Saturday, December 31, 2016

अलविदा 2016 - ’वर्षान्त विशेष’ में 2016 के फ़िल्म-संगीत का अन्तिम भाग

वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला

2016 का फ़िल्म-संगीत  
भाग-5




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, देखते ही देखते हम वर्ष 2016 के अन्तिम महीने पर आ गए हैं। कौन कौन सी फ़िल्में बनीं इस साल? उन सभी फ़िल्मों का गीत-संगीत कैसा रहा? ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में अगर आपने इस साल के गीतों को ठीक से सुन नहीं सके या उनके बारे में सोच-विचार करने का समय नहीं निकाल सके, तो कोई बात नहीं। हम इन दिनों हर शनिवार आपके लिए लेकर आ रहे हैं वर्ष 2016 में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। पिछले सप्ताह तक हम इस श्रृंखला में जनवरी से लेकर सितंबर तक का सफ़र तय कर चुके हैं। और आज हम आ पहुँचे हैं अपनी मंज़िल पर। तो आइए आज इसकी पाँचवीं और अन्तिम कड़ी में चर्चा करें उन फ़िल्मों के गीतों की जो प्रदर्शित हुए अक्टुबर, नवंबर और दिसंबर के महीनों में।



गुलज़ार और शंकर-अहसान-लॉय जब किसी फ़िल्म में साथ में काम करते हैं तो जादू तो चल ही
जाता है। 7 अक्टुबर को प्रदर्शित फ़िल्म ’मिर्ज़्या’ में भी वही जादू एक बार फिर से चला। मिर्ज़ा और साहिबाँ की अमर और मार्मिक प्रेम कहानी को समर्पित इस फ़िल्म में गुलज़ार और शंकर-अहसान-लॉय ने इस बात का ध्यान रखा कि फ़िल्म का गीत-संगीत स्थान-काल-पात्र के अनुरूप हो। ऐल्बम शुरु होता है शीर्षक गीत से जिसे गाया है दलेर मेहन्दी, सैन ज़हूर, अख़्तर चनल और नूरन सिस्टर्स ने। सैन ज़हूर पाकिस्तानी सूफ़ी गायक हैं तो अख़्तर चनल बलोची लोक गायिका हैं। और नूरन सिस्टर्स के बारे में तो हम जानते ही हैं कि वो जलन्धर की सूफ़ी गायिका बहने हैं। यह गीत प्यार का उत्सव है बोल और संगीत दोनों के लिहाज़ से। मुखड़े के बोल "सब मिलता है दुनिया भर को, आशिक़ को सब कब मिलता है..." में नयापन है। गीत की धुन आदिवासी तालों पर आधारित है जिसमें ढोलक, बाँसुरी और पुंगी का प्रयोग किया गया है जबकि शुरुआती संगीत में सैन की देहाती आवाज़ इस गीत को एक लोक-शैली प्रदान करती है। "तीन गवाह हैं इश्क़ के" ऐल्बम का दूसरा गीत है जो एक मेलडी-प्रधान कर्णप्रिय गीत है जिसमें गीटार और पार्श्व में कोरस गायन का प्रयोग हुआ है। यह गीत भी सैन की आवाज़ से शुरु होता है पर इसे आप लोक-आधारित गीत समझने की ग़लती ना करें। जल्द ही सिद्धार्थ महादेवन की आवाज़ इस गीत को एक आधुनिक गीत का रूप दे देती है। तेज़ी से सफलता की सीढ़ी चढ़ने वाले युवा सिद्धार्थ, जो कि ऊँची पट्टी के गीतों के लिए जाने जाते हैं, इस गीत में अपनी प्रतिभा का एक और नमूना दिखाते हुए इस रोमान्टिम कथागीत को ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और गुलज़ार साहब के बोलों के तो कहने ही क्या "तीन गवाह हैं इश्क़ के, एक रब, एक तू और एक मैं"। अगला गीत है "चकोरा" जिसे लोक गायक मामे ख़ान, हिन्दुस्तानी गायन शैली की गायिका सुचिस्मिता दास और अख़्तर चनल ने गाया है। गीत ट्रान्स जैसी सुर से शुरु होकर एक रफ़्तार भरे लोक गीत का रूप ले लेता है। लेकिन इसमें ईलेक्ट्रॉनिक बीट्स भी फैला पड़ा है। शंकर महादेवन और मामे ख़ान का गाया "आवे रे हिचकी" की शुरुआत सारंगी की तानों से होती है। इस स्लो ट्रैक में गीटार और बेस का मिश्रण एक सुखद अनुभव है कानों के लिए। नूरन बहनों की आवाज़ों द्वारा शुरु होने वाला "होता है" तो जैसे हमें तुरन्त आकर्षित कर लेता है। आगे सैन, अख़्तर और दलेर इस गीत को गाते हैं पूरे जोश और उत्साह के साथ जिसकी इस गीत को ज़रूरत है। नूरन सिस्टर्स और के. मोहन का गाया "एक नदी थी" भी एक सुन्दर रचना है जिसमें तौफ़िक़ क़ुरेशी का परक्युशन है। मोहन की नर्मोनाज़ुक आवाज़, बेस अंडरटोन्स की तेज़ धार और साथ में नूरन सिस्टर्स की ऊँची पट्टी पर गायन, कुल मिला कर एक अद्भुत वैषम्य की रचना हुई है। उस पर गीटार के इन्टरल्युड्स गीत को एक पाश्चात्य रूप प्रदान करती है। गीत के बोल नदी के दोनों तरफ़ की ज़िन्दगी की बात बताता है जो एक तरह से रूपक है और गुलज़ार साहब तो रूपक के लिए मशहूर हैं। शंकर और मामे की आवाज़ों में "डोली रे डोली" में तो जैज़ जैसी अपील है, और क्यों ना हो जब बेस, मेलोडिका, ट्रम्पेट और ड्रमसेट का ज़बरदस्त ईलेक्ट्रिक मिक्स हो! मशहूर भारतीय शास्त्रीय संगीत गायिका कौशिकी चक्रबर्ती (अजय चक्रबर्ती की पुत्री) का गाया "कागा" उनकी गायन प्रतिभा का उदाहरण है। पार्श्व में बज रहे पाश्चात्य संगीत से यह एक फ़्युज़न गीत बन पड़ा है। अलग अलग शैलियों के संगम से यह ऐल्बम एक नायाब ऐल्बम बन गया है। और अन्त में "मिर्ज़्या थीम - ब्रोकेन ऐरोज़" एक दर्द भरी धुन है जिसमें सारंगी, पियानो और बाँसुरी की ताने हैं जिसमें नायक-नायिका का दर्द छुपा हुआ है। इस थीम के समाप्त हो जाने के बाद भी यह धुन आपके कानों में ही नहीं बल्कि दिल में भी बजती रहती है। ’मिर्ज़्या’ ऐल्बम एक स्तरीय ऐल्बम है और गुलज़ार साहब हर बार की तरह इस बार भी यह सिद्ध करते हैं कि आज के फ़िल्म-संगीत जगत में भी उनसे बेहतर कोई नहीं। शंकर-अहसान-लॉय, जिनका रुझान अधिकतर पाश्चात्य संगीत की तरफ़ रहता है, इस ऐल्बम में उन्होंने अकल्पनीय लोक और पारम्परिक शैलियों के संगीत से अपने गीतों को बांधा है। लोकप्रियता को एक तरफ़ रख कर अगर स्तर की बात करें तो निस्संदेह यह ऐल्बम उनकी श्रेष्ठ कामों में से एक है। अक्टुबर के दूसरे सप्ताह 14 तारीख को रिलीज़ हुई ’बे‍ईमान लव’। रजनीश दुग्गल और सनी लीओन अभिनीत फ़िल्म के गीत-संगीत से बहुत अधिक आशा रखना समझदारी की बात नहीं होगी। कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पहला गीत जो जारी किया गया था, उसके बोल थे "hug me"। गीत कोई कमाल नहीं दिखा पाया। लेकिन आगे चल कर जब बाकी के गीत एक एक कर जारी होने लगे, तब पता चला कि कुछ अच्छा काम भी हुआ है इस ऐल्बम में। आज के प्रचलित धारा के मुताबिक इस फ़िल्म में भी कई गीतकार व संगीतकार हैं। ऐल्बम की शुरुआत होती है "रंग रेज़ा" से जिसे असीस कौर ने गाया है। सनी लीओन पर फ़िल्माये गए गीतों की बात करें तो शायद यह सबसे उम्दा गीत रहा है। संगीतकार असद ख़ान और गीतकार रक़ीब आलम ने इस गीत को एक क्लासी ट्रीटमेन्ट दिया है। भारतीय शास्त्रीय, सूफ़ी और रॉक के फ़्युज़न से सुसज्जित यह गीत इस ऐल्बम का पहला गीत होने का स्तर रखता है। इस गीत का एक पुरुष संस्करण भी है यासिर देसाई की आवाज़ में और यह संस्करण भी उतना ही सुन्दर है। यासिर की आवाज़ एक बार फिर सुनाई देती है "मैं अधूरा" में और इस पॉप ट्रैक को सुनना एक सुखद अनुभव रहा। सुखद क्यों ना हो जब संगीतकार हैं संजीव दर्शन और गीतकार हैं समीर अनजान। इस गीत में क्लास, मेलडी और कामुकता का सही संतुलन है। इस गीत में आकांक्षा शर्मा की भी आवाज़ है यासिर के साथ। अगला गीत है "प्यार दे" जिसे गाया व स्वरबद्ध किया है अंकित तिवारी ने और लिखा है अभ्येन्द्र कुमार उपाध्याय ने। यह भी एक कामुक प्रेमगीत है जो "मैं अधूरा" के ख़त्म हो जाने के बाद भी मूड को बनाए रखता है। अंकित की नर्मोनाज़ुक गायकी ने गीत को सही स्पर्श दिया है। इन तीन रोमान्टिक गीतों के बारे में पढ़ते हुए आप अब तक सोच रहे होंगे कि अब तक सनी लीओन के चाहने वालों के लिए कोई आइटम गीत क्यों नहीं आया! उन वर्ग को ख़ुश करने के लिए फ़िल्म के निर्माता ने एक नहीं दो नहीं बल्कि चार आइटम गीत डलवाए हैं। पहला है "hug me" जिसे यकीनन कनिका कपूर ने गाया है, संगीत है राघव सचर का और गीत है कुमार का। यह एक पंजाबी डान्स नंबर है जिसे श्योर शॉट सक्सेस का आधार कहा जा सकता है। दूसरा गीत है "मर गए" जो अन्य सनी लीओन आइटम नंबर्स से अलग है। मंज म्युज़िक द्वारा स्वरबद्ध और उनके और निन्दी कौर के गाए इस गीत में रफ़्तार रैपिंग् करते हैं और गीत लिखा भी उन्होंने ही है। एक कैची फ़ूट टैपरिंग् नंबर तो है ही, इसका एक अलग पंजाबी संस्करण भी है। कुल मिलाकर अच्छा काम कह सकते हैं। अन्तिम गीत है अमजद-नदीम स्वरबद्ध "मेरे पीछे हिन्दुस्तान" जिसे हम आयाराम-गयाराम कह सकते हैं। समीर अनजान का लिखा यह गीत उन तमाम सनी लीओन वाले गीतों जैसा ही है जो ’एक पहेली लीला’, ’कुछ कुछ लोचा है’, ’वन नाइट स्टैण्ड’ आदि फ़िल्मों में सुनने को मिले हैं। यासिर देसाई और सुकृति कक्कर का गाया यह गीत हम नहीं कहते कि बुरा है, पर यह दिल को छू पाने में असमर्थ हैं। 

