Saturday, March 15, 2014

होली के रंगों के साथ वापसी 'एक गीत सौ कहानियाँ' की...


एक गीत सौ कहानियाँ - 24
 

‘मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे...’



हम रोज़ाना न जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और उन्हें गुनगुनाते हैं। पर ऐसे बहुत कम ही गीत होंगे जिनके बनने की कहानी से हम अवगत होंगे। फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। एक लम्बे अन्तराल के बाद आज से इस स्तम्भ का पुन: शुभारम्भ हो रहा है। आज इसकी 24-वीं कड़ी में जानिये फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' के गीत "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे..." के बारे में... 


'मुग़ल-ए-आज़म', 1960 की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म। के. आसिफ़ निर्देशित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म की नीव सन् 1944 में रखी गयी थी। दरअसल बात ऐसी थी कि आसिफ़ साहब ने एक नाटक पढ़ा। उस नाटक की कहानी शाहंशाह अकबर के राजकाल की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी। कहानी उन्हें अच्छी लगी और उन्होंने इस पर एक बड़ी फ़िल्म बनाने की सोची। लेकिन उन्हें उस वक़्त यह अन्दाज़ा भी नहीं हुआ होगा कि उनके इस सपने को साकार होते 16 साल लग जायेंगे। 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने ज़माने की बेहद मंहगी फ़िल्म थी। एक-एक गीत के सीक्वेन्स में इतना खर्चा हुआ कि जो उस दौर की किसी पूरी फ़िल्म का खर्च होता था। नौशाद के संगीत निर्देशन में भारतीय शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की छटा लिये इस फ़िल्म में कुल 12 गीत थे जिनमें आवाज़ें दी उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, लता मंगेशकर, शमशाद बेग़म और मोहम्मद रफ़ी। हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक स्वर्णिम अध्याय रहा। यहाँ तक कि इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "प्यार किया तो डरना क्या" को शताब्दी का सबसे रोमांटिक गीत का ख़िताब भी दिया गया था। लता मंगेशकर की ही आवाज़ में फ़िल्म का अन्य गीत "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे" का भी अपना अलग महत्व है। कहा जाता है कि मुस्लिम सब्जेक्ट पर बनी इस ऐतिहासिक फ़िल्म में राधा-कृष्ण से सम्बन्धित इस गीत को रखने पर विवाद खड़ा हो सकता है, ऐसी आशंका जतायी गयी थी। वरिष्ठ निर्देशक विजय भट्ट भी इस गीत को फ़िल्म में रखने के ख़िलाफ़ थे। हालाँकि वो इस फ़िल्म से सीधे-सीधे जुड़े नहीं थे, पर उनकी यह धारणा थी कि यह फ़िल्म को ले डूब सकता है क्योंकि मुग़ल शाहंशाह को इस गीत के दृश्य में हिन्दू उत्सव जन्माष्टमी मनाते हुए दिखाया जाता है। नौशाद ने यह तर्क भी दिया कि जोधाबाई चूँकि ख़ुद एक हिन्दू थीं, इसलिए सिचुएशन के मुताबिक इस गीत को फ़िल्म में रखना कुछ ग़लत नहीं था। फिर भी नाज़ुकता को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के पटकथा लेखकों ने इस सीन में एक संवाद ऐसा रख दिया जिससे यह तर्क साफ़-साफ़ जनता तक पहुँच जाये।

