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देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम, प्यार का यह महूरत निकल जाएगा...नीरज का लिखा एक प्रेम गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 89 यूँ तो फ़िल्मी गीतकारों का एक अलग ही जहाँ है, उनकी अलग पहचान है, उनकी अलग अलग खासियत है, लेकिन फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर झाँका जाये तो हम पाते हैं कि समय समय पर कई साहित्य से जुड़े शायर और कवियों ने इस क्षेत्र में अपने हाथ आज़माये हैं। इन साहित्यकारों ने फ़िल्मों में बहुत कम काम किया है लेकिन जो भी किया है उसके लिए अच्छे फ़िल्म संगीत के चाहनेवाले उनके हमेशा क़द्रदान रहेंगे। इन्हे फ़िल्मी गीतों में पाना हमारा सौभाग्य है, फ़िल्म संगीत का सौभाग्य है। अगर हिंदी के साहित्यकारों की बात करें तो कवि प्रदीप, पंडित नरेन्द्र शर्मा, विरेन्द्र मिश्र, बाल कवि बैरागी, महादेवी वर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, अमृता प्रीतम, और डा. हरिवंशराय बच्चन के साथ साथ कवि गोपालदास 'नीरज' जैसे साहित्यकारों के क़दम फ़िल्म जगत पर पड़े हैं। जी हाँ, कवि गोपाल दास 'नीरज', जिन्होने फ़िल्मों में नीरज के नाम से एक से एक 'हिट' गीत लिखे हैं। उन्होने सबसे ज़्यादा काम सचिन देव बर्मन के साथ किया है, जैसे कि शर्मिली, प्रेम पुजारी, गैम्बलर, तेरे मेरे सपने, आदि फ़िल्मों में। संगीत...

सआदत हसन मंटो की "कसौटी"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में श्रवण कुमार सिंह की कहानी 'बुतरखौकी' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं सआदत हसन मंटो की "कसौटी" , जिसको स्वर दिया है "किस से कहें" वाले अमिताभ मीत ने। इससे पहले आप अनुराग शर्मा की आवाज़ में मंटो की अमर कहानी टोबा टेक सिंह और एक लघुकथा सुन चुके हैं। "कसौटी" का कुल प्रसारण समय १३ मिनट और ४४ सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें। पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था। ~ सआदत हसन मंटो (१९१२-१९५५) हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी वह धर्मकांटा कहाँ है जिसके पलडों में हिन्दू और मुसलमान, ईसाई और यहूदी, काले और गोरे तुल सकते हैं? ( मंटो की "कसौटी" से एक अंश...

सखी री मेरा मन उलझे तन डोले....रोशन साहब का लाजवाब संगीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 88 दो स्तों, अगर आपको याद हो तो कुछ रोज़ पहले हमने आपको 'आम्रपाली' फ़िल्म का एक गीत सुनवाया था और साथ ही आम्रपाली की कहानी भी सुनाई थी। आम्रपाली की तरह एक और नृत्यांगना हमारे देश में हुईं हैं चित्रलेखा। आज इन्ही का ज़िक्र 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। चित्रलेखा सम्राट चंद्रगुप्त के समय की राज नर्तकी थीं। चंद्रगुप्त का एक दोस्त बीजगुप्त हुआ करता था जो चित्रलेखा को देखते ही उससे प्यार कर बैठा। वह चित्रलेखा के प्यार में इस क़दर खो गया कि उसके लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हो गया। चित्रलेखा भी उससे प्यार करने लगी। लेकिन बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से तय हो चुका था। यशोधरा के पिता को जब बीजगुप्त और चित्रलेखा की प्रेम कहानी का पता चला तो वो योगी कुमारगिरि के पास गये और उनसे विनती की, कि वो चित्रलेखा को बीजगुप्त से मिलने जुलने को मना करें। योगी कुमारगिरि चित्रलेखा को उसके दायित्वों और कर्तव्यों की याद दिलाते हैं लेकिन चित्रलेखा योगी महाराज की बातों को हँसकर अनसुना कर देती हैं। लेकिन आगे चलकर एक दिन चित्रलेखा को अपनी ग़लतियों का अहसास हो जाता है। आईने में अपने...

