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Monday, May 13, 2013

चुलबुले गीतों का चुटीला अंदाज़ खनक रहा है नए दौर की जवानी दीवानी में

प्लेबैक वाणी -45 - संगीत समीक्षा - ये जवानी है दीवानी


हमारे फिल्मकारों की राय में जवानी हमेशा से ही दीवानी रही है, फिर चाहे ज़माना राज कपूर का हो, ऋषि कपूर का या फिर आज के रणबीर कपूर का, जवानी की दीवानगी में मोहब्बत की नादानियाँ फ़िल्मी परदे पर दर्शकों को लुभाती रहीं हैं. निर्देशक आयन मुखर्जी की नयी पेशकश ये जवानी है दीवानी में संगीत है प्रीतम का और गीतकार हैं अमिताभ भट्टाचार्य. बर्फी की आपार सफलता के बाद प्रीतम और रणबीर का संगम क्या नया गुल खिला रहा है, आईये देखें फिल्म की एल्बम को सुनकर.

पहला गीत बदतमीज़ दिल एक रैप गीत है, रेट्रो अंदाज़ का. इस पे भूत कोई चढा है ठहराना जाने न....गीत की इन पंक्तियों की ही तरह ये गीत भी कहीं रुकता हुआ प्रतीत नहीं होता. एक सांस में इसे गाया है बेनी दयाल ने और उनके साथ है शेफाली अल्वारिस, पर गीत पूरी तरह बेनी का कहा जाना चाहिए. तेज रिदम और चुटकीले शब्द गीत को मजेदार बनाते हैं. पर कहीं न कहीं कुछ कमी से खलती है शायद नयेपन की, जो गीत पूरी तरह दिल को छू नहीं पाता.

अगला गीत बालम पिचकारी की शुरुआत बहुत दिलचस्प अंदाज़ में देसी ठाठ से होती है. ये एक होली गीत है जैसा कि नाम से ही जाहिर है. मस्त नशीला ये गीत विशेषकर अमिताभ के चुलबुले शब्दों की वजह से भी श्रोताओं को खूब पसंद आना चाहिए. ढोलक की थाप कदम थिरकाने वाली हैं. विशाल ददलानी और श्यामली खोलगडे की आवाज़ में ये शरारती गीत आने वाली होली में सबकी जुबाँ पे चढ सकता है.

दो नटखट अंदाज़ के गीतों के बाद एल्बम का तीसरा गीत इलाही एक बेहद अलहदा मिजाज़ का है. गिटार की सुरीली तान पर मोहित की आवाज़ जादू सी उतरती है, बड़ा ही दिलचस्प गीत है ये और सफर में निकले किसी मुसाफिर के लिए तो जैसे एकदम सटीक है. फिल्म के तेज ताल वाले गीतों से परे इस गीत की एक अलग ही पहचान है. प्रीतम और अमिताभ की ये जुगलबंदी जबरदस्त रही है.

कबीरा गीत के दो मुक्तलिफ़ संस्करण हैं. रेखा भारद्वाज की रेतीली आवाज़ के साथ तोचि रैना की बेस भरी आवाज़ अच्छा आकर्षण पैदा करती है. ऑंखें बंद करके सुनिए इस गीत को तो बड़े ही शानदार विजुअल जेहन में उभरते हैं. इस थीम पर कोई गीत बहुत दिनों बाद किसी एल्बम में सुनाई दिया है (याद कीजिये फकीर चल चला चल और एक रास्ता है जिंदगी आदि). दूसरा संस्करण अधिक भारतीय है, कह सकते हैं, जिसमें हर्षदीप के लोक स्वरों को अरिजीत सिंह की आवाज़ का सुन्दर साथ मिलता है. बस यहाँ किरदारों के चेहरे बदल गए हैं. दोनों ही संस्करण अपनी अपनी खास पहचान बनाने कामियाब हैं. अमिताभ के शब्द एक बार फिर प्रभावी रहे हैं. अरिजीत की आवाज़ में आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा है.