इन्दुबाला
बहुत से फ़िल्मी गीतों को कृष्ण की लीलाओं से प्रेरणा मिली हैं। पर "मोहे पनघट..." कुछ अलग ही मुकाम रखता है। इस गीत के लिए गीतकार शक़ील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद का नाम रेकॉर्ड पर दर्शाया गया है। पर सत्य यह है कि मूल गीत न तो शक़ील ने लिखा है और न ही मूल संगीत नौशाद का है। यह दरअसल एक पारम्परिक बन्दिश है जिसे शक़ील और नौशाद ने फ़िल्मी जामा पहनाया है। क्योंकि इसके मूल रचयिता का नाम किसी को मालूम नहीं है और इसे एक पारम्परिक रचना के तौर पर भी गाया जाता रहा है, इसलिए शायद किसी ने विरोध नहीं किया। पर ऐसे गीतों में गीतकार के नाम के जगह 'पारम्परिक' शब्द दिया जाना बेहतर होता। ख़ैर, उपलब्ध तथ्यों के अनुसार राग गारा पर आधारित इस मूल ठुमरी का सबसे पुराना ग्रामोफ़ोन 78 RPM रेकॉर्ड इन्दुबाला की आवाज़ में मौजूद है।
इन्दुबाला का जन्म 1899 में हुआ था और ऐसी धारणा है कि उनकी गायी यह रेकॉर्डिंग 1915 से 1930 के बीच के किसी वर्ष में की गयी होगी। 1932 में उस्ताद अज़मत हुसैन ख़ाँदिलरंग ने इसी ठुमरी को 'कोलम्बिआ रेकॉर्ड कम्पनी' के लिए गाया था। गौहर जान की आवाज़ में यह ठुमरी मशहूर हुई थी। मूल रचना के शब्द हैं "मोहे पनघट पर नन्दलाल छेड़ दीनो रे, मोरी नाजुक कलइयाँ मरोड़ दीनो रे.."। 'मुग़ल-ए-आज़म' के गीत में शक़ील ने शब्दों को आम बोलचाल वाली हिन्दी में परिवर्तित कर ठुमरी का फ़िल्मी संस्करण तैयार किया है।

नौशाद और शक़ील
विविध भारती के एक कार्यक्रम में नौशाद साहब ने इस गीत को याद करते हुए बताया, "इस फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसा आया जिसमें अकबर बादशाह कृष्णजन्म पर्व मना रहे हैं। आसिफ़ साहब ने मुझसे कहा कि वो इस सिचुएशन पर एक गाना चाहते हैं जिसमें वह झलक, वह माहौल पैदा हो। मैंने गाना बनाया, रेकॉर्ड करवाया, और उन्हें सुनाया। उन्हें बहुत पसन्द आया। तब मैंने उनसे रिक्वेस्ट किया कि इस गीत के पिक्चराइज़ेशन में जो डान्स इस्तेमाल होगा, उसे आप किसी फ़िल्मी डान्स डिरेक्टर से नहीं, बल्कि एक क्लासिकल डान्सर से करवाइयेगा। उन्होंने कहा कि फिर आप ही ढूँढ लाइये। मैंने लच्छू महाराज को आसिफ़ साहब से मिलवाया, जो कथक के एक नामी कलाकार थे। आसिफ़ साहब ने उन्हें गाना सुनाया, तो वो रोने लग गये। आसिफ़ साहब परेशान हो गये, कहने लगे कि यह डान्स का गाना है, इसमें रोने की कौन सी बात है भला, मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात हो गई, तब लच्छू महाराज ने कहा कि बिल्कुल यही स्थायी वाली ठुमरी मेरे बाबा गाया करते थे, इसने मुझे उनकी याद दिला दी।"

लच्छु महाराज
फिर आयी गीत के फ़िल्मांकन की बारी। यह भी कोई आसान काम नहीं था। मधुबाला एक सीखी हुई नृत्यांगना नहीं थी। लच्छू महाराज ने लगातार पाँच दिनों तक मधुबाला को नृत्य सिखाया। कहा जाता है कि इस गीत के लाँग शॉट्स में लच्छू महाराज के ट्रूप के किसे लड़के ने मधुबाला के स्थान पर नृत्य किया, पर गीत के दृश्यों को देख कर अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है। है ना आश्चर्य की बात! एक और आश्चर्य की बात यह है कि इतने स्तरीय गीतों के बावजूद उस वर्ष का 'फ़िल्मफ़ेअर' पुरस्कार 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए नौशाद को नहीं बल्कि 'दिल अपना और प्रीत परायी' के लिए शंकर जयकिशन को दिया गया। इसमें सन्देह नहीं कि 'दिल अपना...' के गानें भी बेहद मकबूल हुए थे, पर स्तर की बात करें तो 'मुग़ल-ए-आज़म' कई क़दम आगे थी। फ़िल्मफ़ेअर में ऐसा कई बार हुआ है। उदाहरण के तौर पर 1967 में शंकर जयकिशन को 'सूरज' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि 'गाइड', 'ममता' और 'अनुपमा' प्रतियोगिता में शामिल थी। 1971 में शंकर जयकिशन को फ़िल्म 'पहचान' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि उसी साल 'दो रास्ते' और 'तलाश' जैसी म्युज़िकल फ़िल्में थीं। 1973 में एक बार फिर शंकर जयकिशन को 'बेइमान' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि 'पाक़ीज़ा' के संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।  क्या यह सही निर्णय था? ख़ैर, कला किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं। सच्चा पुरस्कार है, श्रोताओं का प्यार जो 'मुग़ल-ए-आज़म' को बराबर मिली और अब तक मिलती रही है।