28 अक्टुबर को प्रदर्शित हुई ’शिवाय’ जिसे अजय देवगन ने प्रोड्युस किया। अजय ने यह कोशिश की
कि फ़िल्म का गीत-संगीत स्तरीय हो। तभी शायद मिथुन, जसलीन रॉयल, कैलाश खेर, मोहित चौहान, अरिजीत सिंह और सुनिधि चौहान जैसे गायकों को लिया गया। फ़िल्म का शीर्षक गीत "बोलो हर हर" एक हेवी ड्युटी गीत है; संदीप श्रीवास्तव लिखित और मिथुन द्वारा स्वरबद्ध इस गीत की शुरुआत मोहित चौहान के भावपूर्ण आवाज़ से होती है। गीत में श्लोकों का पाठ मेघा श्रीराम करती हैं। एक अरसे के बाद एक कमर्शियल फ़िल्म में भगवान शिव पर कोई गीत सुनने को मिला है जिसमें अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई को दर्शाया गया है। गीत का रैप सेक्शन बादशाह ने सम्भाला है। उस पर गीटार की उठती-गिरती तरंगें गीत को और मनोरम बनाती हैं। इस संजीदे गीत के बाद ऐल्बम में आता है "दरख़्वास्त", जो सईद क़ादरी का लिखा एक नर्म मेलडी-सम्पन्न गीत है। अरिजीत और सुनिधि की आवाज़ें कानों में रस घोलती हैं और हाँ, यह दूसरे रोमान्टिक गीतों से हट कर है। भारी भरकम टेक्नो बीट्स, नर्म गीटार के रिफ़्स और बेस का प्रयोग इस कम्पोज़िशन को ऊँचाई प्रदान करते हैं। तीसरा गीत है "रातें" जो मेलडी-प्रधान है। जसलीन और आदित्य शर्मा की आवाज़ों में यह गीत जसलीन ने ही लिखा है। गीत पिता-पुत्री के रिश्ते पर है जिन्हें परदे पर अजय देवगन और बाल कलाकार एबिगेल ईम्स निभाते हैं। जसलीन की आवाज़ में बच्ची की मासूमीयत इस गीत को ख़ास बनाती है। गीत का एक अन्य संस्करण तुलनात्मक दृष्टि से ज़्यादा गंभीर और संजीदा है। फ़िल्म का अन्तिम गीत है "तेरे नाल इश्क़ा"। यह गीत भी पिता-पुत्री का गीत है जिसे गाया है कैलाश खेर ने। मिथुन और कैलाश ने मिल कर इसकी धुन बनाई है। कैलाश की ऊँची पट्टी पर गाने की अदा ने गीत में जान डाल दी है। सईद क़ादरी के लिखे इस गीत को सुनते हुए आँखें छलक जाती हैं। कुल मिलाकर ’शिवाय’ का ऐल्बम सुननेलायक है। दीवाली रिलीज़ेस में सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म थी ’ऐ दिल है मुश्किल (ADHM)’। यह फ़िल्म भी 28 अक्टुबर को रिलीज़ हुई। चार साल बाद इस फ़िल्म से करण जोहर की निर्देशन में वापसी हुई है। रणबीर कपूर, ऐश्वर्या राय और अनुष्का शर्मा अभिनीत इस बड़े बजट की फ़िल्म पर हर किसी की नज़र टिकी थी। और ख़ास तौर से करण जोहर की फ़िल्मों का गीत-संगीत का पक्ष काफ़ी मज़बूत रहा है, इसलिए लोगों की आशाएँ बहुत अधिक थी। संगीतकार प्रीतम और गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य, जो पहले साथ में कई हिट दे चुके हैं, फिर एक बार एक हिट ऐल्बम देने में कामयाब हुए हैं। ऐल्बम के पहले गीत के रूप में अरिजीत सिंह का गाया शीर्षक गीत है जिसमें पथोस भी है और पैशन भी। अपनी आवाज़ के वेरिएशन का नमूना पेश करते हुए अरिजीत ने एक बार फिर से सिद्ध किया कि आज के दौर के वो अग्रणी गायकों में से एक हैं। अमिताभ ने नायक की भावनाओं को बड़े ही सुन्दर तरीक़े से बाहर निकाला है - "मुझे आज़माती है तेरी कमी, मेरी हर कमी हो है तू लाज़मी... जुनून है मेरा बनूँ मैं तेरे क़ाबिल, तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल"। साज़ों का चयन भी कमाल का है इस गीत में; प्रील्युड में पियानो, उसके बाद क्रम से ट्रम्पेट, चेलो, और वायलिन ने गीत के समूचे मूड को बड़ी ख़ूबसूरती से उभारा है, गीत को निखारा है। ऐल्बम का दूसरा गीत "बुलेया" भी काफ़ी हिट रहा जिसे अमित मिश्रा और शिल्पा राव ने गाया है। सूफ़ी-रॉक शैली के इस गीत के प्रील्युड में गीटार के रिफ़ हमें इस गीत की तरफ़ आकर्षित करता है। मिश्रा, जो कुछ समय पहले "मनमा ईमोशन जागे" और "सौ तरह के" जैसे हिट गीत गाये हैं, इस गीत में भी अपनी देहाती ऊँची पट्टी वाली गायन से एक अनोखा फ़्लेवर डाला है। उनकी आवाज़ ना केवल रणबीर के चरित्र की मान्सिक स्थिति को उजागर किया है बल्कि गीत में एक ऊर्जा भी उत्पन्न किया है। उनकी आवाज़ और शिल्पा की नर्म मीठी आवाज़ ने ग़ज़ब का विरोध उत्पन्न किया है। दिल का टूटना और मन की अस्थिरता ऐल्बम के तीसरे गीत में भी साफ़ झलकती है। अरिजीत की आवाज़ में "चन्ना मेरेया" में भी वही जज़बात, जिसमें नायक अपनी नायिका को किसी और का होते हुए देखता है। इसमें पाश्चात्य साज़ जैसे कि ऐकोस्टिक गीटार, ईलेक्ट्रिक और बेस गीटार को भारतीय साज़ जैसे कि ढोलक, सारंगी और शहनाई के साथ फ़्युज़ किया गया है। अच्छा प्रयोग! अन्तिम गीत है "The Breakup Song" जिसे अरिजीत, बादशाह, जोनिता गांधी और नकश अज़ीज़ ने गाया है। गीत के बोल पर मत जाइए, ब्रेक-अप के बावजूद यह एक मज़ेदार नृत्य-प्रधान गीत है जिसमें बादशाह रैपिंग् करते हैं और अरिजीत अपनी दर्द भरी आवाज़ से बाहर निकल कर ऐसी मस्ती करते हैं कि निस्सन्देह इस गीत को आज के युवा ब्रेक अप होने के बाद अपने दोस्तों के साथ मिल कर गायेंगे। ’ADHM' का गीत-संगीत फ़िल्म की कहानी के अनुरूप है और इस साल के शीर्ष के पायदानों पर रहने वाले गीतों में है। 

