रविवार, 29 दिसंबर 2013

कुछ दिग्गज स्वर-शिल्पी, जिन्होने कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 148 में आज

रागों में भक्तिरस – 16

‘चदरिया झीनी रे बीनी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सोलहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री मीरा के दो पदों पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा करेंगे। कबीर के इस पद को भारतीय संगीत की हर शैली में गाया गया है। आज के अंक में पहले हम आपको यह पद राग चारुकेशी में निबद्ध, ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं के स्वरों में सुनवाएँगे। इसके बाद यही पद सुविख्यात भजन गायक अनूप जलोटा राग देश में और अन्त में लोक संगीत के जाने-माने गायक प्रह्लाद सिंह टिपणिया प्रस्तुत करेंगे। आप भी नादब्रह्म के माध्यम से निर्गुणब्रह्म की उपासना के साक्षी बनें। 


न्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के जिन भक्त कवियों ने भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया उनमें कबीर अग्रगण्य हैं। उनके जन्म और जन्मतिथि के विषय में विद्वानों के कई मत हैं। एक मान्यता के अनुसार कबीर का जन्म 1398 ई. की ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को काशी (अब वाराणसी) के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था। जुलाहा परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। आगे चलकर वे सन्त रामानन्द के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर विविध क्षेत्रों की मिली-जुली सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मावलम्बियों के समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरवाद का मुखर विरोध किया। कबीर की वाणी, उनके मुखर उपदेश, उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी आदि रूप में उपलब्ध हैं। गुरुग्रन्थ साहब में उनके 200 पद और 250 साखियाँ संकलित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में चर्चा के लिए हमने कबीर का ही एक पद चुना है। यह कबीर के अत्यन्त लोकप्रिय पदों में से एक है। पहले आप इस पद की पंक्तियों पर दृष्टिपात कीजिए।

झीनी झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।

ईडा पिङ्गला ताना भरनी,

सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल दल चरखा डोलै,

पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया।

वाको सियत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया।

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,

ओढि कै मैली कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन से ओढी,

ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया॥

इस पद में कबीर ने मानव के शरीर धारण करने, जीवन को संस्कारित करने और शरीर की सार्थकता से सम्बन्धित गूढ तत्त्वों को एक चादर के प्रतीक रूप में समझाने का प्रयास किया है। कबीर के शब्दों को भारतीय संगीत की प्रायः सभी शैलियों में स्वर मिला है। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत के साथ-साथ सूफी संगीत और कव्वाली में भी कबीर गाये जाते है। आज के अंक में इस पद के गायन के तीन उदाहरण हम प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले यह पद ध्रुवपद अंग में सुनिए, जिसे सुप्रसिद्ध ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं ने प्रस्तुत किया है। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली की गायकी में एक युगल गायक हैं- गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें देश-विदेश में ध्रुवपद गायकी में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों ने कबीर का यह पद राग चारुकेशी के स्वरों में प्रस्तुत किया है। राग चारुकेशी के परिचय से पहले गुण्डेचा बन्धुओं से सुनिए कबीर का पद- ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’। मोहक पखावज वादन अखिलेश गुण्डेचा ने की है।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग चारुकेशी : पं. रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा



कबीर का यह पद आप राग चारुकेशी के स्वरों में सुन रहे थे। यह राग मूलतः कर्नाटक संगीत पद्यति का है, जिसे उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में भी मान्यता प्राप्त है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह-अवरोह में धैवत और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग पूर्वांग में बिलावल और उत्तरांग में भैरवी का आभास कराता है। चारुकेशी के शुद्ध ऋषभ के स्थान पर यदि कोमल ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो राग बसन्त मुखारी का और यदि कोमल निषाद के स्थान पर शुद्ध निषाद का प्रयोग किया जाए तो यह राग नट भैरव की अनुभूति कराता है। इस राग का गायन-वादन दिन के दूसरे प्रहर में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

