' है, जावेद अख़्तर के साथ बातचीत के अंश, नैनिताल और भोपाल से जाँनिसार अख़्तर की बेगम सजिया अख़्तर के लिखे दो ख़त, हसन कमाल की बेबाक टिप्पणी, ख़य्याम का भाव से भरा लेख, सपन (जगमोहन) की भावभीनी श्रद्धांजलि आदि इस पुस्तक में दी गई हैं।


सुजॉय - तो दोस्तों, अब आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि विजय जी के इस पुस्तक का क्या महत्व है गुज़रे ज़माने के अनमोल नग़मों के शौकीनों के लिए। अच्छा विजय जी, बातचीत को आगे बढ़ाने से पहले क्यों न एक गीत सुन लिया जाये अख़त्र साहब का लिखा हुआ और आपकी पसंद का भी?


विजय अकेला - ज़रूर, 'छू मंतर' का "ग़रीब जान कर मुझको न तुम मिटा देना"

सुजॉय - वाह! "तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना", आइए सुनते हैं रफ़ी साहब की आवाज़ और नय्यर साहब की तर्ज़।

गीत - ग़रीब जान कर मुझको न तुम मिटा देना (छू मंतर)


सुजॉय - विजय जी, आपके इस पुस्तक के बारे में तो हमनें उस समाचार पत्र में छपे लेख से जान लिया, पर यह बताइए कि हर एक गीत के पूरे-पूरे बोल आपनें कैसे प्राप्त किए? किन सूत्रों का आपनें सहारा लिया?

विजय अकेला - CDs तो जाँनिसार साहब की फ़िल्मों के जैसे मार्केट में थे ही नहीं, एक 'रज़िया सुल्तान' का मिला, एक 'नूरी' का, एक 'सी.आई.डी' का, बस, और नहीं।

सुजॉय - जी, तो फिर बाकी आपनें कहाँ ढूंढे?

विजय अकेला - मुझे फ़िल्म-हिस्टोरियन सी. एम. देसाई साहब के पास जाना पड़ा। फिर आकाशवाणी की लाइब्रेरी में जहाँ FM पे मैं जॉकी भी हूँ, और फिर आख़िर में जावेद (अख़्तर) साहब के भाई शाहीद अख़्तर के पास गया जिनको जाँनिसार साहब नें अपने रेकॉर्ड्स, फ़ोटोज़, रफ़ बूक्स वगेरह दे रखी थी, और जिन्होंने उन्हें सम्भाल कर रखा भी था।

सुजॉय - सुनार को ही सोने की पहचान होती है।

विजय अकेला - मगर रेकॉर्ड्स मिलने के बाद प्रोब्लेम यह आई कि इन्हें कहाँ सुनी जाए, कोई रेकॉर्ड-प्लेयर तो है नहीं आज!

सुजॉय - बिल्कुल! पर आपकी यह समस्या का समाधान कैसे हुआ, यह हम जानेंगे अगली कड़ी में। और भी कुछ सवाल आप से पूछने हैं, लेकिन आज बातचीत को यहीं विराम देंगे, लेकिन उससे पहले जाँनिसार साहब का लिखा आपकी पसंद का एक और गीत सुनना चाहेंगे।

विजय अकेला - "मैं तुम्ही से पूछती हूँ मुझे तुमसे प्यार क्यों है"

सुजॉय - बहुत ख़ूब! 'ब्लैक कैट' फ़िल्म का गीत है, एन. दत्ता का संगीत है, लता जी की आवाज़, सुनते हैं।
गीत - मैं तुम्ही से पूछती हूँ मुझे तुमसे प्यार क्यों है (ब्लैक कैट)


तो दोस्तों, यह थी बातचीत गीतकार विजय अकेला से उनके द्वारा संकलित व सम्पादित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' से सम्बंधित। इस बातचीत का दूसरा व अन्तिम भाग आप तक पहुँचाया जायेगा अगले सप्ताह इसी स्तंभ में। आज अनुमति दीजिये, और हमेशा बने रहिए 'आवाज़' के साथ। नमस्कार!

Saturday, October 15, 2011

"पहला म्युज़िक विडियो प्लस चैनल नें ही बनाया नाज़िया हसन को लेकर"- अमित खन्ना

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 63
"मैं अकेला अपनी धुन में मगन" - भाग:२
पढ़ें भाग ०१ यहाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! पिछले अंक में आप मिले सुप्रसिद्ध गीतकार एवं फ़िल्म व टी.वी. प्रोड्युसर-डिरेक्टर अमित खन्ना से। अमित जी इन दिनों रिलायन्स एन्टरटेनमेण्ट के चेयरमैन हैं, इसलिए ज़ाहिर है कि वो बहुत ही व्यस्त रहते हैं। बावजूद इसके उन्होंने 'हिन्द-युग्म' को अपना मूल्यवान समय दिया, पर बहुत ज़्यादा विस्तार से बातचीत सम्भव नहीं हो सकी। और वैसे भी अमित जी अपने बारे में ज़्यादा बताने में उत्साही नहीं है, उनका काम ही उनका परिचय रहा है। आइए अमित जी से बातचीत पर आधारित शृंखला 'मैं अकेला अपनी धुन मे मगन' की दूसरी कड़ी में उनसे की हुई बातचीत को आगे बढ़ाते हैं। पिछली कड़ी में यह बातचीत आकर रुकी थी फ़िल्म 'चलते चलते' के शीर्षक गीत पर। अब आगे...

सुजॉय - अमित जी, 'चलते चलते' फ़िल्म का ही एक और गीत था लता जी का गाया "दूर दूर तुम रहे"।
अमित जी - जी हाँ, इस गीत के लिए उन्हें अवार्ड भी मिला था। इस गीत की धुन बी. जे. थॉमस के मशहूर गीत "raindrops keep falling on my head" की धुन से इन्स्पायर्ड थी।

सुजॉय - चलिए इस गीत को भी सुनते चलें।

गीत - दूर दूर तुम रहे पुकारते हम रहे (चलते चलते)


सुजॉय - अच्छा, 'चलते चलते' के बाद फिर आपकी कौन सी फ़िल्में आईं?
अमित जी - उसके बाद मैंने बहुत से ग़ैर-फ़िल्मी गीत लिखे, ८० के दशक में, करीब १००-१५० गानें लिखे होंगे। फ़िल्मी गीतों की बात करें तो 'रामसे ब्रदर्स' की ४-५ हॉरर फ़िल्मों में गीत लिखे, जिनमें अजीत सिंह के संगीत में 'पुराना मन्दिर' भी शामिल है।

सुजॉय - 'पुराना मन्दिर' का आशा जी का गाया "वो बीते दिन याद हैं" गीत तो ख़ूब मकबूल हुआ था। क्यों न इस गीत को भी सुनवाते चलें और बीते दिनों को यादों को एक बार फिर ताज़े किए जायें?
अमित जी - ज़रूर!