नवंबर के दूसरे सप्ताह में दो उल्लेखनीय फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। पहली फ़िल्म है ’इश्क़ जुनून’। इस
फ़िल्म के प्रदर्शित होने के कई महीने पहले से ही इसे लेकर हलचल शुरु हो चुकी थी क्योंकि फ़िल्म के प्रोमो में "थ्रीसम लव" कहा गया था जो कि अपने आप में बहुत बोल्ड जुमला है। उपर से फ़िल्म के पोस्टरों ने भी काफ़ी विवाद खड़ा कर दिया था। भले यह एक बी-ग्रेड फ़िल्म साबित हुई पर फ़िल्म के गाने ठीक-ठाक थे। पहला गीत यू-ट्युब पर रिलीज़ हुआ "कभी यूं भी" जिसे गाया व स्वरबद्ध किया नवोदित गायक-संगीतकार वरदान सिंह ने। गीत लिखा अज़ीम शिराज़ी ने। बेडरूम सॉंग्स की श्रेणी में यह गीत अच्छा बना है पर कोई नई बात नहीं है इसमें। पर इस गीत को काफ़ी सकारात्मक टिप्पणियाँ मिली हैं यू-ट्युब पर। फ़िल्म का दूसरा गीत है "सिर्फ़ तू" मोहित चौहान की आवाज़ में। अंजन भट्टाचार्य के संगीत में इसे लिखा है संजीव चतुर्वेदी ने। गीत के शुरु में गीटार के आकर्षणीय पीस से गीत की तरफ़ आकर्षण बन जाता है। यह गीत भी पहले गीत ही की तरह कमाल दिखाने में असमर्थ है। तीसरे गीत के रूप में रेखा भारद्वाज का गाया "रे नसीबा" हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। संजीव-दर्शन की बनाई धुन पर वायलिन के इन्टरल्युड्स और भारतीय व पाश्चात्य साज़ों के तालमेल से गीत सुन्दर बन पड़ा है। संजीव चतुर्वेदी का ही लिखा फ़िल्म का शीर्षक गीत अरिजीत सिंह की आवाज़ में है जिसे जीत गांगुली ने कम्पोज़ किया है। गीत तुलनात्मक दृष्टि से काफ़ी अच्छा है पर इस गीत को ज़्यादा बढ़ावा नहीं दिया गया। इस फ़िल्म में भी अंकित तिवारी द्वारा स्वरबद्ध एक गीत है "तू मेरा रब है" जिसे अंकित ने स्कृति कक्कर के साथ मिल कर गाया है। सॉफ़्ट रोमान्टिक गीतों की श्रेणी में यह गीत अच्छा कम्पोज़ हुआ है पर बोलों में कोई नहीं बात नज़र नहीं आई। कुल मिलाकर ”इश्क़ जुनून’ एक ऐवरेज ऐल्बम है जिसे ना अच्छा ना बुरा कहा जा सकता है। और 11 नवंबर को रिलीज़ होने वाली दूसरी फ़िल्म थी ’रॉक ऑन 2’। आठ साल पहले जब ’रॉक ऑन’ रिलीज़ हुई थी तब श्रोताओं और समीक्षकों ने इसके गीत-संगीत को ख़ूब सराहा था। और क्यों ना हो जब रॉक म्युज़िक पर बनने वाली यह पहली हिन्दी फ़िल्म थी! शंकर-अहसान-लॉय ने जो कमाल उस फ़िल्म में दिखाया था, उसका 10% भी ’रॉक ऑन 2’ में नहीं दिखा सके। ऐल्बम की शुरुआत "जागो" से होती है जिसे फ़रहान अख़्तर और सिद्धार्थ महादेवन ने गाया है पर यह गीत श्रोताओं को न जगा सका। दूसरे गीत "उड़ जा रे" में श्रद्धा कपूर ने अपनी गायन प्रतिभा का लोहा मनवाया है। पूरे गीत में उन्होंने जो अपनी आवाज़ का वेरिएशन किया है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। पार्श्व में आलाप इस रॉक आधारित गीत में भारतीयता का संचार करता है। तीसरा गीत है "Yoy know what I mean" एक ऐवरेज गीत है। ’रॉक ऑन’ के "पिछले सात दिनों में" गीत के आधार पर बना यह गीत फ़रहान की आवाज़ में कई जगहों पर बेसुरा लगा, और बोल और संगीत के लिहाज़ से भी यह गीत कोई कमाल नहीं दिखा सका। "मंज़र आया" में भी वही फ़रहान की आवाज़; ख़ुद ऐक्टर-प्रोड्युसर होने का यही फ़ायदा है कि आप अपनी आवाज़ में गीत गा सकते हैं भले आपको गाना आता हो या नहीं। श्रद्धा की आवाज़ में "तेरे मेरे दिल" सुरीला है और पार्श्व में सरोद बेहद सुन्दर सुनाई देता है, पर गीत में दम नहीं है। फ़रहान और श्रद्धा का गाया "वो जहाँ" बेहतर है जिसमें एक ऐसे जहाँ की कल्पना की गई है जहाँ कोई ग़म नहीं है। अच्छा ऑरकेस्ट्रेशन है, दर्शन दोषी ड्रम्स पर हैं तो सौमिक दत्त सरोद पर और शेल्डन डी’सिल्वा बेस पर। उषा उथुप की आवाज़ में "चलो चलो" कमाल का गीत है जिसमें उत्तर-पूर्व के खासी जनजाती के बोलों के साथ हिन्दी के बोलों का सुन्दर तालमेल है। उषा उथुप एक बार साबित करती हैं कि उनका कोई जोड़ नहीं। किट शांगप्लियांग् और पिनसुक्लिन सीयेमियोंग् ने उषा उथुप को अच्छा कॉमप्लीमेन्ट किया है खासी बोलों के ज़रिए। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "इश्क़ मस्ताना" जिसमें सूफ़ी रंग है और इस रॉक ऐल्बम के लिए ’odd man out' है। ढोल, ढोलक, तबला, गीटार से कम्पोज़िशन दिलचस्प बना है और दिग्विजय सिंह परियार की आवाज़ शंकर महादेवन की आवाज़ पर पूरी तरह से हावी हो जाती है। कुल मिला कर ’रॉक ऑन 2' का संगीत ’रॉक ऑन’ की तरह कामयाब नहीं। 18 नवंबर को प्रदर्शित ’फ़ोर्स 2’ भी एक सीकुइल फ़िल्म है। गौरव - रोशिन के संगीत में इस फ़िल्म के गाने तेज़ रफ़्तार के हैं। ऐक्शन फ़िल्म होने की वजह से इसमें केवल चार ही गीत हैं। देव नेगी और अदिति सिंह शर्मा के गाये "रंग लाल" से ऐल्बम की शुरुआत होती है जिस पर जॉन एब्रहम का वॉयस ओवर है। एक सीमा के बाद उनकी आवाज़ कानों को खटकती है। अन्तराल संगीत में गीटार का प्रयोग सुन्दर है पर रैप का जो प्रयोग हुआ है उससे गीत को कोई मदद नहीं मिली है। हालाँकि इस गीत का उद्देश्य नेक है, यह हमारे उन सैनिकों को समर्पित है जो शहीद होने के बावजूद चर्चा में नहीं आए, पर यह गीत इस प्रयास में नाकाम रहा है। दूसरा गीत है नेहा कक्कर की आवाज़ में "ओ जानिया" जो दरसल ’मिस्टर इण्डिया’ के हिट गीत "काटे नहीं कटते दिन ये रात" गीत का रीमिक्स वर्ज़न है। गौरव - रोशिन ने इसे एक आधुनिक रंग देने की कोशिश की है जिसमें वो कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। "इशारा" अरमान मलिक की आवाज़ में है जो एक नर्म रोमान्टिक गीत है और इस ऐल्बम का भी एकमात्र रोमान्टिक गीत है। पर ना तो कम्पोज़िशन, ना ही रश्मि विराग के बोल, और ना ही अरमान की गायकी बहुत देर तक हमें इस गीत की तरफ़ खींचे रखता है। अन्तिम गीत है "Catch me if you can" जिसे अमाल मलिक ने गाया है। अत्यधिक टेक्नो बीट्स की वजह से गीत दब कर रह गया है। कुमार के बोल भी जैसे सुनाई ही नहीं देते। कुल मिला कर ’फ़ोर्स 2’ का गीत-संगीत बहुत ही साधारण है।

सीकुइल फ़िल्मों की लड़ी को आगे बढाते हुए 18 नवंबर को प्रदर्शित हुई ’तुम बिन 2’। अनुभव सिन्हा
की 2001 की ’तुम बिन’ की अपार सफलता के बाद इस सीकुइल से भी काफ़ी उम्मीदें थीं। सिर्फ़ फ़िल्म से ही नहीं बल्कि इसके गीतों से भी। निखिल-विनय के संगीत में ’तुम बिन’ के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। लेकिन ’तुम बिन 2’ के संगीतकार अंकित तिवारी कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सके। ऐल्बम का पहला गीत है "तेरी फ़रियाद" जो मूल फ़िल्म के "कोई फ़रियाद" गीत का ही नया संस्करण है। मूल रचना जगजीत सिंह की आवाज़ में था, नया संस्करण रेखा भारद्वाज की आवाज़ में है। हालाँकि यह गीत भी सुन्दर है, पर मूल गीत के टक्कर का नहीं। अरिजीत सिंह का गाया "इश्क़ मुबारक़" ऐल्बम का दूसरा गीत है जिसे मनोज मुन्तशिर ने लिखा है जो हमें "दीवाना कर रहा है" की याद दिला जाती है। अरिजीत सिंह के साथ तुलसी कुमार आवाज़ मिलाती है "देख लेना" में। इस तरह के गाने ढेर सारे बन चुके हैं, पर व्यावसायिक सफलता की दृष्टि से यह गीत श्योर शॉट है। चित्रा की आवाज़ में मूल फ़िल्म का शीर्षक गीत "तुम बिन जिया जाये कैसे" की क्या बात थी! इस बार अंकित तिवारी ने अपनी आवाज़ से इस गीत को नवाज़ा; भले मूल गीत वाली बात न हो पर अंकित ने भी गीत को अच्छा ही निभाया है। "मस्ता" एक पेप्पी नंबर है जिसे विशाल ददलानी और नीति मोहन ने गाया है। हालांकि ऐल्बम के अन्य गीतों से हट कर है यह गीत, विशाल और नीति ने इस गीत को ऊर्जा से भर दिया है। अर्को, जिनकी हाल में "दरिया" (बार बार देखो) अन्द "साथी रे" (कपूर ऐण्ड सन्स) जैसे हिट गीत आए हैं, एक बार फिर एक ताज़े हवा के झोंके की तरह इस ऐल्बम में लेकर आए हैं "दिल नवाज़ियाँ"। लेकिन अफ़सोस कि यह गीत उनके पहले की रचनाओं जैसी उत्कृष्ट नहीं है। "जिगर बॉम्ब" एक पार्टी नंबर है जिसे डीजे ब्रावो, अंकित तिवारी और हर्शद मद ने गाया है। पार्टी क्लब नंबर के लिहाज़ से सही गीत है और डीजे ब्रावो की हाल की फ़ैन फ़ोलोइंग् को देख कर इस गीत के ख़ूब चलने की संभावना है। कुल मिला कर ’तुम बिन 2’ का ऐल्बम वह कमाल नहीं दिखा सकी जो कमाल ’तुम बिन’ ने दिखाया था। 25 नवंबर को ’इंगलिश-विंगलिश’ से अपनी निर्देशन के पारी की शुरुआत करने वाली गौरी शिन्डे की अगली फ़िल्म ’डिअर ज़िन्दगी’ के गीत-संगीत से भी लोगों की काफ़ी उम्मीदें थीं। लेकिन इस फ़िल्म में संगीतकार अमित त्रिवेदी के होने के बावजूद इसके गीतों की ज़्यादा उम्र नहीं लगती। जसलीन रॉयल के गाए "लव यू ज़िन्दगी" से ऐल्बम शुरु होता है जिसमें वो अपनी परिचित मासूमियत भरी आवाज़ में ज़िन्दगी को गले लगाने की सलाह देती है। गीटार और मैन्डोलिन के प्रयोग के बावजूद अरिजीत सिंह का गाया "तू ही है" अपनी अलग पहचान बना पाने में असमर्थ है। इसके बाद आता है "तारीफ़ों से" जो एक जैज़ नंबर है और जिस पर वाल्ट्ज़ नृत्य के रूप में झूमा जा सकता है। विशाल ददलानी की आवाज़ में "lets break up" आज के दौर के रिश्तों की बात बताता है। यह एक डिस्को नंबर है जिसमें बेस गीटार, की-बोर्ड और ड्रम्स का प्रयोग हुआ है। पर अफ़सोस कि इस गीत पर इससे अधिक कुछ लिखने को नहीं है। "Just go to hell dil" एक टूटे दिल की पुकार है, पर इस तरह के भाव के पहले के गीतों से बिल्कुल अलग हट के है। सुनिधि चौहान की दर्द भरी अंदाज़ में यह गीत सुन्दर बन पड़ा है। वायलिन की तानों ने इसमें छुपे दर्द को और ज़्यादा गहराया है। किसी को ब्रेक-अप के बाद यह गीत उसके दिल को ज़रूर छू जाएगा। "लव यू ज़िन्दगी" का क्लब मिक्स अमित त्रिवेदी और आलिया भट्ट की आवाज़ों में है; आलिया ने इसमें अपनी शरारतें भरी हैं। और अन्त में इस ऐल्बम की ख़ास प्रस्तुति है इलैयाराजा के मशहूर गीत "ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले" का नया संस्करण जिसे अमित त्रिवेदी ने रॉक एन रोल शैली में बाँध कर अरिजीत सिंह की आवाज़ में पेश किया है। इसी का आलिया की आवाज़ में भी एक संस्करण है। अरिजीत वाला संस्करण भले मूल गीत जैसा सुन्दर नहीं है, लेकिन फिर भी सुना जा सकता है; पर आलिया वाला संस्करण तो ना ही सुने तो बेहतर होगा।

