Wednesday, August 31, 2016

"मैं सुनता हूँ, सीखता हूँ, फिर कुछ अपना नया रचता हूँ" - अविषेक मजुमदर :एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (26)

इसी शुक्रवार प्रदर्शित हो रही है, जिम्मी शेरगिल और अरबाज़ खान की कॉमेडी फिल्म "ये तो टू मच हो गया" जिसके बेहद काबिल संगीतकार अविषेक मजुमदार हैं हमारे आज के मेहमान, कार्यक्रम एक मुलाकात ज़रूरी है में, मिलिए इस प्रतिभावान संगीतकार से आज के इस ख़ास एपिसोड में....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Sunday, August 28, 2016

मियाँ मल्हार : SWARGOSHTHI – 281 : MIYAN MALHAR




स्वरगोष्ठी – 281 में आज

पावस ऋतु के राग – 2 : तानसेन की अमर कृति – मियाँ मल्हार

“बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हम राग मियाँ की मल्हार पर चर्चा करेंगे। राग मियाँ मल्हार मल्हार अंग का सबसे लोकप्रिय राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु का यथार्थ परिवेश का सृजन किया जा सकता है। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ से गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ में गाया गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग मियाँ की मल्हार में प्रस्तुत एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं।



ल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। इसराज और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है। राग मियाँ मल्हार के बारे में जानकारी देते हुए पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। वास्तव में पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ विरह से व्याकुल नायक-नायिकाओं की विरहाग्नि को शान्त करते हैं और मिलन की आशा जगाते हैं। कई फिल्मों में संगीतकारों ने इस राग पर आधारित यादगार गीतों की रचना की है। अब हम आपको 1998 में प्रदर्शित एक संगीत-प्रधान फिल्म ‘साज’ का मियाँ की मल्हार राग पर आधारित गीत सुप्रसिद्ध गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ में सुनवाते हैं। इस फिल्म का संगीत विश्वविख्यात तबला-वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने तैयार किया था। फिल्म में इसी गीत का एक अन्य संस्करण भी है, जिसे गायिका कविता कृष्णमूर्ति ने स्वर दिया है।

राग मियाँ की मल्हार : “बादल घुमड़ बढ़ आए...” : सुरेश वाडकर : फिल्म – साज


राग मियाँ मल्हार में वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। यह काफी थाट का और सम्पूर्ण-षाड़व जाति का राग है। अर्थात; आरोह में सात और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह और अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है। राग के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की और विरह की पीड़ा को हर लेने की अनूठी क्षमता होती है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ मल्हार’ कहा जाने लगा। आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में तीनताल में निबद्ध, मियाँ मल्हार की एक मनमोहक रचना। आप यह मनमोहक रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मियाँ की मल्हार : ‘बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...’ : उस्ताद राशिद खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से अधिक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 3 सितम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 283वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 279 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मेघ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- अभिनेत्री और गायिका – खुर्शीद बानो

इस बार की संगीत पहेली में छः प्रतिभागियों ने प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस बार की पहेली में पहली बार भाग लेकर विजेता बनने का गौरव मिला है, नई दिल्ली की रेखा एन. देशमुख को। हमारे अन्य नियमित विजेता प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी छः विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ की आज यह दूसरी कड़ी है। मेरे अस्वस्थ हो जाने और भारत संचार निगम की इन्टरनेट सेवा में व्यवधान के कारण 24 जुलाई, 7, 14 और 21 अगस्त, 2016 की ‘स्वरगोष्ठी’ का हम प्रकाशन नहीं कर सके, जिसके लिए हमें खेद है। आज की कड़ी में आपने राग मियाँ की मल्हार का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले मल्हार अंग के कुछ रागों को चुन कर आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी कड़ी में वर्षा ऋतु का ही एक राग प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, August 27, 2016

"एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है...", क्यों इन्दीवर ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 90
 

'एक तू ना मिला ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 90-वीं कड़ी में आज जानिए 1966 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ के मशहूर गीत "एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल इन्दीवर के और संगीत कल्याणजी-आनन्दजी का। 


बात उन दिनों की है जब इन्दीवर जी बम्बई नहीं आए थे। थोड़ी-थोड़ी शोहरत मिल रही थी कवि सम्मेलनों के कारण। मध्य प्रदेश में होने वाले कवि सम्मेलनों में उन्हें ख़ास तौर से बुलाया जाता था। आमदनी भी हो जाती थी, घर चल जाता था। फिर एक ऐसा दौर आया जब इनकी बहन और बहनोई ने इन्दीवर जी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ दबाव डाल कर इनका विवाह झांसी की रहने वाली एक लड़की से करा दिया जिसका नाम था पार्वति। बिल्कुल शादी नहीं करना चाहते थे इन्दीवर जी। इसी वजह से अनमने से रहने लगे पत्नी के साथ। और शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी से पीछा छुड़ाने की मनशा लिए तकरीबन बीस साल की उम्र में बम्बई भाग गए। बम्बई में दो साल तक संघर्षों के साथ भाग्य आज़माने की कोशिशें की। 1946 में फ़िल्म ’डबल फ़ेस’ में इन्दीवर जी के लिखे गीत पहली बार रेकॉर्ड हुए। किन्तु फ़िल्म चली नहीं। परिणाम यह हुआ कि इन्दीवर को जल्दी ही वापस अपने गाँव बरुवा लौट जाना पड़ा। अब भाग्य का खेल देखिए कि जिस पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए वो घर छोड़ कर भागे थे, अब उसी पत्नी से धीरे धीरे उनका लगाव और मोह होने लगा। और इसके चलते उन्होंने मन बना लिया कि वो उसे छोड़ कर कभी वापस नहीं जाएँगे। 

