रविवार, 23 अगस्त 2020

राग मध्यमाद सारंग : SWARGOSHTHI – 476 : RAG MADHYAMAD SARANG : पण्डित जसराज को श्रद्धांजलि


अष्टछाप गायकी के संवाहक पण्डित जसराज को "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" की भावभीनी श्रद्धांजलि 




स्वरगोष्ठी – 476 में आज 

काफी थाट के राग – 20 : राग मध्यमाद सारंग 

पण्डित जसराज से राग मध्यमाद सारंग में एक रागदारी संगीत की रचना और मुकेश से फिल्म का गीत सुनिए 





स्मृतशेष पण्डित जसराज

मुकेश 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बीसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का भरे हुए हृदय से स्वागत करता हूँ। आज का यह अंक भारतीय संगीत के मूर्धन्य सितारे पण्डित जसराज की स्मृतियों को समर्पित है। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग मध्यमाद सारंग में निबद्ध भक्तकवि और संगीतज्ञ पं. परमानन्द दास रचित एक पद के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी काफी उपयोग किया गया है। राग मध्यमाद सारंग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रूपमती" से भरत व्यास का लिखा और एस.एन. त्रिपाठी का स्वरबद्ध किया एक गीत "आ लौट के आ जा मेरे मीत..." सुनवा रहे हैं, जिसे मुकेश ने स्वर दिया है। 



राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग काफी थाट का राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। राग में निषाद स्वर कोमल और शेष लगने वाले स्वर शुद्ध होते हैं। मध्यमाद सारंग के आरोह में सा, रे, म, प, नि(कोमल), और सां तथा अवरोह में सां, नि(कोमल), प, म, रे और सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या पाँच होने से यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसरग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। इसके नाम से ज्ञात होता है कि यह राग सारंग का एक प्रकार है। इसमें कोमल निषाद व पंचम और पंचम व ऋषभ स्वर की संगति राग वाचक है। ऋषभ पर न्यास करते समय इस राग में वृन्दावनी सारंग की छाया आती है, इसलिए बीच-बीच में कोमल निषाद का आरोहात्मक प्रयोग किया जाता है। यह राग मेघ से भी काफी मिलता जुलता राग है। अन्तर इतना ही है कि राग मध्यमाद सारंग, सारंग अंग से और राग मेघ, मल्हार अंग से गाया जाता है। यह वृन्दावनी सारंग का छायालग राग भी कहलाता है। कुछ विद्वान इस राग को खमाज थाट का जन्य राग मानते हैं। "राग परिचय" ग्रन्थ के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव इस राग को खमाज थाट का किन्तु संगीत कार्यालय, हाथरस से प्रकाशित वसन्त की पुस्तक "रागकोष" तथा कन्हैयालाल पाण्डेय की पुस्तक "सुर संवादिनी" में राग मध्यमाद सारंग को काफी थाट का राग माना गया है। गत सोमवार, 18 अगस्त 2020 को कृष्ण-भक्त जसराज 90 वर्ष की आयु में स्वर्गारोहण कर गए। उन्हें श्रीकृष्ण के चरणों में निश्चित रूप से स्थान मिलेगा। अब आप अपने युग के सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वर में ब्रज के भक्तकवि और संगीतज्ञ परमानन्द दास रचित श्रीराधाजी के पलना का एक पद राग मध्यमाद सारंग में निबद्ध एक रचना सुनिए, जिसके बोल हैं; "रसिकनी श्रीराधा पलना झूलै..."। 