गीत - वो बीते दिन याद हैं (पुराना मन्दिर)


सुजॉय - अच्छा अमित जी, यह बताइए कि जब आप कोई गीत लिखते हैं तो आप की रणनीति क्या होती है, किन बातों का ध्यान रखते हैं, कैसे लिखते हैं?
अमित जी - देखिए मैं बहुत spontaneously लिखता हूँ। मैं दफ़्तर या संगीतकार के वहाँ बैठ कर ही लिखता था। घर पे बिल्कुल नहीं लिखता था। फ़िल्म में गीत लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि किसी पहाड़ पे जा कर या तालाब के किनारे बैठ कर लिखने की ज़रूरत है, जो ऐसा कहते हैं वो झूठ कहते हैं। फ़िल्मों में गीत लिखना एक बहुत ही कमर्शियल काम है, धुन पहले बनती है और आपको उस हिसाब से सिचुएशन के हिसाब से बोल लिखने पड़ते हैं। हाँ कुछ गीतकार हैं जिन्होंने नए नए लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया, जैसे कि राजा मेहन्दी अली ख़ाँ साहब, मजरूह साहब, साहिर साहब। इनके गीतों में आपको उपमाएँ मिलेंगी, अन्य अलंकार मिलेंगे।

सुजॉय - अच्छा अलंकारों की बात चल रही है तो फ़िल्म 'मन-पसन्द' में आपनें अनुप्रास अलंकार का एक बड़ा ख़ूबसूरत प्रयोग किया था, उसके बारे में बताइए।
अमित जी - 'मन-पसन्द' मैंने ही प्रोड्युस की थी। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसा आया कि जिसमे छन्दों की ज़रूरत थी। देव आनद टिना मुनीम को गाना सिखा रहे हैं। तो मैंने उसमें जयदेव की कविता से यह लाइन लेकर गीत पूरा लिखा।

सुजॉय - बहुत सुन्दर!
अमित जी - मैं यह समझता हूँ कि जो एक गीतकार लिखता है उसपे उसके जीवन और तमाम अनुभवों का असर पड़ता है। उसके गीतों में वो ही सब चीज़ें झलकती हैं। सबकॉनशियस माइण्ड में वही सबकुछ चलता रहता है गीतकार के।

सुजॉय - वाह! चलिए 'मनपसन्द' का लता जी और किशोर दा का गाया यह गीत सुनते चलें।

गीत - चारू चन्द्र की चंचल चितवन... सा रे गा मा (मनपसन्द)


सुजॉय - 'मनपसन्द' के सभी गीत इतने सुन्दर हैं कि जी चाहता है कि सभी गीत सुनवाएँ। "सुमन सुधा रजनीगंधा" भी लाजवाब गीत है। इस गीत को हम फिर कभी अवश्य अपने श्रोताओं को सुन्वएंगें. राजेश रोशन और बप्पी लाहिड़ी के अलावा और किन किन संगीतकारों के साथ आपने काम किया है?
अमित जी - लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ फ़िल्म 'भैरवी' में काम किया, एक और फ़िल्म थी उनके साथ जो बनी नहीं। भूपेन हज़ारिका के साथ NFDC की एक फ़िल्म 'कस्तूरी' में गीत लिखे। दान सिंह के साथ भी काम किया है। जगजीत सिंह के साथ भी काम किया है, दूरदर्शन की एक सीरियल था जलाल आग़ा साहब का, उसमें। अनु मलिक की २-३ फ़िल्मों में गीत लिखे, रघुनाथ सेठ के साथ १-२ फ़िल्मों में। इस तरह से कई संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला।

सुजॉय - अमित जी, कई नए कलाकारों नें आप ही के लिखे गीत गा कर फ़िल्म-जगत में उतरे थे, उनके बारे में बताइए।
अमित जी - अलका याग्निक नें अपना पहला गीत 'हमारी बहू अलका' में गाया था जिसे मैंने लिखा था। उदित नारायण नें भी अपना पहला गीत रफ़ी साहब के साथ 'उन्नीस बीस' फ़िल्म में गाया था जो मेरा लिखा हुआ था। शरन प्रभाकर, सलमा आग़ा नें मेरे ग़ैर फ़िल्मी गीत गाए। पिनाज़ मसानी का पहला फ़िल्मी गीत मेरा ही लिखा हुआ था। शंकर महादेवन नें पहली बार एक टीवी सीरियल में गाया था मेरे लिए। सुनिता राव भी टीवी सीरियल से आई हैं। फिर शारंग देव, जो पंडित जसराज के बेटे हैं, उनके साथ मैंने २/३ फ़िल्मों में काम किया।

सुजॉय - जी हाँ, फ़िल्म 'शेष' में आप प्रोड्युसर, डिरेक्टर, गीतकार, कहानीकार, पटकथा, संवाद-लेखक सभी कुछ थे और संगीत दिया था शारंग देव नें।
अमित जी - फिर इलैयाराजा के लिए भी गीत लिखे। गायकों में किशोर कुमार नें सबसे ज़्यादा मेरे गीत गाये, रफ़ी साहब नें कुछ ८-१० गीत गाये होंगे। लता जी, आशा जी, मन्ना डे साहब, और मुकेश जी नें भी मेरे दो गीत गाये हैं, दोनों डुएट्स थे, एक बप्पी लाहिड़ी के लिए, एक राजेश रोशन के लिए। इनके अलावा अमित कुमार, शैलेन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अलका, अनुराधा, उषा उथुप नें मेरे गीत गाये हैं। भीमसेन जोशी जी के बेटे के साथ मैंने एक ऐल्बम किया है। नॉन-फ़िल्म में नाज़िया हसन और बिद्दू नें मेरे कई गीत गाए हैं। मंगेशकर परिवार के सभी कलाकारों नें मेरे ग़ैर-फ़िल्मी गीत गाए हैं। मीना मंगेशकर का भी एक ऐल्बम था मेरे लिखे हुए गीतों का। मीना जी नें उसमें संगीत भी दिया था, वर्षा नें गीत गाया था।

