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Wednesday, March 9, 2011

हु तू तू....भई घर गृहस्थी की नोंक झोंक भी तो किसी कबड्डी के खेल से कम नहीं है न...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 609/2010/309

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। इन दिनों विश्वकप क्रिकेट के उत्साह को और भी ज़्यादा बढ़ाने के लिए हम भी खेल-कूद भरे गानें लेकर उपस्थित हो रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'खेल खेल में' के अंतर्गत। अभी परसों ही हम बातें कर रहे थे विश्वकप प्रारंभ होने से पहले के क्रिकेट के बारे में। आइए आज आपको बतायें कि एक दिवसीय मैच, यानी कि वन डे इंटरनैशनल की शुरुआत किस तरह से और कब हुई थी। १९६० के दशक के शुरुआत में ब्रिटिश काउण्टी क्रिकेट टीम्स क्रिकेट के एक छोटे स्वरूप को खेलना शुरु किया जो केवल एक ही दिन का होता था। १९६२ में चार प्रतिभागी दलों के बीच प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसका शीर्षक था 'मिडलैण्ड्स नॊक आउट कप'। उसके बाद १९६३ में 'जिलेट कप' लोकप्रिय हो जाने से एक दिवसीय क्रिकेट की तरफ़ लोगों का रुझान बढ़ने लगा। १९६९ में एक नैशनल सण्डे लीग का गठन हुआ और पहला एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेला गया बारिश से प्रभावित एक क्रिकेट टेस्ट मैच के पाँचवे दिन। यह मैच था इंगलैण्ड और ऒस्ट्रेलिया के बीच जो १९७१ में मेलबोर्ण में खेला गया था। यह मैच खेला गया था जनता को शांत करने के लिए जो पिछले चार दिनों से बारिश की वजह से टेस्ट मैच का आनंद नहीं उठा पा रहे थे। यह एक ४० ओवर का मैच था और प्रति ओवर ८ गेंदें फेंके गये। इंगलैण्ड के घरेलू एक दिवसीय मैचों की अपार सफलता और लोकप्रियता के मद्देनज़र यह पद्धति विश्व के दूसरे देशों ने भी आज़माना चाहा और इस तरह से इंटरनैशनल क्रिकेट काउनसिल (ICC) ने क्रिकेट विश्वकप प्रतियोगिता की योजना बना डाली। बाकी इतिहास है।

इस शृंखला में कल हमने आपको कबड्डी पर आधारित एक गीत सुनवाया था, जिसमें दो लड़कियों के दल आपस में भिड़ रहे थे। आज का गीत भी कबड्डी पर ही आधारित है लेकिन इस बार मुक़ाबला नारी और पुरुष के बीच है। लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में यह "हु तु तु" गीत है १९६१ की फ़िल्म 'मेमदीदी' का। शैलेन्द्र का गीत और सलिल चौधरी का संगीत। झूठ नहीं बोलूँगा, यह गीत मैंने पहले कभी नहीं सुना हुआ था। खेलों पर आधारित गीत ढूंढते हुए यह गीत अचानक मेरे हाथ लगा और आपको भी सुनवाने का मन हुआ। इसका कारण है कि यह गीत दूसरे गीतों से कई बातों में ज़रा हटके है। यह गीत पति पत्नी के बीच के छेड़-छाड़ को दर्शाता है कबड्डी के खेल के माध्यम से। दोनों ही अपने अपने लिए कहते हैं कि उन्हें मेहनत करनी पड़ती है और दूसरा मज़े ले रहा/रही है। शैलेन्द्र जी ने काफ़ी मज़ेदार बोल लिखे हैं। फ़िलर के तौर पर इस्तमाल किया गया "हु तु तु" गीत का कैच लाइन है। मेमदीदी शब्द की बात करें तो बताना चाहूँगा कि बंगाल में इस शब्द का बहुत इस्तमाल होता है जिसका अर्थ मेमसाब ही है। बंगाल में दादा और दीदी का ख़ूब इस्तमाल होता है, शायद इसी वजह से मेमदीदी का चलन है वहाँ पर। इस गीत में सलिल दा ने महेन्द्र कपूर की आवाज़ ली है और शायद यह इस तरह का एकमात्र गीत है महेन्द्र-सलिल कम्बिनेशन का। तो आइए इस दुर्लभ और कमसुने गीत का आज आनंद लें, और खेल के इन दिनों बने हुए मूड को बरक़रार रखें।



क्या आप जानते हैं...
कि सलिल चौधरी पहली बार १९४९ में एक बंगला फ़िल्म 'परिवर्तन' में संगीत देकर फ़िल्म संगीत जगत में प्रवेश किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - कोई नहीं.

सवाल १ - फिल्म में गीत के दो संस्करण हैं, एक आशा की आवाज़ में दूसरा बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार जोड़ी का नाम - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

दोस्तों वैसे तो ये इस शृंखला की आखिरी पहेली है....पर इस बार कुछ नया है....आज हम दे रहे हैं एक बोनस सवाल, जिसके अंक हैं ५....यानी इस एक सवाल के साथ किसी भी तरह का उलटफेर संभव है. तो शुभकामनाएँ सभी को, सवाल ये है -

आपने खेलों से जुड़े १० गीत सुने, मगर एक गीत जो आधारित है क्रिकेट पे और जो समर्पित है एक बड़े क्रिकेट खिलाडी के नाम (वीडियो के हिसाब से) इस शृंखला में छूट गया है, जो हम सुन्वायेंगें ओल्ड इस गोल्ड के शनिवार विशेष में, आपने पहचानना है वो गीत....जो ठीक वही गीत पहचान लेगा जो हम बजायेंगें उसी के नाम होंगें ये बोनस ५ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी आगे हैं पर आज कुछ भी हो सकता है....तो हमें भी इंतज़ार रहेगा...शुभकामनाएँ...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, November 25, 2010

आधा है चंद्रमा रात आधी.....पर हम वी शांताराम जैसे हिंदी फिल्म के लौह स्तंभ पर अपनी बात आधी नहीं छोडेंगें

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 535/2010/235

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - इस लघु शृंखला के पहले खण्ड के अंतिम चरण मे आज हम पहुँच चुके हैं। इस खण्ड में हम बात कर रहे हैं फ़िल्मकार वी. शांताराम की। उनकी फ़िल्मी यात्रा में हम पहुँच चुके थे १९५७ की फ़िल्म 'दो आँखें बारह हाथ' तक। आज बातें उनकी एक और संगीत व नृत्य प्रधान फ़िल्म 'नवरंग' की, जो आई थी ५० के दशक के आख़िर में, साल था १९५९। इससे पहले की हम इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा करें, आइए आपको बता दें कि ६०, ७० और ८० के दशकों में शांताराम जी ने किन किन फ़िल्मों का निर्देशन किया था। १९६१ में फिर एक बार शास्त्रीय संगीत पर आधारित म्युज़िकल फ़िल्म आई 'स्त्री'। 'नवरंग' और 'स्त्री', इन दोनों फ़िल्मों में वसत देसाई का नहीं, बल्कि सी. रामचन्द्र का संगीत था। १९६३ में वादक व संगीत सहायक रामलाल को उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में संगीत देने का मौका दिया फ़िल्म 'सेहरा' में। इस फ़िल्म के गानें भी ख़ूब चले। १९६४ की में वी. शांताराम ने अपनी सुपुत्री राजश्री शांताराम को बतौर नायिका लॉन्च किया फ़िल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' में। जीतेन्द्र की भी यह पहली फ़िल्म थी और इस फ़िल्म के संगीत ने भी ख़ूब नाम कमाया। संगीतकार एक बार फिर रामलाल। १९६६ में 'लड़की सह्याद्री की' और १९६७ में 'बूंद जो बन गए मोती' इस दशक की दो और उल्लेखनीय फ़िल्में थीं। इन दो फ़िल्मों के संगीतकार थे क्रम से वसंत देसाई और सतीश भाटिया। मुकेश की आवाज़ में "ये कौन चित्रकार है" गीत प्रकृति की सुषमा का वर्णन करने वाले गीतों में सर्वोपरी लगता है। ऐसे में १९७१ में 'जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली', १९७२ में 'पिंजरा', १९७५ में 'चंदनाची चोली अंग अंग जली', और १९७७ में 'चानी' नाम की कमचर्चित फ़िल्में आईं जो व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही। बहुत कम लोगों ने सुना होगा, पर फ़िल्म 'चानी' में लता का गाया 'मैं तो जाऊँगी जाऊँगी जाऊँगी उस पार" गीत में कुछ और ही बात है। इस गीत को हम खोज पाए तो आपको ज़रूर सुनवाएँगे कभी। १९८६ में शांताराम ने 'फ़ायर' नामक फ़िल्म का निर्देशन किया था जो उनकी फ़िल्मी सफ़र की अंतिम फ़िल्म थी। एक अभिनेता, निर्माता और निर्देशक होने के अलावा वी. शांताराम फ़िल्म सोसायटी' के अध्यक्ष भी रहे ७० के दशक के आख़िर के सालों में। १९८६ में सिनेमा में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए शांताराम जी को दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ३० अक्तुबर १९९० को वी. शांताराम का बम्बई में निधन हो गया।