अरिजीत और सुनिधि की आवाज़ में दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड गीत फिर से तेज रिदम का है, पर ऊपर बताये गीतों को सुनने के बाद ये गीत प्रीतम के चिरपरिचित अंदाज़ का सा लगता है. बस इतना कहेंगें की बुरा नहीं है ये गीत भी और डिस्को शादियों में जम कर बज सकता है.

सुभान अल्लाह एक प्रीतम मार्का रोमांटिक गीत है श्रीराम की आवाज़ में. सुन्दर और सुरीला भी है ये गीत मगर एक बार फिर हमें प्रीतम के इमरान हाश्मी सरीखे प्रेम गीतों की बरबस की याद आ जाती है. लंबे समय तक ये गीत श्रोताओं को याद रहेगा ऐसा होना मुश्किल ही है.

अंतिम गीत घाघरा रेखा भारद्वाज और विशाल ददलानी का गाया नौटंकी सरीखा है. देसी कलेवर के इस गीत में हारमोनियम के स्वरों का गजब इस्तेमाल है. गीत के अंतरे बहुत खूबसूरत बुने गए हैं (कहीं कहीं अनजाना के वो कौन है गीत की याद आती है पर फिर भी कानों को बेहद सुरीला लगता है). एक और हिट चार्टबस्टर की तमाम खूबियां है इस गीत में.

ये जवानी...एल्बम एक चुटकीली पेशकश है जिसमें प्रीतम ने अपने सभी चिर परिचित रंगों के साथ साथ कुछ बेहद नए जलवे भी समेटे हैं. अमिताभ के शब्द एल्बम की जान हैं, गायकों का चुनाव भी उत्तम है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है एल्बम को ४ की रेटिंग ५ में से.    


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Sunday, March 3, 2013

26/11 की दर्दनाक यादो को मधुर और भावपूर्ण संगीत का मरहम

प्लेबैक वाणी -36 - संगीत समीक्षा - The Attacks of 26/11


राम गोपाल वर्मा की फिल्मों का अपने दर्शकों के साथ धूप छांव का रिश्ता रहा है, या तो उनकी फ़िल्में ताबड तोड़ व्यवसाय करेंगीं या फिर बॉक्स ऑफिस पर औधें मुँह गिर पड़ेंगीं. पर मज़े की बात ये है कि कोई भी कभी भी RGV को सस्ते में लेने की जुर्रत नहीं कर सकता. ‘नॉट अ लव स्टोरी’ से अपनी फॉर्म में वापस आये RGV अब लाये हैं एक ऐसी फिल्म जिस पर मुझे यकीन है हर किसी की नज़र रहेगी, क्योंकि ये फिल्म एक ऐसे कुख्यात आतंकी हमले का बयान है जिसने देश के हर बाशिंदे को हिलाकर रख दिया था और जिससे हर भारतीय की भावनाएं बेहद गहरे रूप में जुडी हुई है. यूँ तो RGV की फिल्मों में गीतों की बहुत अधिक गुन्जायिश नहीं रहती और अमूमन RGV उन्हें एक व्यावसायिक मजबूरी समझ कर ही अपने स्क्रिप्ट का हिस्सा बनाते हैं, पर चूँकि ये फिल्म एक महत्वपूर्ण फिल्म है इसके संगीत की चर्चा भी लाजमी हो जाती है, तो चलिए आज आपसे बांटे कि कैसा है THE ATTACKS OF 26/11 का संगीत.

एल्बम की शुरुआत एक नौ मिनट लंबी ग़ज़ल के साथ होता है – हमें रंजों गम से फुर्सत न कभी थी न है न होगी. मधुश्री की सुरीली आवाज़ में आरंभिक आलाप पर नाना पाटेकर की सशक्त मगर भावपूर्ण आवाज़ का असर जादूई है और ये जादू अगले नौ मिनट तक बरकरार रहता है. हर मिसरे को पहले नाना की आवाज़ का आधार मिलता है जिसके बाद मधुश्री उसे अपने अंदाज़ में दोहराती है. ग़ज़लों का वापस फिल्मों में आना एक सुखद संकेत है. शब्द संगीत और अदायगी हर बात खूबसूरत है इस नगमें की. इसे लूप में लगाकर आप बार बार सुने बिना आप नहीं रह पायेंगें.

