Saturday, November 15, 2014

"हमको हँसते देख ज़माना जलता है..." - जानिये कैसे एक दूसरे की मदद की थी रफ़ी और दुर्रानी ने


एक गीत सौ कहानियाँ - 45
 

हमको हँसते देख ज़माना जलता है...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 45वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' के गीत "हमको हँसते देख ज़माना जलता है..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफी और जी. एम. दुर्रानी ने गाया था।



जी. एम. दुर्रानी
र कलाकार का अपना एक वक़्त होता है जब उसकी चमक, उसका तेज सूरज की तरह होता है, और फिर एक ऐसा समय आता है जब यह चमक धीरे धीरे कम होने लगती है, उस कलाकार का वक़्त पूरा हुआ चाहता है। कुछ कलाकारों का यह वक़्त लम्बा होता है, और कुछ कलाकारों का छोटा। गायक जी. एम. दुर्रानी के गाये हुए गीतों की कामयाबी का दौर केवल 6-7 साल चला, यानी 1943 से 1951 तक। और फिर न जाने क्या हुआ कि फ़िल्मी दुनिया उनसे दूर होती चली गई। मोहम्मद रफ़ी, जो दुर्रानी साहब के नक्श-ए-क़दम पर, उन्हीं की आवाज़ का अनुकरण कर पार्श्वगायन की दुनिया में उतरे थे, वो कामयाबी की ऊँचाइयाँ चढ़ते चले गये, जबकि मूल आवाज़ का मालिक जी. एम. दुर्रानी ढलान पर उतरते चले गये। जी. एम. दुर्रानी के अपने शब्दों में - "मैं जब टॉप पर था, शोहरत की ऊँचाइयों पर था, मैंने गाना छोड़ दिया। मेरे गाना छोड़ने के दो ओजुहात हैं। सबसे पहली वजह तो यह है कि उपरवाले की मर्ज़ी। यानी जिसने आपको, मुझको, तमाम दुनिया वालों को पैदा किया है, उसके क़रीब पहुँचने के लिए मैंने गाना बजाना और यह फ़िल्म लाइन छोड़ दिया। बंगले में रहना, गाड़ियों में घूमना, नोटों को गिनना, उसके पीछे-पीछे भागना, यह बात सन् 1951 की है। मैने किसी फ़िल्मवाले को देख कर गर्दन नीची कर लिया करता था और सोचता था कि इससे बात करूँगा तो फ़िजूल बातें मुँह से निकलेंगी और दाढ़ी भी मैंने इसलिए बढ़ा ली थी कि कोई मुझे जल्दी पहचान ना सके।बस मेरे दिल में यह होता रहता कि गाना बजाना, फ़िल्म लाइन, ये सब बुरी बातें हैं। मैंने बैंक से थोड़े से कुछ पैसे निकाल कर लोगों में, ग़रीबों में बाँटने शुरु कर दिये और बे-नियाज़ हो गया। अंजाम यह हुआ कि मैं फ़क्कड़ हो गया। फिर साहब, किसी से मैंने थोड़े से क़र्ज़-वर्ज़ लेकर जनरल मर्चैन्ट की दुकान खोल ली।" और इस तरह से गुज़रे ज़माने का एक शानदार गायक और संगीतकार बन गया एक मामूली दुकानदार।

दुर्रानी और रफ़ी
आज जब रफ़ी और दुर्रानी के गाये युगल गीत की बात चली है तो यह बताना बेहद ज़रूरी है कि रफ़ी साहब के संघर्ष के दिनों में दुर्रानी साहब ने उनकी बड़ी मदद की थी। यह वह वक़्त था जब जी. एम. दुर्रानी और कुन्दनलाल सहगल जैसे कुछ ही गायक फ़िल्म जगत में डिमाण्ड में थे। ऐसी स्थिति में किसी नये गायक का इस उद्योग में क़दम जमाना और मशहूर बनना आसान काम नहीं था। ऐसे समय में मोहम्मद रफ़ी ने फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में पाँव रखने का निर्णय लिया और अपने संघर्ष की शुरुआत कर दी। तब जी. एम. दुर्रानी साहब ही एक मसीहा बन कर उनके सामने आये और उन्हें काम दिलवाने में उनकी बहुत मदद की। दुर्रानी साहब अच्छे गायक व संगीतकार तो थे ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा अच्छे और भले इंसान भी थे। और यही कारण था कि एक ही व्यावसाय में होते हुए भी काम ढूँढ रहे रफ़ी को वो संगीतकार श्यामसुन्दर के पास ले गये। उन्होंने इस बात का तनिक भी विचार नहीं किया कि अगर रफ़ी का सितारा चमक गया तो उन्हीं की पेट पर लात पड़ सकती है। और श्यामसुन्दर से वो रफ़ी की सिफ़ारिश कर दी, और फ़िल्म 'गाँव की गोरी' के एक गाने में कोरस में गाने का मौका दिलवा दिया। इस सिफ़ारिश और दुर्रानी साहब के मदद का ही नतीजा था कि रफ़ी साहब को थोड़ा-थोड़ा काम मिलने लगा। और फिर अपनी मेहनत, लगन, प्रतिभा और ईश्वर-प्रदत्त आवाज़ के बल पर मोहम्मद रफ़ी बन गये हिन्दी सिनेमा संगीत जगत के महागायक।

