रविवार, 30 अप्रैल 2017

राग गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 315 : RAG GAUD MALHAR




स्वरगोष्ठी – 315 में आज


संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 1 : राग गौड़ मल्हार का आकर्षक रूप


मालविका कानन और लता मंगेशकर से सुनिए –“गरजत बरसत भीजत आई लो...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की पहली कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1949 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के घर में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक लोकप्रिय बन्दिश सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी मालविका कानन के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



फिल्म जगत में रोशन के नाम से विख्यात संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। रोशन का प्रारम्भिक परिचय देते हुए उपरोक्त भूमिका में जैसा निवेदन किया गया है, उनका जन्म पंजाब के गुजरावालाँ (अब पाकिस्तान) में 14 जुलाई, 1917 को हुआ था। संगीत के प्रति उन्हें बचपन से ही लगाव था। देश के तत्कालीन वरिष्ठ संगीत गुरुओं से उनकी शिक्षा हुई। उन्होने पाठ्यक्रम पदयति से पाँच वर्ष तक मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से और गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से संगीत का विधिवत प्रशिक्षण ग्रहण किया था। रोशन ने हर प्रकार का संगीत सीखा था, परन्तु उन्हें इसराज अथवा दिलरुबा वाद्य से विशेष लगाव था। यह वाद्य सारंगी वादन की तकनीक से मेल रखता है। इन वाद्यों का प्रभाव रोशन के स्वरबद्ध अधिकतर गीतों में मिलता है।

लता  मंगेशकर 
1948 में रोशन रेडियो की नौकरी छोड़ कर फिल्म संगीतकार बनने की लालसा लेकर मुम्बई (तब बम्बई) आ गए। थोड़े संघर्ष के बाद रोशन संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद अनवर के सहायक बन गए। फिल्म ‘सिंगार’ में रोशन सहायक संगीतकार थे। कुछ समय बाद रोशन की भेंट फ़िल्मकार केदार शर्मा से हुई। उन्होने रोशन की प्रतिभा को पहचान कर फिल्म ‘नेकी और बदी’ के संगीतकार का दायित्व दे दिया। यह फिल्म 1949 में प्रदर्शित हुई थी, परन्तु व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही। मधुबाला और गीताबाली अभिनीत और राजकुमारी, अमीरबाई कर्नाटकी और फिरोज दस्तूर के गाये गीतों के बावजूद टिकट खिड़की पर असफल रही फिल्म ‘नेकी और बदी’ से रोशन को कोई विशेष पहचान नहीं मिली। अगले वर्ष केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बावरे नैन’ में भी रोशन का संगीत था। इस फिल्म में राज कपूर के लिए पार्श्वगायक मुकेश के गाये गीत –“तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, वापस बुला ले...” के माध्यम से रोशन को अवश्य एक पहचान मिली। इस सदाबहार गीत ने उन दिनों तहलका मचा दिया था। इस गीत के अलावा फिल्म में मुकेश और गीता दत्त का गाया गीत –“ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” तथा मुकेश और राजकुमारी का गाया गीत –“मुझे सच सच बता दो...” भी पर्याप्त लोकप्रिय हुए थे। रोशन और मुकेश की जोड़ी ने इस फिल्म के सफल संगीत के मानक गढ़े थे। दोनों की मित्रता इस फिल्म से पहले की थी जब दोनों दिल्ली में रहते थे। इन दोनों की मित्रता की चर्चा श्रृंखला के आगामी किसी अंक में हम करेंगे। बहरहाल, फिल्म ‘बावरे नैन’ के संगीत की सफलता से रोशन को फिल्म जगत में स्थायित्व मिला। फिल्म ‘बावरे नैन’ की सफलता के कारण रोशन को ‘बेदर्दी’, ‘हमलोग’ और ‘मल्हार’ जैसी उल्लेखनीय फिल्में मिली। इन फिल्मों का प्रदर्शन वर्ष 1951 में हुआ था। फिल्म ‘बेदर्दी’ और ‘हमलोग’ में मुकेश के गाये गीत थे, जबकि ‘मल्हार’ स्वयं मुकेश द्वारा निर्मित फिल्म थी। फिल्म ‘मल्हार’ के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की एक प्रचलित बन्दिश का चुनाव किया। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किए थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। लगभग एक दशक बाद फिल्म ‘बरसात की रात’ और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। अब आपको हम लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का गीत सुनवाते हैं, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार की बन्दिश का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इस गीत को सुनिए ग्रीष्म ऋतु में वर्षा ऋतु का आनन्द लीजिए।

राग  गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार



मालविका कानन
राग गौड़ मल्हार में राग गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। यह मल्हार अंग के रागों में से एक है। इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। राग गौड़ मल्हार के आरोह और अवरोह में सभी शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। केवल अवरोह में धैवत के साथ कोमल निषाद स्वर का प्रयोग होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार के थाट के विषय में दो मत हैं। अधिकतर गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा तो इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार के बारे में विद्वानो का मत है कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरूप अधिक प्रचलित है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। राग गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है, किन्तु पावस ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका मालविका कानन के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है। आप राग गौड़ मल्हार की यह बन्दिश सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालविका कानन : तीनताल




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 315वें अंक की पहेली में आज हम आपको 65 वर्ष से अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश में किस राग का आधार है? राग का नाम बताइए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 6 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 317वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 312वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से एक शैली प्रधान और राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – पार्श्वगायक मुकेश

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी. चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इस सप्ताह से हमारी नई श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हुआ है। इस अंक में हमने रोशन के संगीत से सजी फिल्म ‘मल्हार’ से राग गौड़ मल्हार में पिरोए एक गीत और इस राग के पारम्परिक स्वरूप पर चर्चा की है। आगामी अंक में हम रोशन के संगीत से सजे एक और राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। अगले अंक अथवा अगली श्रृंखला के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों से हम पुनः मिलेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

गीत अतीत 10 || हर गीत की एक कहानी होती है || आ गया हीरो || आ गया हीरो || आर्घ्या बैनर्जी

Geet Ateet 10

Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Aa Gaya Hero
Aa Gaya Hero
Arghya Banerjee - Composer & Singer

गोविंदा की ताज़ातरीन फिल्म "आ गया हीरो" के शीर्षक गीत की चर्चा आज गीत अतीत में, अराफात महमूद के लिखे और अर्घ्य बैनर्जी के गाये इस गीत के संगीतकार भी खुद अर्घ्य ही हैं, सुनिए अर्घ्य बैनर्जी से इस गीत से जुडी कुछ दिलचस्प बातें, प्ले पर क्लिक करें और आनंद लें.....