अगला गीत तेज बेस गिटार से खुलता है. मौला मौला देवा देवा फिल्म में तेज रफ़्तार एक्शन को सशक्त पार्श्व प्रदान करेगा. सुखविंदर की दमदार आवाज़ और कोरस का सुन्दर इस्तेमाल गीत को एक तांडव गीत में तब्दील कर देते हैं. रोशन दलाल का संगीत संयोजन जबरदस्त है, और कलगी टक्कर के शब्द सटीक.

जसप्रीत जैज की आवाज़ में ‘आतंकी आये’ आज के दौर का गीत है. हर दौर के संगीत में उस दौर की झलक हम देख सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ए मेरे वतन के लोगों में आप भारत चीन युद्ध के कड़वाहट को महसूस कर पायेंगें, आतंकी आये में आप आज के दौर का खौफ जी पायेंगें. अभी हाल में प्रकाशित एल्बम ‘बीट ऑफ इंडियन यूथ’ में भी एक गीत है मानव बम्ब जो इसी गीत की तरह इस दौर की घातक सच्चाईयों का बयान है, याद रहे जब ऐसे गीत रचे जाते हैं तो रचेताओं के आगे कोई पूर्व सन्दर्भ नहीं होता, जाहिर है नई ज़मीन खोदने के ये प्रयास सराहनीय हैं.

अगला गीत ‘खून खराबा तबाही’ में सूरज जगन की आवाज़ है. सूरज जगन के अब तक के अधिकतर गीत हार्ड रोक्क् किस्म के रहें हैं, पर ये कुछ अलग है. उस खूंखार आतंकी हमले के परिणामों पर कुछ स्वाभाविक सवाल हैं गीत में. पूछ रहा है वो खुदा क्या सच में है ये इंसान....इस एक पंक्ति में गीत का सार है.


रघुपति राघव राजाराम का जिक्र आते ही आपके जेहन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चेहरा उभर कर आता है और गांधी जी के जिक्र के साथ आता है अहिंसा का सिद्धांत. पर ये आतंकी इन सिद्धांतों से कोसों दूर नज़र आते हैं. इस भजन को बहुत ही सुन्दर रूप में इस्तेमाल किया है संगीतकार विशाल और सुशील खोसला ने. भजन का एक और संस्करण भी है जो उतना ही दमदार है.

फिल्म के साउंड ट्रेक को सुनकर इसे देखने की ललक और बढ़ जाती है. एल्बम में हमें रंजों गम से जैसी खूबसूरत ग़ज़ल है तो मौला मौला, आतंकी आये और रघुपति राघव जैसे कुछ अच्छे प्रयोग भी है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ३.९ की रेटिंग.     