लेकिन उनकी पत्नी पार्वति को पता था कि उनका करीयर यहाँ इस गाँव में नहीं है। उनके हुनर की कद्र तो बम्बई में है। इसलिए धर्मपत्नी पार्वति देवी ने उन्हें वापस बम्बई जाने के लिए प्रेरित करना शुरु कर दिया। बहुत हौसला बढ़ाया। समझाया। बार बार कहा चले जाओ। और अन्त में उन्हें बम्बई लौट जाने के लिए राज़ी भी कर लिया। चले आए बम्बई। धीरे धीरे छोटी फ़िल्मों में गीत लिखने का काम भी मिलता गया। यह सिलसिला लगभग पाँच साल तक चलता रहा। अब इन्दीवर जी ने अपनी धर्मपत्नी पार्वति से गुज़ारिश की कि वो बम्बई आ जाए और साथ रह कर घर-परिवार को आगे बढ़ाए। परन्तु पार्वति देवी ने हमेशा के लिए बम्बई में रहने से इनकार कर दिया। पत्नी के इस इनकार का इन्दीवर जी को बहुत दुख हुआ, झटका लगा। वो पत्नी के ना करने से इतने नाराज़ हो गए कि उन्हें छोड़ दिया। छोड़ कर बम्बई चले आए। संघर्ष रंग लायी और 1951 में लिखे उनके गीत ने धूम मचा दी। फ़िल्म थी ’मलहार’ और गीत के बोल थे "बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी क़सम, प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम"। इन्दीवर जी बुलन्दियों पर पहुँच गए, मगर उनकी पत्नी से उनकी नाराज़गी ख़त्म नहीं हुई। और नतीजा यह हुआ कि वापस लौट कर कभी अपनी पत्नी के पास नहीं गए। 


इन्दीवार जी की नाराज़गी उनकी लिखी एक कविता में फूट पड़ी जब उन्होंने लिखा "जिसके लिए मैंने सब कुछ छोड़ा, वो ही  छोड़ के चल 
दी दिल मेरा तोड़ के चल दी"। जहाँ एक तरफ़ उनकी नाराज़गी रही, वहीं दूसरी तरफ़ शायद उनके मन में एक अपराधबोध भी ज़रूर रहा होगा पत्नी के प्रति अपने कर्तव्यों को ना कर पाने का। तभी उन्होंने कई गीत ऐसे लिखे जो फ़िल्मों की नायिकाओं की ज़ुबान के ज़रिए दुनिया तक पहुँचे। और इन तमाम गीतों में एक वियोगी पत्नी का दर्द छुपा हुआ रहा। एक पत्नी जिसके पति ने उसे बिना किसी ठोस कारण के छोड़ दिया हो, उसके दिल पर क्या बीतती है, उसके मन में कैसे भाव उठते हैं, उन्हें सकार करने की कोशिशें इन्दीवर साहब ने समय समय पर की। 1966 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ के गीत में उन्होंने लिखा "एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है, मेरा दिल ना खिला सारी बगिया खिले भी तो क्या है"। "तक़दीर की मैं कोई भूल हूँ, डाली से बिछड़ा हुआ फूल हूँ, साथ तेरा नहीं संग दुनिया चले भी तो क्या है", इस गीत का एक एक लफ़्ज़ जैसे उनकी पत्नी की तरफ़ ही इशारा करते हैं। संयोग से इसी गीत का एक सुखद संस्करण (happy version) भी लिखा गया था जिसके बोल थे "एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली, खिला जो मेरा दिल तो सारी बगिया खिली"। लेकिन उपहास देखिए कि "एक तू ना मिला" गीत ही ज़्यादा लोकप्रिय हुआ और लोगों के दिलों को ज़्यादा छुआ! 1968 में फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ में इन्दीवर जी ने एक और ऐसा गीत लिखा "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी ज़रूरी कई काम है, प्यार सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए"। और उनके ज़िन्दगी के इस घटना से सबसे ज़्यादा मिलता-जुलता गीत रहा 1970 की फ़िल्म ’सफ़र’ का - "हम थे जिनके सहारे वो हुए ना हमारे, डूबी जब दिल की नैया सामने थे किनारे"। ख़ैर, जो भी हुआ बुरा हुआ। ना इन्दीवर जी का परिवार आगे बढ़ पाया, और वो लड़की भी सारी ज़िन्दगी अकेली रही। बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई!!!




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, August 25, 2016

उस्ताद शफ़क़त अली ख़ान की आवाज़ में राधा की "नदिया किनारे मोरा गाँव" की पुकार कुछ अलग ही असर करती है



कहकशाँ - 17
उस्ताद शफ़क़त अली ख़ान की आवाज़ में ठुमरी   
"नदिया किनारे मोरा गाँव रे..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है मशहूर पाक़िस्तानी शास्त्रीय गायक उस्ताद शफ़क़त अली ख़ान की आवाज़ में ठुमरी "नदिया किनारे मोरा गाँव..."।


ज हम जिस नज़्म को लेकर हाज़िर हुए हैं, वह एक ठुमरी है। फ़नकार हैं उस्ताद शफ़क़त अली ख़ान। शुरू-शुरू में मैंने जब इनका नाम सुना तो मैं इन्हें "शफ़क़त अमानत अली ख़ान" ही मान बैठा था, लेकिन इनकी आवाज़ सुनने पर मुझे अपनी ही सोच हजम नहीं हुई। इनकी आवाज़ का टेक्सचर "शफ़कत अमानत अली ख़ान" ("फ़्युज़न" वाले) से काफी अलग है। इनके कई गाने (ठुमरी, ख्याल..) सुनने और इनके बारे में और ढूँढने के बाद मुझे सच का पता चला। लीजिए आप भी जानिए कि ये कौन हैं (सौजन्य: एक्सडॉट २५)।

17 जून 1972 को पाकिस्तान के लाहौर में जन्मे शफ़क़त अली ख़ान पूर्वी पंजाब के शाम चौरासी घराने से ताल्लुक रखते हैं। इस घराने का इतिहास तब से है जब हिन्दुस्तान में मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था। इस घराने की स्थापना दो भाइयों चाँद ख़ान और सूरज ख़ान ने की थी। शफ़क़त अली ख़ान के पिताजी उस्ताद सलामत अली ख़ान और चाचाजी उस्ताद नज़ाकत अली ख़ान, दोनो ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं और ये दोनों शाम चौरासी घराने के दसवीं पीढी के शास्त्रीय गायक हैं।