कबीर का यही पद अब हम चर्चित भजन गायक अनूप जलोटा के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। अनूप जलोटा के पिता पुरुषोत्तमदास जलोटा स्वयं एक लोकप्रिय भजन गायक हैं। इनका परिवार पंजाब से लखनऊ आया था। परन्तु अनूप जलोटा का जन्म 29 जुलाई 1953 को नैनीताल में हुआ था। भजन गायन उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिला, जिसे उन्होने लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) में सँवारा। बचपन से ही क्रिकेट और टेबिल टेनिस खेल के शौकीन अनूप जलोटा सूर, कबीर, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों-कवयित्रियों के पदों को रागों का स्पर्श देकर देश-विदेश के श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हुए। आज हमारी चर्चा में कबीर का जो पद है, उसे अनूप जलोटा ने राग देश का स्पर्श दिया है। राग देश की रचना खमाज थाट के अन्तर्गत मानी गई है। इसमे कोमल और शुद्ध दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। अब सुनिए, राग देश के स्वरों का सहारा लेकर, अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर का यही पद।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग देश : भजन गायक अनूप जलोटा



कबीर का यह पद संगीत की विविध शैलियों में अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने गाया है। ध्रुवपद और भजन गायकी में यह पद सुनवाने का बाद अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, यही पद मालवा की लोक संगीत शैली में। इसे मालवा अंचल की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत कर रहे है, पद्मश्री सम्मान से विभूषित प्रह्लाद सिंह टिपणिया 7 सितम्बर, 1954 को उज्जैन (मध्यप्रदेश) के तरना कस्बे में जन्में श्री टिपणिया पेशे से शिक्षक हैं और मालवा के लोक संगीत में उनकी गहरी अभिरुचि थी। पारम्परिक लोक कलाकारों के बीच रह कर उन्होने इस अनूठी शैली का गहन अध्ययन किया और कबीर को ही गाने लगे। इस प्रकार की गायकी में स्वर और लय को साधने का प्रमुख वाद्य तम्बूरा होता है, जिसमें पाँच तार होते हैं। इसके अलावा करताल, ढोलक और मँजीरा भी सहायक वाद्य होते हैं। देश में आयोजित होने वाले प्रमुख संगीत समारोहों के सहभागी श्री टिपणिया अमेरिका और ब्रिटेन में भी कबीर को प्रस्तुत कर चुके हैं। कबीर के पद ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ का मालवा की लोक संगीत शैली में गायन प्रस्तुत कर रहे हैं, प्रह्लाद सिंह टिपणिया और उनके साथी। आप कबीर के इस पद की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : लोक संगीत : प्रह्लाद सिंह टिपणिया और साथी




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक विख्यात गायक की आवाज़ में कबीर की भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्ति रचना के अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना की प्रस्तुति में जिस ताल का प्रयोग हुआ है उसके मात्राओं की संख्या बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 146वीं कड़ी में हमने आपको भक्त कवयित्री मीरा के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको सन्त कबीर के एक पद का गायन ध्रुवपद शैली, भजन शैली और लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया। अगले अंक में इसी पद का गायन कुछ और शैलियों और कलासाधकों के स्वरों में हम प्रस्तुत करेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की सत्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।



प्रस्तुति :कृष्णमोहन मिश्र 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

रेडियो प्लेबैक की वार्षिक गीतमाला के शीर्ष ३ गीत : "तुम ही हो" को मिला सरताज गीत का खिताब

पायदान # ०३ - नगाड़े संग ढोल 
पायदान # ०२ - भाग मिल्खा भाग 
पायदान # ०१ (सरताज गीत) - तुम ही हो 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

'तितली' बन उड़ते मन की कुछ 'अनकही' सी बातें

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

'कबीरा' की राह रोकती पुकार कहीं तो 'जिंदा' दिली से जीने की तरकीब कहीं

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

हिट परेड को मिला एक नया 'शुभारंभ' कहता हुआ 'चाहूँ मैं या न'

रविवार, 22 दिसंबर 2013

मीरा का एक और पद : विविध धुनों में


स्वरगोष्ठी – 147 में आज


रागों में भक्तिरस – 15


‘श्याम मने चाकर राखो जी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पन्द्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री के एक पद- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम मीराबाई के साहित्य और संगीत पर चर्चा जारी रखते हुए एक और बेहद चर्चित पद- ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ सुनवाएँगे। इस भजन को विख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी, वाणी जयराम, लता मंगेशकर और चौथे दशक की एक विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। इन चारो गायिकाओं ने मीरा का एक ही पद अलग-अलग धुनों में गाया है। आप इस भक्तिगीत के चारो संस्करण सुनिए और स्वरों के परिवर्तन से गीत के भाव में होने वाले आंशिक बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए। 


