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"रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" - कैसे बना था एक ही शॉट में फ़िल्माये जाने वाले हिन्दी सिनेमा का यह पहला गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 44
 

रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 44-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आराधना' के मशहूर गीत "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना..." के बारे में।


'आराधना' कई कारणों से हिन्दी सिनेमा की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म है। जहाँ एक तरफ़ इस फ़िल्म ने अभिनेता राजेश खन्ना को स्टार बना दिया, वहीं दूसरी ओर गायक किशोर कुमार के करीयर की गाड़ी को सुपरफ़ास्ट ट्रैक पर ला खड़ा किया। एक लो बजट फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने लाखों का मुनाफ़ा कमाया। फ़िल्म-संगीत के चलन की अगर बात करें तो यह एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म रही जिसने 70 के दशक के फ़िल्म-संगीत शैली की नीव रखी। कहने का मतलब है कि 'आराधना' के गीतों की जो स्टाइल थी, वही स्टाइल आगे चलकर 70 के दशक के फ़िल्मी गीतों की स्टाइल बनी। यही नहीं इस फ़िल्म में शर्मीला टैगोर ने साड़ी जिस स्टाइल से पहनी थी, उस ज़माने की लड़कियों ने भी उस स्टाइल को अपनाया। राजेश खन्ना, आनन्द बक्शी और राहुलदेव बर्मन की तिकड़ी भी इसी फ़िल्म से शुरू हुई (हालाँकि इस फ़िल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे)। 'आराधना' रिलीज़ हुई थी 1969 में 'बान्द्रा टॉकीज़' में, और मद्रास के एक थिएटर में यह फ़िल्म लगातार दो साल चली थी। 'आराधना' के गीत-संगीत से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह है कि रफ़ी और किशोर, दोनों ने कैसे एक ही नायक का पार्श्वगायन किया, जबकि उस ज़माने में एक फ़िल्म में एक नायक का पार्श्वगायन एक ही गायक करता था। इस मुद्दे पर दो थियरी सुनने को मिलती है जिसे हम इस लेख में उजागर करने जा रहे हैं। पहली थिअरी है ख़ुद शक्ति दा की जो उन्होंने विविधभारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे। शक्ति दा के शब्दों में - "शुरू में यह तय हुआ था कि मोहम्मद रफ़ी इस फ़िल्म के सभी गीतों को गायेंगे। पर वो एक लम्बे वर्ल्ड टूर पर निकल गये, इसलिए आपस में बातचीत कर यह तय हुआ कि किशोर कुमार को इस फ़िल्म के गीतों को गाने के लिए लाया जाये। पर उस समय किशोर कुमार देव आनन्द के लिए पार्श्वगायन किया करते थे, इसलिए मैं श्योर नहीं था कि किशोर एक नये हीरो के लिए गायेगा या नहीं। मैंने किशोर को फ़ोन किया। वो तब तक अशोक कुमार के ज़रिये मेरा दोस्त बन चुका था। किशोर ने कहा कि वो देव आनन्द के लिए गाता है। तो मैंने कहा कि नख़रे क्यों कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाये! किशोर राज़ी हो गया और इस तरह से पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। एक एक करके तीन गाने रेकॉर्ड हो गये - "कोरा कागज़ था यह मन मेरा...", "मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू...." और "रूप तेरा मस्ताना..."। जब रफ़ी वर्ल्ड टूर से वापस आए तो उन्होंने बाक़ी के दो गीत गाये - "गुनगुना रहे हैं भँवरें...." और "बाग़ों में बहार है..."।"