सुजॉय - अमित जी, अब मैं जानना चाहूँगा 'प्लस चैनल' के बारे में।
अमित जी - 'प्लस चैनल' हमनें १९९० में शुरु की थी पार्टनर्शिप में, जिसने मनोरंजन उद्योग में क्रान्ति ला दी। उस समय ऐसी कोई संस्था नहीं थी टीवी प्रोग्रामिंग की। महेश भट्ट भी 'प्लस चैनल' में शामिल थे। हमनें कुछ १० फ़ीचर फ़िल्मों और ३००० घंटों से उपर टीवी प्रोग्रामिंग् और १००० म्युज़िक ऐल्बम्स बनाई। 'बिज़नेस न्यूज़', 'ई-न्यूज़' हमने शुरु की थी। पहला म्युज़िक विडियो हम ही नें बनाया नाज़िया हसन को लेकर।

सुजॉय - 'प्लस चैनल' तो काफ़ी कामयाब था, पर आपने इसे बन्द क्यों कर दिया?
अमित जी - रिलायन्स में आने के बाद बन्द कर दिया।

सुजॉय - क्या आपनें गीत लिखना भी छोड़ दिया है?
अमित जी - जी हाँ, अब बस मैं नए लोगों को सिखाता हूँ, मेन्टरिंग् का काम करता हूँ। रिलायन्स एन्टरटेन्मेण्ट का चेयरमैन हूँ, सलाहकार हूँ, बच्चों को सिखाता हूँ।

सुजॉय - अच्छा अमित जी, चलते चलते अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए।
अमित जी - मैं अकेला हूँ, मैंने शादी नहीं की।

सुजॉय - अच्छा अच्छा। फिर तो 'मनपसन्द' का गीत "मैं अकेला अपनी धुन में मगन, ज़िन्दगी का मज़ा लिए जा रहा था" गीत आपकी ज़िन्दगी से भी कहीं न कहीं मिलता-जुलता रहा होगा। ख़ैर, अमित जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका, इतनी व्यस्तता के बावजूद आपनें हमें समय दिया, फिर कभी सम्भव हुआ तो आपसे दुबारा बातचीत होगी। बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
अमित जी - धन्यवाद!

गीत - मैं अकेला अपनी धुन में मगन (मनपसन्द)


तो दोस्तों, यह था गीतकार और फ़िल्मकार अमित खन्ना से की हुई बातचीत पर आधारित शृंखला 'मैं अकेला अपनी धुन में मगन' का दूसरा और अन्तिम भाग। अगले शनिवार फिर एक विशेषांक के साथ उपस्थित होंगे, तब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ियों का आनन्द लेते रहिए, नमस्कार!

Saturday, October 1, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 61- पद्मश्री गायिका जुथिका रॉय और "बापू"

जब गायिका जुथिका रॉय मिलीं राष्ट्रपिता बापू से

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का मैं, आपका दोस्त सुजॉय चटर्जी, स्वागत करता हूँ। कल २ अक्टूबर, यानि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयन्ती है। इस अवसर पर आज के इस प्रस्तुति में हम एक गायिका की ज़ुबानी आप तक पहुँचाने जा रहे हैं जिसमें वो बताएंगी बापू से हुई उनकी मुलाक़ात के बारे में। दोस्तों, ५० के दशक में फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में लता मंगेशकर जो मुकाम रखती थीं, ग़ैर-फ़िल्मी भजनों में वह मुकाम उस समय गायिका जुथिका रॉय का था। उनकी आवाज़ आज कहीं सुनाई नहीं देती, पर उस समय उनकी मधुर आवाज़ में एक से एक लाजवाब भजन आए थे जिनके सिर्फ़ आम जनता ही नहीं बल्कि बड़े से बड़े राजनेता जैसे महात्मा गांधी, पण्डित नेहरू, सरोजिनी नायडू आदि भी शैदाई थे। जुथिका जी की आवाज़ किसी ज़माने में घर घर में गूंजती थी। भजन संसार और सुगम संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में जुथिका जी का अमूल्य योगदान है। सन्‍ २००९ में पद्मश्री सम्मानित जुथिका रॉय तशरीफ़ लाई थीं विविध भारती के स्टुडियो में और उनके साथ साथ विविध भारती के समस्त श्रोतागण गुज़रे थे बीते युग की स्मृतियों के गलियारों से। उसी साक्षात्कार में जुथिका जी नें बताया था कि किस तरह से उनकी राष्ट्रपिता बापू से मुलाक़ात हुई थी। आइए बापू को स्मरण करते हुए साक्षात्कार के उसी अंश को आज यहाँ पढ़ते हैं।

जुथिका रॉय - "एक दफ़े हैदराबाद में मेरी सरोजिनी नायडू के साथ मुलाक़ात हुई। वो आई थीं मेरा गाना सुनने के लिए, मुझे देखने के लिए। और उनको मैं कभी यह नहीं सोचा कि वो मेरे पास आएंगी, हमारे पास आकर बोलीं कि 'दीदी, आप ने महात्मा गांधी को देखा?' मैंने कहा कि नहीं, अभी तक हमारा यह सौभाग्य नहीं हुआ, हम तो बस पेपर में पढ़ते हैं कि वो क्या क्या काम करते हैं हमारे देश के लिए। बोलीं, 'आप जानती हैं आपका गाना कितना पसन्द करते हैं?' मैंने बोला कि नहीं, मुझे मालूम नहीं है, मुझे कैसे मालूम पड़ेगा? बोलीं कि 'उनको आपका गाना बहुत पसन्द है, हर रोज़ वो आपके रेकॉर्ड्स बजाते हैं, और जब प्रार्थना में बैठते हैं तो पहले मीराबाई का यह भजन बजाते हैं, फिर प्रार्थना शुरु करते हैं। तो मेरी एक बहुत इच्छा है कि आप महात्मा जी के साथ ज़रूर दर्शन करना, वो गाना सुनना चाहें तो एकदम सामने से उनको गाना सुनाना, यह मैं आपको बोल रही हूँ।'

