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Saturday, November 11, 2017

चित्रकथा - 44: फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें

अंक - 44

फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें


"आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक..." 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

मिर्ज़ा ग़ालिब की लोकप्रियता जितनी है शायद और किसी शायर की नहीं। हिन्दी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में भी ग़ालिब हर दौर में आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे। आज ’चित्रकथा' में हम चर्चा करने जा रहे हैं उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों की जो या तो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें हैं या फिर जिनमें ग़ालिब की ग़ज़लों या शेरों का असर है।



27 दिसंबर 1797 को जन्मे मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग़ ख़ान ’ग़ालिब’ मुग़ल साम्राज्य के आख़िर के बरसों के जानेमाने उर्दू और फ़ारसी के शायर थे। ’असद’ और ’ग़ालिब’ के तख़ल्लुस से उन्होंने लिखा तथा ’दाबिर-उल-मुल्क’ और ’नज्म-उद-दौला’ जैसी उपाधि उन्हें बतौर इज़्ज़त दी गई। मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें इतनी मशहूर हुईं कि उस ज़माने से लेकर आज तक न जाने कितने गुलाकारों ने इन्हें गाया है और न जाने कब तक गाते रहेंगे। आज ग़ालिब केवल भारत और पाक़िस्तान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ज़िन्दा हैं। ग़ालिब शायद एक अकेले ऐसे मुग़ल कालीन अदबी शायर हैं जिनकी ग़ज़लों ने हिन्दी फ़िल्मों में भी अपना असर छोड़ा है। ऐसी ही ग़ज़लों पर एक नज़र अब हम डालने जा रहे हैं। 1931 में 'इम्पीरियल मूवीटोन' ने पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ का निर्माण कर इतिहास रच दिया था। इसी कम्पनी की 1931 की एक और फ़िल्म थी 'अनंग सेना' जिसमें मास्टर विट्ठल, ज़ोहरा, ज़िल्लो, एलिज़र, हाडी, जगदीश और बमन ईरानी ने काम किया। फ़िल्म में अनंग सेना की भूमिका में ज़ोहरा और सुनन्दन की भूमिका में हाडी ने अभिनय व गायन किया। फ़िल्म में दो ग़ालिब की ग़ज़लें शामिल थीं – “दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है” और “दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं”। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें बोलती फ़िल्मों के पहले साल ही फ़िल्मों में प्रवेश कर गईं थीं। हाडी अभिनेता और गायक होने के साथ साथ एक संगीतकार भी थे और ग़ालिब की इन ग़ज़लों को उन्होंने ही कम्पोज़ किया था। 1943 की 'बसन्त पिक्चर्स' की फ़िल्म ‘हण्टरवाली की बेटी’ में छन्नालाल नाइक का संगीत था, इस फ़िल्म में ख़ान मस्ताना ने ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “दिले नादां तुझे हुआ क्या है” को गाया जिसे ख़ूब मक़बूलियत मिली थी। हाल ही में 2015 की फ़िल्म ’हवाईज़ादा’ में आयुष्मान खुराना ने इसी ग़ज़ल को एक बड़े ही आधुनिक अंदाज़ में गाया जिसे कम्पोज़ भी उन्होंने ही किया। इसी का एक रिप्राइज़ वर्ज़न भी है जिसे आयुष्मान और श्वेता सुब्रम ने गाया है और इसमें मूल ग़ज़ल पर अतिरिक्त बोल लिखे हैं विभु पुरी ने। दोनों संस्करण सॉफ़्ट रॉक शैली में निबद्ध है। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़ल का रॉक के साथ फ़्युज़न एक बड़ा ही अनोखा और नया प्रयोग रहा।

जद्दनबाई ने 1935 में ‘संगीत फ़िल्म्स’ की स्थापना कर अपनी बेटी नरगिस (बेबी रानी) को 'तलाश-ए-हक़’ में लॉन्च किया था। 1936 में इस बैनर तले दो फ़िल्में आईं - ‘हृदय मंथन’ और ‘मैडम फ़ैशन’। जद्दनबाई निर्मित, निर्देशित, अभिनीत और स्वरबद्ध ‘हृदय मंथन’ में उन्हीं के गाये तमाम गीतों में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यों” को भी शामिल किया गया था। इसी ग़ज़ल को 1940 में फिर एक बार फ़िल्म-संगीत में जगह मिली जब कलकत्ता के ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया’ की फ़िल्म ‘क़ैदी’ में संगीतकार भीष्मदेव चटर्जी ने इसे फिर एक बार कम्पोज़ किया। बल्कि इस फ़िल्म में ग़ालिब की दो ग़ज़लों शामिल हुईं; दूसरी ग़ज़ल थी “रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो, हमसुखन कोई न हो और हमज़बां कोई न हो”। संगीतकार रामचन्द्र पाल के भतीजे सूर्यकान्त पाल ने भी अपने चाचा की तरह फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में क़दम रखते हुए एस. के. पाल नाम से संगीतकार बने और पहली बार 1942 में ‘शालीमार पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘एक रात’ में संगीत दिया। इस फ़िल्म की अभिनेत्री नीना गाने में कमज़ोर थीं, और उनका पार्श्वगायन ताराबाई उर्फ़ सितारा (कानपुर) ने किया। पर रेकॉर्ड पर नीना का ही नाम छपा था। ‘हमराज़’ के ‘गीत कोश’ में भी नीना का ही नाम दिया गया है। कुछ गीत राजकुमारी ने भी गाए। ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं” को इस फ़िल्म के लिए नीना (सितारा) ने गाया था। 

ग़ालिब की मशूर ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने” कई बार फ़िल्मों में सुनाई दी है। संगीतकार बी. आर. देवधर ने पहली बार 1933 की फ़िल्म 'ज़हर-ए-इश्क़' के लिए इसे कम्पोज़ किया था। मज़ेदार बात यह है कि इसी साल, यानी 1933 में फ़िल्म ‘यहूदी की लड़की’ में 'न्यु थिएटर्स' में संगीतकार पंकज मल्लिक ने इसी ग़ज़ल को कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में रेकॉर्ड किया। राग भीमपलासी में स्वरबद्ध यह ग़ज़ल सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इम्पीरियल के अनुबंधित संगीतकारों में एक नाम अन्नासाहब माइनकर का भी था जिन्होंने 1935 के वर्ष में ‘अनारकली’ और ‘चलता पुतला’ जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था। ‘अनारकली’ में ग़ालिब की इसी ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल” को एक अन्य अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। 1934 की फ़िल्म ‘ख़ाक का पुतला’ में मास्टर मोहम्मद ने ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदबर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुइयाँ है, नींद क्यों रात भर नहीं आती” को कम्पोज़ किया था जिसे अच्छी सराहना मिली थी। 1935 में महबूब ख़ान निर्देशित फ़िल्म ‘जजमेण्ट ऑफ़ अल्लाह’ में संगीतकार प्राणसुख नायक का संगीत था। अन्य गीतों के साथ ग़ालिब की इसी मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदबर नहीं आती” को उन्होंने भी स्वरबद्ध किया था। 1949 की फ़िल्म 'अपना देश' में भी यही ग़ज़ल सुनने को मिली जिसके संगीतकार थे पुरुषोत्तम और गायिका थीं पुष्पा हंस। 1942 की ‘फ़ज़ली ब्रदर्स’ की फ़िल्म ‘चौरंगी’ (अंग्रेज़ी में Chauringhee) में काजी नज़रूल इस्लाम और हनुमान प्रसाद शर्मा संगीतकार थे। हनुमान प्रसाद की यह पहली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के लिए प्रसाद ने इस ग़ज़ल को कम्पोज़ किया था। दशकों बाद 2013 की फ़िल्म ’राजधानी एक्स्प्रेस’ में इसी ग़ज़ल को एक आधुनिक अंदाज़ में पेश किया गया शाहिद माल्या की आवाज़ में। संगीतकार थे लालू माधव। ग़ज़ल के शुरु में ग़ालिब का एक दूसरा शेर कहा है - "काबाँ किस मुंह से जाओगे ग़ालिब, शर्म तुमको मगर नहीं आती"। शाहिद की ताज़ी आवाज़ में "कोई उम्मीद बर नहीं आती" को आज के नौजवानों ने भी ख़ूब पसन्द किया और यह साबित हुआ कि आज की पीढ़ी में भी ग़ालिब ज़िन्दा है।

1941 में ‘फ़ज़ली ब्रदर्स कलकत्ता’ ने मुन्शी मुबारक हुसैन को संगीतकार लेकर फ़िल्म बनाई ‘मासूम’। अन्य गीतों के अलावा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” को इस फ़िल्म के लिए कम्पोज़ किया गया था। 1954 में मिर्ज़ा ग़ालिब पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनी, जिसमें भारत भूषण ने ग़ालिब का रोल अदा किया। साथ में थीं सुरैया। फ़िल्म में संगीत था मास्टर ग़ुलाम मुहम्मद का, और कहने की ज़रूरत नहीं, सभी ग़ज़लें ग़ालिब की लिखी हुई थीं। फ़िल्म में ग़ालिब की इन ग़ज़लों को शामिल किया गया था -

1. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक (सुरैया)
2. दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है (तलत-सुरैया)
3. है बस कि हर एक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत (रफ़ी)
4. इश्क़ मुझको न सही वहशत ही सही (तलत)
5. नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल (सुरैया)
6. फिर मुझे दीद-ए-तर याद आया (तलत)
7. रहिए अब ऐसी जगह चलकर (सुरैया)
8. ये न थी हमारी क़िस्मत (सुरैया)

"ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता", इस ग़ज़ल को उषा मंगेशकर ने शंकर जयकिशन की धुन पर फ़िल्म 'मैं नशे में हूँ' में गाया था। उधर गुलज़ार ने ग़ालिब का एक शेर लिया "दिल ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुरे जाना किए हुए", और इसी को आधार बना कर फ़िल्म 'मौसम' का वह ख़ूबसूरत गीत लिख डाला। नए दौर में ग़ालिब की जिस ग़ज़ल को फ़िल्म में जगह मिली, वह थी "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"। फ़िल्म का नाम भी था 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' जो आई थी साल 2003 में। संगीतकार शान्तनु मोइत्रा ने शुभा मुदगल से इस ग़ज़ल को गवाया था इस फ़िल्म के लिए। ग़ालिब की एक बेहद मशहूर शेर है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है यह वह आतिश ग़ालिब, कि लगाये ना लगे और बुझाये ना बने"। इस शेर का सहारा समय-समय पर फ़िल्मी गीतकारों ने लिया है अपने गीतों को सजाने-सँवारने के लिए। मसलन, 1981 की फ़िल्म ’एक दूजे के लिए’ के मज़ेदार गीत "हम बने तुम बने एक दूजे के लिए" में एक पंक्ति है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं ग़ालिब ने कहा है इसीलिए, उसको क़सम लगे जो बिछड़ के एक पल भी जिये..."। इसके गीतकार थे आनन्द बक्शी। वैसे बक्शी साहब ने इस गीत से 10 साल पहले, 1970 में, फ़िल्म ’इश्क़ पर ज़ोर नहीं’ के शीर्षक गीत में भी इस जुमले का इस्तमाल किया और ख़ूबसूरत गीत बना "सच कहती है दुनिया इसक पे जोर नहीं, यह पक्का धागा है यह कच्ची डोर नहीं, कह दे कोई और है तू मेरा चितचोर नहीं, जो थम जाए वो ये घटा घनघोर नहीं, इस रोग की दुनिया में दवा कुछ और नहीं..."। 1995 की फ़िल्म ’तीन मोती’ में नवाब आरज़ू के कलम से निकले "इश्क़ पे कोई ज़ोर चले ना ना कोई मनमानी, फँस गई मैं तो प्रेम भँवर में अब क्या होगा जानी"। 

ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल है "असूम मोहब्बत का बस इतना फ़साना है, काग़ज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है"। इस ग़ज़ल की अन्तिम शेर है "ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है"। इस आख़िरी शेर पर 1983 में एक फ़िल्म बनी थी ’ये इश्क़ नहीं आसान’ जिसमें ॠषी कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे थे। आनन्द बक्शी ने फ़िल्म का शीर्षक गीत लिखा जो एक क़व्वाली की शक्ल में थी - "ये इश्क़ नहीं आसाँ, ये काम है बस दीवानों का"। इसे महेन्द्र कपूर, सुरेश वाडकर, शब्बीर कुमार और साथियों ने गाया है और संगीतकार हैं लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। उधर 1993 की फ़िल्म ’साहिबाँ’ में बक्शी साहब ने ग़ालिब के उसी शेर की दूसरी लाइन के जुमले को लेकर गीत लिखा "तू क्या प्यार करेगा प्यार मैंने किया, आग के इस दरिया को पार मैंने किया"। 2013 की फ़िल्म ’इस्सक’ में इसी शेर को आधार बना कर गीतकार नीलेश मिश्र ने गीत लिखा था "ये आग का दरिया है, डूब के जाना है"। सचिन-जिगर के संगीत में हार्ड रॉक शैली में कम्पोज़ किया हुआ यह गीत अंकित तिवारी ने गाया था। इसी का एक ’अनप्लग्ड वर्ज़न’ भी है जिसे सचिन-जिगर के सचिन गुप्ता के गाया है। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें हर दौर में फ़िल्मों में आती रही हैं। कुछ तो है इन ग़ज़लों में कि इतने पुराने होते हुए भी आज की पीढ़ी को पसन्द आ रही हैं। दरसल ये कालजयी रचनाएँ हैं जिन पर उम्र का कोई असर नहीं। ग़ालिब ने जैसे लिखा था कि "आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक", ठीक वैसे ही इन ग़ज़लों का असर सदियों तक यूंही बनी रहेगी। 


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, May 19, 2016

जब रफ़ी साहब अपनी आवाज़ के जादू में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल सुनाते हैं

महफ़िल ए कहकशां 5

दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए रफ़ी साहब की दिलकश आवाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल. 


