Saturday, August 22, 2015

BAATON BAATON MEIN-11: INTERVIEW OF LYRICIST PT. NARENDRA SHARMA'S DAUGHTER SMT. LAVANYA SHAH

बातों बातों में - 11

गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुत्री श्रीमती लावण्या शाह से सुजॉय चटर्जी की बातचीत


"दर भी था, थी दीवारें भी, माँ, तुमसे घर घर कहलाया..."  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज अगस्त 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार, भाषाविद, दार्शनिक और आयुर्वेद के ज्ञाता पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।    




लावण्या जी, आपका बहुत बहुत स्वागत है, नमस्कार!

नमस्ते, सुजॉय भाई, आपका आभार जो आपने आज मुझे याद किया।

यह हमारा सौभाग्य है आपको पाना, और आप से आपके पापाजी, यानी पंडित जी के बारे में जानना। यूं तो आप ने उनके बारे में अपने ब्लॉगों में या साक्षात्कारों में कई बार बताया भी है, आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे पंडित जी की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुओं के बारे में भी जानना चाहेंगे। सबसे पहले यह बताइए पंडित जी के पारिवारिक पार्श्व के बारे में। ऐसे महान शख़्स के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी कौन थे, उनके क्या व्यवसाय थे? 

पूज्य पापा जी का जन्म उत्तर प्रदेश प्रांत के ज़िला बुलंदशहर, खुर्जा, ग्राम जहाँगीरपुर में हुआ, जो अब ग्रेटर नॉयडा कहलाता है। तारीख थी फरवरी की 28, जी हाँ, लीप-यीअर में 29 दिन होते हैं, उस के ठीक 1 दिन पहले सन 1913 में। उनका संयुक्त परिवार था, भारद्वाज वंश का था, व्यवसाय से पटवारी कहलाते थे। घर को स्वामी पाडा कहा जाता था जो तीन मंजिल की हवेलीनुमा थी। जहाँ मेरे दादाजी स्व. पूर्णलाल शर्मा तथा उनकी धर्मपत्नी मेरी दादी जी स्व. गंगा देवी जी अपने चचेरे भाई व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आबाद थे। उनके खेत थे, अब भी हैं और फलों की बाडी भी थी। खुशहाल, समृद्ध परिवार था जहाँ एक प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ और दूर के एक चाचाजी जिन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियाँ पढ़ने का शौक था, उन्होंने बालक का नामकरण किया और शिशु को "नरेंद्र" नाम दिया!

वाह!

किसे खबर थी कि "नरेंद्र शर्मा" का नाम एक दिन भारतवर्ष में एक सुप्रसिद्ध गीतकार और कवि के रूप में पहचाना जाएगा? पर ऐसे ही एक परिवार में, बालक नरेंद्र पलकर बड़े हुए थे।

पंडित जी के परिवार का माहौल किस तरह का था जब वो छोटे थे? क्या घर पर काव्य, साहित्य, गीत-संगीत आदि का माहौल था? किस तरह से यह बीज पंडित जी के अंदर अंकुरित हुई? 

पापा से ही सुना है और उन्होंने अपनी पुस्तक "मुठ्ठी बंद रहस्य" में अपने पिताजी श्री पूर्ण लाल शर्मा जी को समर्पित करते हुए लिखा है कि 'पिता की तबीयत अस्वस्थ थी और बालक पिता की असहाय स्थिति को देख रहा था ..' चार साल की उमर में बालक नरेंद्र के सर से पिता का साया हट गया था और बड़े ताऊजी श्री गणपत भाई साहब ने, नरेंद्र को अपने साथ कर लिया और बहुत लाड प्यार से शिक्षा दी और घर की स्त्रियों के पास अधिक न रहने देते हुए उसे आरंभिक शिक्षा दी थी। एक कविता है पापा जी की ..'हर लिया क्यूं शैशव नादान'।

हर लिया क्यों शैशव नादान?
शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन,
दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन,
तृष्णा का संसार नहीं था,
उर रहस्य का भार नहीं था,
स्नेह-सखा था, नन्दन कानन
था क्रीडास्थल मेरा पावन;
भोलापन भूषण आनन का
इन्दु वही जीवन-प्रांगण का
हाय! कहाँ वह लीन हो गया
विधु मेरा छविमान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?