"रोने से दुःख कम न होंगे तो क्यों न हंस खेल जिंदगी बिता लें हम..."- यही था फलसफा किशोर दा का

श्रोताओं और दर्शकों से खचा खच भरे सभागृह में एक हीरे का सौदागर आता है और उसे देख सभी १० मिनट तक सीटी बजाते हैं, चिल्लाते हैं, सारा माहौल गूंज रहा है, सब मस्त है ... | आख़िर ये कौन है जिसे देख कर मस्ती आ जाती है, नौजवान मुश्कियां मारने लगते हैं, कौन है यह कौन है ... ? ये जनाब हैं अपने किशोर कुमार |आदरणीय गालिब के शेर को किशोर बाबू के लिए उधार मांगूं तो कुछ ऐसा होगा - जिसके आने से आती थी स्टेज पर मस्ती, लोग कहतें हैं वो तो किशोर कुमार था | एक वो भी समय था जब किशोर के दिल की धड़कन स्टेज शो के नाम पर तेज हो जाती थी | किशोर कुमार एक मस्ती का नाम जरुर था लेकिन उनमें एक शर्मिलापन भी दिख जाता था | एक बार तो सुनील दत्त और उनके दोस्तों ने उन्हें परदे के पीछे से स्टेज पर ढकेला और शो कराने के लिए मजबूर किया | डरते डरते दादा ने एक लय पकड़ ली और बस निकल पडी स्टेज शो की गाडी ... पम्प पम्प पम्प | अब स्टेज शो में किशोर भैया तब तक गाते जब तक नही थकते | इस सजीव शो (real show) में किशोर ने गाया भी, नाचा भी और अभिनय भी किया | अपने अंदाजों को लोगों की मांग (public demand) पर बदलने लगे | कभी सभ्य आदमी (gen...

बूझ मेरा क्या नाव रे....कौन है ये मचलती आवाज़ वाली गायिका....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 87 ओ. पी नय्यर के निर्देशन में जिन तीन पार्श्व गायिकाओं ने सबसे ज़्यादा गाने गाये, वो थे आशा भोंसले, गीता दत्त और शमशाद बेग़म। शमशाद बेग़म के लिए नय्यर साहब के दिल में बहुत ज़्यादा इज़्ज़त थी। शमशादजी की आवाज़ की नय्यर साहब मंदिर की घंटी की आवाज़ से तुलना किया करते थे। उनके शब्दों में शमशादजी की आवाज़ 'टेम्पल बेल' की आवाज़ थी। भले ही आशा भोंसले के आने के बाद गीता दत्त और शमशाद बेग़म से नय्यर साहब गाने लेने कम कर दिये, लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि नय्यर साहब ने ही इन दोनो गायिकायों को सबसे ज़्यादा 'हिट' गीत दिए। १९५२ से लेकर करीब करीब १९५८ तक नय्यर साहब ने इन दोनो गायिकायों से बहुत से गाने गवाये और लगभग सभी के सभी लोकप्रिय भी हुए। जहाँ तक शमशादजी के गाये हुए गीतों का सवाल है, उनकी पंजाबी लोकगीत शैली वाली अंदाज़ को नय्यर साहब ने अपने गीतों के ज़रिए ख़ूब बाहर निकाला और हर बार सफल भी हुए। नय्यर साहब के अनुसार संगीतकार ही गायक गायिका को तैयार करता है, यह संगीतकार के ही उपर है कि वह गायक गायिका से कितना काम ले सकता है और कितनी अच्छी तरह से ले सकता है। इ...