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी





Wednesday, February 15, 2012

"फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया"- और याद आए ग़ालिब उनकी १४४-वीं पुण्यतिथि पर

१५ फ़रवरी १८६९ को मिर्ज़ा ग़ालिब का ७२ साल की उम्र में इन्तकाल हुआ था। करीब १५० साल गुज़र जाने के बाद भी ग़ालिब की ग़ज़लें आज उतनी ही लोकप्रिय और सार्थक हैं जितनी उस ज़माने में हुआ करती थीं। ग़ालिब पर बनी फ़िल्मों और टीवी प्रोग्रामों की चर्चा तथा उनकी एक ग़ज़ल लेकर सुजॉय चटर्जी आज आए हैं 'एक गीत सौ कहानियाँ' की सातवीं कड़ी में...

एक गीत सौ कहानियाँ # 7


अतीत के अदबी शायरों की बात चले तो जो नाम सबसे ज़्यादा चर्चित हुआ है, वह नाम है मिर्ज़ा ग़ालिब का। ग़ालिब की ग़ज़लें केवल ग़ज़लों की महफ़िलों और ग़ैर-फ़िल्मी रेकॉर्डों तक ही सीमित नहीं रही, फ़िल्मों में भी ग़ालिब की ग़ज़लें सर चढ़ कर बोलती रहीं। 'अनंग सेना' (१९३१), 'ज़हर-ए-इश्क़' (१९३३), 'यहूदी की लड़की' (१९३३), 'ख़ाक का पुतला' (१९३४), 'अनारकली' (१९३५), 'जजमेण्ट ऑफ़ अल्लाह' (१९३५), 'हृदय मंथन' (१९३६), 'क़ैदी' (१९४०), 'मासूम' (१९४१), 'एक रात' (१९४२), 'चौरंगी' (१९४२), 'हण्टरवाली की बेटी' (१९४३), 'अपना देश' (१९४९), 'मिर्ज़ा ग़ालिब' (१९५४), 'मैं नशे में हूँ' (१९५९), 'मौसम' (१९७५) और 'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी' (२००३) जैसी फ़िल्मों में ग़ालिब की ग़ज़लें सुनाई दी हैं। यूं तो गा़लिब ने बहुत सारी ग़ज़लें लिखी हैं, पर उनकी कुछ चुनिन्दा ग़ज़लें ही फ़िल्मों में बार-बार सुनाई दी है, जिनमें शामिल हैं “दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है”, “दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं”, “रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो, हमसुखन कोई न हो और हमज़बां कोई न हो”, “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने”, “कोई उम्मीदबर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुइयाँ है, नींद क्यों रात भर नहीं आती”, “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” और "ये न थी हमारे क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता"।

ग़ालिब की ग़ज़लें तो कई-कई बार फ़िल्मों में आईं, पर ख़ुद मिर्ज़ा ग़ालिब पर कितनी फ़िल्में बनी हैं? सिर्फ़ एक। या यूं कहें कि भारत में एक और पाक़िस्तान में एक। भारत में ग़ालिब को श्रद्धांजली देने का बीड़ा उठाया फ़िल्मकार सोहराब मोदी ने। साल था १९५४। मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार में भारत भूषण और चौदवीं की भूमिका में सुरैया नज़र आए। फ़िल्म में संगीत था ग़ुलाम मोहम्मद का। ग़ालिब की तमाम ग़ज़लों के अलावा शक़ील बदायूनी ने भी कुछ नग़में लिखे थे इस फ़िल्म के लिए। फ़िल्म में शामिल थी ग़ालिब की ये ग़ज़लें - "आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक" (सुरैया), "दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है" (तलत-सुरैया), "है बस कि हर एक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत" (रफ़ी), "इश्क़ मुझको न सही वहशत ही सही" (तलत), "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल" (सुरैया), "फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया" (तलत), "रहिए अब ऐसी जगह चलकर" (सुरैया) और "ये न थी हमारी क़िस्मत" (सुरैया)। 'मिर्ज़ा ग़ालिब' फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, इस मौक़े को याद करते हुए सुरैया ने विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कहा था, "ज़िंदगी में कुछ मौक़े ऐसे आते हैं जिनपर इन्सान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िंदगी में भी एक मौक़ा ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट'स्‍ अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ जहाँ हमने पण्डित नेहरू के साथ बैठकर यह फ़िल्म देखी थी। पण्डित नेहरू हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली न समाती"

पाकिस्तानी सिनेमा ने भी इस अज़ीम शायर को श्रद्धांजली स्वरूप एक फ़िल्म का निर्माण किया १९६१ में 'ग़ालिब' शीर्षक से। एस.के. पिक्चर्स के बैनर तले इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया था एम.एम.बिल्लू मेहरा (कुछ जगहों पर सैयद अताउल्लाह शाह का नाम दिया गया है) ने। फ़िल्म में संगीत था तस्सदुक़ हुसैन का, और ग़ालिब की ग़ज़लों के अतिरिक्त फ़िल्म के अन्य गीत लिखे तनवीर नक़वी ने। क्योंकि भारत में सुरैया चौदवीं का किरदार निभा चुकी थीं, इसलिए इस फ़िल्म के लिए भी किसी ऐसी अदाकारा को चुनना ज़रूरी था जो सुरैया के उस अभिनय, गायन और ख़ूबसूरती को टक्कर दे सके। इसलिए १९६१ की 'ग़ालिब' के लिए चुना गया नूरजहाँ को जो १९४७ में पाक़िस्तान चली गई थीं। और ग़ालिब के चरित्र में नज़र आए पाक़िस्तानी सुपरस्टार सुधीर। २४ नवंबर १९६१ के दिन प्रदर्शित हुई यह फ़िल्म। "ये न थी हमारी क़िस्मत" (नूरजहाँ, सलीम रज़ा), "तस्कीन को हम न रोये" (नूरजहाँ, नजमा नियाज़ी), "मुद्दत हुई है यार को" (नूरजहाँ), “दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त" (नूरजहाँ), "दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है" (नूरजहाँ), "कभी नेकी भी उसके जी में गर" (नूरजहाँ), "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल" (नूरजहाँ), "कोई उम्मीद बर नहीं आती" (नूरजहाँ), "है बस कि हर एक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत" (नूरजहाँ) इन ग़ज़लों को इस फ़िल्म में जगह दी गई थी। 'मिर्ज़ा ग़ालिब' (१९५४) और 'ग़ालिब' (१९६१), ये दोनों ही फ़िल्में बॉक्स-ऑफ़िस पर ऐवरेज चलीं, पर इनका संगीत बहुत लोकप्रिय हुआ, और आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं, सरहद के दोनों तरफ़।

पाक़िस्तानी सरकार नें १९६९ में ख़ालिक़ इब्राहिम को नियुक्त किया था ग़ालिब पर एक वृत्तचित्र बनाने के लिए। फ़िल्म तो १९७१-७२ में पूरी कर ली गई। इस फ़िल्म में शामिल तथ्य इतिहास की दृष्टि से सही थे, पर पाक़िस्तानी सरकार के नज़रिये से नहीं। इसलिए इस फ़िल्म को मुक्ति नहीं मिली और आज यह फ़िल्म पाक़िस्तान सरकार के 'डिपार्टमेण्ट ऑफ़ फ़िल्म्स ऐण्ड पब्लिकेशन' के संग्रहालय में पड़ी हुई है। 16mm फ़ॉरमैट पर बनी इस फ़िल्म में ग़ालिब का किरदार निभाया था सुभानी बयूनुस ने, जिन्होंने बाद में कई टीवी प्रोडक्शनों में इसी किरदार को निभाया। १९८८ में गुलज़ार नें 'मिर्ज़ा ग़ालिब' शीर्षक से दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक बनाई, जो बहुत ज़्यादा कामयाब रही। ग़ालिब का चरित्र निभाया मंझे हुए अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने, और ग़ालिब की ग़ज़लों को आवाज़ें दी जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने। एक ऐल्बम के रूप में भी इन ग़ज़लों को जारी किया गया था जो बहुत सराहा गया। ग़ालिब के ग़ज़लों के ऐल्बम्स की बात चली है तो इस श्रेणी में उल्लेखनीय ऐल्बम है 'लता सिंग्स ग़ालिब', जिसमें ग़ालिब की ग़ज़लों को हृदयनाथ मंगेशकर ने कम्पोज़ किया और लता से गवाया। HMV की तरफ़ से जारी हुआ था यह रेकॉर्ड १९६९ में। इस ऐल्बम में अन्य तमाम ग़ज़लों के अलावा दो ग़ज़लें ऐसी थीं जो १९५४ और १९६१ की फ़िल्मों में भी शामिल थी। ये थीं "फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया" और "कोई उम्मीद बर नहीं आती"।

आज "फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया" की चर्चा करते हैं। ग़ज़ल में कुल ६ शेर हैं, पर 'मिर्ज़ा ग़ालिब' फ़िल्म में तलत की आवाज़ में केवल ४ ही शेर रेकॉर्ड किए गए थे। मूल ग़ज़ल के सभी शेर, उनके अंग्रेज़ी अनुवाद, और कुछ वज़नदार शब्दों के अर्थ ये रहे...

"फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल, जिगर तिश्ना-ए-फ़रयाद आया।


Again I remember my moist eye
Again I wish to complain and cry

दम लिया था न क़यामत ने हनोज़,
फिर तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया।


The doom's day was hardly over
Once again the time of your departure, I remember

ज़िंदगी यूं भी गुज़र जाती,
क्यों तेरा रहगुज़र याद आया।


Life would have passed in any case, then why
Did I remember the road you went by

फिर तेरे कूचे को जाता है ख़याल,
दिल-ए-गुमगश्ता, मगर, याद आया।


Again to her street doth the mind wander
But the heart lost there, I remember

कोई वीरानी सी वीरानी है,
दश्त को देख के घर याद आया।


What desolation doth, O God, here fall
As I see the forest, my home I recall

मैंने मजनूं पे लड़कपन में 'असद',
संग उठाया था, कि सर याद आया।


For Majnu's head (in my boyhood) 'Asad' as I lifted a stone
I instanttly remembered my own.

इस ग़ज़ल के कुछ वज़नदार शब्दों के अर्थ ये रहे...

दीदा-ए-तर --- Tearful eyes
तिश्ना-ए-फ़रयाद --- Desperate to appeal
क़यामत --- The ultimate suffering
दश्त --- Wilderness
असद --- Mirza Ghalib's earlier 'Takhallus' i.e. Pen Name
संग --- Stone


इस ग़ज़ल को कुंदनलाल सहगल, बेगम अख़्तर, मेहदी हसन, और लता मंगेशकर जैसी किंगवदन्तियों ने समय समय पर गाये हैं। पर आज सुनिये तलत महमूद की आवाज़ में १९५४ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की इस ग़ज़ल को नीचे दिए गए प्लेयर पर क्लिक करके...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Saturday, December 24, 2011

फ़िल्म संगीत में ग़ालिब की ग़ज़लें - एक अवलोकन

'ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, फ़िल्म-संगीत में ग़ज़लों का चलन शुरु से ही रहा है। गीतकारों नें तो फ़िल्मी सिचुएशनों के लिए ग़ज़लें लिखी ही हैं, पर कई बार पुराने अदबी शायरों की ग़ज़लें भी फ़िल्मों में समय-समय पर आती रही हैं, और इन शायरों में जो नाम सबसे उपर आता है, वह है मिर्ज़ा ग़ालिब। ग़ालिब की ग़ज़लें सबसे ज़्यादा सुनाई दी हैं फ़िल्मों में। आइए आज इस लेख के माध्यम से यह जानने की कोशिश करें कि ग़ालिब की किन ग़ज़लों को हिन्दी फ़िल्मों नें गले लगाया है। पेश-ए-ख़िदमत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेषांक' की ७३-वीं कड़ी।

Wednesday, February 9, 2011

नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने...ग़ालिब का कलाम और सुर्रैया की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 589/2010/289

"आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक"। मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर के बाद हम सुरैया के लिये भी यही कह सकते हैं कि उनकी गायकी, उनके अभिनय में वो जादू था कि जिसका असर एक उम्र नहीं, बल्कि कई कई उम्र तक होता रहेगा। 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा', सिंगिंग् स्टार सुरैया को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस लघु शृंखला की आज नवी कड़ी में सुनिए १९५४ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की एक अन्य ग़ज़ल "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये ना बने"। ग़ालिब के इन ग़ज़लों को सुरों में ढाला था संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद ने। इस फ़िल्म का निर्देशन सोहराब मोदी ने किया था। ग़ालिब की ज़िंदगी पर आधारित इस फ़िल्म को बहुत तारीफ़ें नसीब हुए। ग़ालिब की भूमिका में नज़र आये थे भारत भूषण और सुरैया बनीं थीं चौधवीं, उनकी प्रेमिका, जो एक वेश्या थीं। फ़िल्म के अन्य कलाकारों में शामिल थे निगार सुल्ताना, दुर्गा खोटे, मुराद, मुकरी, उल्हास, कुमकुम और इफ़्तेखार। इस फ़िल्म को १९५५ में राष्ट्रीय पुरस्कार के तहत स्वर्ण-कमल से पुरस्कृत किया गया था। सोहराब मोदी और संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे। फ़िल्मफ़ेयर में रुसी के. बंकर को सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए पुरस्कृत किया गया था। १९५४ में सुरैया की बाकी फ़िल्में आयीं 'वारिस', 'शमा परवाना' और 'बिलवामंगल'। इसके बाद सुरैया ने जिन फ़िल्मों में काम किया उनकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है:
१९५५ - ईनाम
१९५६ - मिस्टर लम्बू
१९५८ - तक़दीर, ट्रॊली ड्राइवर, मालिक
१९६१ - शमा
१९६३ - रुस्तोम सोहराब
१९६४ में सुरैया ने फ़िल्म 'शगुन' का निर्माण किया, १९६५ में फ़िल्म 'दो दिल' में केवल गीत गाये, और यही उनकी अंतिम फ़िल्म थी। उसके बाद सुरैया ने अपने आप को इस फ़िल्म जगत से किनारा कर लिया और गुमनामी में रहने लगीं। वो ना किसी सार्वजनिक जल्से में जातीं, ना ही ज़्यादा लोगों से मिलती जुलतीं। उनके इस पड़ाव का हाल आपको हम कल की कड़ी में बताएँगे।

सुरैया को फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में अभिनय करने का गर्व था। जब वो विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में तशरीफ़ लायी थीं, उन्होंने आज की इस प्रस्तुत ग़ज़ल को पेश करते हुए कुछ इस तरह से कहा था - "ज़िंदगी में कुछ मौके ऐसे आते हैं जिनपे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िंदगी में भी एक मौका ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ, जहाँ हमने पंडित नेहरु के साथ बैठकर यह फ़िल्म देखी थी। पंडित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली ना समाती। इस वक़्त पंडितजी की याद के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश करती हूँ, नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये ना बने।"