निर्झर-सा स्वछन्द विहग-सा,
शुभ्र शरद के स्वच्छ दिवस-सा,
अधरों पर स्वप्निल-सस्मिति-सा,
हिम पर क्रीड़ित स्वर्ण-रश्मि-सा,
मेरा शैशव! मधुर बालपन!
बादल-सा मृदु-मन कोमल-तन।
हा अप्राप्य-धन! स्वर्ग-स्वर्ण-कन
कौन ले गया नल-पट खग बन?
कहाँ अलक्षित लोक बसाया?
किस नभ में अनजान!
हर लिया क्यों शैशव नादान?

जग में जब अस्तित्व नहीं था,
जीवन जब था मलयानिल-सा
अति लघु पुष्प, वायु पर पर-सा,
स्वार्थ-रहित के अरमानों-सा,
चिन्ता-द्वेष-रहित-वन-पशु-सा
ज्ञान-शून्य क्रीड़ामय मन था,
स्वर्गिक, स्वप्निल जीवन-क्रीड़ा
छीन ले गया दे उर-पीड़ा
कपटी कनक-काम-मृग बन कर
किस मग हा! अनजान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?


बहुत सुंदर, बहुत सुंदर!

भारत के संयुक्त परिवारों में अकसर हमारे पौराणिक ग्रंथों का पाठ जैसे रामायण होता ही है और सुसंस्कार और परिवार की सुद्रढ़ परम्पराएं भारतीयता के साथ सच्ची मानवता के आदर्श भी बालक मन में उत्पन्न करते हुए, स्थायी बन जाते हैं, वैसा ही बालक नरेंद्र के पितृहीन परिवार के लाड दुलार भरे वातावरण में हुआ था।

पंडित जी की शिक्षा-दीक्षा कैसे शुरु हुई?

शिक्षा घर पर ही आरम्भ हुई, फिर नरेंद्र को सीधे बड़ी कक्षा में दाखिला मिल गया और स्कूल के शिक्षक नरेंद्र की प्रतिभा व कुशाग्र बुद्धि से चकित तो थे पर बड़े प्रसन्न भी थे।

आगे की शिक्षा उन्होंने कहाँ से प्राप्त की?

प्रारम्भिक शिक्षा खुर्जा में हुई। इलाहाबाद विश्वविध्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में MA करने के बाद, कुछ वर्ष आनन्द भवन में 'अखिल भारतीय कॉंग्रेज़ कमिटी के हिंदी विभाग से जुड़े और नज़रबंद किये गए। देवली जेल में भूख हड़ताल से (14 दिनों तक) जब बीमार हालत में रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गंगादेवी से मिलने गये। वहीं से भगवती बाबू ("चित्रलेखा" के प्रसिद्ध लेखक) के आग्रह से बम्बई आ बसे। वहीं गुजराती कन्या सुशीला से वरिष्ठ सुकवि श्री पंत जी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुए। बारात में हिंदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ हाजिर थीं - दक्षिण भारत से स्वर-कोकिला सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दिलीप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाबू, सपत्नीक अनिल बिश्वासजी, गुरुदत्त जी, चेतनानन्दजी, देवानन्दजी इत्यादि .. और जैसी बारात थी उसी प्रकार 19 वे रास्ते पर स्थित उनका आवास डॉ. जयरामनजी के शब्दों में कहूँ तो "हिंदी साहित्य का तीर्थ-स्थान" बम्बई जैसे महानगर में एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया।

लावण्या जी, हम बात कर रहे हैं पंडित जी की शिक्षा के बारे में। कवि, साहित्यिक, गीतकार, दार्शनिक - ये सब तो फिर भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन आयुर्वेद तो बिल्कुल ही अलग शास्त्र है, जो चिकित्सा-विज्ञान में आता है। यह बताइए कि पंडित जी ने आयुर्वेद की शिक्षा कब और किस तरह से अर्जित की? क्या यह उनकी रुचि थी, क्या उन्होंने इसे व्यवसाय के तौर पर भी अपनाया, इस बारे में ज़रा विस्तार से बतायें। 