दोस्तों, वी. शांताराम के फ़िल्म के जिस गीत से उन पर केन्द्रित इस शृंखला को हम समाप्त कर रहे हैं, वह है फ़िल्म नवरंग का कालजयी युगल गीत "आधा है चन्द्रमा रात आधी, रह ना जाए तेरी मेरी बात अधी, मुलाक़ात आधी"। 'झनक झनक पायल बाजे' की अपार सफलता के बाद सन् १९५९ में शांताराम जी ने कुछ इसी तरह की एक और नृत्य और संगीत-प्रधान फ़िल्म बनाने की सोची और इस तरह से 'नवरंग' की कल्पना की गई। अभिनेत्री के रूप में संध्या को ही फ़िल्म में बरकरार रखा गया, लेकिन नायक के रूप में आ गये महिपाल। संगीत पक्ष के लिए वसंत देसाई की जगह पर आ गई अन्ना साहब यानी कि सी. रामचन्द्र। भरत व्यास ने फ़िल्म के सभी गीत लिखे। आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के गाये इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर का एक दिलचस्प वक्या जुड़ा हुआ है, जिसे महेन्द्र कपूर ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे। उनके अनुसार इस गीत के निर्माण के दौरान उनका करीयर दाव पर लग गया था। हुआ युं था कि यह गीत किसी रिकॉर्डिंग स्टुडिओ में नहीं बल्कि 'राजकमल कलामंदिर' में रेकॊर्ड किया जा रहा था, जो एक फ़िल्म स्टुडिओ था। एक तरफ़ वो इस बात से नर्वस थे कि पहली बार अशा भोसले के साथ गा रहे हैं, और दूसरी तरफ़ देखा कि रेकॊर्डिस्ट मंगेश देसाई और दूसरे नकनीकी सहायक एक एक कर के कन्ट्रोल रूम से बाहर निकल के आ रहे हैं और उनकी तरफ़ अजीब निगाहों से देख रहे हैं। सी. रामच्न्द्र मंगेश से पूछते हैं कि 'काय बख्तोस तू?' (तुम क्या देख रहे हो?)। मंगेश देसाई कहते हैं कि रेकॊर्डिंग् कैन्सल करनी पड़ेगी क्योंकि महेन्द्र कपूर की आवाज़ स्थिर नहीं है, और वो नर्वस हैं। तब अन्ना ने कहा कि ये तो फ़र्स्ट क्लास गा रहा है, तुम अपना वायरिंग् चेक करो। और तभी इस बात पर से पर्दा उठा कि महेन्द्र कपूर के माइक्रोफ़ोन का प्लग ढीला हो गया था, जिस वजह से ये कंपन आ रहा था। महेन्द्र कपूर यह मानते हैं कि अगर उस प्लग के ढीले होने की बात पता ना चलती तो शायद उसी दिन उनका करीयर ख़त्म हो जाता। तो दोस्तों, आइए अब इस गीत को सुनते हैं, और इसी के साथ समाप्त करते हैं 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' शृंखला का पहला खण्ड जो समर्पित था महान फ़िल्मकार वी. शांताराम को। अगले हफ़्ते इस शृंखला के दूसरे खण्ड में हम एक और महान फ़िल्मकार के फ़िल्मी सफ़र के साथ हाज़िर होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, शनिवार को 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में पधारना ना भूलिएगा, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि बतौर लेखक वी. शांताराम को उनकी तीन फ़िल्मों के साथ जोड़ा जा सकता है - 'अमृत मंथन' (संवाद), 'नवरंग' (स्क्रीनप्ले), 'सेहरा' (स्क्रीनप्ले)

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ६ /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - नौशाद साहब हैं संगीतकार

सवाल १ - किस निर्देशक की चर्चा में होगा ये गीत - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गायिका बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी एक बार फिर सही निकले. रोमेंद्र समय पर पहुंचे कल तो अमित भाई का भी जवाब उनके लिए एक अंक का बोनस दे गया. शरद जी आज देखते हैं...:)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, October 4, 2010

मेरा रंग दे बसंती चोला....जब गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन मिले अमर शहीद भगत सिंह की माँ से तब जन्मा ये कालजयी गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 497/2010/197

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं नव रसों पर आधारित फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'रस माधुरी'। आज बारी है वीर रस की। वीर रस, यानी कि वीरता और आत्मविश्वास का भाव जो हर इंसान में होना अत्यधिक आवश्यक है। प्राचीन काल में राजा महाराजाओं, सेनापतियों और सैनिकों को वीर की उपाधि दी जाती थी जो युद्ध भी अगर लड़ते थे तो पूरे नियमों को ध्यान में रखते हुए। पीठ पीछे वार करने में कोई वीरता नहीं है, बल्कि उसे कायर कहते हैं। वीरता के रस अपने में उत्पन्न करने के लिए इंसान को धैर्य और प्रशिक्षण की ज़रूरत है। आत्मविश्वास को बढ़ाना होगा अपने अंदर। वीर रस का एक महत्वपूर्ण पक्ष है प्रतियोगिता का, जो बहुत ज़रूरी है अपने काबिलियत को बढ़ाने के लिए। लेकिन हार या जीत को अगर हम बहुत ज़्यादा व्यक्तिगत रूप से लेंगे तो फिर मुश्किल ही होगी। वीर रस की वजह से इंसान स्वाधीन होना चाहेगा, उसे किसी का डर नहीं होगा, और वह बढ़ निकलेगा अपने आप को बंधनों से आज़ाद कराने के लिए। भारत ने हमेशा अमन और सदभाव का राह चुना है। हमने कभी किसी को नहीं ललकारा। हज़ारों सालों का हमारा इतिहास गवाह है कि हमने किसी पर कभी पहले वार नहीं किया। जंग लड़ना हमारी फ़ितरत नहीं। ख़ून बहाना हमारा धर्म नहीं और ना ही हम इसे वीरता समझते हैं। वीरता होती है अपने साथ साथ दूसरों की रक्षा करने में। लेकिन जब जब दुश्मनों ने हमारी इस धरती को अपवित्र करने की कोशिश की है, हम पर ज़ुल्म करने की कोशिश की है, तो हमने भी अपनी मर्यादा और सम्मान की रक्षा की है। ना चाहते हुए भी बंसी के बदले बंदूक थामे हैं हम प्रेम पुजारियों ने।

"मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतूल्य है उसका जन्म महान।" स्वर्ग से महान अपनी इस मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणो की आहुति देने वाले शहीदों को समर्पित है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आज का यह एपिसोड। वीर रस पर आधारित जिस गीत को हमने इस कड़ी के लिए चुना है वह गीत हमें याद दिलाता है तीन ऐसे शहीदों की जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जो योगदान दिया, उनके नाम इस देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है। ये तीन अमर शहीद हैं सरदार भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव। २३ मार्च १९३१ के दिन ये फाँसी पर चढ़ कर शहीद हो गए और इस देश के स्वाधीनता के लिए अमर बलिदान दे गए। १९६५ में मनोज कुमार ने जब शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदान पर अपनी कालजयी फ़िल्म 'शहीद' बनाई तो भगत सिंह के किरदार में ख़ुद मोर्चा सम्भाला, राजगुरु बनें आनंद कुमार और सुखदेव की भूमिका में थे प्रेम चोपड़ा। चन्द्रशेखर आज़ाद की भूमिका अदा की मनमोहन ने। भगत सिंह की माँ का रोल निभाया कामिनी कौशल ने। दोस्तों, जब यह फ़िल्म बन रही थी, तब भगत सिंह की माँ जीवित थीं। इसलिए मनोज कुमार अपनी पूरी टीम के साथ भगत सिंह के गाँव जा पहुँचे, उस बूढ़ी माँ से मिले और भगत सिंह के जीवन से जुड़ी बहुत सी बातें मालूम की जिन्हें वापस आकर उन्होंने इस फ़िल्म में उतारा। भगत सिंह की माँ से मुलाक़ात करने वाले इस टीम का एक सदस्य इस फ़िल्म के गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन भी थे, जिन्होंने इस संस्मरण का उल्लेख अपने 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में किया था। पेश है वही अंश। "यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि शहीद भगत सिंह की माँ से मिलने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। हम उस गाँव में गए थे जहाँ भगत सिंह की माँ रहती थीं। उनसे हम लोग मिले और भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कई बातें उन्होंने हमे बताईं। उनकी एक बात जो मेरे दिल को छू गई, वह यह था कि फाँसी से एक दिन पहले वो अपने बेटे से मिलने जब जेल गईं तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। तब भगत सिंह ने उनसे कहा कि 'माँ, मत रो, अगर तुम रोयोगी तो कोई भी माँ अपने बेटे को क़ुर्बानी की राह पर नहीं भेज पाएगी'। इसी बात से प्रेरित होकर मैंने इस फ़िल्म में यह गीत लिखा "तू ना रोना के तू है भगत सिंह की माँ, मर के भी तेरा लाल मरेगा नहीं, घोड़ी चढ़के तो लाते हैं दुल्हन सभी, हंसकर हर कोई फाँसी चढ़ेगा नहीं"। इसी फ़िल्म का मेरा लिखा एक और गीत है जो बहुत मशहूर हुआ था "मेरा रंग दे बसंती चोला"। बसंती रंग क़ुर्बानी का रंग होता है। ऐ माँ, तू मेरा चोला बसंती रंग में रंग दे, मुझे क़ुर्बान होने जाना है इस देश की ख़ातिर, बस यही एक अरमान है मेरा, तू रंग दे बसंती चोला" तो लीजिए दोस्तों, मुकेश, महेन्द्र कपूर और राजेन्द्र मेहता की आवाज़ों में प्रेम धवन का लिखा व स्वरबद्ध किया १९६५ की फ़िल्म 'शहीद' का यह देश भक्ति गीत सुनिए और सलाम कीजिए उन सभी शहीदों को जिनकी क़ुर्बानियों की वजह से हम आज़ाद हिंदुस्तान में जनम ले सके हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही भगत सिंह को उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र ने श्रद्धाजन्ली दी थी, वहीं पिछले हफ्ते ही गायक मेहन्द्र कपूर की दूसरी पुनातिथि भी थी. आईये इस गीत में बहाने हम उन्हें भी आज याद करें.



