मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

काजल कुमार की लघुकथा शिकार

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने उषा छाबड़ा के स्वर में उन्हीं की लघुकथा "प्रश्न" का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं काजल कुमार लिखित लघुकथा शिकार, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी शिकार का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 57 सेकंड है। इसका गद्य कथा-कहानी ब्लॉग पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कवि, कथाकार और कार्टूनिस्ट काजल कुमार के बनाए चरित्र तो आपने देखे ही हैं। उनकी व्यंग्यात्मक लघुकथायेँ "समय", "एक था गधा", "ड्राइवर", "लोकतनतर", और कुत्ता आप पहले सुन चुके हैं। काजल कुमार दिल्ली में रहते हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"एक छोटा बच्चा अकेला खेलता हुआ डगमग-डगमन चला आ रहा था।”
 (काजल कुमार की लघुकथा "शिकार" से एक अंश)


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शिकार MP3

#Twenty Eighth Story,  Shikaar; Kajal Kumar; Hindi Audio Book/2015/28. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 27 दिसंबर 2015

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन : SWARGOSHTHI – 250 : RAG BASED SONGS BY NAUSHAD


स्वरगोष्ठी – 250 में आज


संगीत के शिखर पर – 11 : फिल्म संगीतकार नौशाद अली


फिल्मों में रागदारी संगीत की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम साधक नौशाद अली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि दो दिन पूर्व, अर्थात 25 दिसम्बर को नौशाद अली का 96वीं जयन्ती थी। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में नौशाद अली के चार महत्त्वपूर्ण दशकों की संगीत-यात्रा के कुछ चुने हुए गीतों का उल्लेख कर रहे हैं। पाँचवें से लेकर आठवें दशक के बीच नौशाद सर्वाधिक सक्रिय थे। इन चार दशकों में से प्रत्येक दशक के एक-एक गीत चुन कर हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। इन गीतों में आपको क्रमशः राग बिहाग, मालकौंस, वृन्दावनी सारंग और पहाड़ी के स्वरों के दर्शन होंगे।



25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई की ओर रुख किया।

इसके आगे का वृतान्त हम जारी रखेंगे, इस बीच थोड़ा विराम लेकर हम आपको नौशाद के फिल्मी सफर के पहले दशक का संगीतबद्ध किया एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पिला कर रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वह गीत सुनवाते हैं जो राग बिहाग पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर और भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।


राग बिहाग : फिल्म ‘शाहजहाँ’ : ‘ऐ दिल-ए-बेकरार झूम…’ : कुन्दनलाल सहगल




घर से भाग कर बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे नौशाद अली कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्रांट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इंटरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इंटरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता गया। आइए अब हम वर्ष 1952 की उस फिल्म और उसके एक गीत की चर्चा करते हैं जिसने नौशाद की राग आधारित गीतों की रचना करने की अपनी क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था। परन्तु आज हम आपको नौशाद के सर्वप्रिय पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर में राग मालकौंस पर आधारित वह गीत सुनवाते हैं, जिसकी लोकप्रियता आज भी कायम है।


राग मालकौंस : फिल्म ‘बैजू बावरा’ : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मोहम्मद रफी




पियानो वादक के रूप में नौशाद को न्यू पिक्चर कम्पनी में एक ठिकाना तो मिल गया, परन्तु मंज़िल तो अभी कोसों दूर थी। अभी तक नौशाद मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे अलीम साहब के नाम लखनऊ से अपने एक मित्र का खत लेकर आए थे और उन्हीं के साथ गुजर कर रहे थे। नौकरी मिलते ही उन्होने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। नौशाद के यह दूसरे आश्रयदाता एक दूकान में सेल्समैन थे और रात में दूकान बन्द होने के बाद दरवाजा बन्द कर अन्दर ही सोते थे। नौशाद को भी ऐसे ही रहना पड़ता था। कभी जब दूकान में गर्मी अधिक होती तो दोनों बाहर फुटपाथ पर रात गुजारते थे।

फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग वे कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके…’। इस ठुमरीनुमा गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। लोकधुनों और राग आधारित गीतों के अलावा गज़लों की संगीत-रचना में भी नौशाद सिद्ध थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘मेरे महबूब’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘पालकी’ आदि फिल्मों में उनकी संगीतबद्ध गज़लें बेहद लोकप्रिय हुई थीं। सातवें दशक की फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ में मोहम्मद रफी का गाया- ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’और ‘गुजरे हैं आज इश्क़ में...’ की धुनें बेहद आकर्षक थीं। परन्तु आज हम इस दशक के गीतों में से चुन कर आपको फिल्म का जो गीत सुनवा रहे हैं, वह राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है। मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वरों में प्रस्तुत इस युगल गीत के बोल हैं- ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है...’। तीनताल और कहरवा में निबद्ध इस गीत का आनन्द आप लीजिए।


राग वृन्दावनी सारंग : ‘सावन आए या न आए...’ : आशा भोसले और रफी : फिल्म दिल दिया दर्द लिया




स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए। लोक संगीत के साथ ही उन्होने शास्त्रीय राग आधारित गीतों का प्रचलन भी पाँचवें दशक से आरम्भ कर दिया था। नौशाद के संगीत से सजे अगले जिस गीत की हम चर्चा करने जा रहे हैं, वह आठवें दशक की फिल्म ‘पाकीजा’ की एक ठुमरी है। इस ठुमरी, ‘कौन गली गयो श्याम...’ के फिल्मी प्रयोग पर थोड़ी चर्चा करेंगे। फिल्म और फिल्म संगीत के इतिहास में दो दशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्म ‘पाकीज़ा’ है। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण की योजना बनी थी। फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा। 1972 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी। गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म के अधिकतर गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिये थे। इसी दौरान वे ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे। अन्ततः 17 मार्च, 1968 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद फिल्म का पृष्ठभूमि संगीत और तीन ठुमरियाँ- परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया। अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी। संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए हमारे बीच नहीं थे। आइए, फिल्म ‘पाकीज़ा’ में नौशाद द्वारा शामिल की गई वह पारम्परिक ठुमरी सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुलताना ने राग पहाड़ी का स्वर दिया है। विदुषी परवीन सुलताना ने तीनों सप्तकों में फिरने वाले स्वरो में इस ठुमरी को एक अलग रंग दिया है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और मुझे वर्ष 2015 के इस समापन अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग  पहाड़ी : फिल्म  पाकीज़ा : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : बेगम परवीन सुलताना