पूज्य पापा जी ने आयुर्वेद का ज्ञान किन गुरुओं की कृपा से पाया उनके बारे में बतलाती हूँ पर ये स्पष्ट कर दूं कि व्यवसाय की तरह कभी इस ज्ञान का उपयोग पापा जी ने नहीं किया था। हाँ, कई जान-पहचान के लोग आते तो उन्हें उपाय सुझाते और पापा ज्योतिष शास्त्र के भी प्रखर ज्ञाता थे, तो जन्म पत्रिका देखते हुए, कोई सुझाव उनके मन में आता तो बतला देते थे। हमारे बच्चों के जन्म के बाद भी उनके सुझाव से 'कुमार मंगल रस' शहद के साथ मिलाकर हमने पापा के सुझाव पर दी थी। आयुर्वेद के मर्मज्ञ और प्रखर ज्ञाता स्व. श्री मोटा भाई, जो दत्तात्रेय भगवान के परम उपासक थे, स्वयं बाल ब्रह्मचारी थे और मोटाभाई ने, पावन नदी नर्मदा के तट पर योग साधना की थी, वे पापा जी के गुरु-तुल्य थे, पापा जी उनसे मिलने अकसर सप्ताह में एक या दो शाम को जाया करते थे और उन्हीं से आयुर्वेद की कई गूढ़ चिकित्सा पद्धति के बारे में पापा जी ने सीखा था। मोटा भाई से कुछ वर्ष पूर्व, स्व. ढूंडीराज न्यायरत्न महर्षि विनोद जी से भी पापा का गहन संपर्क रहा था।

लावण्या जी, हमने सुना है कि पंडित जी 30 वर्ष की आयु में बम्बई आये थे भगवती चरण वर्मा के साथ। यह बताइए कि इससे पहले उनकी क्या क्या उपलब्धियाँ थी बतौर कवि और साहित्यिक। बम्बई आकर फ़िल्म जगत से जुड़ना क्यों ज़रूरी हो गया? 

पापा जी ने इंटरमीडीयेट की पढ़ाई खुरजा से की और आगे पढ़ने वे संस्कृति के गढ़, इलाहाबाद में आये और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जोइन की। 19 वर्ष की आयु में, सन 1934 में प्रथम काव्य-संग्रह, "शूल - फूल" प्रकाशित हुआ। अपने बलबूते पर, एम्.ए. अंग्रेज़ी विषय लेकर, पास किया। 'अभ्युदय दैनिक समाचार पत्र' के सह सम्पादक पद पर काम किया। सन 1936 में "कर्ण - फूल" छपी, पर 1937 में "प्रभात - फेरी" काव्य संग्रह ने नरेंद्र शर्मा को कवि के रूप में शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा दिया। काव्य-सम्मलेन में उसी पुस्तक की ये कविता जब पहली बार नरेंद्र शर्मा ने पढी तब, सात बार, 'वंस मोर' का शोर हुआ ...गीत है - "आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगें, आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगें". और एक सुमधुर गीतकार के रूप में नरेंद्र शर्मा की पहचान बन गयी। इसी इलाहाबाद में, आनंद भवन मेँ, 'अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिंदी विभाग से जुडे, हिंदी सचिव भी रहे जिसके लिये पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने पापा जी को अखिल भारतीय कोंग्रेस कमिटी के दस्तावेजों को, जल्दी से अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद कर, भारत के कोने कोने तक पहुंचाने के काम में, उन्हे लगाया था। अब इस देशभक्ति का नतीजा ये हुआ के उस वक्त की अंग्रेज़ सरकार ने, पापा जी को, दो साल देवली जेल और राजस्थान जेल में कैद किया जहाँ नरेंद्र शर्मा ने 14 दिन का अनशन या भूख हड़ताल भी की थी और गोरे जेलरों ने जबरदस्ती सूप नलियों में भर के पिलाया और उन्हे जिंदा रखा। जब रिहा हुए तब गाँव गये, सारा गाँव वंदनवार सजाये, देशभक्त के स्वागत में झूम उठा! दादी जी स्व. गंगा देवी जी को एक सप्ताह बाद पता चला कि उनका बेटा, जेल में भूखा है तो उन्होंने भी एक हफ्ते भोजन नहीं किया। ऐसे कई नन्हे सिपाही महात्मा गांधी की आज़ादी की लड़ाई में, बलिदान देते रहे तब कहीं सन 1947 में भारत को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी। इस रोमांचक घटना का जिक्र करते हुए जनाब सादिक अली जी का लिखा अंग्रेज़ी आलेख देखें ..वे कहते हैं -- " Poet, late Pandit Narendra Sharma, was arrested without trial under the British Viceroy's Orders, for more than two years. His appointment to AICC was made by Pandit Jawaharlal Nehru. Pandit Narendra Sharma's photo along with then AICC members, is still there in Swaraj Bhavan, Allahabad."