तिहासकारों के अनुसार भक्त कवयित्री मीराबाई का जन्म विक्रमी संवत 1561 अर्थात 1504 ई. के श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि को हुआ था। अजमेर के लेखक श्री ओमप्रकाश ने अपनी पुस्तक ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ की भूमिका में मीरा की भक्ति रचनाओं का विवेचन करते हुए लिखा है- “सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में मुगल आक्रमणकारियों से भयाक्रान्त समाज को मीरा ने भक्ति का सम्बल दिया। पूरे भारतवर्ष के कोने-कोने में भक्ति आन्दोलन चल रहे थे। मीरा ने भी उसी संस्कृति के भक्ति-प्रवाह को परिपुष्ट किया। ‘नारी भोग्या नहीं, माँ है’ की जीवन-दृष्टि देकर नारी को नव प्रतिष्ठा दी। समाज की सुव्यवस्था हेतु कुरीतियों का उन्मूलन कर, चिर विद्रोहिणी की भूमिका निभाते हुए समाज-सुधार का कर्तव्य निभाया।”

आज के अंक में हमने मीरा का वह पद चुना है जिसमें वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण से आग्रह कर रही हैं कि ‘हे श्याम मुझे अपना चाकर बना लो’। सबसे पहले आप यह भक्तिगीत सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। मीरा के व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन दर्शन पर 1947 में चन्द्रप्रभा मूवीटोन द्वारा निर्मित फिल्म ‘मीरा’ के गीतों में उन्होने स्वयं अपना स्वर दिया था। यह फिल्म पहले तमिल में और फिर हिन्दी में भी बनी थी। विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी ने इस फिल्म में न केवल गीत गाये, बल्कि मीरा की भूमिका में अभिनय भी किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक एस.वी. वेंकटरमन, जी. रामनाथन् और नरेश भट्टाचार्य थे। फिल्म में मीरा का यह पद एक अप्रचलित राग बिहारी के स्वरों में निबद्ध है। मीरा-भजन के इस संस्करण के बाद आप इसका दूसरा संस्करण भी सुनेगे। भजन- ‘मने चाकर राखो जी...’ का यह संस्करण चौथे दशक में सक्रिय किन्तु वर्तमान में विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। गायिका सती देवी चर्चित पार्श्वगायक किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता (गांगुली) की माँ थीं। चौथे और पाँचवें दशक में गाये गए इस मीरा-भजन के इन दोनों संस्करणों का आप रसास्वादन कीजिए।


मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : एम.एस. शुभलक्ष्मी : फिल्म मीरा (1947)




मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : सती देवी : गैर फिल्मी भजन



भक्त कवयित्री मीरा के पद ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ पर हमारी यह चर्चा जारी है। मीरा के जीवन दर्शन पर एक और फिल्म ‘मीरा’ 1979 में गीतकार गुलजार के निर्देशन में बनी थी। इस फिल्म में भी मीरा के अन्य पदों के साथ-साथ ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ भी शामिल था, जिसे वाणी जयराम ने अपना स्वर दिया था। फिल्म के संगीत निर्देशक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर थे। उन्होने इस भजन को राग भैरवी के स्वर दिये। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले कई अंकों में हम राग भैरवी की चर्चा करते रहे हैं। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। मीरा का यह पद पहले आप राग भैरवी के स्वरो में सुनेगे और फिर उसके बाद यही पद राग बागेश्री के स्वरो पर आधारित प्रस्तुत करेंगे। यह संस्करण हमने 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘तूफान और दीया’ से लिया है। भजन के स्थायी की पंक्ति में श्याम के स्थान पर गिरधारी शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे और इस भजन को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। गीत में राग बागेश्री की स्पष्ट झलक मिलती है। बेहद लोकप्रिय राग है, बागेश्री। कुछ लोग इसे बागेश्वरी नाम से भी सम्बोधित करते हैं, किन्तु वरिष्ठ गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के अनुसार इस राग का सही नाम बागेश्री ही होना चाहिए। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग कर्नाटक संगीत के नटकुरंजी राग से काफी मिलता-जुलता है। राग बागेश्री में पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग होता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। कुछ विद्वान आरोह में पंचम का प्रयोग न करके औड़व-सम्पूर्ण रूप में इस राग को गाते-बजाते हैं। इसमें गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राधा का सर्वप्रिय राग माना जाता है। आप मीरा के पद- ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ को पहले राग भैरवी और फिर राग बागेश्री के स्वरों में सुनिए और मुझे श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : वाणी जयराम : फिल्म मीरा (1979)




