Thursday, October 31, 2013

सूफी संगीत की समृद्ध परंपरा

सूफी संगीत पर हमारी श्रृंखला की चौथी और अंतिम कड़ी लेकर आज हम हाज़िर हैं. आशा है संज्ञा टंडन द्वारा प्रस्तुत इस श्रृंखला का आपने भरपूर आनंद लिया होगा. अगर कोई कड़ी आपसे छूट गयी हों तो आप निम्न लिंक्स पर जाकर सुन सकते हैं.




और अब सुनें ये अंतिम कड़ी. हमें आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.  

Tuesday, October 29, 2013

बकरी दो गाँव खा गई ~ हरिकृष्ण देवसरे

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अभिषेक ओझा की दार्शनिक कहानी "संयोग" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं डॉ. हरिकृष्ण देवसरे की कहानी "बकरी दो गाँव खा गई", अर्चना चावजी की आवाज़ में।

कहानी "बकरी दो गाँव खा गई" का कुल प्रसारण समय 5 मिनट 52 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



प्रसिद्ध लेखक हरिकृष्ण देवसरे विज्ञान प्रसार से जुड़े हैं

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"एक आदमी आगरा की सड़कों पर रोता चिल्लाता घूम रहा था।"
(हरिकृष्ण देवसरे की "बकरी दो गाँव खा गई" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
बकरी दो गाँव खा गई MP3
#34th Story, Bakri do gaon kha gai : Hari Krishna Devsare/Hindi Audio Book/2011/34. Voice: Archana Chaoji

Sunday, October 27, 2013

‘मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ...’ : राग अहीर भैरव में भक्तिरस

  
स्वरगोष्ठी – 141 में आज

रागों में भक्तिरस – 9

पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में सन्त नामदेव का पद



रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तम्भ स्वरगोष्ठी के मंच पर जारी लघु श्रृंखला रागों में भक्तिरस की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे प्रातःकालीन राग अहीर भैरव की चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम दो भक्तिरस से अभिप्रेरित रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। पहले आप सुनेंगे राग अहीर भैरव के स्वरों में पिरोया सन्त नामदेव का एक भक्तिपद, भारतरत्न पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में। इसके उपरान्त हम प्रस्तुत करेंगे, 1982 में प्रदर्शित फिल्म रामनगरी का समर्पण भाव से परिपूर्ण एक भक्तिगीत। 




पं. भीमसेन जोशी 
स श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम यह उल्लेख कर चुके हैं कि भारतीय संगीत का सर्वाधिक विकास वैदिक युग में हुआ था। संगीत के द्वारा ईश्वर की आराधना का स्वरूप वैदिक युग से ही सम्पूर्ण विश्व में फैला। यूनान के विद्वान ओवगीसा ने ‘दी ओल्डेस्ट म्यूजिक ऑफ दी वर्ल्ड’ नामक अपनी पुस्तक में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि इस काल के संगीत का शास्त्रीय रूप इतना पवित्र और शुद्ध था कि उसकी तुलना में विश्व के किसी भी देश के संगीत में वैसा उत्तम रूप नहीं मिलता। वैदिक युग के बाद भारतीय संगीत का अगला पड़ाव पौराणिक युग में होता है। इस युग में जनसामान्य का झुकाव शास्त्रगत संगीत की अपेक्षा लोक-गीत और नृत्य की ओर अधिक हुआ। विभिन्न कालखण्डों में उत्तरोत्तर विकसित होती इस संगीत-परम्परा का आध्यात्मिक स्वरूप मध्यकाल अर्थात 11वीं से लेकर 13वीं शताब्दी तक कायम रहा। इस अवधि में क्षेत्रीय भक्ति संगीत ने भी जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया। बारहवीं शताब्दी में तत्कालीन सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र, विशेष रूप से महाराष्ट्र में भक्ति संगीत की अविरल धारा का प्रवाह था। इसी कालखण्ड में महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल पंढरपुर में सगुण और निर्गुण भक्ति के रूप में एक विशेष कीर्तन शैली का विकास हुआ। अभंग नाम से इस कीर्तन शैली को जनमानस में लोकप्रिय करने का श्रेय दो सन्त कवियों-गायकों, सन्त नामदेव और सन्त ज्ञानेश्वर को प्राप्त है। डॉ. हेमन्त विष्णु इनामदार ने अपनी पुस्तक ‘सन्त नामदेव’ में यह उल्लेख किया है कि आरम्भ में सन्त नामदेव परमेश्वर के सगुण स्वरुप विठ्ठल के उपासक थे। जबकि सन्त ज्ञानेश्वरजी निर्गुण के उपासक थे। सन्त ज्ञानेश्वर के सान्निध्य में सन्त नामदेव सगुण भक्ति से निर्गुण भक्ति की ओर प्रवृत्त हुए। अद्वैतवाद एवं योग मार्ग के पथिक बन गए। सन्त नामदेव ने सन्त ज्ञानेश्वए के साथ सम्पूर्ण भारत के तीर्थों की यात्रा की। उन्होंने 18 वर्षो तक पंजाब में भगवन्नाम का प्रचार किया। भक्त नामदेव की वाणी में सरलता है। वह ह्रदय को बाँधे रखती है। उनके प्रभुभक्ति भरे भावों एवं विचारों का प्रभाव पंजाब के लोगों पर आज भी है। श्री गुरुग्रन्थ साहिब में उनके 61 पद, 3 श्लोक, 18 रागों में संकलित हैं। ‘मुखबानी’ नामक ग्रन्थ में उनकी रचनाएँ संग्रहित हैं। निर्गुण भक्ति के संतों में अग्रिम सन्त नामदेव उत्तर भारत की सन्त परम्परा के प्रवर्तक माने जाते हैं। मराठी सन्त-परम्परा में वह सर्वाधिक पूज्य संतों में एक हैं। उन्होंने मराठी और हिन्दी में हजारों अभंग और पद रचे हैं। आज हम आपको सन्त नामदेव का एक अभंग भारतरत्न पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। पण्डित जी ने इस अभंग को राग अहीर भैरव के स्वरों में पिरोया है।