और अब हम प्रवेश करते हैं वर्ष 2016 के अन्तिम महीने दिसंबर में। 2 दिसंबर को प्रदर्शित हुई थी एक
और सीकुइल फ़िल्म ’कहानी 2’। फ़िल्म के संगीतकार हैं क्लिन्टन सेरेजो। मूल फ़िल्म की तरह इस में भी ज़्यादा गीत-संगीत की गुंजाइश नहीं थी। अत: इस फ़िल्म में केवल तीन ही गीत हैं। पहला गीत अरिजीत सिंह की आवाज़ में है "मेहरम" जिसे एक ऐकोस्टिक नंबर कहा जा सकता है। भले गीत का संगीत संयोजन आकर्षक है, पर असरदार बोलों के ना होने से गीत अपनी ओर आकर्षित नहीं करता। गीत की सबसे अच्छी बात है इसमें गीटार का प्रयोग। सुनिधि चौहान के गाए "लम्हों के रसगुल्ले" में भी कोई मिठास नहीं है। फ़िल्म के बाहर इसे सुनने का मन भी नहीं होगा कभी। और तीसरा गीत है ऐश किंग् का गाया "और मैं ख़ुश हूँ" जो एक पेप्पी नंबर है। अन्य दो गीतों की तुलना में यह गीत बेहतर है, पर फ़िल्म की कहानी में यह गीत कहाँ स्थान पाएगा यह फ़िल्म देख कर ही पता चलेगी। 9 दिसंबर को प्रदर्शित होने वाली ’बेफ़िकरे’ काफ़ी चर्चा में रही। आदित्य चोपड़ा निर्देशित और रणवीर सिंह व वाणी सिंह अभिनीत इस युवा-केन्द्रित फ़िल्म का गीत-संगीत भी श्रोताओं को यही अहसास कराता है कि यह एक युवा केन्द्रित फ़िल्म है। फ़िल्म के संगीतकार हैं विशाल-शेखर। सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "नशे सी चढ़ गई" एक ऐसा गीत है जिसमें वाक़ई एक नशा है जो गीत के अन्त तक हमें इसके साथ बनाए रखता है। अरिजीत की आवाज़ के साथ विशाल-शेखर ने जो प्रयोग किया है, वह आपको निराश नहीं करेगी। गीत का टेम्पो, मूड और बेस हमें इससे जोड़े रखता है और बार बार सुनने के लिए उत्साहित करता है। अगर आपने इस गीत का अन्तिम हिस्सा सुना हो तो आपको लगेगा कि ऐल्बम का दूसरा गीत "उड़े दिल बेफ़िकरे" वहीं से शुरु होता है जहाँ पहला गीत समाप्त हुआ था। बेनी दयाल की आवाज़ में यह गीत भी आकर्षक है। अपने हेडफ़ोन को ऑन रखिए और आप इस गीत में खो से जायेंगे। जयदीप साहनी के बोल और आकर्षक कोरस गीत को मज़बूत बनाते हैं। गीटार, ड्रम्स, ट्रम्पेट, चेलो और कीबोर्ड्स इस गीत की वज़न को बढ़ाते हैं। "Je t'aime" गीत की शुरुआत गीटार और फिर उसके बाद सैक्सोफ़ोन से होती है। ऐसा लगता है कि जैसे यह गीत किसी ख़ास के साथ डिनर डेट के लिए उप्युक्त गीत है। चेलो और कीबोर्ड्स के सही प्रयोग से इसमें एक साल्सा वाली फ़ील आती है। जयदीप साहनी के बोल भी काव्यात्मक और सौन्दर्यपूर्ण है। यह गीत हमें ’दम मारो दम’ फ़िल्म के "ते आमो" गीत की याद दिलाता है। फ़्रेन्च और हिन्दी के सही तालमेल की वजह से आप इस गीत से प्यार कर बैठेंगे। ऐल्बम का चौथा गीत है "यू ऐण्ड मी" जिसे निखिल डी’सूज़ा और रैशेल वरगीज़ ने गाया है। बेस गीटार और कीबोर्ड्स इस मस्ती भरे गीत में पेप्पी फ़्लेवर मिलाते हैं। पापोन का गाया "लबों का कारोबार" तो युवाओं के बीच बेहद मशहूर हो रहा है क्योंकि इसमें चुम्बन के महत्व और मासूमियत पर प्रकाश डाला गया है। यह गीत हमें किसी फ़्रेन्च ओपेरा हाउस का अहसास कराता है। इसमें भी साल्सा का रंग है। गीटार, वायलिन, ट्रम्पेट्स और पियानो से गीत को ऊँचाई मिली है। इस तरह का मस्ती भरा फ़िल्म कम से कम एक पंजाबी देसी नंबर के बिना अधूरा है। ऐल्बम का अगला गीत है "खुलके दुलके" जो पूर्णत: पंजाबी गीत है जिसमें जिप्पी ग्रेवाल और हर्षदीप कौर की आवाज़ें हैं। लेकिन अफ़सोस कि बाकी गीतों की तरह इस गीत में कोई एक्स-फ़ैक्टर नहीं है और श्रोताओं के दिलों पर छाप नहीं छोड़ता। ऐल्बम का स्माअपन एक इन्स्ट्रुमेन्टल पीस से होता है जिसका शीर्षक है "Love is a dare"। बहुत ही सुन्दर कम्पोज़िशन है विशाल-शेखर का। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि ’बेफ़िकरे’ का ऐल्बम ताज़गी भरा है और विशाल-शेखर ने हमें निराश नहीं किया है।

आपको "मुस्कुराने की वजह तुम हो" गीत को याद ही होगा! गीतों के मुखड़ों से जुमले उठा कर
फ़िल्मों के शीर्षक रखने की परम्परा पुरानी है हमारे फ़िल्म जगत में। ऐसा ही कुछ हुआ है इस गीत के साथ भी। 16 दिसंबर को रिलीज़ हुई ’वजह तुम हो’ के म्युज़िक ऐल्बम की ख़ासियत यह है कि पूरे ऐल्बम में बस एक ही मूल गीत है, बाक़ी सारे गीत बीते समय के हिट गीतों के नए संस्करण मात्र हैं। शीर्षक गीत "वजह तुम हो" मिथुन द्वारा स्वरबद्ध, मनोज मुन्तशिर द्वारा लिखा हुआ और तुल्सी कुमार द्वारा गाया गीत है। गीत सुन्दर है और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कुछ और मूल गीत इस ऐल्बम में क्यों नहीं रखे गए! इस गीत के तीन और अन्य संस्करण भी है जिनमें अल्तमश फ़रिदी की आवाज़ भी शामिल है। मिथुन को ये तीन संस्करण विविधता हेतु अलग-अलग पुरुष गायकों से गवाने चाहिए थे। रीक्रीएटेड गीतों में पहला गीत है "पल पल दिल के पास तुम रहती हो"। इस गीत को संगीतकार अभिजीत वघानी "दिल के पास" शीर्षक से अरिजीत सिंह और तुल्सी कुमार से गवाते हैं। किशोर कुमार वाले मूल गीत को अगर भूल जाएँ कुछ देर के लिए तो इस नए संस्करण का भी अपना अलग अंदाज़ है जो दिल को भाता है। इस गीत में नोमैन पिन्टो के अंग्रेज़ी के बोल भी शामिल हैं। गीत के एक अन्य संस्करण में अरमान मलिक, तुल्सी कुमार और शमिता भाटकर की आवाज़ें है। दूसरा रीक्रीएटेड गीत है "ऐसे ना मुझे तुम देखो सीने से लगा लूँगा" जिसे "दिल में छुपा लूँगा" शीर्षक से अरमान मलिक और तुल्सी कुमार की आवाज़ों में है। मीत ब्रदर्स ने इस गीत में अच्छा काम किया है इस गीत को आज के जेनरेशन में लोकप्रिय बनाने में। 2002 की फ़िल्म ’काँटे’ का गीत "माही वे" बहुत लोकप्रिय हुआ था। आनन्द राज आनन्द के कम्पोज़िशन में रिचा शर्मा के गाए देव कोहली के लिखे इस गीत की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। रीक्रीएटेड वर्ज़न में गीतकार कुमार अपने बोलों के साथ गौरव-रोशिन के संगीत निर्देशन में इसे नेहा कक्कर से गवाते हैं। और अब हम आ पहुँचे हैं 2016 के अन्तिम सप्ताह यानी कि 23 दिसंबर में प्रदर्शित होने वाली आमिर ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’दंगल’ पर। इस बार आमिर ने अपनी इस फ़िल्म के लिए संगीतकार प्रीतम और गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य को चुना है। कहने की ज़रूरत नहीं कि आमिर अपनी फ़िल्मों के गीतों को लेकर बहुत गम्भीर रहे हैं। इस फ़िल्म की कहानी और पार्श्व को ध्यान में रखते हुए प्रीतम ने हरियाणवी लोक धुनों का सहारा लेकर फ़िल्म के गाने कम्पोज़ किए हैं। और अमिताभ के दिलकश बोलों के तो कहने ही क्या! फ़िल्म के शीर्षक गीत में "रे लट्ठ गाड़ दूँ, रे जाड़ा पाड़ दूँ" एक हरियाणवी गबरू जवान के शख़्सियत को उभारता है, तो "हानीकारक बापू" गीत के "टॉफ़ी चूरन खेल खिलौने कुल्चे नान पराठा, कह गए हैं टाटा, जबसे बापू तूने डाँटा..." एक सख़्त पिता के प्यार को उजागर करता है। "हानीकारक बापू" को सरवर ख़ान और सरताज ख़ान बरना ने गाया है जो मांगणियार सम्प्रदाय से ताल्लुख़ रखते हैं। युवा कुश्तीगिरों की समस्या होती है उनके पिताओं द्वारा सख़्त अनुशासन में रखना, और यही बात इस गीत में ज़ाहिर होती है। पर इसके पीछे जो प्यार और शिक्षा छुपी हुई है, उनकी तरफ़ भी इशारा है। एक लम्बेअरसे के बाद इस तरह का बच्चों वाला कोई गीत किसी फ़िल्म में सुनाई दी है। "धाकड़" एक महिला कुश्तीगिर के बारे में है। गीत मूलत: रफ़्तार द्वारा की गई रैपिंग् है और फिर इसका एक आमिर ख़ान संस्करण भी है। जो भी है एक अलग हट के रचना है यह। जोनिता गांधी की आवाज़ में "गिल्हरियाँ" एक युवती के सपनों और आशाओं की गाथा है। सॉफ़्ट पॉप की छाया लिए यह गीत प्रीतम के कम्पोज़िशनों में इस ऐल्बम का सबसे "फ़िल्मी" गीत है। अगला गीत है "नैना" जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है; कम से कम साज़ों के इस्तमाल से यह गीत दिल की गहराइयों में जल्दी ही उतर जाता है। "इडियट बन्ना" एक पारम्परिक हरियाणवी विवाह गीत है जिसे नूरान सिस्टर्स ने गाया है। प्रीतम ने हालांकि इसमें रॉक का एक अंग डाल दिया है। कुल मिला कर ’दंगल’ का गीत संगीत उत्तम है। प्रीतम और अमिताभ ने स्तरीय काम किया है। आशा करते हैं कि आने वाले वर्षों में यह जोड़ी इसी तरह के अर्थपूर्ण ऐल्बमों से हमारा दिल बहलाएगी।

तो मित्रों, अब हम आ पहुँचे हैं 2016 के फ़िल्म-संगीत की समीक्षा के मंज़िल पर। पिछले पाँच सप्ताहों से हम इस वर्ष में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीतों की चर्चा कर रहे थे इस वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला में। आज 31 दिसंबर है और कुछ ही घंटों में नया साल शुरु होने वाला है। तो आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए इस विशेष लघु श्रृंखला को यहीं समाप्त करने की अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, और a very happy and prosperous new year 2017!!!