राग मध्यमाद सारंग : "रसिकनी श्रीराधा पलना झूलै..." : पण्डित जसराज 


राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग पर आधारित एक फिल्मी गीत अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस फिल्म का प्रदर्शन 1959 में हुआ था। फिल्म के निर्देशन एस.एन. (श्रीनाथ) त्रिपाठी थे। इन्हीं त्रिपाठी जी ने ही फिल्म के गीतों का संगीत निर्देशन भी किया था। साथ ही फिल्म की पटकथा और संवाद के लिए भी वही उत्तदायी हैं। फिल्म के कथानक के अनुसार रूपमती मालवा के अन्तिम स्वाधीन अफगान सुलतान बाजबहादुर की प्रेयसी थी। बाजबहादुर और रूपमती के प्रेम कथानक को लेकर 1599 ईस्वी में अहमद-उल-उमरी ने फारसी में एक प्रेम काव्य कि रचना कि थी और मुगल काल के अनेकानेक सुप्रसिद्ध चित्रकारों ने उनकी घटनाओं पर कई भावपूर्ण सुन्दर चित्र बनाए थे। परन्तु इस इतिहासप्रसिद्ध प्रेमिका की जीवनी का कोई भी प्रामाणिक विवरण प्राप्य नहीं है। प्राप्य ऐतिहासिक आधारग्रन्थों में तद्विपयक उल्लेख अस्पष्ट या परस्पर विरोधी हैं। रूपमती को सारंगपुर की ब्राह्मण लिखा गया है। परन्तु नर्मदा घाटी में प्रचलित आख्यानों के अनुसार रूपमती धरमपुरी या टाण्डापुर की राजपूत कन्या थी, इनका मकबरा अवश्य ही सारंगपुर, मालवा में एक तालाब के बीच में बना हुआ है। यह तो सर्वस्वीकृत है कि रूपमती अपार सुन्दरी थी और वह गायन व वादन कला में अत्यन्त निपुण थी। बाजबहादुर स्वयं संगीत में निपुण था और गायकी कला में उस्ताद था। यह तो सर्वस्वीकृत है कि रूपमती अपार सुन्दरी थी; उसकी स्वरलहरी बहुत मधुर थी और वह गायन और वादन में पूर्ण निष्णात थी। बाजबहादुर भी संगीत में निपुण था और गायन में उस्ताद था। इन्हीं गुणों के कारण वह रूपमती कि ओर आकर्षित हुआ था और उनमें परस्पर अगाध प्रेम हो गया। उस समय मालवा में संगीत बहुत ही बढ़ी-चढ़ी थी; और अब तो बाजबहादुर और रूपमती दोनों ही उसकी उन्नति तथा साधना में ऐसे लीन हो गए कि जब अकबर के सेनानायक आदम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेनाएँ मालवा पर चढ़ आई और सारंगपुर के पास तक जा पहुँची तभी उन्हें उनका पता लगा। अन्त में सन्‌ 1561 में सारंगपुर युद्ध में पराजित होकर बाजबहादुर को भागना पड़ा। तब रूपमती आदम खाँ कि बन्दिनी बनी। उसके रूप और संगीत से मुग्ध आदम खाँ ने जब रूपमती को अपनी प्रेयसी बनाना चाहा तब रूपमती ने विष खाकर बाजबहादुर के नाम पर जान दे दी और अपनी प्रेमकहानी को अमर कर दिया। रूपमती द्वारा रचित अनेक गीत और पद्य जनसाधारण में तब से प्रचलित हैं तथा अब तक मालवा के कई भागों में लोकगीतों   के रूप में गाए जाते हैं। फिल्म "रानी रूपमती" में रूपमती की भूमिका निरूपा राय ने और बाज बहादुर की भूमिका भारत भूषण ने निभाई थी। फिल्म का यह गीत मुकेश के स्वर में है जिसे परदे पर बाजबहादुर पर फिल्माया गया है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रूपमती" के गीतकार भरत व्यास और संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी हैं। इस गीत को त्रिपाठी जी ने राग मध्यमाद सारंग, कहरवा ताल में निबद्ध किया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग म्ध्यमाद सारंग : "आ लौट के आ जा मेरे मीत..." : मुकेश : फिल्म - रानी रूपमती 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 476वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल पार्श्वगायकों के स्वर है? 

आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 29 अगस्त, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 478 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 474वें अंक में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म "हम दोनों" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - धानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बीसवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मध्यमाद अथवा मधुमाद सारंग का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ स्मृतिशेष पण्डित जसराज के स्वरों में राग मध्यमाद सारंग में अष्टछाप गायकी की एक शास्त्रीय रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रूपमती" से एस.एन. त्रिपाठी का संगीतबद्ध किया एक गीत "आ लौट के आ जा मेरे मीत..." प्रस्तुत किया। गीत के स्वर मुकेश के हैं। 

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प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया
 राग मध्यमाद सारंग : SWARGOSHTHI – 476 : RAG MADHYAMAD SARANG : 23 अगस्त, 2020 





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