Tuesday, July 28, 2015

काजल कुमार की लघुकथा समय

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में काजल कुमार की लघुकथा "कुत्ता" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं काजल कुमार लिखित लघुकथा समय, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी समय का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 10 सेकंड है। इसका गद्य कथा-कहानी ब्लॉग पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कवि, कथाकार और कार्टूनिस्ट काजल कुमार के बनाए चरित्र तो आपने देखे ही हैं। उनकी व्यंग्यात्मक लघुकथायेँ "एक था गधा", "ड्राइवर", "लोकतनतर", और कुत्ता आप पहले सुन चुके हैं। काजल कुमार दिल्ली में रहते हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"आज वह अपने अनुभव सुनाता हुआ दादा के साथ खेतों की ओर जा रहा था।”
 (काजल कुमार की लघुकथा "समय" से एक अंश)


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समय MP3

#Tenth Story,  Samay; Kajal Kumar; Hindi Audio Book/2015/10. Voice: Anurag Sharma

Sunday, July 26, 2015

जयन्त और देस मल्हार : SWARGOSHTHI – 229 : JAYANT AND DES MALHAR



स्वरगोष्ठी – 229 में आज

रंग मल्हार के – 6 : राग जयन्त मल्हार और देस मल्हार

‘ऋतु आई सावन की...’ और ‘सावन की रातों में...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस छठी कड़ी में आज हम वर्षा ऋतु के दो ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जो सार्वकालिक राग हैं, किन्तु मल्हार अंग के मेल से इनका सृजन किया गया है। राग जयजयवन्ती एक स्वतंत्र और पूर्ण राग है। मल्हार अंग के मेल से राग जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार का सृजन होता है। इसी प्रकार राग देस और मल्हार का मेल होता है तो यह देस मल्हार कहलाता है। आज के अंक में हम इन्हीं दो रागों पर चर्चा करेंगे और इनमें पगी कुछ रचनाओं का आस्वादन भी करेंगे।

र्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों में राग जयन्त मल्हार या जयन्ती मल्हार एक प्रमुख राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि(कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि(कोमल) म प, प म ग रे (कोमल) रे सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशेष प्रक्रिया है। पूर्वांग में जयजयवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं। आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह रचना आप भी सुनिए।


राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




आज हम राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह तीसरा गीत है। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत।


राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक




आज का दूसरा राग देस मल्हार है। राग देस, भारतीय संगीत का अत्यन्त मनोरम और प्रचलित राग है। प्रकृति का सजीव चित्र उपस्थित करने में यह पूर्ण सक्षम राग है। यदि इस राग में मल्हार अंग का मेल हो जाए तो फिर 'सोने पर सुहागा' हो जाता है। आज हम आपको राग देस मल्हार का संक्षिप्त परिचय देते हुए इस राग पर आधारित फिल्म ‘प्रेमपत्र’ का एक गीत लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। राग देस मल्हार के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वतंत्र राग देस और मल्हार अंग के मेल से निर्मित राग है। राग देस अत्यन्त प्रचलित और सार्वकालिक होते हुए भी स्वतंत्र रूप से वर्षा ऋतु के परिवेश का चित्रण करने में समर्थ है। एक तो इस राग के स्वर संयोजन ऋतु के अनुकूल है, दूसरे इस राग में वर्षा ऋतु का चित्रण करने वाली रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलती हैं। राग देस औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमें कोमल निषाद के साथ सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। राग देस मल्हार में देस का प्रभाव अधिक होता है। दोनों का आरोह-अवरोह एक जैसा होता है। इसमे दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। रें नी(कोमल) ध प, ध म ग रे स्वरों से देस की झलक मिलती है। इसके बाद जब रे प (कोमल) (कोमल) म रे सा और उत्तरांग में म प नी(कोमल) (ध) नी सां के प्रयोग से राग मियाँ मल्हार की झलक मिलती है। मल्हार अंग के चलन और म रे प, रे म, स रे स्वरों के अनेक विविधता के साथ किये जाने वाले प्रयोग से राग विशिष्ट हो जाता है। राग देस की तरह राग देस मल्हार में भी कोमल गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरुप पावस के परिवेश को जीवन्त कर देता है। परिवेश की सार्थकता के साथ यह मानव के अन्तर्मन में मिलन की आतुरता को यह राग बढ़ा देता है।

राग देस मल्हार पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला फिल्मी गीत हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्रेमपत्र’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी थे, जिनके आजादी से पहले के संगीत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का स्वर मुखरित होता था तो आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द हुआ करता था। सलिल चौधरी भारतीय शास्त्रीय संगीत, बंगाल और असम के लोक संगीत के जानकार थे तो पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था। उनके संगीत में इन संगीत शैलियों का अत्यन्त सन्तुलित और प्रभावी प्रयोग मिलता है। आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत- ‘सावन की रातों में ऐसा भी होता है...’ में उन्होने राग देस मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर उन्होंने राग के स्वरुप का सहज और सटीक चित्रण किया है। इस गीत को परदे पर अभिनेत्री साधना और नायक शशि कपूर पर फिल्माया गया है। फिल्म के निर्देशक हैं विमल रोंय, गीतकार हैं गुलज़ार तथा झपताल में निबद्ध गीत को स्वर दिया है लता मंगेशकर और तलत महमूद ने। इस गीत में सितार का अत्यन्त मोहक प्रयोग किया गया है। लीजिए आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम सेने की अनुमति दीजिए।


राग देस मल्हार : ‘सावन की रातों में...’ : लता मंगेशकर और तलत महमूद : फिल्म - प्रेमपत्र





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 229वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्षा ऋतु में ही गाये जाने वाले एक विशेष शैली के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। 



1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 227वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको भारतीय संगीत के यशस्वी गायक उस्ताद अमीर खाँ के कण्ठ-स्वर में राग रामदासी मल्हार के खयाल का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग रामदासी मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। 

इस बार की पहेली में आपको राग रामदासी मल्हार का अंश सुनवाया गया था। राग रामदासी और मीरा मल्हार में बहुत समानता होती है। दोनों रागों के थाट, जाति, वादी और संवादी स्वर समान होते हैं। राग मीरा मल्हार में दोनों गान्धार, दोनों धैवत और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है, जबकि रामदासी मल्हार में दोनों गान्धार और दोनों निषाद के साथ केवल शुद्ध धैवत स्वर का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर दोनों रागों में समान होते हैं। इस कारण पहेली के जिस प्रतिभागी ने राग की पहचान मीरा मल्हार के रूप में की है, उस उत्तर को भी हमने सही माना है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, पेंसिवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। अगले अंक में हम वर्षा ऋतु में गायी जाने वाली एक विशेष शैली का परिचय और गीत प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, July 25, 2015

BAATON BAATON MEIN - 10: INTERVIEW OF ACTOR KIRAN JANJANI

बातों बातों में - 10

फ़िल्म अभिनेता किरण जनजानी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत






नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज जुलाई 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के जानेमाने अभिनेता किरण जनजानी (करणोदय जनजानी) से की गई हमारी बातचीत के सम्पादित अंश।   




नमस्कार किरण जी,.... मैं किरण इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसी नाम से आप फ़िल्मों में जाने जाते रहे हैं।

नमस्कार! जी बिल्कुल। 

बहुत बहुत स्वागत है ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ’बातों बातों में’ के मंच पर, और बहुत शुक्रिया आपका जो आपने इतनी व्यस्तता के बावजूद हमें समय दिया, और हमारे पाठकों से रु-ब-रु होने का सौभाग्य हमें दिया। बहुत शुक्रिया। 

शुक्रिया आपका भी मुझे आमन्त्रित करने के लिए। 

सबसे पहले तो हम आपके नाम से ही शुरू करना चाहेंगे। आप फ़िल्मों में अब तक किरण जनजानी (Kiran Janjani) के नाम से जाने जाते रहे हैं, पर आजकल आप ने अपना नाम बदल कर करणोदय जनजानी (Karanuday Jenjani) कर दिया है। इसके पीछे क्या राज़ है?

