Saturday, May 5, 2018

चित्रकथा - 67: हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रबीन्द्र संगीत की छाया

अंक - 67

हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रबीन्द्र संगीत की छाया

"कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." 




जहाँ एक तरफ़ फ़िल्म-संगीत का अपना अलग अस्तित्व है, वहीं दूसरी तरफ़ फ़िल्म-संगीत अन्य कई तरह के संगीत पर भी आधारित रही है। शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और पाश्चात्य संगीत का प्रभाव फ़िल्म-संगीत पर हमेशा से रहा है। उधर बंगाल की संस्कृति में रबीन्द्र संगीत एक अहम धारा है; गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं के बिना बांगला संगीत, नृत्य और साहित्य अधूरा है। समय-समय पर हिन्दी सिने संगीत जगत के संगीतकारों ने भी रबीन्द्र-संगीत को अपने फ़िल्मी गीतों का आधार बनाया है। आगामी 7 मई को कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्म-जयंती के उपलक्ष्य में आइए आज ’चित्रकथा’ में हम उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों पर एक नज़र डालें जो रबीन्द्र संगीत की धुनों से प्रेरित हैं। आज का यह अंक कविगुरु को समर्पित है।



(7 May 1861 – 7 August 1941)

विगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर के लिखे गीतों का, जिन्हें हम "रबीन्द्र-संगीत" के नाम से जानते हैं, बंगाल के साहित्य, कला और संगीत पर जो प्रभाव पड़ा है, वैसा बहुत कम साहित्यकारों के साथ होता है। ऐसा कहा जाता है कि टैगोर के गीत दरसल बंगाल के 500 वर्ष के साहित्यिक और सांस्कृतिक मंथन का निचोड़ है। धन गोपाल मुखर्जी ने अपनी किताब 'Caste and Outcaste' में लिखा है कि रबीन्द्र-संगीत मानव मन के हर भाव को प्रकट करने में सक्षम हैं। कविगुरु ने छोटे से बड़ा, ग़रीब से धनी, हर किसी के मनोभाव को, हर किसी की जीवन शैली को आवाज़ प्रदान की है। गंगा में विचरण करते ग़रीब से ग़रीब नाविक से लेकर अर्थवान ज़मीनदारों तक, हर किसी को जगह मिली है रबीन्द्र-संगीत में। समय के साथ साथ रबीन्द्र-संगीत एक म्युज़िक स्कूल के रूप में उभरकर सामने आया है। रबीन्द्र-संगीत को एक तरह से हम उपशास्त्रीय संगीत की श्रेणी में डाल सकते हैं। अपने लिखे गीतों को स्वरबद्ध करते समय कविगुरु ने शास्त्रीय संगीत, बांगला लोक-संगीत और कभी-कभी तो पाश्चात्य संगीत का भी सहारा लिया है। रबीन्द्र-संगीत पर रबीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित "विश्वभारती विश्वविद्यालय" का एक लम्बे समय तक नियंत्रण था। इस विश्वविद्यालय की अनुमति के बिना कोई रबीन्द्र-संगीत को गा या इस्तमाल नहीं कर सकता था। फ़िल्मों में रबीन्द्र-संगीत की धारा को लाने में पहला क़दम उठाया था संगीतकार-गायक पंकज मल्लिक ने। 1937 की फ़िल्म 'मुक्ति' के बांगला संस्करण में मल्लिक बाबू ने कविगुरु की रचनाओं का व्यापक स्तर पर इस्तमाल किया। अधिकांश धुनें कविगुरु की थीं, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "दिनेर शेषे घूमेर देशे" की धुन मल्लिक बाबू ने ख़ुद बनाई थी। इस फ़िल्म के बाद भी पंकज मल्लिक रबीन्द्र-संगीत का इस्तमाल व्यापक रूप से करते रहे और कविगुरु की रचनाओं को बंगाल के बाहर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। 'मुक्ति' के हिंदी संसकरण में कानन देवी के स्वर में "सांवरिया मन भाया रे..." गीत रबीन्द्र-संगीत की छाया लिए हुए था जो न केवल बहुत लोकप्रिय हुआ बल्कि कानन देवी का गाया लोकप्रियतम गीतों में से एक है। 1949 की फ़िल्म 'अंजानगढ़' में पंकज मल्लिक और उत्पला सेन का गाया एक गीत था "संसार के आधार पर दया हम पे दिखाओ..." जो रबीन्द्रनाथ रचित ""सर्बा खर्बा तार दाहे" गीत पर आधारित था। यूं तो इस फ़िल्म के संगीतकार थे रायचन्द बोराल, पर इस गीत का संगीत-संयोजन पंकज मल्लिक ने किया था। फ़िल्म के बांगला संस्करण में इस गीत को हेमन्त मुखर्जी और उत्पला सेन ने गाया है। रायचन्द बोराल ने 1945 की फ़िल्म 'हमराही' (जो बिमल राय निर्देशित प्रथम हिन्दी फ़िल्म थी) में रबीन्द्रनाथ रचित "मधुगंधे भरा मधु स्निग्ध छाया" को उसके मूल बांगला रूप में प्रस्तुत कर सुनने वालों को चमत्कृत कर दिया था। 