राग अहीर भैरव : सन्त नामदेव रचित अभंग : ‘तीर्थ विट्ठल क्षेत्र विट्ठल...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


हरिहरन 
नीलम साहनी 
सन्त नामदेव रचित यह भक्तिपद राग अहीर भैरव पर आधारित था। अहीर भैरव एक प्राचीन राग है, जिसमें प्राचीन राग अभीरी या अहीरी और भैरव का मेल है। स्वरों के माध्यम से भक्तिरस को उकेरने में सक्षम इस राग में कोमल ऋषभ और कोमल निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। राग अहीर भैरव के आरोह-अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। भातखण्डे जी द्वारा प्रवर्तित दस थाट की सूची में यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। दक्षिण भारतीय कर्नाटक पद्यति का राग चक्रवाक, इस राग के समतुल्य है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग का गायन-वादन दिन के प्रथम प्रहर में अर्थात प्रातःकाल के समय अत्यन्त सुखदायी होता है। आपको राग अहीर भैरव पर आधारित फिल्मी भजन सुनवाने के लिए आज फिर हमने संगीतकार जयदेव का ही एक गीत चुना है। इस लघु श्रृंखला के पहले और छठे अंक में हमने जयदेव के स्वरबद्ध किये क्रमशः फिल्म ‘आलाप’ और ‘हम दोनों’ के राग आधारित भक्तिगीत प्रस्तुत कर चुके हैं। आज के इस अंक में हम पुनः संगीतकार जयदेव का ही स्वरबद्ध, 1982 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामनगरी’ एक कीर्तन गीत लेकर उपस्थित हैं। यह भक्तिगीत राग अहीर भैरव के स्वरों में पिरोया हुआ है। रूपक ताल में बँधे इस गीत को ए. हरिहरन और नीलम साहनी ने स्वर दिया है। गीतकार हैं, नक्श लायलपुरी।


राग अहीर भैरव : ‘मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ...’ : ए. हरिहरन और नीलम साहनी : फिल्म ‘रामनगरी’


आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 141वीं संगीत पहेली में हम आपको वाद्य संगीत पर एक राग रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 143वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 139वीं संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अमजद अली खाँ के सरोद वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल रूपक। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे राग अहीर भैरव, सन्त नामदेव और उनके द्वारा प्रवर्तित अभंग गायकी पर चर्चा की। इसके साथ ही पण्डित भीमसेन जोशी द्वारा प्रस्तुत एक अभंग का आस्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक अत्यधिक प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, October 26, 2013

मन्ना दा को समर्पित है आज की 'सिने पहेली'...

सिने पहेली – 85

  


"होगा मसीहा सामने तेरे, फिर भी न तू बच पायेगा, तेरा अपना ख़ून ही आख़िर तुझको आग लगायेगा, आसमान में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जायेंगे....", कल टेलीविज़न पर मन्ना दा के अन्तिम सफ़र को देखते समय उन्ही के गाये फ़िल्म 'उपकार' के इस गीत के इन बोलों में इस नश्वर संसार के कटु सत्य को एक बार फिर से महसूस कर जैसे मन काँप सा उठा। मन्ना दा चले गये.... हमेशा के लिए.... बहुत बहुत दूर। और हमसे कह गये "जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है, आँधी से तूफ़ाँ से डरता नहीं है, तू न चलेगा तो चल देंगी राहें, मइल को तरसेंगी तेरी निगाहें, तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा..."। मन्ना दा भी निरन्तर अपने जीवन पथ पर चलते रहे, बिना रुके, और करते रहे साधना, सुरों की। 

संगीत की वादियों में गूंजती अनगिनत आवाज़ों में इस सुर-साधक की आवाज़ सबसे अलग है। इनके स्वर कभी नभ से विराटता रचते हैं, और कभी सागर की गहराई का अहसास कराते हैं। वो चाहे रुमानीयत हो, वीर रस के ओजपूर्ण गीत हो, हास्य की गुदगुदाहट हो, या फिर अपने आराध्य को अर्पित भक्ति की स्वरांजलि, इस साधक का स्वर एक ऐसा अलौकिक संसार रचते हैं जहाँ केवल आनन्द ही आनन्द है। पिछले कई दशकों से पार्श्व गायन की दुनिया के गंधर्व मन्ना डे के गाये गीत हवाओं पर सवार होकर नदी, पहाड़, समुन्दर लांघ कर हमारे दिल में उतरते रहे हैं। पार्श्व गायन के इस वरिष्ठ कलाकार की साधना उसी समर्पण से, उसी लगन से, उनके अन्तिम समय तक जारी रहा। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से इस महान सुर-गंधर्व को सहस्र नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि।

आज मन्ना दा का शरीर भले पंच-तत्वों में विलीन हो गया है, पर एक कलाकार कभी इस संसार से दूर नहीं होते। उनकी कला उन्हें कर देती है अमर। मन्ना दा के गाये असंख्य गीत युगों युगों तक दुनिया की फ़िज़ाओं में गूंजते रहेंगे। उनकी शास्त्रीय संगीत आधारित रचनायें नई पीढ़ियों को सिखाते रहेंगे संगीत साधना की बारीकियाँ, उनके दार्शनिक गीत पढ़ाते रहेंगे जीवन पथ पर निरन्तर बढ़ते रहने का पाठ। आज की यह 'सिने पहेली' समर्पित है मन्ना दा की पुण्य स्मृति को।




आज की पहेली : ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय....