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी अंक में हम वार्षिक विजेताओं द्वारा प्रस्तुत ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित करेंगे।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप वाद्य के वादक के नाम का अनुमान लगा सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 248 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रामनारायण द्वारा प्रस्तुत सारंगी पर राग दरबारी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वाद्य – सारंगी। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह ग्यारहवाँ और समापन अंक था। इस अंक में हमने भारतीय फिल्मों के अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। यह वर्ष 2015 का समापन अंक था। अगला अंक वर्ष 2016 का पहला अंक होगा। इस अंक में ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के चौथे वार्षिक विजेता का परिचय प्राप्त करेंगे। आगामी अंकों में यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





शनिवार, 26 दिसंबर 2015

2015 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड - The Unsung Melodies of 2015



चित्रशाला - नववर्ष विशेष 

2015 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड

The Unsung Melodies of 2015





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। वर्ष 2015 हमसे विदा लेना चाहता है। और इसी वर्ष के समाप्त होने से इस दशक का पूर्वार्ध भी समाप्त हो जाएगा। इस दशक में फ़िल्म संगीत का जो स्वरूप अब अक हम सबसे देखा, उससे यही कहा जा सकता है कि वही गाने हिट हो रहे हैं, या उन्हीं गानों को बढ़ावा मिल रहा है जिनमें कोई पंच लाइन, या आइटम वाली बात, और इस तरह का कोई मसाला हो। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी कुछ ऐसे गुमनाम गीत आए जिनकी तरफ़ किसी का भी ध्यान नहीं गया, पर स्तर की दृष्टि से ये गीत बहुत से लोकप्रिय और हिट गीतों के मुकाबले कहीं अधिक उत्कृष्ट हैं। ऐसे ही दस गीत को चुन कर आज के ’चित्रशाला’ का यह नववर्ष विशेषांक प्रस्तुत कर रहे हैं। तो पेश है वर्ष 2015 का कमचर्चित हिट परेड, The Top-10 Unsung Melodies of 2015.


10: "साईं बाबा के दरबार आ शीष झुका ले" (साईं महिमा)

एक समय था जब सामाजिक फ़िल्मों के साथ-साथ पौराणिक व धार्मिक फ़िल्मों का जौनर भी काफ़ी लोकप्रिय हुआ करता था। भले ऐसे फ़िल्मों को ज़्यादा व्यावसायिक सफलता ना मिला करता हो, पर इन फ़िल्मों का अलग दर्शक-समूह होता है, सिनेमाघरों में ये फ़िल्में लगती थीं। धीरे-धीरे धार्मिक फ़िल्मों का जौनर लगभग समाप्त हो चुका है, बस इक्का-दुक्का फ़िल्में आ जाती हैं कभी कभार। और जहाँ तक भक्ति रचनाओं का सवाल है, तो सूफ़ी श्रेणी की कुछ भक्तिमूलक क़व्वालियाँ ज़रूर फ़िल्मों में सुनने को मिल जाती हैं आजकल। वर्ष 2015 में ’साईं महिमा’ और ’गौड़ हरि दर्शन’ नामक दो फ़िल्में बनी हैं, पर ये फ़िल्में कब आईं कब गईं कुछ पता नहीं चला। ना किसी सिनेमाघर में ये फ़िल्में लगीं और ना इनके गीत रेडियो पर सुनने को मिले। बस यू-ट्युब पर निर्माता ने अपलोड कर दिए हैं। तो लीजिए प्रस्तुत है ’2015 कमचर्चित हिट परेड’ के पायदान नंबर 10 पर फ़िल्म ’साईं महिमा’ की एक भक्ति रचना, जिसे हिमांशु शर्मा ने गाया और स्वरबद्ध किया है, और इसे लिखा है प्रदीप शर्मा ने।




9: "सज के चली है भारत माँ" (जय जवान जय किसान)

जावेद अली
भक्ति रचनाओं की तरह देशभक्ति रचनाओं का भी अकाल पड़ चुका है हिन्दी फ़िल्म- संगीत संसार में। इस सूखे संसार को हरा-भरा करने हेतु मदन लाल खुराना, सीमा चक्रवर्ती और पंकज दुआ जैसे निर्माता सामने आए और बनाई ’जय जवान जय किसान’। ओम पुरी, प्रेम चोपड़ा, रति अग्निहोत्री जैसे वरिष्ठ अभिनेता भी इस फ़िल्म को नहीं बचा सके। संगीतकार रूपेश गिरिश का संगीत भी अनसुना रह गया। इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने इस हिट परेड के पायदान नंबर 9 के लिए चुना है, उसकी ख़ास बात यह है कि यह आपको मनोज कुमार की बहुचर्चित देशभक्ति फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ के मशहूर गीत "बहन चली, दुल्हन चली, तीन रंग की चोली" की याद दिला जाएगी। किशन पालिवाल के लिखे और जावेद अली की आवाज़ में इस गीत के बोलों "देश प्रेम के गहनों से सज के चली है भारत माँ" की समानता ’पूरब और पश्चिम’ के उस गीत से देखी जा सकती है। कुल मिला कर यह एक कर्णप्रिय रचना है, कम से कम वाद्यों का प्रयोग हुआ है और उससे भी बड़ी बात यह कि किसी कृत्रिम यांत्रिक संगीत का बोलबाला नहीं है इस गीत में।




8: "माँ सुन ले ज़रा " (Take it Easy)

सोनू निगम
भारत माँ के बाद अब एक और माँ के लिए एक बेटे के दिल की पुकार पेश है। धार्मिक और देशभक्ति फ़िल्मों के बाद अब जिस जौनर की हम बात करने जा रहे हैं, वह है बाल फ़िल्मों की, और इस जौनर की भी क्या दशा, ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं है। ’तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़िल्में रोज़ नहीं बनती। 2015 में एक बाल-फ़िल्म आई ’Take it Easy'। इसमें मुख्य चरित्रों में दो दस वर्षीय बालक हैं। एक के पिता खिलाड़ी है और वो चाहते हैं कि उनका बेटा उनकी तरह खिलाड़ी बने जबकि बेटे को पढ़ाई-लिखाई में ज़्यादा रुचि है। दूसरी तरफ़ दूसरे लड़के की कहानी बिल्कुल विपरीत है। उसके माता-पिता अपने सपनों को उस पर थोपना चाहते हैं जबकि बेटे को कुछ और ही करना है। ऐसे में बेटा क्या करे! इस परिदृश्य में प्रस्तुत गीत सार्थक है जिसमें बेटा माँ से कह रहा है कि "दिल पे उम्मीदों का बोझ, कुछ माँगे हर कोई रोज़, हँसी मेरी कहीं छुप गई, कहानी कहीं रुक गई, माँ सुन ले ज़रा, कहता है क्या यह दिल मेरा"। सोनू निगम की आवाज़ ने गीत को काफ़ी असरदार बना दिया है। सुनिल प्रेम व्यास, सुशान्त पवार और अमोल पावले के लिखे इस गीत को संगीत से संवारा है सुशान्त-किशोर ने।