मैंने यह खबर तो उनसे सुना, मैं पहले तो नहीं जानती थी, लेकिन मैं बहुत कोशिश करने लगी कि बापू के साथ मुलाकात करूँ, उनके दर्शन करूँ, उनको प्रणाम करूँ, लेकिन वह समय बहुत खराब समय था, स्वाधीनता के लिए बहुत काम थे, इधर उधर घूमते थे, और हमारे कलकत्ते में भी दंगे लग गए, सब जलने लगा चारों तरफ़। उस वक्त १९४६ में दंगे शुरु हो गए। हमने सुना कि बापू कलकता में आए हैं, और बेलेघाटा में, बहुत दूर है हमारे घर से, तो वहाँ पे ३ दिन ठहरेंगे, लेकिन बहुत बिज़ी हैं, किसी के साथ मुलाकात नहीं कर सकते। मैंने, माताजी और पिताजी ने सोचा कि जैसे भी हो हमें उनका दर्शन करना ही पड़ेगा। और उनके सामने नहीं जा सकेंगे, उनको गाना नहीं सुना सकेंगे, उसमें कोई बात नहीं है, लेकिन दूर से उनके हम दर्शन करेंगे सामने से। और एक साथ हम लोग सब भाई बहन, माताजी, पिताजी, काका, बहुत बड़ा एक ग्रूप बनाके, हम लोगों ने देखा कि जैसे वो मॉरनिंग्‍ वाक करते थे, तो हम रस्ते के उपर उनको प्रणाम करेंगे। ऐसे सब बातचीत करके हम निकले। वहाँ पहुंचे तो देखा कि जहाँ पर बापू रहते हैं वह बहुत बड़ा मकान है, उसके सामने एक बहुत बडआ गेट है और गेट के सामने ताला लगा हुआ है। वहाँ एक दरवान बैठा था तो हमने पूछा कि 'क्या हुआ, ताला क्यों लगा है, बापू मॉरनिंग् वाक में गए क्या?' तो बोला कि 'नहीं, उनका मॉरनिंग् वाक हो गया, अभी आराम कर रहे हैं, इसलिए ताला लगा हुआ है'। हमको बहुत बुरा लगा कि टाइम तो निकल गया।

मेरे काकाजी ने गेट-कीपर को कहा कि 'देखो, हम लोग बहुत दूर से आ रहे हैं, गेट को खोल दो, हम थोड़ा हॉल में बैठेंगे'। बोला, 'नहीं नहीं, मुझे हुकुम नहीं है, आप तो नहीं जा सकते, आप इधर ही खड़े रहना'। बहुत कड़ी धूप थी उधर, हम सब धूप में खड़े थे, हमारे पीछे-पीछे और भी बहुत से लोग आ गए। हम सब साथ में खड़े रहे। अचानक ऐसा हुआ कि वह शरत काल था, इसमें ऐसा होता है कि अभी कड़ी धूप है और अभी अचानक बरसात हो जाती है। तो एकदम से काले बादल आके बरसात शुरु हो गई, और हम भीगने लगे। हमारे काकाजी को तो बहुत गुस्सा आ गया। मुझे बहुत प्यार करते हैं, 'रेणु भीग रही है', उन्होंने एकदम से दरवान को जाकर कहा कि 'देखो, बापू को जाकर कहो कि जुथिका रॉय आई है उनके दर्शन के लिए, अन्दर जाओ और उनको यह बता दो'। दरवान तो चला गया, बाद में क्या देखते हैं कि अन्दर से मानव गांधी और दूसरे सब वोलन्टियर्स आ रहे हैं निकल के। छाता लेकर सब दौड़-दौड़ के आ रहे हैं। हम अन्दर गए, हॉल में सब बैठे। टावल लेकर आए क्योंकि हम सब भीग गए थे। थोड़ी देर बाद आभा गांधी, आभा गांधी बंगाली थे, कानू गांधी के साथ उन्होंने शादी की थी, वो आश्रम में रहती थीं। तो आभा आकर मुझको बोली कि 'दीदी, आप और माताजी अन्दर आइए, बापू जी आपको बुलाए हैं, और किसी को नहीं'। बापूजी एक दफ़े उठ कर हॉल में एक चक्कर देके, सबको दर्शन देके अन्दर चले गए और हमको और माताजी को अन्दर ले गए।

बापूजी एक छोटे से आसन पर बैठे हैं, कुछ नहीं पहनते थे एक छोटी धोती के अलावा। और आँखों में बहुत मोटे काँच का चश्मा है। उसमें से उसी तरह हमको देखने लगे और हँसने लगे। आभा जी ने कहा कि 'आज बापू जी का मौन व्रत है और वो आज नहीं बोलेंगे'। तो भी ठीक है, सामने तो आ गए बापू जी के, यही क्या कम थी हमारे लिए! बापू जी को हमने प्रणाम किया, उन्होंने दोनों हाथ मेरे सर पे रख कर बहुत आशीर्वाद दिया। फिर वो लिखने लगे, लिख लिख कर वो आभा को देते थे और वो पढ़ कर हमको बताती थीं। उन्होंने लिखा कि 'हम तो अभी बहुत बिज़ी हैं, हमारे पास तो टाइम नहीं है, हमें टाइम से सब काम करना पड़ता है, हम अभी दूसरे कमरे में जाकर थोड़ा काम करेंगे, आप यहीं से खाली गले से भजन गाइए'। मैं तो चौंक गई, पेटी-वेटी कुछ नहीं लायी, हम तो खाली दर्शन के लिए आ गए थे। तो एक के बाद एक उनके जो फ़ेवरीट भजन थे, वो उन्होंने बोल दिया था, मैं गाती चली गई, जैसे "मैं तो राम नाम की चूड़ियाँ पहनूँ", "घुंघट के पट खोल रे तुझे पिया मिलेंगे", "मैं वारी जाऊँ राम" आदि।

तो उस दिन वहाँ पर आधे घण्टे तक मैं गाई एक एक करके। उसके बाद बापू जी फिर हमारे कमरे में आ गए, फिर गाना बन्द करके उनको प्रणाम किया, तो फिर से हमारे सर पे हाथ रख के बहुत आशीर्वाद दिया, और फिर आभा को लिख कर बताया कि 'आज मेरा मैदान में अनुष्ठान है'। कलकत्ते का मैदान कितना बड़ा है आपको शायद मालूम होगा। तो वो बोले कि 'आज मेरा मैदान में अनुष्ठान है, शान्तिवाणी जो हम प्रचार करेंगे, उधर सब लोग आएंगे, उधर जुथिका भी हमारे साथ जाएंगी। जुथिका गाएगी भजन और मैं शान्तिवाणी दूंगा, और राम धुन होगा और यह होगा, वह होगा'। मेरा जीवन धन्य हो गया। बस वही एक बार १९४६ में वो मुझे मिले, फिर कभी नहीं मिले। उस वक्त मैं यही कुछ २५-२६ वर्ष की थी।"