प्रश्न-1: नीचे दिये दो तस्वीरों में एक तो मन्ना दा हैं, बाक़ी दो कौन कौन हैं? (1.5x2=3)




प्रश्न-2: नीचे दिये हुए तस्वीरों में मन्ना दा के गाये फ़िल्मी गीतों के दृश्य हैं। क्या आप इन गीतों को पहचान सकते हैं? (7x1=7)









उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 85" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 31 अक्टुबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।





पिछली पहेली का हल

1. खाद्य पदार्थ- समोसा, गीत- जब तक रहेगा समोसे में आलू, फ़िल्मी कलाकार- अक्षय कुमार

2. खाद्य पदार्थ- बटाटा बडा, गीत- बटाटा वडा...बटाटा वडा...दिल नहीं देना था, देना पडा, फ़िल्मी कलाकार- अनिल कपूर

3. खाद्य पदार्थ- दाल रोटी, गीत- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ, फ़िल्मी कलाकार- सायरा बानो

4. खाद्य पदार्थ- बैंगन का भर्ता, गीत- आलू की भाजी..बैंगन का भर्ता, बोलो जी बोलो क्‍या खाओगे, फ़िल्मी कलाकार- राखी

5. खाद्य पदार्थ- हलवा, गीत- आ गया आ गया..हलवा वाला आ गया, फ़िल्मी कलाकार- मिथुन चक्रवर्ती

6. खाद्य पदार्थ- सोन पापडी, गीत- सोन पापडी... मेरी सोन पापडी, फ़िल्मी कलाकार- रवीना टण्‍डन

7. खाद्य पदार्थ- रसगुल्‍ला, गीत- एक रसगुल्‍ला कहीं फट गया रे....फट के जलेबी से लिपट गया रे, फ़िल्मी कलाकार- गोविन्‍दा

8. खाद्य पदार्थ- मोतीचूर लड्डू, गीत- सुन राजा शादी लड्डू मोतीचूर का, फ़िल्मी कलाकार- अरूणा ईरानी

9. खाद्य पदार्थ- आईस क्रीम, गीत- चोकलेट..लाईमज्‍यूस..आईसक्रीम..टॉफियॉं, फ़िल्मी कलाकार- माधुरी दीक्षित

10. खाद्य पदार्थ- पान, गीत- खाईके पान बनारस वाला, फ़िल्मी कलाकार- अमिताभ बच्‍चन



पिछली पहेली के विजेता

'सिने पहेली - 84' में इस बार कुल 4 प्रतियोगियों ने हिस्सा लिया, और सबसे पहले 100% सही जवाब भेज कर 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। बहुत बहुत बधाई विजय जी, आपको।

हमारे नियमित प्रतियोगी चन्द्रकान्त दीक्षित जी ने अपने जवाब के साथ-साथ हमें यह भी बताया कि आजकल वो स्वीडेन गये हुए हैं दो सप्ताहों के लिए, और इन्होंने किसी तरह समय निकाल कर 'सिने पहेली' के जवाब भेजे। लेकिन उससे भी बड़ी बात दीक्षित जी ने बताया कि पहेली के जवाब ईमेल में टाइप करते हुए उन्हें लगा कि जैसे वो भारत में अपने घर में बैठे हैं। दीक्षित जी, वाक़ई आपके इस बात ने हमें छू लिया, और हमें बहुत ख़ुशी भी हुई यह जानकर कि 'सिने पहेली' ने आपको विदेश में होने के बावजूद देश में और अपने घर में होने का हसास कराया। यह भी हमारे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है।

और अब इस सेगमेण्ट के सम्मिलित स्कोर-कार्ड पर एक नज़र...



कौन बनेगा 'सिने पहेली' महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स। 

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जोड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेता के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। आठवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा-



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, अनुमति चाहूँगा, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Friday, October 25, 2013

एक आवाज़ जिसने गज़ल को दिए नए मायने

खमली आवाज़ की रूहानी महक और ग़ज़ल के बादशाह जगजीत सिंह को हमसे विदा हुए लगभग २ साल बीत चुके हैं, बीती १० तारिख को उनकी दूसरी बरसी के दिन, उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने उनके करोड़ों मुरीदों को एक अनूठी संगीत सी डी का लाजवाब तोहफा दिया. "द वोईस बियोंड' के नाम से जारी इस नायब एल्बम में जगजीत के ७ अप्रकाशित ग़ज़लें सम्मिलित हैं, जी हाँ आपने सही पढ़ा -अप्रकाशित. शायद ये जगजीत की गाई ओरिजिनल ग़ज़लों का अंतिम संस्करण होगा, पर उनकी मृत्यु के पश्चात ऐसी कोई एल्बम नसीब होगी ऐसी उम्मीद भी आखिर किसे थी ? 

खुद चित्रा सिंह ने जो खुद भी एक बेमिसाल गज़ल गायिका रहीं हैं, ने इस एल्बम को श्रोताओं के लिए जारी किया यूनिवर्सल मुय्सिक के साथ मिलकर. जगजीत खुद में गज़ल की एक परंपरा हैं और उनकी जगह खुद उनके अलावा और कोई नहीं भर सकता. जगजीत की इस एल्बम में आप क्या क्या सुन सकते हैं आईये देखें. 