गोपालदास नीरज का एक संगीतबद्ध गीत

समय-समय पर आवाज़ नई प्रतिभाओं से आपको रूबरू कराता रहता है। आज हम आपको एक बहुत ही प्रतिभावान कवि, संगीतकार और गायक से मिलाने जा रहे हैं। जी हाँ, ये हैं अब्बास रज़ा अल्वी । अब्बास हिन्दी और उर्दू कविता से तबसे जुड़े हैं जबसे इन्होंने ऑस्ट्रेलिया में कवि सम्मेलन और मुशायरों में पाठ किया। सिडनी में इनके पास अपना रिकॉर्डिंग स्टूडियो है। हिन्दी-उर्दू की गंगा-जमुनी संस्कृति में पले-बढ़े तथा भारतीय तथा पाश्चात्य संगीत का अनुभव रखने वाले अल्वी ने कविताएँ लिखीं, उन्हें संगीतबद्ध किया और गाया तथा उस एल्बम का नाम दिया 'बैलेंस इन लाइफ'। अल्वी ने ऑस्ट्रेलिया की ढेरों सांस्कृतिक तथा सामुदायिक संस्थानों के साथ काम किया। इसके साथ ही साथ इन्होंने साहित्य, रंगमंच, रेडियो व टीवी कार्यक्रमों के लिए भी काम किया। लेकिन ये दिल से कवि थे, कविताएँ इनके अंतर्मन के तार छेड़ती थी, इसलिए लिखने का काम सर्वोपरि रहा। ऑस्ट्रेलिया में इनका पहला ऑडियो एल्बम रीलिज हुआ 'कर्बला को सलाम' जो इनके स्वर्गीय पिता जनाब मुनव्वर अब्बास अल्वी को समर्पित थी। इसके बाद 'मुनव्वर प्रोडक्शन' के बैनर तले इन्होंने प्...

अपनी आँखों में बसा कर कोई इकरार करूँ...प्रेम की कोमल भावनाओं से सराबोर एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 86 क हा जाता है कि प्यार अंधा होता है, या फिर प्यार इंसान को अंधा बना देता है। लेकिन उस प्यार को आप क्या कहेंगे जो एक नेत्रहीन व्यक्ति अपनी मन की आँखों से करे? वह कैसे अपने प्यार का इज़हार करे, कैसे वह अपनी महबूबा की ख़ूबसूरती का बयान करे? आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं वही गीत इन सवालों का जवाब भी है। यह गीत इस बात का सबूत है कि प्यार की बस एक ही शर्त है, कि वो दो सच्चे दिलवालों में होनी चाहिए, बाक़ी और कुछ भी कोई मायने नहीं रखता। अगर दिल प्यार की अनुभूती को महसूस कर सकता है तो फिर आँखों की क्या ज़रूरत है! फ़िल्म 'ठोकर' का प्रस्तुत गीत "अपनी आँखों में बसाकर कोई इक़रार करूँ" प्रमाण है इस बात का कि एक नज़रों से लाचार आदमी के लिए प्यार कितना सुंदर हो सकता है। गीत में नेत्रहीन नायक अपनी नायिका को अपनी आँखों में बसाने की बात करता है क्योंकि उसे यक़ीन है कि आँखों के ज़रिए प्यार सीधे दिल में उतर जायेगा। ७० के दशक के बीचों बीच आयी इस गीत में रफ़ी साहब की आवाज़ का जादू वैसा ही बरक़रार है जैसा कि ५० और ६० के दशक में थ...

पतझर सावन बसंत बहार...अनुराग शर्मा के काव्य संग्रह पर पंकज सुबीर की समीक्षा

पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा पुस्तक - पतझर सावन बसंत बहार (काव्य संग्रह) लेखक - अनुराग शर्मा और साथी (वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया) समीक्षक - पंकज सुबीर पिट्सबर्ग अमेरिका में रहने वाले भारतीय कवि श्री अनुराग शर्मा का नाम वैसे तो साहित्‍य जगत और नेट जगत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है । किन्‍तु फिर भी यदि उनकी कविताओं के माध्‍यम से उनको और जानना हो तो उनके काव्‍य संग्रह पतझड़, सावन, वसंत, बहार को पढ़ना होगा । ये काव्‍य संग्रह छ: कवियों वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया और अनुराग शर्मा की कविताओं का संकलन है । यदि अनुराग जी की कविताओं की बात की जाये तो उन कविताओं में एक स्‍थायी स्‍वर है और वो स्‍वर है सेडनेस का उदासी का । वैसे भी उदासी को कविता का स्‍थायी भाव माना जाता है । अनुराग जी की सारी कविताओं में एक टीस है, ये टीस अलग अलग जगहों पर अलग अलग चेहरे लगा कर कविताओं में से झांकती दिखाई देती है । टीस नाम की उनकी एक कविता भी इस संग्रह में है ’’एक टीस सी उठती है, रात भर नींद मुझसे आंख मिचौली करती है ।‘’ अनुराग जी की कविताओ...