शफ़क़त ने महज 7 साल की उम्र में अपनी हुनर का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। अपनी गायकी का पहला जौहर इन्होंने 1979 में लाहौर संगीत उत्सव में दिखलाया। अभी तक ये यूरोप के कई सारे देशों मसलन फ़्रांस, युनाईटेड किंगडम, इटली, जर्मनी, हॉलेंड, स्पेन एवं स्वीटज़रलैंड (जेनेवा उत्सव) के महत्वपूर्ण कन्सर्ट्स में अपना परफ़ॉरमेंस दे चुके हैं। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में तो ये नामी-गिरामी शास्त्रीय गायक के रूप में जाने जाते हैं ही, अमेरिका और कनाडा में भी इन्होंने अपनी गायकी से धाक जमा ली है। 1988 और 1996 में स्मिथसोनियन इन्स्टिच्युट में, 1988 में न्यूयार्क के मेट्रोपोलिटन म्युज़ियम के वर्ल्ड म्युज़िक इन्स्टिच्युट में एवं 1991 में मर्किन कन्सर्ट हॉल में दिए गए इनके प्रदर्शन को अभी भी याद किया जाता है।

शफ़क़त को अभी तक कई सारे पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। 1986 में इन्हें "सर्वश्रेष्ठ युवा शास्त्रीय गायक" के तौर पर लाहौर का अमिर खुसरो पुरस्कार मिला था। आगे चलकर 1987 में इन्हें पाकिस्तान के फ़ैज़लाबाद विश्वविद्यालय ने "गोल्ड मेडल" से सम्मानित किया। ये अभी तक दुनिया की कई सारी रिकार्ड कंपनियों के लिए गा चुके हैं, मसलन: निम्बस (युके), इ०एम०आई० (हिन्दुस्तान), एच०एम०वी० (युके), वाटरलिली एकॉसटिक्स (युएसए), वेस्ट्रॉन (हिन्दुस्तान), मेगासाउंड (हिन्दुस्तान), कीट्युन प्रोडक्शन (हॉलैंड), प्लस म्युज़िक (हिन्दुस्तान) एवं फोक़ हेरिटेज (पाकिस्तान)। गायकी के क्षेत्र में ये अभी भी निर्बाध रूप से कार्यरत हैं।

चलिए तो हम और आप सुनते हैं उस्ताद की आवाज़ में "नदिया किनारे मोरा गाँव":

संवरिया मोरे आ जा रे,
तोहू बिन भई मैं उदास रे.. हो..
आ जा रे.

नदिया किनारे मोरा गाँव..
आ जा रे संवरिया आ जा..
नदिया किनारे मोरा गाँव..

साजन प्रीत लगा के 
अब दूर देस मत जा
आ बस हमरे नगर अब
हम माँगे तू खा..

नदिया किनारे मोरा गाँव रे.
संवरिया रे

ऊँची अटरिया चंदन केंवरिया
राधा सखी रे मेरो नाँव
नदिया किनारे मोरा गाँव..

ना मैं माँगूं सोना, चाँदी
माँगूं तोसे प्रीत रे.. 
बलमा मैका छाड़ गए
यही जगत की रीत रे..


नदिया किनारे मोरा गाँव रे..






’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, August 24, 2016

"बाबुल गीत के लिए मैं जब भी मिलती हूँ, प्रसून को बधाई देती हूँ"- शुभा मुदगल : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (25)

दोस्तों, आज हम आ पहुंचे हैं अपने पसंदीदा कार्यक्रम "एक मुलाकात ज़रूरी है" के पच्चीसवें यानी सिल्वर जुबली एपिसोड पर, और ये हमारा सौभाग्य है कि इस ग्रेंड एपिसोड में हमारे साथ हैं हमारे देश की सबसे सुरीली, और मधुरतम आवाजों में से एक शुभा मुदगल जी. गायकी की दुनिया के सबसे रोशन सितारों में एक, शुभा जी के साथ इस ख़ास मुलाक़ात ने हमारे इस आयोजन को एक अलग ही बुलंदी दे दी है. मिलिए शुभा जी से और सुनिए उनके गाये गीतों की सुरीली कहानियां....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Tuesday, August 23, 2016

अजय नावरिया की कहानी इतिहास

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में अशोक भाटिया की लघुकथा "पापा जब बच्चे थे" का वाचन सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, अजय नावरिया की मननशील कथा इतिहास, अनुराग शर्मा के स्वर में। सामाजिक पुनर्गठन से गुज़रते एक वैविध्यपूर्ण समाज की उलझनों को सुलझाते हुए एक आधुनिक परिवार और उनके मित्रों के सम्वाद के माध्यम से अजय ने वर्तमान भारतीय परिदृश्य का बहुत सुंदर चित्रण किया है।

इस कहानी इतिहास का मूल गद्य द्वैभाषिक मासिक पत्रिका सेतु पर उपलब्ध है। कथा का कुल प्रसारण समय 25 मिनट 23 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



6 जून 1972 को दिल्ली में जन्मे अजय नावरिया वर्तमान हिंदी साहित्य का एक जाना माना नाम हैं। वे सुधा स्मृति साहित्य सम्मान तथा हिंदी अकादमी का साहित्यिक कृति सम्मान पा चुके हैं और आजकल दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं।

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‘‘क्‍या पापा आप सुबह सुबह ये क्‍या बखेड़ा फैलाये बैठे हैं।’’
 (अजय नावरिया की कथा "इतिहास" से एक अंश)


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#Sixteenth Story, Itihaas: Ajay Navaria /Hindi Audio Book/2016/16. Voice: Anurag Sharma

Saturday, August 20, 2016

"बता दो कोई कौन गली मोरे श्याम...", क्यों इस गीत की रेकॉर्डिंग् के बाद नौशाद ने इस्तीफ़ा दे दिया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 89
 