क्या आप जानते हैं...
कि "मेरा रंग दे बसंती चोला" गीत राग भैरवी पर आधारित है जब कि इसी फ़िल्म का एक और देश-भक्ति गीत "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" को प्रेम धवन ने राग दरबारी काबड़ में स्वरबद्ध किया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. युं तो यह गीत रौद्र रस पर आधारित है लेकिन जिस वस्तु के माध्यम से ग़ुस्सा प्रकट किया जा रहा है, वह एक बहुत ही नाज़ुक सी चीज़ है। इस युगल गीत के गायक का नाम बताएँ। ४ अंक।
२. इस फ़िल्म में ७० के दशक की एक सुपरहिट नायक-नायिका की जोड़ी है और ठीक वैसे ही एक सफल गीतकार-संगीतकार की जोड़ी भी। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
३. पहले अंतरे में "ख़ूबसूरत शिकायत" शब्द आते हैं। मुखड़ा पहचानिए। २ अंक।
४. फ़िल्म के निर्देशक बताएँ। ३ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार नए प्रतिभागी ने सबको पीछे छोड़ा, वैसे इस गीत को पहचानना मुश्किल भी नहीं था, आज का गीत पहचाने तो मानें :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 9, 2010

चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में....मजलिस-ए-कव्वाली के माध्यम से सभी श्रोताओं को ईद मुबारक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 480/2010/180

प सभी को 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से ईद-उल-फ़ित्र की दिली मुबारक़बाद। यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आए ऐसी हम कामना करते हैं। ईद-उल-फ़ित्र के साथ रमज़ान के महीने का अंत होता है और इसी के साथ क़व्वालियों की इस ख़ास मजलिस को भी आज हम अंजाम दे रहे हैं। ४० के दशक से शुरु कर क़व्वालियों का दामन थामे हर दौर के बदलते मिज़ाज का नज़ारा देखते हुए आज हम आ गए हैं ८० के दशक में। जिस तरह से ८० के दशक में फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर ख़त्म होने की कगार पर था, वही बात फ़िल्मी क़व्वालियों के लिए भी लागू थी। क़व्वालियों की संख्या भी कम होती जा रही थी। फ़िल्मों में क़व्वालियों के सिचुएशन्स आने ही बंद होते चले गए। कभी किसी मुस्लिम सबजेक्ट पर फ़िल्म बनती तो ही उसमें क़व्वाली की गुंजाइश रहती। कुछ गिनी चुनी फ़िल्में ८० के दशक की जिनमें क़व्वालियाँ सुनाई दी - निकाह, नूरी, परवत के उस पार, फ़कीरा, नाख़ुदा, नक़ाब, ये इश्क़ नहीं आसाँ, ऊँचे लोग, दि बर्निंग्‍ ट्रेन, अमृत, दीदार-ए-यार, आदि। इस दशक की क़व्वालियों का प्रतिनिधि मानते हुए आज की कड़ी के लिए हमने चुनी है फ़िल्म 'निकाह' की क़व्वाली "चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में"। फ़िल्मी क़व्वलियों की बात चलती है तो आशा जी का नाम गायिकाओं में सब से उपर आता है। क़व्वाली गायन में गायिका के गले में जिस तरह की हरकत होनी चाहिए, जिस तरह की शोख़ी, अल्हड़पन और एक आकर्षण होनी चाहिए, उन सभी बातों का ख़्याल आशा जी ने रखा और शायद यही वजह है कि उन्होंने ही सब से ज़्यादा फ़िल्मी क़व्वालियाँ गाई हैं। तो आज का यह एपिसोड भी कल की तरह आशा जी के नाम, और उनके साथ इस क़व्वली में आप आवाज़ें सुनेंगे महेन्द्र कपूर, सलमा आग़ा और साथियों की। हसन कमाल के बोल और रवि का संगीत।

फ़िल्म 'निकाह' एक मुस्लिम सामाजिक फ़िल्म थी और बेहद कमयाब भी साबित हुई थी। बी. आर. चोपड़ा की यह फ़िल्म थी जो डॊ. अचला नागर की लिखी एक नाटक पर आधारित थी। २४ सितंबर १९८२ को प्रदर्शित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज बब्बर, दीपक पराशर, सलमा आग़ा, हिना कौसर प्रमुख। यह फ़िल्म तो आपने देखी ही होगी, फ़िल्म की कहानी तलाक़ और मुस्लिम पुनर्विवाह के मसलों के इर्द गिर्द घूमती है। इस्लामिक मैरिज ऐक्ट के मुताबिक़, किसी तलाक़शुदा महिला से उसका पूर्व पति तभी दुबारा शादी कर सकता है जब वो किसी और से शादी कर के तलाक़ ले आए। बस इसी बात को केन्द्रबिंदु में रख कर लिखी गई थी नाटक 'निकाह' की कहानी, जिस पर आगे चलकर यह फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म को बहुत सराहना मिली थी और आज भी मुस्लिम सामाजिक फ़िल्मों के जौनर की सब से मक़बूल फ़िल्म मानी जाती है। फ़िल्म में गायिका अभिनेत्री सलमा आग़ा ने कुछ ऐसे दिल को छू लेने वाले गीत गाए कि वो गानें सदाबहार नग़मों में दर्ज हो चुके हैं। "दिल के अरमाँ आसुओं में बह गए" के लिए उन्हें उस साल फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के ख़िताब से नवाज़ा गया था। इसके अलावा "फ़ज़ा भी है जवाँ जवाँ, हवा भी है रवाँ रवाँ" तथा महेन्द्र कपूर के साथ गाया युगल गीत "दिल की यह आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले" भी ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। वैसे इस क़व्वाली में आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ें ही मुख्य रूप से सुनाई देती है, सलमा आग़ा बस एक लाइन गाती हैं आख़िर की तरफ़ - "यह झूठ है कि तुमने हमें प्यार किया है, हमने तुम्हे ज़ुल्फ़ों में गिरफ़्तार किया है"। आइए सुना जाए यह दिलकश क़व्वाली जिसमें है प्यार मोहब्बत के खट्टे मीठे गिले शिकवे और तकरारें हैं। और इसी के साथ 'मजलिस-ए-क़व्वाली' शृंखला पूरी होती है। आपको यह शृंखला कैसी लगी, क्या ख़ामियाँ रह गईं, आप अपने विचार हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजें। और अगर कोई और क़व्वाली आप सुनना चाहते हैं 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में, तो उसका भी ज़िक्र आप कर सकते हैं। तो अब आपसे अगली मुलाक़ात होगी शनिवार की शाम, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और एक बार फिर से आप सभी को ईद-उल-फ़ित्र की हार्दिक शुभकामनाएँ।



क्या आप जानते हैं...
कि हाल ही में आशा भोसले का नाम दुनिया के सब से लोकप्रिय १० कलाकारों में शामिल हुआ है। यह सर्वे सी.एन.एन के तरफ़ से आयोजित किया गया है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह गीत एक अमर प्रेमिक और प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी फ़िल्म का है जिसका निर्माण ४० के दशक के आख़िर के तरफ़ के किसी साल में हुआ था। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
२. फ़िल्म में कुल तीन संगीतकार हैं, जिनमें दो जोड़ी के रूप में हैं। इस जोड़ी के एक सदस्य आगे चलकर एक सफल संगीतकार सिद्ध हुए लेकिन एक अन्य नाम से। बताइए इस गीत के तीनों संगीतकारों के नाम। ४ अंक।
३. यह गीत एक पारम्परिक रचना है जिसका इस्तेमाल उसी सफल संगीतकार ने आगे चलकर अपनी एक बेहद उल्लेखनीय फ़िल्म में किया है और जिनसे गवाया है वो भी उनके ही परिवार की एक सदस्या हैं। इस पारम्परिक रचना को पहचानिए। ३ अंक।
४. इस गीत की गायिका का नाम बताएँ जिन्होंने इसी फ़िल्म में जी. एम. दुर्रानी के साथ मिलकर युगल गीत भी गाया है। २ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी और इंदु जी एकदम सही हैं, प्रतिभा जी आपने हसन कमाल को देखिये तो जरा क्या लिख दिया :), रोमेंद्र जी एकदम सही हैं. सभी मित्रों को ईद की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 10, 2010

पुरवा सुहानी आई रे...थिरक उठते है बरबस ही कदम इस गीत की थाप सुनकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 369/2010/69

'गीत रंगीले' शृंखला की नौवीं कड़ी के लिए आज हमने जिस गीत को चुना है, उसमें त्योहार की धूम भी है, गाँव वालों की मस्ती भी है, लेकिन साथ ही साथ देश भक्ति की भावना भी छुपी हुई है। और क्यों ना हो जब भारत कुमार, यानी कि हमारे मनोज कुमार जी की फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का गाना हो, तो देश भक्ति के भाव तो आने ही थे! आइए आज सुनें इसी फ़िल्म से "पूर्वा सुहानी आई रे"। लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर और साथियों की आवाज़ें हैं, गीत लिखा है संतोष आनंद ने और संगीतकार हैं कल्याणजी-आनंदजी। गीत फ़िल्माया गया है मनोज कुमार, विनोद खन्ना, भारती और सायरा बानो पर। आइए आज गीतकार व कवि संतोष आनंद जी की कुछ बातें की जाए! दोस्तों, कभी कभी सफलता दबे पाँव आने के बजाए दरवाज़े पर दस्तक देकर आती है। मूलत: हिंदी के जाने माने कवि संतोष आनंद को फ़िल्मी गीतकार बनने पर ऐसा ही अनुभव हुआ होगा! कम से कम गीत लिख कर ज़्यादा नाम और इनाम पाने वाले गीतकारों में शुमार होता है संतोष आनंद का। मनोज कुमार ने 'पूरब और पश्चिम' में उनसे सब से पहले फ़िल्मी गीत लिखवाया था "पूर्वा सुहानी आई रे"। यह गीत उनके जीवन में ऐसे सुगंधित और शीतल पुरवा की तरह आई कि वो तो शोहरत की ऊँचाइयों तक पहुँचे ही, सुनने वाले भी झूम उठे। इसके बाद बनी फ़िल्म 'शोर' और संतोष आनंद ने चटखारे लेते हुए लिखा "ज़रा सा उसको छुआ तो उसने मचा दिया शोर"। इस गीत ने बहुत शोर मचाया, हालाँकि इसी फ़िल्म में उन्होने एक गम्भीर दार्शनिक गीत भी लिखा था जो आज तक उतना ही लोकप्रिय है जितना उस समय हुआ था। जी हाँ, "एक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है, ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है"।संतोष आनंद जी संबंधित और भी कई बातें हम आगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी रखेंगे।

'पूरब और पश्चिम' १९७० की मनोज कुमार निर्मित, निर्देशित व अभिनीत फ़िल्म थी। मूल कहानी श्रीमति शशि गोस्वामी की थी, जिसे फ़िल्म के लिए लिखा मनोज कुमार ने। इस फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, सायरा बानो, प्राण, भारती, निरुपा रॊय, कामिनी कौशल, विनोद खन्ना, राजेन्द्र नाथ आदि। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कमल शर्मा ने आनंदजी भाई से फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के संगीत से जुड़ा सवाल पूछा था, ख़ास कर आज के इस गीत को बजाने से पहले, तो भला यहाँ पर उस बातचीत के अंश को पेश करने से बेहतर और क्या होगा!