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

Thursday, December 29, 2016

जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है.. "मीर" के एकतरफ़ा प्यार की कसक और हरिहरण की आवाज़ 'कहकशाँ’ की अन्तिम कड़ी में



कहकशाँ - 27 (अंतिम कड़ी)
मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल, हरिहरण की आवाज़  
"पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है मीर तक़ी मीर की मशहूर ग़ज़ल "पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है", हरिहरण की आवाज़ में।




पढ़ते फिरेंगे गलियों में इन रेख़्तों को लोग,
मुद्दत रहेंगी याद ये बातें हमारियां।

जाने का नहीं शोर सुख़न का मीर-ए-हरगिज़,
ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा।

ये दो शेर मिर्ज़ा ग़ालिब के गुरू (ग़ालिब ने इनसे ग़ज़लों की शिक्षा नहीं ली, बल्कि इन्हें अपने मन से गुरू माना) मीर के हैं। मीर के बारे में हर दौर में हर शायर ने कुछ न कुछ कहा है और अपने शेर के मार्फ़त यह ज़रूर दर्शा दिया है कि चाहे कितना भी लिख लो, लेकिन मीर जैसा अंदाज़ हासिल नहीं हो सकता। ग़ालिब के समकालीन इब्राहिम ज़ौक़ का यह शेर आपको सुनवाते हैं, जो उन्होंने मीर को नज़र करके लिखा था:

न हुआ पर न हुआ ‘मीर’ का अंदाज़ नसीब।
‘जौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा।।

हसरत मोहानी साहब कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी वही दुहराया जो पहले मीर ने कहा और बाद में बाकी शायरों ने:

शेर मेरे भी हैं पुर-दर्द वलेकिन ‘हसरत’।
‘मीर’ का शैवाए-गुफ़्तार कहां से लाऊं।।

ग़ज़ल कहने की जो बुनियादी जरूरत है, वह है "हर तरह की भावनाओं विशेष कर दु:ख की संवेदना"। जब तलक आप कथ्य को खुद महसूस नहीं करते, तब तलक लिखा गया हरेक लफ़्ज़ बेमानी है। मीर इसी कला के मर्मज्ञ थे, सबसे बड़े मर्मज्ञ। इस बात को उन्होंने ख़ुद भी अपने शेर में कहा है:

मुझको शायर न कहो ‘मीर’ कि साहब मैंने।
दर्द-ओ-ग़म जमा किये कितने तो दीवान किया।।

मीर का दीवान जितना उनके ग़म का संग्रह था, उतना ही जमाने के ग़म का -

दरहमी हाल की है सारे मिरा दीवां में,
सैर कर तू भी यह मजमूआ परीशानी का।

अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास" में "बच्चन सिंह" जी मीर के बारे में लिखते हैं:

मीर का पूरा नाम मीर तक़ी मीर था। मीर ने फ़ारसी में अपनी आत्मकथा लिखी है, जिसका अनुवाद "ज़िक्रे मीर" के नाम से हो चुका है। ’ज़िक्रे मीर’ के हिसाब से उनका जन्म १७२५ में अकबराबाद (आगरा) में हुआ था। लेकिन और घटनाओं के समय उन्होंने अपनी जो उम्र बताई है उससे हिसाब लगाने पर उनकी जन्म-तिथि ११३७ हि.या १७२४ ई. निकलती है। (प्रकाश पंडित की पुस्तक "मीर और उनकी शायरी" में भी इस बात का उल्लेख है) मीर के पिता प्रसिद्ध सूफ़ी फ़कीर थे। उनका प्रभाव मीर की रचनाओं पर देखा जा सकता है। दिल्ली को उजड़ती देखकर वे लखनऊ चले आए। नवाब आसफ़ुद्दौला ने उनका स्वागत किया और तीन सौ रूपये की मासिक वृत्ति बाँध दी। नवाब से उनकी पटरी नहीं बैठी। उन्होंने दरबार में जाना छोड़ दिया। फिर भी नवाब ने उनकी वृत्ति नहीं बंद की। १८१० में मीर का देहांत हो गया।

मीर पर वली की शायरी का प्रभाव है - ज़बान, ग़ज़ल की ज़मीन और भावों में दोनों में थोड़ा-बहुत सादृश्य है। पर दोनों में एक बुनियादी अंतर है। वली के इश्क़ में प्रेमिका की अराधना है तो मीर के इश्क़ पर सूफ़ियों के इश्क़-हक़ीक़ी का भी रंग है और वह रोज़मर्रा की समस्याओं में नीर-क्षीर की तरह घुलमिल गया है। मीर की शायरी में जीवन के जितने विविध आयाम मिलेंगे उतने उस काल के किसी अन्य कवि में नहीं दिखाई पड़ते।

दिल्ली मीर का अपना शहर था। लखनऊ में रहते हुए भी वे दिल्ली को कभी नहीं भूले। दिल्ली छोड़ने का दर्द उन्हें सालता रहा। लखनऊ से उन्हें बेहद नफ़रत थी। भले ही वे लखनऊ के पैसे पर पल रहे थे, फिर भी लखनऊ उन्हें चुगदों (उल्लुओं) से भरा हुआ और आदमियत से ख़ाली लग रहा था। लखनऊ के कवियों की इश्क़िया शायरी में वह दर्द न था, जो छटपटाहट पैदा कर सके। लखनऊ के लोकप्रिय शायर "जुर्रत" को मीर चुम्मा-चाटी का शायर कहा करते थे। 

मीर विचारधारा में कबीर के निकट हैं तो भाषा की मिठास में सूर के। जिस तरह कबीर कहते थे कि "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल", उसी तरह मीर का कहना है - "उसे देखूँ जिधर करूँ निगाह, वही एक सूरत हज़ारों जगह।" दैरो-हरम की चिंता उन्हें नहीं है। मीर उससे ऊपर उठकर प्रेमधर्म और हृदयधर्म का समर्थन करते हैं-

दैरो-हरम से गुज़रे, अब दिल है घर हमारा,
है ख़त्म इस आवले पर सैरो-सफ़र हमारा।

हिन्दी के सूफ़ी कवि भी इतने असांप्रदायिक नहीं थे, जितने मीर थे। इस अर्थ में मीर जायसी और कुतबन के आगे थे। वे लोग इस्लाम के घेरे को नहीं तोड़ सके थे, जबकि मीर ने उसे तोड़ दिया था। पंडों-पुरोहितों, मुल्ला-इमामों में उनकी आस्था नहीं थी, पर मुसलमां होने में थी। शेखों-इमामों की तो उन्होंने वह गत बनाई है कि उन्हें देखकर फ़रिश्तों के भी होश उड़ जाएँ -

फिर ’मीर’ आज मस्जिद-ए-जामें में थे इमाम,
दाग़-ए-शराब धोते थे कल जानमाज़ का। 
(जानमाज़ - जिस कपड़े पर नमाज़ पढ़ी जाती है)

सौन्दर्य-वर्णन मीर के यहाँ भी मिलेगा, किन्तु इस सावधानी के साथ कि "कुछ इश्क़-ओ-हवस में फ़र्क़ भी कर-

क्या तन-ए-नाज़ुक है, जां को भी हसद जिस तन पर है,
क्या बदन का रंग है, तह जिसकी पैराहन पर है।

मीर की भाषा में फ़ारसी के शब्द कम नहीं हैं, पर उनकी शायरी का लहजा, शैली, लय, सुर भारतीय है। उनकी कविता का पूरा माहौल कहीं से भी ईरानी नहीं है।

मीर ग़ज़लों के बादशाह थे। उनकी दो हज़ार से अधिक ग़ज़लें छह दीवानों में संगृहीत हैं। "कुल्लियात-ए-मीर" में अनेक मस्नवियाँ, क़सीदे, वासोख़्त, मर्सिये आदि शामिल हैं। उनकी शायरी के कुछ नमूने निम्नलिखित हैं:-

इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या
आगे आगे देखिये होता है क्या

इश्क़ इक "मीर" भारी पत्थर है
कब दिल-ए-नातवां से उठता है

हम ख़ुदा के कभी क़ायल तो न थे
उनको देखा तो ख़ुदा याद आ गया

सख़्त काफ़िर था जिसने पहले "मीर"
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया

आधुनिक उर्दू कविता के प्रमुख नाम और उर्दू साहित्य के इतिहास 'आब-ए-हयात' के लेखक मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी 'मीर' के बारे में दर्ज़ किया है- "क़द्रदानों ने उनके कलाम को जौहर और मोतियों की निगाहों से देखा और नाम को फूलों की महक बना कर उड़ाया। हिन्दुस्तान में यह बात उन्हीं को नसीब हुई है कि मुसाफ़िर, ग़ज़लों को तोहफ़े के तौर पर शहर से शहर में ले जाते थे"। जिनकी शायरी मुसाफ़िर शहर-दर-शहर दिल में लेकर घूमते हैं, हमारी खुश-किस्मती है कि हमारी महफ़िल को आज उनकी ख़िदमत करने का मौका हासिल हुआ है। इतनी बातों के बाद लगे हाथ अब आज की ग़ज़ल भी सुन लेते हैं। आज की ग़ज़ल मेरे हिसाब से मीर की सबसे मक़बूल गज़ल है और मेरे दिल के सबसे करीब भी। "जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है।" एकतरफ़ा प्यार की कसक इससे बढ़िया तरीके से व्यक्त नहीं की जा सकती। मीर के लफ़्ज़ों में छुपी कसक को ग़ज़ल गायिकी को एक अलग ही अंदाज़ देने वाले "हरिहरण" ने बखूबी पेश किया है। यूँ तो इस ग़ज़ल को कई गुलूकारों ने अपनी आवाज़ दी है, लेकिन हरिहरण का "क्लासिकल टच" और किसी की गायकी में नहीं है। पूरे ९ मिनट की यह ग़ज़ल मेरे इस दावे की पुख्ता सुबूत है:

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दोबारा जाने है

तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्व दीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, December 28, 2016

"अभी भी ग़ज़ल के कद्रदान बहुत हैं, हमें नाउम्मीद नहीं होना चाहिए" - चन्दन दास : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 43
नववर्ष विशेष 


दोस्तों एक और साल अपने पंख समेट कर उड़ जाने की तैयारी में है, नया साल अभी दहलीज़ पर ही खड़ा है, ऐसे में इस जाते हुए साल के खूबसूरत लम्हों को याद करने और उनके लिए शुक्रगुजार होने का मौसम है, और ऐसे में साथ मिला जाए कुछ जादू भरी ग़ज़लों का तो सोने पे सुहागा, ग़ज़ल गायिकी की बात हो और चन्दन दास का जिक्र न आये ये तो संभव ही नहीं. आवाज़ और अदायगी में इतनी सच्चाई बहुत कम कलाकारों को नसीब हुई है, आईये साल २०१६ के अपने इस अंतिम एपिसोड में आज रूबरू होते हैं, चन्दन दास जी से. बस प्ले का बटन दबाएँ और मौसिकी के इस जादूगर से हुई हमारी इस दिलचस्प बातचीत का आनंद लें....