7: "इश्क़ फ़ोबिया" (युवा)

इरफ़ान
जसबीर भट्टी लिखित व निर्देशित फ़िल्म ’युवा’ भी बॉक्स ऑफ़िस पर पिट गई। लेकिन इसके गीतों में दम ज़रूर था। फ़िल्म में संगीत देने के लिए चार संगीतकार लिए गए। यह आजकल फ़िल्मों में एकाधिक संगीतकार का ट्रेन्ड चल रहा है, और यह फ़िल्म व्यतिक्रम नहीं। राशिद ख़ाँ, पलक मुछाल, हनीफ़ शेख और प्रवीण-मनोज इस फ़िल्म के संगीतकार हैं और भूपेन्द्र शर्मा ने गीत लिखे हैं। फ़िल्म के तमाम गीतों में एक गीत है मोहम्मद इरफ़ान का गाया हुआ जिसने हमारा ध्यान आकर्षित किया। ये वही इरफ़ान हैं जिन्होंने ’जो जीता वो ही सुपरस्टार’ का ख़िताब जीता था और ’अमूल स्टार वॉयस ऑफ़ इण्डिया’ और ’सा रे गा मा पा’ के जानेमाने प्रतियोगी रहे। मेलडी, रोमान्स और सुफ़ियाना अंदाज़, कुल मिलाकर इस गीत को अच्छी तरह से स्वरबद्ध किया गया है, पर सबसे अच्छी बात है इसके अंतरों के बोल। गीत फ़िल्म में दो बार है, एक बार इरफ़ान की एकल आवाज़ में और एक बार पलक मुछाल और भानु प्रताप की युगल आवाज़ों में।



6: "एक हथेली तेरी हो, एक हथेली मेरी हो" (इश्क़ के परिन्दे)

केका घोषाल
पिछले दौर के गायकों में अगर कोई गायक आज टिका हुआ है तो वो हैं सोनू निगम। आजे के नवोदित गायकों की भीड़ में सोनू निगम आज भी अपने आप को एक अलग मुकाम पर बनाये रखा है और हर साल उनके कुछ अच्छे गीत सुनने को मिलते हैं। केका घोषाल के साथ सोनू निगम के इस युगल गीत के बोल और संगीत दोनों बहुत सुरीले हैं और एक कर्णप्रिय गीत की जितनी विशेषताएँ होती हैं, वो सब मौजूद हैं। हालाँकि इस गीत की धुन में ज़्यादा नई बात नहीं है और इस तरह की धुन पहले भी सुनाई दी है कई बार, पर एक ताज़गी ज़रूर है जिसकी वजह से इस गीत को सुनना अच्छा लगता है। इस गीत में पारम्परिक और समकालीन वाद्यों का संगम सुनने को मिलता है। एक तरफ़ बाँसुरी है तो दूसरी तरफ़ है गिटार। कई लोगों ने यह धारणा बना ली है कि केका घोषाल गायिका श्रेया घोषाल की बहन है, पर यह तथ्य ग़लत है। इन दोनों का कोई रिश्ता नहीं है संगीत के अलावा। केका घोषाल भी ’सा रे गा मा पा’ से रोशनी में आईं हैं। लीजिए इस गीत सुनिए, पर उससे पहले आपको यह बता दें कि इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है सोनू निगम की आवाज़ में और एक और रीमिक्स वर्ज़न है विजय वर्मा और सुप्रिया पाठक की आवाज़ों में।



5: "हमारी अधुरी कहानी" (हमारी अधुरी कहानी)

अरिजीत सिंह
कुछ अभिनेताओं के साथ ऐसा अक्सर हुआ है कि उनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा अच्छे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर पुराने समय में शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की सभी फ़िल्मों के गाने हिट हुआ करते थे चाहे फ़िल्म चले ना चले। आगे चलकर सलमान ख़ान की फ़िल्मों के गाने हिट होते रहते थे। और इस दौर की अगर हम बात करें तो इमरान हाश्मी एक ऐसे अभिनेता हैं जिनकी फ़िल्मों का संगीत ख़ूब चला। 2015 में इमरान हाश्मी और विद्या बालन अभिनीत एक फ़िल्म आई ’हमारी अधुरी कहानी’। फ़िल्म का शीर्षक इमरान हाश्मी अभिनीत फ़िल्म ’गैंगस्टर’ के एक गीत "भीगी भीगी सी है रातें भीगी भीगी" के मुखड़े के अन्तिम तीन शब्द ही हैं। ’हमारी अधुरी कहानी’ मोहित सुरी निर्देशित फ़िल्म है, इसलिए इस फ़िल्म के गीत-संगीत से लोगों को उम्मीदें थीं, मोहित सुरी को अच्छे संगीत की परख जो है। फ़िल्म तो नहीं चली पर इसके गीत-संगीत ने निराश नहीं किया। फ़िल्म के कुल पाँच गीतों के हर गीत में कुछ ना कुछ ख़ास बात है। ’कमचर्चित हिट परेड’ के पायदान नंबर 5 के लिए हमने इस फ़िल्म का शीर्षक गीत ही चुना है जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है। रश्मी विराग के लिखे और जीत गांगुली द्वारा स्वरबद्ध इस गीत का स्तर आजे के दौर के आम गीतों से काफ़ी उपर है। प्रेम और विरह के भावों को व्यक्त करता यह गीत सुनने वाले के मन पर असर ज़रूर करता है। और एक बार सुनने के बाद लूप में सुनने का मन होता है। कम से कम साज़ों का इस्तमाल, सुरीली धुन, मनमोहक गायकी, असरदार बोल, कुल मिलाकर यह भावुक गीत इस ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है।





4: "तू, मेरे सारे इम्तिहानों के जवाब तू" (दम लगाके ह‍इशा)