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Monday, January 21, 2013

सुधीर मिश्रा निर्देशित इनकार के अच्छे संगीत का इकरार

प्लेबैक वाणी -30 -संगीत समीक्षा - इनकार  



सुधीर मिश्रा गंभीर फिल्म निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, उनकी ताज़ा पेशकश भी एक अलग विषय पर केंद्रित है. जहाँ तक संगीत का ताल्लुक है स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा उनके साथ बहुत सी फिल्मों में संगत बिठा चुके हैं. स्वानंद २०१२ के हमारे सर्वश्रेष्ठ गीतकार रहे हैं एक गैर फ़िल्मी एल्बम सत्यमेव जयते के गीत ओ री चिरैया गीत के लिए. जहाँ तक फ़िल्मी गीतों का सवाल है वहाँ भी स्वानंद बर्फी के शीर्षक गीत को लिखकर श्रोताओं का दिल जीतने में कामियाब रहे थे. आईये देखें वर्ष २०१३ में अपने पसंदीदा संगीतकार शांतनु के साथ उनकी नई कोशिश क्या रंग लेकर आई है.
पहले गीत दरमियाँ को हम किसी खास श्रेणी में नहीं रख सकते, बल्कि ये जोनर है स्वानंद जेनर, जिसमें आप बावरा मन और खोये खोये चाँद की तलाश में जैसे गीत सुने चुके हैं. गीतकारी का ये अंदाज़ नीरज सरीखा है, शब्द एक बार फिर बेहद दिलचस्प हैं जो पूरे गीत में श्रोताओं को बांधे रखते हैं. पूरी तरह से स्वानंद का ये गीत एल्बम को एक शानदार शुरुआत देता है.
अगले गीत में फिर स्वानंद की आवाज़ है मगर इस बार उन्हें साथ मिला है खुद शांतनु का. मौला तू मालिक है शब्द और संगीत के लिहाज से एक सूफियाना कव्वाली जैसा है. एक बार फिर धीमे धीमे असर करता ये गीत अच्छे संगीत के कद्रदानों को अवश्य पसंद आना चाहिए.
अग्नि बैंड के, के. मोहन अपनी आवाज़ से एक खास पहचान बना चुके हैं. स्वानंद के शब्द एक बार फिर कारगर हैं. लेकिन यहाँ शांतनु ने भी अपनी मौजूदगी सशक्त रूप में दर्शाई है. पूरी तरह से रौक अंदाज़ का ये गीत बार बार सुने जाने लायक है. शहरी जीवन की दौड भाग और सपनों को पाने कि अंधी दौड में शामिल हम सभी को ऐसे गीत बेहद करीब से छू जाते हैं.
सूरज जगन की गायकी में अब हमारे संगीतकारों को एक अच्छा हार्ड रोंक गायक नसीब हो गया है. पर अभी भारतीय श्रोता हार्ड रौक जैसे जोनर के लिए कितना तैयार हैं ये कहना ज़रा मुश्किल है. सूरज के गाये पिछले गीतों को मिली कम शोहरत इस बात को लेकर संशय खड़ा करते हैं. कुछ भी हो सकता है गीत मीडिया के बढते क़दमों और सब कुछ चलता है जैसे आधुनिक सोच को दर्शाता है अपने शब्दों के माध्यम से. हालाँकि इस गीत को अपेक्षित श्रोता मिल पायेंगें, ये कहना मुश्किल है.
इनकार थीम में उभरती हुई प्रतिभाशाली गायिका मोनाली ठाकुर की आवाज़ भी है. एक अच्छा पीस जिसे शांत बैठकर आराम से सुना जा सकता है, वोइलिन के स्वरों से टकराती मोनाली की उत्तेजना भरी आवाज़ बेहद सुखद लगती है. कुल मिलाकर इनकार एक अच्छा सरप्राईस है श्रोताओं के लिए जिसे स्वानंद और शांतनु ने मिलकर यादगार बनाया है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है एल्बम को ३.८ की रेटिंग.                   



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Monday, January 14, 2013

विशाल और गुलज़ार की जोड़ी है पूरे धूम में

प्लेबैक वाणी -29 -संगीत समीक्षामटरू की बिजली का मंडोला 



कहने की जरुरत नहीं कि जब भी गुलज़ार और विशाल एक साथ आते हैं, संगीत प्रेमियों की तो लॉटरी सी लग जाती है. इस बार ये साथ आये हैं मटरू की बिजली का मंडोला लेकर. अब जब नाम ही इतना अनूठा हो तो संगीत से उम्मीद क्यों न हों, तो चलिए देखते हैं माचिस से सात खून माफ तक लगातार उत्कृष्ट संगीत देने वाली इस जोड़ी की पोटली में अब नया क्या है...