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

मधुदीप गुप्ता की लघुकथा - मज़हब

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। इस शृंखला में पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में (स्वर्गीय) डॉ. सतीश दुबे की लघुकथा श्रद्धांजलि का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मधुदीप गुप्ता की लघुकथा मज़हब, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत अंश का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 51 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

लेखक: मधुदीप गुप्ता
जन्म: 1-5-1950; दुजाना (हरियाणा)
सम्प्रति: निदेशक, दिशा प्रकाशन
लघुकथा शृंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ के 20 खण्डों के सम्पादन/संयोजन


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

हाँ बाबा, आप सोजुद्दीन हैं।
 (मधुदीप गुप्ता की लघुकथा 'मज़हब' से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
मज़हब MP3

#Fifth Story, Mazahab; Madhudeep Gupta; Hindi Audio Book/2017/5. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 23 अप्रैल 2017

श्रद्धांजलि : SWARGOSHTHI – 314 : A TRIBUTE



स्वरगोष्ठी – 314 में आज

विशेष अंक : किशोरी ताई को भावभीनी श्रद्धांजलि

फिल्म “भिन्न षडज” के माध्यम से विदुषी किशोरी अमोनकर की स्मृतियों को सादर नमन



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के विशेष अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज के इस अंक में हम भारतीय संगीत जगत की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। विगत 3 अप्रैल 2017 को शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका पद्मविभूषण किशोरी अमोनकर का 84 वर्ष की आयु में देहावसान हो जाने से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत जगत को गहरी क्षति पहुँची है। शास्त्रीय संगीत जगत में किशोरी जी का जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति हो पाना सम्भव नहीं है। संयोग से निधन के अगले सप्ताह सोमवार 10 अप्रैल को किशोरी जी का जन्मदिवस था। आज के इस विशेष अंक में हम किशोरी अमोनकर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर निर्मित एक फिल्म का प्रदर्शन आपके लिए कर रहे हैं। सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार अमोल पालेकर और संध्या गोखले द्वारा निर्देशित इस फिल्म को हम ‘यू-ट्यूब’ से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं।

'Bhinna Shadja', a film on the unparalleled contributions of Ganasaraswati Padmavibhushan Kishori Amonkar (fondly known as Tai) to Indian classical music, is also an exploration of larger debates on the nature of art itself. Often criticised for experimenting with classical traditions of the Japiur-Atrauli Gharana, Tai nonetheless strove in her passionate resolve to emphasise evocation of moods over an orthodox rendition of ragas. This vilification by conservatives however did not deter her audiences and other contemporary artists from appreciating her transcendental aesthetics. The film explores some of these questions as not just pertaining to her own life but as artistic dilemmas that resonate in many other contexts. Tai's apprehension that with age her music might begin to elude her is also one of the most fundamental predicaments that artists face.

Release year – 2011

Running time - 1:09:34

Language – Marathi

Directors - Amol Palekar and Sandhya Gokhale


Category - Documentary

License - Standard YouTube License


फिल्म – भिन्न षडज : विदुषी किशोरी अमोनकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित वृत्तचित्र




अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक में आज हमने विदुषी किशोरी अमोनकर की स्मृतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। आगामी अंक में हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम फिल्म जगत के महान संगीतकार रोशन के राग आधारित गीतो पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 







शनिवार, 22 अप्रैल 2017

चित्रकथा - 15: नक़्श लायलपुरी के लिखे 60 मुजरे (भाग - 1)


अंक - 15

नक़्श लायलपुरी के लिखे 60 मुजरे - भाग 1

"भरोसा कर लिया जिस पर, उसी ने हमको लूटा है..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



एक बार ’विविध भारती’ के एक साक्षात्कार में गीतकार नक़्श लायलपुरी साहब ने फ़रमाया था कि उन्होंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं जो कि अलग-अलग रंग, अलग-अलग मिज़ाज के हैं। उन्होंने श्रोताओं से इन्हें सुनने का भी सुझाव दिया था। यह बात मेरे अवचेतन मन में बरसों से चली आ रही थी। हाल ही में नक़्श साहब की मृत्यु के बाद यह बात फिर से मुझे याद आ गई और मैंने यह निर्णय लिया कि उनके सुझाये इन 60 मुजरों को खोज निकालना ज़रूरी है। जुट गया शोध पर। और इसी शोध का नतीजा है आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक। मेरी तरफ़ से यह नक़्श साहब को श्रद्धांजलि है। मैं इसमें कितना कामयाब हुआ हूँ, इसका फ़ैसला आप लेंगे। आज प्रस्तुत है इस लेख का पहला भाग।




ह आज से दस साल पहले, वर्ष 2006, की बात होगी जब ’विविध भारती’ के ’उजाले उनकी यादों के’ में नक़्श लायलपुरी साहब तशरीफ़ लाए थे। बातों बातों में उन्होंने कमल शर्मा जी से कहा था - "मैंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं। अगर कभी हो सके तो पेशेन्स के साथ उन्हें सुनिएगा। आपको 60 अलग फ़्लेवर और 60 अलग रंग मिलेंगे उनमें।" उस दिन मेरे मन में यह ख़याल आया था कि काश नक़्श साहब के इस सुझाव पर अमल किया जा सकता! दिन निकलते चले गए, पर यह बात मेरे अवचेतन मन में दर्ज हो चुकी थी। कई बार सोचा कि मैं ख़ुद ही इस पर शोध करूँ और ढूंढ़ निकालूँ नक़्श साहब के लिखे सभी मुजरों को। पर किसी न किसी वजह से संभव नहीं हो सका। वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता। नक़्श साहब हाल ही में दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ चले गए अपने अख़िरी सफ़र पर। उनके जाने के बाद वह पुराना ख़याल फिर एक बार मेरे दिल में मचल उठा है। आइए ज़रा नज़दीक से नज़र डालें नक़्श लायलपुरी साहब के लिखे तमाम मुजरा शैली के गीतों पर।

