शनिवार, 28 जून 2014

संगीतकार शंकर अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए



स्मृतियों के स्वर - 04

संगीतकार शंकर अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। दोस्तों, आपको याद होगा 80 के दशक में दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता था 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' जिसमें तबस्सुम फ़िल्मी कलाकारों के साक्षात्कार लेती थीं। उसी सीरीज़ में एक बार संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के शंकर तशरीफ़ लाये थे। आइए आज 'स्मृतियों के स्वर' में उसी साक्षात्कार का एक अंश पढ़े जिसमें शंकर जी बता रहे हैं अपने पृथ्वी थिएटर के दिनों के बारे में, और लता मंगेशकर को 'बरसात' के लिए चुनने के बारे में ...




सूत्र: दूरदर्शन

कार्य्रक्रम: 'फूल खिले हैं गुलशन गु्लशन' - संगीतकार शंकर से तबस्सुम की बातचीत

प्रसारण तिथि: 1986




किसी भी कली को फूल बन कर महकने के लिए किन रास्तों से गुज़रना पड़ता है यह आप अच्छी तरह जानते हैं। हमारे आज के महमान की कला कली से फूल बन कर कैसे महकी यह उन्हीं की ज़ुबानी सुनिये। शंकर जी!

यह बड़ा अच्छा आपने पूछा है, हमारी ज़िन्दगी जो है पृथ्वी थिएटर्स से शुरू हुई है, और आपको मालूम है कि उस थिएटर में बहुत कुछ सीखने को मिला है और बहुत काम करने को भी मिला है, और उसी की बदौलत जो है, हम आज हैं। पृथ्वी थिएटर हमेशा जब टूर पे बाहर जाया करता था, तब कुछ न कुछ हम एक्स्ट्रा काम भी किया करते थे, कैसे काम के बाद किसी भी शहर में कोई गाने बजाने वाले मिल जाते तो मैं उनको पकड़ के ले आता था क्योंकि वहाँ के जितने आर्टिस्ट्स हैं वो थक जाते थे ड्रामा क्ले बाद, तो मुझसे नाराज़ होते थे कि यार ये कहीं न कहीं से कुछ न कुछ करता है, किसी न किसी को पकड़ कर ले आता है। तो मेरी आदत थी गाना, बजाना, सुनना, और उससे कुछ हासिल करना, तो पापाजी को ये बहुत पसन्द था।


पृथ्वीराज जी को?

पृथ्वीराज जी को, क्योंखि वो क्लासिकल वगेरह में बहुत शौक रखते थे। इसी तरीके से हम लोगों के कर टूर पर कहीं न कहीं से ऐसे प्रोग्राम हुआ करते थे।


मैं गु़स्ताख़ी की माफ़ी चाहती हूँ आपने यह नहीं बताया कि आपने पृथ्वी थिएटर्स में शुरुआत कैसे की?

ओ हो हो, जब मैं बम्बई आया, तब मुझे पापाजी, एक देओधर म्युज़िक स्कूल है, वहाँ उनके दर्शन हुए। जब मैंने उनको देखा, ऐसा लगा कि वाक़ई ये इतने ख़ूबसूरत हीरो शायद ही कोई हो सकता है। उनकी ख़ूबसूरती और पर्सोनलिटी जो थी, उसको देख कर ही मैं ख़ामोश हो गया। मैं तो छोटा सा..., तो मैंने उनसे पूछा, मुझे मालूम था कि पापाजी उस वक़्त शकुन्तला ड्रामा शुरू करने वाले थे। तो मैंने उनसे पूछा कि 'पापाजी, आप हमें काम देंगे क्या?' उन्होंने पूछा कि क्या करते हैं? मैंने कहा कि मैं तबला बहुत अच्छी बजाता हूँ और हारमोनियम भी बहुत अच्छा बजाता हूँ। थोड़ा बहुत डान्स भी कर लेता हूँ और स्टेज पर अगर कोई छोटे मोटे डायलोग हों तो वो भी मैं बोल सकता हूँ।


ऑल राउन्डर?

ऑल राउन्डर? तो उनको यह बहुत अच्छी लगी बात, तो उन्होंने दादर में, आपने सुना होगा कि वो म्युज़िक के सिटिंग्स वगेरह वहीं किया करते थे। तो बुलाया वहीं पे एक दिन। साहब, दो रिहर्सल हॉल थे, वहाँ बड़े-बड़े कलाकार बैठे हुए थे। तो उन कलाकारों को देख कर मैं सोच में पड़ गया कि मैं तो कुछ भी नहीं हूँ इन लोगों के सामने। तो फिर मुझसे पूछे कि तबला सुनाओगे क्या? मैंने कहा कि आप इजाज़त दें तो ज़रूर सुनायूंगा। इत्तेफ़ाक़ से अली अकबर साहब भी वहाँ थे, तो अली अकबर साहब के साथ आप बजायेंगे क्या? मैंने बोला कि ठीक है, पहले दो मिनट मैं सोलो बजा लूँ, फिर आपके साथ संगत करूंगा। मैंने दो-चार मिनट जो सोलो बजाया, सारे लोगों ने इतनी पसन्द की, इतनी तालियाँ बजाये ज़ोर ज़ोर से।



और पृथ्वी थिएटर्स में आपके क़दम जम गये?