एल्बम खुलता है शीर्षक गीत से, जिसके साथ एक लंबे समय बाद गायक सुखविंदर की वापसी हुई है. संगीत संयोजक रंजीत बारोट ने भी उनका साथ दिया है, पर ये गीत पूरी तरह सुखविंदर का ही है. रिदम जबरदस्त है और धुन इतनी सरल है कि सुनते ही जेहन में बस जाता है. गुलज़ार ऐसे गीतों में भी अपने शब्दों को खास अंदाज़ से पेश करने में माहिर हैं. गीत मास और क्लास दोनों को प्रभावित करने में सक्षम है.

अगला गीत खामखाँ यूँ तो एक प्रेम गीत है. जिसकी धुन बेहद मधुर है. संगीत संयोजन सरल और सुरीला है और विशाल की आवाज़ गीत पर पूरी तरह से दुरुस्त भी. कोई और संगीतकार होते तो शायद इस गीत को एक सरल प्रेम गीत ही बनाये रखते मगर विशाल ने गीत के दूसरे हिस्से में प्रेम देहाती के स्वर का इस्तेमाल किया है हरियाणवी लोक गीत अंदाज़ में जिसके आते ही गीत का मूड कुछ और देसी हो जाता है और अंत में एक शानदार फ्यूशन एफ्रो स्टाइल का. वाह क्या गीत है...साल की शुरुआत में ही इतना शानदार गीत सुनकर मन बाग बाग हो गया.

विशाल अपनी गायिका पत्नी रेखा भारद्वाज की आवाज़ को बहुत खूब पहचानते हैं यही वजह है कि वो सात खून माफ में रेखा से डार्लिंग भी गवाते हैं और येशु भी. प्रस्तुत एल्बम में भी जहाँ रेखा का बिंदास रूप दिखता है ओए बॉय चार्ली में तो वहीँ उनकी आवाज़ में बादल उठायो भी है. ओए बॉय की बात करें तो ये एक मस्त डांस नंबर है. जहाँ शंकर महादेवन ने जानलेवा रूप अख्तियार किया है, बंटी और बबली के कजरारे के बाद उनका ये रूप देखना सुखद लगा, साथ में मोहित चौहान भी हैं.

बादल उठायो में तो रेखा ने कमाल ही कर दिया है. शब्द हरियाणवी लहजे के हैं मगर रेखा कहाँ पीछे रहने वाली थी. उसपर संगीत संयोजन भी उत्कृष्ट है. एल्बम का एक और यादगार गीत.

लूटने वाले गीत एक बगावत का गीत है जहाँ किसान क्रूर जमींदारों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. यहाँ सुखविंदर के साथ हैं मास्टर सलीम, जिनकी आवाज़ का फ्लेवर एकदम अनूठा ही है. गुलज़ार साहब के शब्दों में उफान भी है और बागी तेवर भी. लंबे समय तक याद रखे जाने वाला गीत.

इन गीतों के अलावा एल्बम में पंकज कपूर, इमरान खान और प्रेम देहाती की आवाजों में कुछ हरियाणवी लोक अंदाज़ के मिसरे हैं जिनमें भरपूर छेड़छाड़ है, कुछ रागणीयां भी है जो फिल्म के देसी कलेवर को और सुदृढ़ता देते हैं.

संगीत प्रेमियों के लिए नए साल का तोहफा है मटरू की बिजिली का मंडोला. इस एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४.१ की रेटिंग.                   