कोई राज़ की बात नहीं है, करणोदय (करण-उदय) मेरा जन्मपत्री नाम है और किरण नाम मेरे बाल्यकाल से चला आ रहा है। संजय जुमानी जी मुझसे बहुत बार कह चुके हैं कि मुझे करणोदय नाम को ही अपनाना चाहिए, पर मैंने कभे इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। लेकिन अब मेरी बेटी के जन्म के बाद जब उन्होंने फिर से यह कहा कि अब मुझे अपना नाम बदल लेना चाहिए, तो मैंने आख़िरकार बदल ही लिया। पर लोग अब भी मुझे किरण नाम से ही बुलाते हैं।

तो क्या आपकी आनेवाली फ़िल्मों में आपक नाम करणोदय दिखाई देगा?

जी बिल्कुल, मैंने अब औपचारिक तौर पर अपना नाम बदल दिया है। अंग्रेज़ी में पारिवारिक नाम की स्पेलिंग् भी बदल गई है, यानी कि Janjani से अब Jenjani हो गया है।

आप विश्वास करते हैं न्युमेरोलोजी पर?

जैसा कि मैंने कहा कि अपनी बेटी की ख़ातिर मैंने अपने नाम में बदलाव किया है। और वैसे भी यह मेरा जन्मपत्री नाम ही है, तो एक तरह से कोई बदलाव तो है ही नहीं।


किरण की, अब चलते हैं पीछे की तरफ़, बताइए कि कैसा था आपका बचपन? बचपन के वो दिन कैसे थे? किस तरह की यादें हैं आपकी?

जब मैं छोटा था तब बहुत ही शर्मीला स्वभाव का था। अपने परिवार का दुलारा था, protected by family types। कोई चिन्ता नहीं, कोई तनाव नहीं, वो बड़े बेफ़िकरी के दिन थे। क्योंकि मैं पढ़ाई में काफ़ी अच्छा था, मैं अपने बिल्डिंग् के दोस्तों के ग्रूप का लीडर हुआ करता था, पर खेलकूद में बिल्कुल भी अच्छा नहीं था। उन दिनों कम्प्यूटर नहीं था और केबल टीवी की बस शुरुआत हुई ही थी। इसलिए विडियो टेप (VCP/VCR) ही देश-विदेश के फ़िल्म जगत से जुड़ने का एकमात्र ज़रिया था। पर उन दिनों ज़्यादा वक़्त दोस्तों के साथ घूमने-फिरने, मौज मस्ती करने में ही निकलता था। और यही बचपन की सबसे ख़ूबसूरत बात थी।

आपने इस बात का ज़िक्र किया कि आप पढ़ाई-लिखाई में अच्छे थे, यहाँ पर मैं अपने पाठकों को यह बता दूँ कि किरण जी ने देश-विदेश में काफ़ी पढ़ाई की है, जैसे कि कोलम्बिया के Colegio Cosmopolitano de Colombia, फिर अमरीका के New York Film Academy और Universal Studios से फ़िल्म स्टडीज़ की, और फिर मुंबई के Narsee Monjee Institute of Management and Higher Studies से भी कोर्स किया। ऐसे बहुत कम फ़िल्म अभिनेता होंगे हमारे देश में जिन्होंने इतनी पढ़ाई की होगी। ख़ैर, किरण जी, यह बताइए कि जैसे जैसे आप बड़े होने लगे तो जीवन के किस मोड़ पे आकर आपको यह लगा कि आपको अभिनय में जाना है?

जब मैं दसवीं कक्षा में था, तब फ़ैशन के बारे में मुझे मालूमात हुई और एक झुकाव सा हुआ। यह वह समय था जब मैं स्कूल ख़तम करने ही वाला था और कॉलेज में दाख़िल होने वाला था। मैं बहुत उत्तेजित हो जाता था जब मेरे दोस्त, पड़ोसी और मेरे कज़िन्स मुझे देख कर यह कहते कि मैं बहुत अच्छा दिखता हूँ, इसलिए मुझे मॉडेलिंग् और ऐक्टिंग् में जाना चाहिए। उन दिनों त्योहारों, जैसे कि गणपति में, मेलों में और कॉलेज फ़ंकशन्स में डान्स करना एक क्रेज़ हुआ करता था। इन सब का प्रभाव मुझ पर भी पड़ा और मैंने भी डान्स सीखना शुरू कर दिया, और मॉडलिंग् की बारीकियाँ भी सीखने लगा।

परिवार जनों की क्या प्रतिक्रिया रही? कहीं उन्हें यह तो नहीं लगा कि आप ग़लत राह पर चल रहे हैं?

बिल्कुल नहीं! मेरे पिताजी मुझे डान्स शोज़ में परफ़ॉर्म करते देख बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो जाते थे, और यहाँ तक कि ज़ोर ज़ोर से सीटियाँ भी बजाते थे जब भी मैं स्टेज पर परफ़ॉर्म कर रहा होता।

क्या बात है! और आपकी माँ?

मेरी माँ और बहन तो हमारे इलाके में मेरी वजह से मशहूर थीं। और मुझे यह अनुभव बहुत ही अच्छा लगता था कि मैं इतना पॉपुलर हूँ।


मॉडलिंग् में जाते हुए आपको क्या किसी कठिनाई या संघर्ष का सामना करना पड़ा?

बस एक ही तक़लीफ़ थी, और वह यह कि मेरे दाँत उभरे हुए थे, जिसे हम अंग्रेज़ी में buck teeth कहते हैं। इसे ठीक करने के लिए मैं पैसे बचाए और ब्रेसेस लगा कर इस परेशानी को ख़त्म किया। और इसका एक फ़ायदा यह भी हुआ कि मेरे अन्दर आत्मविश्वास और गहरा हो गया, और मैं एक मॉडल और डान्सर बनने के लिए बिल्कुल तैयार हो गया।

और उसके बाद अभिनय भी?

जी हाँ, बिल्कुल!