क्या आप जानते हैं...
कि सुरैया ने कोई बसियत नहीं बनवाई थी, इसलिए उनकी मृत्यु के तुरंत बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनकी जायदाद सील कर दी और दावेदार के लिए अर्ज़ी आमंत्रित की।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
भाई ये तो हम कहीं पहुँचते हुए नज़र नहीं आ रहे...मुकाबला एकदम बराबरी का है....आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी है...देखते हैं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, January 12, 2011

इसी को प्यार कहते हैं.. प्यार की परिभाषा जानने के लिए चलिए हम शरण लेते हैं हसरत जयपुरी और हुसैन बंधुओं की

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०८

ग़ज़लों की दुनिया में ग़ालिब का सानी कौन होगा! कोई नहीं! है ना? फिर आप उसे क्या कहेंगे जिसके एक शेर पर ग़ालिब ने अपना सारा का सारा दीवान लुटाने की बात कह दी थी.. "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता।" इस शेर की कीमत आँकी नहीं जा सकती, क्योंकि इसे खरीदने वाला खुद बिकने को तैयार था। आपको पता न हो तो बता दूँ कि यह शेर उस्ताद मोमिन खाँ ’मोमिन’ का है। अब बात करते हैं उस शायर की, जिसने इस शेर पर अपना रंग डालकर एक रोमांटिक गाने में तब्दील कर दिया। न सिर्फ़ इसे तब्दील किया, बल्कि इस गाने में ऐसे शब्द डाले, जो उससे पहले उर्दू की किसी भी ग़ज़ल या नज़्म में नज़र नहीं आए थे - "शाह-ए-खुबां" (इस शब्द-युग्म का प्रयोग मैंने भी अपने एक गाने "हुस्न-ए-इलाही" में कर लिया है) एवं "जान-ए-जानाना"। दर-असल ये शायर ऐसे प्रयोगों के लिए "विख्यात"/"कुख्यात" थे। इनके गानों में ऐसे शब्द अमूमन हीं दिख जाते थे, जो या तो इनके हीं गढे होते थे या फिर न के बराबर प्रचलित। फिर भी इनके गानों की प्रसिद्धि कुछ कम न थी। इन्हें यूँ हीं "रोमांटिक गानों" का बादशाह नहीं कहा जाता। बस इनसे यही शिकायत रही थी कि ये नामी-गिरामी और किवदंती बन चुके शायरों के शेरों को तोड़-मरोड़कर अपने गानों में डालते थे (जैसा कि इन्होंने "मोमिन" के शेर के साथ किया), जबकि दूसरे गीतकार उन शेरों को जस-का-तस गानों में रखते थे/हैं और इस तरह से उन शायरों को श्रद्धांजलि देते थे/हैं। मेरे हिसाब से "गुलज़ार" ने सबसे ज्यादा अपने गानों में "ग़ालिब", "मीर", "जिगर" एवं "बुल्ले शाह" की रचनाओं का इस्तेमाल किया है, लेकिन उन शायरों के लिखे एक भी हर्फ़ में हेर-फेर नहीं किया, इसलिए कोई भी सुधि श्रोता/पाठक इनसे नाराज़ नहीं होता। हमारे आज के शायर ने यही एक गलती कर दी है... इसलिए मुमकिन है कि जब भी ऐसी कोई बात उठेगी तो ऊँगली इनकी तरफ़ खुद-ब-खुद हीं उठ जाएगी। खैर छोड़िये... हम भी कहाँ आ गए! हमें तो अपने इस रोमांटिक शायर से बहुत कुछ सुनना है, बहुत कुछ सीखना है और इनके बारे में बहुत कुछ जानना भी है।

बहुत देर से हम "इस" और "ये" के माया-जाल में फँसे थे, तो इस जाल से बाहर निकलते हुए, हम यह बता दें कि जिनकी बात यहाँ की जा रही है, वे और कोई नहीं राज कपूर साहब के चहेते जनाब "हसरत जयपुरी" हैं। ये क्या थे.... चलिए यह जानने के लिए हम कुछ चिट्ठों को खंगाल मारते हैं (साभार: लाईव हिन्दुस्तान, सुरयात्रा, पत्रिका, ड्रीम्स एवं कविताकोश)

१५ अप्रैल, १९१८ को जन्मे हसरत जयपुरी का मूल नाम इकबाल हुसैन था। उन्होंने जयपुर में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद अपने दादा फिदा हुसैन से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की। बीस वर्ष का होने तक उनका झुकाव शेरो-शायरी की तरफ होने लगा और वह छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे। वर्ष १९४० मे नौकरी की तलाश में हसरत जयपुरी ने मुंबई का रुख किया और आजीविका चलाने के लिए वहां बस कंडक्टर के रुप में नौकरी करने लगे। इस काम के लिए उन्हे मात्र ११ रुपये प्रति माह वेतन मिला करता था। इस बीच उन्होंने मुशायरा के कार्यक्रम में भाग लेना शुरू किया। ऐसे हीं एक मुशायरे मे उन्होंने मजदूरों के बीच अपनी कविता "मजदूर की लाश" पढ़ी, जिसे पृथ्वीराज कपूर ने भी सुना। उनकी काबिलियत से प्रभावित होकर वे उन्हें पृथ्वी थिएटर ले आए और राज कपूर से मिलने की सलाह दी। राज कपूर ने उनकी कविता "मैं बाजारों की नटखट रानी" सुनकर अपनी दूसरी फिल्म "बरसात" के गीत लिखने का ऑफर दे दिया। १५० रूपए माहवार पर उनकी नौकरी पक्की हो गई। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फिल्म बरसात से ही संगीतकार शंकर जयकिशन ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी।

राजकपूर के कहने पर शंकर जयकिशन ने हसरत जयपुरी को एक धुन सुनाई और उसपर उनसे गीत लिखने को कहा। धुन के बोल कुछ इस प्रकार थे- "अंबुआ का पेड़ है वहीं मुंडेर है आजा मेरे बालमा काहे की देर है" शंकर जयकिशन की इस धुन को सुनकर हसरत जयपुरी ने गीत लिखा "जिया बेकरार है छाई बहार है आजा मेरे बालमा तेरा इंतजार है"। वर्ष १९४९ में प्रदर्शित फिल्म बरसात में अपने इस गीम की कामयाबी के बाद हसरत जयपुरी रातोंरात बतौर गीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की कामयाबी के बाद राजकपूर, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की जोड़ी ने कई फिल्मों मे एक साथ काम किया। इनमें आवारा, श्री 420, चोरी चोरी, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, तीसरी कसम, दीवाना, एराउंड द वर्ल्ड, मेरा नाम जोकर, कल आज और कल जैसी फिल्में शामिल है। यह जोड़ी १९७१ तक अनेक फिल्मो में साथ काम करती रही, "मेरा नाम जोकर " के फेल होने और जयकिशन के निधन होने के बाद राज कपूर ने इस टीम को छोड़ दिया और अपनी नयी टीम आनंद बक्षी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ बना ली, लेकिन अपनी फ़िल्म "राम तेरी गंगा मैली" में हसरत को वापस ले आये, जहाँ हसरत ने "सुन साहिबा सुन" लिखा, लेकिन राज कपूर की मौत के बाद हसरत का फिल्मी सफ़र थम सा गया था, फिर भी वे कुछ संगीतकारों के साथ काम करते रहे।

हसरत जयपुरी को दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष १९६६ में फिल्म सूरज के गीत बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है के लिए दिया गया। वर्ष १९७१ मे फिल्म अंदाज में जिंदगी एक सफर है सुहाना गीत के लिए भी वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। हसरत जयपुरी वर्ल्ड यूनिवर्सिटी टेबुल के डाक्ट्रेट अवार्ड और उर्दू कान्फ्रेंस में जोश मलीहाबादी अवार्ड से भी सम्मानित किए गए। फिल्म मेरे हुजूर में हिन्दी और ब्रज भाषा में रचित गीत झनक झनक तोरी बाजे पायलिया के लिए वह अम्बेडकर अवार्ड से सम्मानित किए गए।

अपने गीतों से कई वर्षों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार १७ सिंतबर, १९९९ को संगीतप्रेमियों को रोता और तनहा छोड़कर चला गया।

इन जानकारियों के बाद आज की नज़्म की ओर रुख करें.. उससे पहले बड़ी हीं मज़ेदार बात आपसे बाँटने का जी कर रहा है। २८ जुलाई, २००९ को सुजॉय जी ने अपने "ओल्ड इज गोल्ड" पर हमें एक गीत सुनाया था "ये मेरा प्रेम-पत्र पढकर" और उस आलेख में लिखा था कि "हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा!" और इतना कहते-कहते सुजॉय जी रूक गए थे। तो दर-असल बात ये है कि "हसरत" साहब ने यह गीत अपने महबूबा के लिए हीं लिखा था। यह रही पूरी कहानी: लगभग बीस साल की उम्र में उनका राधा नाम की हिन्दू लड़की से प्रेम हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने प्यार का इजहार नहीं किया। उन्होंने पत्र के माध्यम से अपने प्यार का इजहार करना चाहा, लेकिन उसे देने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाए। वह लड़की उनकी प्रेरणा बन गई और उसी को कल्पना बनाकर वे जीवनभर शायरी करते रहे। बाद में राजकपूर ने उस पत्र में लिखी कविता 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना...' का इस्तेमाल अपनी फिल्म संगम के लिए किया। नाकाम एकतरफ़ा प्रेम क्या-क्या न करवा देता है.. कोई हम जैसों से पूछे!! चलिए इसी बहाने एक शायर तो मिला हमें!

हमने एक बार जब "मुहम्मद हुसैन" और "अहमद हुसैन" यानि कि "हुसैन बंधुओं" की ग़ज़ल आप सबको सुनवाई थी तो लिखा था कि इनका हसरत जयपुरी से बड़ा हीं गहरा नाता है। आज उसी नाते के कारण हम आज की यह नज़्म लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं। "हुसैन बंधुओं" ने इस "रोमांटिक"-से नज़्म को किस कशिश से गाया है, इसका अंदाजा बिना सुने नहीं लगाया जा सकता। इसलिए आईये हम और आप डूब जाते हैं "प्यार के इस सागर" में और जानते हैं कि "प्यार कहते किसे हैं":

नज़र मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

जबाँ ख़ामोश है लेकिन निग़ाहें बात करती हैं
अदाएँ लाख भी रोको अदाएँ बात करती हैं।
नज़र नीची किए दाँतों में ____ को दबाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

छुपाने से मेरी जानम कहीं क्या प्यार छुपता है
ये ऐसा मुश्क है ख़ुशबू हमेशा देता रहता है।
तुम तो सब जानती हो फिर भी क्यों मुझको सताती हो?
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे प्यार का ऐसे हमें इज़हार मिलता है
हमारा नाम सुनते ही तुम्हारा रंग खिलता है
और फिर साज़-ए-दिल पे तुम हमारे गीत गाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे घर में जब आऊँ तो छुप जाती हो परदे में
मुझे जब देख ना पाओ तो घबराती हो परदे में
ख़ुद ही चिलमन उठा कर फिर इशारों से बुलाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मोह-जाल" और मिसरे कुछ यूँ थे-

वर्त्तमान के मोह-जाल में,
आने वाला कल न भुलाएँ।

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

निश्छल, निष्कपट भावना हो
स्नेह से हो हर मन सुरभित
उलझे ना कोई भी मोहजाल में
उल्लास से हो हर मन कुंजित - शन्नो जी

जान लिखकर लगा दिए चार चाँद ,
सृजन कराता लिखने का मोह जाल . - मंजु जी

मोह-जाल का जाल न मोह सके
जीवन को सच का प्राण मिले - अवनींद्र जी

शुभ रेखांकित सप्त पदी से,
सरस नेत्र ने थामी अंगुल,
लिये हाथ में हाथ सदी से,
नव निर्मित बादामी अंगुल.
किंचित सरस नेत्र शरमाया,
मधुर मोह जाल यह पाया,
अधर पहन कर अधरों पर,
भरती लजीली हामी अंगुल
. - पूजा जी (पूरी कविता हीं पेश कर रहा हूँ क्योंकि मुझे यह रचना बेहद पसंद आई.. पूजा जी, आपने सारी शिकायतें पल में हीं दूर कर दीं)

पिछली महफ़िल की शान बनीं "शन्नो जी"। आपने "मोह-जाल" पर इतनी सारी पंक्तियाँ पेश कीं कि हम भी आपके मोह-जाल में फँस गए। अपना यह प्यार ऐसे हीं बनाए रखियेगा। शन्नो जी के बाद महफ़िल का हिस्सा बने अवध जी। हाँ, मोह-जाल शब्द थोड़ा अलग तरह का है, इसलिए इस पर शेर या दोहा लिखना आसान नहीं, लेकिन यह क्या, आप दुबारा आने का वादा करके मुकर गए, आए हीं नहीं.. ऐसे नहीं चलेगा :) इसकी सज़ा यह है कि आप आज की महफ़िल के कम से कम चार चक्कार लगाएँ। सही है ना? अगली बारी थी मंजु जी की। मंजु जी ने छुट्टियाँ का मोह-जाल समेटे हुए नए वर्ष में कदम रखा और हमें भी नए वर्ष की बधाईयाँ दी। आपका स्वागत है! नीलम जी, हम आपकी भी पंक्तियाँ इस महफ़िल में शामिल करते, लेकिन आपसे एक गलती हो गई। आपने "मोह-जाल" को एक शब्द की तरह नहीं रखा, बल्कि इसे "मोह का कोई जाल" बना दिया। आगे से ध्यान रखियेगा। पिछली महफ़िल में जिन दो फ़नकारों ने चार चाँद लगाए, वे हैं "अवनींद्र" जी एवं "पूजा" जी। मैं चाहता तो था कि अवनींद्र जी की भी कविता अपनी टिप्पणी में डालूँ, लेकिन वह बहुत बड़ी है, इसलिए उनका बस "ज़िक्र" हीं कर पा रहा हूँ, जहाँ तक पूजा जी की बात है तो आपने हमारा दिल जीत लिया। और क्या कहूँ! :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, October 20, 2010