नक़्श लायलपुरी ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था 1952 में फ़िल्म ’जग्गु’ में केवल एक गीत लिख कर। ग़ौर तलब बात यह है कि यह एक गीत मुजरा शैली का ही गीत था। हंसराज बहल के संगीत में आशा भोसले का गाया यह गीत है "अगर तेरी आँखों से आँखें मिला दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ, मुक़द्दर बना दूँ"। गीत के संगीत में पारम्परिक मुजरा संगीत की झलक ना होकर मध्यएशियाई संगीत की झलक मिलती है। "निगाहें बदल दूँ, निशाना बदल दूँ, जो चाहूँ तो सारा ज़माना बदल दूँ, मोहब्बत की राह पर चलना सिखा दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ..." और "है जिनकी जवानी उन्हीं का ज़माना, जो चाहे अगर मेरी दुनिया में आना, ज़मीं तो ज़मीं आसमाँ पे बिठा दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ..." जैसे बोल इसे मुजरा शैली का गीत बनाता है शब्द और भाव की दृष्टि से। नक़्श साहब की दूसरी फ़िल्म ’घमंड’ जो 1955 में आई थी, उसमें भी एक मुजरा गीत था। राजकुमारी की आवाज़ में गुल्शन सूफ़ी की यह रचना एक मुजरा गीत था जिसके बोल थे "जब से उलझे नैन मुझे दिन रैन नहीं है चैन, सजनवा नैनों की गली में आजा, ओ मोरे राजा"। पिछले गीत में जहाँ नायिका नायक को अपनी ओर आकर्षित करती हुई ख़ुद की बढ़ाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ ’घमंड’ फ़िल्म के इस मुजरे में नायिका अपने नायक को उसके पास आने की ग़ुज़ारिश कर रही है। इस तरह से ये दोनों गीत बिल्कुल अलग रंग के होते हुए भी एक ही अंजाम की तरफ़ बढ़ रहे हैं।

1958 में एक फ़िल्म आई थी ’अजी बस शुक्रिया’ जिसमें रोशन का संगीत था और गीत लिखे फ़ारुख़ क़ैसर ने। लेकिन नक़्श साहब के दो मुखड़े इस फ़िल्म के लिए लिए गए जिनमें से एक मुजरा था। क़िस्सा आख़िर क्या था, जानिए नक़्श साहब की ज़ुबानी - "मैं रोशन साहब के साथ सिर्फ़ एक ही फ़िल्म कर सका। एक और फ़िल्म थी जिसमें मेरे लिखे दो मुखड़े इस्तमाल किए गए। दरसल क्या हुआ कि मेरे दो मुखड़े रोशन साहब के पास पड़े हुए थे। वो उन्हें ’अजी बस शुक्रिया’ में इस्तमाल करना चाहते थे। लेकिन फ़िल्म के डिरेक्टर मोहम्मद हुसैन चाहते थे कि फ़ारुख़ क़ैसर फ़िल्म के गीत लिखे। रोशन और फ़ारुख़ क़ैसर कई बार सिटिंग् की पर फ़ारुख़ साहब जो कुछ लिख रहे थे वो सब रोशन साहब को पसन्द नहीं आ रही थी। एक दिन रोशन साहब मेरे पास आए और कहने लगे कि वो वह फ़िल्म छोड़ रहे हैं क्योंकि वो गीतों के बोलों से ख़ुश नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मेरे लिखे दो मुखड़े पसन्द है और वो उनका इस्तमाल करना चाहते हैं। मैंने ख़ुशी ख़ुशी वो मुखड़े उन्हें दे दिए और फ़ारुख़ क़ैसर ने उनके अन्तरे लिखे। कुछ दिनों बाद मुझे दो वाउचर मिले 250 रुपये प्रति मुखड़ा। इन दो गीतों में एक मुजरा था "बेदर्दी नज़रें मिला के कहदे क्या है तेरी मर्ज़ी" और दूसरा गीत था "सारी सारी रात तेरी याद सताये"। मीनू मुमताज़ पर फ़िल्माया गया यह मुजरा काफ़ी हिट हुआ था पर इस मुजरे के गीतकार के रूप में फ़ारुख़ क़ैसर का नाम ही जुड़ा हुआ है जबकि पंच लाइन नक़्श साहब का दिया हुआ है।


इसके अगले ही साल 1959 में स्टण्ट फ़िल्म आई ’सर्कस क्वीन’। मोहम्मद शफ़ी के संगीत में नक़्श साहब का लिखा मुजरा गाया मुबारक बेगम ने। ’जग्गु’ फ़िल्म के गीत की तरह इसे भी एक आधुनिक मुजरा कह सकते हैं जो एक पार्टी में पेश की जा रही है। "ओहो दिल वाले, निगाहें मिला ले, दिल के दामन को रंगी बना ले"। इसकी धुन में भी मध्यएशियाई रंग शामिल है। इस गीत के तीन अन्तरे हैं - "नैन तीखे हैं क़ातिल निगाहें, मेरी फूलों सी नाज़ुक हैं बाहें, चाल बहकी हुई, ज़ुल्फ़ें महकी हुई, मेरे मुखड़े पे झूमे उजाले...", "आ हसीनों की महफ़िल में आके, देख ले दो घड़ी मुस्कुरा के, साज़ दिल का उठा गीत ख़ुशियों के गा, झूम कर ज़िन्दगी का मज़ा ले...", "ज़िन्दगी है सफ़र जीने वाले, हँसते-हँसते गुज़र जीने वाले, होके मस्ती में जी, है यही ज़िन्दगी, कर ना दिल को ग़मों के हवाले..." - पहले दो अन्तरों में नायिका नायक को अपनी तरफ़ आकर्षित कर रही हैं तो तीसरे अन्तरे में आकर्षण के साथ-साथ ज़िन्दगी का फ़ल्सफ़ा भी बता रही है। इस तरह से इस मुजरे में नक़्श साहब ने जीवन-दर्शन का भी समावेश कर दिया है।