फिल्म - मुगल-ए-आजम : 'मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे...' : गायिका - लता मंगेशकर : संगीत - नौशाद  





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Friday, March 14, 2014

जुगनी उडी गुलाबी पंख लेकर इस होली पर

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 10

दोस्तों इस रविवार को दुनिया भर में मनाया गया महिला दिवस. आज जो दो गीत हम आपके लिए चुनकर लेकर आये हैं वो भी नारी शक्ति के दो मुक्तलिफ़ रूप दर्शाने वाले हैं. पहला गीत है गुलाब गैंग  का...कलगी हरी है, चोंच गुलाबी, पूँछ है उसकी पीली हाय, रंग से हुई रंगीली रे चिड़िया, रंग से हुई रंगीली ... नेहा सरफ के लिखे इस खूबसूरत गीत में गौर कीजिये कि उन्होंने इस चिड़िया की चोंच गुलाबी  रंगी है, यही बदलते समय में नारी की हुंकार को दर्शाता है. वो अब दबी कुचली अबला बन कर नहीं बल्कि एक सबल और निर्भय पहचान के साथ अपनी जिंदगी संवारना चाहती है. शौमिक सेन के स्वरबद्ध इस गीत को आवाज़ दी है कौशकी चक्रवर्ति ने. गुलाब गैंग  में ९० के दशक की दो सुंदरियाँ, माधुरी दीक्षित और जूही चावला पहली बार एक साथ नज़र आयेगीं. फिल्म कैसी है ये आप देखकर बताएं, फिलहाल सुनिए ये गीत जो इस साल होली को एक नए रंग में रंगने वाली है. 
)
कितने काफिले समय के/ धूल फांकते गुजरे हैं/ मेरी छाती से होकर/ मटमैली चुनर सी /बिछी रही आसमां पे मैं...
कोख में ही दबा दी गयी/ कितनी किलकारियां मेरी/ नरक का द्वार, ताडन को जाई,/ कुलटा, सती, देवी, डायन,/ जाने क्या क्या कहलाई मैं...जली, कटी, लड़ी मगर,/ चीखी भी, चिल्लाई भी मैं,
इन हाथों को, पखों में बदलने को,/जाने कितनी प्रसव वेदनाओं से,/ गुजरी हूँ मैं....अब उड़ने दो, उड़ने दो, उड़ने दो मुझे/ मैं आधी धरा हूँ तो,/ आधे आकाश को भी तो अपना, कहने दो मुझे.... 
कुछ ऐसे ही जज़्बात हैं हमारे अगले गीत में, जिसे गाया और स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने. शब्द रचे हैं अन्विता दास गुप्तन ने. फिल्म है Queen कंगना रानौत की ये फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आ रही है. अमित ने बेहद मुक्तलिफ़ रंग के गीत रचे हैं फिल्म के लिए, ये गीत भी उनमें से एक है. लीजिए मिलिए इस जुगनी  से जो पिंजरा तोड़ उड़ चली है नीले विशाल गगन में, अपनी नई पहचान ढूँढने. 

)

Sunday, March 9, 2014

होली की उमंग : राग काफी के संग


स्वरगोष्ठी – 158 में आज



फाल्गुनी परिवेश में राग काफी के विविध रंग
 

‘लला तुमसे को खेले होली, तुम तो करत बरजोरी...’