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में.. मादर-ए-वतन से दूर होने के ज़फ़र के दर्द को हबीब की आवाज़ ने कुछ यूँ उभारा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०१

पूरे एक महीने की छुट्टी के बाद मैं वापस आ गया हूँ महफ़िल-ए-ग़ज़ल की अगली कड़ी लेकर। यह छुट्टी वैसे तो एक हफ़्ते की हीं होनी थी, लेकिन कुछ ज्यादा हीं लंबी खींच गई। दर-असल मेरे साथ वही हुआ जो इन महाशय के साथ हुआ था जिन्होंने "कल करे सो आज कर" का नवीनीकरण किया है कुछ इस तरह से:

आज करे सो कल कर, कल करे सो परसो,
इतनी जल्दी क्या है भाई, जीना है अभी बरसों।

तो आप समझ गए ना? हर बुधवार को मैं यही सोचता था कि भाई पूरे सौ अंकों के बाद जाकर मुझे आराम करने का यह मौका नसीब हुआ है, तो इसे ज़ाया क्यों गंवाया जाए, चलो आज भी महफ़िल से नदारद हो लेता हूँ। यही सोचते-सोचते ४ हफ़्ते निकल गए। फिर जब इस बार बुधवार नजदीक आया तो विश्राम करने के विचार के साथ-साथ अपराध-बोध भी अपना सर उठाने लगा। अपराधबोध का मंतव्य था कि भाई तुमने तो सभी पाठकों से यह वादा किया था कि एक हफ़्ते में वापस आ जाओगे, फिर ये वादाखिलाफ़ी क्यों? अपराधबोध कम होता, अगर मेरे सामने सुजॉय जी का उदाहरण न होता। एक मैं हूँ जो सप्ताह में एक आलेख लिखता हूँ और अभी तक उन आलेखों की संख्या १०० तक हीं पहुँची है और एक ये हुज़ूर हैं जो हरदिन लिखते हैं और अभी तक ५०० कड़ियाँ लिख चुके हैं, फिर भी अगर इन्हें छुट्टी पर घर जाना होता है तो पहले से हीं उतने आलेख लिखकर सजीव जी को थमा जाते हैं, ताकि "ओल्ड इज गोल्ड" सटीक समय पर हर दिन आए, ताकि नियम की अवहेलना न हो पाए। ये तो कभी आराम नहीं करते, फिर मैं क्यों आराम के पीछे भाग रहा हूँ। चाचा नेहरू भी कह गए हैं कि आराम हराम है। इस अपराधबोध का आना था कि मैने विश्राम करने के प्रबलतम विचार को एक एंड़ी मारी और बढ निकला आज की कड़ी की ओर। तो चलिए आज से आपकी महफ़िल-ए-ग़ज़ल फिर से सजने वाली है.. हर बुधवार, बिना रूके...वैसे हीं मज़ेदार अंदाज़ में।

आज की महफ़िल में हम जो ग़ज़ल लेकर हाज़िर हैं, उस ग़ज़ल का ज़िक्र हमने आज से पूरे ९ महीने पहले "गजरा बना के ले आ... एक मखमली नज़्म के बहाने अफ़शां और हबीब की जुगलबंदी" शीर्षक से प्रकाशित आलेख में किया था। "गजरा बना के.." को जिस गुलुकार ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया था, वही गुलुकार, वही फ़नकार आज की ग़ज़ल में अपनी आवाज़ के जरिये मौजूद है। बस फ़र्क इतना है कि उस ग़ज़ल/नज़्म के ग़ज़लगो और आज के ग़ज़लगो दो मुक्तलिफ़ इंसान हैं। उस कड़ी में हमने कहा तो यह था कि हबीब साहब जल्द हीं ग़ालिब की एक ग़ज़ल के साथ हाज़िर हो रहे हैं.. लेकिन सच ये है कि हम जिस ग़ज़ल की बात कर रहे थे, वह ग़ालिब की नहीं है, बल्कि मुगलिया सल्तनत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की है। हमने जल्दबाजी में ज़फ़र की ग़ज़ल ग़ालिब के हवाले कर दी थी.. हम उस गलती के लिए आपसे अभी माफ़ी माँगते हैं।

ये तो सभी जानते हैं कि १८५७ के गदर के वक़्त ज़फ़र ने अपने किले बागियों के लिए खोल दिए थे। इस गुस्ताखी की उन्हें यह सज़ा मिली की उनके दो बेटों और एक पोते को मौत के घाट उतार दिया गया.. बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया। अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। ८२ साल के उस बूढे पर उस वक़्त क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा लगाना भी नामुमकिन है। क्या ये कम था कि अंग्रेजों ने ज़फ़र को कैद करके दिल्ली से बाहर .. दिल्ली हीं नहीं उनकी सरज़मीं हिन्दुस्तान के बाहर बर्मा(आज का मयन्मार) भेज दिया.. कालापानी के तौर पर। ज़फ़र अपनी मौत के अंतिम दिन तक अपनी सरज़मों को वापस आने के लिए तड़पते रहे। उन्हें अपनी मौत का कोई गिला न था, उन्हें गिला..उन्हें अफसोस तो इस बात का था कि मरने के बाद जो मिट्टी उनके सीने पर डाली जायगी, वह मिट्टी पराई होगी। वे अपने कू-ए-यार में, अपने मादर-ए-वतन की गोद में दफ़न होना चाहते थे, लेकिन ऐसा न हुआ। बर्मा की गुमनाम गलियों में घुट-घुटकर मरने के बाद उन्हीं अजनबी पौधों और परिंदों के बीच सुपूर्द-ए-खाक होना उनके नसीब में था। ७ नवंबर १८६२ को उनकी मौत के बाद उन्हें वहीं रंगून (आज का यंगुन) में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफ़ना दिया गया। वह जगह बहादुर शाह ज़फ़र दरगाह के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। शायद ज़फ़र को अपनी मौत का पूर्वाभास हो चुका था, तभी तो इस ग़ज़ल के एक-एक हर्फ़ में उनका दर्द मुखर होकर हमारे सामने आता है:

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो _____ में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में


यह ग़ज़ल पढने वक़्त जितना असर करती है, उससे हज़ार गुणा असर तब होता है, जब इसे हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में सुना जाए। तो लीजिए पेश है हबीब साहब की यह पेशकश:


हाँ तो बात ज़फ़र की हो रही थी, तो आज भी हमारे हिन्दुस्तान में ऐसे कई सारे मुहिम चल रहे हैं, जिनके माध्यम से ज़फ़र की आखिरी मिट्टी, ज़फ़र के कब्र को हिन्दुस्तान लाए जाने के लिए सरकार पर दबाव डाला जा रहा है। हम भी यही दुआ करते हैं कि सरकार जगे और उसे इस बात का बोध हो कि स्वतंत्रता-सेनानियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। आज़ादी की लड़ाई में आगे रहने वाले धुरंधरों और रणबांकुरों को इस तरह से नज़र-अंदाज़ किया जाना सही नहीं।

ज़फ़र उस वक़्त के शायर हैं जब ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन जैसे शायर अपनी काबिलियत से सबके बीच लोहा मनवा रहे थे। ऐसे में भी ज़फ़र ने अपनी खासी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की। (और क्यों न करते, जब ये तीनों शायर इन्हीं के राज-दरबार में बैठकर अपनी शायरी सुनाया करते थे.. जब ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और ज़ौक़ की असमय मौत के बाद ग़ालिब ज़फ़र के साहबजादे के उस्ताद बने) ज़फ़र किस हद तक शेर कह जाते थे, यह जानने के लिए उनकी इस ग़ज़ल पर नज़र दौड़ाना जरूरी हो जाता है:

या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता

ख़ाकसारी के लिये गरचे बनाया था मुझे
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ न बनाया होता

नशा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने
क्यों ख़िरद्मन्द बनाया न बनाया होता

शोला-ए-हुस्न चमन् में न दिखाया उस ने
वरना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

रोज़-ए-ममूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता


चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "अनमोल" और शेर कुछ यूँ था-

याद थे मुझको जो पैगाम-ए-जुबानी की तरह,
मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

रिश्तों के पुल
मिलाते रहे
स्वार्थ के तटों को
और
अनमोल भावना की
नदी
बहती रही
नीचे से होकर
अछूती सी !! (अवनींद्र जी)

आँसू आँखों में छिपे होते हैं गम दिखाये नहीं जाते
बड़े अनमोल होते हैं वो लोग जो भुलाये नहीं जाते. (शन्नो जी)

ग़ज़ल की महफ़िल का अनमोल तोहफा तुमने दिया
बधाई हो सौवां अंक जो तुमने पूरा किया (नीलम जी)

अनमोल शतक की दे रही बधाई ,
'विश्व 'ने खुशियों की शहनाई बजाई . (मंजु जी)

बेशक हो मुश्किल भरी वो डगर,
मगर था 'अनमोल' ग़ज़ल का सफर (अवध जी)

जब तक बिके ना थे कोई पूछता ना था,
तूने मुझे खरीद कर अनमोल कर दिया। (अनाम)

चूँकि पिछली महफ़िल में हमने शतक पूरा किया था, इसलिए हमारे सभी शुभचिंतकों और मित्रों से हमें शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं। हम आप सभी का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। पिछली महफ़िल में सबसे पहले शन्नो जी का आना हुआ और आपने हमें हमारी भूल (शब्द गायब न करना) से अवगत कराया। शिकायत करने में काहे की मुश्किल.. आगे से ऐसे कभी भी किंकर्तव्यविमूढ न होईयेगा। समझीं ना? :) आपके बाद सजीव जी ने हमें बधाईयाँ दीं। सजीव जी, सब कुछ तो आपके कारण हीं संभव हो सका है। आपसे प्रोत्साहन पाकर हीं तो मैं महफ़िल-ए-ग़ज़ल की दूसरी पारी लेकर हाज़िर हो पाया हूँ। अवनींद्र जी, आपने महफ़िल की पहली नज़्म कही, लेकिन चूँकि शब्द गायब करने में मुझसे देर हो गई थी, इसलिए "शान-ए-महफ़िल" की पदवी मैं आपको दे नहीं पाऊँगा.. मुझे मुआफ़ कीजिएगा। नीलम जी, आपके बधाई-पत्र की अंतिम पंक्ति (अब क्यों कोई करे कोई शिकवा न गिला) मैं समझ नहीं पाया, ज़रा प्रकाश डालियेगा। :) सुजॉय जी, आप मुझे यूँ लज्जित न कीजिए। आप ५०० एपिसोड तक पहुँच चुके हैं और जिस तरह की आप जानकारियाँ देते हैं, वह अंतर्जाल पर कहीं नहीं है, इसलिए आपका यह कहना कि फिल्मी गानों के बारे में जानकारी लाना आसान होता है.. आपकी बड़प्पन का परिचय देता है। पूजा जी, आपने कुछ दिन विश्राम करने को कहा था और मैंने महिने भर विश्राम कर लिया। आप नाराज़ तो नहीं हैं ना? :) चलिए अब आप फिर से नियमित हो जाईये, क्योंकि मैं भी नियमित होने जा रहा हूँ। मंजु जी और अवध जी, आपके "अनमोल" शब्द मेरी सर-आँखों पर.. प्रतीक जी, क्षमा कीजिएगा मैंने आपकी आग्रह के बावजूद महफ़िल को महिने भर का विराम दे दिया, आगे से ऐसा न होगा। :) सुमित भाई, महफ़िल आ गई फिर से, अब आप भी आ जाईये..

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, September 8, 2010

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए.. पेश-ए-नज़र है अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९९

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं|

अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं|

गए दिन के तन्हा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राज़दाँ और भी हैं|

हमारे यहाँ कुछ शायर ऐसे हुए हैं, जिन्हें हमने उनकी कुछ ग़ज़लों (कभी-कभी तो महज़ एक ग़ज़ल या एक नज़्म) तक हीं बाँधकर रखा है। ऐसे हीं एक शायर हैं, "मोहम्मद इक़बाल"। अभी हमने ऊपर जो शेर पढे, उन शेरों में से कम-से-कम एक शेर तो (पहला शेर हीं) अमूमन हर इंसान की जुबान पर काबिज़ है ,लेकिन ऐसे कितने हैं, जिन्हें इन शेरों के शायर का नाम पता है। हाँ, "इक़बाल" के नाम से सभी वाकिफ़ हैं, लेकिन कितनों की इसकी जानकारी है कि "सितारों के आगे... " कहकर लोगों में आशा की एक नई लहर पैदा करने वाला शायर "इक़बाल" हीं है। हमारे लिए तो इक़बाल बस "सारे जहां से अच्छा" तक हीं सीमित हैं। और यही कारण है कि जब हम बड़े शायरों की गिनती करते हैं तो ग़ालिब के दौर के शायरों को गिनने के बाद सीधे हीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ तक पहुँच जाते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि इन दो दौरों के बीच भी एक शायर हुआ है, जिसने पुरानी शायरी और नई शायरी के बीच एक पुल की तरह काम किया है। मेरे हिसाब से ऐसी गलती या ऐसी अनदेखी बस हिन्दुस्तान में हीं होती है, क्योंकि पाकिस्तान के तो ये क़ौमी शायर (राष्ट्रकवि) हैं और इनके जन्म की सालगिरह पर यानि कि ९ नवंबर को वहाँ सार्वजनिक (राष्ट्रीय) छुट्टी होती है।

मैंने अपने कई लेखों में यह लिखा है कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ग़ालिब के एकमात्र उत्तराधिकारी थे, यह बात शायद सच हो, लेकिन यह भी सच है कि उर्दू भाषा ने ‘ग़ालिब’ के अतिरिक्त अभी तक इक़बाल से बड़ा शायर उत्पन्न नहीं किया। ग़ालिब के उत्तराधिकारी होने वाली बात इसलिए सच हो सकती है क्योंकि इक़बाल पर सबसे ज्यादा प्रभाव मौलाना 'रूमी' का था। हाँ, साथ-हीं-साथ ये ग़ालिब और जर्मन शायर 'गेटे' को भी खूब पढा करते थे, लेकिन ’रूमी’ की बात तो कुछ और हीं थी। इक़बाल की शायरी प्रसिद्धि के मामले में ग़ालिब के आस-पास ठहरती है, ऐसा कईयों का मानना है.. उन्हीं में से एक हैं उर्दू पत्रिका "मख़जन" के भूतपूर्व संपादक "स्वर्गीय शेख अब्दुल कादिर बैरिस्टर-एट-लॉ"। उन्होंने कहा था (साभार: प्रकाश पंडित):