तो दोस्तों, कैसा लगा जुथिका जी का यह संस्मरण? इन यादों को दोहराते हुए जुथिका जी की आँखों में चमक आ गई थी उस साक्षात्कार के दौरान, ऐसा साक्षात्कार लेने वाले कमल शर्मा नें बताया था कुछ इन शब्दों में - "सत्य के उस पुजारी से, शान्ति के उस दूत से जो आपकी भेंट हुई थी, उसकी चमक मैं आज भी आपके चेहरे पर ताज़ा देखता हूँ। आप बता रही हैं और वैसी ही पुलक, बच्चों जैसी वैसी ही ख़ुशी आपके चेहरे पर नज़र आ रही है, ऐसा लग रहा है कि आप को वह स्पर्श महसूस हो रहा है ताज़ा"।

तो आइए दोस्तों, अब जुथिका रॉय की आवाज़ में सुनें एक भजन जिसे उन्होंने बापू को भी सुनाया था उस मुलाकात में।

भजन: घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे (जुथिका रॉय, ग़ैर-फ़िल्मी)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष'। इस प्रस्तुति के बारे में अपने प्रतिक्रिया आप टिप्पणी में ज़रूर लिखिएगा। जुथिका रॉय को ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज आपसे अनुमति लेते हैं, कल फिर मुलाकात होगी, नमस्कार!

Saturday, September 17, 2011

भारत में ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड की शुरुआत

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 59

यूं तो ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के बारे में हम सभी को जानकारी है, लेकिन ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड की सटीक परिभाषा क्या है? विकिपीडिआ में इसकी परिभाषा कुछ इस तरह से दी गई है - "A gramophone record, also known as a phonograph record, is an analogue sound storage medium consisting of a flat disc with an inscribed modulated spiral groove starting near the periphery and ending near the center of the disc." ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के कई प्रकार हैं जैसे कि एल.पी रेकॉर्ड (LP, 33, or 33-1/3 RPM), ई.पी रेकॉर्ड (EP, 16-2/3 RPM), 45 RPM रेकॉर्ड और 78 RPM रेकॉर्ड। 78 RPM रेकॉर्ड वह रेकॉर्ड है जो प्रति मिनट ७८ बार अपनी धूरी पर घूमती है। एल.पी का अर्थ है 'लॉंग प्ले' तथा ई.पी का अर्थ है 'एक्स्टेण्डेड प्ले'। एल.पी, 16 और 45 RPM रेकॉर्डों का निर्माण पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) से होता था, जिस वजह से इन्हें विनाइल रेकॉर्ड भी कहते हैं। 'सोसायटी ऑफ़ इण्डियन रेकॉर्ड कलेक्टर्स मुंबई' के सुरेश चंदावरकर नें बहुत अच्छी तरह से भारत में ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के विकास को अपने लेख 'इण्डियन ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स - दि फ़र्स्ट १०० यीअर्स' में क़ैद किया है। थॉमस आल्वा एडिसन (जिन्होंने ईलेक्ट्रिक बल्ब का भी आविष्कार किया था) नें १८७७ में 'सीलिंडर फ़ोनोग्राफ़' का आविष्कार किया, जिसका भारत में पहला डेमो अगले ही साल १८७८ में दिया गया। रेकॉर्डिंग्‍कंपनियों में 'दि ग्रामोफ़ोन कंपनी' प्राचीनतम कंपनियों में से थीं, तथा इसका एक मुख्य लेबल था 'हिस मास्टर्स वॉयस', जिसे हम HMV के नाम से जानते हैं। भारत में इसकी स्थापना हुई १८९५ में। HMV के पहले डीलर थे दिल्ली के 'महाराजा लाल ऐण्ड को'। उन दिनों यह डीलर सीलिंडर रेकॉर्ड्स बेचा करते थे, जो मार्केट में चली तकरीबन १९१० के आसपास तक। आज ये रेकॉर्ड्स नष्ट हो चुकी हैं, बस एक रेकॉर्ड अभी ज़िंदा है और वह है कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की आवाज़ में "वन्देमातरम" का।

हैनोवर, जर्मनी के एमिल बर्लिनर नें सीलिंडर की जगह एक फ़्लैट ज़िंक-डिस्क के इस्तमाल से फ़ोनोग्राफ से बहतर एक मशीन का निर्माण किया। मास्टर डिस्क से असंख्य प्रतियाँ रेकॉर्ड करने का यह आसान ज़रिया साबित हुआ जिसकी बाज़ार में व्यावसायिक मूल्य बहुत अधिक थी। इस तरह की ७ इंच डायमीटर वाली सिंगल-साइड डिस्क पर १८९९ में लंदन में पहले भारतीय की आवाज़ रेकॉर्ड हुई। ये 44 RPM की रेकॉर्ड्स थीं जिनमें आवाज़ें थीं कैप्टन भोलानाथ, डॉ. हरनामदास और अहमद की, जिन्होंने अलग अलग भाषाओं में कविता-पाठ या गीत रेकॉर्ड करवाये। सन्‍१९०१ में जे. डब्ल्यु. हॉड कलकत्ता आये और अपनी एक ब्रांच-ऑफ़िस खोली। १९०२ में एफ़. डब्ल्यु. गैज़बर्ग आये अपनी पहली रेकॉर्डिंग्‍अभियान पर, और भारत की धरती से करीब करीब ५०० गीत रेकॉर्ड करके ले गये। इन्हें फिर हैनोवर के बर्लिनर के प्रेसिंग्‍ फ़ैक्टरी में ले जा कर इनकी प्रतियाँ बनाई गईं। इनमें से ज़्यादातर रेकॉर्डिंग्स कोठों में जा कर रेकॉर्ड किये गये थे क्योंकि उस ज़माने में अच्छे घर की औरतों का गाना-बजाना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन धीरे धीरे वक़्त बदला, और कई नामचीन कलाकारों नें रेकॉर्ड कंपनियों के लिये अपनी आवाज़ें दी। इनमें शामिल थे कलकत्ते की गौहर जान, इलाहाबाद की जानकीबाई, पियारा साहिब आदि। इसके बाद दो और रेकॉर्डिंग अभियान हुए और करीब ३००० वाक्स रेकॉर्ड्स बनें, जिन्हें जर्मनी में प्रेस कर वापस भारत में लाया गया बेचने के लिये। अब तक रेकॉर्ड्स ज़िंक से बदल कर वाक्स यानी मोम और शेलैक (shellac) के बनने लगे थे।