आपने फ़िल्म इंडस्ट्री में क़दम रखा साल 2003 की फ़िल्म ’Oops!' से। किस तरह से मौक़ा मिला इस फ़िल्म में हीरो बनने का? क्या बॉलीवूड में आपका कोई कनेक्शन था पहले से ही?

कोई कनेक्शन नहीं था, दरसल बात यह हुई कि मैं जिस जिम में जाया करता था, उसी जिम में दीपक तिजोरी भी जाया करते थे। वहाँ उन्होंने मुझे देखा, और मेरा जो स्वभाव था, जिस तरह से मैं वहाँ के स्टाफ़, ट्रेनर और दूसरे दोस्तों से बातचीत करता था, जिस खिलन्दड़पन और रंगीन मिज़ाज से सबसे मिलता था, उससे वो काफ़ी प्रभावित हुए। पूरी मस्ती चालू रहती थी, जोक्स मारता रहता था, एक ऐटिट्यूड भी था, कुल मिला कर दीपक तिजोरी ने मुझमें जहान देखा।

जहान?

जी हाँ, जहान, यानी कि 'Oops!' फ़िल्म के नायक के चरित्र का नाम। जहान में ये ही सारी ख़ूबियाँ थीं। उन्होंने जब मुझे इसके लिए ऐप्रोच किया तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

पहली बार फ़िल्मी कैमरा फ़ेस करने से पहले किस तरह की तैयारियाँ आपने की थी?

ऑफ़कोर्स दीपक ने मुझे पूरे दो महीने की फ़िल्म के स्क्रिप्ट की ट्रेनिंग् दिलवाई। उस समय मेरे अन्दर एक आग थी अभिनेता बनने की, इसलिए कोई भी मुश्किल मुश्किल नहीं लगा। 


फ़िल्म 'Oops!' की कहानी बहुत ही ज़्यादा बोल्ड थी। अपनी पहली ही फ़िल्म में इस तरह का रोल करना आपको आत्मघाती नहीं लगा? किसी तरह की हिचकिचाहट महसूस नहीं हुई?

जैसा कि मैंने अभी कहा कि मेरे अन्दर उस समय एक अभिनेता एक हीरो बनने की आग जल रही थी और मैं हर हाल में वह मंज़िल पाना चाहता था, इसलिए यह सोचने का सवाल ही नहीं था कि फ़िल्म बोल्ड सब्जेक्ट पर है या मेरे लिए suicidal है। डरने या पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। मौक़े बार बार नहीं मिलते। इसलिए मैंने 'Oops!' में जहान का किरदार निभाने के लिए दीपक तिजोरी को हाँ कह दिया।

फ़िल्म ’Oops!' कई कारणों से विवादों में घिर गई थी। पहला कारण इसका बोल्ड सब्जेक्ट कि जिसमें जहान अपनी दोस्त आकश की माँ के साथ प्रेम संबंध बना लेता है, और दूसरा कारण इसमें दिखाए गए अन्तरंग दृश्य जो उस समय के हिसाब से बहुत ज़्यादा बोल्ड थे। क्या वाक़ई आपको डर नहीं लगा था फ़िल्म को करते हुए?

नरवसनेस तो होती है यह मैं मानता हूँ, मुश्किल दृश्यों को करते हुए अभिनेता नरवस फ़ील करता है। सीनियर ऐक्टर्स के साथ काम करना, देर रात तक काम करना, अन्तरंग दृश्य निभाना, ये सब हमें परेशान करते हैं, पर मैं इन सब चीज़ों को अपने काम का हिस्सा मानता हूँ जिनसे बचने का कोई तरीका नहीं है। इसलिए इन्हें स्वीकार कर लेने में ही भलाई है।

वरिष्ठ अभिनेत्री मीता वशिष्ठ के साथ आपके अन्तरंग दृश्यों को लेकर काफ़ी चर्चाएँ और विवाद खड़े हुए थे। क्या कहना चाहेंगे उस बारे में?

मुझे हमेशा अपने डिरेक्टर पर भरोसा रहा है और यह विश्वास रहा है कि वो ऐसा कुछ नहीं दिखाएँगे जो सस्ता या चल्ताऊ लगे, भद्दा लगे, अश्लील लगे। मीता जी एक वरिष्ठ अभिनेत्री हैं, अगर उन्हे वह सीन करते हुए बुरा नहीं लगा तो मैं नहीं समझता कि इसके बाद मुझे कुछ और कहने की आवश्यक्ता है।

’Oops!' के गाने भी काफ़ी अच्छे थे और लोकप्रिय भी हुए। आपको कौन सा गाना सबसे ज़्यादा पसन्द है इस फ़िल्म का?

सच पूछिए तो इस फ़िल्म के सभी गाने मेरे फ़ेवरीट हैं। सोनू निगम का गाया "जाने यह क्या हो रहा है, यह दिल कहाँ खो रहा है...", हरिहरण का गाया "ऐ दिल तू ही बता...", शान का गाया "याहें...", ये सभी गीत मुझे बहुत पसन्द है, और ये सब बड़े बड़े गायक हैं। मैं आज भी इन गीतों को सुनता रहता हूँ।


हमारी फ़िल्म इंडसट्री में यह रवायत है कि कोई भी कलाकार बहुत जल्दी टाइप कास्ट हो जाता है, और शायद यह आपके साथ भी हुआ। ’Oops!' के बाद आपने कई ऐसी फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें कहानी कम और मसाला ज़्यादा थी, जैसे कि ’Stop', ’सौ झूठ एक सच’, ’जलवा - फ़न इन लव’, ’सितम’ आदि। क्या इनके बाद भी आपको यह नहीं लगा कि ’Oops!' से आग़ाज़ करना उचित नहीं रहा?

’Stop' फ़िल्म में मैंने एक flirt casanova का किरदार निभाया था, ’सितम’ में मैं एक बिज़नेसमैन था, और अन्य फ़िल्मों में भी मैंने अलग अलग किरदार निभाए, पर इन सब में एक बात जो कॉमन थी, वह यह कि मेरा किरदार एक flirt था, हा हा हा। पर यह भी तो देखिए कि ’Oops!' में एक male stripper का रोल निभाने वाला ’My Friend Ganesha' में एक अच्छे पति का रोल भी निभाया है जो एक बच्चों की फ़िल्म थी। और आज भी मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मैंने ’Oops!' में एक male stripper के किरदार से अपनी पारी की शुरुआत की। मुझे गर्व है कि मैंने यह फ़िल्म किया। मैं एक अभिनेता हूँ, इसलिए कठिनाइयाँ और ख़तरे तो उठाने ही पड़ेंगे।

क्योंकि आपने ज़िक्र छेड़ ही दिया है तो मैं अब सीधे 2007 की फ़िल्म ’My Friend Ganesha' पे आ जाता हूँ। इस फ़िल्म में आपको अभिनय का मौका कैसे मिला, जबकि आप दूसरी तरह की फ़िल्में (वयस्क फ़िल्में) कर रहे थे?