क़दम जम गये, और वहीं से ज़िन्दगी शुरू होती रही। थिएटर में जाते रहे, तो इत्तेफ़ाक़ से राज साहब ने पिक्चर शुरू किया 'बरसात'। राज साहब हमें गाने बनाकर रखने के लिए कहते थे। ऐसे हमने कई गानें बना लिए थे। जब उन्होंने फिर से कहा गाने बनाने के लिए तो हमने कहा कि आप गाने बनवाते हैं पर कभी लेते तो हैं नहीं। इत्तेफ़ाक़ से हम पूना गये थे थिएटर के साथ, तो रात का वक़्त है, एक धुन है सुनिये और देखिये कैसी लगती है, भैया मत लीजिए पर सुन लीजिए। गाना मैंने वो "अम्बुआ का पेड़ है, गोरी मुंढेर है, आजा मोरे बालमा, अब काहे को देर है" सुनाया। जैसे सुनाया तो बोले कि "बस अब बम्बई चलते हैं और इस गाने को रेकॉर्ड करते हैं। इस बार बम्बई आने के बाद वो सीरिसली गाने के पीछे लग गये। तो गाने के लिए हसरत मियाँ लिखने के लिए आये।


तो हसरत भाई ने उस धुन पर बोल कौन से लिखे?

"जिया बेकरार है, छायी बहार है, आजा मोरे बालमा, तेरा इन्तज़ार है"


ओ हो, यह तो बहुत लोकप्रिय गाना था। शंकर जी, आज जब हम कहते हैं कि शंकर जी आ गये तो लोग पूछते हैं कि 'कौन, शंकर-जयकिशन की जोड़ी वाले?' क्या मैं यह जान सकती हूँ कि यह शंकर-जयकिशन की जोड़ी कैसे बनी?

यह तो ऐसा है कि जब मैं थिएटर में काम किया करता था, तो एक हारमोनियम बजाने वाले की ज़रूरत थी, तो मैंने जयकिशन जी को वहाँ काम के लिए ले आया। जब लाया तो उनको पापाजी ने रख लिया। बस, उसके साथ हमारी यह जोड़ी जो बनी है, जैसे बरसात शुरू हुई है, आज तक बरसात ही बरसात होती रही है।


बहुत ख़ूब!

दोनो जब मिल कर काम करते थे कभी यह नहीं सोचा कि वो कर रहा है या मैं कर रहा हूँ, ऐसे कभी हमारे दिमाग़ में ख़याल नहीं आये, हमेशा यही सोच कर करते थे कि हमारा नाम होना चाहिये, हमें कामयाबी मिलनी चाहिये, ख़ूब दुनिया में हमारा चर्चा होना चाहिये।


अब आप यह भी हमें बतायें कि जब आप फ़िल्मी दुनिया में आये उस वक़्त यहाँ की मशहूर आवाज़ें कौन सी थीं?

उस वक़्त तो मेरे ख़याल से शमशाद बाई थीं, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी, राजकुमारी, ख़ुर्शीद, सुरैया और नूरजहाँ जैसी गायिकायें थीं। तो ऐसे बड़े बड़े गाने वाले थे। लेकिन हम एक दिन 'जुपिटर स्टुडियो' में गये थे, तो मैंने एक लड़की को वहाँ देखा जो हुस्नलाल-भगतराम के वहाँ अपनी आवाज़ सुनाने के लिए आयी थी। तो वहाँ पर अपनी आवाज़ सुनाया इन्होंने पर हुस्नलाल-भगतराम ने पसन्द नहीं किया और वापस भेज दिया। मेरे दिमाग़ में नहीं मालूम वह आवाज़ क्यों रही, क्या है, जब यह गाना 'बरसात' का बनाया "जिया बेक़रार है", तब उस लड़की को मैंने बुलाया। अच्छा जब बुलाया तब आप समझेंगी नहीं कि यह लड़की गाना गायेगी या गा सकती है, ऐसी कुछ बातें उनमें नज़र नहीं आ रही थी।


मैं आपसे यही सवाल करने जा रही थी कि जब उस ज़माने की मशहूर आवाज़ों को ना लेते हुए आपने यह गाना लताजी से गवाने का फ़ैसला क्यों किया?

नाम वाले तो हैं ही लेकिन उस वक़्त दिमाग़ में मेरे यह आया कि मैं ख़ुद नया हूँ, ज़िदगी का कुछ ठिकाना नहीं था, लेकिन मैंने उस लडअकी की आवाज़ को पसन्द किया, इसलिये पसन्द किया क्योंकि मेरे दिमाग़ में था कि यह गायेगी, उसको एक गाने के लिये ले आये हैं, वो हैं लता मंगेशकर!

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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'दूरदर्शन' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार दूरदर्शन के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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