पहले विश्वयुद्ध (१९१४-१९१९) के दौरान ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड उद्योग शेलैक की सप्लाई के लिये भारत पर बुरी तरह से निर्भर थी। भारत ७५ सालों तक शेलैक का एकमात्र सप्लायर था और यहाँ से भारी तादाद में शेलैक निर्यात होता था। १९१६ तक करीब करीब ७५ अलग रेकॉर्ड कंपनियों नें भारत में अपने क़दम जमाये, जिनमें प्रमुख थे Nicole, Universal, Neophone, Elephone, H. Bose, Beka, Kamla, Binapani, Royal, Ram-a-Phone (Ramagraph), James Opera, Singer, Sun, Odeon, और Pathe। समय के साथ साथ ये तमाम कंपनियाँ या तो ग़ायब हो गईं या फिर 'दि ग्रामोफ़ोन कंपनी' के साथ मिल गईं। HMV लेबल नें भारतीय बाज़ार में एकतरफ़ा अधिकार जमा लिया। ध्वनि-मूद्रण तकनीकी दृष्टि से निरंतर बदलती चली जा रही थी। शुरु शुरु में सब कुछ मेकनिकली होता था और उस काल को 'ऐकोस्टिक ईरा' भी कहा जाता है। सन्‍१९२५ के आसपास यह रेकॉर्डिंग्‍की तकनीक मेकनिकल से बदलकर हो गई ईलेक्ट्रिकल, और कार्बन माइक्रोफ़ोन का आगमन हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास चुम्बकीय तकनीक लिये टेप-रेकॉर्डर्स आ गये। १९३१ में 'दि ग्रामोफ़ोन कंपनी' और 'कोलम्बिआ ग्रामोफ़ोन कंपनी' एक जुट हो गईं और स्थापना हुई 'ईलेक्ट्रिकल ऐण्ड म्युज़िकल इन्ड्रस्ट्रीस लिमिटेड' (EMI) की। और इस तरह से HMV भी आ गई EMI में।

आलेख - सुजॉय चटर्जी

संदर्भ -

१. "Gramophone Record" (URL: http://en.wikipedia.org/wiki/Gramophone_record)
२. "Indian Gramophone Records - The First 100 Years", Suresh Chandavarkar, Society of Indian Record Collectors, Mumbai (URL: http://www.mustrad.org.uk/articles/indcent.htm)

Saturday, September 10, 2011

...और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी - असद भोपाली

सुविख्यात शायर और फिल्म-गीतकार श्री असद भोपाली के सुपुत्र श्री ग़ालिब खाँ साहब से उनके पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत
अब तक आपने पढ़ा...
अब आगे

‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के ‘शनिवार विशेषांक’ में आपका एक बार पुनः स्वागत है। दोस्तों, पिछले सप्ताह हमने फिल्म-जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार असद भोपाली के सुपुत्र ग़ालिब खाँ से उनके पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बातचीत का पहला भाग प्रस्तुत किया था। इस भाग में आपने पढ़ा था कि असद भोपाली को भाषा और साहित्य की शिक्षा अपने पिता मुंशी अहमद खाँ से प्राप्त हुई थी। आपने यह भी जाना कि अपनी शायरी के उग्र तेवर के कारण असद भोपाली, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर जेल में डाल दिये गये थे। आज़ादी के बाद अपनी शायरी के बल पर ही उन्होने फिल्म-जगत में प्रवेश किया था। आज हम उसके आगे की बातचीत को आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, ‘शनिवार विशेषांक’ के दूसरे भाग में एक बार फिर आपका हार्दिक स्वागत है।
ग़ालिब खाँ- धन्यवाद, और सभी पाठकों को मेरा नमस्कार। अपने पिता असद भोपाली के बारे में ज़िक्र करते हुए पिछले भाग में मैंने बताया था कि १९४९ की फिल्म ‘दुनिया’ के माध्यम से एक गीतकार के रूप में उनकी शुरुआत हुई थी। इसके बाद १९५१ की फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता भी मिली, परन्तु फिल्म कि सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। १९६३ में प्रदर्शित फिल्म 'पारसमणि' के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." और "वो जब याद आये, बहुत याद आये..." ने लोकप्रियता के परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं।

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें।
ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." सुनवाते हैं-

फिल्म – पारसमणि : "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट


कृष्णमोहन- बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे?
ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम, हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा), चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु ‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं, जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं।

कृष्णमोहन- असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं, किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है?
ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने १९४९ से १९९० तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत "कबूतर जा जा जा..." तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे। इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे, जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेंगे रो-रो के..." जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को अनुभव कर पाता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। प्रसिद्ध शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ।

कृष्णमोहन- दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको १९५७ की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है।

फिल्म – मिस बॉम्बे : "ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का.." : स्वर – मोहम्मद रफी


कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब! साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत/ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं?
ग़ालिब खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन दिनों हम जिस स्थान पर रहते थे उसका नाम था "नालासोपारा", जो पहाड़ी के तल पर था और वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक बाढ़, असद भोपाली की सारी "गालिबी" को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया, मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- 'जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था,और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी'। एक शायर के पूरे जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है।

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा?
ग़ालिब खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते थे कि वो असदउल्लाह खाँ "ग़ालिब" थे और ये 'ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर ‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’, ‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी फिल्मो का संवाद-लेखन किया और अभी कुछ दिनों पहले एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को पूरा कर पाऊँ।

कृष्णमोहन- आपका बहुत-बहुत आभार, आप ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के मंच पर आए और अपने पिता असद भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें।
ग़ालिब खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’ का गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त दीजिए।

फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा...” : स्वर – मोहम्मद रफी


कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, September 3, 2011

शनिवार विशेष - 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा मनवा लिया...