मैं बचपन से ही भगवान गणपति का बहुत बड़ा भक्त रहा हूँ। गणपति उत्सव के दौरान मैं गलियों में ख़ूब नाचा करता था। मैं यही कहूँगा कि गणपति के आशिर्वाद से ही मुझे ’My Friend Ganesha' में काम करने का अवसर मिला। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि फ़िल्म के निर्मता महोदय शुरुआत में नहीं चाहते थे कि मैं इस फ़िल्म में काम करूँ। फिर उसके बाद जब वो तैयार हुए तो मैंने एक बार नहीं बल्कि दो दो बार रीजेक्ट कर दिया, पार अख़िरकार मैं मान गया।

कैसा था इस फ़िल्म में अभिनय करने का अनुभव?

जब मैं इस फ़िल्म की शूटिंग् कर रहा था तब मुझे वाक़ई ऐसा लग रह था कि गणेश जी मेरे आसपास हैं। इस फ़िल्म के सभी दृश्यों और भक्ति गीतों पर अभिनय करते हुए एक अजीब सी शान्ति अनुभव करता था, और फ़िल्म के निर्देशक और पूरी यूनिट को भी बहुत अच्छा लगा।

यानी कि एक आध्यात्मिक लोक में पहुँच गए थे इस फ़िल्म को करते हुए?

बिल्कुल! एक कनेक्शन बन गया था जैसे!

बहुत ख़ूब! अच्छा, अब आपके द्वारा निभाए कुछ अन्य चरित्रों की बात करते हैं। फ़िल्म ’Life Express' में आपने निखिल शर्मा का किरदार निभाया था। इसके बारे में कुछ बताइए?

’Life Express' का निखिल शर्मा एक बहुत ही व्यस्त पति है जिसे अपने परिवार के लिए बिल्कुल समय नहीं है। पर हक़ीक़त की ज़िन्दगी में ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे लिए परिवार ही सर्वोपरि है। इस वजह से इस किरदार को अन्दर से महसूस करना थोड़ा मुश्किल हो गया था शुरू शुरू में। निखिल शर्मा बहुत ही शुष्क और शान्त स्वभाव का है जबकि मैं बहुत ही लाउड हूँ जो सबके साथ कनेक्टेड रहता हूँ। ’Life Express' की कहानी surrogate motherhood की कहानी है जिसमें ऋतुपर्णा सेनगुप्ता और दिव्या दत्ता ने मेरे साथ काम किया था और इस फ़िल्म को काफ़ी सराहा गया था।

जी हाँ, और इस फ़िल्म के गीत भी काफ़ी अच्छे थे।

रूप कुमार राठौड़ ने बहुत अच्छा म्युज़िक दिया था। "फीकी फीकी सी लगे ज़िन्दगी तेरे प्यार का नमक जो ना हो...", "थोड़ी सी कमी रह जाती है..." और ख़ास तौर पर जगजीत सिंह के गाए भक्ति गीत "फूल खिला दे शाख़ों पर..." गीत के तो क्या कहने!



अच्छा, अभे हाल में आपने ’Picture Perfect' नामक फ़िल्म में अभिनय किया था। इस फ़िल्म के बारे में कुछ बताइए?

यह दरसल MTV Films और Tresemme द्वारा निर्मित एक लघु फ़िल्म थी 40 मिनट अवधि की जिसे MTV और Youtube पर रिलीज़ किया गया था। यह कहानी थी एक लड़की के दृढ़ संकल्प की, जोश की, और जीतने की चाह की; उस लड़की की जो हर मुसीबतों का सामना करती है अपने सपने को जीने के लिए। Youtube पर आप इस फ़िल्म को देख सकते हैं।

ज़रूर! किरण जी, आपने इतने सारे किरदार निभाए हैं, क्या किसी किरदार में किरण नज़र आता है आपको? कौन है आपके सबसे ज़्यादा दिल के क़रीब - 'Oops!' का जहान, 'Stop' का रोहित, ’सौ झूठ एक सच’ का विक्रम प्रधान, ’जलवा’ का यश सिंघानिया या फिर ’Life Express' का निखिल शर्मा?

मैं अपने द्वारा निभाए गए किसी भी फ़िल्मी चरित्र जैसा नहीं हूँ। मुझे लगता है कि एक अभिनेता होने के नाते मुझे हर किरदार और रोल में ढल जाना चाहिए, और मेरे हिसाब से एक अच्छे कलाकार की यही निशानी होनी चाहिए। मैं हमेशा सिम्पल फील करता हूँ।

आपने शुरू में बताया था कि कॉलेज के दिनों से ही आप नृत्य करते थे। तो अब यह बताइए कि ’नच बलिये 3’ में आप कैसे गए और कैसा अनुभव था उस रीयल्टी शो में भाग लेने का?

दरसल ’नच बलिये 3’ मुझे नहीं बल्कि मेरी पत्नी ऋतु को मिला था। क्योंकि हमारी तस्वीरें इन्तरनेट पर मौजूद थी celebrity couple के रूप में, Hong Kong से Star TV चैनल ने उन्हें देखा और ऋतु और मुझे फ़ाइनल किया। और जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ कि मैं एक अच्छा डान्सर था ही, इसलिए ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। मैं शियामक दावर और अलिशा चिनॉय जैसे पॉप स्टार्स के साथ डान्स कर चुका था, पर एक जोड़ी बन कर डान्स करना और वह भी इतने बड़े प्लैटफ़ॉर्म पर, नैशनल टेलीविज़न पर, यह एक चुनौती ज़रूर था।

आपने पत्नी ऋतु का ज़िक्र जब आ ही गया तो उनके बारे में भी कुछ बताइए?

मेरी पत्नी ऋतु एक prosthetic make-up designer हैं जिसने Los Angeles california से ट्रेनिंग् प्राप्त किया है। 


और कौन हैं आपके परिवार में?

मेरी तीन साल की बेटी Valerie है जो बहुत ही प्यारी है और हमारी लाडली भी। 

ख़ाली समय में क्या करते हैं? कोई शौक़?

कोई शौक़ नहीं है, Valerie के साथ समय बिताना ही हमारा एकमात्र पास्टाइम है। शॉपिंग् मॉल, गार्डन, मूवीज़, स्विमिंग् ये तमाम चीज़ें मैं करता हूँ वैलरी और ऋतु के साथ।

भविष्य में अभिनय या फ़िल्म निर्माण/निर्देशन का विचार है?

मैंने Los Angeles New York Film Academy से फ़िल्म निर्माण सीखा और एक निर्माता और निर्देशक के हैसीयत से कुछ लघु फ़िल्मों का निर्माण भी किया। अब मैंने अपनी पहली पटकथा लिखी है जो एक ऐक्शन थ्रिलर है। बहुत जल्द मैं अपनी इस फ़िल्म को ख़ुद प्रोड्युस और डिरेक्ट करने जा रहा हूँ। और हाँ, इस फ़िल्म में मैं बहुत से special fx prosthetic makeup का इस्तमाल करने जा रहा हूँ जिसमें मेरी पत्नी पारंगत है। भगवान गणेश का आशीर्वाद रहा तो यह सपना जल्दी ही सच होगा।

हम ईश्वर से दुआ करते हैं कि आपका यह सपना सच हो और हम सब को एक अच्छी फ़िल्म देखने को मिले।

धन्यवाद!