प्र: जैसे 'पूरब और पश्चिम', जैसा आप ने ज़िक्र किया, उसमें दो शब्द ही अपने आप में सारी बातें कह देता है। एक तरफ़ पूरब की बात है, दूसरी तरफ़ पश्चिम की बात है, कल्चर डिफ़रेण्ट हैं, उस पूरी तसवीर को संगीत में खड़ा करना और उसको सपोर्ट देना चैलेंजिंग् तो रहा ही होगा?

उ: चलेंजिंग् तो रहता है लेकिन साथ में एक इंट्रेस्टिंग् भी रहता है, इसलिए कि म्युज़िक डिरेक्टर को एक घराने में नहीं रहना पड़ता है, यह होता है न कि मैं इस घराने से हूँ, ऐसा नहीं है, यहाँ पे वेस्टर्ण म्युज़िक भी देना है, इंडियन म्युज़िक भी देना है, हिंदुस्तान के इतने सारे फ़ोक हैं अलग अलग, उन फ़ोक को भी आपको इस्तेमाल करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा सिचुयशन आएगा, वैसा आपको गाना देना पड़ेगा, उसका सब का स्टडी तो करना पड़ेगा। उसके लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूँगा, आपके यहाँ एक प्रोग्राम है जिसमें पुराने, गाँव के गानें आते हैं, क्या है वह?

प्र: 'लोक संगीत'।
उ: 'लोक संगीत'। इसको मैं बहुत सुनता रहा हूँ, यहाँ पे मादल क्यों बज रहा है, यहाँ पे यह क्यों बज रहा है, वो चीज़ें मुझपे बहुत हावी होती रही है, क्योंकि शुरु से मेरी यह जिज्ञासा रही है कि यह ऐसा क्यों है? कि यहाँ मादल क्यों बजाई जाती है। हिमाचल में अगर गाना हो रहा है तो फ़ास्ट गाना नहीं होगा क्योंकि उपर हाइ ऒल्टिट्युड पे साँस नहीं मिलती, तो वहाँ पे आपको स्लो ही नंबर देना पड़ेगा। अगर पंजाब है तो वहँ पे प्लैट्यू है तो आप धनधनाके, खुल के डांस कर सकते हैं। सौराष्ट्र में आप जाएँगे तो वहाँ पे कृष्ण, उषा, जो लेके आए थे, वो आपको मिलेगा, वहाँ का डांडिया एक अलग होता है, यहाँ पे ये अलग होता है, तो ये सारी चीज़ें अगर आप सीखते जाएँ, सीखने का आनंद भी आता है, और इन चीज़ों को काम में डालते हैं तो काम आसान भी हो जाता है।

दोस्तों, इन्ही शब्दों के साथ उस प्रोग्राम में बजाया गया था "पुरवा सुहानी आई रे", तो चलिए हम भी झूम उठते हैं इस गीत के साथ। गीत के शुरुआती बोलों पर ग़ौर कीजिएगा दोस्तों, "कहीं ना ऐसी सुबह देखी जैसे बालक की मुस्कान, या फिर दूर कहीं नींद में हल्की सी मुरली की तान, गुरुबानी गुरुद्वारे में, तो मस्जिद से उठती आज़ान, आत्मा और परमात्मा मिले जहाँ, यही है वह स्थान।" कितने उत्कृष्ट शब्दों में संतोष आनंद जी ने इस देश की महिमा का वर्णन किया है न! आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि गीतकार संतोष आनंद को फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "मैं ना भूलूँगा" के लिये उस साल के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। और इसी फ़िल्म के उनके लिखे गीत "और नहीं बस और नहीं" के लिए गायक महेन्द्र कपूर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"पुकार", गीत बताएं -३ अंक.
2. एक निर्देशक जिनकी सभी फ़िल्में अंग्रेजी के "ए" अक्षर से शुरू होती है, केवल पहली फिल्म को छोडकर, ये उन्हीं की फिल्म का गीत है, उनका नाम बताएं -२ अंक.
3. गीत के गीतकार कौन हैं -२ अंक.
4. धमेन्द्र इस फिल्म के नायक थे, नायिका का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
आज सभी ने जम कर भाग लिए और अंक भी पाए, इंदु जी मुझे भी (सजीव) आपकी बात ठीक लग रही है, सुजॉय जी अपना पक्ष रखेंगें :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, March 8, 2010

आज मधुबातास डोले...भरत व्यास रचित इस गीत के क्या कहने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 367/2010/67

गीत रंगीले' शृंखला की सातवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, इन दिनों हर बातें कर रहे हैं बसंत ऋतु की, फागुन के महीने की, रंगों की, फूलों की, महकती हवाओं की, पीले सरसों के खेतों की। इसी मूड को बरक़रार रखते हुए आज हमने एक ऐसा सुरीला नग़मा चुना है जिसके बोल जितने उत्कृष्ट हैं, उसका संगीत भी उतना ही सुमधुर है। लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में यह है फ़िल्म 'स्त्री' का युगल गीत "आज मधुबातास डोले"। जब शुद्ध हिंदी में लिखे गीतों की बात चलती है, तो ऐसे गीतकारों में भरत व्यास का नाम शुरुआती नामों में ही शामिल किया जाता है। शुरु शुरु में फ़िल्मी गीतों में उर्दू का ज़्यादा चलन था। ऐसे में भरत ब्यास ने अपनी अलग पहचान बनाई और हिंदी का दामन थामा। कविता के ढंग में कुछ ऐसे गीत लिखे कि सुननेवाले मोहित हुए बिना नहीं रह पाए। आज का यह गीत भी एक ऐसा ही उत्कृष्टतम गीतों में से एक है। संगीत की बात करें तो सी. रामचन्द्र ने इस फ़िल्म में संगीत दिया था और शास्त्रीय संगीत की ऐसी छटा उन्होने इस फ़िल्म के गीतों में बिखेरी कि जैसे बसंत ऋतु को एक नया ही रूप दे दिया। "बसंत है आया रंगीला" और आज का प्रस्तुत गीत "आज मधुबातास डोले" इस फ़िल्म के दो ऐसे गीत हैं। इनके अलावा लता जी का गाया "ओ निर्दयी प्रीतम", और महेन्द्र कपूर का गाया "कौन हो तुम" गीत काफ़ी मशहूर हुए थे। 'नवरंग' फ़िल्म के गीतों की कामयाबी के बाद वी. शान्ताराम और सी. रामचन्द्र ने महेन्द्र कपूर को फिर एक बार इस फ़िल्म में मौका दिया और महेन्द्र कपूर ने फिर एक बार उनके उम्मीदों पर खरे उतरे। १९६१ में राजकमल कलामंदिर के बैनर तले निर्मित वी. शान्ताराम की इस फ़ैंटसी फ़िल्म में अभिनय किया था ख़ुद वी. शन्ताराम ने, और उनके साथ थे संध्या, राजश्री, केशवराव दाते और बाबूराव पेढंरकर प्रमुख।

दोस्तों, क्योंकि आज मधुबातास की बात हो रही है, तो क्यों ना इस अलबेले मौसम के नाम एक कविता की जाए जिसे लिखा है चेतन प्रकाश 'चेतन' ने, और जिसे हमने इंतरनेट पर किसी ब्लॊग में पढ़ा। सोचा कि क्यों ना आपके साथ भी इसे बांटा जाए! शीर्षक है 'आया ऋतुराज बसंत है'।

"ऋतुराज बसंत है
नभ में शोभयमान
चौदहवीं का चांद
तारे खिले हैं
अनंत ब्रह्मांड में
बौराई है धरा
ख़ुशी का उसकी अब
नहीं कोई अंत है
आया ऋतुराज बसंत है।

कुद्रत ने लुटाई है
इकट्ठी की हुई दौलत
सफ़ेद मोतियों की छटा
पत्ती पत्ती बिखराई है
सरसों के फूल हैं
हरियाली के गलिचे हैं
चौतरफ़ा प्रकृति में
आमंत्रण ही आमंत्रण है
आया ऋतुराज बसंत है।

है चिकनी चांदनी का असर
खेत खेत चल निकले
रतनारे पतनाले हैं
चुप के आधी रात के
झरना झम जह्म तोड़ रहा
जोड़ रहा दो दिलों के तार
बंदिशेंझरें नेहा के गात
पोर पोर में उसके राग अनंत हैं
आया ऋतुराज बसंत है।

फूल फूल चांदनी पसरी है
मंद पवन कान में फुसफुसा रहा
गेंदा भी हाँ में हाँ मिला रहा
नीरवता में कोई गुनगुना रहा
बासंती राग, लगाए तन बदन में आग
शायद याद कोई भूली बिसरी है
पूर्वाई मे ये टीस उभरी है
चांद हँसे और सुरभीत दिग दिगंत है
आया ऋतुराज बसंत है।