एक अरसे के बाद 1968 में नक़्श साहब के लिखे गीतों से सजी फ़िल्म आई ’तेरी तलाश में’ जिसमें सपन-जगमोहन के स्वरबद्ध गीत काफ़ी सराहे गए। इस फ़िल्म में आशा भोसले का गाया एक मुजरा गीत था "राज़-ए-दिल हमसे कहो, हम तो कोई ग़ैर नहीं, यूं परेशाँ ना रहो हम तो कोई ग़ैर नहीं"। अब तक के नक़्श साहब के मुजरों में ख़ुशी का रंग था, पर इस ग़ज़ल में उन्होंने दर्द भर दिया है। ग़ज़ल के बाक़ी दो शेर हैं - "महकी महकी सी ये तन्हाई गिला करती है, ग़ैर तुम भी न रहो हम तो कोई ग़ैर नहीं", और "किसी हमदर्द को कुछ दर्द बटा लेने दो, दर्द तन्हा ना सको हम तो कोई ग़ैर नहीं"। 1972 की फ़िल्म ’बाज़ीगर’ में नक़्श साहब ने दो मुजरे लिखे। एक बार फिर सपन-जगमोहन का संगीत और आशा भोसले की आवाज़। "आज आया है तू मेरा महमान बनके, तुझको जाने ना दूँगी मैं"। गीत का सिचुएशन क़रीब क़रीब ’शोले’ फ़िल्म के "जब तक है जान, जाने-जहाँ मैं नाचूंगी" गीत जैसा ही है। या फिर ’मेरा गाँव मेरा देश’ फ़िल्म के "मार दिया जाए छोड़ दिया जाए" गीत जैसी। दुश्मन के डेरे पर नायिका नाचती हुई यह गीत गा रही है; एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "तेरे हाल पे रहम ना खाऊँगी, मैं तो खेल के होली तेरे ख़ून से, बरसों की आग बुझाऊंगी, यही है मेरी मर्ज़ी..."। यह गीत पारम्परिक मुजरा जैसा नहीं है, लेकिन इसी फ़िल्म का अन्य गीत "मेरी झूम के नाची जवानी तो घुंघरू टूट गए, मैंने छेड़ी जो दिल की कहानी घुंघरू टूट गए"। आशा भोसले ही की आवाज़ में इस मुजरे को सुनते हुए ख़याल आया कि 80 के दशक में क़तील शिफ़ई का लिखा मशहूर मुजरा "मोहे आई ना जग से लाज, मैं इतना ज़ोर से नाची आज कि घुंघरू टूट गए" में बोलों की समानता है।


1973 में फ़िल्म आई ’प्रभात’ जिसमें मदन मोहन का संगीत था। इसमें नक़्श ल्यालपुरी को गीत लिखने का मौक़ा मिला। नक़्श साहब ने उसी साक्षात्कार में बताया था कि इस फ़िल्म में उन्होंने दो मुजरे लिखे जिन पर बिहार की जनता ने सिनेमाघरों में स्क्रीन पर सिक्के उछाले। लता मंगेशकर की आवाज़ में पहला मुजरा है "भरोसा कर लिया जिस पर, उसी ने हमको लूटा है, कहाँ तक नाम गिनवाएँ सभी ने हमको लूटा है"। ग़ौर करने लायक बात है कि इस मुजरे में नक़्श साहब ने मुजरा करने वाली के दिल के दर्द को उजागर किया है कि उसे हर किसी ने बस लूटा ही है। ’तेरी तलाश में’ फ़िल्म के मुजरे में जिस दर्द की छाया हमने देखी थी वह नायक का दर्द था, जबकि इस मुजरे में नायिका का दर्द छुपा है। एक अन्तरे में नक़्श साहब कहते हैं, "जो लुटते मौत के हाथों तो कोई ग़म नहीं होता, सितम इस बात का है ज़िन्दगी ने हमको लूटा है"। इसी तरह का कुछ उन्होंने ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल में भी कहा था, "बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते, ज़िन्दगी बोझ बनी हो तो उठायें कैसे"। ख़ैर, ’प्रभात’ फ़िल्म का एक और मुजरा है "साक़िया क़रीब आ, नज़र मिला"। लता जी की ही आवाज़ में शास्त्रीय संगीत आधारित इस मुजरे को मदन मोहन के अद्‍भुत संगीत ने जितना निखारा है, उतना ही न्याय नक़्श ल्यालपुरी के असरदार बोलों ने किया है। "प्यासी कहीं ना रह जाए मेरे शबाब की रातें, दिल को मेरे न बहला तू करके शराब की बातें, तुझको ख़ुदा का वास्ता शराब ना शराब ना, साक़िया क़रीब आ..." - पहले अन्तरे में नायिका शराब को ना कह रही है तो दूसरे अन्तरे में शराब पिलाने की बात होती है और तीसरे अन्तरे में तो नायिका ख़ुद शराब पीने की बात करती है। वो कहती है, "दिल भी जवाँ है पहलु में तू भी है पास जानेजाँ, ढलने लगी है शोलों में होठों की प्यास जानेजाँ, इतनी सी है इल्तिजा मुझे पीला पीला, साक़िया क़रीब आ..."।

70 के दशक के शुरुआती किसी साल में संगीतकार मदन मोहन के संगीत में नक़्श साहब ने दो मुजरे लिखे थे संभवत: ’रहनुमा’ फ़िल्म के लिए जो बन्द हो गई। लेकिन गाने आशा भोसले की आवाज़ में रेकॉर्ड हो चुके थे। 6 मिनट 38 सेकन्ड्स अवधि का पहला मुजरा था "हम होश लुटा कर महफ़िल में जब उनका नज़ारा कर बैठे, घबरा के उन्हें तन्हाई में मिलने का इशारा कर बैठे"। इस मुजरे में पूरी की पूरी एक कहानी छुपी हुई है। पहले अन्तरे में नक़्श साहब बताते हैं कि किस तरह से उस तवायफ़ को किसी ने अपना हाथ दिया और किस तरह से वो उसके प्यार में पड़ गई। "हाथों में जो उनका हाथ आया, आंखों में नशा सा छाने लगा, सौ बार झुकीं बोझल पलकें, माथे पे पसीना आने लगा, मिलते ही किसी बेगाने से हम वादा वफ़ा का कर बैठे।" दूसरे अन्तरे में दोनों के और ज़्यादा क़रीब आने की बात कही गई है, तन से तन का मेल हुआ, पर जल्द ही तवायफ़ का मोह भंग हुआ। "दिल से दिल की बातें भी हुईं, छुप छुप के मुलाक़ातें भी हुईं, कुछ फूल तमन्ना की महके, रंगीन कई रातें हुईं, इक रोज़ हमें मालूम हुआ हम ख़ून-ए-तमन्ना कर बैठे"। और अन्तिम अन्तरे में तवायफ़ के टूटे दिल के संभल जाने के प्रयास का चित्रण हुआ है। "उल्फ़त की मिली यह हमको सज़ा, हर ग़म को अकेले सहना पड़ा, शिकवे लबों पे आई मगर पत्थर की चुप रहना पड़ा, क्या जाने उन्हें हम क्या समझे जो उनपे भरोसा कर बैठे"। दूसरा मुजरा है "आज की शाम पहलू में तू, तेरा जाम ख़ाली है क्यों?"। संगीत संयोजन को सुन कर अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि यह मदन मोहन की रचना है। सुन कर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत की याद आ जाती है। "ज़ुल्फ़ की घटा खुली बिखर गई, शाम और भी ज़रा निखर गई, दिल की धड़कनों में रंग आ गया, तू मिला तो ज़िन्दगी सँवर गई, कैसे कहूँ मेरे लिए लायी है क्या आज की शाम..."। 

संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल के भाई गणेश के संगीत निर्देशन में 1975 में एक फ़िल्म आई थी ’बदनाम’। इस फ़िल्म में नक़्श ल्यालपुरी ने एक मुजरा लिखा था जिसे आशा भोसले ने गाया - "महफ़िल मेरी रातें मेरी दुनिया करे बातें मेरी, शीशे की जवानी आके मेरे सोनिया, नशे दियाँ बोतलाँ"। पंजाबी शब्दों का सुन्दर इस्तमाल नक़्श साहब ने इस मुजरे में किया। गीत फ़िल्माया गया था लक्ष्मी छाया पर जिन पर "मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए" फ़िल्माया गया था। गणेश के संगीत में एल-पी की छाया मिलती है। फ़िल्म के ना चलने से यह गीत भी गुमनाम रह गया। संगीतकार सपन-जगमोहन के साथ नक़्श लायलपुरी ने बहुत अच्छा काम किया है। 1976 में नक़्श-सपन-जगमोहन की एक और फ़िल्म आई ’कागज़ की नाव’। इसमें आशा भोसले का गाया एक बेहद ख़ूबसूरत मुजरा था जो शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। "ना जैयो रे सौतन घर सैंया, रुक जा मैं रो रो पड़ूँ तोरे पैंया" निस्सन्देह एक उच्चस्तरीय मुजरा गीत है। अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "जादू भी जाने टोना भी जाने, नजरिया से दिल को पिरोना भी जाने, हँस के मिले दूर होना भी जाने, तू ही ना माने ना माने, ना जैयो रे सौतन घर सैंया..."। गीत की ख़ास बात यह है कि गीत मुजरे वाली कोठे पे गा रही है, पर बोल पत्नी की ज़ुबाँ से निकलने वाले बोल हैं जो अपने पति को सौतन के घर जाने से रोक रही है। इस तरह से विरोधाभास का सुन्दार उदारहण है यह गीत। कितने सुन्दर शब्दों में नक़्श साहब दूसरा अन्तरा कहते हैं, "तन से लुभाये, अदाओं से लूटे, पल में वो माने तो पल में ही रूठे, बैरन की होती हैं सब रूप झूठे, तू ही ना जाने..."।

1977 में एक फ़िल्म आई थी ’महाबदमाश’। इस फ़िल्म में विनोद खन्ना और नीतू सिंह मुख्य भूमिकाओं में थे। रवीन्द्र जैन के संगीत में इस फ़िल्म में नक़्श लायलपुरी ने गीत लिखे। सिचुएशन के मुताबिक एक पार्टी में नीतू सिंह विनोद खन्ना को शराब का सहारा लेकर अपनी तरफ़ आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। पारम्परिक मुजरा शैली का गीत ना होते हुए भी सिचुएशन और भाव गीत के बोलों को मुजरा जैसा बना दिया है। मुखड़ा है - "अभी ज़रा सी देर में ये रात गुनगुनाएगी, ये धड़कनों की लय कोई हसीं धुन सुनाएगी, न तुझको नींद आएगी, न मुझको नींद आएगी, मेरे क़रीब आके पी, ये फ़ासला मिटा के पी"। एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं "जो तू कहे तो झूमके महकती ज़ुल्फ़ खोल दूँ, सनम तेरी शराब में लबों का रंग घोल दूँ, तेरी नज़र नज़र पे मैं ये दिल का फूल तोड़ दूँ, मेरे क़रीब आके पी..."। अब तक जितने भी मुजरों की हमने बातें की, हर एक मुजरा दूसरे मुजरे से अलग है। यहाँ तक कि शब्दों का दोहराव भी दिखाई नहीं दिया किसी में। इसी साल एक फ़िल्म आई थी ’वोही बात’, इसमें एक ग़ज़ल नक़्श साहब ने लिखी है, लेकिन शायद इसे एक मुजरे की तरह फ़िल्माया नहीं गया है, हालाँकि इसमें दर्द एक मुजरे वाली का ज़रूर छुपा हुआ है। ग़ज़ल के तीन शेर अर्ज़ है - "ज़हर देता है मुझे कोई दवा देता है, जो भी मिलता है मेरे ग़म को बढ़ा देता है।" "क्यों सुलगती है मेरे दिल में पुरानी यादें,कौन बूझती हुई शोलों को हवा देता है।" "हाल हँस-हँस के बुलाता है कभी बाहों में, कभी माज़ी मुझे रो रो सदा देता है।"


आज बस इतना ही, इस लेख का दूसरा व अन्तिम भाग आप पढ़ पाएंगे अगले सप्ताह।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

गीत अतीत 09 || हर गीत की एक कहानी होती है || इतना तुम्हें || मशीन || अराफात महमूद


Geet Ateet 09
Har Geet Ki Ek Kahani Hoti Hai...
Itna Tumhe
Machine 
Arafat Mehmood - Lyricist

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अब्बास मस्तान निर्देशित "मशीन" का गीत 'इतना तुम्हें' फिल्म के प्रोमो से पहले जारी हुआ, और खूब पसंद किया गया, ९० के दशक में आई फिल्म "यलगार" के गीत 'आखिर तुम्हें आना है' का रीक्रिएशन है ये गीत, जिसे नए अंदाज़ में ढाला है तनिष्क बागची ने, गाया है यासीर देसाई और शाशा तिरुपति ने, और लिखा है अराफात महमूद ने, सुनते है गीतकार अराफात महमूद की जुबानी, इतना तुम्हें गीत के बनने की कहानी.... 