किरण जी, बहुत अच्छा लगा आप से बातें कर, आपका बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने हमें इतना समय दिया अपनी वुअस्त ज़िन्दगी से। आपको आपकी आने वाली फ़िल्म के लिए ढेरों शुभकामनाएँ, नमस्कार!

बहुत बहुत धन्यवाद और नमस्कार!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Sunday, July 19, 2015

रामदासी और मीरा मल्हार : SWARGOSHTHI – 228 : RAMDASI AND MEERA MALHAR



स्वरगोष्ठी – 228 में आज


रंग मल्हार के – 5 : राग रामदासी और मीराबाई की मल्हार

‘छाए बदरा कारे कारे...’ और ‘बादल देख डरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस पाँचवीं कड़ी में आज हम आपसे राग रामदासी और मीराबाई की मल्हार के बारे में चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपके लिए सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में राग रामदासी मल्हार में एक आकर्षक रचना प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘छाए बदरा कारे कारे...’। इसके साथ ही आपको 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म ‘मीरा’ का एक गीत सुनवा रहे है, जिसे संगीतकार पण्डित रविशंकर ने राग मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार में निबद्ध किया था। 



बाहर पावस की रिमझिम फुहार और आपकी ‘स्वरगोष्ठी’ में मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। ऐसे ही सुहाने परिवेश में ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ श्रृंखला के अन्तर्गत आज प्रस्तुत है, मल्हार अंग के दो रागों- रामदासी और मीराबाई की मल्हार के स्वरों से अनुगूँजित कुछ चुनी हुई संगीत-रचनाएँ। दोनों रागों के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण संगीत और भक्ति संगीत के मनीषियों के नामों पर हुआ है। पहले हम राग रामदासी मल्हार के बारे में आपसे चर्चा करेंगे। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला राग रामदासी मल्हार, दोनों गान्धार तथा दोनों निषाद से युक्त होता है। इसकी जाति वक्र सम्पूर्ण होती है। अवरोह में दोनों गान्धार का प्रयोग वक्र रूप से करने पर राग का सौन्दर्य निखरता है। शुद्ध गान्धार के प्रयोग से यह राग मल्हार के अन्य प्रकारों से अलग हो जाता है। इसका वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग वर्षा ऋतु के परिवेश का सजीव चित्रण करने में समर्थ होता है, इसलिए इस ऋतु में रामदासी मल्हार का गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। 

राग रामदासी मल्हार का सृजन ग्वालियर के विद्वान नायक रामदास ने की थी। इस तथ्य का समर्थन विख्यात संगीतज्ञ मल्लिकार्जुन मंसूर द्वारा किया गया है। उनके मतानुसार नायक रामदास मुगल बादशाह अकबर से भी पूर्व काल में थे। सुप्रसिद्ध विद्वान और ग्रन्थकार हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘राग परिचय’ के चौथे भाग में इस राग के सृजन के लिए काशी के सुप्रसिद्ध संगीतविद बड़े रामदास को श्रेय दिया है। राग रामदासी मल्हार में शुद्ध गान्धार के उपयोग से उसका स्वरूप मल्हार अंग से अलग व्यक्त होता है। राग का प्रस्तार वक्र गति से किया जाता है, जैसे- सा रे प ग म, प ध नि ध प, म प ग म, प ग(कोमल) म रे सा...। आजकल यह राग अधिक प्रचलन में नहीं है। इस राग का स्वरूप अत्यन्त मधुर होता है। मल्हार के म रे और रे प का स्वरविन्यास इस राग में बहुत लिया जाता है। इस राग के गायन-वादन में राग शहाना और गौड़ की झलक भी मिलती है। आइए, अब हम आपको किराना घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में राग रामदासी मल्हार का तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं।


राग रामदासी मल्हार : 'छाए बदरा कारे कारे...' : उस्ताद अमीर खाँ 




आज का द्दूसरा राग है, मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार। यह भी मल्हार अंग का राग है। यह माना जाता है कि इस राग की रचना सुप्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई ने की थी। यह काफी थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग मीरा मल्हार में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप (शुद्ध और कोमल) प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इससे पूर्व आपने राग रामदासी मल्हार के जिस रचना का रसास्वादन किया है, उसमें और राग मीरा मल्हार के थाट, जाति, वादी और संवादी समान होते हैं। आरोह और अवरोह के स्वर भी लगभग समान होते हैं। केवल कोमल धैवत स्वर का अन्तर होता है। राग रामदासी मल्हार में केवल शुद्ध धैवत का प्रयोग होता है, जबकि राग मीरा मल्हार में दोनों धैवत का प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर राग मीरा मल्हार के गायन-वादन का समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। राग के स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म ‘मीरा’ से एक गीत सुनवा रहे हैं। यह गीत ही नहीं, बल्कि इस राग की संरचना भी स्वयं भक्त कवयित्री मीराबाई की है। फिल्म ‘मीरा’ के संगीत पर मैं अपने प्रिय मित्र और फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख का एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ।

जाने-माने गीतकार गुलज़ार को मीरा के जीवन पर एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिला। मीराबाई की मुख्य भूमिका में अभिनेत्री हेमामालिनी का और संगीत निर्देशन के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का चुनाव पहले ही हो चुका था। फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद गुलज़ार ने सिटिंग रखी फ़िल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे के साथ। मीराबाई द्वारा लिखी बेशुमार भजनों की चर्चा करते हुए अन्त में कुल 12 भजन छाँट लिए गये जो फ़िल्म में रखे जाने थे। फ़िल्म के निर्माता ने व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन प्रकाशित कर दिया - 'आज की मीरा' (लता मंगेशकर) 'मीरा' की मुहूर्त शॉट में क्लैप करेंगी। गुलज़ार ने पहला भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." को सबसे पहले फ़िल्माने की तैयारी भी कर ली। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने भजन कम्पोज़ किया और लता जी से सम्पर्क किया रेकॉर्डिंग के लिए। लक्ष्मी-प्यारे जानते थे कि लता जी ना नहीं करेंगी। पर उनके सर पे बिजली आ गिरी जब लता जी ने इसे गाने से इनकार कर दिया। लता जी के अनुसार अभी हाल ही में उन्होंने अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के लिए मीरा भजनों का एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम रेकॉर्ड किया है, इसलिए दोबारा किसी कमर्शियल फ़िल्म के लिए वही भजन नहीं गा सकती। लता जी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं। मसला इतना नाज़ुक था कि ना तो गुलज़ार लता जी से इस पर बहस कर सकते थे और एल.पी. का तो सवाल ही नहीं था। हुआ यूँ कि लता जी के ना कहने पर एल. पी ने भी फ़िल्म में संगीत देने से मना कर दिया। उन्हे लगा कि कहीं लता जी उनसे नाराज़ हो गईं और भविष्य में उनके गीत गाने से मना कर देंगी तो वो बरबाद हो जायेंगे। ख़ैर, लता जी के पीछे हट जाने के बाद गुलज़ार ने आशा भोसले से अनुरोध किया। पर आशा जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि जहाँ देवता ने पाँव रखे हों, वहाँ फिर मनुष्य पाँव नहीं रखते। अब 'मीरा' की टीम डर गई। न लता है, न आशा, न एल.पी.। गुलज़ार अगर चाहते तो पंचम को संगीतकार बनने के लिए अनुरोध कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लता और आशा के गुलज़ार को मना करने पर पंचम वैसे ही शर्मिन्दा थे, गुलज़ार उन्हें और ज़्यादा शर्मिन्दा नहीं करना चाहते थे। और इस तरह से लता, आशा, एल.पी, पंचम - ये दिग्गज इस फ़िल्म से बहुत दूर हो गये।