फिल्म-जगत के सुप्रसिद्ध शायर / गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र पटकथा-संवाद लेखक ग़ालिब खाँ से एक साक्षात्कार

शनिवार विशेषांक (प्रथम भाग)



ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी गीत-संगीत प्रेमियों को कृष्णमोहन मिश्र का सादर अभिवादन, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' के मंच पर। दोस्तों, फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान, स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर इस बार के शनिवार विशेषांक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित अंश-



कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, ‘आवाज़’के शनिवार विशेषांक के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने ‘आवाज़’ के मंच पर मुझे अपने पिता के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका और सभी पाठकों / श्रोताओं का आभारी हूँ।



कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से है?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म १० जुलाई १९२१ को भोपाल में हुआ था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे। वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जानने वाले संगीतकार उन्हें गीत लिखने की मशीन कहा करते थे।



कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था, यह बात मेरी माँ बताया करती थीं। उस दौर में जब कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी थी।



कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि अंग्रेज़ जेलर भी उनकी 'गालिबी' का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अंग्रेज़ जेलर शायरी को 'गालिबी' कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।



कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुँचे?

ग़ालिब खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज की तरफ से एक मुशायरे का आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन १९४९ में बम्बई (अब मुम्बई) आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। 'दुनिया' उनकी पहली फिल्म थी। संगीतकार थे सी.रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लूटे दिल टूट गया...” लोकप्रिय भी हुआ था।



कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, १९४९ में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें?

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए।



फिल्म – दुनिया : "अरमान लुटे दिल टूट गया..." : गायिका - सुरैया





कृष्णमोहन- बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन सा है?

ग़ालिब खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्म 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा लिया। फिल्म का एक गीत -"किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है..." आज भी लोगों को याद है। इस गीत को संगीतकार हुस्नलाल-भगतराम के निर्देशन में मुकेश ने गाया है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसन्द है। कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं?



कृष्णमोहन- अवश्य! मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा था। तो ‘ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक’ के प्रिय पाठकों-श्रोताओं! आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने १९५१ में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें और आज हमें यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। इस साक्षात्कार का दूसरा भाग लेकर हम अगले शनिवार को अपने अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ के साथ पुनः उपस्थित होंगे। धन्यवाद!



फिल्म – अफसाना : "किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली..." : गायक – मुकेश





कृष्णमोहन मिश्र

शेष अगले अंक में........



चित्र - ग़ालिब खान (उपर)

असद भोपाली (नीचे)

Saturday, August 27, 2011

तेरे नैनों के मैं दीप जलाऊँगा....नेत्र दान महादान, जिन्दा रखिये अपनी आँखों को सदा के लिए

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 56



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नम्स्कार! दोस्तों, भगवान से इन्सान और पशुओं को जितनी भी अनमोल चीज़ें मिली हैं, उनमें सबसे अनमोल देन है आँखें। आँखें, जिनसे हम दुनिया को देखते हैं, अपने प्रियजनों को देखते हैं। अपने संतान को बड़ा होते देखने में जो सुख है, वह शायद सबसे सुखद अनुभूति है, और यह भी हम अपनी आँखों से ही देखते हैं। पर ज़रा सोचिए उन लोगों के बारे में जिनकी आँखों में रोशनी नहीं है, जो नेत्रहीन हैं। कितनी अन्धेरी, कितनी बेरंग होती होगी उनकी दुनिया, क्या इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं! पर मैं और आप अपने एक छोटे से प्रयास से कम से कम एक नेत्रहीन को नेत्र ज़रूर प्रदान कर सकते हैं। २५ अगस्त से ४ सितम्बर भारत में 'राष्ट्रीय नेत्रदान सप्ताह' के रूप में पालित किया जाता है। आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में इसी पर चर्चा की जाए। चर्चा क्या दोस्तो, आइए आपको एक कहानी सुनाता हूँ जो मुझे इंटरनेट पर ही प्राप्त हुई थी। यह एक सत्य घटना है अनीता टेरेसा अब्राहम के जीवन की।



I don't remember my grandfather, as he passed away when I was three years old. He was known as a very terrorizing person. There was nobody in the town who did not know about his thundering anger. My father hardly remembers his father talking to his children or expressing some kind of affection or love towards them. He was always remembered as a person who gave blunt replies and didn't care about what other people felt. But I guess, eventually as he walked closer to his gray old days, he reformed himself to a sober person.



With the birth of his first grandchild (me), he became even more sober and sweet. My grandmother and father saw different changes, they started seeing a face they had never seen before. But my grandfather still remained very reserved. My first three years were with my grandparents, far away from my parents, who flew to Dubai for work. For my grandparents I was the child, God had gifted them in their old age, to pamper, love and caress. My grandmother cooked me all the possible food the three year old, could eat and my grandfather carried me everywhere this three year old girl could go. There was nothing this little fairy had missed in that small village.



Soon, the whole village knew this inseparable grandfather and granddaughter. There was never a moment one could see either of us alone. My grandfather loved me so much, that he wouldn't open his eyes in the morning without seeing this little fairy who taught the art of living.



After three long years, my parents came home, with a passport and a visa all ready for me to fly away. My grandparents though very hesitant and sad, were helpless and so had to let me go with my parents. Although they brought me up those three years, they had to accept the fact that I was only their grandchild and had to let me go with my parents. Never did I know, when I bid him good bye, I would part from him for life.



After that day, my grandfather went back to his old ways. He used to get angry and irritated even at the smallest creek of door. He spent his time all alone. He sat at the veranda with a confused stare on the plain floor. He missed his little fairy. He kept telling my grandmother that, they shouldn't have looked after me, maybe then he wouldn't be in this state!!



In a year's time, on a dreadful morning, the news of my grandfather's death reached us. Since I was a small girl, the reality of death was too complex for me to comprehend. But I knew that there was something very bad that happened and the next time I went home, I would never be able to run into those warm arms again.



After a year I came to know, that my grandfather had donated both his eyes to two blind people, who rejoiced in his name with the power of vision. Nobody in the family knew about it, except my uncle. While donating grandfather had told my uncle that he wanted to donate his eyes once he dies so that his eyes would still live to see his little fairy. Every time I think of that thought of my dear Grandfather, my eyes fill with tears.



I have met the two people who can now see because of his great deed. Though I don't know them, those eyes do smile at me. If my grandfather, who was a very rude and reserved man in others eyes, could do it, I think all of us can do it. Donate your eyes, you can make many witness the world of love.