न्यू थिएटर्स के संगीतकार पंकज मल्लिक और रायचन्द बोराल की जब बात चल ही रही है, तो वहाँ के तीसरे संगीतकार अर्थात्‍ तिमिर बरन का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। पंकज मल्लिक की तरह तिमिर बरन ने रबीन्द्र संगीत का प्रयोग ज़्यादा तो नहीं किया पर 1954 की 'बादबान' (एस. के. पाल के साथ) फ़िल्म में "कैसे कोई जिए, ज़हर है ज़िन्दगी... आया तूफ़ान" (हेमन्त कुमार - गीता दत्त) को रबीन्द्र-संगीत ("तारे ना जानी...") पर आधारित कर ऐसा कम्पोज़ किया कि जिसे ख़ूब सराहना मिली। यह गीत तिमिर बरन के यादगार गीतों में से एक है जो आज भी रेडियो पर सुनाई दे जाता है। रबीन्द्र-संगीत का इस्तमाल करने वाले न्यू थिएटर्स के बाहर के संगीतकारों में पहला नाम है अनिल बिस्वास का। अनिल दा ने मूल गीत के शब्दों को नहीं, बल्कि उनकी धुनों का प्रयोग किया। और उनके बाद भी तमाम संगीतकारों ने केवल रबीन्द्र-संगीत के धुनों का ही सहारा लिया। उपर्युक्त "मधुगंधे भरा..." गीत की धुन का प्रयोग अनिल बिस्वास ने अपनी 1960 की फ़िल्म 'अंगुलिमाल' में किया था मीना कपूर और साथियों के गाये "मेरे चंचल नैना मधुरस के भरे..." गीत में। अनिल बिस्वास द्वारा स्वरबद्ध रबीन्द्र-संगीत पर आधारित सबसे लोकप्रिय रचना है 1954 की फ़िल्म 'वारिस' का "राही मतवाले, तू छेड़ एक बार मन का सितार..." गीत। तलत महमूद और सुरैया की आवाज़ों में यह गीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय तो हुआ पर बंगाल के बाहर जनसाधारण को यह पता भी नहीं चला कि दरसल इस गीत की धुन कविगुरु रचित "ओ रे गृहोबाशी..." पर आधारित है जो मूलत: एक होली गीत है। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कविगुरु होली के त्योहार को एक विशेष उत्सव की तरह गीत-संगीत-नृत्य के माध्यमों से मनाते थे और आज भी यह परम्परा ’विश्वभारती’ में जारी है। 