गुलज़ार ने हार नहीं मानी और सोचने लगे कि ऐसा कौन संगीतकार है जो अपने संगीत के दम पर लता और आशा के बिना भी फ़िल्म के गीतों को सही न्याय और स्तर दिला सकता है! और तभी उन्हें पण्डित रविशंकर का नाम याद आया। पण्डित जी उस समय न्यूयॉर्क में थे; उनसे फोन पर सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वो सितम्बर-अक्तूबर में भारत आएँगे और आने के बाद स्क्रिप्ट पढ़ कर अपना फ़ैसला सुनायेंगे। वह जून का महीना था और गुलज़ार इतने दिनों तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अमरीका का टिकट कटवाया और पहुँच गये पण्डित जी के पास। यह गुलज़ार साहब की पहली अमरीका यात्रा थी। पण्डित जी को स्क्रिप्ट पसन्द आई, पर उस पर काम वो सितम्बर से ही शुरू कर पायेंगे, ऐसा उन्होंने कहा। लेकिन गुलज़ार साहब के फिर से अनुरोध करने पर वो अमरीका में रहते हुए ही धुनों पर काम करने को तैयार हो गये। अभी भी पण्डित जी को थोड़ी सी हिचकिचाहट थी क्योंकि उन्होंने भी लता मंगेशकर वाले विवाद की चर्चा सुनी थी। संयोग से जब गुलज़ार पण्डित जी से मिलने अमरीका गये, उन दिनों लता जी भी वहीं थीं। गुलज़ार साहब और पण्डित जी ने लता जी को फ़ोन किया और उन्हें सब कुछ बताया तो लता जी ने उनसे कहा कि उन्हें फ़िल्म 'मीरा' के बनने से कोई परेशानी नहीं है, बस वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं होना चाहती। अब इसके बाद पण्डित जी के सामने अगला सवाल था कि कौन सी गायिका इन भजनों को गाने वाली हैं? गुलज़ार के मन में वाणी जयराम का नाम था, पर वो पण्डित जी से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, यह सोच कर कि वो कैसे रिऐक्ट करेंगे वाणी जयराम का नाम सुन कर। इसलिए गुलज़ार साहब ने ही पण्डित जी से गायिका चुनने को कहा। और पण्डित जी का जवाब था, "वाणी जयराम कैसी रहेगी?"

पण्डित रविशंकर ने "बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी..." को सबसे पहले कम्पोज़ किया। गुलज़ार साहब के अनुसार यह इस फिल्म का सबसे बेहतरीन भजन है। कहते हैं कि "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." कम्पोज़ करते समय पण्डित जी ने कहा था - "जो ट्यून रोशन साहब ने बनायी है 'नौबहार' में, वह दिमाग़ से नहीं जाती। लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगा कि कुछ अलग हट कर बनाऊँ"। पर जिस भजन के लिए वाणी जयराम को पुरस्कार मिला, वह था "मेरे तो गिरिधर गोपाल..."। सितम्बर में भारत वापस आने के बाद 'मीरा' के सभी 12 भजन एक के बाद एक 9 दिनों के अन्दर रेकॉर्ड किये गये वाणी जयराम की आवाज़ में। पण्डित जी ने सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करते हुए पूरे अनुशासन के साथ कार्य को समय पर सम्पन्न किया। एक दिन ऐसा हुआ कि पण्डित जी बहुत ही थके हुए से दिख रहे थे। गुलज़ार साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि अगले दिन वो दोपहर 2 बजे से काम शुरू करेंगे। यह कह कर वो निकल गये। अगले दिन पण्डित जी 2 बजे आये, बिल्कुल तरो-ताज़ा दिख रहे थे। जब गुलज़ार साहब ने उनसे इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि अब वो बहुत ज़्यादा बेहतर महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने लगातार 8 घंटे अपना सितार बजाया है सुबह 4 बजे से बैठ कर; वो इसलिए थके हुए से लग रहे थे क्योंकि कई दिनों से उन्हे अपने सितार को छूने का मौका नहीं मिल पाया था। इस तरह से 'मीरा' के गानें बने। आइए, अब हम आपको इसी फिल्म का एक गीत (मीराबाई का पद) सुनवाते हैं, राग मीरा मल्हार के स्वरों में पिरोया हुआ। अन्य गीतों की तरह इसे वाणी जयराम ने स्वर दिया है और संगीत पण्डित रविशंकर का है। आप मीरा के इस पद का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग मीरा मल्हार : 'बादल देख डरी...' : वाणी जयराम : संगीत - पं. रविशंकर : फिल्म - मीरा  





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 228वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के सुप्रसिद्ध विद्वान की आवाज़ में दो रागों के मेल से बने एक राग में निबद्ध खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल  swargoshthi@gmail.com  या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 226 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत राग सूर मल्हार की एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सूर मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित भीमसेन जोशी। इस बार पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। आज के अंक में आपने राग रामदासी मल्हार और मीरा मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपको मल्हार अंग के कुछ मिश्र रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, July 18, 2015

"करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." - आज यादें बशर नवाज़ के इस ग़ज़ल की

सभी पाठकों और श्रोताओं को ईद मुबारक



एक गीत सौ कहानियाँ - 63
 

'करोगे याद तो हर बात याद आएगी...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 64-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं जानेमाने शायर बशर नवाज़ को उनकी लिखी ग़ज़ल "करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." के ज़रिए। बशर नवाज़ का हाल ही में निधन हो गया है। 