फाल्गुनी परिवेश में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली पाँच कड़ियों से हम बसन्त ऋतु के मदमाते रागों पर चर्चा कर रहे हैं और फाल्गुनी परिवेश के अनुकूल गायन-वादन का आनन्द ले रहे हैं। फाल्गुन मास में शीत ऋतु का क्रमशः अवसान और ग्रीष्म ऋतु की आगमन होता है। यह परिवेश उल्लास और श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होता है। प्रकृति में भी परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। रस-रंग से परिपूर्ण फाल्गुनी परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंकों में हमने इस राग में ठुमरी, टप्पा, खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत किया था। राग, रस और रगों का पर्व होली अब मात्र एक सप्ताह की दूरी पर है, अतः आज के अंक में हम आपसे राग काफी की कुछ होरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे क्रमशः गायिका अच्छन बाई, विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है।


भारतीय पंचांग के अनुसार माघ मास के उत्तरार्द्ध से लेकर चैत्र मास के पूर्वार्द्ध तक बसन्त ऋतु का परिवेश होता है। यह शीत ऋतु के अवसान का और ग्रीष्म ऋतु के आगमन की अनुभूति कराने वाला समय होता है। इन दिनों प्रकृति में भी मनभावन परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। ऐसे परिवेश मे मानव ही नहीं, पशु-पक्षी भी उल्लास, उमंग और उत्साह से भर कर कुछ गाने और थिरकने का उपक्रम करने लगते हैं। भारतीय संगीत में होली गीतों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। ध्रुवपद शैली में धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक इस रंग-विरंगे पर्व का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन शैलियों में श्रृंगार रस के अनेक चित्रों का दर्शन होता है। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है। इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है। आज के अंक में हम ठुमरी अंग की होली या होरी गायन शैली के कुछ रंग प्रस्तुत कर रहे हैं। लगभग एक शताब्दी पूर्व ठुमरी होरी का स्वरूप कैसा रहा, इसका एक उदाहरण अच्छन बाई की गायी एक प्राचीन ठुमरी होरी के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं।

भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक किशोर आयु की गायिका अच्छन बाई भी थीं, जिनके गीत 1908 में ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किये थे। अच्छन बाई के रिकार्ड की उन दिनों धूम मच गई थी। उस दौर में अच्छन बाई के स्वर में बने रिकार्ड में से आज कुछ ही रिकार्ड उपलब्ध हैं, जिनसे उनकी गायन-प्रतिभा का सहज ही अनुभव हो जाता है। अच्छन बाई के उपलब्ध रिकार्ड में से एक में उन्होने राग काफी होरी को पुराने अंदाज़ में प्रस्तुत किया है। इस होरी को अब आप भी सुनिए।



राग काफी : ठुमरी होरी : ‘चलो होरी खेलिए बृजराज...’ : अच्छन बाई






परम्परागत होरी अथवा होली गीतों में अधिकतर ब्रज की होली का प्रसंग होता है। श्रृंगार रस से अभिसिंचित ऐसी होरी में राधा-कृष्ण की छेड़-छाड़, ब्रजमण्डल में अबीर, गुलाल के उड़ते बादलों और मान-मनुहार का चित्रण प्रमुख रूप से होता है। आज की दूसरी होरी राग मिश्र काफी में है, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी ने गाया है। पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को कला और संस्कृति की नगरी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत-प्रेमी थे। उन्होंने पाँच वर्ष की आयु में ही गिरिजा देवी के संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया। गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कोई रोक पाया है। 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूटी थीं। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। आकाशवाणी से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई वह आज तक जारी है। उन्होने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोधकार्यों में भी अपना योगदान किया। 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च एकेडमी ने आमंत्रित किया। यहाँ रह कर उन्होंने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये बल्कि शोधकार्य भी कराए। इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक छात्र-छात्राओं को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतंत्रता-पूर्व काल की पूरब अंग की बोल-बनाव ठुमरियों की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं। आधुनिक उपशास्त्रीय संगीत के भण्डार को उन्होंने समृद्ध किया है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी।


राग मिश्र काफी : ठुमरी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी, लला तुमसे को खेले होरी...’ : विदुषी गिरिजा देवी






यद्यपि होली विषयक रचनाएँ राग काफी के अलावा अन्य रागों में भी मिलते हैं, किन्तु राग काफी के स्वरसमूह इस पर्व के उल्लास से परिपूर्ण परिवेश का चित्रण करने में सर्वाधिक समर्थ होते हैं। अब हम आपको राग काफी की एक होरी ठुमरी सुनवाते हैं। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत पण्डित भीमसेन जोशी ने इसे प्रस्तुत किया है। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं- ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न की आवाज़ में राग काफी की यह होरी ठुमरी। इस रचना के माध्यम से ब्रज की होली का यथार्थ स्वर-चित्र उपस्थित हो जाता है। आप रस-रंग से भीगी यह होरी ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने देने की अनुमति दीजिए। अगले रविवार को ठीक होली के दिन रस-रंग से सराबोर कुछ और सांगीतिक रचनाओं के साथ हम उपस्थित होंगे।