'बता दो कोई कौन गली मोरे श्याम...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 89-वीं कड़ी में आज जानिए 1941 की फ़िल्म ’कंचन’ के मशहूर भजन "बता दो कोई कौन गली मोरे श्याम..." के बारे में जिसे लीला चिटनिस ने गाया था। बोल डी. एन. मधोक के और संगीत नौशाद (व ज्ञान दत्त) का। 

क नारी की कृष्ण भक्ति को व्यक्त करने के लिए गाए जाने वाले गीतों में ठुमरी का प्रमुख स्थान माना जाता
Naushad
है। ठुमरियाँ प्रेम रस और भक्ति रस से सराबोर होती हैं और बोलों में अवधि और बृज भाषा का प्रयोग होता है। रागों की अगर बात करें तो पिलु, काफ़ी, खमाज, गारा, तिलक कामोद और भैरवी रागों का प्रयोग होता है ठुमरी में। राग खमाज (मिश्र खमाज) पर आधारित एक बहुत ही प्रसिद्ध पारम्परिक ठुमरी है "कौन गली गयो मोरे श्याम"। प्राचीन समय से इस ठुमरी को कलाकार गाते चले आए हैं। यह ठुमरी इतना लोकप्रिय है कि हमारी हिन्दी फ़िल्मों में भी इसे एकाधिक बार सुना गया है। 1947 की फ़िल्म ’मीराबाई’ में संगीतकार एस. के. पाल के निर्देशन में सितारा (कानपुर) ने इसे गाया था। रोशन के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने इसे गाया था 1959 की फ़िल्म ’मधु’ में। इसे ठुमरी के रूप में नहीं बल्कि एक फ़िल्मी गीत के रूप में गाया गया था। 1980 की फ़िल्म ’पायल की झंकार’ में सुलक्षणा पंडित ने इसे संगीतकार राज कमल के निर्देशन में गाया था। इसके बोलों को थोड़ा सा बदल कर इसे "आयो कहाँ से घनश्याम, रैना बिताई किस धाम" बना कर 1971 की फ़िल्म ’बुड्ढा मिल गया’ फ़िल्म में मन्ना डे और अर्चना की आवाज़ों में पेश किया संगीतकार राहुल देव बर्मन ने। इसके अगले ही साल, 1972 की मशहूर फ़िल्म ’पाक़ीज़ा’ में इसे पारम्परिक ठुमरी के रूप में ही प्रस्तुत की गई। संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद के इन्तकाल के बाद इस फ़िल्म के संगीत के लिए नौशाद को नियुक्त किया गया था, जिन्होंने इस ठुमरी को परवीन सुल्ताना से गवाया था।


नौशाद ने ’पाक़ीज़ा’ से पहले ही इस ठुमरी का इस्तमाल बहुत साल पहले अपने शुरुआती दिनों में किया था।
Gyan Dutt
बात 30 के दशक के आख़िर के किसी साल की होगी। गीतकार डी. एन. मधोक, जो संघर्षरत नौशाद के दोस्त हुआ करते थे, नौशाद की काबिलियत पर पूरा यकीन था। इसी यकीन के बलबूते वो नौशाद को चन्दुलाल शाह के पास ले गए थे। शाह ने उन्हें अपनी अगली फ़िल्म में काम दिलाने की कह कर आश्वस्त किया। इस आगामी फ़िल्म के लिए मधोक साहब की लिखी एक भजन की धुन उन्होंने बनाई। भजन के बोल थे "बता दो कोई कौन गली गये श्याम..."। गीत रेकॉर्ड हो गया, लेकिन दुर्भाग्यवश चन्दुलाल शाह की वह फ़िल्म बन नहीं सकी, और यह गीत भी जारी नहीं हुआ। आगे चल कर 1938 में जब नौशाद संगीतकार ज्ञान दत्त के सहायक के रूप में काम कर रहे थे पंजाबी फ़िल्म ’मिर्ज़ा साहिब’ में, तब एक दिन नौशाद ने ज्ञान दत्त को अपनी इस पहली धुन के बारे में बताया और सुनाया। और इस धुन का इस्तमाल ज्ञान दत्त ने अपनी 1941 की फ़िल्म ’कंचन’ में की जिसे लीला चिटनिस ने गाया और उन्हीं पर यह फ़िल्माया भी गया। इस तरह से भले नौशाद की पहली फ़िल्म के रूप में 1940 की फ़िल्म ’प्रेम नगर’ को माना जाता है, पर हक़ीक़त यह है कि किसी अज्ञात फ़िल्म के लिए नौशाद की बनाई धुन पर यह गीत 30 के दशक में रेकॉर्ड हुआ था। बताया जाता है कि ज्ञान दत्त नेकदिल अर आदर्शवादी इंसान थे, इसलिए उन्होंने नौशाद की इस रचना का श्रेय ख़ुद नहीं लिया, और इसके लिए नौशाद का नाम नामावलि में शामिल करने का सुझाव दिया। इस वजह से फ़िल्म ’कंचन’ के नामावलि या टाइटल्स में बतौर संगीतकार ज्ञान दत्त और नौशाद, दोनों नाम दिखाई देते हैं।