ओ. पी. नय्यर
जब रफ़ी का सितारा दिन-ब-दिन चढ़ता चला जा रहा था, तब दुर्भाग्यवश जी. एम. दुर्रानी साहब का करीयर धीरे-धीरे ढलान पर आ गया। काम कम हो गया, काम नहीं मिलने की वजह से आमदनी कम हो गई, और घर में धीरे-धीरे मुफ़लिसी आने लगी। उपर लिखे दुर्रानी के शब्दों से प्रतीत होता है कि उन्होंने ही फ़िल्म लाइन छोड़ दी, पर हक़ीक़त यही था कि उन्हें काम मिलना बन्द हो गया था। नई पीढ़ी के गायकों के आने से सहगल-दुर्रानी युग समाप्त हो चुका था। दुर्रानी साहब की माली हालत बद से बदतर हो गई। उनकी इस ग़रीबी का पता रफ़ी साहब को चला और उन्हें बड़ी तक़लीफ़ हुई। अपने आइडल गायक, जिनकी आवाज़ का अनुसरण कर वो गायन के इस क्षेत्र में उतरे थे, जिन्हें वो अपना गुरु मानते थे, उस इंसान को ग़रीबी से परेशान देख वो ख़ुद भी बेचैन हो उठे और उन पुराने दिनों को याद करते हुए दुर्रानी साहब को हरसम्भव मदद करने का फ़ैसला लिया। रफ़ी साहब नय्यर साहब के पास जा कर उन्होंने रीक्वेस्ट की कि वो 1956 में बनने वाली फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' के गाने में रफ़ी साहब के साथ दुर्रानी साहब को भी गाना गवाये। नय्यर साहब ने बात मान ली और इस फ़िल्म में एक गाना ऐसा रखा गया जिसमें नायक और हास्य चरित्र, दोनों गाते हैं। इस सिचुएशन के लिए रफ़ी साहब के साथ दुर्रानी का गाया गीत रखा गया। यह गीत था "हमको हँसते देख ज़माना जलता है..."। इस गीत के अलावा भी कुछ और संगीतकारों से कह कर रफ़ी साहब ने दुर्रानी साहब को गाने दिलवाये। जहाँ तक मेरा ख़याल है रफ़ी और दुर्रानी ने साथ में पहला डुएट 1946 की फ़िल्म 'सस्सी पुन्नु' में गाया था, गोविन्दराम के संगीत निर्देशन में। 'हम सब चोर हैं' के अलावा ओ. पी. नय्यर ने रफ़ी और दुर्रानी को साथ में फ़िल्म 'मुसाफ़िरख़ाना' में भी गवाया था जिसके बोल थे "कुछ आँख मिली कुछ पैसा मिला..."। इसके करीब 10 साल बाद भी नय्यर साहब ने दुर्रानी को 1966 में फ़िल्म 'अक्लमन्द' के एक गीत में गाने का मौका दिया जिसमें महेन्द्र कपूर और भूपेन्द्र की आवाज़ें भी थीं और गीत के बोल थे "ओ बेख़बर तुझको क्या पता..."। संगीतकार नाशाद ने रफ़ी और दुर्रानी से एक डुएट गवाया था, 1959 की फ़िल्म 'ज़रा बच के' में जिसके बोल थे "ऐ इश्क़ इसे बरबाद ना कर..."। रफ़ी और दुर्रानी ने साथ में मिल कर कुछ 6 डुएट गाने और कुछ कोरस भी गाये। इस तरह आगे चलकर भी नेकदिली का रफ़ी साहब को जब भी मौका मिला तो उन्होंने इस मौके को नहीं गँवाया, और सारी ज़िन्दगी उन्हें जहाँ पर भी लगा, वो हमेशा दूसरों के काम आये। गुरु-शिष्य के सम्बन्ध का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है कि शुरु में गुरु ने शिष्य को स्थापित करने का हर सम्भव प्रयास किया, और जब शिष्य स्थापित हो गया और गुरु के बुरे दिन आये तो उसी शिष्य ने अपने गुरु की हर सम्भव सेवा की। गुरु जी. एम. दुर्रानी और शिष्य मोहम्मद रफ़ी को हमारा नमन। अब आप गुरु-शिष्य के अनूठे सम्बन्ध को रेखांकित करता हुआ यह गीत सुनिए।

फिल्म - हम सब चोर हैं : 'हमको हँसते देख ज़माना जलता है...' : जी. एम. दुर्रानी और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

1 comment:

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी said...

बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

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