अनु और सानू
वर्ष 2015 हिन्दी सिने संगीत के लिए एक उल्लेखनीय वर्ष माना जा सकता है क्योंकि इस वर्ष पुनरागमन हुआ तीन कलाकारों का जिन्होंने 90 के दशक में काफ़ी धूम मचाई थी। ये हैं संगीतकार अनु मलिक, गायक कुमार सानू और गायिका साधना सरगम। जी हाँ, ’दम लगाके ह‍इशा’ फ़िल्म में अनु मलिक ने 90 के उसी सुरीले रोमान्टिक दौर को वापस लाने की कोशिश की है, और इसमें वो कामयाब भी रहे हैं। इस फ़िल्म में कुल छह गीत हैं जिनमें कुमार सानू का एकल गीत "तू..." और कुमार-सानू-साधना सरगम के युगल गीत "दर्द करारा" ख़ास उल्लेखनीय हैं। ख़ास कर "तू..." तो शायद पिछले दस वर्षों के तमाम श्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में से एक है। और ऐसे गीतों के लिए ही तो कुमार सानू जाने जाते रहे हैं। इस गीत में हमें निराश नहीं करते और इस गीत को सुनते हुए हम उसी 90 के दशक में पहुँच जाते हैं। किसी को अपने स्कूल या कॉलेज के दिन याद आते हैं, तो किसी को अपने दफ़्तर-जीवन के दिन। निस्संदेह यह गीत इस ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इसके बारे में ज़्यादा कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं, बस सुनिए...



3: "भोर भयी और कोयल जागे" (बेज़ुबान इश्क़)

ओस्मान मीर
कुछ गीत आज ऐसे भी बन रहे हैं जिहें सुनते हुए मन में यह उम्मीद जागती है कि शायद सुरीले और अच्छे गीतों का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। इस हिट परेड के तीसरे पायदान के लिए हमने जो गीत चुना है वह है ’बेज़ुबान इश्क़’ फ़िल्म का "भोर भयी और कोयल जागे"। जी नहीं, इस गीत का ’सत्यम शिवम सुन्दरम्’ के "भोर भयी पनघट पे" के साथ कोई समानता नहीं है। इसे राजस्थानी लोक गायक ओस्मान मीर ने गाया है। ओस्मान मीर के लोक गीत लोकप्रिय रहे हैं। प्राकृतिक सुन्दरता को दर्शाता यह गीत भी उतना ही सुन्दर है। राजस्थान की मिट्टी की ख़ुशबू लिए यह गीत ना केवल एक लोक गीत है बल्कि इसमें भक्ति रस का भी एक पुट है। फ़िल्म की नायिका स्नेहा उल्लाल के एन्ट्री सॉंग् के रूप में इस गीत को रखा गया है। स्नेहा ने इसमें एक श्रद्धालु का चरित्र निभाया है। इस गीत में प्रस्तुत ध्वनियाँ और वाद्य तरंगें इतने कर्णप्रिय हैं कि सुबह सुबह सुन कर मन-मस्तिष्क पवित्रा हो जाता है। बाँसुरी, घण्टियों और शंख की ध्वनियों से गीत की आध्यात्मिक्ता और भी निखर कर सामने आई है। ’बेज़ुबान इश्क़’ फ़िल्म के अन्य गीत भी सुनने लायक है, पर प्रस्तुत गीत सबसे ज़्यादा ख़ास है। रूपेश वर्मा के संगीत निर्देशन में इस गीत को लिखा है यशवन्त गंगानी ने।



2: "आजा मेरी जान" (I Love NY)

पंचम
'2015 कमचर्चित हिट परेड’ के शीर्ष के दो गीत ऐसे हैं जिनसे सीधे सीधे जुड़े हैं फ़िल्म-संगीत संसार के दो दिग्गज, दो स्तंभ, दो किंवदन्ती, जिनकी तारीफ़ में कुछ कहना सूरज को दीया दिखाना है। इनमें जो पहला नाम है, उन्हीं का स्वरबद्ध गीत है इस हिट परेड के दूसरे पायदान का गीत। और ये शख़्स हैं राहुल देव बर्मन, हमारे पंचम दा। आश्चर्य हो रहा है आपको? आपको याद होगा 1993 में एक फ़िल्म आई थी ’आजा मेरी जान’, जिसमें अमर-उत्पल का संगीत था। इसमें गुल्शन कुमार ने अपने भाई कृषण कुमार को लौन्च करने के लिए एक गीत राहुल देव बर्मन के कम्पोज़िशन का भी रखा था। उन्हीं दिनों अनुराधा पौडवाल चाहती थीं कि पंचम उनके गाये आठ गीतों के एक ऐल्बम के लिए संगीत तैयार करे। और उन्हीं गीतों में से एक गीत था "आजा मेरी जान", जिसे गुल्शन कुमार ने फ़िल्म ’आजा मेरी जान’ में इस्तमाल किया। इसे अनुराधा पौडवाल और एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम ने गाया था। पर इसे फ़िल्म के साउण्डट्रैक में नहीं रखा गया और जो ऐल्बम लोगों के हाथ आया उसमें केवल अमर-उत्पल के स्वरबद्ध गीत ही थे। इस तरह से पंचम का यह गीत गुमनाम ही रह गया (हालाँकि बांगला में पंचम की आवाज़ में इस धुन पर आधारित गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा)। 2015 की फ़िल्म ’I Love NY' में इस गीत को DJ फुकन ने बड़ी ख़ूबसूरती से अरेंज कर मौली दवे से गवाया है। गीत के बोल लिखे हैं मयुर पुरी ने। मौली की थोड़ी कर्कश (husky) आवाज़ ने गीत में एक कामुक पुट जोड़ा है। आर. डी. बर्मन के नाम इस हिट परेड का दूसरा पायदान!



1: "जीना क्या है जाना मैंने" (Dunno Y2 - Life is a Moment)

लता मंगेशकर
अभी हमने दो दिग्गज कलाकारों का उल्लेख किया था, जिनमें एक हैं राहुल देव बर्मन, जिनका गीत अभी हमने सुना। दूसरी किंवदन्ती हैं स्वर-साम्राज्ञी, भारतरत्न लता मंगेशकर। यह किसी विस्मय, किसी आश्चर्य से कम नहीं कि 86 वर्ष की आयु में लता जी ने किसी फ़िल्म में गीत गाया है, वर्ष 2015 के हिट परेड में लता जी का गाया गीत शामिल हो रहा है। 1945 में लता जी ने ’बड़ी माँ’ फ़िल्म में "माता तेरी चरणों में" गीत गाया था, और उससे 70 वर्ष बाद भी उनका गाया नया गीत रिलीज़ हो रहा है। वर्ष 2010 में 'Dunno Y - Na Jaane Kyun' फ़िल्म का शीर्षक गाने के बाद जब 2015 में इस फ़िल्म का सीकुइल बना ’'Dunno Y - Life is a Moment' के शीर्षक से, तब संगीतकार निखिल कामत ने इसमें भी लता जी से गीत गवाने की इच्छा व्यक्त की। गीत लिखा है विमल कश्यप ने। इसी फ़िल्म में सलमा आग़ा ने भी एक गीत गाया है पर उस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि सलमा आग़ा के स्तर की गायिका के लिए यह गीत ज़रा हल्का हो गया है। ख़ैर, हम लता जी के गीत की बात कर रहे थे। आप सुनिए यह गीत और इस हिट परेड को समाप्त करने की मुझे दीजिए अनुमति। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मैं, सुजॉय चटर्जी, प्रस्तुति सहायक कृष्णमोहन मिश्र के साथ आपसे विदा लेता हूँ, नमस्कार!




तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति। आशा है आपको हमारी यह कोशिश पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते हाप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

उषा छाबड़ा की लघुकथा प्रश्न

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार असगर वजाहत की लघुकथा "जब वह बुलाएगा" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, उषा छाबड़ा की लघुकथा प्रश्न, उन्हीं के स्वर में।

उषा जी साहित्यिक अभिरुचि वाली अध्यापिका हैं। वे पिछले उन्नीस वर्षों से दिल्ली पब्लिक स्कूल ,रोहिणी में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। उन्होंने कक्षा नर्सरी से कक्षा आठवीं तक के स्तर के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें एवं व्याकरण की पुस्तक श्रृंखला भी लिखी हैं। वे बच्चों एवं शिक्षकों के लिए वर्कशॉप लेती रहती हैं। बच्चों को कहानियाँ सुनाना उन्हें बेहद पसंद है। उनकी कविताओं की पुस्तक "ताक धिना धिन" और उस पर आधारित ऑडियो सीडी प्रकाशित हो चुकी हैं। आप उनकी आवाज़ में पंडित सुदर्शन की कालजयी कहानी "हार की जीत" तथा दो बच्चियों के वार्तालाप पर आधारित उनकी अपनी कहानी "बचपन का भोलापन" पहले ही सुन चुके हैं। आप उनसे उनके ब्लॉग अनोखी पाठशाला पर मिल सकते हैं।

इस कहानी प्रश्न का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 26 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



इंसानियत की मशाल सब मिलकर उठाएं
जश्न मानवता का एक जुट हों मनाएं
चलो सब एक हो नया गीत गुनगुनाएं
प्रेम के संदेश को जन जन में फैलाएं
~ उषा छाबड़ा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


"दोनों, दादी का हाथ थामे उछलकूद कर रहे थे।”
 (उषा छाबड़ा की लघुकथा "प्रश्न" से एक अंश)


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प्रश्न MP3

#Twenty Seventh Story, Prashn: Usha Chhabra/Hindi Audio Book/2015/27. Voice: Usha Chhabra

रविवार, 20 दिसंबर 2015

सारंगी के पर्याय पण्डित रामनारायण : SWARGOSHTHI – 249 : SARANGI AND PANDIT RAMNARAYAN





स्वरगोष्ठी – 249 में आज

संगीत के शिखर पर – 10 : पण्डित रामनारायण

संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की दसवीं कड़ी में हम आपको मानव-कण्ठ के सर्वाधिक निकट तंत्रवाद्य सारंगी और इस वाद्य कुशल वादक पण्डित रामनारायण के बारे में चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि 25 दिसम्बर को पण्डित रामनारायण जी का 89वाँ जन्मदिन है। इस अवसर पर हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में पण्डित जी का सारंगी पर बजाया राग मारवा का आलाप और राग दरबारी में एक आकर्षक गत प्रस्तुत करेंगे। पण्डित रामनारायण आरम्भिक दशकों में फिल्म संगीत से भी जुड़े थे। आज के अंक में हम आपको 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत सुनवाएँगे, जिसमें पण्डित जी की सारंगी का वादन किया गया था। इस फिल्मी गीत में आपको राग जोगिया और राग बहार का स्पर्श मिलेगा।


ज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट है। एक कुशल सारंगी वादक गले की शत-प्रतिशत विशेषताओं को अपने वाद्य पर बजा सकता है। सम्भवतः इसीलिए इस वाद्य को ‘सौ-रंगी’ अर्थात सारंगी कहा गया। 25 दिसम्बर, 1927 को उदयपुर, राजस्थान के एक सांगीतिक परिवार में एक ऐसे प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ, जिसे आज हम सब विख्यात सारंगी वादक पण्डित रामनारायण के रूप में जानते हैं। भारतीय संगीत जगत में इस महान संगीतज्ञ का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। आज के अंक में हम उनके इस योगदान पर चर्चा करेंगे। फरवरी, 1994 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अभिलेखागार के लिए मुझे पण्डित रामनारायण जी से एक लम्बे साक्षात्कार का सुअवसर मिला था। उस बातचीत के कुछ अंश हम आपके लिए इस अंक में भी प्रस्तुत करेंगे, किन्तु उससे पहले आपको सुनवाते हैं, पण्डित रामनारायण का बजाया उनका सर्वप्रिय राग मारवा में मनमोहक आलाप।