’कंचन’ के इस भजन के निर्माण का एक दूसरा पक्ष भी सामने आया जब नौशाद ने इस गीत से जुड़ी कहानी
विविध भारती के ’नौशादनामा’ सीरीज़ में बताई। नौशाद साहब के अनुसार हुआ यूं था कि ‘चित्रा प्रोडक्शन्स’ जब अपनी अगली फ़िल्म ‘कंचन’ प्लान कर रहे थे, तब डी. एन. मधोक ने संगीतकार के लिए नौशाद का नाम सुझाया। नौशाद की उम्र उस वक़्त बहुत कम थी, इसलिए साज़िन्दों ने उन्हें सहयोग नहीं दिया और उनके दिए हुए निर्देशों को नहीं मानते थे। यह बात जब नौशाद ने खेमचन्द प्रकाश को बताई तो खेमचन्द जी ने साज़िन्दों पर निगरानी रखी। यहाँ तक कि फ़िल्म के पहले गीत की रेकॉरडिंग के दिन खेमचन्द वहाँ उपस्थित भी हो गए थे ताकि नौशाद को किसी तरह की कोई परेशानी न हो। लीला चिटनिस का गाया वह गीत था “बता दो मुझे कौन गली मोरे श्याम”, जिसकी सब ने ख़ूब तारीफ़ें की। नौशाद उस दिन रेकॉर्डिंग पर एक इस्तीफ़ा पत्र अपनी जेब में लेकर गये और रेकॉर्डिंग समाप्त होने पर उसे मधोक साहब को सौंप दिया यह कहते हुए कि साज़िन्दे उनका कहना नहीं मानते और इस वजह से वो इस नौकरी को छोड़ रहे हैं। मधोक चकित हो गए और उनसे गुज़ारिश की कि वो इतना बड़ा क़दम न उठाएँ। उन्हें समझाया कि इस इंडस्ट्री में मौका पाना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए हाथ आए मौके को गंवाना नहीं चाहिए। जब मधोक ने कहा कि “तुम बहुत जज़्बाती हो”, तो उस पर नौशाद का जवाब था “यही जज़्बात  मुझे इस लाइन में लाया है साहब!” 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Wednesday, August 17, 2016

"मेरी अपनी बहन के साथ एक ख़ास तरह की बोन्डिंग है, हम मिलकर गीत रचते हैं"- अल्ताफ सय्यद : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (24)

दोस्तों, रक्षा बंधन के पावन अवसर पर आज हम आपसे रूबरू करवाने जा रहे हैं एक युवा संगीतकार और गायक को, जो अपनी बहन के साथ एक ख़ास रिश्ता शेयर करते हैं, ये जो गीत बनाते और गाते हैं उन्हें शब्दों में पिरोने का काम इनकी बहन करती है, जी हाँ दोस्तों मिलिए आज के एपिसोड में अल्ताफ सय्यद से, जिनके संगीत से सजी फिल्म "बाबूजी एक टिकट बम्बई" जल्द ही रिलीस होने वाली है, और भी कुछ फ़िल्में इनकी प्रदर्शन के लिए तैयार हो चुकी है. तो लीजिये पेश हैं अल्ताफ सय्यद के साथ ये बातचीत....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Saturday, August 13, 2016

"हारमोनियम टूट गया, और मेरा दिल भी", नौशाद के संघर्ष की कहानी का पहला भाग


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 15
 
नौशाद-1



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद पर। आज प्रस्तुत है नौशाद के संघर्ष की कहानी का पहला भाग।
  
याद है अब तक बचपन का वो ज़माना याद है, याद है अब तक अधूरा सा फ़साना याद है! मेरा जन्म 25 दिसम्बर 1919 को लखनऊ में हुआ। मेरे वालिद साहब वाहिद अली राजदरबार में मुंशी थे। हमारा परिवार एक सूफ़ी परिवार है जिसमें संगीत को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता। जब मैं 10 बरस का था, तब कैसे मुझे संगीत से लगाव हुआ मैं ख़ुद भी नहीं जानता। यह अल्लाह की देन है। यह ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ किसी से सीखी जाए या विरासत में मिले। अदायिगी अल्लाह की देन है, यह अल्लाह की अदा है। जब मैं 10 बरस का था, वहाँ एक उर्स हुआ करता था, दस दिनों का मेला लगता था बाराबंकी दरगाह शरीफ़ में। बहुत से फ़नकार अलग अलग जगहों से वहाँ आते थे अपने तम्बुओं के साथ। बहुत सी थिएटर कंपनियाँ भी आती थीं। मैं अपने मामा के साथ वहाँ जाता था। मुझे याद है उस मेले में एक बांसुरी बेचने वाला आदमी होता था जो बांसुरी बजाता रहता था। मुझे वो इतना पसन्द था कि उसकी तरफ़ खींचा चला जाता, और फ़ूटपाथ पर उसके साथ खड़े होकर बांसुरी की ताने सुनते हुए बाक़ी सबकुछ भूल जाता था। उस ज़माने में फ़िल्में सायलेण्ट हुआ करती थीं। मैं अक्सर जाता था देखने। थिएटर वाले लाइव ऑरकेस्ट्रा का इन्तज़ाम रखते थे जो सीन के मुताबिक कुछ बजाते, गाते। लखनऊ के रॉयल सिनेमा में मैं जाता था जहाँ के ऑरकेस्ट्रा में कई बड़े फ़नकार होते थे, जैसे कि उस्ताद लद्दन ख़ाँ, कल्याणजी तबले पर, बाबूजी क्लैरिनेट पर। मैं वहाँ सिर्फ़ इन फ़नकारों को सुनने के लिए जाता। 

मेरे उपर संगीत का ऐसा जुनून सवार हो गया था कि रात को सोते हुए भी मेरी उंगलियाँ चारपाई की पट्टियों पर फिरने लगती उन्हें हारमोनियम समझ कर। फिर मैं उस्ताद ग़ुरबत ख़ाँ के साज़ों की दुकान में काम करने लगा। रोज़ सुबह दुकान खोलता, ख़ाँ साहब के आने से पहले सारे साज़ों की साफ़-सफ़ाई करता, और उनकी ग़ैर-मौजूदगी में उन साज़ों पर रियाज़ भी करता। एक दिन किसी ने उन्हें बता दिया कि मैं बहुत अच्छा गाता हूँ और मुझमें बहुत हुनर है। उस्ताद जी बहुत ख़ुश हुए और मुझे अपनी दुकान से लेकर एक हारमोनियम उपहार दे दी। मैं बहुत ख़ुश हुआ और उसे लेकर घर आया। एक दिन जब मैं उस पर रियाज़ कर रहा था तो मेरे वालिद साहब अचानक वहाँ आए। उन्हें मेरा संगीत के प्रति लगाव कतई मंज़ूर नहीं था, उन्हें ग़ुस्सा आ गया और हारमोनियम को बाहर फेंक दिया। हारमोनियम टूट गया, और मेरा दिल भी। उस्ताद लद्दन ख़ाँ साहब हमारे साथ बच्चों की तरह सुलूग करते थे। हम उनके वहाँ रोज़ जाते। लखनऊ में एक अमेचर क्लब था जिसमें हर साल एक ड्रामा होता था, जिसमें ज़्यादातर वकील थे। एक साल मैंने भी उसमें हिस्सा लिया। मैं कोई 16-17 साल का था। कहीं से मेरे वालिद को पता चल गया कि मैं ड्रामे में हिस्सा ले रहा हूँ। एक रात जब मैं घर वापस आया, उन्होंने मुझसे कहा कि मेरे लाख मना करने के बाद भी तुमने संगीत और ड्रामा का साथ नहीं छोड़ा, इसलिए अभी इसी वक़्त तुम्हे यह फ़ैसला करना होगा कि तुम्हे संगीत चाहिए या घर? वह दिवाली की रात थी, हर तरफ़ ख़ुशियों का आलम था। मेरी अम्मी ने उन्हें शान्त करने की कोशिशें की, पर वो नहीं माने। मैंने कहा कि घर आपका आपको मुबारक़ हो! और मैं वहाँ से निकल आया, अम्मी रोती रह गईं। वहाँ से निकल कर मैं अपने दोस्त माजिद अली के घर गया, उसी ने मेरे लिए बम्बई का टिकट ख़रीद कर दिया और बम्बई के डॉ. अब्दुल हलीम नामी साहब के नाम एक चिट्ठी लिख दी, जो वहाँ पर प्रोफ़ेसर थे।