राग मिश्र काफी : ठुमरी होरी : ‘होरी खेलत नन्दकुमार...’ : पण्डित भीमसेन जोशी 






आज की पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 158वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह संगीत की कौन सी शैली है? इस संगीत शैली का नाम बताइए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर राग पहचानिए और उसका नाम लिख भेजिए।


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता



‘‘स्वरगोष्ठी’ की 156वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में प्रस्तुत राग काफी के तराना का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- तराना और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित कुमार गन्धर्व। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों फाल्गुनी रस-रंग का प्रभाव है। इस फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। हमारा अगला अंक ठीक होली के दिन प्रस्तुत होगा। इस विशेष अंक में हम होली के कुछ विशेष तचनाओं के साथ उपस्थित होंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे। अगली श्रृंखलाओं के लिए विषय का सुझाव आप भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।




प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, March 8, 2014

'सिने पहेली' प्रतियोगिता के महाविजेता बने हैं....

और 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के महाविजेता हैं...


वाह! क्या काँटे की टक्कर रही इस महामुकाबले में प्रकाश गोविन्द और विजय कुमार व्यास के बीच! 

दूसरे और तीसरे स्थान पर पंकज मुकेश और चन्द्रकान्त दीक्षित रहे। 

क्षिति तिवारी ने महामुकाबले में भाग नहीं लिया।


आप सभी विजेताओं को हज़ारों शुभकामायें!

आइये अब आपको बतायें कि महामुकाबले के सवालों के सही जवाब क्या हैं।


महामुक़ाबले के सवालों का हल

उत्‍तर 1. गीत - श्‍याम सुन्‍दर मदन मोहन, कुंबरी संग बात कीनो........ (फिल्‍म - ट्रैप्‍ड, 1931)
*इस गीत के मुखडे में संगीतकार 'श्‍याम सुन्‍दर' तथा संगीतकार 'मदन मोहन' के नाम आते हैं अर्थात गीत के मुखडे के प्रारम्‍भ में दो संगीतकारों के नाम मौजूद हैं ।

उत्‍तर 2. फिल्‍म का नाम -  तमाशा (1952)

उत्‍तर 3. चित्र में दिखाई गई चीजों के नाम फिल्‍म 'हम आपके हैं कौन' के गीत 'दीदी तेरा देवर दीवाना'  के अन्‍तरों में आती हैं और इस गाने की धुन नुसरत फ़तेह अली ख़ान की कव्‍वाली 'सारे नबियां दां नबी तूं इमाम सोणिया' से प्रेरित (inspired) है। चित्र में दिखाये गये वस्तुओं में से 'मिर्च' शायद गीत में नहीं है। लेकिन 'मिट्टी पहाड़ी' से ज़्यादा 'मिर्ची पहाड़ी' अर्थपूर्ण लगता है क्योंकि खाने वाली वस्तुओं का ज़िक्र हो रहा है। ख़ैर, कोई बात नहीं, इस  त्रुटि के बावजूद आपने गीत पहचान ही लिया।

उत्‍तर 4. गीत - दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे........ (फिल्‍म - मदर इण्डिया, 1957)।

उत्‍तर 5. चित्र 1 - जूथिका रॉय,  चित्र 2 - सी. एच. आत्मा

उत्‍तर 6. गीत - जिन्‍दगी बदली मुहोब्‍बत का मजा आने लगा है......... (फिल्‍म - अनहोनी, 1952)

उत्‍तर 7. गीत - तुझे बिब्‍बो कहूँ के सुलोचना,  उमा शशि कहूँ के जमुना.........(फिल्‍म - गरीब का लाल, 1939)
*चित्र में जिन कलाकारों की तस्‍वीरें दी गई है, उन सभी कलाकारों के नाम इस गीत में आतें हैं।

उत्‍तर 8. गीत - मधुबन खुशबू देता है............(फिल्‍म - साजन बिना सुहागन, 1978)
 