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मिलिए इन जबरदस्त कलाकारों से भी -
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Monday, December 26, 2016

वर्षान्त विशेष - 2016 का फ़िल्म-संगीत (भाग-4)

वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला

2016 का फ़िल्म-संगीत  
भाग-4




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, देखते ही देखते हम वर्ष 2016 के अन्तिम महीने पर आ गए हैं। कौन कौन सी फ़िल्में बनीं इस साल? उन सभी फ़िल्मों का गीत-संगीत कैसा रहा? ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में अगर आपने इस साल के गीतों को ठीक से सुन नहीं सके या उनके बारे में सोच-विचार करने का समय नहीं निकाल सके, तो कोई बात नहीं। हम इन दिनों हर शनिवार आपके लिए लेकर आ रहे हैं वर्ष 2016 में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। अब तक इस श्रृंखला में हमने वर्ष के प्रथमार्ध का सफ़र तय कर लिया है, और आज से हम इसके द्वितीयार्ध का सफ़र शुरु करेंगे। तो आइए आज इसकी चौथी कड़ी में चर्चा करें उन फ़िल्मों के गीतों की जो प्रदर्शित हुए जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीनों में।



ले 1990 का दौर समाप्त हो चुका हो, पर इस दौर में भी कभी-कभार कुछ फ़िल्में ऐसी बन रही हैं
जिनके गीत-संगीत में 90 के दशक की छाप मिलती है। जुलाई के शुरुआती सप्ताह में ही दो ऐसी ही फ़िल्में आईं। पहली फ़िल्म थी ’शोरगुल’ जिसके संगीतकार हैं ललित पण्डित (जतिन-ललित वाले)। ज़ाहिर सी बात है गीतों में मेलडी तो होगी ही। इस ऐल्बम के गीतों में भी वही मिठास बरकरार है। अरिजीत सिंह का गाया "तेरे बिना" तो जैसे जतिन-ललित का ट्रेडमार्क लिए हुए है जिसे बार-बार सुनने में कोई हर्ज़ नहीं है। इस पहले पहले गीत को सुनते ही ऐसा लगा जैसे कोई ताज़ा हवा का झोंका आया हो, और वह भी उस समय जब बाकी सारे संगीतकार एक ही तरह का काम करते जा रहे हैं। "मस्त हवा" एक पार्टी नंबर है जो क्लब पब्लिक के लिए सटीक है। फ़िल्म की कहानी के बाहर इस गीत की कोई ख़ास भूमिका नहीं है। ऐल्बम के अन्य गीतों से बिल्कुल अलग इस गीत में रॉक शैली का प्रयोग हुआ है जिसकी तुलना फ़िल्म ’ब्लैक फ़्राइडे’ के "बन्दे" से की जा सकती है। 1 जुलाई को ही प्रदर्शित दूसरी फ़िल्म थी ’दिल तो दीवाना है’ जिसका संगीत भी हमें 90 के दशक में ले जाता है। इस बार संगीतकार हैं आनन्द राज आनन्द, जिन्होंने 90 के दशक में बहुत सी कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में हमें दी हैं। फ़िल्म का शीर्षक गीत ज़ुबिन गर्ग की आवाज़ में है; भले ज़ुबिन की अदायगी अच्छी है पर गीत की धुन में नयापन कुछ नहीं है। इससे तो इसी मुखड़े का लता-रफ़ी वाला फ़िल्म ’इश्क़ पर ज़ोर नहीं’ का गीत कई गुणा बेहतर है। ऐल्बम का दूसरा गीत श्रेया घोषाल की आवाज़ में है "क्यों दिल की गलियों में", जो शायद इस ऐल्बम का सबसे अच्छा गीत है। श्रेया की मधुर आवाज़ के बीच रंग में भंग डालने के लिए उन ईलेक्ट्रॉनिक बीट्स की क्या ज़रूरत थी समझ नहीं आया। ज़ुबिन का गाया एक और गीत "धूप खिले जब तुम मुसकाओ" बोलों के लिहाज़ से एक ख़ूबसूरत नग़मा है जिसमें कोई ख़ास बात ना सही पर सुनने लायक ज़रूर है। एक लम्बे समय के बार ग़ज़ल सम्राट पंकज उधास की आवाज़ में "रात भर तन्हा रहा" सुनने का मज़ा ही कुछ और रहा। एक तरफ़ पंकज उधास की नर्मोनाज़ुक आवाज़ और दूसरी तरफ़ बाँसुरी की मधुर ताने, एक दिलकश कम्पोज़िशन कुल मिला कर। रिचा शर्मा ने पहले भी आनन्द राज आनन्द के लिए कई गीत गायी हैं, इस फ़िल्म में "मुझे इतना बोलना है" में उन्हें फिर से सुनना सुखद रहा लेकिन एक बार फिर ईलेक्ट्रॉनिक बीट्स ने मज़ा किरकिरा कर दिया। 6 जुलाई को इस साल की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक - ’सुल्तान’ प्रदर्शित हुई। सलमान ख़ान की फ़िल्म हो और उसके गाने न चले ऐसा होना नामुमकिन है। ’सुल्तान’ के गाने भी ख़ूब चले। विशाल-शेखर का संगीत, इरशाद कामिल के गीत, जादू तो चलना ही था। ऐल्बम का आग़ाज़ होता है "बेबी को बेस पसन्द है" से। विशाल ददलानी, बाद्शाह, शालमली खोलगडे और इशिता के गाए इस गीत में ढोलक, भपंग, ड्रम, टर्णटेबल और तमाम परक्युशन का इस्तमाल किया गया है। इस गीत में कोई ख़ास बात ना होते हुए भी इतना बड़ा हिट हुआ, यही आश्चर्य की बात है। वैसे इससे पहले भी समलान की फ़िल्मों के गीत इसी तरह कैची लाइनों की वजह से हिट होते रहे हैं। ऐल्बम का सबसे अच्छा गीत रहा "जग घूमेया" जिसे राहत फ़तेह अली ख़ान ने गाया। इस गीत के साथ एक विवाद जुड़ा हुआ है। पहले यह गीत अरिजीत सिंह गाने वाले थे लेकिन सलमान के साथ किसी अनबन की वजह से अरिजीत को इस फ़िल्म से बाहर फेंक दिया गया। इस गीत का अन्य संस्करण नेहा भसीन ने गाया है जिसमें ऑरकेस्ट्रेशन को कम से कम रख कर केवल तुम्बी और मैन्डोलिन पर आधारित किया गया है। अच्छा प्रयोग! फिर आते हैं मिका "440 volt" लेकर, जिसकी तरफ़ आपका ध्यान ना भी जाए तो भी कोई बात नहीं। ’सुल्तान’ के शीर्षक गीत में श्रेष्ठ पंक्ति आती है "ख़ून में तेरी मिट्टी, मिट्टी में तेरा ख़ून, उपर अल्लाह नीचे धरती बीच में तेरा जुनून"। सुखविन्दर सिंह और शदब फ़रिदी की आवाज़ें, कुछ तेज़ बेस के रीदम, कुछ कोमल सुर। नूरन बहनों और ददलानी का गाया "टुक टुक" और मोहित चौहान और हर्शदीप कौर का गाया "सच्ची मुच्ची" अत्यधिक ऑरकेस्ट्रेशन की वजह से बरबाद हुए हैं। पापोन का गाया "बुल्लेया" गीत को विशाल-शेखर के कमज़ोरतम रचनाओं में से एक माना जा सकता है।

अध्ययन सुमन की फ़िल्म ’इश्क़ क्लिक’ में सतीश त्रिपाटःई, अजय और मनीषा उपाध्याय "कुहु
बोले" एक पेप्पी नंबर है पर लोक-धुन और पारम्परिक वाद्यों के प्रयोग से इसमें एक अलग ही निखार आया है। गीत के बोल भी स्तरीय हैं। अंकित तिवारी के गाये "माना तुझी का ख़ुदा" में उनकी यथारीति ऊँचे सुर में गाने की प्रवृत्ति है। फ़िल्म में इस गीत के तीन संस्करण हैं। नकश अज़ीज़ और रिचा नारायण के गाए संस्करण में धीमा रॉक फ़ील है जिसमे आजकल के फ़िल्मी गीतों में पाए जाने वाली रॉक शैली की आँच है। तीसरे संस्करण में अंकित तिवारी ने रिचा के साथ आवाज़ मिलाई है, यह संस्करण धीमे लय पर है और अन्य दो से बेहतर सुनाई देता है। अमानत अली ख़ान की आवाज़ में "का देखूँ" भारतीय शास्त्रीय संगीत आधारित है, लेकिन कम्पोज़िशन में फ़्युज़न है। भारतीय ध्वनियों को सिम्फ़नी जैसे इन्टरल्युड्स में ढाला गया है। इस गीत के भी दो और संस्करण है - एक में अविनाश और अनामिका सिंह हैं तो दूसरा अजय जैसवाल की आवाज़ में है। "अभी अजनबी" गीत के भी दो संस्करण हैं - माधुरी पाण्डेय और समीरा कोपिकर ने अच्छा काम किया है। समीरा का संस्करण धीमा है और उनकी हस्की आवाज़ मूड के मुताबिक है। कुल मिला कर ’इश्क़ क्लिक’ का संगीत एकाधिक बार सुनने लायक है। इसके बाद अगली फ़िल्म की तरफ़ बढ़ते हैं। जिस फ़िल्म में जॉन एब्रहम और वरुण धवन जैसे दो हंक हों, वह एक यथार्थ मसाला फ़िल्म बन कर रहता है। ’डिशूम’ का ऐल्बम भी मसालेदार है। प्रीतम का दिल को छू लेने वाला संगीत इस फ़िल्म के गीतों में भी सर चढ़ कर बोलता है। पहला ट्रैक है "तो डिशूम" जिसे शाहिद माल्या ने गाया है, साथ में रैपिंग की है रफ़्तार ने। गीत का आकर्षण गीत के बोल हैं। और दोनों गायकों ने अपनी अपनी ऊर्जा से गीत में जान डाली है। बेस और पंजाबी तड़का का सही संतुलन इस गीत की ख़ासियत है। जोनिता गांधी की आवाज़ में "सौ तरह के" में प्रीतम फिर उसी "अफ़ग़ान जलेबी" वाले मोड में चले जाते हैं पर इस गीत के अरबी बोलों से एक अलग फ़्लेवर उत्पन्न हुआ है। फ़िल्म का लोकप्रिय गीत "जानेमन आह" एक ऐवरेज गीत है पर जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। नकश अज़ीज़, अमन त्रिखा और अन्तरा मित्रा ने अच्छा निभाया है, पर गीत के बोल आपत्तिजनक ज़रूर हैं। बहुत दिनों बाद अभिजीत सावन्त को प्रीतम ने अपने गीत में प्रयोग कर सबको चकित किया है। गीत है "इश्क़ा"। इस गीत के लिए पूरा क्रेडिट प्रीतम को ही जाता है, अभिजीत कोई कमाल नहीं दिखा सके। ’देसी बॉयज़’ के मिका और शेफ़ाली के गाए हिट गीत "सुबह होने ना दे" का रीमिक्स वर्ज़न इस ऐल्बम में डाला गया है। कुल मिला कर इस फ़िल्म का गीत-संगीत फ़िल्म के लिहाज़ से पैसा-वसूल है। अगली फ़िल्म है ’दि लीजेन्ड ऑफ़ माइककेल मिश्रा’। इसके ऐल्बम में कुछ अच्छे तो कुच भुला देने लायक गाने हैं। ऐल्बम की एक अच्छी शुरुआत होती है कनिका कपूर के गाए "लव लेटर" से। वही "बेबी डॉल" वाली टीम, यानी कि कनिका और मीत ब्रदर्स। हालाँकि इसमें "बेबी डॉल" जैसे उम्र नहीं मिलेगी, पर फ़िल्हाल एक अच्छा नृत्य गीत कहा जा सकता है। कार्तिक धिमा का गाया "इश्क़ दी गाड़ी" एक कर्णप्रिय रोमान्टिक गीत है जिसके नर्मोनाज़ुक बोल दिल को छू जाते हैं। सकीना ख़ान की आवाज़ में "फिर तू" को अच्छा गाया गया है पर कम्पोज़िशन में दम नहीं है। "निखट्टू" के दो संस्करण हैं, एक तरफ़ सोम रिग्स अपनी मज़ेदार आवाज़ से ऊँचाए पर चढ़ाता है, तो दूसरी तरफ़ मीत ब्रदर्स के अपने फ़ंकी बीट्स हैं। यह गीत आपको कुछ हद तक सुभाष कपूर के "माता का ईमेल" की याद दिला जएगा। "फ़िल्म शुरु हुई है" में भी वही स्टाइल है, पर इस ऐल्बम में शामिल होने लायक नहीं। ॠषी-सिद्धार्थ ने ऐवरेज काम किया है पर ऐसा कुछ भी नहीं जो इस गीत को डूबने से बचा सके।