राग बागेश्री : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म तूफान और दीया




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 149वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रविशंकर द्वारा स्वरबद्ध और वाणी जयराम की आवाज़ में प्रस्तुत मीरा के एक भजन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सात मात्रा का रूपक ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। क्षिति जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर भक्त कवयित्री मीरा के एक और पद पर चर्चा की। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि महात्मा कबीर की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

'सिने पहेली' में आज फ़िल्मी सितारों का महाकुंभ

सिने पहेली –93 & 94

फ़िल्मी पहेलियों को सुलझाने में दिलचस्पी रखते वाले तमाम साथियों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत 'सिने पहेली' में। दोस्तों, जिस तरह से पिछली बार हमने दो कड़ियों को एक साथ मिलाकर 'सिने पहेली' के 92 और  93 वे  अंक प्रस्तुत किए थे, उसी प्रकार आज भी हम 'सिने पहेली' - 93  और 94 पेश कर रहे हैं। कारण? जी मामला कुछ ऐसा है कि अगले शनिवार 'सिने पहेली' का प्रसारण संभव नहीं हो सकेगा। इसलिए आज हम 10 के बजाय 20 अंकों के सवाल इकट्ठा पूछ लेंगे और आपको इस बार एक के बजाय दो सप्ताह का समय भी दिया जा रहा है अपने जवाब भेजने का। तो चलिए शुरू करते हैं आज की 'सिने पहेली'।






आज की पहेली : गीत एक सितारे अनेक



नीचे पाँच चित्र दिये गये हैं। हर चित्र में पाँच फ़िल्मी सितारे मौजूद हैं। आपको इन सितारों को ध्यान में रखते हुए हर चित्र के लिए एक फ़िल्मी गीत सुझाना है और साथ में तर्क भी देना है कि किस तरह से इन पाँच सितारों को आपने एक गीत में बाँधा है। यानी पाँच सवालों के लिये आपको पाँच गीत सुझाने हैं तर्क के साथ। हर सही जवाब के लिए आपको मिलेंगे 4 अंक। यानी 4x5=20।

तो ये रहे वो पाँच चित्र।

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अपने जवाब आप हमें cine.paheli@yahoo.com पर 2 जनवरी शाम 5 बजे तक ज़रूर भेज दीजिये।


पिछली पहेली का हल


कम्बिनेशन 1. कार्टून 1 अर्थात हैलो का सम्‍बन्‍ध अभिनेता सलमान खान से जुडा हैं क्‍योंकि फिल्‍म 'हैलो ब्रदर' सलमान खान अभिनीत फिल्‍म हैं एवं इसके अतिरिक्‍त एक अन्‍य फिल्‍म 'हैलो' में भी सलमान खान की विशेष उपस्थिति {special appearance} है

कम्बिनेशन 2. कार्टून 2 अर्थात बॉक्‍सर का सम्‍बन्‍ध अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती से जुडा हैं क्‍योंकि 'बॉक्‍सर' मिथुन चक्रवर्ती अभिनीत फिल्‍म हैं

कम्बिनेशन 3. कार्टून 3 अर्थात हथकडी का सम्‍बन्‍ध अभिनेता गोविन्‍दा से जुडा हैं क्‍योंकि 'हथकडी' गोविन्‍दा अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं

कम्बिनेशन 4. कार्टून 4 अर्थात गायक/रॉकस्‍टार का सम्‍बन्‍ध अभिनेता रणबीर कपूर से जुडा हैं क्‍योंकि 'रॉक स्‍टार' रणबीर कपूर अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं और उसमें वे एक रॉकस्‍टार गायक हैं

कम्बिनेशन 5. कार्टून 5 अर्थात लुटेरे का सम्‍बन्‍ध अभिनेता सन्‍नी देओल से जुडा हैं क्‍योंकि 'लुटेरे' सन्‍नी देओल अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं

कम्बिनेशन 6. कार्टून 6 अर्थात ट्रेन का सम्‍बन्‍ध अभिनेता इमरान हाशमी से जुडा हैं क्‍योंकि 'द ट्रेन' इमरान हाशमी अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं

कम्बिनेशन 7. कार्टून 7 अर्थात पतंगों (काईट्स) का सम्‍बन्‍ध अभिनेता ऋतिक रोशन से जुडा हैं क्‍योंकि 'काईट्स' ऋतिक रोशन अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं

कम्बिनेशन 8. कार्टून 8 अर्थात भिन्‍न-भिन्‍न शराब/पेय पदार्थ यानि कॉकटेल का सम्‍बन्‍ध अभिनेता सैफ़ अली ख़ान से जुडा हैं क्‍योंकि 'कॉकटेल' सैफ़ अली ख़ान अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं

कम्बिनेशन 9. कार्टून 9 अर्थात जोकर का सम्‍बन्‍ध अभिनेता अक्षय कुमार से जुडा हैं क्‍योंकि 'जोकर' अक्षय कुमार अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं

कम्बिनेशन 10. कार्टून 10 अर्थात दनदनाता गोल का सम्‍बन्‍ध अभिनेता जॉन अब्राहम से जुडा हैं क्‍योंकि 'दन दनादन गोल' जॉन अब्राहम अभिनीत फिल्‍म का नाम हैं



पिछली पहेली के विजेता


'सिने पहेली' प्रतियोगिता के इस नये सेगमेण्ट में दुर्भाग्यवश किसी भी नये खिलाड़ी का आगमन नहीं हुआ, और उन्ही चार खिलाड़ियों ने ही भाग लिया जो पिछले सेगमेण्ट में नियमित रूप से भाग ले रहे थे। अर्थात्‍ प्रकाश गोविन्द, विजय कुमार व्यास, पंकज मुकेश और चन्द्रकान्त दीक्षित। इस बार सबसे पहले सभी प्रश्नों के सही जवाब देकर 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। बहुत बहुत बधाई विजय जी, आपको। अन्य तीन खिलाड़ियों ने भी शत प्रतिशत सही उतार भेजे हैं। इस तरह से इस नये सेगमेण्ट का स्कोर कार्ड कुछ इस तरह का बना...





नये पाठकों की जानकारी के लिए महाविजेता स्कोर-कार्ड पर भी एक नज़र डाल लेते हैं।






इस सेगमेण्ट की समाप्ति पर जिन पाँच प्रतियोगियों के 'महाविजेता स्कोर कार्ड' पर सबसे ज़्यादा अंक होंगे, वो ही पाँच खिलाड़ी केवल खेलेंगे 'सिने पहेली' का महामुकाबला और इसी महामुकाबले से निर्धारित होगा 'सिने पहेली महाविजेता'। 

और अब एक ज़रूरी सूचना:


'महाविजेता स्कोर कार्ड' में नाम दर्ज होने वाले खिलाड़ियों में से कौछ खिलाड़ी ऐसे हैं जो इस खेल को छोड़ चुके हैं, जैसे कि गौतम केवलिया, रीतेश खरे, सलमन ख़ान, और महेश बसन्तनी। आप चारों से निवेदन है (आपको हम ईमेल से भी सूचित कर रहे हैं) कि आप इस प्रतियोगिता में वापस आकर महाविजेता बनने की जंग में शामिल हो जायें। इस सेगमेण्ट के अन्तिम कड़ी तक अगर आप वापस प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुए तो महाविजेता स्कोर कार्ड से आपके नाम और अर्जित अंख निरस्त कर दिये जायेंगे और अन्य प्रतियोगियों को मौका दे दिया जायेगा।


तो आज बस इतना ही, नये साल में फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, अनुमति चाहूँगा, आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

रविवार, 15 दिसंबर 2013

विविध रागों में निबद्ध मीरा का एक भक्तिपद


स्वरगोष्ठी – 146 में आज

रागों में भक्तिरस – 14

‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम कुछ बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। आज हम आपको भक्त कवयित्री मीराबाई का एक भजन प्रस्तुत करेंगे जिसे अलग-अलग गायिकाओं के स्वरों में और विभिन्न रागों में पिरोया गया है। हम आपको मीरा का यह कृष्णभक्ति से परिपूर्ण पद क्रमशः गायिका वाणी जयराम, लता मंगेशकर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में सुनवाएँगे। एक ही भजन को चार अलग-अलग आवाज़ों और धुनों में सुन कर आपको भजन की भावभिव्यक्ति और रस की ग्राह्यता में अन्तर करने का अवसर भी मिलेगा।   



भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा रही है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। परन्तु भक्तिरस की धारा जो वैदिक युग में समाहित हुई, वह अविच्छिन्न रूप से आज भी जारी है। आज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। 15वीं और 16वीं शताब्दी में संगीत के विकास में भक्त कवियों का भरपूर योगदान था। इस काल में सूरदास, मीराबाई, गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, पुण्डरीक विट्ठल आदि ऐसे भक्तकवि हुए जिन्होने भक्तिकाल में साहित्य के साथ-साथ संगीत को भी प्रतिष्ठित किया। इनका प्रभाव आज भी साहित्य और संगीत के क्षेत्र में कायम है। इनमें से आज हम भक्त कवयित्री मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। मीरा का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्ति धारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमे आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। इस पद के चार संस्करण हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले प्रस्तुत है, गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। राग तोड़ी की चर्चा से पहले आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा 



अभी आपने मीरा के इस पद की रसानुभूति राग तोड़ी के स्वरों में किया। अब थोड़ी चर्चा राग तोड़ी के विषय में कर ली जाए। राग तोड़ी इसी नाम के थाट तोड़ी से सम्बन्धित माना जाता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके साथ मध्यम स्वर तीव्र और निषाद स्वर शुद्ध प्रयोग होता है। इसके आरोह और अवरोह, दोनों में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार है। राग तोड़ी के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। करुण और भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए यह उपयुक्त राग है।
आइए, मीरा का यही पद अब एक भिन्न रूप में सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया था। राग भीमपलासी काफी थाट से सम्बन्धित है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण भी सुनिए।


राग भीमपलासी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म नौबहार



मीरा के इसी पद का तीसरा संस्करण 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘जोगन’ में प्रयोग किया गया था। फिल्म में इस भक्तिपद का उपयोग काफी द्रुत लय में कीर्तन शैली में किया गया है। फिल्म के मुख्य कलाकार दिलीप कुमार, नरगिस, प्रतिमा देवी, पूर्णिमा, तबस्सुम आदि थे। अभिनेता राजेन्द्र कुमार की यह पहली फिल्म थी। भजन के इस संस्करण को सुनते समय कई रागों की झलक मिलती है। स्थायी में राग सिन्दूरा तो अन्तरे में राग झिंझोटी के दर्शन भी होते हैं। सामान्य रूप से इस गीत को राग मिश्र झिंझोटी पर आधारित कहा जा सकता है। फिल्म ‘जोगन’ में शामिल मीरा के इस पद को बुलो सी. रानी ने संगीतबद्ध किया था और गायिका गीता दत्त ने स्वर दिया था। इस प्रस्तुति के बाद इसी पद का चौथा स्वरूप भी आप सुनेगे। यह एक गैर फिल्मी संस्करण है, जिसे गायिका सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया है। मीरा के पारम्परिक अन्तरों के साथ इसे कृपशंकर तिवारी ने स्वरबद्ध किया है। इस प्रस्तुति में राग जोग की स्पष्ट झलक मिलती है। भारतीय संगीत का राग जोग भक्तिरस के साथ वैराग्य भाव का सृजन भी करता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग नट इसके समतुल्य राग होता है। सम्पूर्ण जाति का यह राग पूर्वांग प्रधान होता है। आरोह में केवल शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध और कोमल, दोनों गान्धार का प्रयोग किया जाता है। राग जोग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय माना जाता है। सुमन कल्याणपुर की इस प्रस्तुति में आपको मीरा के इसी पद में एक अन्य भाव का सृजन भी परिलक्षित होगा। आप मीरा के एक ही पद के इन संस्करणों की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र झिंझोटी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : गीता दत्त : फिल्म जोगन




राग जोग : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : सुमन कल्याणपुर : गैर फिल्मी भजन





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना के स्वरों को ध्यान से सुनिए और हमे गायिका का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 144वीं कड़ी में हमने आपको विदुषी कला रामनाथ के वायलिन वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी के साथ-साथ हमारे एक नए पाठक/श्रोता चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको राग तोड़ी, भीमपलासी, मिश्र झिंझोटी और जोग पर आधारित मीराबाई के एक पद का रसास्वादन कराया। आगामी अंक में आप मीरा के ही एक अन्य पद की अलग-अलग स्वरों में की गई प्रस्तुति का रसास्वादन कर सकेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की पन्द्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

'सिने पहेली' का अन्तिम सेगमेण्ट शुरू हो रहा है आज; सेगमेण्ट विनर बन कर कोई भी नया खिलाडी अब भी पहुँच सकता है महाविजेता बनने के महामुकाबले में...