बहुत ख़ूब! अच्छा, बम्बई कैसे आना हुआ उनका?
with Bhagwati Charan Verma

आपका कहना सही है कि भगवतीचरण वर्मा, 'चित्रलेखा ' के मशहूर उपन्यासकार नरेन्द्र शर्मा को अपने संग बम्बई ले आये थे। कारण था, फिल्म निर्माण संस्था "बॉम्बे टॉकीज" नायिका देविका रानी के पास आ गयी थी जब उनके पति हिमांशु राय का देहाँत हो गया और देविका रानी को, अच्छे गीतकार, पटकथा लेख़क, कलाकार सभी की जरूरत हुई। भगवती बाबू को, गीतकार नरेंद्र शर्मा को बोम्बे टाकीज़ के काम के लिये ले आने का आदेश हुआ था और नरेंद्र शर्मा के जीवन की कहानी का अगला चैप्टर यहीं से आगे बढा।

पंडित जी का लिखा पहला गीत पारुल घोष की आवाज़ में 1943 की फ़िल्म 'हमारी बात' का, "मैं उनकी बन जाऊँ रे" बहुत लोकप्रिय हुआ था। क्योंकि यह उनका पहला पहला गीत था, उन्होंने आपको इसके बारे में ज़रूर बताया होगा। तो हम भी आपसे जानना चाहेंगे उनके फ़िल्म जगत में पदार्पण के बारे में, इस पहली फ़िल्म के बारे में, इस पहले मशहूर गीत के बारे में।

पापा ने बतलाया था कि फिल्म 'हमारी बात' के लिए लिखा सबसे पहला गीत 'ऐ बादे सबा, इठलाती न आ...' उन्होंने इस ख्याल से इलाहाबाद से बंबई आ रही ट्रेन में ही लिख रखा था कि हिन्दी फिल्मों में उर्दू अलफ़ाज़ लिए गीत जरूरी है, जैसा उस वक्त का ट्रेंड था, तो वही गीत पहले चित्रपट के लिए लिखा गया और 'हमारी बात' में अनिल बिस्वास जी ने स्वरबद्ध किया और गायिका पारुल घोष ने गाया। पारुल घोष, मशहूर बांसुरी वादक श्री पन्नालाल घोष की पत्नी थीं और भारतीय चित्रपट संगीत के भीष्म पितामह श्री अनिल बिस्वास की बहन। जब यह गीत बना तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था पर आज इस गीत को सुनती हूँ तब भी बड़ा मीठा, बेहद सुरीला लगता है। एक वाकया याद आ रहा है, हमारे पडौसी फिल्म कलाकार जयराज जी के घर श्री राज कपूर आये थे और बार बार इसी गीत की एक पंक्ति गा रहे थे, 'दूर खड़ी शरमाऊँ, मैं मन ही मन अंग लगाऊँ, दूर खडी शरमाऊँ, मैं, उनकी बन जाऊं रे, मैं उनकी बन जाऊं' और इसी से मिलते जुलते शब्द यश राज की फिल्म 'दिल तो पागल है' में भी सुने 'दूर खडी शरमाये, आय हाय', तो प्रेम की बातें तब भी और अब भी ऐसे ही दीवानगी भरी होती रहीं हैं और होतीं रहेंगीं ..जब तक 'प्रेम', रहेगा ये गीत भी अमर रहेगा।

बहुत सुंदर! और पंडित जी ने भी लिखा था कि "मेरे पास मेरा प्रेम है"। अच्छा लावण्या जी, यह बताइए कि 'बॉम्बे टॉकीज़' के साथ वो कैसे जुड़े? क्या उनकी कोई जान-पहचान थी? किस तरह से उन्होंने अपना क़दम जमाया इस कंपनी में? 