12 अगस्त को प्रदर्शित हुई ॠतिक रोशन अभिनीत महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’मोहेन्जोदारो’। ए. आर.
रहमान और आशुतोष गोवारिकर इससे पहले ’लगान’, ’स्वदेस’ और ’जोधा अकबर’ जैसी कामयाब फ़िल्में दे चुके हैं, इसके इस फ़िल्म से लोगों की उम्मीदें बहुत बढ़ गई थीं। जावेद अख़्तर बतौर गीतकार इस फ़िल्म में भी शामिल थे। साधारणत: जब एक पीरियड फ़िल्म बनाई जाती है, तब उस समयकाल के संगीत और ध्वनियों को ध्यान में रखते हुए गीतों को तैयार किया जाता है। पर मोहेन्जोदारो के बारे में इतनी कम जानकारी है कि इस कहानी पर बनी फ़िल्म के गीतों को न्याय दिला पाना आसान काम नहीं। रहमान और जावेद साहब के पास उस ज़माने के बोली का कोई ऑडियो प्रमाण तो था नहीं, इसलिए बोल हिन्दी में ही लिखे गए हैं और बीच बीच में आदिवासी किस्म के बोल डाले गए हैं जिससे ज़्यादा मदद नहीं मिल सकी। ऐल्बम की शुरुआत होती है अरिजीत सिंह, ए. आर. रहमान, बेला शिंडे और साना मोइदुत्ती की आवाज़ों में "मोहेन्जो मोहेन्जो" गीत से। इस गीत में कोरस का काम सराहनीय रहा और ऑरकेस्ट्रेशन भी लाजवाब है, बिल्कुल वैसा जैसे कि किसी कालजयी प्रेम गाथा की शुरुआत हो रही हो! हर बार की तरह इस बार भी अपना छाप छोड़ जाते हैं। आदिवासी ध्वनियाँ हमें कुछ हद तक अफ़्रीका और मिशर की याद दिलाती हैं। दूसरा गीत है "सिंधु माँ" जिसे ए. आर. रहमान और साना मोइदुत्ती ने गाया है, जो सिंधु नदी की शान में लिखा गया है। इस गीत में लम्बा प्रील्युड संगीत रखा गया है। वैसे इसका एक अन्य संस्करण "तू है" ज़्यादा आकर्षणीय है जिसमें रहमान और साना की ही आवाज़ें हैं। लेकिन इन दोनों से बेहतर है इन्स्ट्रुमेन्टल वर्ज़न "The Shimmer of Sindhu" जिसे केबा जेरेमिया ने गीटार पर और करीम कमलाकर ने बाँसुरी पर बजाया है। एक अनोखा और दिलकश प्रयोग! शाश्वत सिंह और शाशा तिरुपति की आवाज़ों में "सरसरिया" में फिर से उन आदिवासी ध्वनियों और बोलों का सहारा लिया गया है, पर शाशा की आवाज़ की रेंज का हमें पता चलता है। इस गीत का एक इन्स्ट्रुमेन्टल वर्ज़न भी है जिसे तापस रॉय ने मैन्डोलीन पर और पी.एम.के. नवीन कुमार ने बाँसुरी पर बजाया है। कमाल की जुगलबन्दी है इसमें और कोई संशय नहीं कि गीत से ज़्यादा असरदार यह संस्करण बन पड़ा है। रहमान ने अर्जुन चण्डी और उनके वोकल ग्रूप का इस्तमाल मूलत: इन्स्ट्रुमेन्टल "Whispers of the mind" और "Whispers of the heart" में किया है। श्लोकों और आदिवासी बोलों वाला कोरस, झिंगुरों की आवाज़ें, बहते पानी की कल कल, सब कुछ बेहद मनोरम बन पड़ा है। कुल मिला कर रहमान ने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की है इस ऐल्बम में स्थान-काल-पात्र के हिसाब से संगीत देने की।

12 अगस्त के ही दिन एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ’रुस्तोम’। फ़िल्म की कहानी के हिसाब से
इस फ़िल्म के गीत-संगीत से ज़्यादा उम्मीदें लगाना मुश्किल था, पर संगीतकारों ने ऐसा काम कर दिखाया कि यह ऐल्बम ऐवरेज से कहीं उपर जा पहुँचा। "तेरे संग यारा" एक चार्टबस्टर सिद्ध हुआ। हालाँकि संगीतकार अर्को को अक्सर सेफ़-गेम खेलने वाला खिलाड़ी समझा जाता रहा है, पर यह गीत वाक़ई एक नगीना है। मनोज मुन्तशिर के रोमान्टिक बोल और आतिफ़ असलम की आवाज़ गीत में जान डाल दी है। आतिफ़ की कशिश भरी आवाज़ ने इस गीत को ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत बना दिया है। इस गीत का एक अन्य संस्करण भी है अर्को की आवाज़ में पर इसमें वह बात नहीं बन पायी है जो बात आतिफ़ की आवाज़ से बनी थी। राघव सचर की आवाज़ फ़िल्म के शीर्षक गीत को कुछ गहराई तो ज़रूर प्रदान करती है। इस गीत के चार अलग-अलग संस्करण हैं पर हर संस्करण को अलग मूड दिया गया है फ़िल्म की कहानी के अनुसार। सुकृति कक्कर और जसराज जोशी अपना अपना संस्करण बख़ूबी निभाते हैं, पर इन्स्ट्रुमेन्टल वर्ज़न ही सबसे बेहतरीन बन पड़ा है जो सबसे ज़्यादा दिल को छूता है। अंकित तिवारी का गाया "ते है" में कोई ख़ास बात ऐसी नज़र नहीं आती और इस गीत के बार में कुछ लिखते नहीं बन रहा। जीत गांगुली द्वारा स्वरबद्ध "देखा हज़ारों दफ़ा" अच्छी रचना है जिसमें पुराने ज़माने का आकर्षण भी है और जिसे सुन कर आजे के ज़माने के श्रोता भी अपने आप को जोड़ पायेंगे। अरिजीत सिंह और पलक मुछाल ने इस गीत में यह सिद्ध किया है कि इस दौर के वो ही अग्रणी गायक-गायिका हैं। इस गीत में जीत गांगुली ने अपना ही स्तर इतना बढ़ा लिया है कि उनकी अगली रचना "ढल जाऊँ मैं" ज़्यादा सुख कर नहीं बना। जुबिन नौटियाल और आकांक्षा शर्मा ने अच्छा काम किया, पर गीत ऐवरेज ही बना है। अंकित फिर आते हैं "जब तुम होते हो" लेकर जिसमें श्रेया घोषाल की आवाज़ गीत को ऊँचाई प्रदान करती है। अंकित और श्रेया का कॉम्बिनेशन काम कर गया है। कुल मिलाकर ’रुस्तोम’ का गीत-संगीत एक सुखद अनुभव है जिसे लूप में डाल कर बार बार सुना जा सकता है। ’है अपना दिल तो आवारा’, नहीं नहीं, मैं हेमन्त कुमार के गाए गीत की बात नहीं कर रहा। दरसल इस शीर्षक से एक फ़िल्म बनी है इस साल, और शीर्षक के अनुरूप सुमधुर गीत-संगीत भी शामिल है इसमें। संगीतकार अजय सिंह, सुभाष प्रधान और परवेज़ क़ादिर ने उत्तम काम किया है। पापोन और नेहा राजपाल का गाया "छू लिया" एक लव-डुएट है जिसका संगीत-संयोजन भी कमाल का है। पापोन की आवाज़ को इस गीत में चुनना अकलमन्दी का काम सिद्ध हुआ जिन्होंने इस गीत में गहराई ला दी है। "मेहेरम मेरे" भी एक सादा रोमान्टिक नंबर है। एक हल्का सा सूफ़ी फ़्लेवर ज़रूर है, पर ख़ास बात है मोहित चौहान की दिलकश गायकी। गीटार और तबले का सही संतुलन इस गीत में सुनाई देता है। फ़िल्म का शीर्षक गीत निखिल डी’सूज़ा की आवाज़ में है जिसे हम थम्ब्स-अप दे सकते हैं। "तेरे इश्क़ ने नचाया" एक कमज़ोर गीत है; बुल्ले शाह की कविता को क्लब सॉंग में परिनीत करने में संगीतकार मुंह के बल गिरे हैं। अजय की ही आवाज़ में "भूल सारी बात" एक दर्द भरा गीत है; भले उनकी आवाज़ में बहुत अच्छी क्वालिटी नहीं है, पर इस गीत को उन्होंने चार चाँद लगाये ज़रूर हैं। और अन्तिम गीत है रमण महादेवन की आवाज़ में "दिल के राही" जो दिल को बिल्कुल नहीं छू पाते। 