डॉ. नामी साहब मुझे शायर फ़ैज़ के पास ले गए। फ़ैज़ को संगीत से प्यार था। वो मुझे ए. आर. कारदार साहब से मिलवाए। मुश्ताक़ हुसैन उनके संगीतकार थे। मुझे देख कर कारदार साहब ने कहा कि यह तो बच्चा है। मुश्ताक़ साहब ने कहा कि पहले मैं कुछ सीख लूँ, फिर उनके पास आऊँ। लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी! ’रणजीत स्टुडिओज़’ के बाहर खड़ा रहता, गेटकीपर मुझ अन्दर जाने न दे। ज्ञान दत्त वहाँ के संगीतकार थे। फिर ’फ़िल्म सिटी’ थी तारदेओ में। वहाँ संगीतकार रफ़ीक़ ग़ज़नवी और फ़िल्मकार ज़ेड. ए. बुख़ारी का ग्रूप था। ग़ज़नवी साहब की एक झलक पाने के लिए मैं गेट के बाहर खड़ा रहता था। एक बार गफ़ुर साहब (जो बनारस से ताल्लुख़ रखते थे और सारंगी नवाज़ थे) मुझे देख कर कहा कि आप ऐसे बाहर क्यों खड़े रहते हैं? मैंने उन्हें अपने सपनों के बारे में बताया तो उन्होंने भी वादा किया कि मेरी एक दिन मुश्ताक़ साहब के पास सिफ़ारिश करेंगे। मैं नामी साहब के साथ सुबह का नाश्ता करके निकलता था और फिर रात को वापस पहुँच कर उन्हीं के साथ रात का खाना खाता था। सुबह नाश्ते के बाद मैं कोलाबा से दादर जाता, 6 पैसे लगते, और शाम को वापस। एक दिन किसी ने मेरी पॉकिट मार ली और उस दिन से मैं रोज़ कोलाबा से दादर पैदल आने-जाने लगा!

नौशाद साहब के संघर्ष की दासतान जारी रहेगी अगले अंक में भी।

सूत्र: नौशादनामा, विविध भारती




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Thursday, August 11, 2016

"पन्द्रह अगस्त की पुण्य तिथि फिर धूम-धाम से आई..." विवादास्पद बोल की वजह से किशोर कुमार का गाया यह गीत कभी जारी नहीं हो सका



कहकशाँ - 16
किशोर कुमार का गाया  दुर्लभ देशभक्ति गीत   
"पन्द्रह अगस्त की पुण्य तिथि फिर धूम-धाम से आई..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गायक किशोर कुमार का गाया एक देशभक्ति गीत जो स्वाधीनता दिवस के मौक़े के लिए बनाया गया था पर कभी जारी न हो सका। 


म तौर पर किशोर कुमार का नाम फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों के साथ ही जोड़ा जाता है, और क्यों ना हो, उनके गाए लगभग 99% हिन्दी गीत फ़िल्मों से ही तो हैं। इस वजह से बाक़ी का जो एक प्रतिशत बच गया, इसमें उनके ग़ैर फ़िल्मी गीत आते हैं जो अपने आप में दुर्लभ और अनूठे हैं। इनमें से कुछ के बारे में बताता हूँ। सम्भवत: उनका गाया पहला हिन्दी ग़ैर फ़िल्मी गीत 1946 में रेकॉर्ड हुआ था। एक नहीं बल्कि दो गीत - पहला "भूलने वाले..." और दूसरा "जिस दिल ने मोहब्बत की..."। एक भजन "हरि नाम का प्याला..." भी एक अद्‍भुत रचना है। प्राइवेट ऐल्बम ’सपनों की मंज़िल’ में दो गीत किशोर दा के थे - "ले चल मुझे..." और "एक लड़की है अजनबी..."। मदन मोहन के संगीत में एक ग़ैर फ़िल्मी गीत "आज मुझे जल जाने दो..." हाल ही में ’तेरे बग़ैर’ ऐल्बम में रिलीज़ किया गया था। "हरि नाम का प्याला..." को छोड़ कर बाक़ी सभी गीत लगभग रोमान्टिक जौनर के ही थे। पर आज हम आपको किशोर दा का गाया जो गीत सुनवाने के लिए लाये हैं, वह एक देशभक्ति गीत रचना है। 15 अगस्त नज़दीक है, और इस गीत में भी 15 अगस्त का ज़िक्र है, इस वजह से आज के इस महफ़िल में इस गीत से बेहतर शायद कोई और गीत नहीं। संगीतकार बाल सिंह द्वारा स्वरबद्ध और किशोर कुमार व आर. पी. शर्मा द्वारा गाया गया यह गीत है "पन्द्रह अगस्त की पुण्य तिथि..."। गीतकार हैं केशव त्रिवेदी। इस गीत के दो भाग हैं। 78 RPM के रेकॉर्ड के दूसरी तरफ़ इस गीत का दूसरा हिस्सा है। रेकॉर्ड संख्या है GE 8194। आर. पी. शर्मा की बात करें तो उन्होंने 1947 में ’नमक’ और ’रेणुका’, 1948 में ’लखपति’ और ’रामबाण’, तथा 1952 में ’शिवशक्ति’ में गीत गाया था। बाल सिंह और केशव त्रिवेदी का नाम फ़िल्म-संगीत में कभी सुनाई नहीं दिया। हाँ, केवल ’केशव’ के नाम से एक गीतकार ज़रूर हुए हैं जिन्होंने 1954 की फ़िल्म ’परिचय’ और 1960 की फ़िल्म ’माया मछिन्द्र’ में गीत लिखे थे।