सिने पहेली –91 & 92

'सिने पहेली' के सभी प्रतियोगियों औ़र पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, हमें खेद है कि पिछले सप्ताह 'सिने पहेली' पोस्ट न हो सका। और हमें यह पता है कि आप सब बेसबरी से नवे सेगमेण्ट के विजेताओं के नाम जानने के लिए व्याकुल रहे होंगे। चलिए प्रतीक्षा की घड़ी समाप्त हुई और ये रहे सेगमेण्ट विजेताओं के नाम...


प्रथम स्थान: विजय कुमार व्यास (बीकानेर) - 100%

द्वितीय स्थान: प्रकाश गोविंद (लखनऊ) - 99%

तृतीय स्थान: पंकज मुकेश (बेंगलुरू) - 78%


आप तीनों को बहुत बहुत बधाई!!! साथ ही चन्द्रकान्त दीक्षित जी का भी बहुत बहुत धन्यवाद जिन्होने इस सेगमेण्ट के हर एपिसोड की पहेली में भाग लिया और अच्छा प्रदर्शन किया। यह रहा इस सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर-कार्ड...





नौ सेगमेण्ट की समाप्ति पर महाविजेता स्कोर-कार्ड की स्थिति कुछ इस तरह की बनी है, आइए एक नज़र डाल लें...




अरे हाँ दोस्तों, मैं विजेताओं के नाम घोषित करने की ख़ुशी में मैं तो पिछली पहेली के सही जवाब बताना ही भूल बैठा। ये रहे पिछले सप्ताह के सवालों के जवाब...



पिछली पहेली का हल


1. "जय जय शिव शंकर" (आपकी कसम) गीत के अन्त में किशोर कुमार गाते हैं "बजाओ रे बजाओ इमानदारी से बजाओ, पचास हज़ार खर्चा कर दिये"। पूरा वाक्या बहुत जल्द 'एक गीत सौ कहानियाँ' में आप जान पायेंगे।

2. "इन्हीं लोगों ने ले ली ना दुपट्टा मेरा" की धुन से प्रेरित गीत है "तू है सनम मेरा प्यार ओए मेरा दिल तेरा आशिक़" (दिल तेरा आशिक़)।

3. "कभी अजनबी थे ज़मीं आसमाँ ये" (कभी अजनबी थे)



आज की पहेली : कार्टून क्वीज़


दोस्तों, आज से शुरू हो रहा है 'सिने पहेली' प्रतियोगिता का अन्तिम सेगमेण्ट। जी हाँ, हम अब इस लम्बे सफ़र के आख़िरी हिस्से में पहुँच चुके हैं। इन बचे हुए दस पहेलियों को जी भर कर जी लीजिये, क्या पता 'सिने पहेली' का यह सफ़र फिर कभी हो न हो! नये प्रतियोगियों के लिए अब भी महाविजेता बन पाना असंभव नहीं, क्योंकि अगर कोई नया खिलाड़ी इस सेगमेण्ट का विजेता बनता है और उसे 3 अंक मिलते हैं, तो हो सकता है कि वो महाविजेता बनने के महामुकाबले के लिए क्वालिफ़ाई कर ले। तो फिर देर किस बात की? जुट जाइये, जी तोड़ मेहनत कीजिये, और महाविजेता का ख़िताब अपने नाम कर लीजिये!

दोस्तों, क्योंकि पिछले सप्ताह 'सिने पहेली' पोस्ट नहीं हो पाया था, इसलिये आज की कड़ी में हम 10 के बजाय 20 अंकों के सवाल पूछ रहे हैं। अर्थात्‍, आज 'सिने पहेली' का 91 और 92 वाँ अंक एक साथ प्रस्तुत हो रहा है। ध्यान से खेलियेगा।

सवाल बड़ा आसान है। नीचे दिये हुए तस्वीर में 10 कार्टून दिखाये गये हैं और उसके ठीक नीचे 10 अभिनेताओं के चेहरे दिखाये गये हैं। आपको इन दस कार्टूनों को इन दस अभिनेताओं के साथ जोड़ना है। यानी कि कौन से कार्टून को किस अभिनेता के साथ जोड़ा जा सकता है और कैसे, यही है आज की पहेली। एक कार्टून के लिए एक अभिनेता, कोई दोहराव नहीं; यानी आपको 10 यूनिक कम्बिनेशन बनाने हैं।

हर सही जवाब के 2 अंक, यानी आज की पहेली के कुल अंक हैं 20.