तो चलिए, हम भी इस मद मंद पवन के साथ डोलें और सुनें "आज मधुबातास डोले"।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र ने कोल्हापुर में १९३५ में सम्राट सिनेटोन कृत मराठी में निर्मित 'नागानंद' में नायक का अभिनय किया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. इस गीत के लिए कोई शब्द का सूत्र नहीं देंगें, देशभक्ति फिल्मों के लिए मशहूर अभिनेता/निर्देशक की इस अमर फिल्म के इस गीत को आप खुद पहचानिए-३ अंक.
2. गायक, गायिकाओं की पूरी फ़ौज है इस समूह गीत में, एक अभिनेता की भी आवाज़ है बताएं उनका नाम-3 अंक.
3. बसन्त उत्सव के लिए ख़ास बने इस गीत को किसने लिखा है-२ अंक.
4. किस संगीतकार जोड़ी ने इस मदमस्त गीत को रचा है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी चूके तो इंदु जी ने मौका झपट लिया, शरद जी भी सही जवाब लाये और पदम सिंह जी ने भी दो अंक कमाए, बधाई सभी विजेताओं को
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, January 20, 2010

एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है, गहरी सच्चाईयों की सहज अभिव्यक्ति यानी आवाज़े महेंदर कपूर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 320/2010/20

र आज हम आ पहुँचे हैं 'स्वरांजली' की अंतिम कड़ी में। गत ९ जनवरी को पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर साहब की जयंती थी। आइए आज 'स्वरांजली' की अंतिम कड़ी हम उन्ही को समर्पित करते हैं। महेन्द्र कपूर हमसे अभी हाल ही में २७ सितंबर २००८ को जुदा हुए हैं। ९ जनवरी १९३४ को जन्मे महेन्द्र कपूर साहब के गाए कुछ गानें आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं। बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में अक्सर हमने उनकी आवाज़ पाई है। साहिर लुधियानवी के बोल, रवि का संगीत और महेन्द्र कपूर की आवाज़ चोपड़ा कैम्प के कई फ़िल्मों मे साथ साथ गूंजी। इस तिकड़ी के हमने फ़िल्म 'गुमराह' के दो गानें सुनवाए हैं, "आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया" और "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों"। आज भी हम एक ऐसा ही गीत लेकर आए हैं, लेकिन यह फ़िल्म बी. आर. चोपड़ा की दूसरी फ़िल्मों से बिल्कुल अलग हट के है। यह है १९७३ की फ़िल्म 'धुंध' का शीर्षक गीत, "संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है"। साहिर लुधियानवी के क्रांतिकारी गीतों ने बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों को एक अलग ही दर्जे तक पहुँचाया है। और रवि के संगीत में और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में ये गानें बहुत खुलकर सामने आए हैं और कालजयी बन गए हैं। आज का प्रस्तुत गीत एक दार्शनिक गीत है जिसमें मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में कहा गया है। एक सस्पेन्स थ्रिलर होने की वजह से फ़िल्म का नाम 'धुंध' रखा गया और साहिर साहब ने सस्पेन्स को बरक़रार रखते हुए कितनी ख़ूबी से जीवन दर्शन को सामने लाया है इस गीत के माध्यम से। मुझे नहीं लगता कि धुंध पर इससे बेहतर और इससे सरल कोई गीत लिखा जा सकता है!

'धुंध' १९७३ की फ़िल्म थी। बी. आर. चोपड़ा निर्मित और निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य कलाकार थे संजय ख़ान, ज़ीनत अमान, डैनी और नवीन निश्चल। यह फ़िल्म अगाथा क्रिस्टी के नाटक 'ऐन अन-एक्स्पेक्टेड गेस्ट' पर आधारित थी, जिसका हिंदी फिल्मीकरण किया लेखक अख्तर-उल-रहमान, अख़्तर मिर्ज़ा और सी. जे. पावरी ने। इस रोंगटे खड़े कर देने वाली मर्डर मिस्ट्री का प्लॊट कुछ इस तरह से था कि एक रात चन्द्रशेखर (नवीन निश्चल) की गाड़ी गहरे धुंद में ख़राब हो जाती है। कार की हेडलाइट से उन्हे सामने एक मकान नज़र आता है। दरवाज़े पर खटखटाने जाते हैं तो दरवाज़ा खुला हुआ ही पाते हैं। वो अंदर जाते हैं और देखते हैं कि कुर्सी पर एक आदमी बैठा हुआ है। उनसे वो एक टेलीफ़ोन करने की इजाज़त माँगते हैं। उस आदमी से कोई जवाब ना पाकर जैसे ही उन्हे हिलाते हैं तो वो आदमी (डैनी) नीचे गिर जाता है। दरअसल वो उस आदमी की लाश थी। चन्द्रशेखर सामने रखे टेलीफ़ोन से जैसे ही पुलिस को ख़बर करने के लिए आगे बढ़ता है तो अंधेरे से रानी रणजीत सिंह (ज़ीनत अमान, डैनी की पत्नी) हाथ में रिवोल्वर लिए उसके सामने आ जाती है। वो बताती है कि उसी ने अपने उस अत्याचारी पति का ख़ून किया है। चन्द्रशेखर रानी की तरफ़ आकर्षित भी होता है, उस पर दया भी आती है। दोनों मिल कर लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचता है। क्या होता है आगे चलकर? आख़िर क्या है इस ख़ून का राज़? कौन है ख़ूनी? यही है इस फ़िल्म की कहानी। बड़ी ज़बरदस्त फ़िल्म है, अगर आप ने अब तक नहीं देख रखी है, तो ज़रूर देखिएगा। मेरे अनुसार हिंदी सिनेमा के सस्पेन्स फ़िल्मों में यह एक अव्वल दर्जे का सस्पेन्स थ्रिलर है। ख़ैर, अब वापस मुड़ते हैं आज के गीत पर। 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में ममता सिंह ने जब महेन्द्र कपूर से पूछा था कि इस गीत को गाने के लिए क्या उन्हे कोई विशेष तैयारी करनी पड़ी थी, तो उनका जवाब था - "तब तक मैं बहुत गानें गा चुका था, इसलिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। इस गाने का मूड भी वही था जो "नीले गगन के तले" का था।" चलिए दोस्तों, महेन्द्र कपूर साहब की याद में सुनते हैं यह गीत और 'स्वरांजली' शृंखला को समाप्त करते हुए हम भी यही दोहराते हैं कि "संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है"। धन्यवाद !



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

मेरी बेकरारियों का सबब मत पूछ,
आजमा मेरे सब्र को तू इस तरह,
रोये हैं मैंने खून के आंसू बरसों,
तेरे साथ को हूँ मैं तरसा इस तरह...

अतिरिक्त सूत्र - महिला संगीतकारों में इनका नाम अग्रिणी है

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह अवध जी, आपको विजेता के रूप में पाकर आज बड़ी खुशी हो रही है, २ अंक मुबारक हो आपको...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, September 7, 2009

तू हुस्न है मैं इश्क हूँ, तू मुझमें है मैं तुझमें हूँ....साहिर, रवि, आशा और महेंद्र कपूर वाह क्या टीम है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 195

शा भोंसले ने जिन जिन पार्श्व गायकों के साथ सब से ज़्यादा लोकप्रिय गानें गाये हैं, उनमें किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी के बाद, मेरे ख़याल से महेन्द्र कपूर का नाम आना चाहिए। बी. आर. चोपड़ा कैम्प के सदस्यों में संगीतकार रवि और गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ साथ आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर ने भी एक लम्बे समय तक काम किया है। आशा जी और महेन्द्र कपूर के गाए युगल गीतों में 'नवरंग', 'धूल का फूल', 'हमराज़', 'गुमराह', 'आदमी और इंसान', 'वक़्त', 'पति पत्नी और वो', और 'दहलीज़' जैसी मशहूर फ़िल्मों के गानें रहे हैं। आज हम जिस गीत को आप तक पहुँचा रहे हैं वह है फ़िल्म 'हमराज़' का, "तू हुस्न है मैं इश्क़ हूँ, तू मुझ में है मैं तुझ में हूँ"। करीब करीब ७ मिनट २७ सेकन्ड्स के इस गीत में इतिहास की मशहूर प्रेम कहानियों को बड़ी ही ख़ूबसूरती से साहिर साहब ने ज़िंदा किया है। सोहनी-महिवाल, सलीम-अनारकलि तथा रोमियो जुलियट की दास्तान का बयान हुआ है इस गीत में। १९६७ में बनी फ़िल्म 'हमराज़' बी. आर. चोपड़ा की एक मशहूर फ़िल्म रही है। फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी १६ अक्टुबर के दिन। राज कुमार, सुनिल दत्त और विम्मी अभिनीत इस फ़िल्म के गीतों ने ख़ूब शोहरत पायी थी। रवि और साहिर की जोड़ी उन दिनों कामयाबी की ऊँचाइयाँ छू रही थी। यहाँ पर रवि जी से की गयी बातचीत का एक अंश प्रस्तुत करता हूँ जिसमें उन्होने साहिर साहब के सेन्स औफ़ ह्युमर के बारे में टिप्पणी की थी - "साहिर साहब बड़े ही सिम्पल किस्म के थे। वो गम्भीर से गम्भीर बात को भी बड़े आसानी से कह डालते थे। एक किस्सा आप को सुनाता हूँ। उन दिनों हम ज़्यादातर बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों के लिए काम करते थे। तो शाम के वक़्त हम मिलते थे, बातें करते थे। तो एक दिन साहिर साहब ने अचानक कहा 'देश में इतने झंडे क्यों है? और अगर है भी तो उन सब में डंडे क्यों है?" यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी ज़ोर से हँस पड़े।"

दोस्तों, आशा जी पर केन्द्रित इस शृंखला में शामिल हो रहे गीतों के बारे में जानकारी तो हम देते ही जा रहे हैं, साथ ही जहाँ तक संभव हो रहा है, हम आशा जी से जुड़ी बातें भी आप तक ज़्यादा से ज़्यादा पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। आज क्योंकि महेन्द्र कपूर के साथ गाया हुआ आशा जी का गीत बज रहा है, तो क्यों न जान लें कि महेन्द्र कपूर ने आशा जी के बारे में विविध भारती को क्या कहा था।

प्र: आशा जी के साथ आप ने बहुत सारे गानें गाए हैं, तो उन से जुड़ी कोई ख़ास बात आप बताना चाहेंगे?