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

रविवार, 16 अप्रैल 2017

चैत्र की चैती : SWARGOSHTHI – 313 : CHAITRA KI CHAITI




स्वरगोष्ठी – 313 में आज

फागुन के रंग – 5 : चैती गीतों का लालित्य

विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में सुनिए – “चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर लइहें...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की पाँचवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। पिछले दिनों हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। अब तो चैत्र, शुक्ल प्रतिपदा अर्थात भारतीय नववर्ष और नवरात्रि का पर्व भी हम माना चुके हैं। इस परिवेश में लोक और उप-शास्त्रीय शैली में चैती गीतों का गायन किया जाता है। पिछले अंक में हमने धमार गीतों में होली की चर्चा की थी। आज के अंक में हम चैती गीतों की चर्चा करेंगे। आज हम विदुषी गिरिजा देवी और विदुषी निर्मला देवी के स्वरों में उपशास्त्रीय चैती और पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में एक फिल्मी चैती प्रस्तुत कर रहे हैं।



ज हम आपसे संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो मूलतः ऋतु प्रधान लोक संगीत की शैली है, किन्तु अपनी सांगीतिक गुणबत्ता के कारण इस शैली को उपशास्त्रीय मंचों पर भी अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत के रूप में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र मास से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में चैती गीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। उत्तर भारत में इस गीत के प्रकारों को चैती, चैता और घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।

गिरिजा देवी
चैती गीतों का मूल स्रोत लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में रामजन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत् के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। कभी-कभी गायकों को दो दलों में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘चैता दंगल' कहा जाता है। आइए, सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप पर एक दृष्टिपात करते है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी एक चर्चित चैती से हम आज की इस संगीत सभा का शुभारम्भ करते हैं। यह श्रृंगार रस प्रधान चैती है जिसमें नायिका परदेश गए नायक के वापस घर लौटने की प्रतीक्षा करती है। इस चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है।

चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : विदुषी गिरिजा देवी और साथी



निर्मला  देवी
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि ‘लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है।‘ श्लोक का अर्थ है कि ‘इस चर-अचर की दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।‘ चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा, गायिका निर्मला देवी आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।

चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी



मुकेश
चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती की धुन और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती का गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनीचुनी फिल्मी गीतों में मिलता है। 1963 में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’। इस गीत में आपको चैती गीतों के समस्त लक्षण परिलक्षित होंगे। इस गीत में राग तिलक कामोद का आधार और दीपचन्दी ताल का स्पन्दन भी मिलेगा। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे।

चैती गीत : ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’ : मुकेश : फिल्म – गोदान



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 313वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 22 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 315वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 311वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको ध्रुपद गायक पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वर में धमार गायकी का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मिश्र खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – धमार (14 मात्रा) और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, शैली – धमार

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर देकर इस सप्ताह विजयी हुए हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह समापन अंक था। इस अंक में हमने आपके लिए चैती गीतों का एक खूबसूरत गुलदस्ता प्रस्तुत किया। श्रृंखला में हमने आपसे बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा की। आगामी अंक में हम संगीत जगत की एक महान विदुषी श्रीमती किशोरी अमोनकर को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके उपरान्त आगामी 30 अप्रैल,2017 से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम फिल्म जगत के गुणी संगीतकार रोशन के राग आधारित गीतो पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

चित्रकथा - 14: फ़िल्मी गीतों में सितार वादक जयराम आचार्य का योगदान


अंक - 14

सितार वादक जयराम आचार्य को श्रद्धांजलि

फ़िल्मी गीतों में जयराम आचार्य का योगदान 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



12 अप्रैल 2017 को सितार वादक, दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित, पंडित जयराम आचार्य का निधन हो जाने से फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने वाले उन तमाम गुमनाम टिमटिमाते सितारों में से एक सितारा हमेशा के लिए डूब गया। यह कटु सत्य ही है कि किसी फ़िल्मी गीत की सफलता के पीछे अक्सर गायक, संगीतकार और गीतकार के हाथ को स्वीकारा जाता है, और लोग भूल जाते हैं उन तमाम वादकों को जिनके वाद्यों के टुकड़ों से गीतों का श्रॄंगार होता रहा है, जिनसे गीतों की सुन्दरता बढ़ती रही है। जयराम जी भी ऐसे ही एक सितार वादक थे जिन्होंने बहुत से कामयाब गीतों में सितार के सुन्दर टुकड़े बजाए पर उन गीतों के साथ उन्हें लोगों ने कभी याद नहीं किया। आइए आज उनके जाने के बाद उन्हें याद करें उन गीतों का ज़िक्र करते हुए जिनमें उनकी उंगलियों का जादू चला था सितार के ज़रिए। पेश-ए-ख़िदमत है ’चित्रकथा’ के अन्तर्गत लेख ’फ़िल्म-संगीत में सितार वादक जयराम आचार्य का योगदान’।




जयराम आचार्य (4 जुलाई 1928 - 12 अप्रैल  2017)

यह एक कड़वा सच है कि फ़िल्मी गीतों में साज़ों को बजाने वाले साज़िन्दों को वह मुकाम नहीं दिया जाता जो मुकाम गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को दिया जाता है जबकि सच यही है कि किसी भी गीत की सफलता के पीछे इन साज़िन्दों का भी बेशकीमती योगदान होता है। यहाँ तक कि कुछ गीत तो उसमें शामिल साज़ों के टुकड़ों की वजह से यादगार हो जाते हैं। फ़िल्म ’परख’ के "ओ सजना बरखा बहार आई" गीत के शुरुआत में बजने वाले सितार के पीस के बग़ैर इस गीत को सुनना बिल्कुल वैसा है जैसे कि किसी के शरीर से सर को अलग कर दिया गया हो। फ़िल्म ’परख’ के इस गीत में सितार बजाने वाले फ़नकार का नाम है पंडित जयराम आचार्य, जिनका 12 अप्रैल 2017 को निधन हो गया। अफ़सोस की बात यह है कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होने के बावजूद उनकी मृत्यु की ख़बर अख़बारों में नहीं छपी, किसी रेडियो चैनल ने उन्हें याद नहीं किया। रेडियो पर शायद वो गाने बज रहे होंगे जिनमें उन्होंने सितार बजाए हैं, लेकिन न रेडियो प्रेज़ेन्टर को इस बात का पता है और न ही श्रोताओं को इस बात की ख़बर। जयराम आचार्य गुमनाम रह गए; और आज भी उनसे संबंधित अधिक जानकारी इन्टरनेट पर उपलब्ध नहीं है।