संगीतकार सचिन देव बर्मन ने रबीन्द्र-संगीत का हू-ब-हू प्रयोग ज़्यादा गीतों में नहीं किया। यह ज़रूर है कि उनके द्वारा स्वरबद्ध कई गीतों में रबीन्द्र-संगीत की छाया मिलती है। रबीन्द्र-संगीत पर आधारित दादा बर्मन का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है 1973 की फ़िल्म 'अभिमान' का "तेरे मेरे मिलन की ये रैना..." जो रबीन्द्रनाथ रचित "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." गीत पर आधारित है। 1950 की देव आनन्द-सुरैया अभिनीत फ़िल्म 'अफ़सर' में सुरैया का गाया लोकप्रिय गीत "नैन दीवाने एक नहीं माने..." भी एक रबीन्द्र-रचना "शेदिन दुजोने दुलेछिलो बोने..." पर आधारित है जिसकी धुन दादा बर्मन ने बनाई है। रबीन्द्र-संगीत की छाया लिए दादा बर्मन द्वारा स्वरबद्ध कुछ और गीत हैं "जायें तो जायें कहाँ" (टैक्सी ड्राइवर), "मेरा सुंदर सपना बीत गया" (दो भाई), "मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निन्दिया" (शर्मीली)। सचिन दा के बेटे राहुल देव बर्मन ने बंगाल और नेपाल के लोक-संगीत का ख़ूब प्रयोग किया है अपने गीतों में, पर एक-आध बार रबीन्द्र-संगीत की तरफ़ भी झुके हैं। फ़िल्म 'जुर्माना' का लता के गाये "छोटी सी एक कली खिली थी एक दिन बाग़ में..." गीत के लिए पंचम ने जिस रबीन्द्र-रचना को आधार बनाया, उसके बोल हैं "बसन्ते फूल गांथलो आमार जयेर माला..."। इस मूल रबीन्द्र-रचना को 1944 की बांगला फ़िल्म 'उदयेर पथे' में शामिल किया गया था। 'उदयेर पथे' दरसल बांगला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म थी, जिसका हिन्दी में 'हमराही' के नाम से निर्माण हुआ था। इस फ़िल्म के एक गीत की चर्चा हम उपर कर चुके हैं। राहुल देव बर्मन ने 1982 की फ़िल्म 'शौकीन' में आशा-किशोर से "जब भी कोई कंगना बोले..." गीत गवाया था जो रबीन्द्रनाथ रचित "ग्राम छाड़ा ओइ रांगा माटीर पथ..." की धुन पर आधारित था। '1942 - A Love Story' में कविता कृष्णमूर्ति का गाया "क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन..." को भी रबीन्द्र-संगीत से प्रेरित पंचम ने ही एक साक्षात्कार में बताया था पर मूल रबीन्द्र-रचना की पहचान नहीं हो पायी है। इसी अंश का प्रयोग पंचम ने बरसों पहले 'हीरा-पन्ना' के शीर्षक गीत "पन्ना की तमन्ना..." के अंतरे की पंक्ति "हीरा तो पहले ही किसी और का हो गया" में किया था। हेमन्त कुमार की आवाज़ में एक अत्यन्त लोकप्रिय रबीन्द्र-रचना है "मोन मोर मेघेरो शोंगी उड़े चोले दिग दिगन्तेरो पाने..."। हेमन्त कुमार ने ही इस गीत की धुन पर 1964 की हिन्दी फ़िल्म 'माँ बेटा' में एक गीत कम्पोज़ किया था "मन मेरा उड़ता जाए बादल के संग दूर गगन में, आज नशे में गाता गीत मिलन के रे, रिमझिम रिमझिम रिमझिम..."। लता मंगेशकर का गाया यह गीत ज़्यादा सुनाई तो नहीं दिया पर यह एक अत्यन्त कर्णप्रिय रचना है जिसे जितनी बार भी सुनें, अच्छा ही लगता है। इस गीत के फ़िल्मांकन में निरुपा रॉय सितार हाथ में लिए गीत गाती हैं और एक नर्तकी इस पर नृत्य कर रही हैं। इस बात का उल्लेख हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस नृत्य शैली को "रबीन्द्र-नृत्य" के नाम से जाना जाता है (रबीन्द्र संगीत पर किए जाने वाले नृत्य की विशेष शैली को रबीन्द्र-नृत्य कहते हैं)। 

बंगाल से ताल्लुख रखने वाले संगीतकारों में एक नाम बप्पी लाहिड़ी का भी है। यूं तो बप्पी दा 'डिस्को किंग्‍' के नाम से जाने जाते हैं, पर उन्होंने भी कई शास्त्रीय और लोक संगीत आधारित गीत रचे हैं। रबीन्द्र-संगीत का प्रयोग उन्होंने कम से कम दो बार किया है। 1985 की फ़िल्म 'झूठी' में उन्होंने "चंदा देखे चंदा तो वो चंदा शर्माये..." को उसी "जोदी तारे नाइ गो चीनी..." पर आधारित किया जिस पर सचिन दा ने "तेरे मेरे मिलन की यह रैना" को कम्पोज़ किया था। दोनों ही गीत लता-किशोर के गाए हुए हैं, और दोनों ही फ़िल्मों के निर्देशक हैं ॠषीकेश मुखर्जी। क्या पता वो 'झूठी' के गीत में 'अभिमान' के उस गीत को पुनर्जीवित करना चाहते होंगे! 1984 की फ़िल्म 'हम रहे न हम' में बप्पी दा ने एक अत्यन्त लोकप्रिय रबीन्द्र-रचना "पुरानो शेइ दिनेर कथा भूलबो की रे..." के शुरुआती अंश का प्रयोग कर एक सुन्दर गीत कम्पोज़ किया "रोशन रोशन रातें अपनी, दिन भी रोशन, जब से जीवन में तुम आये, तब से ऐसा जीवन..."। आशा-किशोर की युगल आवाज़ों में यह गीत था। वैसे यह भी एक रोचक तथ्य है कि मूल रबीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा" भी अपने आप में कविगुरु की मौलिक रचना नहीं है। इसकी धुन प्रेरित है स्कॉटलैण्ड की एक धुन "Auld Lang Syne" से। बप्पी लाहिड़ी के संगीत में 1986 की फ़िल्म 'अधिकार' में किशोर कुमार का गाया "मैं दिल तू धड़कन, तुझसे मेरा जीवन..." गीत भी रबीन्द्र-संगीत शैली में ही स्वरबद्ध एक रचना है। 