पापा के एक और गहरे मित्र रहे मशहूर कथाकार श्री अमृतलाल नागर : उनका लिखा पढ़ें| नागर जी चाचा जी लिखते हैं ...
"एक साल बाद श्रद्धेय भगवती बाबू भी "बोम्बे टाकीज़" के आमंत्रण पर बम्बई पहुँच गये, तब हमारे दिन बहुत अच्छे कटने लगे। प्राय: हर शाम दोनोँ कालिज स्ट्रीट स्थित, स्व. डॉ. मोतीचंद्र जी के यहाँ बैठेकेँ जमाने लगे। तब तक भगवती बाबू का परिवार बम्बई नहीँ आया था और वह, कालिज स्ट्रीट के पास ही माटुंगा के एक मकान की तीसरी मंजिल मेँ रहते थे। एक दिन डॉक्टर साहब के घर से लौटते हुए उन्होँने मुझे बतलाया कि वह एक दो दिन के बाद इलाहाबाद जाने वाले हैँ। "अरे गुरु, यह इलाहाबाद का प्रोग्राम एकाएक कैसे बन गया ?" "अरे भाई, मिसेज रोय (देविका रानी रोय) ने मुझसे कहा है कि, मैँ किसी अच्छे गीतकार को यहाँ ले आऊँ! नरेन्द्र जेल से छूट आया है और मैँ समझता हूँ कि वही ऐसा अकेला गीतकार है जो प्रदीप से शायद टक्कर ले सके!' सुनकर मैँ बहुत प्रसन्न हुआ प्रदीप जी तब तक, बोम्बे टोकीज़ से ही सम्बद्ध थे "कंगन", "बंधन" और "नया संसार" फिल्मोँ से उन्होँने बंबई की फिल्मी दुनिया मेँ चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बात से कुछ पहले ही वह बोम्बे टोकीज़ मेँ काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे। इस गुट ने "फिल्मिस्तान" नामक एक नई संस्था स्थापित कर ली थी - कंपनी के अन्य लोगोँ के हट जाने से देविका रानी को अधिक चिँता नहीँ थी, किंतु, ख्यातनामा अशोक कुमार और प्रदीप जी के हट जाने से वे बहुत चिँतित थीँ - कंपनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ ख़ान नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी! युसूफ का नया नाम, "दिलीप कुमार" रखा गया, (यह नाम भी पापा ने ही सुझाया था - एक और नाम 'जहाँगीर' भी चुना था पर पापा जी ने कहा था कि युसूफ, दिलीप कुमार नाम तुम्हे बहुत फलेगा - (ज्योतिष के हिसाब से) और आज सारी दुनिया इस नाम को पहचानती है। किंतु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीँ। इसलिये उन्होँने भगवती बाबू से यह आग्रह किया था एक नये शुद्ध हिंदी जानने वाले गीतकार को खोज लाने का।

किसी भी सफल इंसान के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, ऐसी पुरानी कहावत है। आपके विचार में आपकी माताजी का कितना योगदान है पंडित जी की सफलता के पीछे? अपनी माताजी की शख़्सीयत के बारे में विस्तार से बतायें।
with his better half