निदा फाजली के पारंपरिक अंदाज़ में लिखा गया एक भजन है. धडकन धडकन धड़क रहा है बस एक तेरो नाम ... जगजीत के स्वरों में इसे सुनते हुए आप खुद को ईश्वर के बेहद करीब पायेंगें. नन्हों की भोली बातों में उजली उजली धूप , गुंचा गुंचा चटक रहा है बस एक तेरो नाम  सुनकर जगजीत -निदा के एल्बम इनसाईट  की बरबस ही याद आ जाती है. 

अगली ग़ज़ल एक तेरे करीब आने से  को सुनकर लगता है कि शयद जगजीत के बेहद शुरूआती दिनों की गज़ल रही होगी जो किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो पायी. जाने क्यों बिजलियों को रंजिश है, सिर्फ मेरे ही आशियाने से , आग दिल की सुलगती रहने दो, और भड़केगी ये बुझाने से  अब यहाँ भड़केगी  जैसे शब्दों पे उनकी पकड़ को ध्यान से सुनिए...क्या कहें कमाल ....

अगली ग़ज़ल तो सरापा जगजीत की छाप लिए है. जिंदगी जैसी तम्मना थी नहीं कुछ कम है .... आगे के मिसरे सुनिए - घर की तामीर तस्सवुर ही में हो सकती है, अपने नक़्शे के मुताबिक ये ज़मीन कुछ कम है .... वाह क्या कहने शहरयार साहब. हैरत होती है कि ऐसे नायब हीरे कैसे अप्रकाशित रह गए होंगें. 

दाग दहलवी का लिखा रस्मे उल्फत सिखा गया कोई  सरल शब्दों में बहुत कुछ कहती है. जगजीत की गायिकी शब्दों को एक अलग ही मुकाम दे जाती है. विंटेज जगजीत का मखमली अंदाज़. वहीँ सईद राही की गज़ल खुदा के वास्ते  में किसी और ही दौर के जगजीत नज़र आते हैं. ये क्या कि खुदी हुए जा रहे हो पागल से, ज़रा सी देर तो रुख पे नकाब रहने दो.... वाह.

शायर नसीम काज़मी की एक बेहद खूबसूरत गज़ल है आशियाने की बात करते हो  वैसे चित्रा जी इन ग़ज़लों के साथ कुछ इन ग़ज़लों के बनने की बातें भी अगर बांटती तो सोने पे सुहागा हो जाता. हादसा था गुजर गया होगा , किसके जाने की बात करते हो  जैसे अशआर सुनकर बहुत कुछ महसूस होता है.

अंतिम गज़ल के शायर हैं गुलज़ार साहब. दर्द हल्का है  को सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसे एल्बम कोई बात चले  के लिए पहले इसे चुना गया होगा, मगर बाद में सुझाव बदल दिया गया होगा, क्योंकि उस एल्बम की एक गज़ल में भी गुलज़ार खुद अपनी आवाज़ में इस गज़ल का एक मिसरा बोलते सुनाई दिए हैं आपके बाद भी हर घडी हमने, आपके साथ ही गुज़री है . वही गुलज़ार, वही जगजीत वही जादू....और क्या कहें.

दोस्तों ऐसा तोहफा हाथ से छोडना समझदारी बिलकुल नहीं होगी. ये एल्बम हर हाल में आपकी लाईब्रेरी का हिस्सा हो, हमारी सिफारिश तो यही रहेगी. चलते चलते एक बार फिर चित्रा सिंह का बहुत बहुत आभार जिन्होंने हम जैसे जगजीत प्रेमियों के लिए उनकी आवाज़ को एक बार फिर से जिंदा कर दिया इस खूबसूरत एल्बम का नजराना देकर. आप ओनलाईन भी इन ग़ज़लों का लुत्फ़ उठा सकते हैं नीचे दिए लिंकों में.

गाना डॉट कॉम
स्मैश हिट्स

Thursday, October 24, 2013

अभिनय का नुक्सान, संगीत का फायदा - मीत ब्रो अनजान की तिकड़ी

नए सुर साधक (१)

मनमीत, हरमीत और अनजान (बाएं से दायें)
क्सर जब भी संगीतकार तिकड़ी की बात होती है तो जेहन में शंकर एहसान लॉय का नाम कौंधता है. मगर एक और भी संगीत तिकड़ी है जो धीरे धीरे ही सही मगर इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना रही है, ये हैं मीत बंधू यानी हरमीत और मनमीत जिनके साथ जुड़ते हैं उनके मित्र अनजान. मीत ब्रो अनजान के नाम से मशहूर इस तिकड़ी का रचा हाल ही में प्रकाशित 'बॉस' का शीर्षक गीत इन दिनों खूब बज रहा है. 

मीत बंधू सबसे पहले छोटे परदे पर अवतरित हुए थे बतौर अभिनेता. पर कहीं न कहीं संगीत को मार्ग बना कर एक पॉप समूह बनाने का सपना भी पल रहा था. उनका पहला गीत जोगी सिंह बरनाला सिंह  बेहद कामियाब रहा और मीत बंधुओं ने अभिनय को अलविदा कह दिया. एक लाईव शो के दौरान उन्हें अनजान मिले, और तीनों को महसूस हुआ कि उनकी तिकड़ी साथ मिलकर धामल कर सकती है. 