दूसरी थिअरी का पता हमें चला अन्नु कपूर से, उन्ही के द्वारा प्रस्तुत 'सुहाना सफ़र' कार्यक्रम में। "उन दिनों यह प्रचलन था कि फ़िल्म के शुरू होने पर लौन्चिंग पैड के तौर पर फ़िल्म के दो गाने रेकॉर्ड होते थे, और गानो के रेकॉर्ड होने की ख़बर इंडस्ट्री के प्रचलित अख़्बार 'स्क्रीन' में छप जाती थी। फ़िल्म के गीतों को गाने के लिए सचिनदेव बर्मन की पहली पसन्द थे मोहम्मद रफ़ी साहब। और यही वजह थी कि उन्होंने फ़िल्म के दो गीत रफ़ी से गवाये। "गुनगुना रहे हैं ..." और "बाग़ों में बहार है..."। इससे पहले कि वो और गानों को रेकॉर्ड करवा पाते, दादा की तबीयत ख़राब हो गई, बीमार पड़ गये। हेल्थ के हाथों मजबूर दादा के संगीत की ज़िम्मेदारी आन पड़ी उनके बेटे पंचम के कन्धों पर। पंचम की किशोर कुमार से बहुत अच्छी दोस्ती थी। और वो किशोर कुमार को, ऐज़ ए सिंगर लाइक भी बहुत करते थे। लेकिन किशोर कुमार का उस वक़्त करीयर अच्छा नहीं चल रहा था। पंचम के दिमाग़ में यह बात बस गई और उन्होंने किशोर कुमार की आवाज़ को लेने का निर्णय ले डाला। पंचम का मानना था कि राजेश खन्ना एक नया आर्टिस्ट है जिसके उपर किशोर की आवाज़ बहुत फ़िट रहेगी। बहुत सारी चीज़ों का ध्यान रखते हुए, उनके अपने विचार होंगे, किशोर कुमार के साथ रिहर्सलें शुरू कर दी। पंचम के साथ "मेरे सपनों की रानी...", "कोरा कागज़ था..." और "रूप तेरा मस्ताना...", इन गानों की तैयारी करनी शुरू कर दी। जब गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग चल रही थी, तब पिताजी यानी सचिनदेव बर्मन की हालत में कुछ सुधार आ गया और वो फ़ाइनल रेकॉर्डिंग को सुनने स्टुडियो जा पहुँचे। वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि किशोर गाना गा रहा है। पंचम से बोले कि ये तूने क्या किया? मैं रफ़ी से गाने गवाना चाहता था क्योंकि वो इंडस्ट्री की नम्बर वन आवाज़ है, डिस्ट्रिब्युटर्स और फ़ाइनन्सर्स की वो पहली पसन्द है, वैसे भी राजेश खन्ना की पहले आई तीन फ़िल्में फ़्लॉप हो चुकी हैं, कम से कम गानों की वजह से तो फ़िल्म प्रोमोट की जा सकती है। क्या तुझे रफ़ी की आवाज़ में रेकॉर्ड की हुई पहले दो गीतों में कोई कमी लगी है? पंचम ने बहुत शान्त भाव से उत्तर दिया कि आप सही कह रहे हैं बाबा, मैंने वो दोनो गीत सुने हैं, और कहीं से भी कमतर नहीं है। पर बचे हुए गीतों के लिए मुझे लगा कि किशोर की आवाज़ बहुत ऐप्ट और पर्फ़ेक्ट रहेगी। मैं चाहता हूँ कि एक बार आप सुनें और फिर कहें। सचिन दा ने जब किशोर की आवाज़ में वो तीनो गाने सुने तो ख़ुश हो गये। पंचम ने उनकी रॉ ट्युन्स को जिस फ़ैशन में फ़ाइनल टच किया था, वो सचमुच बेहतरीन था। गाने फ़ाइनली किशोर की ही आवाज़ में रेकॉर्ड हुए। जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो किशोर के गाये इन गीतों को बहुत कामयाबी मिली। और इस फ़िल्म के गीत "रूप तेरा मस्ताना..." के लिए किशोर कुमार को उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। और इस तरह से इसी फ़िल्म के साथ कमबैक हुआ किशोर कुमार का।"

सचिन दा, शक्ति दा, राजेश खन्ना और पंचम
अब इन दोनों थिअरी में से कौन सी थिअरी सच है और कौन सी ग़लत, यह कह पाना मुश्किल है। पर एक बात जो सच है, वह यह कि "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना..." गीत की जो कम्पोज़िशन दादा सचिनदेव बर्मन ने बनाई थी, उसमें उतना सेन्सुअसनेस नहीं था। सीन जितना बोल्ड था, उस हिसाब से गीत की धुन ठंडी थी। रिहर्सल करते समय किशोर कुमार ने इसमें अपना अंदाज़ डाल दिया, मुड़कियाँ कम कर दीं और अपनी आवाज़-ओ-अंदाज़ में ऐसी सेन्सुअस अपील ले आये कि सीन के साथ पर्फ़ेक्ट मैच कर गया। कहना ज़रूरी है कि फिर इसके बाद इस तरह का मेल सेन्सुअस गीत दूसरा नहीं बन पाया है। अब इस गीत के पिक्चराइज़ेशन की कहानी भी सुन लीजिये। शक्ति सामन्त अपने गीतों के पिक्चराइज़ेशन के बारे में रात को अपने कमरे में बैठ कर गीतों को सुनते हुए सोचा करते थे और पिक्चराइज़ेशन की प्लैनिंग किया करते थे। तो इस गीत को जैसे वो सुन रहे थे, अचानक से उनके दिमाग़ में यह ख़याल आया कि इस गीत को एक ही शॉट में फ़िल्माया जा सकता है। उन्होंने एक कागज़ लिया और उस पर A, B, C लिखा - A हीरो के लिए, B हीरोइन के लिए, C कैमरे के लिए, और अपने मन-मस्तिष्क में गीत का पूरा फ़िल्मांकन कर बैठे। शूटिंग के दिन उन्होंने एक राउन्ड ट्रॉली मँगवाया और 'फ़िल्मालय' स्टुडियो में इसकी शूटिंग शुरू की। शुरू शुरू में कुछ लोगों ने उनके इस विचार का विरोध किया था कि गीत को एक ही शॉट में फ़िल्माया जाये। किसी ने कहा भी था कि इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शॉट में ले रहा है। तब शक्ति दा ने यह दलील दी कि जब रात को मैं यह गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि "कट" कहाँ पर बोलूँ? इस तरह से यह गीत हिन्दी सिनेमा का वह पहला गीत बना जो एक ही शॉट में फ़िल्माया गया था। बस इतनी सी ही थी इस गीत के बनने की कहानी।  लीजिए, अब आप वह गीत सुनिए।

फिल्म - आराधना : 'रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना...' : किशोर कुमार : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - आनन्द बक्शी 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ'' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 


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2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


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