मेरी माँ, श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा, कलाकार थीं। चार साल हलदनकर इंस्टिट्यूट में चित्रकला सीख कर बेहतरीन आयल कलर और वाटर कलर के चित्र बनाया करती थीं। हमारे घर की दीवारों को उनके चित्रोँ ने सजाया। उस सुन्दर, परम सुशील, सर्वगुण संपन्न माँ के लिये, पापा का गीत गाती हूँ - "दर भी था, थीं दीवारें भी, माँ, तुमसे, घर घर कहलाया!" यह कम लोग जानते हैं के सुशीला गोदीवाला संगीत निर्देशक गायक अविनाश व्यास के ग्रुप में गाया भी करतीं थीं; रेडियो आर्टिस्ट थीं और अनुपम सुन्दरी थीं - हरी हरी, अंगूर सी आँखें, तीखे नैन नक्श, उजला गोरा रंग और इतनी सौम्यता और गरिमा कि स्वयं श्री सुमित्रानंदन पन्त जी ने सुशीला को दुल्हन के जोड़े में सजा हुआ देख कहा था, "शायद दुष्यंत राजा की शकुन्तला भी ऐसी ही होगी"। पन्त जी तो हैं हिंदी के महाकवि! मैं, अम्मा की बेटी हूँ! जिस माँ की छाया तले अपना जीवन संवारा वो तो ऐसी देवी माँ को श्रद्धा से अश्रू पूरित नयनों से प्रणाम ही कर सकती है। कितना प्यार दुलार देकर अपनी फुलवारी सी गृहस्थी को अम्मा ने सींचा था। पापा जी तो भोले शम्भू थे, दिन दुनिया की चिंता से विरक्त सन्यासी - सद गृहस्थ! अम्मा ही थी जो नमक, धान, भोजन, सुख सुविधा का जुगाड़ करतीं, साक्षात अम्बिका भवानी सी हमारी रक्षा करती, हमें सारे काम सिखलाती, खपती, थकती पर कभी घर की शांति को बिखरने न दिया, न कभी पापा से कुछ माँगा। अगर कोई नई साड़ी आ जाती तो हम तीन बहनों के लिये सहेज कर रख देतीं। ऐसी निस्पृह स्त्री मैंने और नहीं देखी और हमेशा सादा कपड़ों में अम्मा महारानी से सुन्दर और दिव्य लगतीं थीं। अम्मा की बगिया के सारे सुगंधी फूल, नारियल के पेड़, फलों के पेड़ उसी के लगाए हुए आज भी छाया दे रहे हैं पर अम्मा नहीं रहीं, यादें रह गयीं, बस!

बहुत खी सुंदर तरीके से आपने अपनी माताजी का वर्णन किया, हम भी भावुक हो गए हैं। लावण्या जी, फ़िल्म जगत के किन किन कलाकारों के साथ आपके परिवार का पारिवारिक सम्बंध रहा है? इसमें एक नाम लता मंगेशकर जी का अवश्य है । लता जी के साथ आपके पारिवारिक सम्बन्ध बारे में हम विस्तार से जानना चाहेंगे।
with the Melody Queen

स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर जी हमारे परिवार की बड़ी दीदी हैं। दीदी, पापा जी से निर्माता निर्देशक विनायक राव जी [जो मशहूर तारिका नंदा जी के पिताजी थे] उन के यहाँ दीदी जब काम किया करतीं थीं उसी दौरान सबसे पहली बार मिले थे ..फिर मुझे याद आता है मैं छोटी ही थी तब दीदी घर आयीं थीं, फिर मुलाकातें होती रहीं बाहर काम के लिये, बंबई फिल्म निर्माण का मुख्य केंद्र है तो कहीं न कहीं मुलाक़ात हो ही जाया करती थी।

लावण्या जी, एक तरफ़ आपके पिता, पंडित जी, और दूसरी तरफ़ स्वर-साम्राज्ञी लता जी। ऐसे महान दो कलाकारों का स्पर्श आपको जीवन में मिला, जो मैं समझता हूँ कि इस तरह का सौभाग्य बहुत कम लोगों को नसीब है। 

पापाजी और दीदी, दो ऐसे इंसान हैं जिनसे मिलने के बाद मुझे ज़िंदगी के रास्तों पे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिली है। संघर्ष का नाम ही जीवन है। कोई भी इसका अपवाद नहीं- सत्चरित्र का संबल, अपने भीतर की चेतना को प्रखर रखे हुए किस तरह अंधेरों से लड़ना और पथ में कांटे बिछे हों या फूल, उन पर पग धरते हुए, आगे ही बढ़ते जाना ये शायद मैंने इन दो व्यक्तियों से सीखा। उनका सान्निध्य मुझे यह सिखला गया कि अपने में रही कमजोरियों से किस तरह स्वयं लड़ना जरुरी है- उनके उदाहरण से हमें इंसान के अच्छे गुणों में विश्वास पैदा करवाता है। पापा जी का लेखन, गीत, साहित्य और कला के प्रति उनका समर्पण और दीदी का संगीत, कला और परिश्रम करने का उत्साह, मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दे गया। उन दोनों की ये कला के प्रति लगन और अनुदान सराहने लायक है ही, परन्तु उससे भी गहरा था उनका इंसानियत से भरापूरा स्वरूप जो शायद कला के क्षेत्र से भी ज्यादा विस्तृत था। दोनों ही व्यक्ति ऐसे जिनमें इंसानियत का धर्म कूट-कूट कर भरा हुआ मैंने बार बार देखा और महसूस किया । जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है, उसे किसी भी रूप में उठालो, वह समान रूप से दमकता मिलेगा वैसे ही दोनों को मैंने हर अनुभव में पाया। जिसके कारण आज दूरी होते हुए भी इतना गहरा सम्मान मेरे भीतर बैठ गया है कि दूरी महज एक शारीरिक परिस्थिती रह गयी है। ये शब्द फिर भी असमर्थ हैं मेरे भावों को आकार देने में।