एक कोपरेट कंपनी की तरह काम करते हुए इस तिकड़ी ने अपने खुद के गीत रचने शुरू किये और अपने काम को लेकर प्रोडक्शन कंपनियों के पास आने जाने लगे. नए गीतों को अपने संकलन में जोड़ते हुए इन्हें खबर भी नहीं हुई कि कब १० बड़े बैनरों ने इनके गीतों को अपनी एल्बम का हिस्सा बनाने का फैसला कर लिया. क्या सुपर कूल हैं हम  और  ओह माई गोड  की एल्बमों से इन्हें बतौर संगीतकार पहचान मिली. 

इस साल बॉस  के अलावा जंजीर  के गीत 'पिंकी है पैसे वालों की' भी खासा लोकप्रिय हुआ. अमूमन श्रोता गायक गायिका को अधिक पहचानते हैं, तो इसी डर से कि कहीं मीत ब्रो अनजान के गीतों में संगीतकार पार्श्व में ही न रह जाएँ, ये संगीत तिकड़ी खुद को परदे पर रखने की हर संभव कोशिश करती हैं. यही वजह है कि आप इनके सभी गीतों में मूल गायक के साथ इन तीनों में से कम से कम किसी एक की आवाज़ भी अवश्य सुनेगें.  बॉस का शीर्षक गीत तो खुद इस टीम ने मिलकर गाया है. 

कदम थिरकाते गीतों में मेलोडी का तडका लगाते गीत हैं मीत ब्रो अनजान की पहचान. अगर इनके पिछले रेकॉर्डों पर जाएँ तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाली रागिनी एम् एम् एस २, और कर ले प्यार कर ले में भी हमें कुछ झूमते झुमाते गीत सुनने को मिल सकते हैं. इस तिकड़ी एक सोलो एल्बम बब्बू की जवानी भी जल्द ही श्रोताओं के सामने होगी. फिलहाल आने वाले कल की बातें छोड़ते हैं और आपको सुनते हैं वो गीत जिसकी बदौलत संगीत प्रेमियों के रूबरू हुई ये संगीत तिकड़ी 

Wednesday, October 23, 2013

सूफी संतों के सदके में बिछा सूफी संगीत (सूफी संगीत ०३)


सूफी संगीत पर विशेष प्रस्तुति संज्ञा टंडन के साथ 
सूफी संतों की साधना में चार मकाम बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं- शरीअततरी-कतमारि-फत तथा हकीकत। शरीयत में सदाचरण कुरान शरीफ का पाठपांचों वक्त की नमाजअवराद यानी मुख्य आयतों का नियमित पाठअल्लाह का नाम लेनाजिक्रे जली अर्थात बोलकर या जिक्रे शफी यानी मुंह बंद करके अल्लाह का नाम लिया जाता है। उस मालिक का ध्यान किया जाता है। उसी का प्रेम से नाम लिया जाता है। मुराकवा में नामोच्चार के साथ-साथ अल्लाह का ध्यान तथा मुजाहिदा में योग की भांति चित्त की वृत्तियों का निरोध किया जाता है। पांचों ज्ञानेन्दियों के लोप का अभ्यास इसी में किया जाता है। इस शरीअत के बाद पीरो मुरशद अपने मुरीद को अपनाते हैं उसे रास्ता दिखाते हैं। इसके बाद शुरू होती है तरी-कत। इस में संसार की बातों से ऊपर उठकर अहम् को तोड़ने छोड़ने का अभ्यास किया जाता है।

अपनी इद्रियों को वश में रखने के लिए शांत रहते हुए एकांतवास में व्रत उपवास किया जाता है। तब जाकर मारिफत की पायदान पर आने का मौका मिलता है। इस परम स्थिति में आने के लिए भी सात मकाम तय करने पड़ते हैं। तौबा, जहद, सब्र, शुक्र, रिजाअ, तबक्कुल और रजा की ऊंचाइयों पर चढ़ने के बाद सूफी साधक इस दुनिया को ही नहीं, बल्कि खुद को भी भूलकर अल्लाह के इश्क में पूरी तरह से डूब जाते हैं, वे परम ज्ञानी हो जाते हैं। इसके बाद सूफी साधक हकीकत से रूबरू होता है। यह परम स्थिति उसे प्रेम के चरम पर ले जाती है। उसे खुशी और तकलीफों से छुटकारा दिलाती है। ऐसी स्थिति में पहुंचने के बाद फिर बस अल्लाह के अलावा दूसरा न कोई सूझता है और न सुहाता है। हर वक्त उसी अल्लाह में प्रेम की लौ लगी रहती है। दिल के अंदर उसी की चाहत बसी रहती है। सारी इच्छाएं , चिंताएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। मीरा के प्रेम और सूफियों के इश्क में कोई अंतर नहीं लगता है। आंसुओं के जल से दिल का मैल जब घुलने लगे , जिंदगी में फूल हर तरफ खिलने लगें , तब समझना रास्ता है ठीक आगे बढ़ने के लिए। सारे झंझट छोड़ दिल में प्रेम रस घुलने लगे। प्रेम ऐसा , जो सिर्फ दिखावटी न हो। प्रेम ऐसा , जो जिंदगी में पूरी तरह रच बस जाए। हर तरफ बस तू ही तू-तू ही तू नजर आए। (साभार -ममता भारती)

Tuesday, October 22, 2013

अभिषेक ओझा की कहानी संयोग

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने गिरिजेश राव की मार्मिक कहानी "दूसरा कमरा" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अभिषेक ओझा की कहानी "संयोग", अनुराग शर्मा की आवाज़ में।

कहानी "संयोग" का कुल प्रसारण समय 9 मिनट 38 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट ओझा-उवाच पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