"अगर मैं तनासख़ (आवागमन) का क़ायल होता तो ज़रूर कहता कि ‘ग़ालिब’ को उर्दू और फ़ारसी शायरी से जो इश़्क था उसने उनकी रूह को अदम (परलोक) में भी चैन नहीं लेने दिया और मजबूर किया कि वह फिर किसी इन्सानी जिस्म में पहुँचकर शायरी के चमन की सिंचाई करे; और उसने पंजाब के एक गोशे में, जिसे स्यालकोट कहते हैं, दोबारा जन्म लिया और मोहम्मद इक़बाल नाम पाया।"

इक़बाल के बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए प्रकाश पंडित जी की पुस्तक "इक़बाल और उनकी शायरी" को खंगालते हैं:

सन् १८९९ में इक़बाल ने पंजाब विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। और यही वह ज़माना था जब लाहौर के सीमित क्षेत्र से निकलकर उनकी शायरी की चर्चा पूरे भारत में पहुँची। पत्रिका ‘मख़ज़न’ उन दिनों उर्दू की सर्वोत्तम पत्रिका मानी जाती थी। उसके सम्पादक स्वर्गीय शेख़ अब्दुल क़ादिर ‘अंजुमने-हिमायते-इस्लाम’ के जल्सों में इक़बाल को नज़्में पढ़ते देख चुके थे और देख चुके थे कि इन दर्द-भरी नज़्मों को सुनकर उपस्थिति सज्जनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उन्होंने इक़बाल की नज़्मों को ‘मख़ज़न’ में विशेष स्थान देना शुरू किया। पहली नज़्म ‘हिमालय’/’हिमाला’ के प्रकाशन पर ही, जो अप्रैल १९०१ के अंक में निकली, पूरा उर्दू-जगत् चौंक उठा। सभाओं द्वारा प्रार्थनाएं की जाने लगीं कि उनके वार्षिक सम्मेलनों में वे अपनी नज़्मों के पाठ द्वारा लोगों को लाभान्वित करें। स्वर्गीय अब्दुल क़ादिर के कथनानुसार उन दिनों इक़बाल शे’र कहने पर आते तो एक-एक बैठक में अनगिनत शे’र कह डालते। "मैंने उन दिनों उन्हें कभी काग़ज़-क़लम लेकर शे’र लिखते नहीं देखा। गढ़े-गढ़ाए शब्दों का एक दरिया या चश्मा उबलता मालूम होता था। अपने शे’र सुरीली आवाज़ में, तरन्नुम से (गाकर) पढ़ते थे। स्वयं झूमते थे, औरों को झुमाते थे। यह विचित्र विशेषता है कि मस्तिष्क ऐसा पाया था कि जितने शे’र इस प्रकार ज़बान से निकलते थे, सब-के-सब दूसरे समय और दूसरे दिन उसी क्रम से मस्तिष्क में सुरक्षित होते थे।"

शायरी कैसी हो, इस बारे में इक़बाल का ख्याल था: "अगरचे आर्ट के मुतअ़ल्लिक़ दो नज़रिये (दृष्टिकोण) मौजूद हैं : अव्वल यह कि आर्ट की ग़रज़ (उद्देश्य) महज़ हुस्न (सौंदर्य) का अहसास (अनुभूति) पैदा करना है और दोयम यह है कि आर्ट से ज़िन्दगी को फ़ायदा पहुँचाना चाहिए। मेरा ज़ाती ख़याल यह है कि आर्ट ज़िन्दगी के मातहत है। हर चीज़ को इन्सानी ज़िन्दगी के लिए वक़्त होना चाहिए और इसलिए हर आर्ट जो ज़िन्दगी के लिए मुफ़ीद हो, अच्छा और जाइज़ है। और जो ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ हो, जो इन्सानों की हिम्मतों को पस्त और उनके जज़बाते-आलिया (उच्च भावनाओं) को मुर्दा करने वाला हो, क़ाबिले-नफ़रत है और उसकी तरवीज (प्रसार) हुकूमत की तरफ़ से ममनू (निषिद्ध) क़रार दी जानी चाहिए।" इसी ख्य़ाल के तहत १९०५ तक (जब तक वे उच्च शिक्षा के लिए यूरोप नहीं गए थे) वे देश-प्रेम में डूबी हुई तथा भारत की पराधीनता और दरिद्रता पर खून के आँसू रुलाने वाली नज़्मों की रचना करते रहे। उन्होंने हर किसी के मुख में यह प्रार्थना डाली:

हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत


फिर १९०५ में उनका यूरोप जाना हुआ। वहाँ छोटे-बड़े और काले-गोरे का भेद-भाव देखकर उनके हृदय पर गहरी चोट लगी। अब विशाल अध्ययन तथा विस्तृत निरीक्षण के बाद उनकी क़लम से ऐसे शेर निकलने लगे:

दियारे-मग़रिब के रहनेवालों खुदा की बस्ती दुकां नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो, वो अब ज़रे-कम-अयार होगा
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी
जो शाख़े-नाजुक पे आशियाना बनेगा नापायदार होगा


वे अब प्रगतिशील शायरी की और कूच करने लगे। ये इक़बाल ही थे जिन्होंने सबसे पहले ‘इंक़िलाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और उर्दू शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया। पूँजीपति और मज़दूर, ज़मींदार और किसान, स्वामी और सेवक, शासक और पराधीन की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की उर्दू शायरी में देखते हैं, उन सबपर सबसे पहले इक़बाल ने ही क़लम उठाई थी और यही वे विषय हैं जिनसे उनके बाद की पूरी पीढ़ी प्रभावित हुई और यह प्रभाव राष्ट्रवादी, रोमांसवादी और क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है।

१९०८ में यूरोप से लौटने के बाद वे उर्दू की बजाय फ़ारसी में अधिक लिखने लगे। फ़ारसी इस्तेमाल करने का कारण यह था कि उर्दू भाषा का शब्द-भण्डार फ़ारसी के मुक़ाबले में बहुत कम है। वहीं कुछ लोगों का मत यह है कि अब वे केवल भारत के लिए नहीं, संसार-भर के मुसलमानों के लिए शे’र कहना चाहते थे। कारण कुछ भी हो, वास्तविकता यह है कि फ़ारसी भाषा में शे’र कहने से उनका यश भारत से निकलकर न केवल ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, टर्की और मिश्र तक पहुँचा, बल्कि ‘असरारे-ख़ुदी’ (अहंभाव के रहस्य) पुस्तक की रचना और डॉक्टर निकल्सन के उसके अंग्रेज़ी अनुवाद से तो पूरे यूरोप और अमरीका की नज़रें इस महान भारतीय कवि की ओर उठ गईं। और फिर अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें ‘सर’ की श्रेष्ठ उपाधि प्रदान की।

इक़बाल का जन्म ९ नवंबर १८७७ को स्यालकोट में हुआ था। पुरखे कश्मीरी ब्राह्मण थे जिन्होंने तीन सौ वर्ष पूर्व इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और कश्मीर से निकलकर पंजाब में आ बसे थे। उनके पिता एक अच्छे सूफी संत थे। यह उनके पिता की हीं तालीम थी कि इक़बाल की शायरी में गहरी सोच के दर्शन होते हैं। जैसे कि इन्हीं शेरों को देखिए:

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारे
मैं उसका बन्दा बनूँगा जिसको ख़ुदा के बन्दों से प्यार होगा

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ


इक़बाल के बारे में इतनी जानकारियों के बाद चलिए अब हम आज की ग़ज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की ग़ज़ल को अपनी मखमली आवाज़ से मुकम्मल किया है उस्ताद मेहदी हसन ने। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है "राख" को परीशां करके "दिल" बना देने वाली ग़ज़ल, जो इक़बाल की पुस्तक "बाम-ए-जिब्रील" में दर्ज़ है:

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
जो मुश्किल अब है यारब फिर वोही मुश्किल न बन जाए

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
___ सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

बनाया इश्क़ ने दरिया-ए-ना-पैगा-गराँ मुझको
ये मेरी ख़ुद निगहदारी मेरा साहिल न बन जाए

अरूज़-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
के ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बेगाने" और शेर कुछ यूँ था-

गै़रों की दोस्ती पर क्यों ऐतबार कीजे
ये दुश्मनी करेंगे, बेगाने आदमी हैं

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

चलो अच्छा है अपनों में कोई गैर तो निकला.
अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते. (राजेंद्र कृष्ण)

अगर पाना है सुकून तो कुछ बेगाने तलाश कर
अपनों के यहाँ तो आजकल महफ़िल नहीं होती (अवनींद्र जी)

जब से वे दिल की महफ़िल से रुखसत हुए ,
सारे मोसम अपने अब बेगाने हो गए . (मंजु जी)

अपनों- बेगानों का फ़रक न रहा होता ,
कभी वो नजरें यूं चुरा के न गया होता
जाना ही था तो बता के जाता ,
रास्ता हमने खुद ही दिखा दिया होता (नीलम जी)

जिस की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिस के लिये बदनाम हुए,
आज वही हम से बेगाने-बेगाने से रहते हैं| (हबीब जालिब)

ख्वाबों पे कोई जोर नहीं उनकी मनमानी होती है
बेगाने दिल में बसने की उनसे नादानी होती है. (शन्नो जी)

यूँ तो पिछली महफ़िल के सबसे पहले मेहमान थे "नीरज रोहिल्ला" जी, लेकिन सही शब्द की पहचान कर अवध जी महफ़िल की शान बने। नीरज जी, सच कहूँ तो महफ़िल सजाने से पहले मुझे भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि "ख़ूब परदा है... " वाला शेर "दाग़" का है। मैं बता नहीं सकता कि महफ़िल लिखने का मुझे कितना फायदा हो रहा है। आलेख पसंद करने के लिए आपका और अन्य मित्रों का तह-ए-दिल से आभार। अवध जी, ये हाज़िर-गैरहाज़िर होने का खेल कब तक खेलते रहिएगा.. हमारे नियमित पाठक/श्रोता क्यों नहीं बन जाते.. :) अवनींद्र जी, आपके इस स्वरचित शेर के क्या कहने.. इसी तरह हर बार महफ़िल में चार चाँद लगाते रहें। मंजु जी और नीलम जी, हमें अच्छा लगा कि हमारे बहाने आपको भी छुट्टी मिल गई :) लेकिन आगे से ऐसा नहीं होगा.. हम इसका आपको यकीन दिलाते हैं। सजीव जी, महफ़िल जैसी भी बन पड़ी है, सब आपकी दुआओं का हीं असर है.. हमारे लिए यूँ हीं दुआ करते रहिएगा। शन्नो जी, आपको भी जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ, और हाँ ईद, तीज और गणेश-चतुर्थी की शुभकामनाएँ भी लगे हाथों कबूल कीजिए। (बस शन्नो जी हीं क्यों.. ये बधाईयाँ तो हरेक स्वजन के लिए हैं)। आशीष जी, हबीब साहब के शेरों से हमें रूबरू कराने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, September 1, 2010

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं.. ताहिरा सैय्यद ने कुछ यूँ आवाज़ दी दाग़ की दीवानगी और मस्तानगी को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९८

कोई नामो-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना,
तख़ल्लुस 'दाग़' है और आशिकों के दिल में रहते हैं।

"कौन ऐसी तवाएफ़ थी जो ‘दाग़’ की ग़ज़ल बग़ैर महफिल में रंग जमा सके? क्या मुशाअरे, क्या अदबी मजलिसें, क्या आपसी सुहबतें, क्या महफ़िले-रक्स, क्या गली-कूचें, सर्वत्र ‘दाग़’ का हीं रंग ग़ालिब था।" अपनी पुस्तक "शेर-ओ-सुखन: भाग ४" में अयोध्या प्रसाद गोयलीय ने उपरोक्त कथन के द्वारा दाग़ की मक़बूलियत का बेजोड़ नज़ारा पेश किया है। ये आगे लिखते हैं:

मिर्ज़ा ‘दाग़’ को अपने जीवनकाल में जो ख्याति, प्रतिष्ठा और शानो-शौकत प्राप्त हुई, वह किसी बड़े-से-बड़े शाइर को अपनी ज़िन्दगी में मयस्सर न हुई। स्वयं उनके उस्ताद इब्राहिम ‘ज़ौक़’ शाही क़फ़समें पड़े हुए ‘तूतिये-हिन्द’ कहलाते रहे, मगर १०० रू० माहवारी से ज़्यादा का आबो-दाना कभी नहीं पा सके। ख़ुदा-ए-सुख़न ‘मीर’, ‘अमर-शाइर’ ‘गा़लिब’ और ‘आतिश’-जैसे आग्नेय शाइरों को अर्थ-चिन्ता जीवनभर घुनके कीड़े की तरह खाती रही। हकीम ‘मोमिन शैख़’, ‘नासिख़’ अलबत्ता अर्थाभाव से किसी क़द्र निश्चन्त रहे, मगर ‘दाग़’ जैसी फ़राग़त उन्हें भी कहाँ नसीब हुई? जागीर मिलने और उच्च पदवियोंसे विभूषित होनेके अतिरिक्त १५०० रू० मासिक वेतन, राजसी ठाट-बाट और नवाब हैदराबाद के उस्ताद होने का महान् गौरव मिर्जा़ ‘दाग़’ को प्राप्त था। सच मानिए तो १९वीं शताब्दीका अन्तिम युग ‘दाग़’ युग था।