जयराम आचार्य का जन्म तमिल नाडु में 4 जुलाई 1928 को हुआ था। उन्हें संगीत विरासत में ही मिली। उनके पूर्वज सितार और वायलिन के वादक थे। वर्ष 1939 में जयराम बम्बई आए फ़िल्मों में एक गायक बनने का सपना लेकर। उस समय पार्श्वगायन का इजाद हो चुका था, इसलिए जयराम के मन में एक पार्श्वगायक बनने की ही लालसा थी। पर पार्श्वगायन के आने के बावजूद वह ज़माना सिंगिंग् स्टार्स का ही था। इसलिए इस क्षेत्र में पाँव जमाना आसान काम नहीं था। दो वर्ष तक संघर्ष करने के बाद जयराम को 1941 की फ़िल्म ’मेरा संसार’ में कोरस में गाने का मौक़ा मिला। गीत था "नया ज़माना आया लोगों"। इस गीत में मुख्य गायक थे अरुण कुमार और कवि प्रदीप। जयराम को समझ में आ चुका था कि गायकी में क़दम जमाना आसान नहीं। उधर उनके पिता चाहते थे कि जयराज दिलरुबा साज़ को अपनाए और उसी में उस्ताद बने। लेकिन युवा जयराम को सितार से प्यार था। पिता के सुझाव पर वो दिलरुबा बजाने तो लगे थे, पर घर पर एक सितार भी हुआ करता था। एक दिन जयराम ने सितार उठाया और उसके तार छेड़ दिए। सितार के तार छेड़ते ही उन्हें समझ आ गया कि यही वह साज़ है जो उनका हमसफ़र है। वर्ष 1946 में जयराम आचार्य HMV कंपनी से जुड़ गए और वहाँ उन्हें सितार के दिग्गजों जैसे कि पंडित रविशंकर के संस्पर्श में आने का मौक़ा मिला और सितार की बहुत सी बारीक़ियाँ सीखी।

आगे चलकर जयराम आचार्य वी. शान्ताराम के ’राजकमल कलामन्दिर’ से जुड़ गए। इस बैनर की 1953 की फ़िल्म ’तीन बत्ती चार रास्ता’ के दृश्य में सितार बजाने का मौका मिला जो उन्हीं पर फ़िल्माया गया। संगीतकार थे पंडित शिवराम कृष्ण। यह गीत था लता मंगेशकर का गाया "अपनी अदा पर मैं हूँ फ़िदा, कोई चाहे ना चाहे मेरी बला"। 1957 की फ़िल्म ’शारदा’ में सी. रामचन्द्र का संगीत था। इस फ़िल्म में लता और आशा का गाया एक यादगार डुएट था "ओ चाँद जहाँ वो जाए"। इस गीत में जयराम आचार्य ने सितार पर अपना कमाल दिखाया। इस तेज़ गति वाले गीत के रीदम और मिज़ाज के साथ ताल से ताल मिलाता हुआ उनके सितार ने एक अलग ही समा बांधा। 1958 में एक फ़िल्म आई थी ’अजी बस शुक्रिया’। इस फ़िल्म के लोकप्रिय गीत "सारी सारी रात तेरी याद सताये" गीत में जयराम आचार्य का सितार था। रोशन के संगीत में इस गीत के फ़िल्मांकन में नायिका जो एक गायिका हैं गीत गा रही हैं और बगल में तमाम साज़िन्दे अपने अपने वाद्य को बजा रहे हैं। तमाम साज़ों की भीड़ में जयराम जी का सितार भीड़ से अलग सुनाई देता है। 1960 की फ़िल्म ’परख’ के सदाबहार गीत "ओ सजना बरखा बहार आई" की बात हम कर चुके हैं। इस गीत में शैलेन्द्र, सलिल चौधरी और लता मंगेशकर की जितनी भूमिका, उतनी ही भूमिका जयराम आचार्य की भी है जिनकी जादुई सितार के टुकड़ों ने गीत को अमरत्व प्रदान कर दी है। 


यूं तो जयराम आचार्य ने समकालीन सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया है, लेकिन राहुल देव बर्मन के साथ उनका रिश्ता कुछ अलग ही रहा है। पंचम के पहले पहले गीत "घर आजा घिर आए बदरा साँवरिया" में जो सितार के सुन्दर टुकड़े सुनने को मिलते हैं, वो जयराम जी की ही देन है। यह 1961 की फ़िल्म ’छोटे नवाब’ का गीत है जिससे पंचम ने अपनी फ़िल्मी सफ़र का आग़ाज़ किया था। मुख्यत: सितार, सारंगी और तबले से सुसज्जित इस गीत के इन्टरल्युड संगीत में सितार के बेहद ख़ूबसूरत टुकड़े सुनने को मिलते हैं। यह वह ज़माना था जब किसी भी गीत में तीन ट्रैक हुआ करते थे - एक गायक के लिए, एक परक्युशन के लिए और एक ऑरकेस्ट्रा के लिए। और इन तीनों ट्रैकों पर बजाने वाले साज़िन्दों को बेहद होशियार रहना पड़ता था ताक़ि वो अपने अपने पीस को पहली बार में ही बिल्कुल सही बजाएँ। और जयराम आचार्य इस बात को अच्छी तरह समझते थे। तभी उनके बजाए हुए पीसेस भीड़ में भी बिल्कुल साफ़ और प्रॉमिनेन्टली सुनाई देते हैं।


एक साक्षात्कार में जब जयराम आचार्य से पूछा गया कि वो आख़िर फ़िल्म-संगीत में ही क्यों आए तो इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि फ़िल्म-संगीत में साज़िन्दों को बहुत जल्दी पेमेन्ट मिल जाता था जबकि शास्त्रीय संगीत के वादकों को बहुत दिनों तक इन्तज़ार करना पड़ता। कितनी ईमानदारी से उन्होंने इस कटु सत्य को कह दिया था! कला होने के साथ साथ सितार उनका पेशा भी था। घर चलाने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। ऐसे में फ़िल्मों में न बजाते तो कैसे घर चलता भला! राहुल देव बर्मन से उनकी मुलाक़ात सचिन देव बर्मन के एक रेकॉर्डिंग् पर हुई थी। पंचम को याद करते हुए वो कहते हैं कि पहली बार जब उन्होंने पंचम को "पंचम दा" कह कर बुलाया था, तब पंचम ने उनसे कहा था, "पंचम दा मत कहो, पंचम कहो।" 1967 की फ़िल्म ’चंदन का पलना’ में पंचम का संगीत था। इसमें लता मंगेशकर की आवाज़ में भक्तिमूलक गीत था "ओ गंगा मैया, पार लगा दे मेरी सपनों की नैया"। इस गीत को सुर्सिंगार पुरस्कार के लिए मनोनित किया गया था। इस गीत में भी जयराम जी के सितार के सुन्दर टुकड़े सुनने को मिलते हैं। पंचम की यह ख़ासियत थी कि परक्युशन और रीदम के प्रयोग के बावजूद उनके संगीत में भारतीय संगीत का जड़ होता था। 1969 की प्रसिद्ध फ़िल्म ’प्यार का मौसम’ के गीत "मैं ना मिलूंगी नज़र हटा लो" में भी सितार का सुन्दर प्रयोग सुनाई देता है। 1972 की फ़िल्म ’गोमती के किनारे’ के मुजरे "आज तो मेरी हँसी उड़ाई जैसे भी चाहा पुकारा" में भी जयराम आचार्य के सितार ने इस गीत को यादगार बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। 1975 की फ़िल्म ’आंधी’ के गीतों के लिए बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया, सरोद वादक ज़रीन दारुवाला और सितार के लिए जयराम आचार्य को चुना गया था। "इस मोड़ से जाते हैं" गीत में सितार और सरोद दोनों का प्रयोग है। "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं" गीत में भी जयराम जी के सितार का हस्ताक्षर है। इस गीत के शुरुआती संगीत के रूप में सितार के टुकड़े जैसे इस गीत के संकेत धुन की तरह सुनाई पड़ते हैं। हम आए दिन इन गीतों को सुनते रहते हैं सभी रेडियो चैनलों पर, लेकिन शायद ही कभी इन दो वादकों को याद करते हैं इन गीतों के साथ। यह अफ़सोस की ही बात है।