इससे पहले कि आप इस गीत के दोनों हिस्सों को बारी-बारी से सुनें, आइए इस गीत से संबंधित थोड़ी जानकारी आपको देते हैं। यह गीत 1950 में रचा गया था, सम्भवत: स्वाधीनता दिवस के अवसर पर इसे जारी होना था। पर गीत के साथ एक हादसा हो गया जिस वजह से इस गीत को कभी मुक्ति नहीं मिली। एक गड़बड़ हो गई। गीत में "पुण्य तिथि" शब्द की वजह से सब गड़बड़ हो गया। "पुण्यतिथि" से गीतकार का अर्थ था पुण्य तिथि, यानी कि पवित्र दिन, अर्थात् पन्द्रह अगस्त का पवित्र दिन। लेकिन "पुण्यतिथि" को सेन्सर बोर्ड ने दोहरे अर्थ वाला शब्द करार देते हुए इस गीत पर पाबन्दी लगा दी क्योंकि इससे विवाद खड़ा हो सकता है। पुण्यतिथि को आम तौर पर मृत्यु तिथि के रूप में ही समझा जाता है। तो "पन्द्रह अगस्त की पुण्यतिथि" जुमला काफ़ी वितर्कित हो सकता है। इसलिए इस गीत को मान्यता नहीं मिली और रेकॉर्ड हो चुका यह गीत बन्द बक्से में चला गया। यह वाक़ई अफ़सोस की बात है कि बस एक शब्द की वजह से इतना सुन्दर देशभक्ति गीत दब कर रह गया। लीजिए आप ख़ुद ही इसके बोलों को पढ़ कर तय करें...


पन्द्रह अगस्त की पुण्य तिथि फिर धूम धाम से आई,
भारत के कोने कोने में खुशियाली है छायी।

सन सैन्ताल्लीस में भारत को अंग्रेज़ों ने जोड़ दिया
गोली बरसा के हार गए सब ??? से मुंह मोड़ लिया
बापू की अटल अहिंसा ने अपनी रंगत दिखलाई
फिर धूम धाम से आई...

उस दिन सारे देश की शोभा अपने ढंग की न्यारी थी
महलों से लेकर कुटियों तक दीपों की उजियारी थी
मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों ने फिर दीपावलि मनाई
फिर धूम धाम से आई...

नेताजी ने जिसके ख़ातिर था अपना क़दम बढ़ाया
ला क़िले पर वही तिरंगा क़ौमी झंडा लहराया
इसी तिरंगे झंडे ने भारत की शान बढ़ाई
फिर धूम धाम से आई...

तारों के दीप जला कर के ना सती प्रथा भी झूम रही
भारत माता अपने लालों के मुखड़ों को चूम रही
देश प्रेम की मधुर रागिनी देवलोक में छायी
फिर धूम धाम से आई...

PART-1



PART-2






’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज, आलेख, प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 

Wednesday, August 10, 2016

11 बार जीतने के बाद 'ज़ी सारेगामापा' छोड़ने का निर्णय मेरा व्यक्तिगत था - अभिजित घोषाल :एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (23)

जी सा रे गा मा पा में इतिहास रचने के बाद शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी के साथ फ़िल्मी पार्श्वगायन की शुरुआत करने वाले गायक अभिजित घोषाल,अपने खुद के संगीत समूह के साथ मिलकर लगातार कुछ अर्थपूर्ण सार्थक गीतों को रचने में सक्रिय हैं, अभी हाल ही में उन्होंने "मेरी प्यारी गुडिया" गीत के साथ "बेटी बचाओ बेटी पढाओ" अभियान का समर्थन करने की सुन्दर कोशिश की है, मिलिए आज के एपिसोड में इस नायाब गायक से, और जानिए उनके संगीत सफ़र से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से...


एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Saturday, August 6, 2016

"घुंघट की आढ़ से दिलबर का...", क्यों दिल के क़रीब है यह गीत अलका याज्ञनिक के


एक गीत सौ कहानियाँ - 88
 

'घुंघट की आढ़ से दिलबर का...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 88-वीं कड़ी में आज जानिए 1993 की फ़िल्म ’हम हैं राही प्यार के’ के मशहूर गीत "घुंघट की आढ़ से दिलबर का..." के बारे में जिसे अलका याज्ञ्निक और कुमार सानू ने गाया था। बोल समीर के और संगीत नदीम-श्रवण का। 