अपने जवाब आप हमें cine.paheli@yahoo.com पर अगले पाँच दिनों के अन्दर (19 दिसंबर शाम 5 बजे तक) ज़रूर भेज दीजिये।


कौन बनेगा 'सिने पहेली' महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स। 

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जोड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेता के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। 

4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।



तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, अनुमति चाहूँगा, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

रविवार, 8 दिसंबर 2013

राग जोगिया में भक्तिरस


  

स्वरगोष्ठी – 145 में आज

रागों में भक्तिरस – 13 

‘हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग जोगिया में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का राग जोगिया पर आधारित एक शिव-स्तुति और इसके बाद विदुषी कला रामनाथ का वायलिन पर बजाया राग जोगिया प्रस्तुत करेंगे। अन्त में इसी राग पर आधारित कन्नड के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और सन्त पुरन्दर दास की भक्ति रचना नचिकेता शर्मा के स्वरों में आप सुनेगे।
  


महेन्द्र कपूर 
कमाल बारोट 
भारतीय संगीत में भक्तिरस की धारा का अजस्र प्रवाह वैदिककाल से ही होता आया है। ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी के बीच अनेक सन्त कवियों और संगीतकारों ने इस परम्परा को पुष्ट किया है। आज के इस अंक में हम आपको कन्नड के सुप्रसिद्ध सन्तकवि और संगीतकार सन्त पुरन्दर दास की एक भक्तिरचना सुनवाने के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी देंगे। परन्तु उससे पहले भारतीय संगीत के एक भक्तिरस प्रधान राग जोगिया की चर्चा करेंगे। भक्तिरस के वैराग्य भाव को उभारने में राग जोगिया एक आदर्श राग है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है।

राग जोगिया पर आधारित एक बेहद आकर्षक शिव वन्दना का उपयोग फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में किया गया था। 1962 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग जोगिया के स्वरों का आधार लेकर यह वन्दना गीत स्वरबद्ध किया था। इसे पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर और गायिका कमल बारोट ने स्वर दिया है। पहले प्रस्तुत है, यही शिव-वन्दना।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर शम्भो...’ : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन : महेन्द्र कपूर और कमल बारोट



कला रामनाथ 
नचिकेता शर्मा 
राग जोगिया भक्तिरस के आध्यात्मिक और वैराग्य भाव की अनुभूति कराने में सक्षम है। राग के इस भाव की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको दो रचनाएँ सुनवाते हैं। पहले आप सुनेगे वायलिन पर राग जोगिया में निबद्ध एक भावपूर्ण रचना, जिसे प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी कला रामनाथ। आज की इस कड़ी के अन्त में आप कन्नड का एक भक्तिगीत भी सुनेगे जिसे युवा गायक नचिकेता शर्मा प्रस्तुत कर रहे हैं। राग जोगिया के स्वरों पिरोया यह भजन सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास की रचना है। कर्नाटक संगीत पद्यति के शीर्षस्थ संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास का जन्म कर्नाटक राज्य के शिवमोगा जनपद में स्थित क्षेमपुर नामक स्थान में एक सम्पन्न रत्न-व्यवसायी वरदप्पा नायक के घर 1484 ई. में हुआ था। बचपन में माता-पिता ने इनका नाम श्रीनिवास नायक रखा था। उन्होने कन्नड, संस्कृत भाषा और संगीत शास्त्र का गहन अध्ययन किया था। कर्नाटक संगीत पद्यति में उनकी असंख्य कृतियाँ और भगवान विट्ठल के प्रति समर्पित भजन भारतीय संगीत की अनमोल धरोहर हैं। इस अंक में गायक नचिकेता शर्मा के स्वरों में प्रस्तुत किये जा रहे कन्नड भाषा के इस भजन के गायन में तबला-संगति रवि गुटाला ने और हारमोनियम-संगति विवेक दातार ने की है। आप पहले वायलिन पर राग जोगिया फिर इसी राग में पिरोया सन्त पुरन्दर दास का भजन सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : वायलिन वादन : विदुषी कला रामनाथ




राग जोगिया : सन्त पुरन्दर दास रचित भक्तिपद : नचिकेता शर्मा




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हम आपको एक गीत का आरम्भिक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में ताल के मात्राओं की संख्या कितनी है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 147वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 143वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की एक जुगलबन्दी रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे राग जोगिया में भक्तिरस के तत्त्व विषयक चर्चा की। अगले अंक में आप एक ऐसी भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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