उत्‍तर 9. चारों अभिनेताओं ने ऐसी फिल्‍मों में मुख्‍य भूमिका की है जिनके टाईटल में 'राम' शब्‍द जुडा है एवं इनकी इन सभी फिल्‍मों में इनके चरित्र के नाम में भी 'राम' शब्‍द है। त्रिलोक कपूर (राम जन्‍म,1951), अभि भट्टाचार्य (राम लीला,1961), सनी देओल (राम अवतार, 1988), शाहरुख ख़ान (राम जाने, 1995)। इसी तरह से इन चारों अभिनेताओं के साथ 'अर्जुन' भी जुड़ा हुआ है। त्रिलोक कपूर ने फ़िल्म 'वीर अर्जुन' में अर्जुन की भूमिका निभाई; अभि भट्टाचार्य ने 'श्री कृष्णार्जुन युद्ध' में अर्जुन की भूमिका निभाई; सनी देओल ने 'अर्जुन' और 'अर्जुन पंडित', दोनों फ़िल्मों में शीर्षक भूमिका निभाई, तथा शाहरुख़ ख़ान ने 'करण-अर्जुन' फ़िल्म में अर्जुन की भूमिका निभाई।


उत्‍तर 10. फ़िल्म 'गीत गाता चल' का पोस्टर होना चाहिये क्योंकि फिल्‍मी पोस्‍टर्स की यह श्रंखला फिल्‍म 'एक दूजे के लिए' के गीत 'मेरे जीवनसाथी प्‍यार किए जा' के अन्‍तरें की एक पंक्ति से बनाई गई है।
(लडकी, मिलन, गीत गाता चल, प्‍यार का मौसम, बेशर्म.......सत्‍यम शिवम सुन्‍दरम)



महामुक़ाबले का परिणाम

और ये रहे प्रतियोगियों के परिणाम इन दस सवालों के....





विजेताओं के पुरस्कार!


तो इस तरह से 'सिने पहेली' के युग्म महाविजेता बने हैं श्री प्रकाश गोविन्द और श्री विजय कुमार व्यास। 5000 रुपये नकद इनाम आप दोनों को बहुत बहुत मुबारक़ हो! यह इनाम राशि आप दोनों में बराबर बाँटी जायेगी।

सांत्वना पुरस्कार स्वरूप श्री पंकज मुकेश, श्री चन्द्रकान्त दीक्षित और श्रीमती क्षिति तिवारी को पुस्तकें भेंट की जायेंगी। बहुत बहुत बधाई हो आप सभी को!


'सिने पहेली' का समापन

तो दोस्तों, इस तरह से 'सिने पहेली' का यह लम्बा सफ़र तो हो गया पूरा। इस सफ़र में आप सब हमारे हमसफ़र हुए, और इस सफ़र को एक बेहद सुहाना अंजाम दिया, जिसके लिए हम आप सभी के शुक्रगुज़ार हैं। 'सिने पहेली' समाप्त हो रहा है, पर पहेलियाँ सुलझाना बन्द नहीं होना चाहिये। क्योंकि हमारी ज़िन्दगी भी ख़ुद एक पहेली है, तो हर मोड़ पर आपको पहेली सुलझाते हुए निरन्तर आगे बढ़ना है। इस जीवन पथ पर अग्रसर होने और हर पड़ाव पर सफलता प्राप्त करने की शुभकामनायें देते हुए अब मुझे आप से विदा लेना होगा। 'सिने पहेली' के माध्यम से मेरा और आपका साथ यहीं होता है पूरा, पर आने वाले समय में मैं आपसे दोबारा मिलूंगा इसी मंच पर किसी अन्य स्तंभ के साथ। तब तक के लिए आप मुझे अनुमति दीजिये, पर बने रहिये 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के साथ। आप सभी को मेरा, यानी कि सुजॉय चटर्जी का बहुत सारा प्यार, ख़ुश रहिये, मस्त रहिये, नमस्कार!