"आशा जी बहुत फ़्रैंक हैं, अगर कोई मिस्टेक हो जाए तो कहती हैं कि 'भ‍इया, इसको ऐसे नहीं, ऐसे गाओ, बहुत हेल्प करती थीं, दोनों बहनें, बहुत हेल्प करती थीं, हँसी मज़ाक भी करती थीं।"

प्र: गले के लिए आप किन चीज़ों से परहेज़ करते हैं?

"मैं तो सब खाता हूँ, चाट, मैने पहले भी बताया था, चौपाटी से, बांद्रा के ऐल्कोम मार्केट से मँगवा कर खाते हैं। चाट खाने के बाद गरम चाय पी लो तो फिर सब ठीक है, यह मुझे आशा दीदी ने बताया था।"

तो दोस्तों, आइए आप और हम मिल कर सुनते हैं प्यार करने वाले अमर प्रेमियों की दास्तान आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल होंगें आशा के साथ तान मिलते अपने किशोर दा.
२. इस फिल्म के एक गीत में किशोर के लिए रफी साहब ने पार्श्वगायन किया था.
३. मुखड़े में दो प्रान्तों के लोगों को बुलाये जाने वाले नाम है....उनमें से एक मद्रास है...

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी २२ अंकों के साथ अब आप भी शीर्ष पर विराजमान हो गए हैं पराग जी के साथ....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, August 23, 2009

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों....साहिर ने लिखा यह यादगार गीत.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 180

रद तैलंग जी के फ़रमाइशी गीतों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं उनकी पसंद के पाँचवे और अंतिम गीत पर, और साथ ही हम छू रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के १८०-वे अंक को। आज का गीत है निर्माता-निर्देशक बी. आर चोपड़ा की फ़िल्म 'गुमराह' का "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनो", जिसे महेन्द्र कपूर ने गाया है। इससे पहले भी हम ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इसी फ़िल्म का एक और गीत आप को सुनवाया था महेन्द्र कपूर साहब का ही गाया हुआ, "आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया"। इस फ़िल्म के बारे में तमाम जानकारी आप उस आलेख में पढ़ सकते हैं। आज चलिए बात करते हैं महेन्द्र कपूर की। अभी पिछले ही साल २७ सितंबर के दिन महेन्द्र कपूर का देहावसान हो गया। वो एक ऐसे गायक रहे हैं जिनकी गायकी के कई अलग अलग आयाम हैं। एक तरफ़ अगर ख़ून को देश भक्ति के जुनून से गर्म कर देनेवाले देशभक्ति के गीत हैं, तो दूसरी तरफ़ शायराना अंदाज़ लिए नरम-ओ-नाज़ुक प्रेम गीत, एक तरफ़ जीवन दर्शन और आशावादी विचारों से ओत-प्रोत नग़में हैं तो दूसरी तरफ़ ग़मगीन टूटे दिल की सदा भी उनकी आवाज़ में ढलकर कुछ इस क़दर बाहर आयी है कि सीधे दिल पे असर कर गई। "तुम्हे भी कोई उलझन रोकती है पेश कदमी से, मुझे भी लोग कहते हैं के ये जलवे पराये हैं, मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की, तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं"। साहिर लुधियानवी के बोल और रवि का संगीत था इस फ़िल्म में।

महेन्द्र कपूर के साथ संगीतकार रवि का एक बहुत लम्बा साथ रहा। वजह शायद यही कि ये दोनों चोपड़ा कैम्प के नियमित सदस्य थे। ऐसा भी कह सकते है कि रवि के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से लोकप्रिय गीत गाए हैं। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में महेन्द्र कपूर ने रवि साहब के बारे में कहा था - "रवि जी एक बहुत बड़े संगीतकार हैं, जो 'पोएट्री' समझते हैं, और धुन बनाते वक़्त 'पोएट्री' को 'डिस्टर्ब' नहीं करते। वो हर गाने पर बहुत मेहनत करते हैं। हर गीत के २ से ४ अलग अलग धुनें बनाते हैं और फिर पार्श्व गायक और दूसरे लोगों से सब से अच्छी वाली धुन चुनने के लिए कहते हैं। और तब जाके 'फ़ाइनल ट्युन' निर्धारित होती है।" ९ जनवरी १९३४ को अमृतसर मे जन्मे महेन्द्र कपूर अपने ४० दिन की आयु में ही बम्बई आ गए। ५ वर्ष की आयु में उन्होने गाना शुरु किया। १२ वर्ष की आयु में वे पहुँच गए अपने आदर्श मोहम्मद रफ़ी साहब के पास। रफ़ी साहब ने उन्हे समझाया कि अगर एक अच्छा गायक बनना है तो पहले शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। और हर गायक का अपना एक मौलिक 'स्टाइल' होना चाहिए। १९५७ में जब वे कालेज में पढ़ रहे थे तब 'All India Metro Murphy competition' में उन्होने हिस्सा लिया जिसका विषय था हिंदी फ़िल्मों में पार्श्व गायन का मोहरा। हालाँकि महेन्द्र कपूर ने १९५३ में वी. बल्सारा की फ़िल्म 'मदमस्त' में गा चुके थे, पर इस प्रतियोगिता ने उनके लिए पार्श्व गायन का द्वार खोल दिया। इस प्रतियोगिता में जज थे नौशाद और सी. रामचन्द्र। इस प्रतियोगिता को जीतने के बाद नौशाद और सी. रामचन्द्र, दोनों ने महेन्द्र कपूर से गाने गवाए (नौशाद -सोहनी महिवाल, सी. रामचन्द्र - नवरंग)। फिर उसके बाद महेन्द्र कपूर को कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। तो दोस्तों, ये तो थी महेन्द्र कपूर की कुछ बातें, आइए अब 'गुमराह' फ़िल्म के उस गीत को सुना जाए जिसकी फ़रमाइश हमें लिख कर भेजी है शरद तैलंग साहब ने।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मुकेश के गाये गीतों में से ऐसे गीत जो उन्हें खुद हैं सबसे प्रिय, कल है इस शृंखला का पहला गीत.
२. शैलेन्द्र हैं गीतकार.
३. मुखड़े की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"खुदा".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी फिलहाल के लिए रेस में आप आगे निकल आये १६ अंकों के लिए बधाई....शमिख जी पूरे गीत के लिए धन्येवाद. और मंजूषा जी, आपकी महफिल भी खूब जमी हुई है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, August 17, 2009

मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती...गुलशन बावरा ने लिखा इस असाधारण गीत से इतिहास

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 174

र आज है तिरंगे के तीसरे रंग, यानी कि हरे रंग की बारी। हरा रंग है संपन्नता का, ख़ुशहाली का। "ख़ुशहाली का राज है, सर पे तिरंगा ताज है, ये आज का भारत है ओ साथी आज का भारत है"। जी हाँ दोस्तों, इस बात में कोई शक़ नहीं कि देश प्रगति के पथ पर क्रमश: अग्रसर होता जा रहा है। हरित क्रांति से देश में खाद्यान्न की समस्या बड़े हद तक समाप्त हुई है। लेकिन अब भी देश की आबादी का एक ऐसा हिस्सा भी है जिसे दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं। इस तिरंगे का हरा रंग उस दिन सार्थक होगा जिस दिन देश में कोई भी आदमी भूखा न होगा। आज तिरंगे के हरे रंग को सलामी देते हुए हमने जिस गीत को चुना है उस गीत से बेहतर शायद ही कोई और गीत होगा इस मौके के लिए। फ़िल्म 'उपकार' का सदाबहार देश भक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती" आप ने हज़ारों बार सुना होगा, आज भी सुनिए, रोज़ सुनिए, क्योंकि इस तरह के गीत रोज़ रोज़ नहीं बनते। यह एक ऐसा देश भक्ति गीत है जिसने एक इतिहास रचा है। शायद ही कोई स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का पर्व होगा जो इस गाने के बग़ैर मनाया गया होगा! इस गीत में भारत के एक साधारण गाँव की दैनन्दिन जीवन शैली, किसानों की दिन चर्या को दर्शाया गया है, लेकिन देश भक्ति के रंग में ढाल कर। मनोज कुमार देश भक्ति फ़िल्मों के बादशाह माने जाते हैं। उनका नाम भारत कुमार भी पड़ गया था। फ़िल्म 'शहीद' के बाद 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', और 'क्रांति' जैसी कई कामयाब देश भक्ति फ़िल्मों का उन्होने निर्माण किया। फ़िल्म 'उपकार' के इस गीत को सुनते हुए हमारा दिल इस बात पर गर्व अनुभव करता है कि हम ने इस देश की मिट्टी में जन्म लिया।