पंडित जी से सम्बंधित कुछ यादगार घटनाओं के बारे में बताइए। वो घटनाएँ या संस्मरण जो भुलाये नहीं भूलते। 
The Father-Daughter duo

हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बड़े सो रहे थे, पड़ोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड़ कर किलकारियाँ भर रहे थे कि अचानक, पापाजी वहाँ आ पहुँचे, गरज कर कहा, "अरे! यह आम पूछे बिना क्योँ तोड़े? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो"। एक तो चोरी करते पकड़े गए और उपर से माफी माँगनी पडी!!! पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए, यही उनकी शिक्षा थी। एक और बताती हूँ,  मेरी उम्र होगी कोई 8 या 9 साल की। पापाजी ने कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति " मेघदूत " से पढ़ने को कहा। संस्कृत कठिन थी परँतु, जहाँ कहीँ , मैँ लड़खड़ाती, वे मेरा उच्चारण शुद्ध कर देते। आज, पूजा करते समय, हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ। एक और सुनिए, मेरी बिटिया, सिंदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा, मेरे पास सहारा देते, मिल जाते, मुझसे कहते, "बेटा, मैँ हूँ, यहाँ"। आज मेरी बिटिया की प्रसूति के बाद, यही वात्सल्य उड़ेलते समय, पापाजी की निश्छल, प्रेममय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है। जीवन अतीत के गर्भ से उदित होकर, भविष्य को संजोता आगे बढ रहा है।

पंडित जी ने जहाँ एक तरफ़ कविताएँ, साहित्य, और फ़िल्मी गीत लिखे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ग़ैर फ़िल्मी भक्ति रचनाएं, ख़ास कर माता को समर्पित बहुत से गीत लिखे हैं, उनके लेखनी के इस पक्ष के बारे में भी बताइए। क्या वो अंदर से भी उतने ही धार्मिक थे? आध्यात्मिक थे? कैसी शख़्सीयत थी उनकी? 

पापा जी दार्शनिक, विचारशील, तरुण व्यक्ति और प्रखर बुद्धिजीवी रहे। धार्मिक तो वे थे ही पर भारतीय वांग्मय, पुराण, वेद, धर्म ग्रन्थ के अध्येता थे। कईयों का अनुभव है और लोग कहते थे 'नरेंद्र शर्मा चलता फिरता विश्व कोष है'। 'राम चरित मानस' को पढ़ते और आंसू बहाते भी देखा है। उनका धर्म , सच्ची मानवता थी। सभी को एक समान आदर दिया करते चाहे वो आनेवाला महाराणा मेवाड़ हो या हमारे घर कपड़े लेने आनेवाला हमारा इस्त्रीवाला हो। हमारी बाई को चिट्ठी बांच कर सुनाते और घंटों existansilism इस गूढ़ विषय पे वे बोलते। बी.बी.सी सुनते और मारग्रेट थेचर को चुनाव लड़ने की शुभ तारीख भी उन्होंने बतलाई थी, हाँ सच! और मैडम जीती थीं! वे पूरी बंबई, पैदल या लोकल ट्रेन से या बस से घूम आते। दूरदर्शन पे संगीत का प्रोग्राम रेकॉर्ड करवा के सहजता से घर पर बतियाते। कभी कोई पर्चा या नोट नहीं रखते। किसी भी विषय पे साधिकार, सुन्दर बोलते। पंडित नेहरू के निधन पर भी 'रनिंग्‍कमेंट्री' की थी। भारत माता के प्रति अगाध प्रेम व श्रद्धा थी जो उनकी कविताओं में स्पष्ट है। उन्होँने "कदली वन " काव्य -सँग्रह की "देश मेरे" शीर्षक कविता में कहा है - "दीर्घजीवी देश मेरे, तू, विषद वट वृक्ष है"। पापा जी का धर्म आडम्बरहीन और मानवतावादी था सर्वोदय और ' सर्वे भवन्तु सुखिन ' का उद्घोष लिये था।