वास्तविकता तो ये है कि किसे फुर्सत है मेरे बारे में सोचने की, लेकिन ये मानव मन भी न!
~ अभिषेक ओझा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी
"जैसे लॉटरी में हर बार उसका वही नंबर लगा हो जो लगना चाहिए था। वो पीछे मुड़ कर देखे तो क्या ऐसा नहीं है कि वो इन्हीं सब के लिए ही तो बना था ! चुन-चुन कर तराशे हुए ऐसे लोग ..."
(अभिषेक ओझा की "संयोग" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
संयोग MP3
#33rd Story, Sanyog : Abhishek Ojha/Hindi Audio Book/2011/33. Voice: Anurag Sharma

Saturday, October 19, 2013

आज 'सिने पहेली' आपके मुँह में पानी न लाये तो कहिएगा...

सिने पहेली – 84

  
'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों व श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! 'सिने पहेली' के इस नए अंक के साथ मैं हाज़िर हूँ। आशा है नवरात्रि, दुर्गापूजा, दशहरा और ईद के त्योहार आप सभी ने हर्षोल्लास के साथ मनाया होगा, और यह भी अंदाज़ा लगा रहे हैं कि अब आप दीपावली की तैयारियों में या तो जुट गए होंगे या कमर कस ही रहे होंगे। दोस्तों, त्योहारों के इस मौसम में खाने-पीने की तरफ़ विशेष ज़ोर दिया जाता है। हर प्रान्त के अपने अलग पकवान होते हैं, जिन्हें हम या तो घर में बनाते हैं या मेले में जाकर खाते हैं। क्यों न आज की 'सिने पहेली' को भी स्वादिष्ट बनाया जाए! जी हाँ, आज हम एक ऐसी पहेली लेकर आये हैं जिसे सुलझाते हुए आपके मुंह में पानी अवश्य आने वाला है। भूमिका में और ज़्यादा वक़्त न ज़ाया करते हुए यह रही आज की पहेली।



आज की पहेली : FOOD FOR THOUGHT

नीचे एक के बाद एक दस चित्र दिये गये हैं। हर चित्र में किसी न किसी पकवान या खाद्य वस्तु को दर्शाया गया है। इन चित्रों पर ग़ौर करें। चित्रों के बाद पहेली का सवाल पूछा गया है।












इन दस चित्रों में दिये गये दस खाद्य वस्तुओं का उल्लेख फ़िल्मी गीतों में हुआ है। आपको दस फ़िल्मी गीत सोचने हैं जिनमें इन वस्तुओं का शाब्दिक उल्लेख है (एक खाद्य वस्तु के लिए एक गीत, अर्थात कुल दस गीत चुनने हैं आपको)। लेकिन शर्त यह है कि इन गीतों में नीचे दिये हुए फ़िल्मी कलाकार ही नज़र आते हों।



अर्थात 10 खाद्य पदार्थ -- 10 गीत -- 10 फ़िल्मी कलाकार। जवाब में किसी भी गीत या इन दस फ़िल्मी कलाकारों में किसी भी कलाकार का दोहराव न करें। आपके 10 जवाब बिल्कुल 10 यूनिक कम्बिनेशन होने चाहिये।

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 84" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 24 अक्तूबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।




पिछली पहेली का हल




पिछली पहेली के विजेता

इस बार सबसे पहले सही जवाब भेज कर 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं लखनऊ के श्री प्रकाश गोविंद। बहुत बहुत प्रकाश जी, आपको। इस बार दो सप्ताह का समय मिलने के बावजूद केवल चार प्रतियोगियों ने ही भाग लिया। सम्मिलित स्कोर-कार्ड यह रहा



कौन बनेगा 'सिने पहेली' महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स। 

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जोड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेता के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। आठवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा-



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, अनुमति चाहूँगा, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Friday, October 18, 2013

राम चाहे सुरों की "लीला"

निर्देशक से संगीतकार बने संजय लीला बंसाली ने 'गुज़ारिश' में जैसे गीत रचे थे उनका नशा उनका खुमार आज तक संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन से उतरा नहीं है. सच तो ये है कि इस साल मुझे सबसे अधिक इंतज़ार था, वो यही देखने का था कि क्या संजय वाकई फिर कोई ऐसा करिश्मा कर पाते हैं या फिर "गुजारिश" को मात्र एक अपवाद ही माना जाए. दोस्तों रामलीला, गुजारिश से एकदम अलग जोनर की फिल्म है. मगर मेरी उम्मीदें आसमां छू रही थी, ऐसे में रामलीला का संगीत सुन मुझे क्या महसूस हुआ यही मैं आगे की पंक्तियों में आपको बताने जा रहा हूँ. 

अदिति पॉल की नशीली आवाज़ से खुलता है गीत अंग लगा दे. हल्की हल्की रिदम पर मादकता से भरी अदिति के स्वर जादू सा असर करती है उसपर शब्द 'रात बंजर सी है, काले खंजर सी है' जैसे हों तो नशा दुगना हो जाता है. दूसरे अंतरे से ठीक पहले रिदम में एक तीव्रता आती है जिसके बाद समर्पण का भाव और भी मुखरित होने लगता है. कोरस का प्रयोग सोने पे सुहागा लगता है. 

धूप से छनके उतरता है अगला गीत श्रेया की रेशम सी बारीक आवाज़ में, सुरों में जैसे रंग झलकते हैं. ताल जैसे धडकन को धड्काते हों, शहनाई के स्वरों में पारंपरिक स्वरों की मिठास...रोम रोम नापता है, रगों में सांप सा है....सरल मगर सुरीला और मीलों तक साया बन साथ चलता गीत. 