दाग़ की ख्याति का यह आलम था कि उनकी शिष्य मण्डली में सम्मलित होना बहुत बड़ा सौभाग्य एवं गौरव समझा जाता था। हैदराबाद-जैसे सुदूर प्रान्तमें ‘दाग़’ के समीप जो शाइर नहीं रह सकते थे, वे लगभग शिष्य संशोधनार्थ ग़ज़लें भेजते थे। ‘दाग़’ का शिष्य कहलाना ही उन दिनों शाइर होने का बहुत बड़ा प्रमाणपत्र समझा जाता था। मिर्जा दाग़के जन्नत-नशीं होने के बाद एक दर्जन से अधिक शिष्य अपने को ‘जा-नशीने-दाग़’ (गुरुका उत्तराधिकारी शिष्य) लिखने लगे। नवाब ‘साइल’ मिर्जा ‘दाग़’ के दामाद भी थे और शिष्य भी। अतः बहुत बड़ी संख्या उन्हीं को ‘जानशीने-दाग़’ समझती थी। ‘बेखुद’ देहलवी, ‘बेखुद’ बेख़ुद’ बदायूनी, ‘आगा’ शाइर क़िज़िलबाश, ‘अहसन’ मारहरवी’, ‘नूह’ नारवी, भी अपने को ‘जानशीने-दाग़’ लिखने में बहुत अधिक गर्व का अनुभव करते हैं; और किसी कि मजाल नहीं जो उन्हें इस गौरवास्पद शब्द से वंचित कर सके। वास्तविक उत्ताधिकारी कौन है, इस प्रश्न को सुलझाने के लिए वर्षों वाद-विवाद चले है।

कहा जाता है कि दाग़ के २००० से अधिक शागिर्द थे। इन शागिर्दों में दो ऐसे भी शागिर्द रहे हैं, जिन्हें उत्तराधिकारी कहे जाने का कोई शौक़ या कोई जिद्द नहीं थी, लेकिन इन्हीं दोनों ने दाग़ का नाम सबसे ज्यादा रौशन किया है। उनमें से एक थे जिगर मुरादाबादी, जिनके बारे में हम पिछली एक महफ़िल में ज़िक्र कर चुके हैं और दूसरे थे मोहम्मद अल्लामा इक़बाल। इक़बाल अपनी कविताएँ डाक द्वारा ‘दाग़’ देहलवी को संशोधनार्थ भेजा करते थे। महज २२ वर्ष की आयु में हीं इक़बाल ऐसी दुरूस्त गज़लें लिखने लगे थे कि मिर्ज़ा दाग़ को भी उनकी काबिलियत का लोहा मानना पड़ा था। दाग़ ने उनकी रचनाएँ इस टिप्पणी के साथ वापस करनी शुरू कर दीं कि रचनाएँ संशोधन की मोहताज नहीं हैं।

अभी ऊपर हमने दाग़ के सुपूर्द-ए-खाक होने की बातें कीं, लेकिन इससे पहले जो चार दिन की ज़िंदगी होती है या फिर जन्म होता है, उसका ज़िक्र भी तो लाजिमी है। तो दाग़ का जन्म नवाब मिर्ज़ा खान के रूप में २५ मई १८३१ को हुआ था। इन्होंने बस दस वर्ष की अवस्था से ही ग़ज़ल पढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। १८६५ में वे रामपूर चले गए। रामपुर में इनकी मक़बूलियत का हवाला देते हुए हजरत ‘नूह’ नारवी लिखते हैं कि -"मुझसे रामपुर के एक सिन-रसीदा (वयोवृद्ध) साहब ने जिक्र किया कि नवाब कल्ब अली खाँ साहब का मामूल था कि मुशाअरे के वक़्त कुछ लोगों को मुशाअरे के बाहर महज़ इस ख्याल बैठा देते थे कि बाद में ख़त्म मुशाअरा लोग किसका शेर पढ़ते हुए मुशाइरे से बाहर निकलते हैं। चुनाव हमेशा यही होता था कि ‘दाग़’ साहबका शेर पढ़ते हुए लोग अपने-अपने घरोंको जाते थे।" २४ साल रामपुर में व्यतीत करने के बाद दाग़ १८९१ के आस-पास हैदराबाद चले गए। यहीं पर १७ फरवरी १९०५ को इन्होंने अंतिम साँसें लीं।

दाग़ के बारे में और जानने के लिए चलिए अब हम निदा फ़ाज़ली साहब की शरण में चलते हैं:

दाग़ के पिता नवाब शम्सुद्दीन ने अपनी बंदूक से देश प्रेम में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी को उड़ा दिया था. नवाब साहब को फाँसी दी गई और उनकी पत्नी अपने पाँच साल के बेटे को रामपुर में अपनी बहन के हवाले करके, जान बचाने के लिए इधर-उधर भागती रहीं. जहाँ उन्हें मदद मिली वहाँ-वहाँ इसकी क़ीमत उन्हें अपने शरीर से चुकानी पड़ी. जिसके नतीजे में दाग़ के एक भाई और बहन अंग्रेज़ नस्ल से भी हुए. यह अभागिन महिला आख़िर में, आख़िरी मुगल सम्राट के होने वाले जानशीन मिर्ज़ा फखरू के निकाह में आई. यह १८५७ से पहले का इतिहास है. महल में आने के बाद माँ को रामपुर में छोड़े हुए बेटे की याद आई और किस्मत, बदकिस्मत बेटे को रामपुर से लालकिले में ले आई. १८५७ से एक साल पहले मिर्जा फखरू का देहांत हुआ और उसके बाद माँ और बेटा दोनों फिर से बेघर हो गए. दाग़ उस वक़्त शायर बन चुके थे. मशहूर हो चुके थे. शायरी ने उस समय के रामपुर नबाव को उन पर मेहरबान बनाया और उन्होंने फिर से घर-बार बसाया.

रामपुर में हर साल एक मेला लगता था. जिसमें देश की मशहूर तवायफ़ें अपने गायन और नृत्य का प्रदर्शन करती थीं. उन तवायफों में एक नवाब साहब के भाई की प्रेमिका थी. दाग़ का दिल उसी पर आ गया. उनका नाम था मुन्नी बाई हिजाब. मुहब्बत की दीवानगी में पत्नी के मना करने के बावजूद नवाब साहब के नाम दाग़ ने खत लिख डाला: "नवाब साहब आपको ख़ुदा ने हर ख़ुशी से नवाज़ा है, मगर मेरे लिए सिर्फ़ एक ही ख़ुशी है और वह है मुन्नी बाई."

नवाब तो दाग़ की शायरी के प्रशंसक थे. उन्होंने मुन्नी बाई के ज़रिए ही उत्तर भेजा. लिखा था - "दाग़ साहब हमें आपकी ग़ज़ल से ज़्यादा मुन्नी बाई अजीज़ नहीं है." मुन्नी बाई दाग़ साहब की प्रेमिका के रूप में उनके साथ रहने लगीं. लेकिन जब मन में धन का प्रवेश हुआ तो मन बेचारा बंजारा बन गया और मुन्नी बाई उन्हें छोड़ के चली गईं. इसी बेवफ़ाई पर शायद दाग़ ने यह शेर कहा था:

तू जो हरजाई है अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही और नहीं, और सही

लखनवी और देहलवी अंदाज़ की शायरी का सम्मिश्रण दाग की शायरी में बखूबी नज़र आता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये दो अंदाज़ हैं क्या और इनमें अंतर क्या है। इसी प्रश्न का जवाब देवी नागरानी आर०पी०शर्मा "महर्षि" से पूछ रही हैं: (साभार: साहित्य कुंज) "देहलवी शायरी में प्रेमी का उसके सच्चे प्रेम तथा दुख-दर्द का स्वाभाविक वर्णन होता है, जब कि लखनवी शायरी अवध की उस समय विलासता से प्रभावित रही। अतः उसमें प्रेम को वासना का रूप दे दिया गया तथा शायरी प्रेमिका के इर्द -गिर्द ही घूमती रही। वर्णन में कृत्रिमता एवं उच्छृंखलता से काम लिया गया। अब लखनवी शायरी में सुधार आ गया है।" ये तो हुई अंतर की बात, लेकिन अगर इनमें मेल-मिलाप जानना हो तो दाग़ के इन शेरों से बढकर और मिसाल नहीं मिल सकते:

ग़म से कहीं निजात मिले चैन पाएं हम,
दिल खुं में नहाए तो गंगा नहाएं हम

ख़ूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना, जो पता एक ने जाना तेरा


दाग़ के बारे में आज हमने बहुत कुछ जाना। महफ़िल तभी सफ़ल मानी जाती है जब शेरों के साथ-साथ शायर की भी दिल खोलकर बातें हों। आज की महफ़िल भी कुछ वैसी हीं थी। इसलिए मैं मुतमुईन होकर ग़ज़ल की और बढने को बेकाबू हूँ। चलिए तो अब आज की ग़ज़ल से रूबरू हुआ जाए। इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सजाया है मल्लिका पुखराज की सुपुत्री ताहिर सैय्यद ने, जो खुद हीं बेमिसाल आवाज़ की मालकिन रही हैं। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है आज की ग़ज़ल, जिसमें दाग़ ज़ाहिद से यह दरख्वास्त कर रहे हैं कि ये प्यार में पागल मस्ताने और दीवाने आदमी हैं, इसलिए इन्हें बुरा न कहा जाए:

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं
तुझ से लिपट पड़ेंगे, दीवाने आदमी हैं

गै़रों की दोस्ती पर क्यों ऐतबार कीजे
ये दुश्मनी करेंगे, ____ आदमी हैं

तुम ने हमारे दिल में घर कर लिया तो क्या है
आबाद करते. आख़िर वीराने आदमी हैं

क्या चोर हैं जो हम को दरबाँ तुम्हारा टोके
कह दो कि ये तो जाने-पहचाने आदमी हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बला" और शेर कुछ यूँ था-

जा कि हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से 'ज़ौक़'
अपनी बला से बादे-सबा अब कहीं चले

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

वो जब चाहे छीन ले मुझको ही मुझसे
उनकी बला से फिर में भले तड़पता ही रहूँ (अवनींद्र जी)

जल गया दिल मगर ऐसी जो बला निकले है
जैसे लू चलती मेरे मुँह से हवा निकले है। (मीर तक़ी ’मीर’)

उनकी बला से जीउँ या मरूँ मैं ,
उनकी आदत रिवाज बन गई रे ! (मंजु जी)

आईने में वो अपनी अदा देख रहे है
मर जाये की मिट जाये कोई उनकी बला से (सोहेल राना)

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्‍से, काम की बातें
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ (जावेद अख्तर)

रुतबा है जिनका ना आपे में वो हैं
सरे आम मुल्क में तबाही मची है
न है परवाह उनको उनकी बला से
इज्ज़त लुटी या किसी की बची है. (शन्नो जी)

पूरे दो घंटे बैठकर लिखी गई महफ़िल पोस्ट करते वक़्त डिलीट (गायब) हो गई। मैं पूरी तरह से हतोत्साहित हो चुका था। लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर महज़ २५ मिनट में मैंने इसे याद से तैयार किया है।

पिछली महफ़िल की शान बने अवनींद्र जी। इस मुकाम के लिए आप बधाई के पात्र हैं। आपके बाद महफ़िल में शरद जी की आमद हुई। उस्ताद ज़ौक़ को समर्पित महफ़िल में उस्तादों के उस्ताद मीर तक़ी मीर का शेर पेश करके आपने सोने पर सुहागा जड़ दिया। इसके लिए किन लफ़्ज़ों में आपका शुक्रिया अदा करूँ! शन्नो जी और मंजु जी, आप दोनों के स्वरचित शेर कमाल के हैं। इन्हें पढकर मज़ा आ गया। आशीष जी, दाग़ का शेर "खूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं... " आप पर फिट बैठता है। आप की यह लुकाछिपी, किसी एक महफ़िल में आना, किसी से नदारद रहना कोई अदा है क्या? नहीं ना? तो फिर नियमित हो जाईये। :) चलिए आप सब आए तो कम से कम, न जाने हमारे बाकी मित्र किधर गायब हैं। सीमा जी, नीलम जी, आप दोनों तो नियमित हुआ करती थीं। भई.. जिधर भी हैं आप, तुरत लाईन-हाज़िर होईये, आपको तलब किया जाता है। :) उम्मीद है कि हमारे वे सारे भूले-भटके दोस्त आज भटकते हुए महफ़िल की ओर रूख कर लेंगे। दिल पर हाथ रखकर कह रहा हूँ, हमारा यह दिल मत तोड़िएगा। अरे हाँ, बातों-बातों में पिछले बुधवार की अपनी गैर-मौजूदगी की तो मुआफ़ी माँगना हीं भूल गया। दर-असल मैं अपने गृह-नगर (गाँव हीं कह लीजिए) गया हुआ था, वहाँ न तो बिज़ली सही थी और न हीं इंटरनेट, इसलिए लाख कोशिशों के बावजूद महफ़िल पोस्ट न कर सका। आप हमारी मजबूरी समझ रहे हैं ना? बढिया है।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, August 18, 2010

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले.. ज़िंदगी और मौत के बीच उलझे ज़ौक़ को साथ मिला बेग़म और सहगल का

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९७

नाज़ है गुल को नज़ाक़त पै चमन में ऐ ‘ज़ौक़’,
इसने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाक़त वाले

