Sunday, February 9, 2014

बसन्त ऋतु और राग बहार SWARGOSHTHI – 154



स्वरगोष्ठी – 154 में आज

ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन राग बहार से


‘कलियन संग करता रंगरेलियाँ...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, पिछले अंक में हमने बसन्त पंचमी के उपलक्ष्य मे राग बसन्त के माध्यम से ऋतुराज का स्वागत किया था और भारतीय संगीत के महान रत्न पण्डित भीमसेन जोशी को उनके जन्मदिवस पर स्मरण किया था। आज संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में बसन्त ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले एक और राग, बहार की चर्चा होगी। साथ ही पण्डित भीमसेन जोशी को एक बार पुनः उन्हीं की कृति के माध्यम से स्मरण करेंगे। भारतीय संगीत के विश्वविख्यात कलासाधक और सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत पण्डित भीमसेन जोशी का जन्म भी बसन्त ऋतु में 4 फरवरी, 1922 को हुआ था। बसन्त ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले कुछ मुख्य रागों की चर्चा का यह सिलसिला हमने गत सप्ताह से आरम्भ किया है। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में आज हम आपसे राग बहार पर चर्चा करेंगे।  

 



 पिछले अंक में हमने आपसे राग बसन्त के बारे में चर्चा की थी। ऋतुओं पर आधारित रागों की श्रृंखला में आज बारी है, राग बहार की। राग बहार एक प्राचीन राग है, जिसमें शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत की रचनाएँ भरपूर मिलतीं हैं। इस राग के स्वर समूह बासन्ती परिवेश रचने में पूर्ण समर्थ हैं। चूँकि राग बहार ऋतु प्रधान राग है, अतः बसन्त ऋतु में इसका गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। अन्य ऋतुओं में इसे रात्रि के प्रथम और द्वितीय प्रहर में ही गाने-बजाने की परम्परा है। काफी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण है, अर्थात आरोह में छः और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। बहार में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है, आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर वादी और षडज स्वर संवादी माना जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सा म, प (कोमल) म, ध, नि सां तथा अवरोह के स्वर हैं- रें नि सां ध नि (कोमल) प, म प (कोमल) म, रे सा । कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ और अवरोह में धैवत का प्रयोग नहीं करते। ऐसी स्थिति में यह राग षाड़व-षाड़व जाति का होता है। आइए अब हम आपको राग बहार की एक मनमोहक बन्दिश सुनवाते हैं। द्रुत तीनताल में निबद्ध इस रचना को महान गायक पण्डित भीमसेन जोशी ने स्वर प्रदान किया है। 



राग बहार : ‘कलियन संग करता रंगरेलियाँ...’ : पण्डित भीमसेन जोशी : द्रुत तीनताल



कुछ विद्वान मानते हैं कि राग बहार का सृजन राग बागेश्री और कान्हड़ा के मेल से हुआ है। राग बहार का अन्तरा राग मियाँ की मल्हार के काफी निकट प्रतीत होता है। राग बहार के गायन के बाद अब हम यही राग आपको वाद्य संगीत में सुनवाएँगे। विश्वविख्यात वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग का एक ग्रामोफोन रिकार्ड है, जिसमें उन्होने राग बहार का अत्यन्त आकर्षक वादन प्रस्तुत किया है। पण्डित वी.जी. जोग का जन्म 22 फरवरी, 1922 को मुम्बई में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें पण्डित शंकरराव आठवले और पण्डित गणपतराव पुरोहित से मिली। बाद में उन्होने लखनऊ आकर मैरिस म्युजिक कालेज (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) के तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातञ्जंकर से न केवल संगीत-शिक्षा प्राप्त की बल्कि 1952 तक इसी कालेज में वायलिन शिक्षक के रूप में कार्य भी किया। जोग साहब जुगलबन्दी के बादशाह थे। उन्होने देश-विदेश के अनेक ख्यातिप्राप्त कलासाधकों के साथ वायलिन की जुगलबन्दी की है, किन्तु जो प्रसिद्धि उन्हें उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के साथ जुगलबन्दी करके मिली वह अन्यत्र दुर्लभ था। इन दोनों कलासाधकों ने प्रथम बार 1946 में कोलकाता के लाला बाबू संगीत सम्मेलन में जुगलबन्दी की थी। अपने समय के प्रायः सभी संगीतज्ञों के साथ पण्डित जी की जुगलबन्दी के रिकार्ड, संगीत-प्रेमी आज भी सुनते और सराहते हैं। उस्ताद इनायत खाँ (सितार), पण्डित रामनारायण (सारंगी), पण्डित रविशंकर (सितार), पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया (बाँसुरी), उस्ताद अमजद अली खाँ (सरोद), पण्डित शिवकुमार शर्मा (संतूर), पण्डित ब्रजभूषण काबरा (गिटार) और पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष (हारमोनियम) के साथ जोग साहब की जुगलबन्दियाँ अविस्मरणीय रहीं हैं। उन्होने कई दक्षिण भारतीय वायलिन वादकों और पाश्चात्य संगीत के प्रसिद्ध पियानो वादकों के साथ भी अपनी वायलिन की जुगलबन्दी की है। अब आप पण्डित वी.जी. जोग का बजाया वायलिन पर राग बहार सुनिए। इस प्रस्तुति में द्रुत तीनताल की तबला संगति उस्ताद अहमदजान थिरकवा ने की है।


राग बहार : वायलिन वादन : पण्डित वी.जी. जोग : द्रुत तीनताल




 
हिन्दी फिल्मों में राग बहार का प्रयोग बहुत अधिक तो नहीं हुआ है किन्तु कुछेक फिल्मों में इस राग का बेहतर प्रयोग किया गया है। इन्हीं में से एक अतीत के सुनहरे दौर का एक फिल्मी गीत है। 1943 में रणजीत स्टुडियो द्वारा निर्मित उल्लेखनीय फिल्म ‘तानसेन’ का एक गीत है- ‘बाग लगा दूँ सजनी...’। इस फिल्म में गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल तानसेन की भूमिका में और गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद, तानसेन की प्रेमिका की भूमिका में थीं। संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे। इस संगीतप्रधान फिल्म में उन्होने एक से बढ़ कर एक विभिन्न राग आधारित गीतों की रचना की थी। राग तिलक कामोद, मेघ मल्हार, शंकरा, पीलू और कथित दीपक राग पर आधारित गीतों के बीच एक गीत ‘बाग लगा दूँ सजनी...’ राग बहार पर भी आधारित था, जिसे सहगल ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। लीजिए, अब आप सहगल की आवाज़ में संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश के निर्देशन में राग बहार पर आधारित यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बहार : ‘बाग लगा दूँ सजनी...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म तानसेन : संगीत खेमचन्द्र प्रकाश




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 154वें अंक की पहेली में आज हम आपको तंत्रवाद्य वादन का एक अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – तंत्रवाद्य वादन के इस अंश को सुन कर इस वाद्ययंत्र को पहचानिए और हमे उसका नाम लिख भेजिए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर आपको किस राग का संकेत प्राप्त हो रहा है? राग का नाम लिखें।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 156वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 152वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में गायन का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित भीमसेन जोशी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



 मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों बसन्त ऋतु में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

 

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