संजय की फिल्मों में गायक के के एक जरूरी घटक रहते हैं पर जाने क्यों यहाँ उनकी जगह उन्होंने चुना आदित्य नारायण को. शायद किरदार का रोबीलापन उनकी आवाज़ में अधिक जचता महसूस हुआ होगा. आदित्य का गाया पहला गीत है इश्कियाँ डीश्कियाँ. फिल्म के दो प्रमुख किरदारों के बीच प्रेम और नफ़रत की जंग को गीत के माध्यम से दर्शाता है ये गीत. 

अरिजीत सिंह की रूहानी आवाज़ में एक और दिल को गहरे तक छूता गीत मिला है श्रोताओं को लाल इश्क में. आरंभिक कोरस को सुनकर एक सूफी गीत होने का आभास होता है मगर जैसे ही अरिजीत की आवाज़ मिलती है गीत का कलेवर बदल जाता है. रिदम ऊपर के सभी गीतों की ही तरह लाजवाब और संयोजन बेमिसाल. शब्द करीने से चुने हुए और गायिकी गजब की. जब अरिजीत 'बैराग उठा लूँ' गाते हैं तो उनकी आवाज़ में भी एक बैराग उभर आता है. 

शैल हडा तो जैसे लगता है अपना सर्वश्रेष्ठ संजय की धुनों के लिए ही बचा कर रखते हैं. पारंपरिक गुजराती लोक धुन की महक के बाद शैल की कशिश भरी आवाज़ में लहू मुँह लग गया में नफ़रत को प्रेम में बदलते उन नाज़ुक क्षणों की झनकार है. धुन कैची है और जल्द ही श्रोताओं के मुँह लग जायेगा इसमें शक नहीं. गीत के अंतरे खूबसूरती से रचे गए हैं. 

अगले दो गीत फिल्म की गुजरती पृष्भूमि को उभारते हुए हैं मोर बनी थन्घट करे अधिक पारंपरिक है और लोक गायकों की आवाज़ में बेहद जचता है. वहीँ नगाडा संग ढोल में हम दिल दे चुके सनम की ढोल बाजे की झलक होने के बावजूद गीत अपनी एक अलग छाप छोड़ता है. श्रेया की आवाज़ गीत का खास आकर्षण है. 

शैल को एक और रूहानी गीत दिया है संजय ने पूरे चाँद की ये आधी रात है में, पहले गीत से अधिक जटिल गीत है ये पर शैल ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है. हाँ पर मुझे यहाँ के के की कमी जरा सी खली. गीत में ठहराव है गजब का और गति भी है चढ़ते ढलते चाँद सी. अनूठा विरोधाभास है गीत में. बार बार सुनने को मन हो जाए ऐसा.

रामलीला के ठेठ अंदाज़ में शुरु होता है राम चाहे लीला गीत. अक्सर रामलीला में पर्दा गिरने और उठने के बीच कुछ गीत परोसे जाते हैं मनोरंजन के लिए. इन्डियन आइडल से चर्चा में आई भूमि त्रिवेदी को सौंपा संजय ने इस मुश्किल गीत को निभाने का जिम्मा. यकीं मानिये भूमि ने इंडस्ट्री में धमाकेदार एंट्री कर दी है इस गीत के साथ. यहाँ शब्द भी काफी ठेठ हैं. राम चाहे लीला चाहे लीला चाहे राम....देखे तो सरल मगर गहरे तक चोट करते शब्द हैं. जबरदस्त गीत. 

अंतिम गीत राम जी की चाल देखो में रामलला की झाँकी का वर्णन है, अगर कोई भी और संगीतकार होते तो आज के चलन अनुसार इस गीत के लिए मिका को चुनते. मगर यही तो बात है संजय में जो उन्हें सब से अलग करती है. उन्होंने आदित्य पर अपना विश्वास कायम रखा और आदित्य ने कहीं भी गीत की ऊर्जा को कम नहीं होने दिया. और तो और उनके भाव, ताव सब उत्कृष्ट माहौल को रचने में जमकर कामियाब हुए हैं यहाँ. एक धमाल से भरा गीत है ये जिसमें दशहरे का जोश और उत्सव तो झलकता ही है किरदारों के बीच की आँख मिचौलो भी उभरकर सामने आती है.       

कोई बेमतलब के रीमिक्स नहीं. बेवजह की तोड़ मरोड़ नहीं गीतों में. सीधे मगर जटिल संयोजन वाले, मधुर मगर सुरों में घुमाव वाले, मिटटी से जुड़े १० गीतों की लड़ी लेकर आये हैं संजय अपने इस दूसरे प्रयास में. जब उम्मीदें अधिक होती है यो संभावना निराशा की अधिक होती है पर खुशी की बात है कि बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली में वही सूझ बूझ, वही आत्मीयता, वही समर्पण नज़र आता है जो एक निर्देशक के रूप में वो बखूबी साबित कर चुके हैं. ये एक ऐसी एल्बम है जिस पर फिल्म की सफलता असफलता असर नहीं डाल सकती. रामलीला सभी संगीत प्रेमियों के लिए इस वर्ष के सर्वोत्तम तोहफों में से एक है. अवश्य सुनें और सुनाएँ. गीतकार सिद्धार्थ गरिमा को भी हमारी टीम की विशेष बधाई. 