इस तपिश का है मज़ा दिल ही को हासिल होता
काश, मैं इश्क़ में सर-ता-ब-क़दम दिल होता

यूँ तो इश्क़ और शायर/शायरी में चोली-दामन का साथ होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी शायर होते हैं जो इश्क़ को बखूबी समझते हैं और हर शेर लिखने से पहले स्याही को इश्क़ में डुबोते चलते हैं। ऐसे शायरों का लिखा पढने में दिल को जो सुकूं मिलता है, वह लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता। ज़ौक़ वैसे हीं एक शायर थे। जितनी आसानी ने उन्होंने "सर-ता-ब-कदम" दिल होने की बात कही है या फिर यह कहा है कि गुलशन के फूलों को जो अपनी नज़ाकत पे नाज़ है, उन्हें यह मालूम नहीं कि यह नाज़-ओ-नज़ाकत उनसे बढकर भी कहीं और मौजूद है .. ये सारे बिंब पढने में बड़े हीं आम मालूम होते हैं ,लेकिन लिखने वाले को हीं पता होता है कि कुछ आम लिखना कितना खास होता है। मैंने ज़ौक़ की बहुत सारी ग़ज़लें पढी हैं.. उनकी हर ग़ज़ल और ग़ज़ल का हर शेर इस बात की गवाही देता है कि यह शायर यकीनन कुछ खास रहा है। फिर भी न जाने क्यों, हमने इन्हें भुला दिया है या फिर हम इन्हें भुलाए जा रहे हैं। इस गु़स्ताखी या कहिए इस गलती की एक हीं वज़ह है और वह है ग़ालिब की हद से बढकर भक्ति। अब होता है ये है कि जो भी सुखनसाज़ या सुखन की कद्र करने वाला ग़ालिब को अपना गुरू मानने लगता है, उसके लिए यक-ब-यक ज़ौक़ दुश्मन हो जाते हैं। उन लोगों को यह लगने लगता है कि ज़ौक़ की हीं वज़ह से ग़ालिब को इतने दु:ख सहने पड़े थे, इसलिए ज़ौक़ निहायत हीं घटिया इंसान थे। इस सोच का जहन में आना होता है कि वे सब ज़ौक़ की शायरी से तौबा करने लगते हैं। मुझे ऐसी सोच वाले इंसानों पे तरस आता है। शायर को उसकी शायरी से मापिए, ना कि उसके पद या ओहदे से। ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और उनके दरबार में रहा करते थे.. अगर दरबार में रहना गलत है तो फिर ग़ालिब ने भी तो दरबार में रहने के लिए हाथ-पाँव मारे थे। तब तो उन्हें भी बुरा कहा जाना चाहिए, पथभ्रष्ट कहा जाना चाहिए। सिर्फ़ ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन होने के कारण ज़ौक़ से नाक-भौं सिकोड़ना तो सही नहीं। मुझे मालूम है कि हममें से भी कई या तो ज़ौक़ को जानते हीं नहीं होंगे या फिर जानकर भी अनजान रहना हीं पसंद करते होंगे। अपने वैसे मित्रों के लिए मैं "प्रकाश पंडित" जी के खजाने से "ज़ौक़" से ताल्लुक रखने वाले कुछ मोती चुनकर लाया हूँ। इसे पढने के बाद यकीनन हीं ज़ौक़ के प्रति बरसों में बने आपके विचार बदलेंगें।

प्रकाश जी लिखते हैं:
उर्दू शायरी में ‘ज़ौक़’ का अपना खास स्थान है। वे शायरी के उस्ताद माने जाते थे। आखिरी बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के दरबार में शाही शायर भी थे।

बादशाह की उस्तादी ‘ज़ौक़’ को किस क़दर महंगी पड़ी थी, यह उनके शागिर्द मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की ज़बानी सुनिए:
"वह अपनी ग़ज़ल खुद बादशाह को न सुनाते थे। अगर किसी तरह उस तक पहुंच जाती तो वह इसी ग़ज़ल पर खुद ग़ज़ल कहता था। अब अगर नयी ग़ज़ल कह कर दें और वह अपनी ग़ज़ल से पस्त हो तो बादशाह भी बच्चा न था, 70 बरस का सुख़न-फ़हन था। अगर उससे चुस्त कहें तो अपने कहे को आप मिटाना भी कुछ आसान काम नहीं। नाचार अपनी ग़ज़ल में उनका तख़ल्लुस डालकर दे देते थे। बादशाह को बड़ा ख़याल रहता था कि वह अपनी किसी चीज़ पर ज़ोर-तबअ़ न ख़र्च करें। जब उनके शौक़े-तबअ़ को किसी तरफ़ मुतवज्जह देखता जो बराबर ग़ज़लों का तार बांध देता कि तो कुछ जोशे-तबअ़ हो इधर ही आ जाय।"

शाही फ़रमायशों की कोई हद न थी। किसी चूरन वाले की कोई कड़ी पसंद आयी और उस्ताद को पूरा लटका लिखने का हुक्म हुआ। किसी फ़क़ीर की आवाज़ हुजूर को भा गयी है और उस्ताद पूरा दादरा बना रहे हैं। टप्पे, ठुमरियां, होलियां, गीत भी हज़ारों कहे और बादशाह को भेंट किये। खुद भी झुंझला कर एक बार कह दिया :

ज़ौक मुरत्तिब क्योंकि हो दीवां शिकवाए-फुरसत किससे करें
बांधे हमने अपने गले में आप ‘ज़फ़र’ के झगड़े हैं


"ज़ौक़" के काव्य के स्थायी तत्वों की व्याख्या के पहले उनके बारे में फैली हुई कुछ भ्रांतियों का निवारण आवश्यक मालूम होता है। पहली बात तो यह है कि समकालीन होने के लिहाज़ से उन्हें ‘ग़ालिब’ का प्रतिद्वंद्वी समझ लिया जाता है और चूंकि यह शताब्दी ‘ग़ालिब’ के उपासकों की है इसलिए ‘ज़ौक़’ से लोग खामखाह ख़ार खाये बैठे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि समकालीन महाकवियों में कुछ न कुछ प्रतिद्वंद्विता होती ही है और ‘ज़ौक़’ ने भी कभी-कभी मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की छेड़-छाड़ की बादशाह से शिकायत कर दी थी, लेकिन इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता में न तो वह भद्दापन था जो ‘इंशा’ और ‘मसहफ़ी’ की प्रतिद्वंद्विता में था, न इतनी कटुता जो ‘मीर’ और ‘सौदा’ में कभी-कभी दिखाई देती है। असल में उनके बीच प्रतिद्वंद्विता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। ‘ग़ालिब’ नयी भाव-भूमियों को अपनाने में दक्ष थे और वर्णन-सौंदर्य की ओर से उदासीन; ‘ज़ौक़’ का कमाल वर्णन-सौंदर्य में था और भावना के क्षेत्र में बुजुर्गों की देन ही को काफ़ी समझते थे। जैसा कि हर ज़माने के समकालीन महाकवि एक दूसरे के कमाल के क़ायल होते हैं, यह दोनों बुजुर्ग भी एक-दूसरे के प्रशंसक थे। ग़ालिब ‘ज़ौक़’ के प्रशंसक थे और अपने एक पत्र में उन्होंने ‘ज़ौक़’ के इस शे’र की प्रशंसा की है :

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे।


और उधर ‘ज़ौक़’ भी मुंह-देखी में नहीं बल्कि अपने दोस्तों और शागिर्दों मैं बैठकर कहा करते थे कि मिर्ज़ा (ग़ालिब) को खुद अपने अच्छे शे’रों का पता नहीं है और उनका यह शे’र सुनाया करते थे:

दरियाए-मआ़सी तुनुक-आबी से हुआ खुश्क
मेरा सरे-दामन भी अभी तक न हुआ था।

ज़ौक़ की असली सहायक उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता थी। कविता-अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे। इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। तफ़सीर (कुरान की व्याख्या) में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ तिब्ब (यूनानी चिकित्सा-शास्त्र) भी सीखी थी। धार्मिक तर्कशास्त्र (मंतक़) और गणित में भी वे पटु थे। उनके इस बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं।

‘ज़ौक़’ १२०४ हि. तदनुसार १७८९ ई. में दिल्ली के एक ग़रीब सिपाही शेख़ मुहम्मद रमज़ान के घर पैदा हुए थे। शेख़ रमज़ान नवाब लुत्फअली खां के नौकर थे। शेख़ इब्राहीम (ज़ौक़ का असल नाम) इनके इकलौते बेटे थे। इस कमाल के उस्ताद ने १२७१ हिजरी (१८५४ ई.) में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया। मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत करे

ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच शायराना नोंक-झोंक और हँसी-मज़ाक के कई सारे किस्से मक़बूल हैं। मुझे याद नहीं कि मैंने यह वाक्या ग़ालिब के लिए सजी महफ़िल में सुनाया था या नहीं, अगर सुनाया हो, तब भी दुहराए देता हूँ। बात एक गोष्ठी की है । मिर्ज़ा ग़ालिब मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे थे । शेख इब्राहीम ‘जौक’ भी वहीं मौज़ूद थे । ग़ालिब द्वारा मीर की तारीफ़ सुनकर वे बैचेन हो उठे । वे सौदा नामक शायर को श्रेष्ठ बताने लगे । मिर्ज़ा ने झट से चोट की- “मैं तो आपको मीरी समझता था मगर अब जाकर मालूम हुआ कि आप तो सौदाई हैं ।” यहाँ मीरी और सौदाई दोनों में श्लेष है । मीरी का मायने मीर का समर्थक होता है और नेता या आगे चलने वाला भी । इसी तरह सौदाई का पहला अर्थ है सौदा या अनुयायी, दूसरा है- पागल।

ज़ौक़ कितने सौदाई थे या फिर कितने मीरी... इसका निर्धारण हम तो नहीं कर सकते, लेकिन हाँ उनके लिखे कुछ शेरों को पढकर और उन्हें गुनकर अपने इल्म में थोड़ी बढोतरी तो कर हीं सकते हैं:

आँखें मेरी तलवों से मल जाए तो अच्छा
है हसरत-ए-पा-बोस निकल जाए तो अच्छा

ग़ुंचा हंसता तेरे आगे है जो गुस्ताख़ी से
चटखना मुंह पे वहीं बाद-सहर देती है

आदमीयत और शै है, इल्म है कुछ और शै
कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा

वाँ से याँ आये थे ऐ 'ज़ौक़' तो क्या लाये थे
याँ से तो जायेंगे हम लाख तमन्ना लेकर


चलिए अब इन शेरों के बाद उस मुद्दे पर आते हैं, जिसके लिए हमने महफ़िल सजाई है। जानकारियाँ देना हमारा फ़र्ज़ है, लेकिन ग़ज़ल सुनना/सुनवाना तो हमारी ज़िंदगी है.. फ़र्ज़ के मामले में थोड़ा-बहुत इधर-उधर हो सकता है, लेकिन ज़िंदगी की गाड़ी पटरी से हिली तो खेल खत्म.. है ना? तो आईये.. लगे हाथों हम आज की ग़ज़ल से रूबरू हो लें। आज हम जो ग़ज़ल लेकर महफ़िल में हाज़िर हुए हैं उसे ग़ज़ल-गायिकी की बेताज बेगम "बेगम अख्तर" की आवाज़ नसीब हुई है। इतना कह देने के बाद क्या कुछ और भी कहना बचा रह जाता है। नहीं ना? इसलिए बिना कुछ देर किए, इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाया जाए:

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल्लगी चले

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बद-क़िमार
जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले

हो उम्रे-ख़िज़्र भी तो भी कहेंगे ब-वक़्ते-मर्ग
हम क्या रहे यहाँ अभी आये अभी चले

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो युँ ही जब तक चली चले

नाज़ाँ न हो ख़िरद पे जो होना है वो ही हो
दानिशतेरी न कुछ मेरी दानिशवरी चले

जा कि हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से 'ज़ौक़'
अपनी ___ से बादे-सबा अब कहीं चले




वैसे तो हम एक महफ़िल में एक हीं गुलुकार की आवाज़ में ग़ज़ल सुनवाते हैं। लेकिन इस ग़ज़ल की मुझे दो रिकार्डिंग्स हासिल हुई थी.. एक बेग़म अख्तर की और एक कुंदन लाल सहगल की। इन दोनों में से मैं किसे रखूँ और किसे छाटूँ, मैं यह निर्धारित नहीं कर पाया। इसलिए बेगम की आवाज़ में ग़ज़ल सुनवा देने के बाद हम आपके सामने पेश कर रहे हैं "सहगल" साहब की बेमिसाल आवाज़ में यही ग़ज़ल एक बार फिर:



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "उम्र" और शेर कुछ यूँ था-

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

आह को चाहिये इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक (ग़ालिब)

सर्द रातों की स्याही को चुराकर हमने
उम्र यूँ काटी तेरे शहर में आकर हमने (आशीष जी)

उम्रभर तलाशा था हमने जिस हंसी को
आज वो खुद की ही दीवानगी पे आई है (अवनींद्र जी)

उनके बच्चे भी सोये हैं भूखे
जिनकी उम्र गुजरी है रोटियाँ बनाने में (नीलम जी की प्रस्तुति.. शायर का पता नहीं)

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में । (बहादुर शाह ज़फ़र)

ता-उम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की,
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफर लेके आ गया। (सुदर्शन फ़ाकिर)

उम्र हो गई तुम्हें पहचानने में ,
अभी तक न जान पाई हमदम मेरे ! (मंजु जी)

दिल उदास है यूँ ही कोई पैगाम ही लिख दो
अपना नाम ना लिखो तो बेनाम ही लिख दो
मेरी किस्मत में गम-ए-तन्हाई है लेकिन
पूरी उम्र ना सही एक शाम ही लिख दो. (शन्नो जी की पेशकश.. शायर का पता नहीं)

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब्-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं (ख़ामोश देहलवी) .. नीलम जी, आपके शायर का नाम गलत है।

पिछली महफ़िल की शान बने आशीष जी। इस उपलब्धि के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ। मुझे पिछली महफ़िल इसलिए बेहद पसंद आई क्योंकि उस महफ़िल में अपने सारे मित्र मौजूद थे, बस सीमा जी को छोड़कर। न जाने वो किधर गायब हो गई हैं। सीमा जी, आप अगर मेरी यह टिप्पणी पढ रही हैं, तो आज की महफ़िल में टिप्पणी देना न भूलिएगा :) मनु जी, आपको ग़ज़ल पढने में अच्छी लगी, लेकिन सुनने में नहीं। चलिए हमारी आधी मेहनत तो सफल हुई। जहाँ तक सुनने-सुनाने का प्रश्न है और गुलुकार के चयन का सवाल है तो अगर मैं चाहता तो मेहदी हसन साहब या फिर गुलाम अली साहब की आवाज़ में यह ग़ज़ल महफ़िल में पेश करता, लेकिन इनकी आवाज़ों में आपने "पत्ता-पत्ता" तो कई बार सुनी होगी, फिर नया क्या होता। मुझे हरिहरण प्रिय हैं, मुझे उनकी आवाज़ अच्छी लगती है और इसी कारण मैं चाहता था कि बाकी मित्र भी उनकी आवाज़ से रूबरू हो लें। दक्षिण भारत से संबंध रखने के बावजूद उर्दू के शब्दों को वो जिस आसानी से गाते हैं और जितनी तन्मयता से वो हर लफ़्ज़ के तलफ़्फ़ुज़ पर ध्यान देते हैं, उतनी मेहनत तो हिंदी/उर्दू जानने वाला एक शख्स नहीं करता। मेरे हिसाब से हरिहरण की ग़ज़ल सुनी जानी चाहिए.. हाँ, आप इनकी ग़ज़लों की तुलना मेहदी हसन या गुलाम अली से तो नहीं हीं कर सकतें, वे सब तो इस कला के उस्ताद हैं, लेकिन यह कहाँ लिखा है कि उस्ताद के सामने शागिर्द को मौका हीं न मिले। मेरी ख्वाहिश बस यही मौका देने की थी... कितना सफल हुआ और कितना असफल, ये तो बाकी मित्र हीं बताएँगे। अवनींद्र जी और शन्नो जी, आप दोनों ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमें शुभकामनाएँ दीं, हमारी तरफ़ से भी आप सभी स्वजनों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.. मराठी में कहें तो "शुभेच्छा".. महाराष्ट्र में रहते-रहते यह एक शब्द तो सीख हीं गया हूँ :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, August 11, 2010