1968 की फ़िल्म ’आशिर्वाद’ के गीत "झिर झिर बरसे सावनी अखियाँ" जैसा असर वो 1970 की फ़िल्म ’गुड्डी’ के गीत "बोल रे पपीहरा" में चाहते थे। इसलिए वो अपने उन कलाकारों को इकट्ठा किया जिन पर वो भरोसा करते थे। ऑरकेस्ट्रेशन के लिए सेबास्टिअन, तबले के लिए वसन्त आचरेकर, परक्युशन के लिए लाला सत्तार, सरोद के लिए ज़रीन दारुवाला और सितार के लिए जयराम आचार्य को चुना गया। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के उपलब्ध ना होने की वजह से बांसुरी पर थे सुमन्त राज जी। जब ऐसे दिग्गज फ़नकार इस गीत से जुड़े थे, तब जादू तो चलना ही था। गायिका वाणी जयराम अपने आप को ख़ुशक़िस्मत मानती हैं जो इतने बड़े बड़े कलाकारों ने उनके गीत में वाद्य बजाए। और इसके गीत के इन्टरल्युड में सितार की ही प्रमुख भूमिका रही। 1970 की ही फ़िल्म ’दस्तक’ में मदन मोहन का संगीत था। मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी ग़ज़ल "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह" एक सदाबहार ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल के दोनों इन्टरल्युड्स में सिर्फ़ और सिर्फ़ जयराम आचार्य का सितार ही सुनाई देता है और क्या ख़ूब सुनाई देता है। लता जी की आवाज़ की मिठास के साथ सितार के टुकड़ों का रस, बस कमाल है! इसमें कोई शक़ नहीं कि इस ग़ज़ल को ख़ूबसूरती प्रदान करने में जयराम आचार्य का उतना ही हाथ है जितना हाथ लता-मजरूह-मदन मोहन का है। सितार के उन तमाम पीसेस के बिना यह ग़ज़ल उतनी ख़ूबसूरत न होती। 

1977 में फिर एक बार सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में जयराम आचार्य को सितार बजाने का मौक़ा मिला। फ़िल्म थी ’आनन्द महल’। शास्त्रीय संगीत आधारित यह रचना थी "नि सा ग म प रे सा रे गा"। यह फ़िल्म प्रदर्शित न हो सकी जिस वजह से इस गीत को बहुत अधिक नहीं सुना गया। उल्लेखनीय बात यह कि यह जेसुदास का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत था। इस गीत के इन्टरल्युड में सितार और सारंगी की ख़ूबसूरत जुगलबन्दी सुनने को मिलती है। जयराम आचार्य ने कई फ़िल्मों के पार्श्वसंगीत और शीर्षक संगीत में अमूल्य योगदान दिया। शंकर जयकिशन के संगीत में फ़िल्म ’ससुराल’ (1961) और ’ज़िन्दगी’ (1964) के टाइटल म्युज़िक में जयराम आचार्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ’ससुराल’ फ़िल्म के टाइटल म्युज़िक में "तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे चश्मेबद्दूर" गीत की धुन सितार पर उन्होने बजायी। इसी तरह से ’ज़िन्दगी’ फ़िल्म के टाइटल म्युज़िक में जयराम आचार्य ने बजायी "पहले मिले थे सपनों में और आज सामने पाया हाय कुरबान जाऊँ" की धुन। इसी तरह से शंकर जयकिशन के कई और फ़िल्मों में उन्होंने बजाए।

80 के दशक के आते आते जयराम आचार्य ने फ़िल्मों के लिए बजाना कम कर दिया। उन्हीं के शब्दों में उन्होंने 80 के दशक से ही फ़िल्मी कलाकारों से किनारा कर लिया और 1995 में उन्होंने सितार बजाना ही छोड़ दिया। आज जयराम आचार्य हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन फ़िल्म संगीत के धरोहर को अपने सितार के सुरीले टुकड़ों से समृद्ध करने के उनके अमूल्य योगदान को हम कभी नहीं भुला सकते। जयराम आचार्य हमेशा ज़िन्दा रहेंगे इन गीतों के माध्यम से। जब जब ये गीत सुने जाएँगे, उनकी यादें ताज़ा हो जाएँगी। सितार नवाज़ जयराम आचार्य को नमन!




आपकी बात

पिछले अंक में तीसरे लिंग के सकारात्मक चित्रण वाले 1997 की तीन हिन्दी फ़िल्मों पर लेख का हमें अच्छी प्रतिक्रिया मिली, और शुक्रवार देर रात तक इस अंक की रीडरशिप रही 191।  यूंही हमारे साथ बने रहिए, धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

गीत अतीत 08 || हर गीत की एक कहानी होती है || बेखुद || बिस्वजीत नंदा || हेमा सरदेसाई ||

Geet Ateet 08
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Bekhud
Biswajit Nanda & Hema Sardesaai
Biswajit Nanda

लन्दन में बसे देसी कलाकार बिस्वजीत नंदा और सुप्रसिद्ध गायिका हेमा सरदेसाई मिले तो बना गीत "बेखुद", शब्द पिरोये सजीव सारथी ने और सुर संजोये कृष्ण राज ने. लीजिये सुनें "बेखुद" के बनने की कहानी आज गायक बिस्वजीत नंदा की जुबानी...



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

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