एल्बम के बहतरीन गीत - राम जी की चाल, राम चाहे लीला,  पूरे चाँद की आधी रात है, लहू मुँह लग गया, लाल इश्क, अंग लगा दे, धूप से छनके 

हमारी रेटिंग - ४.९/५ 

    


Wednesday, October 16, 2013

इस ईद "जिक्र" उस परवरदिगार का सूफी संगीत में

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

सूफी संगीत भाग २ 

कहा जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में क़रीब एक हज़ार साल पहले जन्मा. भारत में इसके पहुंचने की सही सही समयावधि के बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में ग़रीबनवाज़ ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती बाक़ायदा सूफ़ीवाद के प्रचार-प्रसार में रत थे. (पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं)

Sunday, October 13, 2013

‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ : नवरात्र पर विशेष

स्वरगोष्ठी – 140 में आज

रागों में भक्तिरस – 8

राग यमन में सांध्य-वन्दन के स्वर 

   
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम भारतीय संगीत के सर्वाधिक लोकप्रिय राग कल्याण अर्थात यमन पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए दो रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। पहले आप सुनेंगे 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगा की लहरें’ से शक्तिस्वरूपा देवी दुर्गा की प्रशस्ति करता एक आरती गीत। आज के अंक में यह भक्तिगीत इसलिए भी प्रासंगिक है कि आज पूरे देश में शारदीय नवरात्र पर्व के नवें दिन देवी के मातृ-स्वरूप की आराधना पूरी आस्था के साथ की जा रही है। इसके साथ ही विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का बजाया राग यमन भी हम प्रस्तुत करेंगे। यहाँ यह रेखांकित करना भी आवश्यक है कि बीते 9 सितम्बर को इस महान सरोद-वादक का 69वाँ जन्मदिन मनाया गया।


लता मंगेशकर और चित्रगुप्त 
हिन्दी फिल्म संगीत के समृद्ध भण्डार से यदि राग आधारित गीतों का चयन करना हो तो सर्वाधिक संख्या राग यमन, भैरवी और पहाड़ी पर आधारित गीतों की मिलेगी। राग यमन प्रायः सभी संगीतकारों का प्रिय राग रहा है। आज शारदीय नवरात्र के मातृनवमी के दिन हम आपको राग यमन पर आधारित एक फिल्मी आराधना गीत सुनवा रहे हैं। 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगा की लहरें’ का गीत- ‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ राग यमन पर आधारित है। इसके संगीतकार चित्रगुप्त ने राग यमन के स्वरों को लेकर अत्यन्त सहज-सरल धुन में गीत को बाँधा है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में इस राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव तथा भक्ति और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘गंगा की लहरें’ के इस गीत में भक्त के पुकार का भाव स्पष्ट रूप से मुखरित होता है। कहरवा ताल के ठेके पर लता मंगेशकर ने इस आराधना गीत को भक्तिरस से परिपूर्ण कर दिया है।


राग यमन : ‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गंगा की लहरें 


राग कल्याण अर्थात यमन यद्यपि संगीत शिक्षा का प्रारम्भिक राग माना जाता है किन्तु यह गम्भीर राग है और इसमें कल्पनापूर्ण विस्तार की अनन्त सम्भावना भी उपस्थित है। गायन के साथ ही वाद्य संगीत पर भी राग यमन खूब खिलता है। सरोद जैसे गम्भीर गमकयुक्त वाद्य पर इस राग की सार्थक अनुभूति के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात सरोदवादक उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत राग यमन सुनवाते हैं। यह उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं कि इस सप्ताह 9 अक्तूबर को उस्ताद अमजद अली खाँ का 69वाँ जन्मदिवस था। इस अवसर के लिए हम उन्हें ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं और उनके व्यक्तित्व के कुछ प्रेरक पलों को याद करते हैं।

उस्ताद अमजद अली खाँ 
वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ सरोद-वादकों की सूची में शिखर पर हैं और ‘सरोद-सम्राट’ की उपाधि से विभूषित हैं। 9 अक्तूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली खाँ को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नाम दिया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र से ही संगीत की शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में ही उनके एकल सरोद-वादन का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ था। एक छोटे से बालक की अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए थे। युवावस्था तक आते-आते वे एक श्रेष्ठ वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद की वादन-शैली में कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने अनेक नये रागों की रचना भी की है। ये नवसृजित राग हैं- किरणरंजनी, हरिप्रिया कान्हड़ा, शिवांजलि, श्यामश्री, सुहाग भैरव, ललितध्वनि, अमीरी तोड़ी, जवाहर मंजरी, और बापूकौंस। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ संगीत जगत के सर्वश्रेष्ठ सरोद-वादक हैं। उनके वादन में इकहरी तानें, गमक, खयाल की बढ़त का काम अत्यन्त आकर्षक होता है। आइए, अब हम आपको सरोद पर खाँ साहब का बजाया राग यमन में भक्तिरस से परिपूर्ण एक मोहक रचना सुनवाते हैं। यह प्रस्तुति सात मात्रा के रूपक ताल में निबद्ध है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सरोद पर रूपक ताल की रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ 



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्तिपद का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह चौथे सेगमेंट की समापन पहेली है। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्तिपद के अंश में आपको किस राग के दर्शन हो रहे हैं?

2 – गीत के गायक-स्वर को पहचानिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 142वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 138वें अंक की पहेली में हमने आपको डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर गायकी अंग में प्रस्तुत मीरा के एक पद का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक पिछले रविवार को हम प्रस्तुत न कर सके, इसके लिए हमें खेद है। आइए, आज हम उस कड़ी का रसास्वादन करते हैं। जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग यमन के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की नौवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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