Friday, March 7, 2014

सरहदों की दूरियां संगीत से पाटते अली ज़फर और अमित त्रिवेदी

ताज़ा सुर ताल - 09 -2014

ताज़ा सुर ताल के एक और नए एपिसोड में आप सब का स्वागत है. आज हम आपको मिलवा रहे हैं सरहद पार से आये एक जबरदस्त फनकार से जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. पाकिस्तान के पॉप संशेशन अली ज़फर न सिर्फ एक बहतरीन गायक हैं बल्कि एक अच्छे अभिनेता, संगीतकार, और गीतकार भी हैं. आने वाली फिल्म टोटल सयापा  में अली इन सभी भूमिकाओं में नज़र आयेगें. बतौर गीतकार इस फिल्म में उन्होंने आशा  नाम का गीत लिखा है, फिल्म का काम पूरी तरह खत्म होने के बाद फिल्म के अपने साथी किरदार को जेहन में रख कर लिखा गया ये गीत, फिल्म का हिस्सा नहीं है पर एल्बम में अवश्य शामिल है. वैसे इस एल्बम में जिसे पूरी तरह से अली का ही एल्बम कहा जायेगा, मात्र एक ही युगल गीत है, जिसे आज हमने चुना है आपके लिए. अकील रूबी का लिखा ये गीत सदा लुभावन अरेबिक मिजाज़ का है, जिसमें रुबाब का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. फरिहा परवेज हैं अली के साथ इस गीत में. नहीं मालूम  निश्चित ही एक ऐसा गीत है जिसे आप बार बार सुनना चाहेगें. 


आज के एपिसोड का दूसरा गीत है, मेरे बेहद पसंदीदा संगीतकार अमित त्रिवेदी का. दोस्तों अक्सर हम लोगों से सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं मिलती जो पुराने दौर के गीतों में था. पर वास्तव में ऐसा नहीं है. आज के गीत आज की पीढ़ी को जेहन में रख कर लिखे बुने जाते हैं और हमें इस बात पर फक्र होना चाहिए कि आज के दौर के गीतकार संगीतकार आज भी हमारी धरोहर को संभाले रखे हुए हैं. इतनी सारी बातें मैंने इसलिए कही क्योंकि मुझे लगता है कि प्रस्तुत गीत को सुनकर आपको गुजर दौर का मर्म भी याद आएगा और आज के संगीत की झनक भी. खुद अमित का गाया हुआ ये गीत है बदरा बहार  जिसे बहुत बढ़िया लिखा है अनिवता दत्त ने. अमित का एक खास अंदाज़ है जो सबसे अल्हदा है. सबसे अच्छी बात ये है कि वो किसी से प्रभावित नहीं लगते वरन वो अपनी खुद की लीक पर चलते हैं. हर गीत में एक नया प्रयोग करते हुए, लीजिए सुनिए ये लाजवाब गीत...
    

Thursday, March 6, 2014

सेंस्बल दुनिया के कुछ अन्सेंसेबल किरदार - हाईवे

फिल्म चर्चा - हाईवे 

सालों पहले निर्देशक इम्तियाज़ अली ने छोटे परदे के लिए एक टेलीफिल्म बनायीं थी, जिसकी कहानी उनके दिलो दिमाग को रह रह कर झकझोरती रही, और अततः जब वी मेट, लव आजकल  जैसी सफल व्यावसायिक फ़िल्में बनाने के बाद आखिरकार वो साहस जुटा पाए अपनी उस कहानी को बिना लाग लपेट के परदे पर साकार करने का. फिल्म में इम्तियाज़ के साथ जुड़े देश के सबसे अव्वल छायाकार अशोक मेहता, ओस्कर विजेता ध्वनि संयोजक रसूल पुकुट्टी, संगीत गुरु ए आर रहमान, और संवेदनशील गीतकार इरशाद कामिल. यकीन मानिये हाइवे इम्तियाज़ की एक बहतरीन पेशकश है. 

धुर्विया फासलों और एकदम विपरीत परिस्थियों से निकले दो किरदारों को हालात एक सफर में बाँध देता हैं, अपने अतीत के आघातों से मुहँ छुपाते, रूह के जख्मों को कहीं गहरे तहखानों में छुपाये ये किरदार इसी सफर के दौरान एक दूसरे को समझने की कोशिश में कहीं न कहीं खुद से ही आँख मिलाने के काबिल हो जाते हैं. वीरा के किरदार में अलिया अपनी पहली फिल्म (स्टूडेंट ऑफ द ईयर ) की सामान्य भूमिका और 'प्लास्टिक फेस इमेज' से कहीं अधिक परिपक्व और बेहतर नज़र आई है, तो वहीँ महाबीर की भूमिका में रणदीप हूडा चमत्कृत करते हैं. एक संगदिल हत्यारे और अपहरणकर्ता का दबा आक्रोश और किरदार का रूखापन उन्होंने बेहद संजीदगी से उभारा है. 