फ़िल्म 'उपकार' की बाक़ी बातें हम फिर किसी दिन करेंगे, आज सिर्फ़ इस गीत के बारे में कहने को जी चाह रहा है। इस फ़िल्म में कई गीतकार थे जैसे कि क़मर जलालाबादी, इंदीवर और गुलशन बावरा। प्रस्तुत गीत गुल्शन बावरा का लिखा हुआ है और शायद यह उनके फ़िल्मी सफ़र का सब से ख़ास गीत रहा होगा। गायक महेंद्र कपूर साहब को तो थी ही महारथ हासिल देश भक्ति के गानें गाने की। और संगीतकार कल्यानजी-आनंदजी ने क्या संगीत संयोजन किया है इस गीत में, कमाल है! किसी गाँव का एक पूरा दिन हमारी आँखों के सामने ला खड़ा कर दिया है सिर्फ़ संगीत और ध्वनियों की सहायता से। इस संगीतकार जोड़ी की जितनी तारीफ़ की जाये इस गीत के लिए, कम ही होगी! तभी तो जब आनंदजी विविध भारती पर पधारे थे तो 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में उनसे इस गीत से संबंधित विस्तृत जानकारी ली गयी थी, जो आज हम ख़ास आप के लिए यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्र: आप की फ़िल्म 'उपकार', जो 'हिट', बड़ी 'सुपर डुपर हिट' रही, उसमें एक गाना है "मेरे देश की धरती सोना उगले", उसमें भी बहुत सारे 'साउंड एफ़ेक्ट्स' हैं।

क्या है कि मनोज जी की यह पहली पिक्चर थी। उनका काम हम ने देखा हुआ नहीं था, नहीं तो हम लोग क्या करते हैं कि पहले हम 'डिरेक्टर' का, उसका 'ऐंगल' क्या है, उसकी 'टेकिंग्‍' क्या है, हर 'डिरेक्टर' की एक 'ऐंगल' होती है, इस तरह से इनका कोई काम देखने को नहीं मिला था। 'हिमालय की गोद में' में उनके साथ काम किया था लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला था कि इनका ये है, ऐसा है। तो वो सेठ जी बुलाते थे हम लोगों को। 'सेठ जी, मैं गाँव का आदमी हूँ और सुबह से शाम तक मुझे ये चाहिए कि एक गाने में सब कुछ आ जाए'। हमने कहा, 'सुबह से शाम, मतलब? समझे नहीं कि क्या चाहिए'। बोले कि 'गाँव में मैं किसान आदमी हूँ, शाम तक खेती में जो काम होता है, उसमें सब कुछ चाहता हूँ और यह वतन की बात है, देश की धरती की बात है'। तो बोले कि 'ठीक है, गाँव में तो आप भी रहे हैं, जो हम देंगे वो कर के लायेंगे क्या आप?' एक दूसरे की छेड़-खानी हम लोग आपस में बहुत करते थे। कोई बुरा नहीं मानता था, एक दूसरे के काम से लिए हम ऐसा बोलते थे। वह गाना जो हुआ, उसमें हम ने सारे 'एफ़ेक्ट्स' डाले। पंछियों की चहचहाहट, फिर वह लहट का चलना, बैलों का चलना, फिर ये, वो, सब कुछ, और ये करने के बाद, काफ़ी 'टाइम' लगा इसमें, क्योंकि 'एफ़ेक्ट्स' में काफ़ी 'टाइम' लग जाता है।

प्र: कितने घंटे लगे थे इस गाने को रिकार्ड करने में?

इस गाने में 'पार्ट्स' भी थे, तो इस गाने को सवेरे से 'स्टार्ट' किए थे, कुछ १६-१८ घंटे लगे होंगे, only in recording, उससे पहले 'रिहर्सल' होता रहा।


प्र: लेकिन 'फ़ाइनल प्रोडक्ट' जो मिला आप को...

क्योंकि सब कुछ चाहिए था उसमें। कोरस में गानेवाले भी चाहिए, बैल की आवाज़ भी चाहिए, लहट की भी आवाज़ आनी चाहिए, उसी 'टाइम' पे 'सिंगर' की भी आवाज़ आनी चाहिए, महेंद्र कपूर जी की आवाज़ थी बड़ी मज़बूत, वो टिके रहे 'लास्ट' तक। इस गाने की रिकार्डिंग्‍ से पहले एक बात बनी थी कि "इस देश की धरती" कि "मेरे देश की धरती"? ये सब छोटी छोटी बातें हैं, पहले यह लिखा गया था कि "इस देश की धरती सोना उगले"। बोले कि एक तो "उगले" शब्द लोग समझेंगे नही, वो बोले कि 'नहीं, यहाँ तो समझते हैं, आप के वहाँ नहीं समझते होंगे'। 'ठीक है, लेकिन "इस देश की धरती" में 'फ़ीलिंग्स्‍' नहीं आती है, "मेरे" में ज़्यादा अपनापन का अहसास होता है'। तो इस पर बहस चल रही थी कि "इस" रखें कि "मेरे" रखें। 'सिटिंग्‍' चलती रही कि "इस" रखें कि "मेरे" रखें, "मेरे" रखें कि "इस" रखें। युं करते करते आख़िर में "मेरे देश की धरती", और इस गाने ने...

प्र: इतिहास रच दिया!

इतिहास रच दिया!!!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल का एपिसोड समर्पित होगा गीतकार गुलज़ार को.
2. सलिल चौधरी है संगीतकार.
3. मुखड़े में एक से नौ के बीच के एक अंक का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी अब एक बार फिर आप नंबर १ हो गयी हैं, १४ अंकों के लिए बधाई. वाकई इतने आसान गीत को तो यूं झट से पहचान लिया जाना चाहिए थे...खैर हम ये मान के चलें कि हर कोई शरद जी या स्वप्न जी जैसा धुरंधर नहीं हो सकता :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, May 9, 2009

आप आये तो ख़्याल-ए-दिले नाशाद आया....साहिर के टूटे दिल का दर्द-ए-बयां बन कर रह गया ये गीत.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 75

निर्माता-निर्देशक बी. आर. चोपड़ा अपनी फ़िल्मों के लिए हमेशा ऐसे विषयों को चुनते थे जो उस समय के समाज की दृष्टि से काफ़ी 'बोल्ड' हुआ करते थे। और यही वजह है कि उनकी फ़िल्में आज के समाज में उस समय की तुलना में ज़्यादा सार्थक हैं। हमारी पुरानी फ़िल्मों में नायिका का चरित्र बिल्कुल निष्पाप दिखाया जाता था। तुलसी के पत्ते की तरह पावन और गंगाजल से धुला होता था नायिका का चरित्र। शादी से बाहर किसी ग़ैर पुरुष से संबंध रखने वाली नायिका की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन ऐसा ही कुछ कर दिखाया चोपड़ा साहब ने सन १९६३ की फ़िल्म 'गुमराह' में। एक शादी-शुदा औरत (माला सिन्हा) किस तरह से अपने पति (अशोक कुमार) से छुपाकर अपने पहले प्रेमी (सुनिल दत्त) से संबंध रखती है, लेकिन बाद में उसे पता चलता है कि जिस आदमी से वो छुप छुप कर मिल रही है उसकी असल में शादी हो चुकी है (शशीकला से)। इस कहानी को बड़े ही नाटकीय और भावुक अंदाज़ में पेश किया गया है इस फ़िल्म में। अशोक कुमार, सुनिल दत्त, माला सिन्हा और शशीकला के जानदार अभिनय, बी. आर. चोपड़ा के सशक्त निर्देशन, और साहिर-रवि के गीत संगीत ने इस फ़िल्म को कालजयी बना दिया है।

गीतकार साहिर लुधियानवी, संगीतकार रवि, गायक महेन्द्र कपूर और गायिका आशा भोंसले बी. आर. फ़िल्म्स के नियमित सदस्य हुआ करते थे। इस बैनर की कई फ़िल्मों में इस टीम का योगदान रहा है, और 'गुमराह' इन्ही में से एक उल्लेखनीय फ़िल्म है। सुनिल दत्त का किरदार इस फ़िल्म में एक गायक का था और इस वजह से उन पर कई गाने फ़िल्माये भी गये जिन्हें अपनी आवाज़ से नवाज़ा महेन्द्र कपूर ने। इस फ़िल्म के महेन्द्र कपूर के गाये कुछ 'हिट' गानें गिनायें आपको? "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनो", "ये हवा ये हवा..... आ भी जा आ भी जा", "इन हवाओं में इन फिजाओं में तुझको मेरा प्यार पुकारे" जैसे मशहूर गानो ने इस फ़िल्म की शोभा बढ़ाई। इसी फ़िल्म में एक और गीत भी था "आप आये तो ख्याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया", महेन्द्र कपूर की आवाज़ में यह गीत सिर्फ़ संगीत की दृष्टि से ही नहीं बल्कि साहिर साहब की बेहतरीन उर्दू शायरी की वजह से भी एक अनमोल नग्मा बन कर रह गया है। "आपके लब पे कभी अपना भी नाम आया था, शोख़ नज़रों से कभी मोहब्बत का सलाम आया था, उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था", अपनी ज़िन्दगी की अनुभवों, निराशाओं, और व्यर्थतायों को साहिर अपने कलम से काग़ज़ पर उतारते चले गये। बचपन में ही उनकी माँ उनके पिता की अय्याशियों से तंग आकर उनसे अलग हो गयीं और साहिर को लेकर घर छोड़ दिया था। और तभी से फूटने लगा साहिर के कोमल मन में विद्रोह का अंकुर। ज़िन्दगी की परेशानियों ने उन्हे तोड़कर रख दिया था। कालेज के पहले असफल प्रेम ने उन्हे एक बार फिर से झकझोर कर रख दिया। बाद में गीतकार बनने के बाद जब भी कभी किसी टूटे हुए दिल की पुकार लिखने की बात आयी तो साहिर ने जैसे अपने दिल की भड़ास, अपना वही पुराना दर्द उड़ेल कर रख दिया। और फ़िल्म 'गुमराह' का यह नग्मा भी कुछ इसी अंदाज़ का है। "रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए, कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए, यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने अहसान किये, पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया, कितने भूले हुए जख्मों का पता याद आया"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. मुकेश का एक दर्द भरा गीत.
२. इसी फिल्म में एक मशहूर "राखी" गीत भी था जो आगे चल कर इस त्यौहार का ही पर्याय बन गया.
३. मुखड़े में शब्द है - "संगदिल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी ने फिर से बाज़ी मारी है आज. अवध जी, फिल्म गुमराह है, हमराज़ नहीं, वैसे हमराज़ के भी सभी गीत लाजवाब हैं और फिल्म भी जबरदस्त. रचना जी आपका भी जवाब सही है. मनु जी आप तो "सेंटी" हो गए...आचार्य जी महफिल की शोभा बढाने के लिए आपका भी आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Sunday, April 19, 2009