सागर मिले कौन से जल में....जीवन की तमाम सच्चाइयां समेटे है ये छोटा सा गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 85 जी वन दर्शन पर आधारित गीतों की जब बात चलती है तो गीतकार इंदीवर का नाम झट से ज़हन में आ जाता है। यूँ तो संगीतकार जोड़ी कल्याणजी - आनंदजी के साथ इन्होने बहुत सारे ऐसे गीत लिखे हैं, लेकिन आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में उनके लिखे जिस दार्शनिक गीत को आप तक पहुँचा रहे हैं वो संगीतकार रोशन की धुन पर लिखा गया था। मुकेश और साथियों की आवाज़ों में यह गीत है फ़िल्म 'अनोखी रात' का - "ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना". १९६८ में प्रदर्शित यह फ़िल्म रोशन की अंतिम फ़िल्म थी। इसी फ़िल्म के गीतों के साथ रोशन की संगीत यात्रा और साथ ही उनकी जीवन यात्रा भी अचानक समाप्त हो गई थी १९६७, १६ नवंबर के दिन। अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका अकाल निधन हो गया। इसे भाग्य का परिहास ही कहिए या फिर काल की क्रूरता कि जीवन की इसी क्षणभंगुरता को साकार किया था रोशन साहब के इस गीत ने, और यही गीत उनकी आख़िरी गीत बनकर रह गया. ऐसा लगा जैसे उनका यह गीत उन्होने अपने आप पर ही सच साबित करके दिखाया। इंदीवर ने जो भाव इस गीत में साकार किया है...

"ज़िंदगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी - प्रकाश मेहरा को हिंद युग्म की श्रद्धांजली

एक नौजवान, नाकाम और हताश, मुंबई में मिली असफलताओं का बोझ दिल में लिए घर लौटने की तैयारी कर रहा था कि उसे एक युवा निर्देशक ने रुकने की हिदायत दी, और अपनी एक छोटे बजट की फिल्म में उस नौजवान को मुख्य रोल की पेशकश दी. नौजवान ने उस निर्देशक पर विश्वास किया और सोचा कि एक आखिरी दाव खेल लिया जाए. फिल्म बनी और और जब दर्शकों तक पहुँची तो कमियाबी की एक नयी कहानी लिखी जा चुकी थी... दोस्तों, वो नौजवान थे अमिताभ बच्चन और वो युवा निर्देशक थे प्रकाश मेहरा. प्रकाश मेहरा, एक एक ऐसे जादूगर फ़िल्मकार, जिन्होने ज़िंदगी को एक जुआ समझकर पूरे आन बान से हाथ की सफ़ाई , और हेरा फेरी की हर ज़ंजीर तोड़ी, और तब जाकर कहलाये मुक़द्दर का सिकंदर । फ़िल्म जगत के ये सिकंदर यानी कि असंख्य हिट फ़िल्मों के निर्माता, निर्देशक और गीतकार प्रकाश मेहरा अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी मृत्यु की ख़बर सुनकर न जाने क्यों सबसे पहले 'मुक़द्दर का सिकंदर' फ़िल्म के शीर्षक गीत की वो लाइनें याद आ रहीं हैं कि - "ज़िंदगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी, मर के जीने की अदा जो दुनिया को सिखलाएगा, वो...

अखियाँ भूल गयी हैं सोना....सोने सा चमकता है ये गीत आज ५० सालों के बाद भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 84 आ ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक बहुत ही ख़ुशनुमा, चुलबुला सा, गुदगुदाने वाला गीत लेकर हम हाज़िर हुए हैं। दोस्तों, हमारी फ़िल्मों में कुछ 'सिचुएशन' ऐसे होते हैं जो बड़े ही जाने पहचाने से होते हैं और जो सालों से चले आ रहे हैं। लेकिन पुराने होते हुए भी ये 'सिचुएशन' आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि उस ज़माने में हुआ करते थे। ऐसी ही एक 'सिचुएशन' हमारी फ़िल्मों में हुआ करती है कि जिसमें सखियाँ नायिका को उसके नायक और उसकी प्रेम कहानी को लेकर छेड़ती हैं और नायिका पहले तो इन्कार करती हैं लेकिन आख़िर में मान जाती हैं लाज भरी अखियाँ लिए। 'सिचुएशन' तो हमने आपको बता दी, हम बारी है 'लोकेशन' की। तो ऐसे 'सिचुएशन' के लिए गाँव के पनघट से बेहतर और कौन सा 'लोकेशन' हो सकता है भला! फ़िल्म 'गूँज उठी शहनाई' में भी एक ऐसा ही गीत था। यह फ़िल्म आज से पूरे ५० साल पहले, यानी कि १९५९ में आयी थी, लेकिन आज के दौर में भी यह गीत उतना ही आनंददायक है कि जितना उस समय था। गीता दत्त, लता मंगेशकर और सखियों की आवाज़ों में यह गी...