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Monday, January 7, 2013

लिएंडर पेस की राजधानी एक्सप्रेस का संगीत

प्लेबैक वाणी -28 -संगीत समीक्षा - राजधानी एक्सप्रेस


दोस्तों नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ आप सभी को. वर्ष २०१२ की ही तरह २०१३ भी हम सब के लिए कुछ नया अनुसुना संगीत अनुभव लेकर आये इसी उम्मीद के साथ हम साल की पहली समीक्षा की तरफ बढते हैं. यूँ तो साल के पहले सप्ताह में ही बहुत सी दिलचस्प फ़िल्में प्रदर्शन को तैयार है पर हमें लगा कि इस पहले सप्ताह में हमें ‘राजधानी एक्सप्रेस’ की बातें करनी चाहिए, वजह है इस एल्बम के गायकों में उदित नारायण, शान और सुरेश वाडकर की आवाजों का होना और उससे भी बढ़कर गीतकारों की फेहरिस्त में मिर्ज़ा ग़ालिब की मौजूदगी, आज के दौर में अगर किसी फिल्म में ग़ालिब की ग़ज़ल हो तो उस एल्बम का जिक्र वाजिब बनता है. राजधानी एक्सप्रेस के प्रमुख संगीतकार हैं रितेश नलिनी मगर ग़ालिब की गज़ल के पाश्चात्य संस्करण के लिए आमंत्रित हुए है संगीतकार लाहु माधव भी. तो चलिए जानें इस एल्बम में क्या कुछ है श्रोताओं के लिए. 


‘कोई उम्मीद बर् नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती...’ ग़ालिब साहब की इस मशहूर ग़ज़ल को एल्बम में दो संस्करण मिले हैं, एक पाश्चात्य और एक पारंपरिक. पहले संस्करण को गाया है हितेश प्रसाद ने जबकि दूसरे को आवाज़ मिली है शाहिद माल्या की. धुन बेहद मधुर है और दोनों गायकों ने अपने अपने संस्करण के साथ न्याय किया है. पाश्चात्य संस्करण विशेष रूप से सराहनीय है. जिसमें वाध्यों को बेहद खूबसूरती के साथ मिक्स किया गया है. बाँसुरी का प्रयोग बेस गिटार के साथ खूब जमता है. काश कि ये गीत कुछ छोटा होता. ग़ज़ल के लगभग सभी मिसरे इस्तेमाल कर लिए गए हैं, जिससे गीत की लम्बाई १० मिनट की हो गयी है. इतना लंबा होने के कारण इसे बार सुना जाना उबाऊ हो सकता है. फिर भी एल्बम कवर में ग़ालिब का नाम सुखद लगता है. 
अगला गीत एक प्रार्थना है ‘मैं हूँ पतित...’. एक प्रयोगात्मक गीत जो पूरी तरह से कोरस स्वरों में है. ऐसे गीतों में धुन से अधिक तरजीह शब्दों को दी जाती है. और शब्द यहाँ इतने प्रबल नहीं है कि लंबे समय तक इसे याद रखा जाए.
यही हाल सुरेश वाडकर की आवाज़ से सजे गीत ‘तेरा जिक्र’ का भी है. आप श्रोताओं को पुराने दौर में लेकर जाईये मगर कलेवर अगर नया नहीं होगा तो ऐसे गीतों को श्रोता मिल पायेंगें, संशय है. 
शान के गाये ‘आरमान जगाती है’ में गीतकार रमीज़ ने थोड़ी बहुत अच्छी कोशिश की है, मगर गीत तभी अच्छे लगते हैं जब उसमें कुछ आश्चर्य चकित करने वाले तत्व हों. शान की मखमली आवाज़ के असर के बावजूद भी ये गीत फीका ही लगता है.

उदित नारायण के स्वर में ‘करते हैं दिल से’ ९० के दशक का गीत लगता है. न ही शब्दों में न ही संयोजन में कुछ नयापन मिलता है. हाँ धुन अवश्य मधुर है. पर लंबे समय बाद उदित नारायण लौटे हैं मगर गीत में उनके लिए कुछ खास करने को नहीं था.


कुल मिलाकर ‘राजधानी एक्सप्रेस’ एक एल्बम के रूप में निराश ही करती है. ‘कोई उम्मीद’ ही एकमात्र राहत है, मगर अपनी लम्बाई के चलते ये भी श्रोताओं को रिझा पायेगा, ऐसा लगता नहीं. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को १.६ की रेटिंग.                 