अपने पापाजी के लिखे फ़िल्मी रचनाओं में अगर पाँच गीत हम चुनने के लिए कहें, तो आप कौन कौन से गीतों को चुनेगी? 

यूं तो मुझे उनके लिखे सभी गीत बहुत पसंद हैं, पर आपने पाँच के लिये कहा है तो मैं इन्हें चुनती हूँ। पहला, "ज्योति कलश छलके", गायिका लतादीदी, संगीत सुधीर फडके जी, शब्द पं. नरेंद्र शर्मा। दूसरा, "सत्यम शिवम् सुंदरम", गायिका लतादीदी, लक्ष्मीकांत प्यारे लाल जी का संगीत, शब्द पापा के। तीसरा, "नाच रे मयूरा", विविध भारती का सर्व प्रथम प्रसार-गीत, स्वर श्री मन्ना डे, संगीत अनिल बिस्वास जी और शब्द पंडित नरेंद्र शर्मा के। चौथा, "स्वागतम शुभ स्वागतम", स्वागत गान एशियाड खेलों के उदघाटन पर संगीत पंडित रवि शंकर जी, शब्द पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के। और पाँचवाँ गीत "नैना दीवाने, एक नहीं माने, करे मनमानी माने ना...", गायिका सुरैया जी और संगीत श्री एस डी बर्मन तथा शब्द नरेंद्र शर्मा फिल्म "अफसर" जो देवानन्द जी के "नवकेतन बेनर" की प्रथम पेशकश थी।

और अब एक अंतिम सवाल, पंडित नरेन्द्र शर्मा एक ऐसी शख़्सीयत का नाम है जिनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों का मूल्यांकन शब्दों में संभव नहीं। लेकिन फिर भी हम आपसे जानना चाहेंगे कि अगर केवल एक वाक्य में आपको अपने पापाजी के बारे में कुछ कहना हो तो आप किस तरह से उनकी शख़्सीयत का व्याख्यान करेंगी?

मैं मानती हूँ कि हर एक इंसान ईश्वर की अप्रतिम कृति है। हम ईश्वर के अंश हैं शायद, ईश्वर को कविता, गीत व संगीत बेहद प्रिय हैं! सबसे अलग, सबसे विशिष्ट हैं हम सभी। जैसे हमारे फिंगर प्रिंट सब से अलग होते हैं। पर पापा जी, पंडित नरेंद्र शर्मा के लिये एक वाक्य में कहूं तो यही कहूंगी - 'न भूतो न भविष्यति' ! एक अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी, जो आजीवन सर्वथा साधारण और सहज बने रहे शायद यही उनकी तपस्या का फल था और उनकी आत्मा का अंतिम चरण ...अंतिम सोपान ...

बहुत बहुत धन्यवाद लावण्या जी आपका, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, अपनी व्यस्त जीवन से समय निकालकर आपने हमें समय दिया, और पंडित जी के बारे में इतनी जानकारी दी जो शायद उनके चाहने वालों को मालूम नहीं होगी। बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्कार! 

सुजॉय भाई, आपके अनेक इंटरव्यू पढ़ कर खुश हुई हूँ और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित होकर महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। समग्र सम्पादक मंडल व पूरी टीम को मेरे सस्नेह आशीष। आपको मेरे सच्चे मन से कहे धन्यवाद, बड़ी लम्बी बातचीत हो गयी। आप सब को समय देने के लिये भी शुक्रिया, फिर मिलेंगें, नमस्ते!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





2 comments:

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