जब तेरी धुन में जिया करते थे.....महफ़िल-ए-हसरत और बाबा नुसरत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१४ कु छ फ़नकार ऐसे होते हैं, जिनकी ना तो कोई कृति पुरानी होती है और ना हीं कीर्ति पर कोई दाग लगता है। वह फ़नकार चाहे मर भी जाए लेकिन फ़न की मौत नहीं होती और यकीन मानिए- एक सच्चे फ़नकार की परिभाषा भी यही है। एक ऐसे हीं फ़नकार हैं जिनके बारे में जितना भी लिखा जाए,ना तो दिल को संतुष्टि मिलती है और ना हीं कलम को चैन नसीब होता है। कहने को तो १९९७ में हीं उस फ़नकार ने इस ईहलोक को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था,लेकिन अब भी फ़िज़ा में उनके सुरों की खनक और आवाज़ की चमक यथास्थान मौजूद है। ना हीं वक्त उसे मिटा पाया है और ना हीं मौत उसे बेअसर कर पाई है। उसी "शहंशाह-ए-कव्वाली", जिसे २००६ में "टाईम मैगजीन" ने "एशियन हिरोज" की फ़ेहरिश्त में शुमार किया था, की एक गज़ल लेकर हम आज यहाँ जमा हुए हैं। वह गज़ल वास्तव में सत्तर के दशक की है,जिसे पाकिस्तान के रिकार्ड लेबल "रहमत ग्रामोफोन" के लिए रिकार्ड किया गया था और यही कारण है कि तमाम कोशिशों के बावजूद मैं उस गज़ल के गज़लगो का नाम मालूम नहीं कर पाया। लेकिन परेशान मत होईये, गज़लगो का नाम नहीं मिला तो क्...

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम...आजकल वो इस तरफ देखता है कम...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 83 सा हिर लुधियानवी एक ऐसे गीतकार रहे हैं कि उन्होने जो भी गाने लिखे वो आम जनता के होठों की शान बन गये। उन्होने अपनी शायरी और नग़मों में ऐसे ऐसे ख़यालात पेश किये हैं कि जिसने भी इन्हे पढ़ा या सुना इनके असर से बच न सके। असंतुलित बचपन और जवानी के असफल प्रेम ने उन्हे ऐसे झटके दिये थे कि उनकी ये तमाम दर्द उनकी शायरी में फूट पड़े थे और वो बन बैठे थे एक विद्रोही शायर। लेकिन सिर्फ़ प्रेम और प्रेम की नाकामियाँ लिखने तक ही उनकी शायरी सीमित नहीं रही, बल्कि समाज में चल रही समस्यायों पर भी उनकी कलम के बाण चलाये है उसी असरदार तरीक़े से। प्रेम और विरह जैसी विषयों से परे उठकर आम जनता की दैनन्दिन समस्यायों को अपना निशाना बनाया है साहिर ने एक बार नहीं बल्कि कई कई बार। भूख, बेरोज़गारी, नारी की इज़्ज़त और ग़रीबों की तमाम दुख तकलीफ़ों पर सीधा वार उनके कलम ने बहुत बार किये हैं। एक फ़िल्मी गीतकार के दायरे सीमाओं से घिरे होते हैं और बहुत ज़्यादा अलग तरह का कुछ लिखना मुमकिन नहीं होता। लेकिन जब भी मौका हाथ लगा साहिर ने ज़िन्दगी के किसी न किसी ज्वलन्त मुद्दे को व्यक्त किया है। उदाहरण के...