1988 में ’क़यामत से क़यामत तक’ में आमिर ख़ान और जुही चावला की जोड़ी बनी थी जो बेहद कामयाब रही
और लोगों ने इस जोड़ी को हाथोंहाथ ग्रहण किया। इसका श्रेय जाता है आमिर के पिता ताहिर हुसैन को। लेकिन इसके बाद जब 1989 में ’लव लव लव’, 1990 में ’तुम मेरे हो’ और 1992 में ’दौलत की जंग’ जैसी फ़िल्में नाकामयाब रहीं, तब लोगों के मन में आमिर-जुही की जोड़ी के चलने पर संदेह जागृत हुआ। पर ताहिर हुसैन ने ही लोगों की धारणा को ग़लत साबित करते हुए आमिर-जुही को लेकर एक बार फिर से फ़िल्म बनाने की सोची। ’हम हैं राही प्यार के’ में आमिर-जुही की जोड़ी फिर एक बार चल पड़ी और लोगों का रवैया बदल गया। आज इसी फ़िल्म के एक गीत के बारे में हम चर्चा करने जा रहे हैं। अगर यह कहा जाए कि फ़िल्म ’आशिक़ी’ से मेलडी-प्रधान गीतों का दौर वापस आया था, तो शायद ग़लत नहीं होगा। इसके लिए श्रेय जाता है टी-सीरीज़ के गुल्शन कुमार, गायिका अनुराधा पौडवाल और गीतकार-संगीतकार समीर व नदीम-श्रवण की जोड़ी को। 70 के दशक के मध्य भाग से जो मार-धाड़ वाले ऐक्शन फ़िल्मों का दौर चल पड़ा था, फ़िल्म ’आशिक़ी’ ने उस पर कुछ हद तक लगाम लगाया। 90 के दशक में नदीम-श्रवण ने एक के बाद एक म्युज़िकल ब्लॉकबस्टर्स देते चले गए। ’आशिक़ी’, ’जान की क़सम’, ’दिल है कि मानता नहीं’, ’साजन’, ’साथी’, ’फूल और काँटें’, ’सड़क’, ’दिल का क्या क़सूर’, ’सपने साजन के’, ’जान तेरे नाम’, ’दीवाना’, ’बेख़ुदी’, 'दामिनी’, ’हम हैं राही प्यार के’, ’रंग’, ’दिलवाले’, ’साजन का घर’, ’बरसात’, ’राजा’, ’राजा हिन्दुस्तानी’, ’जुदाई’, ’परदेस’, ’सिर्फ़ तुम’, ’धड़कन’ जैसी फ़िल्मों के गीतों ने उस दौर में ख़ूब धूम मचाई थी। इन्हीं फ़िल्मों में से एक ’हम हैं राही प्यार के’ के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत के बारे में आज बताने जा रहे हैं।

विविध भारती के ’विशेष जयमाला’ कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को संबोधित करते हुए नदीम-श्रवण के श्रवण राठौड़ ने इस गीत के बनने की कहानी का कुछ इन शब्दों में उल्लेख किया था - "फ़ौजी भाइयों और फ़ौजी
Nadeem-Shravan
बहनों, एक और क़िस्सा मुझे याद आ रहा है। 1980 में जब हम भारी संघर्ष कर रहे थे, काफ़ी सारे निर्माताओं को अपनी धुनें सुनाया करते थे। उनमें से एक थे ताहिर हुसैन साहब, जो आमिर ख़ान के पिताजी हैं। हम उनके पास गए और कहा कि ’सर, प्लीज़ हमें चान्स दे दीजिए’। हमने उनको बहुत सारे गीतों की धुनें सुनाई। पहला गीत जो हमने सुनाया वह कौन सा था यह मैं आपको बाद में बताऊँगा; तो हम लोग दो तीन घंटों तक उनको धुनें सुनाते गए। दूसरे दिन जब हम उनके पास गए तो उन्होंने कहा कि म्युज़िक बहुत अच्छा है लेकिन मैचुरिटी की कमी है। हम अपसेट हो गए कि ताहिर साहब ने यह कह दिया, हमने इतनी मेहनत की थी इन धुनों पर, सब बेकार हो गया। ख़ैर, 12 साल बाद जब हमारी ’आशिक़ी’, ’दिल है कि मानता नहीं’ और ’सड़क’ हिट हो गई तो ताहिर साहब ने हमें बुलाया और कहा कि एक फ़िल्म साथ में करते हैं। हमने कहा ’ठीक है’। तो उन्होंने कहा कि एक हिट गाना चाहिए। तो यह वही गाना था जो हमने 12 साल पहले सबसे पहले उनको सुनाया था। अब मैं आपको बताऊँगा कि यह गाना कौन सा है, और यह गाना है "घुंघट की आढ़ से दिलबर का"। जिस गाने को सुन कर उन्होंने कहा था कि मैचुरिटी नहीं है, उसी गाने को 12 साल बाद उन्होंने अपनी फ़िल्म में लिया और बहुत हिट हुआ। इस गीत के लिए अलका याज्ञ्निक को फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला और ताहिर साहब बहुत ख़ुश हुए। तो इस वाक़या से हमें यह सबक मिला कि हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिए, एक न एक दिन जीत ज़रूर मिलेगी!"



"घुंघट की आढ़ से दिलबर का..." केवल नदीम-श्रवण के लिए ही यादगार गीत नहीं है, गायिका अलका याज्ञ्निक के दिल में भी इस गीत के लिए ख़ास जगह है। अलका याज्ञ्निक ने भी ’विशेष जयमाला’ कार्यक्रम में इसी गीत को बजाते हुए कहा था कि यह गीत क्यों उनके दिल के करीब है। "अगला गाना फ़िल्म ’हम हैं राही प्यार के’ से है। यह गाना बहुत मशहूर हुआ था या यूं कहिए कि आप लोगों ने इसे बहुत पसन्द किया था। इस गाने के लिए मुझे अपना पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार ’कुछ कुछ होता है’ के लिए मिला था। यह गीत मेरे दिल के बहुत पास है क्योंकि यह गाना मेरे पापा को बहुत पसन्द था। जब यह गाना बजना शुरू हुआ था, मेरे पापा ने कहा था कि देखना इस गाने के लिए तुम्हे ज़रूर अवार्ड मिलेगा। फ़रवरी 1994 में उनकी डेथ हो गई और उसी साल इस गाने के लिए अवार्ड की घोषणा हुई। मुझे बहुत तक़लीफ़ हुई कि वो चले गए इस दिन को देखे बग़ैर, और ख़ुशी इस बात की हुई कि उनका कहना सही निकला। इस वजह से इस गाने का महत्व मेरे लिए बहुत है।"



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खोज: चन्द्रकान्त दीक्षित  
आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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