सितंबर के महीने में यूं तो बहुत सी फ़िल्में रिलीज़ हुईं जैसे कि ’अकीरा’, ’ये तो टू मच हो गया’,
’फ़्रेकी अली’, ’एक कहानी जुली की’, ’वाह ताज’, ’एम. एस. धोनी’ वगेरह, पर जिन दो फ़िल्मों के संगीत ने हमारा ध्यान आकर्षित किया, वो दो फ़िल्में हैं ’बार बार देखो’ और ’राज़ रीबूट’। ’बार बार देखो’ की अगर बात करें तो जब करण जोहर, फ़रहान अख़्तर और रितेश सिधवानी जैसे नाम जुड़े हों तो सिद्धार्थ मल्होत्रा - कटरीना कैफ़ अभिनीत इस फ़िल्म के गीत-संगीत से उम्मीदें लगाई जा सकती है। इन निर्माताओं के पहली की फ़िल्मों में जहाँ एक ही संगीतकार पूरा ऐल्बम तैयार करते थे, इस फ़िल्म के लिए कई संगीतकारों और गीतकारों को लिया गया है। जसलीन रॉयल को, जिन्हें फ़िल्म जगत में फ़िल्म ’ख़ूबसूरत’ के "प्रीत" गीत से प्रसिद्धी मिली थी, एक बार फिर माइक के पीछे जाकर एक शानदार गीत "खो गए हम कहाँ" गाने का अवसर मिला। हालाँकि ऐल्बम के पहले गीत के रूप में इस तरह के सिचुएशनल ट्रैक का होना आश्चर्यजनक है, पर इससे किसी को परेशानी नहीं होगी क्योंकि गीत बेहद कर्णप्रिय बन पड़ा है। जसलीन ने ख़ुद इसे कम्पोज़ भी किया है, प्रतीक कुहड़ ने इस गीत को लिखा है तथा जसलीन के साथ अपनी आवाज़ भी मिलाई है। अर्थात् गीतकार प्रतीक कुहड़, संगीतकार जसलीन रॉयल, और आवाज़ प्रतीक और जसलीन की। है ना मज़ेदार बात! संगीतकार अमाल मलिक और गीतकार कुमार साथ में लेकर आए हैं "सौ आसमाँ" जिसमें नीति मोहन की आवाज़ है। यह एक ख़ुशनुमा गीत है जिसे सुन कर फ़रहान अख़्तर की अनुभूति होती है। कारण साफ़ है कि यह एक शंकर-अहसान-लॉय शैली का कम्पोज़िशन है। नीति मोहन के साथ अमाल के भाई अरमान मलिक अपनी आवाज़ मिलाते हैं। कुल मिला कर अच्छा गीत। ऐल्बम का तीसरा गीत है "दरिया" जिसे अर्को ने लिखा, स्वरबद्ध किया और ख़ुद गाया भी है। सूफ़ियाना शैली का यह गीत दो प्रेमियों के मिलन की आस को दर्शाता है। यह गीत अर्को के अन्य गीतों से बिल्कुल अलग है। अगला गीत है पंजाबी लोक शैली में रचा "नचदे ने सारे"। जसलीन रॉयल द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को गाया है जसलीन, हर्शदीप कौर और सिद्धार्थ महादेवन ने और इसमें पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेज़ी के बोल हैं, गीतकार आदित्य शर्मा। गीत की शैली कई हद तक फ़िल्म ’दिल धड़कने दो’ के "गल्लाँ गूड़ियाँ" जैसी है। पिछले साल कम्पोज़र-सिंगर बिलाल सईद फ़िल्म ’इश्क़ेदारियाँ’ में "मोहब्बत ये" जैसे आकर्षणीय गीत लेकर आए थे जिसकी तरफ़ किसी ने ध्यान नहीं दिया। ’बार बार देखो’ में वो लेकर आते हैं "तेरी ख़ैर मंगदी"। इसे उन्होंने कुमार के साथ मिल कर लिखा भी है। हालाँकि गीत पूर्णत: पंजाबी में है, पर मेलडी इतनी कमाल की है कि आप इसमें बहते चले जाते हैं और इसमें कोई शक़ नहीं कि यह ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत कहलाने के लायक है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "काला चश्मा"। मूलत: प्रेम हरदीप द्वारा कम्पोज़ किया हुआ और बाद में बादशाह द्वारा रीक्रीएट किया हुआ यह गीत अमर अरशी और नेहा कक्कड़ की आवाज़ों में एक कैची ट्रैक है। अमरीक सिंह और कुमार के लिखे इस गीत में कुछ तो बात है जो अपनी ओर आकर्षित करती है। एक चार्टबस्टर सिद्ध होने वाला गीत। कुल मिला कर ’बार बार देखो’ की शुरुआत धीमी और चुपचाप होती है और धीरे धीरे ऐल्बम खुलता जाता है। एक एक करके जब गीत आने लगते हैं तो जैसे दिल ख़ुश, और ज़्यादा ख़ुश होता चला जाता है। और अब आज की अन्तिम फ़िल्म ’राज़ रीबूट’ के गीतों की बातें। संगीतकार जीत गांगुली ने अकेले इस फ़िल्म में संगीत दिया है। उनकी शैली का "लो मान लिया" एक धीमा रोमान्टिक गीत है जिसमें एक बार फिर अरिजीत सिंह की आवाज़ है। कौसर मुनीर के लिखे इस गीत में कम से कम साज़ों का प्रयोग किया गया है ताकि अरिजीत की आवाज़ की कशिश और उभरकर सामने आए। पर अरिजीत सिंह के एक के बाद एक गीत आने की वजह से यह गीत एक दोहराव की तरह सुनाई पड़ता है। इस तरह के गीत उनकी आवाज़ में कई बार हम सुन चुके हैं। "राज़ आँखें तेरी" भी अरिजीत की आवाज़ में एक और स्लो ट्रैक है और यह गीत जीत गांगुली के ’हमारी अधुरी कहानी’ के गीतों से मेल खाता है कुछ हद तक। इस गीत में एक सूदिंग् क्वालिटी है जिसे स्लो रोमान्टिक गीत पसन्द करने वालों को बेहद पसन्द आएगा। "ओ मेरी जान" ऐल्बम का एकमात्र गीत है जिसे जीत ने नहीं बल्कि संगीत और सिद्धार्थ हल्दीपुर भाइयों ने कम्पोज़ किया है। बहुत दिनों बाद के.के की आवाज़ सुन कर दिल भर गया। गीत तेज़ रफ़्तार में है और तरह तरह के म्युज़िकल अरेन्जमेण्ट्स से गीत को नयापन मिला है। अरिजीत की आवाज़ में अगला गीत है "याद है ना" जो एक टूटे हुए दिल वाले की ज़ुबान बन सकती है। इस गीत का अन्य संस्करण जुबिन नौटियाल की आवाज़ में है। यह गीत एक टिपिकल इमरान हाशमी नंबर है जिसे लम्बे समय तक याद रखा जा सकता है। ऐल्बम का आख़िरी गीत है "हम में तुम में जो था" जिसे पलक मुछाल और पापोन ने गाया है। गीत की शुरुआत "राज़ आंखें तेरी" की धुन से होती है जिसे चायलिन्स पर बजाया जाता है। धुन वही है पर बोल अलग हैं। पापोन की आवाज़ पार्श्व में बज रहे वायलिन्स के साथ ग़ज़ब की लगती है। निस्सन्देह ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है यह।

तो दोस्तों, यह था 2016 के जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीनों में प्रदर्शित होने वाली प्रमुख फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। आगामी शनिवार को हम इस लघु श्रुंखला की पाँचवीं और अन्तिम कड़ी में चर्चा करेंगे अक्टुबर, नवंबर और दिसंबर में प्रदर्शित होने वाले फ़िल्मों के गीतों की। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार!



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

Sunday, December 25, 2016

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 298 : RAG BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 298 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 11 : 98वें जन्मदिवस पर स्वरांजलि

“दिया ना बुझे री आज हमारा...”




नौशाद : जन्मतिथि - 25 दिसम्बर, 1919
 ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग भैरवी पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला की इस समापन कड़ी का प्रसारण हम आज 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर कर रहे हैं और तमाम संगीत-प्रेमियों की ओर से स्वरांजलि अर्पित करते हैं। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



नौशाद और  लता  मंगेशकर
 मु म्बई आकर फिल्म संगीतकार के रूप में स्वयं को स्थापित करने के लिए नौशाद ने कडा संघर्ष किया। मुम्बई में सबसे पहले नौशाद को चालीस रुपये मासिक वेतन पर ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ के वाद्यवृन्द में पियानो वादक की नौकरी मिली। इसी फिल्म कम्पनी की फिल्म ‘सुनहरी मकड़ी’ के एक गीत को स्वरबद्ध करने पर उनकी तरक्की सहायक संगीतकार के रूप में हो गई। लखनऊ से मुम्बई आने से पहले नौशाद अपने एक परिचित अब्दुल मजीद ‘आदिल’ से उनके बम्बई में रह रहे मित्र अलीम ‘नामी’ के नाम एक पत्र लिखवा कर लाए थे। शुरू में उन्हें अलीम साहब के यहाँ आश्रय भी मिला था। परन्तु ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ की नौकरी मिलने के बाद नौशाद ने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। इसी बीच उनकी मित्रता गीतकार पी.एल. सन्तोषी से हो गई, जो गीत लिखते समय नौशाद से सलाह लिया करते थे। इस दौरान नौशाद दस रुपये मासिक किराये पर परेल की एक चाल में रहने लगे थे। गीतकार दीनानाथ मधोक नौशाद के सबसे बड़े शुभचिन्तक थे। मधोक की मदद से नौशाद को मिली और 1944 में प्रदर्शित फिल्म ‘रतन’ नौशाद की बेहद सफल फिल्म थी। इस फिल्म के गीतों की साढ़े तीन लाख रुपये रायल्टी अर्जित हुई थी। यह उस समय की बहुत बड़ी रकम थी। 1947 में प्रदर्शित फिल्म ‘दर्द’ इसलिए उल्लेखनीय है कि इस फिल्म में पहली बार नौशाद और गीतकार शकील बदायूनी का साथ हुआ। गीतकार और संगीतकार की यह जोड़ी काफी लम्बी चली। शकील बदायूनी के निधन से पूर्व उनकी चिकित्सा के लिए आर्थिक सहयोग दिलाने हेतु अन्तिम गीत भी नौशाद ने ही लिखवाया था। शकील बदायूनी जब क्षयरोग से ग्रसित होकर एक सेनीटोरियम में भर्ती हुए, उस समय उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। नौशाद ने उनकी आर्थिक मदद के इरादे से 1967-68 में प्रदर्शित तीन फिल्मों; ‘राम और श्याम’, ‘आदमी’ और ‘संघर्ष’ में गीत लिखने का अनुबन्ध कराया था। फिल्म ‘राम और श्याम’ का एक गीत –“आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, कल तेरी वज़्म से दीवाना चला जाएगा...” सम्भवतः उनके निधन से पूर्व का अन्तिम लिखा गया गीत है। शकील बदायूनी के गीतों से और नौशाद के संगीत से सजी 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘सन ऑफ इण्डिया’ का एक गीत आज हमारी चर्चा में है। सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार महबूब इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक और लेखक थे। शकील बदायूनी के लिखे फिल्म के एक गीत –“दिया ना बुझे री आज हमारा...” की स्वरयोजना नौशाद ने राग भैरवी में की थी। यह नृत्य-गीत लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ में है। आइए, सुनते हैं, यह लुभावना गीत जो नृत्यांगना-अभिनेत्री कुमकुम और साथियों पर फिल्माया गया था।

राग भैरवी : “दिया ना बुझे री आज हमारा...” : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म – सन ऑफ इण्डिया


 राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।


मालिनी राजुरकर
 भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको राग भैरवी में निबद्ध आकर्षक टप्पा और तराना का गायन सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग भैरवी का मोहक टप्पा और तराना। आप इस टप्पा का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : टप्पा - “लाल वाला जोबन...” और तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर




संगीत पहेली

 ‘स्वरगोष्ठी’ के 298वें और 299वें अंक में हम आपसे संगीत पहेली में हम आपसे कोई भी प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं। पहेली को निरस्त करने का कारण यह है कि हमारे अगले दो अंक संगीत पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों पर ही केन्द्रित है। ‘स्वरगोष्ठी’ के 300वें अंक से हम संगीत पहेली का सिलसिला पुनः आरम्भ करेंगे।

पिछली पहेली के विजेता

 ‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 296 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – हमीर, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – मोहम्मद रफी

 इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।


अपनी बात

 मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर अब तक जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की यह समापन कड़ी थी। आज के अंक में आपने राग भैरवी की प्रस्तुतियों का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने थे। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का साभार सहयोग लिया था। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा था। यदि आप भी किसी नई श्रृंखला, राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को संगीत पहेली के महाविजेताओ की प्रस्तुतियों पर आधारित एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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