अब तक हिन्दी फ़िल्म-संगीत में रबीन्द्र-संगीत के प्रयोग की जितनी चर्चा हमने की है, उसमें जितने भी संगीतकारों का नाम आया है, वो सब बंगाल से ताल्लुख रखने वाले थे। बंगाल के बाहर केवल राजेश रोशन ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने रबीन्द्र-संगीत का प्रयोग कई बार अपने गीतों में किया। वैसे राजेश रोशन का बंगाल से रिश्ता तो ज़रूर है। उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं। 1981 की फ़िल्म 'याराना' में राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा" का मुखड़ा रबीन्द्रनाथ रचित "तोमार होलो शुरू, आमार होलो शाड़ा..." से प्रेरित था। यूं तो इस रबीन्द्र-रचना को कई गायकों ने गाया, पर किशोर कुमार का गाया संस्करण सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, और राजेश रोशन ने भी अपने गीत को किशोर दा से ही गवाया। भले राजेश रोशन ने केवल मुखड़े की धुन को ही प्रयोग में लाया, पर कलकत्ते की जनता को क्रोधित करने में यही काफ़ी था। दरसल राजेश रोशन ने इस धुन के इस्तमाल के लिए विश्वभारती से अनुमति नहीं ली थी, जिस वजह से बंगाल में यह हंगामा हुआ। पर बंगाल के बाहर इस गीत ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि राजेश रोशन को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने 1984 की फ़िल्म 'इंतहा' में फिर एक बार इसी धुन की छाया तले कम्पोज़ किया एक और गीत "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल...", और इसे भी किशोर कुमार से ही गवाया। 1997 की फ़िल्म 'युगपुरूष' में राजेश रोशन ने दो गीतों में रबीन्द्र-संगीत की छटा बिखेरी। इनमें एक था आशा भोसले का गाया "कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." (मूल रबीन्द्र रचना - "तुमि केमोन कोरे गान कोरो हे गुणी...") और दूसरा गीत था प्रीति उत्तम का गाया "बंधन खुला पंछी उड़ा, आगे सुनो अजी फिर क्या हुआ" (मूल रबीन्द्र रचना - "पागला हावा बादल दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...")। "पगला हावार..." एक अत्यन्त लोकप्रिय रबीन्द्र-रचना है और बंगाल के बहुत सारे कलाकारों ने समय समय पर इसे गाया है। 

कहते हैं कि नौशाद द्वारा स्वरबद्ध लता-शमशाद का गाया "बचपन के दिन भुला न देना" भी किसी रबीन्द्र-संगीत से प्रेरित है, ऐसा विश्वभारती दावा करते हैं, पर वह कौन सा गीत है इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। ऐसे कई गानें हैं जिन्हें रबीन्द्र-संगीत शैली में कम्पोज़ किया गया है, पर सही-सही कहा नहीं जा सकता कि मूल रचना कौन सी है। फ़िल्म 'सुजाता' का "जलते हैं जिसके लिए, मेरी आँखों के दिये" को भी रबीन्द्र-संगीत पर आधारित होने का दावा विश्वभारती ने किया है। इस तरह से हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रबीन्द्र-संगीत की महक हमें बार बार मिली है। इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि जब जब रबीन्द्र-संगीत की धुनें हिन्दी फ़िल्मी गीतों में सुनाई दी है, वो सभी गीत बेहद मधुर व कर्णप्रिय बने हैं। रबीन्द्र-संगीत इस देश की अनमोल धरोहर है जिसे हमें सहेज कर रखना है। जिन जिन संगीतकारों ने रबीन्द्र-संगीत का प्रयोग अपने गीतों में प्रयोग कर इसे बंगाल के बाहर पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम किया है, उन्हें हमारा सलाम।



आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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