इस कहानी को पढकर शायद आपकी आँखें भी मेरी तरह नम हो गई होंगी। अब इसके बाद कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं। अगर हमारे इस विशेषांक को पढ़कर आपमें भी नेत्रदान करने की इच्छा जागृत हुई है, तो इसे हम अपनी सफलता मानेंगे। आइए चलते चलते 'अनुराग' फ़िल्म का गीत सुनते हैं लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में। आनन्द बक्शी के बोल और सचिन देव बर्मन का संगीत। हम ख़ुद अपनी आँखों से दुनिया तो देखते ही हैं, पर क्यों न हम ऐसा कुछ कर जाएँ कि हमारे जाने के बाद हमारी आँखें किसी और के आँखों को रोशनी प्रदान करें। नेत्रदान असल में प्रेमदान, जीवनदान है, सबसे महत दान है। आप इस गीत का आनन्द लें और मुझे, यानि अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दें, नमस्कार!







और अब एक विशेष सूचना:



२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

Saturday, August 20, 2011

फिर मत कहना कि सिस्टम ख़राब है...

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 55



ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नम्स्कार! दोस्तों, अभी इसी हफ़्ते हमनें अपने देश की आज़ादी का ६५-वाँ वर्षगांठ मनाया। हम अक्सर इस बात पर ख़ुश होते हैं कि विदेशी ताक़तों नें जब भी हम पर आक्रमण किया या जब भी हमें ग़ुलाम बनाने की कोशिशें की, तो हर बार हमनें अपने आप को आज़ाद किया, दुश्मनों की धज्जियाँ उड़ाईं। पर 'स्वाधीनता दिवस' की ख़ुशियाँ मनाते हुए या कारगिल विजय पर नाज़ करते हुए हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि हम अब भी ग़ुलाम हैं हमारी सरज़मीन पर ही पनपने वाले भष्टाचार के। क्या आप यह जानते हैं कि अंग्रेज़ों नें २०० साल में इस देश को इतना नहीं लूटा जितना इस देश के भ्रष्टाचारियों ने इन ६४ सालों में लूट लिया। इन दिनों देश के हर शहर में, हर गाँव में, हर कस्बे में एक नई क्रान्ति की लहर आई है जिसकी चर्चा हर ज़बान पर है। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के ज़रिए हम आप तक पहुँचाना चाहते हैं एक अपील।



"अगर हम अपनी प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करने को तैयार नहीं है तो हम आज़ादी के हकदार भी नहीं है। देश सेवा एक क़ुर्बानी नहीं, एक सौभाग्य है। क्या हम आने वाले ६० साल वैसे ही गुज़ारना चाहते हैं कि जैसे पिछले ६० साल गुज़ारे हैं? हमारे युवा इस देश की १०० प्रतिशत जनसंख्या तो नहीं लेकिन १०० प्रतिशत इस देश का भविष्य ज़रूर बनाते हैं। समय की पुकार है, भारत की मांग है और अच्छे क़ानून द्वारा अच्छा शासन। देश सिर्फ़ नारे लगाने से महान नहीं बनता, देश महान तब बनता है जब उसके नागरिक महान काम करते हैं। हमारा विश्वास है कि भारत में ९९ प्रतिशत लोग सच्चे और ईमानदार हैं, वह भष्टाचार में भागीदार नहीं है लेकिन समुद्र में बूंद के समान इन १ प्रतिशत भष्टाचारियों ने ९९ फ़ीसदी भारत को बंधक बना लिया है। गांधीजी ने मद्रास में कहा था कि "सहयोग देना हर नागरिक का तब तक फ़र्ज़ बनता है जब तक सरकार उनके सम्मान की रक्षा करती है और असहयोग का भी उतना ही फ़र्ज़ बनता है जब सरकार उनके सम्मान की हिफ़ाज़त के बजाय उसे लूटने लगती है"। संघर्ष औतर तक़लीफ़ के लिए तैयार रहें। आज़ादी कभी मिलती नहीं है, बल्कि हमेशा हासिल करनी पड़ती है। अपने पैरों पर खड़े होने की कीमत चुकानी पड़ती है, और अपने घुटनों को टेक कर भी जीने की कीमत चुकानी पड़ती है। फ़ैसला आपका, आख़िर देश है आपका। याद रहे, अभी नहीं तो कभी नहीं। फिर मत कहना कि सिस्टम खराब है!" (अधिक जानकारी के लिए इस वेबसाइट पर पधारें - www.indiaagainstcorruption.org)



दोस्तों, वक्त आ गया है अब जागने का। बहुत हो चुका। अगर एक ७४ वर्ष का वृद्ध इस महायुद्ध को लड़ने की हिम्मत रख सकता है, तो हम कम से कम उन्हें अपना सहयोग देकर इस महान मिशन को कामयाब करने में थोड़ा सा योगदान तो दे ही सकते हैं! आख़िर 280 लाख करोड़ का भी तो सवाल है! जी हाँ, "भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा", ये कहना है 'स्विस बैंक' के डाइरेक्टर का। स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपये उनके स्विस बैंक में जमा है। ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है। या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है। या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है। ऐसा भी कह सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है। ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60 साल तक ख़त्म ना हो। यानी भारत को किसी 'वर्ल्ड बैंक' से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है। जरा सोचिये, हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नोकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी 2011 तक जारी है। इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है। अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा। मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रष्टाचार ने 280 लाख करोड़ लूटा है। एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64 सालों में 280 लाख करोड़ है। यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा 'स्विस बैंक' में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है। भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है। सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है। हमे भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है। हाल ही में हुए घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, 2G स्पेक्ट्रुम घोटाला, आदर्श होउसिंग घोटाला, और न जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले हैं। दोस्तों, आइए, हम सब मिलकर इस महामुहीम में ऐसे भाग लें कि यह एक आन्दोलन बन जाये, एक ऐसा आन्दोलन जो 'स्वाधीनता संग्राम' के बाद पहली बार हुआ हो। और सच भी तो है, यह हमारी दूसरी आज़ादी की लड़ाई ही तो है!



आइए आज चलते चलते सुनें फ़िल्म 'भ्रष्टाचार' का शीर्षक गीत मोहम्मद अज़ीज़ और साथियों की आवाज़ों में।



गीत - ये जनता की है ललकार, बन्द करो ये भ्रष्टाचार (भ्रष्टाचार)







इसी के साथ आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' यहीं समाप्त होता है, फिर मुलाक़ात होगी, अब अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!



और अब एक विशेष सूचना:



२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