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (5)

पराग संकला से हमारे श्रोता परिचित हैं, आप गायिका गीता दत्त के बहुत बड़े मुरीद हैं और उन्हीं की याद में गीता दत्त डॉट कॉम के नाम से एक वेबसाइट भी चलते हैं. आवाज़ पर गीता दत्त के विविध गीतों पर एक लम्बी चर्चा वो पेश कर चुके हैं अपने आलेख " असली गीता दत्त की खोज में " के साथ. आज एक बार फिर रविवार सुबह की कॉफी का आनंद लें पराग संकला के साथ गीता दत्त जी के गाये कुछ दुर्लभ "प्रेम गीतों" को सुनकर. गीता दत्त और प्रेम गीतों की भाषा हिंदी चित्रपट संगीत में अलग अलग प्रकार के गीत बनाते हैं. लोरी, भजन, नृत्यगीत, हास्यगीत, कव्वाली, बालगीत और ग़ज़ल. इन सब गानों के बीच में एक मुख्य प्रकार जो हिंदी फिल्मों में हमेशा से अधिक मात्रा में रहता हैं वह हैं प्रणयगीत यानी कि प्रेम की भाषा को व्यक्त करने वाले मधुर गीत! फिल्म चाहे हास्यफिल्म हो, या भावुक या फिर वीररस से भरपूर या फिर सामजिक विषय पर बनी हो, मगर हर फिल्म में प्रेम गीत जरूर होते हैं. कई फिल्मों में तो छः सात प्रेमगीत हुआ करते हैं. चालीस के दशक में बनी फिल्मों से लेकर आज की फिल्मों तक लगभग हर फिल्म में कोई न कोई प्रणयगीत जरूर ...

मेरा दिल ये पुकारे आजा.....तड़पती नागिन की पुकार लता के स्वर में...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 82 क ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने सुना हेमन्त कुमार के संगीत और आवाज़ से सजी फ़िल्म 'बीस साल बाद' का एक गीत। आज भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हेमन्तदा छाये रहेंगे क्यूंकि आज भी हम उन्ही का स्वरबद्ध गीत सुनवाने जा रहे हैं आपको। लेकिन यह बात ज़रूर है कि आज का गीत उनकी आवाज़ में नहीं बल्कि सुर कोकीला लता मंगेशकर की आवाज़ में है। जहाँ हेमन्तदा का मधुर संगीत और लताजी की मधुर आवाज़ एक साथ घुलमिल जाये तो इस संगम से कैसा मीठा रस उत्पन्न होगा इसका शायद आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज हम आपको सुनवाने के लिए लाये हैं १९५४ की फ़िल्म 'नागिन' का एक गीत। यूँ तो फ़िल्म 'नागिन' का नाम आते ही लताजी का गाया "मन डोले मेरा तन डोले" गीत याद आता है और साथ ही याद आती है रवि और कल्याणजी द्वारा बजाये गये हारमोनियम और क्लेवियोलिन पर बीन की ध्वनि। लेकिन इसी फ़िल्म में लताजी ने बहुत सारे एक से एक मधुर एकल गीत गाये हैं जिनकी चर्चा इस गीत से थोडी कम होती है। तो इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना इन्ही में से एक गीत आज चुना जाए। अब देखना यह है कि क्या ...

बुतरखौकी - हक जन्म का मेरे मत छीनो

सुनो कहानी: श्रवण कुमार सिंह की कहानी 'बुतरखौकी' 'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम प्रत्येक शनिवार को आपको सुनवा रहे हैं चुनी हुई कहानियां जिनमें नए, पुराने, प्रसिद्ध, अल्प-परिचित सभी श्रेणी के रचनाकारों की बहुमूल्य कृतियाँ शामिल हैं। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में सआदत हसन अली मंटो की अमर कहानी 'टोबा टेक सिंह' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं श्रवण कुमार सिंह की सम-सामयिक कहानी 'बुतरखौकी' , जिसको स्वर दिया है शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 54 मिनट और 3 सेकंड। श्रवण कुमार सिंह की इस कहानी का टेक्स्ट हिंद युग्म पर कहानी कलश में उपलब्ध है। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें। हक जन्म का मेरे मत छीनो, मुझमें भी आस चहकती है. ~ प्रदीप मनोरिया ( पतझड़ सावन वसंत बहार से साभार) निष्काम भाव से उसने थ...