राग मारवा : सारंगी पर आलाप : पण्डित रामनारायण




पण्डित रामनारायण के प्रपितामह, दानजी वियावत उदयपुर महाराणा के दरबारी गायक थे। पितामह हरिलाल वियावत भी उच्चकोटि के गायक थे, जबकि पिता नाथूजी वियावत ने दिलरुबा वाद्य को अपनाया। छः वर्ष की आयु में रामनारायण जी के हाथ एक सारंगी लगी और इसी वाद्य पर पिता की देख-रेख में अभ्यास आरम्भ हो गया। 10 वर्ष की आयु में उन्होने उस्ताद अल्लाबंदे और उस्ताद जाकिरुद्दीन डागर से ध्रुवपद की शिक्षा ग्रहण की। इसके साथ ही जयपुर के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद महबूब खाँ से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। 1944 में रामनारायण जी की नियुक्ति सारंगी संगतिकार के रूप रेडियो लाहौर में हुई, जहाँ तत्कालीन जाने-माने गायक-वादकों के साथ उन्होने सारंगी की संगति कर कम आयु में ही ख्याति अर्जित की। 1947 में देश विभाजन के समय उन्हें लाहौर से दिल्ली केन्द्र पर स्थानान्तरित किया गया। अब तक रामनारायण के सारंगी वादन में इतनी परिपक्वता आ गई कि तत्कालीन सारंगी वादकों में उनकी एक अलग शैली के रूप में पहचानी जाने लगी। इसके बावजूद उनका मन इस बात से हमेशा खिन्न रहा करता था कि संगीत के मंच पर संगतिकारों को वह दर्जा नहीं मिलता था, जिसके वो हकदार थे। मुख्य गायक कलाकारों के साथ, इसी बात पर प्रायः नोक-झोंक हो जाती थी। उनका मानना था कि संगतिकारों को भी प्रदर्शन के दौरान अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। 1956 में पण्डित रामनारायण ने मुम्बई के एक संगीत समारोह में एकल सारंगी वादन किया। संगीत-प्रेमियों के लिए यह एक दुर्लभ क्षण था। किसी शास्त्रीय मंच पर पहली बार सदियों से संगति वाद्य के रूप में प्रचलित सारंगी को स्वतंत्र वादन का सम्मान प्राप्त हुआ था। इस दिन संगीत के सुनहरे पृष्ठों पर पण्डित रामनारायन का नाम सारंगी को प्रतिष्ठित करने में दर्ज़ हो चुका था। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर सुनते हैं, पण्डित रामनारायण जी का सारंगी पर बजाया राग दरबारी में एक मनमोहक गत।


राग दरबारी : सारंगी पर गत का वादन : पण्डित रामनारायण




सारंगी वादन की अपनी एक अलग शैली विकसित करते हुए पण्डित रामनारायण का मन स्वतंत्र सारंगी वादन के लिए बेचैन होने लगा। रेडियो की नौकरी में रहते हुए उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी, अतः 1949 में उन्होने रेडियो की नौकरी छोड़ कर मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँच गये। मुम्बई में स्वयं को स्थापित करने की लालसा ने उन्हें फिल्म-जगत में पहुँचा दिया। उस दौर के फिल्म संगीतकारों ने पण्डित रामनारायण को सर-आँखों पर बिठाया। सारंगी के सुरों से सजी उनकी कुछ प्रमुख फिल्में हैं- हमदर्द 1953, अदालत 1958, मुगल-ए-आजम 1960, गंगा जमुना 1961, कश्मीर की कली 1964, मिलन और नूरजहाँ 1967। संगीतकार ओ.पी. नैयर के तो वे सर्वप्रिय रहे। हमदर्द, अदालत, गंगा जमुना और मिलन फिल्म में तो उन्होने कई गीतों की धुनें भी बनाई। अब हम आपको उनके फिल्मी गीतों में से चुन कर हमने फिल्म ‘हमदर्द’ का एक राग आधारित गीत लिया है। इस गीत के चार अन्तरे हैं। पहला अन्तरा राग गौड़ सारंग, दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार, तीसरा अन्तरा राग जोगिया और चौथा अन्तरा राग बहार के सुरों में निबद्ध है। अब हम आपको गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनवा रहे हैं। फिल्म के संगीत निर्देशक हैं अनिल विश्वास और गायक हैं, मन्ना डे और लता मंगेशकर। आइए सुनते हैं, राग जोगिया और राग बहार के स्वरो से सुसज्जित यह गीत।


राग जोगिया और बहार : ‘पी बिन सब सूना...’ और ‘आई मधु ऋतु...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल की गई एक ठुमरी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेता का सम्मान मिलेगा। साथ ही पहेली के वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – इस गीतांश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस गायिका की आवाज़ है? उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का हल भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रघुनाथ सेठ की बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – शुद्ध सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – बाँसुरी

इस बार की पहेली के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों में एक नये प्रतिभागी शामिल हुए हैं। यह नये प्रतिभागी हैं, पनवेल, महाराष्ट्र के शिरीष ओक। शिरीष जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य विजेता हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे सारंगी के अप्रतिम साधक पण्डित रामनारायन के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कुछ चर्चा की। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   




शनिवार, 19 दिसंबर 2015

"आज फिर जीने की तमन्ना है..." - क्यों शुरू-शुरू में पसन्द नहीं आया था देव आनन्द को यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 72
 

'आज फिर जीने की तमन्ना है...' 


 रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 72-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की फ़िल्म ’गाइड’ के गीत "आज फिर जीने की तमन्ना है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सचिन देव बर्मन का। 


हर फ़िल्मी गीत का निश्चित स्वरूप होता है, पहले मुखड़े से पहले का प्रस्तावना या कुछ शब्द, फिर मुखड़ा, फिर अन्तराल संगीत, फिर अन्तरा। शुरू से लेकर अब तक अधिकांश फ़िल्मी गीत इसी स्वरूप को मानते चले आए हैं। फिर भी कभी कभार कुछ गीतकारों और संगीतकारों ने नए प्रयोग किए और इस स्वरूप से हट कर गीत बनाए। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले" इस स्वरूप को नहीं मानता। इस गीत में कोई अन्तरा नहीं है, बल्कि हर अन्तरा मुखड़े की धुन पर ही आधारित है। इसी तरह से एक गीत ऐसा भी है जो शुरू होता है अन्तरे से और मुखड़ा अन्तरे के बाद आता है। सचिन देव बर्मन की धुन पर शैलेन्द्र का लिखा हुआ यह गीत है फ़िल्म ’गाइड’ का - "आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है" जो शुरू होता है "काँटों से खींच के यह आँचल" जो अन्तरा है। पिता के इस नवीन प्रयोग को पुत्र पंचम ने भी एक बार अपने एक गीत में प्रयोग किया। फ़िल्म ’बेताब’ का वह गीत था "तेरी तसवीर मिल गई" जो शुरू होता है "यह मेरी ज़िन्दगी बेजान लाश थी" से। ख़ैर, आज हम चर्चा करेंगे "आज फिर जीने की तमन्ना है" का। अपने ज़माने का सुपर-डुपर हिट गीत और आज तक आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाता है। गीत के 50 वर्ष बाद भी यह उतना ही लोकप्रिय है। और यही नहीं आमिर ख़ान की अगली फ़िल्म का शीर्षक भी ’आज फिर जीने की तमन्ना है’ होने जा रहा है, ऐसी ख़बर मीडिया में आई है। इसी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस जुमले में कितनी शक्ति है! लेकिन जब यह गीत बना था तब देव आनन्द को यह गीत बिल्कुल बकवास लगा था।