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Monday, October 8, 2012

अमित और स्वानंद ने रचा कुछ अलग "इंग्लिश विन्गलिश" के लिए


प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा : इंग्लिश विन्गलिश 

१५ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद खूबसूरती की जिन्दा मिसाल और अभिनय के आकाश का माहताब, श्रीदेवी एक बार फिर लौट रहीं है फ़िल्मी परदे पर एक ऐसे किरदार को लेकर जो अपनी अंग्रेजी को बेहतर करने के लिए संघर्षरत है. फिल्म है इंग्लिश विन्गलिश. आईये चर्चा करें फिल्म के संगीत की. अल्बम के संगीतकार हैं आज के दौर के पंचम अमित त्रिवेदी और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे.

पहला गीत जो फिल्म का शीर्षक गीत भी है पूरी तरह इंग्लिश विन्गलिश अंदाज़ में ही लिखा गया है. गीत के शुरूआती नोट्स को सुनते ही आप को अंदाजा लग जाता है अमित त्रिवेदी ट्रेडमार्क का. कोरस और वोइलन के माध्यम से किसी कोल्लेज का माहौल रचा गया है. स्वानंद ने गीत में बेहद सुंदरता से हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों के साथ खेला है. गीत की सबसे बड़ी खासियत है शिल्पा राव की आवाज़,जिसमें किरदार की सहमी सहमी खुशी और कुछ नया जानने का आश्चर्य बहुत खूब झलकता है. पुरुष गायक के लिए अमित स्वयं की जगह किसी और गायक की आवाज़ का इस्तेमाल करते तो शायद और बेहतर हो पाता.    

अगले गीत में अमित की आवाज़ लाजवाब आई है. धक् धुक एक ऐसे अवस्था का बयां है जिसमें किरदार किसी अपने से दूर जाने के भय से ग्रस्त है. बंगाल के मिटटी की खुश्बू से सने इस गीत की धुन बहुत ही मधुर है. स्वानंद ने शब्दों से पूरे चित्र को बखूबी तराशा है....क्यों न हमें टोके...क्यों न हमें रोके... जैसी पक्तियों को अमित ने बेहद दिल से गाया भी है.

श्रीदेवी की आवाज़ में कुछ संवादों से अगला गीत खुलता है जो मैनहैंटन शहर को समर्पित है. क्लिटंन और बियांका गोमस की आवाजों में ये गीत दिलचस्प है पर कोई लंबी छाप नहीं छोड़ता, हालाँकि बांसुरी का प्रयोग खूबसूरत है.

अगला गीत है गुस्ताख दिल, कम से कम वाध्यों से सुन्दर संयोजन है अमित का और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी भी है. शिल्पा की गहरी और दिल में उतरती आवाज़ गीत को एक अलग मुकाम दे देती है. दिल की गुस्ताखियों को शब्दों में उभरा है स्वानंद ने, हालाँकि इस विषय पर हजारों गीत बन चुके हैं पर स्वनादं ने कुछ अलग तरीके से बात को रखने की कोशिश जरूर की है.    

महाराष्ट्र के विवाहों में गाये जाने वाले लोक गीतों की झलक है अंतिम गीत नवराई माझी में. मस्ती भरे इस गीत में सुनिधि की आवाज़ है और उनका साथ दिया है खुद गीतकार स्वानंद ने और माताजी नीलाम्बरी किरकिरे ने. स्वानंद और उनकी माताजी की आवाज़ गीत में एक सुखद रस घोल देती है....

इंग्लिश विन्गलिश का संगीत ठहराव भरा और मेलोडियस है, रेडियो प्लेबैक इसे दे रहा है ४.१ की रेटिंग....अपनी राय आप बताएँ...


संगीत समीक्षा - इंग्लिश विन्गलिश by f100000740246953
एक सवाल  क्या आपको कोई ऐसा पुराना गीत याद आता है जिसमें गायक एक ऐसे किरदार के लिए गा रहा हो जो किसी नयी भाषा को सीखना की कोशिश कर रहा हो....सोचिये और बताईये हमें टिप्पणियों के माध्यम से.

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