बेकरार करके हमें यूँ न जाइये....हेमंत दा का नशीला अंदाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 81 'ओ ल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी नम्बर ८१ में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, कुछ रोज़ पहले हमने आपको हेमन्त कुमार की आवाज़ में फ़िल्म कोहरा का एक गीत सुनवाया था "ये नयन डरे डरे"। इस गीत को सुनकर कुछ श्रोताओं ने हमसे हेमन्त कुमार के गाए कुछ और गीत सुनवाने का अनुरोध किया था। तो आज उन सभी श्रोताओं की फ़रमाइश पूरी हो रही है क्यूंकि आज हम आप तक पहुँचा रहे हैं हेमन्तदा का गाया फ़िल्म 'बीस साल बाद' का एक बड़ा ही चुलबुला सा गाना। दोस्तों, जब हमने फ़िल्म 'कोहरा' का गीत सुनवाया था तो हमने आपको यह भी बताया था कि हेमन्तदा ने अपने बैनर 'गीतांजली पिक्चर्स' के तले कुछ 'सस्पेन्स थ्रिलर' फ़िल्मों का निर्माण किया था और इस सिलसिले की पहली फ़िल्म थी 'बीस साल बाद' जो बनी थी सन् १९६२ में। बिरेन नाग निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे विश्वजीत और वहीदा रहमान। विश्वजीत पर हेमन्तदा की आवाज़ कुछ ऐसी जमी कि आगे चलकर प्रदीप कुमार की तरह विश्वजीत के लिए भी दादा ने एक से बढ़कर एक पार्श्वगायन किया। यहाँ कुछ गीतों के नाम गिनाएँ ...

सफल "हुई" तेरी आराधना (भाग ४), शक्ति सामंता का मुक्कमल फ़िल्मी सफ़र

अब तक आपने पढ़ा - आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र.... हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक... रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम... अब आगे... दोस्तों, शक्ति सामंत की सुरीली फ़िल्म यात्रा की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हुए हैं आज। शक्तिदा के इस सुरीले सफ़र के हमसफ़र बनकर पिछली कड़ी तक हम पाँव रख चुके थे ७० के दशक में। इससे पहले कि हम शक्तिदा और राजेश खन्ना की दूसरी फ़िल्म का ज़िक्र शुरु करें, 'आराधना' के एक और गाने की शूटिंग से संबधित बात हम आपको बताना चाहेंगे। यह बात शक्तिदा ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों को बताया था - "मुझे याद है कि कुल्लू मनाली में राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर के साथ मुझे एक गाना फ़िल्माना था। वो लोग तैयार होके १० बजे के करीब लोकेशन पर पहुँचते थे और ११ बजे पूरी वादी पर अंधेरा छा जाता था। बहुत कोशिशों के बाद भी जब वो लोग ७ बजे लोकेशन पर नहीं पहुँचे तो एक दिन मैनें दोनो को सोने ही नहीं दिया और ५ बजे 'मेक-अप' कराके ७ बजे लोकेशन पर ले गया। और उसके बाद ११ - ११:३० बजे तक हम लोग शूटिंग करते रहे। उसके बाद 'पैक-अप' करके उनको छोड़ दिया। उस ...

जाओ रे जोगी तुम जाओ रे....आम्रपाली के स्वर में लता की सदा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 80 य ह कहानी है भारत के इतिहास के पन्नो से। इस कहानी की शुरुआत होती है वैशाली शहर में जहाँ एक रोज़ एक नारी का आविर्भाव होता है वहाँ के एक आम के बगीचे से। किसी को नहीं पता कि वह कौन है और कहाँ से आयी है। वह बहुत सुंदर थी और नृत्यकला में उसका कोई सानी नहीं था वहाँ पर। शहर में हर पुरुष उसका प्यार जीतना चाहता था। इसलिए उस लड़की ने यह ऐलान किया कि वह कभी किसी से शादी नहीं करेगी और वह पूरे शहर के लिए नृत्य करती रहेगी। दिन गुज़रने लगे, लोग उसे 'आम्रपाली' के नाम से पुकारने लगे क्योंकि वो आम के बगीचे से निकल कर पहली बार शहर में आयी थी। एक दिन अचानक मगध के राजा अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण कर दिया। शहर के सारे लोग, जो आम्रपाली के नृत्य में डूबे हुए थे, अब युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे। यह देख आम्रपाली का हृदय दर्द से भर उठा। अजातशत्रु के सिपाही मगध की सेना से युद्ध में हारने लगते हैं, तो अजातशत्रु युद्धभूमी से भागकर मगध के सैनिक का भेस धारण कर वैशाली शहर में घुस जाते हैं और इत्तेफ़ाक से आ पहुँचते हैं नर्तकी आम्रपाली के घर। दोनो को एक दूसरे से प्यार हो जाता है, ले...