अशोक मेहता का कैमरा हाईवे के रास्ते दिल्ली, हरयाणा, पंजाब, हिमाचल, राजस्थान और कश्मीर के रास्तों पर आपको जिंदगी के कई चेहरे दिखाता है और इम्तियाज़ की खूबी ये है कि वो किरदार के भावों और संवेदनाओं को भी इन्हीं रास्तों पर बेलिबास छोड़ देते हैं. फिल्म कहीं से भी बनावटी नहीं लगती. रहमान का संगीत गजब है, उनके मूल गीतों के साथ साथ, जिस खूबी से उन्होंने रसूल के साथ मिलकर क्षेत्रीय ध्वनियों और लोक गीतों का समन्वय किया है उसका तो कहना ही क्या. 

दबी चीखों की वेदना है यहाँ, निशब्द संवादों का गूंजता सैलाब है यहाँ, दर्द की वादियों में प्रेम का संताप है यहाँ. व्यावसायिक सिनेमा के शौक़ीन शायद इस फिल्म को न सराहें, पर सिनेमा को उसके गैर मिलावटी रूप में देखने को तरसते कद्रदानों के लिए हाइवे  एक आवश्यक फिल्म है.   

Monday, March 3, 2014

सभी शादी शुदा जोड़ों को अवश्य देखनी चाहिए 'शादी के साईड एफ्फेक्ट्स'

फिल्म चर्चा - शादी के साईड एफ्फेक्ट्स 


साकेत चौधरी के निर्देशन में बनी इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है फिल्म की कास्टिंग. राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित फरहान अख्तर और विध्या बालन की केमिस्ट्री ही इस फिल्म की जान है. प्यार के साईड एफ्फेक्ट्स  के सिक्युअल के तौर पर बनी इस फिल्म की कहानी बेहद दिलचस्प अंदाज़ में एक के दौर के दाम्पत्य जीवन की मिठास और कड़वाहट को दर्शाती है. सिद्धार्थ रॉय के किरदार में फरहान का अभिनय कबीले तारीफ है. वास्तव में वो परदे पर इतने सहज लगते हैं कि दर्शक खुद बा खुद उनके किरदार से जुड जाते हैं, तो वहीँ त्रिशा के किरदार में विध्या बेहद सराहनीय उपस्तिथि दर्ज कराने में कामियाब रही है. पूरी फिल्म यूँ तो इन्हीं दोनों किरदारों के इर्द गिर्द ही घूमती है, पर राम कपूर और इला अरुण भी अपनी अपनी भूमिकाओं में खासे जचे हैं. 

त्रिशा और सिद्धार्थ की शादी शुदा जिंदगी में सब कुछ बढ़िया चल रहा होता है कि अचानक एक नए मेहमान के आने की दस्तक से उथल पुथल मच जाती है. जहाँ त्रिचा अपनी प्रेगनेंसी और उसके बाद अपनी नन्हीं बच्ची के लिए नौकरी छोड़ देती है वहीँ सिद्धार्थ इस नई जिम्मेदारी को लेकर असमंजस की स्तिथि में है, त्रिशा के नौकरी छोड़ देने की स्तिथि में सिद्धार्थ पर अतिरिक्त दबाब पड़ता है और उसके संगीत एल्बम का सपना खटाई में पड़ जाता है. शादी के बाद के जीवन को काफी हलके फुल्के अंदाज़ में बुना गया है फिल्म की कहानी में. 

साकेत का निर्देशन चुस्त है और स्क्रीन प्ले फिल्म की रफ़्तार को बखूबी बनाये रखता है. संवाद छोटे, चुटीले और गुदगुदाने वाले है. संगीत पक्ष बहुत दमदार नहीं है, फिल्म का सबसे खूबसूरत गीत बावला सा सपना  कहीं संवादों का हिस्सा ही बनकर रह जाता है. कुछ गीत जबरन ठूंसे हुए लगते हैं. कुल मिलाकर फिल्म की कहानी, कास्टिंग और सभी पात्रों के अच्छे अभिनय के कारण फिल्म दिलचस्प अवश्य है. चलिए हम आपको दिखाते हैं इस फिल्म का एक ट्रेलर, पूरी फिल्म आप सिनेमा घरों में जाकर देखें और अपनी राय हमें दें. 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