जाने न जाने गुल हीं न जाने, बाग तो सारा जाने है.. "मीर" के एकतरफ़ा प्यार की कसक औ’ हरिहरण की आवाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९६

ढ़ते फिरेंगे गलियों में इन रेख़्तों को लोग,
मुद्दत रहेंगी याद ये बातें हमारियां।

जाने का नहीं शोर सुख़न का मिरे हरगिज़,
ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा।

ये दो शेर मिर्ज़ा ग़ालिब के गुरू (ग़ालिब ने इनसे ग़ज़लों की शिक्षा नहीं ली, बल्कि इन्हें अपने मन से गुरू माना) मीर के हैं। मीर के बारे में हर दौर में हर शायर ने कुछ न कुछ कहा है और अपने शेर के मार्फ़त यह ज़रूर दर्शा दिया है कि चाहे कितना भी लिख लो, लेकिन मीर जैसा अंदाज़ हासिल नहीं हो सकता। ग़ालिब और नासिख के शेर तो हमने पहले हीं आपको पढा दिए थे (ग़ालिब को समर्पित महफ़िलों में), आज चलिए ग़ालिब के समकालीन इब्राहिम ज़ौक़ का यह शेर आपको सुनवाते हैं, जो उन्होंने मीर को नज़र करके लिखा था:

न हुआ पर न हुआ ‘मीर’ का अंदाज़ नसीब।
‘जौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा।।

हसरत मोहानी साहब कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी वही दुहराया जो पहले मीर ने कहा और बाद में बाकी शायरों ने:

शेर मेरे भी हैं पुर-दर्द वलेकिन ‘हसरत’।
‘मीर’ का शैवाए-गुफ़्तार कहां से लाऊं।।

ग़ज़ल कहने की जो बुनियादी जरूरत है, वह है "हर तरह की भावनाओं विशेषकर दु:ख की संवेदना"। जब तलक आप कथ्य को खुद महसूस नहीं करते, तब तलक लिखा गया हरेक लफ़्ज़ बेमानी है। मीर इसी कला के मर्मज्ञ थे, सबसे बड़े मर्मज्ञ। इस बात को उन्होंने खुद भी अपने शेर में कहा है:

मुझको शायर न कहो ‘मीर’ कि साहब मैंने।
दर्दों-ग़म जमा किये कितने तो दीवान किया।।

मीर का दीवान जितना उनके ग़म का संग्रह था, उतना हीं जमाने के ग़म का -

दरहमी हाल की है सारे मिरा दीवां में,
सैर कर तू भी यह मजमूआ परीशानी का।

अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास" में "बच्चन सिंह" जी मीर के बारे में लिखते हैं:

मीर का पूरा नाम मीर तक़ी मीर था। मीर ने फ़ारसी में अपनी आत्मकथा लिखी है, जिसका अनुवाद "ज़िक्रे मीर" के नाम से हो चुका है। ज़िक्रे मीर के हिसाब से उनका जन्म १७२५ में अकबराबाद (आगरा) में हुआ था। लेकिन और घटनाओं के समय उन्होंने अपनी जो उम्र बताई है उससे हिसाब लगाने पर उनकी जन्म-तिथि ११३७ हि.या १७२४ ई. निकलती है। (प्रकाश पंडित की पुस्तक "मीर और उनकी शायरी" में भी इस बात का उल्लेख है) मीर के पिता प्रसिद्ध सूफ़ी फ़कीर थे। उनका प्रभाव मीर की रचनाओं पर देखा जा सकता है। दिल्ली को उजड़ती देखकर वे लखनऊ चले आए। नवाब आसफ़ुद्दौला ने उनका स्वागत किया और तीन सौ रूपये की मासिक वृत्ति बाँध दी। नवाब से उनकी पटरी नहीं बैठी। उन्होंने दरबार में जाना छोड़ दिया। फिर भी नवाब ने उनकी वृत्ति नहीं बंद की। १८१० में मीर का देहांत हो गया।

मीर पर वली की शायरी का प्रभाव है - जबान, ग़ज़ल की ज़मीन और भावों में दोनों में थोड़ा-बहुत सादृश्य है। पर दोनों में एक बुनियादी अंतर है। वली के इश्क़ में प्रेमिका की अराधना है तो मीर के इश्क़ पर सूफ़ियों के इश्क़-हक़ीक़ी का भी रंग है और वह रोजमर्रा की समस्याओं में नीर-क्षीर की तरह घुलमिल गया है। मीर की शायरी में जीवन के जितने विविध आयाम मिलेंगे उतने उस काल के किसी अन्य कवि में नहीं दिखाई पड़ते।

दिल्ली मीर का अपना शहर था। लखनऊ में रहते हुए भी वे दिल्ली को कभी नहीं भूले। दिल्ली छोड़ने का दर्द उन्हें सालता रहा। लखनऊ से उन्हें बेहद नफ़रत थी। भले हीं वे लखनऊ के पैसे पर पल रहे थे, फिर भी लखनऊ उन्हें चुगदों (उल्लुओं) से भरा हुआ और आदमियत से खाली लग रहा था। लखनऊ के कवियों की इश्क़िया शायरी में वह दर्द न था, जो छटपटाहट पैदा कर सके। लखनऊ के लोकप्रिय शायर "जुर्रत" को मीर चुम्मा-चाटी का शायर कहा करते थे।

मीर विचारधारा में कबीर के निकट हैं तो भाषा की मिठास में सूर के। जिस तरह कबीर कहते थे कि "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल", उसी तरह मीर का कहना है - "उसे देखूँ जिधर करूँ निगाह, वही एक सूरत हज़ारों जगह।" दैरो-हरम की चिंता उन्हें नहीं है। मीर उससे ऊपर उठकर प्रेमधर्म और हृदयधर्म का समर्थन करते हैं-

दैरो-हरम से गुजरे, अब दिल है घर हमारा,
है ख़त्म इस आवले पर सैरो-सफ़र हमारा।


हिन्दी के सूफ़ी कवि भी इतने असांप्रदायिक नहीं थे, जितने मीर थे। इस अर्थ में मीर जायसी और कुतबन के आगे थे। वे लोग इस्लाम के घेरे को नहीं तोड़ सके थे, जबकि मीर ने उसे तोड़ दिया था। पंडों-पुरोहितों, मुल्ला-इमामों में उनकी आस्था नहीं थी, पर मुसलमां होने में थी। शेखों-इमामों की तो उन्होंने वह गत बनाई है कि उन्हें देखकर फ़रिश्तों के भी होश उड़ जाएँ -

फिर ’मीर’ आज मस्जिद-ए-जामें में थे इमाम,
दाग़-ए-शराब धोते थे कल जानमाज़ का।
(जानमाज़ - जिस कपड़े पर नमाज़ पढी जाती है)

सौन्दर्य-वर्णन मीर के यहाँ भी मिलेगा, किन्तु इस सावधानी के साथ कि "कुछ इश्क़-ओ-हवस में फ़र्क़ भी कर-

क्या तन-ए-नाज़ुक है, जां को भी हसद जिस तन प’ है,
क्या बदन का रंग है, तह जिसकी पैराहन प’ है।

मीर की भाषा में फ़ारसी के शब्द कम नहीं हैं, पर उनकी शायरी का लहजा, शैली, लय, सुर भारतीय है। उनकी कविता का पूरा माहौल कहीं से भी ईरानी नहीं है।

मीर ग़ज़लों के बादशाह थे। उनकी दो हज़ार से अधिक ग़ज़लें छह दीवानों में संगृहीत हैं। "कुल्लियात-ए-मीर" में अनेक मस्नवियाँ, क़सीदे, वासोख़्त, मर्सिये आदि शामिल हैं। उनकी शायरी के कुछ नमूने निम्नलिखित हैं:-

इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या
आगे आगे देखिये होता है क्या

इश्क़ इक "मीर" भारी पत्थर है
कब दिल-ए-नातवां से उठता है

हम ख़ुदा के कभी क़ायल तो न थे
उनको देखा तो ख़ुदा याद आ गया

सख़्त काफ़िर था जिसने पहले "मीर"
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया


आधुनिक उर्दू कविता के प्रमुख नाम और उर्दू साहित्य के इतिहास 'आब-ए-हयात' के लेखक मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी 'मीर' के बारे में दर्ज़ किया है- "क़द्रदानों ने उनके कलाम को जौहर और मोतियों की निगाहों से देखा और नाम को फूलों की महक बना कर उड़ाया. हिन्दुस्तान में यह बात उन्हीं को नसीब हुई है कि मुसाफ़िर,ग़ज़लों को तोहफ़े के तौर पर शहर से शहर में ले जाते थे"। जिनकी शायरी मुसाफ़िर शहर-दर-शहर दिल में लेकर घूमते हैं, हमारी खुश-किस्मती है कि हमारी महफ़िल को आज उनकी खिदमत करने का मौका हासिल हुआ है। कई महीनों से हमारे दिल में यह बात खटक रही थी कि भाई ग़ालिब पर दस महफ़िलें हो गईं और मीर पर एक भी नहीं। तो चलिए आज वह खटक भी दूर हो गई, इसी को कहते हैं "देर आयद दुरूस्त आयद"। इतनी बातों के बाद लगे हाथ अब आज की ग़ज़ल भी सुन लेते हैं। आज की ग़ज़ल मेरे हिसाब से मीर की सबसे मक़बूल गज़ल है और मेरे दिल के सबसे करीब भी। "जाने न जाने गुल हीं न जाने, बाग तो सारा जाने है।" एकतरफ़ा प्यार की कसक इससे बढिया तरीके से व्यक्त नहीं की जा सकती। मीर के लफ़्ज़ों में छुपी कसक को ग़ज़ल गायिकी को एक अलग हीं अंदाज़ देने वाले "हरिहरण" ने बखूबी पेश किया है। यूँ तो इस ग़ज़ल को कई गुलूकारों ने अपनी आवाज़ दी है, लेकिन हरिहरण का "क्लासिकल टच" और किसी की गायकी में नहीं है। पूरे ९ मिनट की यह ग़ज़ल मेरे इस दावे की पुख्ता सुबूत है:

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक ____ दो बारा जाने है

तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "दामन" और शेर कुछ यूँ था-

आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई
मैं और मेरी तन्हाई...

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

मेरे अश्रु भरे मन की खातिर
वो फैला दे दामन तो जी लूं (अवनींद्र जी)

दामन छुड़ा के अपना वो पूछ्ते हैं मुझसे
जब ये न थाम पाए थामोगे हाथ कैसे ? (शरद जी)

इन लम्हों के दामन में पाकीजा से रिश्ते हैं
कोई कलमा मुहब्बत का दोहराते फ़रिश्ते हैं (जावेद अख्तर)

दामन में आंसू थे, या रुस्वाईयां थी
ये किस्मत थी या वो बे- वफ़ाइयाँ थी (नीलम जी)

फूलों से बढियां कांटे हैं ,
जो दामन थाम लेते हैं. (मंजु जी)

फूल खिले है गुलशन गुलशन,
लेकिन अपना अपना दामन (जिगर मुरादाबादी)

रात के दामन में शमा जब जलती है
हवा आके उससे लिपट के मचलती है (शन्नो जी)

छोड़ कर तेरे प्यार का दामन यह बता दे के हम किधर जाएँ
हमको डर है के तेरी बाहों में हम सिमट कर ना आज मर जाएँ. (रजा मेहदी अली खान)

आपको मुबारक हों ज़माने की सारी खुशियाँ
हर गम जिंदगी का हमारे दामन में भर दो . (शन्नो जी)

पिछली महफ़िल की शान बने अवनीद्र जी। हुज़ूर, आप की अदा हमें बेहद पसंद आई। एक शब्द पर पूरी की पूरी ग़ज़ल कह देना आसान नहीं। हम आपके हुनर को सलाम को करते हैं। आपके बाद महफ़िल को अपने स्वरचित शेर से शरद जी ने रंगीन किया। शरद जी, आपने तो बड़ा हीं गूढ प्रश्न पूछा है। अगर आशिक़ एक दामन नहीं थाम सकता तो हाथ क्या खाक थामेगा! उम्मीद करता हूँ कि कोई सच्चा आशिक़ इसका जवाब देगा। शरद जी के बाद नीलम जी की बारी थी। इस बार तो आपने दिल खोलकर महफ़िल की ज़र्रानवाज़ी की। आपने अपने शेरों के साथ जानेमाने शायरों के भी शेर शामिल किए। और एक शेर में जब आप शायर का नाम भूल गए तो अवध जी ने वह कमी भी पूरी कर दी। आप दोनों की लख़नवी बातचीत हमें खूब भाई। अब आप दोनों मिलकर मीर से निपटें, जिन्हें लख़नऊ में बस उल्लू हीं नज़र आते थे :) अवध जी, प्रकाश पंडित जी की पुस्तकों से मैं जो भी जानकारी हासिल कर पाता हूँ, वे सब अंतर्जाल पर उपलब्ध हैं। मेरे पास उनकी बस एक कि़ताब है "मज़ाज और उनकी शायरी"। अगर और भी कुछ मालूम हुआ, तो आपको ज़रूर इत्तला करूँगा। मंजु जी, इस बार तो छोटे बहर के एक शेर से आपने बड़ी बाज़ी मार ली है। यही सोच रहा हूँ कि फूल और काँटों का यह अंतर मेरे लिए अब तक अनजाना कैसे था? सुमित जी, आपको "फूल खिले हैं.." वाले शेर के शायर का नाम पता न था, इसका मतलब यही हुआ कि आप "जिगर मुरादाबादी" वाली महफ़िल से नदारद थे :) शन्नो जी, ये हुई ना बात। इसी तरह खुलकर शेरों का मज़ा लेती रहें और लफ़्ज़ों की बौछार से हमें भी भिंगोती रहें।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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