त 9 जुलाई 2015 को उर्दू के जानेमाने शायर बशर नवाज़ का महाराष्ट्र के औरंगाबाद में इन्तकाल हो गया है। फ़िल्मे संगीत की दुनिया में 79 वर्षीय बशर नवाज़ को 1982 की फ़िल्म ’बाज़ार’ के लिए लिखी उनकी ग़ज़ल "करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." के लिए याद किया जाता रहेगा। इसके अलावा ’लोरी’, ’जाने वफ़ा’ और ’तेरे शार में’ जैसी फ़िल्मों के लिए भी उन्होंने गाने लिखे और उनकी गीतों व ग़ज़लों को आवाज़ देनेवाली आवाज़ों में शामिल हैं लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी, ग़ुलाम अली, भूपेन्द्र और तलत अज़ीज़। बशर नवाज़ ने कई रेडियो नाटक लिखे और दूरदर्शन के मशहूर धारावाहिक ’अमीर ख़ुसरो' की पटकथा भी लिखी। फ़िल्म और टेलीविज़न की दुनिया के बाहर बशर नवाज़ एक उम्दा शायर और आलोचक भी थे। समकालीन शायर निदा फ़ाज़ली का कहना है कि बशर नवाज़ हमेशा उनके समकालीन शायरों की रचनात्मक आलोचना के लिए जाने जाएँगे। 18 अगस्त 1935 को जन्मे बशर नवाज़ ने अपनी 80 साल की ज़िन्दगी में उर्दू साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इस योगदान के लिए उन्हें पुलोत्सव सम्मान से समानित किया गया है। साल 2010 में फ़िल्मकार जयप्रसाद देसाई ने ’ख़्वाब ज़िन्दगी और मैं’ शीर्षक से बशर नवाज़ की जीवनी पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था। देसाई साहब का कहना है कि "बशर" शब्द का अर्थ है आम आदमी, और बशर नवाज़ वाक़ई आम आदमी के शायर थे जिनकी शयरी में आम आदमी की ज़िन्दगी का संघर्ष झलकता है। बशर नवाज़ बहुत ही नम्र स्वभाव के थे। एक बार तो गेटवे ऑफ़ इण्डिया पर एक कार्यक्रम के दौरान एक अशिक्षित ने उन्हें न पहचानते हुए उनसे उनकी पहचान पूछ ली, जबकि वो उस कार्यक्रम के केन्द्रबिन्दु थे।


और अब यादें "करोगे याद तो..." ग़ज़ल की। फ़िल्म ’बाज़ार’ में संगीतकार थे ख़य्याम। मुस्लिम सब्जेक्ट पर बनने वाली इस फ़िल्म के लिए यह तय हुआ कि इसके गीतों को फ़िल्मी गीतकारों से नहीं बल्कि उर्दू साहित्य के शायरों से लिखवाए जाएँगे। ख़य्याम साहब के शब्दों में, "वो हमारी फ़िल्म आपको याद होगी, बाज़ार! तो उसमें सागर सरहदी साहब हमारे मित्र हैं, दोस्त हैं, तो ऐसा सोचा सागर साहब ने कि ख़य्याम साहब, आजकल का जो संगीत है, उस वक़्त भी, बाज़ार के वक़्त भी, हल्के फुल्के गीत चलते थे। तो उन्होंने कहा कि कुछ अच्छा आला काम किया जाए, अनोखी बात की जाए! तो सोचा गया कि बड़े शायरों का कलाम इस्तेमाल किया जाए फ़िल्म संगीत में। तो मैं दाद दूँगा कि प्रोड्युसर-डिरेक्टर चाहते हैं कि ऊँचा काम, शायद लोगों की समझ में ना आए। लेकिन उन्होंने कहा कि आपने बिल्कुल ठीक सोचा है। तो जैसे मैं आपको बताऊँ कि मीर तक़ी मीर साहब, बहुत बड़े शायर, इतने बड़े कि मिर्ज़ा ग़ालिब साहब ने अपने कलाम में उनका ज़िक्र किया है कि वो बहुत बड़े शायर हैं। तो उनका कलाम हमने इस्तेमाल किया, "दिखाई दिए यूं..."। फिर मिर्ज़ा शौक़, एक मसनबी है ज़हर-ए-इश्क़, बहुत बड़ी है, एक किताब की शक्ल में, तो उसमें से एक गीत की शक्ल में, ज़हर-ए-इश्क़, "देख लो आज हमको जी भर के..."। फिर मख़्दुम मोहिउद्दीन, "फिर छिड़ी रात बात फूलों की...", यह उनकी बहुत मशहूर ग़ज़ल है।" मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा शौक़ 18 और 19 वीं सदी के शायर थे तो मख़्दुम मोहिउद्दीन भी 20-वीं सदी के शुरुआती सालों से ताल्लुक रखते थे। इन शायरों की ग़ज़लों के साथ अगर आज के दौर के किसी शायर की ग़ज़ल का शुमार किया जाए तो मानना पड़ेगा कि इस शायर में ज़रूर कोई बात होगी। फ़िल्म ’बाज़ार’ के चौथे शायर के रूप में चुना गया बशर नवाज़ को और उनकी ग़ज़ल "करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." को फ़िल्म के एक सिचुएशन पर ढाल दिया गया। ख़य्याम साहब के शब्दों में, "बहुत मशहूर ग़ज़ल है बशर नवाज़ साहब की, और बहुत अच्छे शायर हैं, आज के शायर हैं, और भूपेन्द्र ने बहुत अच्छे अंदाज़ में गाया है इसे"। फ़िल्म ’बाज़ार’ के रिलीज़ के 13 साल बाद इस ग़ज़ल को एक बार फिर से ’सादगी’ नामक ऐल्बम में शामिल किया गया, जिसमें ख़य्याम साहब के साथ-साथ अन्य कई कम्पोज़र्स की ग़ज़लें शामिल हैं। आज बशर नवाज़ इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर चले गए हैं, पर उनकी याद हमें दिलाती रहेगी यह दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल। उनकी कमी उर्दू साहित्य जगत को खलती रहेगी। "गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाज़ा, तरसती आँखों से रास्ता किसी का देखेगा, निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी..."। बशर नवाज़ को श्रद्धासुमन। लीजिए यही ग़ज़ल आप भी सुनिए। 

फिल्म - बाज़ार : 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी...' : भूपेन्द्र : संगीत - खय्याम : शायर - बशर नवाज़ 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, July 12, 2015

राग सूर मल्हार : SWARGOSHTHI – 227 : RAG SOOR MALHAR




स्वरगोष्ठी – 227 में आज

रंग मल्हार के – 4 : राग सूर मल्हार

‘बादरवा बरसन लागी...’ और ‘डर लागे गरजे बदरवा...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस चौथी कड़ी में आज हम आपसे राग सूर मल्हार के बारे में चर्चा करेंगे। आज के अंक में सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में हम इस राग में दो मोहक रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे, जिनके बोल हैं- 'बादरवा गरजत आए...' और ‘बादरवा बरसन लागी...’। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया, राग सूर मल्हार पर आधारित फिल्म ‘रामराज्य’ का एक गीत भी सुनवाएँगे। 


ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों और कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसा ही एक उल्लेखनीय राग है- सूर मल्हार। ऐसी मान्यता है कि इस राग की रचना हिन्दी के भक्त कवि सूरदास ने की थी। इस ऋतु प्रधान राग में निबद्ध रचनाओं में पावस के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, नायिका के विरह के भाव को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। राग सूर मल्हार काफी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औडव-षाडव होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग सूर मल्हार में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वरों का तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित होता है।

इस राग की कुछ अन्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने बताया कि सूर मल्हार का मुख्य अंग है- सा [म]रे प म, नी(कोमल) म प, नी(कोमल)ध प, म रे सा होता है। राग के गायन-वादन में यदि सारंग झलकने लगे तो नी(कोमल) ध s म प नी(कोमल) ध s प स्वरों का प्रयोग करने से सारंग तिरोहित हो जाता है। श्री मिश्र के अनुसार सारंग के भाव में मेघ मल्हारांश उद्वेग के चपल और गम्भीर ओज से युक्त भाव में राग देस के अंश के विरह भाव के मिश्रण से कसक-युक्त उल्लास में वेदना के मिश्रण से नये रस-भाव का सृजन होता है। अब आप पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए, राग सूर मल्हार में निबद्ध दो मोहक खयाल रचनाएँ। मध्यलय की रचना एकताल में है, जिसके बोल हैं- ‘बादरवा गरजत आए...’ और इसके बाद द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘बादरवा बरसन लागी...’


