शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

फ़िल्मी प्रसंग - 2: "सपने ख़ुशी के सजाता चल..." - अलविदा अभिलाष जी!

  

फ़िल्मी प्रसंग - 2

अलविदा अभिलाष जी!

"सपने ख़ुशी के सजाता चल..." 



रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के नए साप्ताहिक स्तंभ ’फ़िल्मी प्रसंग’ में आप सभी का स्वागत है।  फ़िल्म एवम् फ़िल्म-संगीत निर्माण प्रक्रिया के दौरान घटने वाली रोचक घटनाओं व अन्य पहलुओं से सम्बन्धित दिलचस्प प्रसंग जिनके बारे में जान कर आश्चर्य भी होता है और रोमांच भी। फ़िल्म इतिहासकारों, रेडियो व टेलीविज़न कार्यक्रमों, कलाकारों व कलाकारों के परिवारजनों के सोशल मीडिया पोस्ट्स व उनसे साक्षात्कारों, विभिन्न फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं जैसे विश्वसनीय माध्यमों से संकलित जानकारियों से सुसज्जित प्रसंग - फ़िल्मी प्रसंग!

28 सितम्बर 2020 को गीतकार अभिलाष का निधन हो गया। उनके गुज़र जाने के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें जितना याद किया, काश उनके जीवित रहते समय किया होता तो शायद वे इस दुनिया को थोड़े सुकून के साथ छोड़ पाते! गीतकार विजय अकेला ने अपनी दिल की भड़ास निकालते हुए अपने फ़ेसबूक पृष्ठ पर लिखा, "शायरी से दुनिया को जितनी महब्बत होती है, शायरों से उतनी ही चिढ़! दुनिया शायरों को सहानुभूति तो देती है, उनका हक़ नहीं ! उनकी royalties नहीं ! शायर जब इलाज के अभाव में मरता है तो सभी कहते हैं -’अच्छा शायर था !’ मगर जीते जी उसके कलाम की चोरी की जाती है! मुफ़्त ही उससे महफ़िलें सजायी जाती हैं। शायर एक रंगीन चश्मा भी लगा के शेर कहे तो रंगीन चश्मा लगा के घूमने वालों की ego उस शायर से इतनी hurt हो जाती है कि वे उसका बहिष्कार करना शुरू कर देते हैं ! बड़े हॉस्पिटल में उसका इलाज चले तो समाज के सीने पे कटारी चल जाती है! यही है वो समाज जिसमें हम रहते हैं! बढ़िए आगे अभिलाष जी! हम भी आ ही रहे हैं! अभिलाष जी ने लिखा था "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो ना"। यह गीत प्रार्थना बना। सैंकड़ों स्कूलों में हर रोज़ गाया गया / जाता है! और तो और वर्तमान सरकार ने भी इस गीत को एक तरह से अपना Party Song बनाया, मगर royalties? कुछ भी नहीं! आज करोड़ों मोबाइल का caller tune है ये गीत! पर कितनों को पता होगा कि इसे अभिलाष जी ने लिखा है?"

अभिलाष जी को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके लिखे "इतनी शक्ति हमें देना दाता" गीत के बजाय उनके किसी कमचर्चित या कमसुने-अनसुने गीत को चुनने का मन हो रहा है। हालांकि उनका लिखा मेरा अब तक का पसन्दीदा गीत फ़िल्म ’सावन को आने दो’ का "तेरे बिन सूना मोरे मन क मन्दिर आ रे आ रे आ" है, उनके लिखे गीतों पर नज़र डालते हुए एक ऐसा गीत हाथ लगा जिसे शायद बहुत कम ही लोगों ने सुना होगा और अब यही गीत सबसे अधिक दिल को छू रहा है। दिल को छूने का कारण शायद यह है कि इस गीत का एक एक शब्द जैसे अभिलाष जी के जीवन का उपहास कर रहा हो! "झूमता, मुस्कुराता चल, प्यार में गुनगुनाता चल, ओ मेरे मन, होके मगन, सपने ख़ुशी के सजाता चल"। यह 1970 के दशक में बनने वाली किसी अप्रदर्शित फ़िल्म का बताया जा रहा है। गीत गाया है मुकेश ने और संगीत दिया है असित गांगुली ने। गीत में मुकेश जी की आवाज़ और गीत के संगीत संयोजन को सुनते हुए यह 70 के दशक का ही गीत जान पड़ता है, पर एक आश्चर्य की बात है कि बहुत से जगहों पर इसे 1956 की फ़िल्म ’मौक़ा’ का बताया जा रहा है। पर अभिलाष जी की उम्र उस समय मात्र दस वर्ष की थी, इसलिए यह सम्भव नहीं कि उन्होंने यह गीत उस समय लिखा होगा। संयोग की बात यह है कि गीत में "मौक़ा" शब्द आता है, इसलिए संशय उत्पन्न हुआ कि क्या ’मौक़ा’ नामक किसी फ़िल्म के लिए ही यह गीत लिखा गया होगा! ख़ैर, जो भी है, इस गीत को आज सुनते हुए मन में जैसे अभिलाष जी के लिए एक दर्द सा महसूस होता है। पूरे गीत में आशाओं की धरती पर एक नई दुनिया बसाने, ख़ुशियों के सपने सजाने की बातें कही गई हैं, पर अभिलाष जी का अपना जीवन निराशाओं से ही घिरा रहा। तमाम निराशाओं के बीच उनके आशावादी गीतों का सफ़र जारी रहा। जिस तरह से इस अप्रदर्शित गीत में उन्होंने आशावादी विचारधारा रखी है, "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो ना" में भी वही आशावाद दिखाई देता है।

झूमता मुस्कुराता चल
प्यार में गुनगुनाता चल
ओ मेरे मन, हो के मगन
सपने खुशी के सजाता चल

फूलों भरी ये डालियाँ
महकी महकी वादियाँ
कलियों का ये निखरा जोबन
नज़रों से तू चुराता चल
मौका मिला है सुनहरा
उठ गया ग़म का पहरा
आशाओं की धरती पर तू
दुनिया नई बसाता चल





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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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