"आज फिर जीने की तमन्ना है" गीत फ़िल्म की कहानी के हिसाब से भी बेहद ज़रूरी और सार्थक था क्योंकि इसी गीत से परिवर्तन होता है फ़िल्म की हीरोइन रोज़ी के चरित्र का। यही गाना बताता है कि अब रोज़ी अपने पति के चंगुल से आज़ाद है और निकल पड़ी है एक नए सफ़र पर, ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत के लिए। जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, तब सबसे पहले यही गाना लोगों के ज़बान पर चढ़ गया था। मगर यही लोकप्रिय गाना देव आनन्द के गले नहीं उतर रहा था। वो इस गाने को शूट करना तो दूर, वो इसे दूसरे किसी म्युज़िक डिरेक्टर से दोबारा बनवाना चाहते थे। इतना ना-पसन्द था उन्हें यह गाना। वहीदा रहमान ने अपनी किताब में इस घटना का ज़िक्र किया है कि एक दिन शूटिंग के वक़्त जब इस गाने को शूट करने की बारी आई तो देव आनन्द साहब बहुत अपसेट थे। उन्होंने फ़िल्म के निर्देशक विजय आनन्द, जो उनके भाई थे, से कहा कि "ये बर्मन दादा को क्या हो गया है, ऐसा गाना बना दिया है, मज़ा नहीं आ रहा है। I just can't take it. मुझे दादा से बात करनी पड़ेगी कि गाने में बिल्कुल मज़ा नहीं आ रहा है, किसी और कम्पोज़र से गाना बनवानी पड़ेगी।" देव साहब की यह बात सुन कर गोल्डी को अजीब लगा। पूरी युनिट ने भी यह बात सुनी, सब ने कहा कि "आपको यह गाना बुरा लगा है, कम से कम एक बार यह गाना हमको तो सुनवा दें। शूटिंग् तो उसी दिन करनी है हमको।" देव आनन्द ने बड़े अनमने मन से कहा कि अच्छा नागरे के उपर लगा दो, और सुनो। नागरा एक स्पूल वाली मशीन हुआ करती थी उस ज़माने में, जिस पर गाना लगा देते थे। गाना लगाया गया, गाना सबने सुना, और सब उछल पड़े गाने के बाद। लता जी की बेहतरीन आवाज़, एस. डी. बर्मन का बेहतरीन संगीत, शैलेन्द्र का बेहतरीन गीत, सबको बहुत अच्छा लगा, आपको पसन्द क्यों नहीं आ रहा है? लेकिन देव साहब के उपर कोई असर ही नहीं हुआ। अब सबने सोचा कि शूटिंग् का टाइम आ रहा है, कैसे देव साहब को मनायें? तब भाई विजय आनन्द के दिमाग़ में एक विचार आया। उन्होंने भाई से कहा, "हम सब आपकी जज़्बात की इज़्ज़त करते हैं कि आपको गाना पसन्द नहीं आ रहा है, मगर फिर भी एक हमारी अनुरोध है कि गाना शूट कर लेते हैं, शूट करने के बाद जब आप देखेंगे कि गाना पसन्द नहीं आ रहा है, तो निकाल देंगे।" देव आनन्द मान गए। और इस गीत को राजस्थान के अलग अलग स्थानों पे पाँच दिनों में शूट किया गया। इसी शूटिंग् के दौरान एक बहुत अहम बात हो गई जिसने देव आनन्द के फ़ैसले को बदल दिया। हर दिन शूट के बाद फ़िल्म के कर्मी दल के सदस्य जब होटल लौटते तो सभी की ज़बान पर यही गाना होता था। जहाँ देखो जिसे देखो हर कोई यही गाना गुनगुनाता हुआ नज़र आता था। लोगों की ज़ुबान पर गाना चढ़ गया। तब देव साहब को यह एहसास हुआ कि उनका फ़ैसला हो सकता है कि ग़लत हो। पाँचवे दिन जब वो सेट पे पहुँचे, तो उन्होंने पूरे कर्मी दल से कहा कि "Sorry, I made a mistake, सचमुच यह गाना बहुत अच्छा है और अब यही गाना इस फ़िल्म का हिस्सा भी बनेगा। मैं रखूँगा इस गाने को।" और उसके बाद फिर क्या हुआ, इतिहास गवाह है। 

फिल्म - गाइड : 'काँटों से खींच कर ये आँचल....' : लता मंगेशकर




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




रविवार, 13 दिसंबर 2015

रघुनाथ सेठ की प्रयोगधर्मी बाँसुरी : SWARGOSHTHI – 248 : EXPERIMENTAL FLUTE BY RAGHUNATH SETH




स्वरगोष्ठी – 248 में आज

संगीत के शिखर पर – 9 : पण्डित रघुनाथ सेठ

पण्डित रघुनाथ सेठ के जन्मदिन पर एक स्वरांजलि




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की नौवीं कड़ी में हम आपके साथ भारतीय संगीत वाद्य, बाँसुरी और इस वाद्य के एक अनन्य स्वर-साधक, पण्डित रघुनाथ सेठ की सृजनात्मक साधना पर चर्चा करेंगे। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि 15 दिसम्बर को श्री सेठ का 85वाँ जन्म-दिवस है। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठकों-श्रोताओं की ओर से उन्हें स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं। आज के अंक में हम आपको पहले राग शुद्ध सारंग में एक आकर्षक रचना और फिर इसके बाद 'सूर्योदय' शीर्षक से राग नट भैरव के स्वरों में पिरोया एक प्रयोगधर्मी संगीत-संयोजन सुनवाएँगे। श्री सेठ ने कई फिल्मों का संगीत निर्देशन भी किया है। इन्हीं फिल्मों में से एक फिल्म 'ये नजदीकियाँ' का गीत भी भूपेन्द्र सिंह की आवाज़ में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। 


ज बाँसुरी शास्त्रीय संगीत के मंच पर स्वतन्त्र वाद्य, संगति वाद्य, सुगम और लोक-संगीत का मधुर और लोकप्रिय वाद्य बन चुका है। सामान्य तौर पर देखने में बाँस की, खोखली, बेलनाकार आकृति होती है, किन्तु इस सुषिर वाद्य की वादन तकनीक सरल नहीं है। बाँसुरी का अस्तित्व महाभारतकाल से पूर्व कृष्ण से जुड़े प्रसंगों में उपलब्ध है। शास्त्रीय वाद्य के रूप में इसे उत्तर भारत के साथ दक्षिण भारत के संगीत में समान रूप से लोकप्रियता प्राप्त है। पण्डित रघुनाथ सेठ की छवि आधुनिक बाँसुरी वादकों में प्रयोगशील वादक के रूप में लोकप्रिय रही है।