राग सूर मल्हार : ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’ : पण्डित भीमसेन जोशी




फिल्मी संगीतकारों ने वर्षा ऋतु के इस राग सूर मल्हार पर आधारित एकाध गीत ही रचे हैं, जिसमें वर्षा ऋतु के अनुकूल भावों की अभिव्यक्ति हो। संगीतकार वसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया एक कर्णप्रिय गीत हमे अवश्य उपलब्ध हुआ। फिल्म संगीतकारों में वसन्त देसाई एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनकी रचनाओं में रागदारी संगीत के प्रति लगाव और उनकी प्रतिबद्धता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। मल्हार अंग के रागों के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म ‘शक’ तक निरन्तर बना रहा। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में बसन्त देसाई द्वारा राग मियाँ मल्हार में स्वरबद्ध ‘गुड्डी’ का आकर्षक गीत आप सुन चुके हैं। आज के अंक में हम राग सूर मल्हार के स्वरों में पिरोया उनका एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ का यह गीत है, जिसे भरत व्यास ने लिखा, वसन्त देसाई ने संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग सूर मल्हार : ‘डर लागे गरजे बदरवा..’ : लता मंगेशकर : फिल्म रामराज्य





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 227वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको मल्हार अंग के ही एक राग का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। इस राग का नाम एक संगीत-नायक के नाम पर किया गया है। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 18 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 229वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 225वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के कण्ठ-स्वर में एक फिल्मी खयाल रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में रायपुर, छतीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव, पेंसिवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्न का सही उत्तर दिया है। तीन में से दो प्रश्न का सही उत्तर दिया है- वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। अगले अंक में हम वर्षा ऋतु के एक अन्य राग के साथ उपस्थित होंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसंद के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Saturday, July 11, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 04 - सुधा चन्द्रन्


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 04

 
सुधा चन्द्रन्



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है मशहूर नृत्यांगना व अभिनेत्री सुधा चन्द्रन् को। 


21 सितंबर 1964 को सुधा का जन्म हुआ था। सुधा जब मात्र पाँच वर्ष की थी, तभी से नृत्य सीखना शुरू कर दिया था बम्बई के कला सदन में। पढ़ाई और नृत्य दोनो साथ-साथ करती गईं और 17 वर्ष की आयु होते होते वो लगभग 75 स्टेज शोज़ कर चुकी थीं। अन्य पुरस्कारों के साथ-साथ दो मुख्य पुरस्कार ’नृत्य मयूरी’ और ’नवज्योति’ प्राप्त कर चुकी थीं। नृत्य में ही अपना करीअर बनाने का निर्णय ले चुकी थीं सुधा अन्द इस राह पर वो निरन्तर अग्रसर होती चली जा रही थीं बहुत लगन और निष्ठा के साथ। पर भाग्य ने एक बहुत भयानक और गंदा मज़ाक कर दिया उनके साथ। 2 मई 1981 की बात है। सुधा अपने माता-पिता के साथ तमिलनाडु के एक मन्दिर में जा रही थीं एक बस में। और वह बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। दुर्घटना इतनी घातक थी कि सुधा के पैरों को गहरी चोट लगी। दायें पैर का चोट बहुत ज़्यादा था, उस पर शुरुआती डॉक्टर ने इलाज में गड़बड़ी कर दी जिसकी वजह से गैंगरीन हो गया, और उनकी दायीं टांग को शरीर से अलग कर देना पड़ा उनकी जान को बचाने के लिए। एक नृत्यांगना के लिए पैर की क्या अहमियत होती है, यह शायद अलग से बताने की ज़रूरत नहीं। पलक झपकते सबकुछ मानो ख़त्म हो गया, सब तहस-नहस हो गया। एक नृत्यांगना बनने का सपना मानो पल भर में दम तोड़ दिया। जान बच गई, बस यही एक अच्छी बात थी।


कुछ दिनों के इलाज के बाद सुधा को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। सुधा अब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं कि उनका एक पैर उनसे अलग हो गया है। यहाँ तक कि वो व्हील-चेअर पर भी बैठने के लिए तैयार नहीं हुईं और सामान्य रूप से चलने-फिरने की हर संभव कोशिशें करने लगीं। ऐम्प्युटेशन के 6 महीने बाद सुधा ने एक मैगज़ीन में ’रमन मैगससे अवार्ड’ विजेता, जयपुर के डॉ. सेठी के बारे में पढ़ा जो कृत्रिम अंग विशेषज्ञ थे। उनसे बात करने के बाद सुधा में फिर से आत्मविश्वास के अंकुर फूटने लगे, उन्हें आभास होने लगा कि शायद वो फिर से नृत्य कर सकती हैं। डॉ. सेठी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और उनके नृत्य के लिए प्रयोग करने लायक एक कृत्रिम पैर की रचना की। 28 जनवरी 1984 को सुधा चन्द्रन् ने बम्बई में एक स्टेज शो किया जो बेहद सफल रहा और रातों रात सुधा एक स्टार बन गईं। उस नृत्य प्रदर्शन को देखने वालों में निर्माता रामोजी राव भी थे जिन्होंने सुधा के जीवन की कहानी को लेकर एक फ़िल्म बनाने का निर्णय भी ले लिया। ’मयूरी’ नामक इस तेलुगू फ़िल्म में नायिका की भूमिका सुधा चन्द्रन् ने ही निभाई और इसके लिए राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह से ’सिल्वर लोटस’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। 1986 में इस फ़िल्म को हिन्दी में ’नाचे मयूरी’ के नाम से बनाया गया और इसमें भी सुधा चन्द्रन् ही नज़र आईं। फिर इसके बाद सुधा चन्द्रन् ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। फ़िल्मों और नृत्य मंचों के अलावा सुधा चन्द्रन् छोटे परदे पर भी बेहद कामयाब रहीं। सुधा चन्द्रन् के जीवन की कहानी को पढ़ने के बाद उन्हें झुक कर सलाम करने को जी चाहता है। ज़िन्दगी ने उन्हें हताश करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी, पर उन्होंने ज़िन्दगी को ही जैसे जीना सिखा दिया, और ज़िन्दगी ख़ुद उनसे जैसे कह रही हो कि सुधा, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!! 

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



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