बाँसुरी वादन के क्षेत्र में अनेक अभिनव प्रयोग करते हुए भारतीय संगीत को समृद्ध करने वाले अप्रतिम कलासाधक पण्डित रघुनाथ सेठ का जन्म 15 दिसम्बर, 1931 को ग्वालियर के एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ बहन-भाइयों को तो संगीत से अनुराग था, किन्तु उनके पिता इसके पक्ष में नहीं थे। प्रारम्भिक शिक्षा ग्वालियर में ग्रहण करने के बाद, रघुनाथ सेठ 13 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई काशीप्रसाद जी के पास लखनऊ आ गए। काशीप्रसाद जी उन दिनों लखनऊ के प्रतिष्ठित गायक और रंगमंच के अभिनेता थे। उन्होने अपने अनुज के लिए विद्यालय की शिक्षा के साथ-साथ स्थानीय भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) में संगीत-शिक्षा के लिए भी दाखिला करा दिया। उन दिनों महाविद्यालय के प्राचार्य, डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर थे। शीघ्र ही रघुनाथ सेठ उनके प्रिय शिष्यों में शामिल हो गए। डॉ. रातंजनकर जी से उन्होने पाँच वर्षों तक निरन्तर संगीत-शिक्षा ग्रहण की। इसी दौर में उन्होने बाँसुरी को ही अपने संगीत का माध्यम चुना। लखनऊ विश्वविद्यालय से रघुनाथ सेठ ने पुरातत्व शास्त्र विषय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और इसी अवधि में अन्तर विश्वविद्यालय युवा महोत्सव में उन्हें बाँसुरी वादन के लिए सर्वश्रेष्ठ वादक का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। आइए यहाँ रुक कर पण्डित रघुनाथ सेठ की बाँसुरी पर सुनते हैं, राग शुद्ध सारंग। यह द्रुत तीनताल की रचना है।


राग शुद्ध सारंग : बाँसुरी पर द्रुत तीनताल की रचना : पण्डित रघुनाथ सेठ




19 वर्ष की आयु में रघुनाथ सेठ, लखनऊ से बम्बई (अब मुम्बई) गए। वहाँ पण्डित पन्नालाल घोष से मैहर घराने के संगीत की बारीकियाँ सीखी। प्रारम्भ से ही संगीत में नये प्रयोग के हिमायती श्री सेठ ने लगभग 25 वर्ष पूर्व मेरे द्वारा किए गए एक साक्षात्कार में अपने कुछ प्रयोगों की चर्चा की थी। आपके लिए आज हम उक्त साक्षात्कार के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होने कहा था कि संगीत उनके लिए योग-साधना है। उनके अनुसार भारतीय संगीत की प्रस्तुति में गायक-वादक का व्यक्तित्व प्रकट होता है। सच्चे सुरॉ की सहायता से कलासाधक और श्रोता समाधि की स्थिति में पहुँचता है। यही सार्थक परमानन्द की अनुभूति है। उनके अनुसार एक ही राग की अलग-अलग प्रस्तुति अलग-अलग भावों की सृष्टि करने में सक्षम है। उन्होने यह भी बताया था कि संगीत में गूँज, अनुगूँज, समस्वरता और उप-स्वरों का विशेष महत्त्व होता है। यह सब गुण तानपूरा में होता है, इसीलिए गायन-वादन के प्रत्येक कार्यक्रम में तानपूरा मौजूद अवश्य होता है। आगे चल कर रघुनाथ सेठ ने अपनी बाँसुरी और अपने सगीत में अनेकानेक सफल प्रयोग किये। आइए, आपको बाँसुरी पर उनका बजाया एक प्रयोगधर्मी रचना सुनते हैं। इस रचना के आरम्भिक 45 सेकेण्ड तक बिना तानपूरे के बाँसुरी वादन हुआ है। लगभग साढ़े तीन मिनट के बाद रचना में ताल का प्रयोग हुआ है, किन्तु पारम्परिक रूप से तबला या पखावज के स्थान पर नल-तरंग जैसे वाद्य और पाश्चात्य लय वाद्यों का प्रयोग किया गया है। इस रचना का शीर्षक उन्होने ‘सूर्योदय’ रखा है। आप यह रचना सुनिए और शीर्षक की सार्थकता को प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए।


“सूर्योदय’ : एक  प्रयोगधर्मी रचना : पण्डित रघुनाथ सेठ




श्री सेठ ने शास्त्रीय मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को सम्मोहित करने के साथ-साथ भारत सरकार के फिल्म डिवीजन के लगभग दो हज़ार वृत्तचित्रों में संगीत दिया है। वर्ष 1969 में वे फिल्म डिवीज़न के संगीतकार हुए थे। उनके अनेक वृत्तचित्रों को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। श्री सेठ ने संगीत के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का गहन अध्ययन किया है और इस विषय पर अनेक संगीत रचनाएँ भी की है। बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित रघुनाथ सेठ ने कई फिल्मों में भी संगीत निर्देशन किया है। उनके संगीत से सजी फिल्में हैं- ‘फिर भी’ (1971), ‘किस्सा कुर्सी का’ (1977), ‘एक बार फिर’ (1980), ‘ये नज़दीकियाँ’ (1982), ‘दामुल’ (1985), ‘आगे मोड़ है’ (1987), ‘सीपियाँ’ (1988) और ‘मृत्युदण्ड’ (1997)। आज हम आपको 1982 में प्रदर्शित फिल्म ‘ये नज़दीकियाँ’ का एक मधुर गीत सुनवाते हैं। गणेश बिहारी श्रीवास्तव के गीत को पार्श्वगायक भूपेंद्र सिंह ने स्वर दिया है। इस गीत के साथ हम आज के अंक को यहीं विराम देते है।


फिल्म - ये नज़दीकियाँ : ‘दो घड़ी बहला गई परछाइयाँ...’ : भूपेन्द्र सिंह : संगीत - रघुनाथ सेठ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 248वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ के 152वें अंक में हम वार्षिक विजेताओं के नाम की घोषणा भी करेंगे।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप संगीत वाद्य को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उस वाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 19 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 246 की संगीत पहेली में हमने आपको मोहनवीणा वाद्य के सुविख्यात वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा प्रस्तुत एक राग-रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वाद्य – मोहनवीणा (गिटार)। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह आठवाँ अंक था। इस अंक में हमने प्रयोगधर्मी बाँसुरी-वादक पण्डित रघुनाथ सेठ के व्यक्तित्व और उनके वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।  



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





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