हम जब सिमट के आपकी बाहों में आ गए - साहिर का लिखा एक खूबसूरत युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 56

. पी. नय्यर ने अगर आशा भोंसले से सबसे ज़्यादा गाने लिये तो संगीतकार रवि ने भी लताजी से ज़्यादा आशाजी से ही गाने लिये। यहाँ तक की रवि के सबसे सफलतम गीत आशाजी ने ही गाये हैं। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पेश है संगीतकार रवि और गायिका आशा भोंसले की जोड़ी का एक शायराना नग्मा । महेन्द्र कपूर की भी आवाज़ शामिल है इस गाने में। जोड़ी की अगर बात करें तो रवि के साथ शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की जोड़ी भी ख़ूब जमी थी। हमराज़, नीलकमल, पारस, काजल, दो कलियाँ, गुमराह, आँखें, एक महल हो सपनों का, धुंध, और वक़्त जैसी कामयाब फ़िल्मों में साहिर और रवि ने एक साथ काम किया। आज aasha -महेन्द्र की आवाज़ों में जो गीत हम चुन कर लाए हैं वह है फ़िल्म वक़्त का। साहिर हमेशा से सीधे शब्दों में गहरी बात कह जाते थे। इस गीत में भी सीधे सीधे वो लिखते हैं कि "हम जब सिमट के आपकी बाहों में आ गए, लाखों हसीन ख़्वाब निगाहों में आ गए"। बात है तो बड़ी सीधी, लेकिन तरीका बेहद सुंदर और रुमानीयत से भरपूर।

फ़िल्म वक़्त बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था यश चोपड़ा ने। यह हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास की पहली 'मल्टी-स्टारर फ़िल्म' थी जिसमें कई बड़े और दिग्गज कलाकारों ने काम किया जैसे कि सुनिल दत्त, साधना, राज कुमार, शशि कपूर, शर्मिला टैगोर, बलराज साहनी, मोतीलाल और रहमान। पहले बी. आर. चोपड़ा इस फ़िल्म को पृथ्वीराज कपूर और उनके तीन बेटे राज, शम्मी और शशि को लेकर बनाना चाहते थे, लेकिन हक़ीक़त में केवल शशि कपूर को ही फ़िल्म में 'कास्ट' कर पाए। 'वक़्त' ने १९६६ में बहुत सारे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते, जैसे कि धरम चोपड़ा (सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र), अख़्तर-उल-इमान (सर्वश्रेष्ठ संवाद), यश चोपड़ा (सर्वश्रेष्ठ निर्देशक), अख़्तर मिर्ज़ा (सर्वश्रेष्ठ कहानी), राज कुमार (सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता), और बी. आर. चोपड़ा (सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म)। भले ही इस फ़िल्म के गीत संगीत के लिए किसी को कोई पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन असली पुरस्कार तो जनता का प्यार है जो इस फ़िल्म के गीतों को भरपूर मिला और आज भी मिल रही है। चलिये, उसी प्यार को बरक़रार रखते हुए सुनिये आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. एक और बेमिसाल युगल गीत मुकेश और गीता दत्त का.
२. रोशन साहब का संगीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"बेवफा"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर नीरज और मनु जी की टीम को बधाई...सही गीत के लिए.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Wednesday, April 8, 2009

जो चला गया उसे भूल जा....मुकेश की आवाज़ में गूंजता दर्द

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 46

गायक मुकेश ने सबसे ज़्यादा संगीतकार कल्याणजी आनंदजी और शंकर जयकिशन के लिए लोकप्रिय गीत गाए हैं, और कई गीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए भी. संगीतकार नौशाद के मनपसंद गायक थे मोहम्मद रफ़ी जिनसे उन्होने अपने सबसे ज़्यादा गाने गवाए. लेकिन कुछ गीत ऐसे भी हैं नौशाद साहब के जिन्हे मुकेश ने गाए हैं. एक ऐसी ही फिल्म है "साथी" जिसमें मुकेश ने कई गीत गाए. इन्ही में से एक गीत आज हम आप को सुनवा रहे हैं 'ओल्ड इस गोल्ड' में. फिल्म "साथी" आई थी सन 1968 में. दक्षिण के निर्माता वीनस कृष्णमूर्ती की यह फिल्म थी जिसके लिए उन्होने नौशाद और मजरूह सुल्तानपुरी को गीत संगीत का भार सौंपा गया. इस फिल्म में सबसे लोकप्रिय गीत लताजी ने गाए - "मेरे जीवन साथी कली थी मैं तो प्यासी", "यह कौन आया रोशन हो गयी महफ़िल" और "मैं तो प्यार से तेरे पिया माँग सजाउंगी". मुकेश और सुमन कल्याणपुर का गाया "मेरा प्यार भी तू है यह बहार भी तू है" भी सदाबहार नग्मों में शामिल होता है. लेकिन इस फिल्म में मुकेश की आवाज़ में 3 गाने ऐसे भी हैं जिन्हे दूसरे गीतों के मुक़ाबले थोडा सा कम सुना गया है. और इसीलिए आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम आप को सुनवा रहे हैं इनमें से एक गीत.

मुकेश की आवाज़ में "जो चला गया उसे भूल जा" गीत में एक रूहानी, एक 'हॉनटिंग' सा अहसास है. गीत का संगीत संयोजन कुछ इस तरह का है कि जिसे सुन कर ऐसा लगता है कि यह फिल्म जैसे किसी 'सस्पेन्स' या 'हॉरर सब्जेक्ट' पर बनाई गयी है. लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है. मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों में भी उसी डरावने अंदाज़ की झलक मिलती है, जैसे कि "यह हयात-ए-मौत की है डगर, कोई खाक में कोई खाक पर". गीत के 'इंटरल्यूड' संगीत में भी कुछ इसी तरह की बात है. कुल मिलाकर यह गीत टूटे दिल की पुकार है जिसका असर कुछ ऐसा है कि सुनने के बाद एक लंबे समय तक इसका असर बरक़रार रहता है. हमें पूरी उम्मीद है की इस गीत को सुनने के बाद कई दिनों तक इसका असर आप के दिल-ओ-दिमाग़ पर छाया रहेगा. तो सुनिए यह रूहानी गीत फिल्म साथी से...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. शांति माथुर के गाये गिने चुने गानों में से एक.
२. ताजा ख़बरों की आड़ में देश के हालातों पर तीखा व्यंग है गीत के बोलों में.
३. महबूब खान की फिल्म और गीत संगीत जोड़ी- शकील और नौशाद.

कुछ याद आया...?



खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Thursday, January 29, 2009

संगीतकार हमेशा गायक से ऊँचा दर्जा रखता है, मानना था ओ पी नैयर का

(पहले अंक से आगे ...)

"किस्मत ने हमें मिलाया और किस्मत ने ही हमें जुदा कर दिया....", अक्सर उनके मुँह से ये वाक्य निकलता था. आशा के साथ सम्बन्ध विच्छेद होने के बाद ओ पी का जीवन फ़िर कभी पहले जैसा नही रहा. इस पूरी घटना ने उनके पारिवारिक रिश्तों में भी दरारें पैदा कर दी थी. ये सब उनकी पत्नी, तीन बेटियों और एक बेटे के लिए लगभग असहनीय हो चला था. कुंठा से भरे ओ पी ने किसी साधू की सलाह पर सारी धन संपत्ति, घर (जो लगभग ६ करोड़ का था उन दिनों), गाड़ी, बैंक बैलेंस आदि का त्याग कर सब से अपना नाता तोड़ लिया. पर उनके परिवार ने कभी भी उन्हें माफ़ नही किया....कुछ ज़ख्म कभी नही भरते शायद. 1989 में घर छोड़ने के बाद उन्होंने एक मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीय परिवार के साथ पेइंग गेस्ट बन कर रहने लगे, और मरते दम तक यही उनका परिवार रहा. यहाँ उन्हें वो प्यार और वो सम्मान मिला जिसे शायद उम्र भर तलाशते रहे ओ पी. उस परिवार के एक सदस्या के अनुसार उन्हें अपने परिवार और फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में बात करना बिल्कुल नही अच्छा लगता था. सुरैया, शमशाद बेगम और कभी कभी गजेन्द्र सिंह (स रे गा माँ पा फेम) ही थी जिनसे वो बात कर लिया करते थे. उन्हें होमीयो पेथी का अच्छा ज्ञान था और इसी ज्ञान को बाँट कर वो लोगों की सेवा करने लगे. उनके कुछ जो साक्षात्कार उपलब्ध हैं उनके कुछ अंशों के माध्यम से कोशिश करते हैं और करीब से समझने की हम सब के प्रिय संगीतकार ओ पी को.

पर पहले सुनिए वो गीत जो मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद है -


"मुझे दिखावे और झूठ से नफ़रत है. मैं लता की आवाज़ का इस्तेमाल किए बिना भी कामियाब रहा. इस बात में कोई शक नही कि लता की आवाज़ में दिव्य तत्व हैं, वो एक महान गायिका हैं, पर उनकी आवाज़ पतली है, मेरे गीतों को जिस तरह की आवाजों की दरकार थी वो शमशाद, गीता और आशा में मुझे मिल गया था." तमाम मतभेदों के बावजूद ओ पी लता को ही सर्वश्रेष्ठ मानते थे. आशा के साथ उन्होंने कमियाबी की बुलंदियों को छुआ, लगभग 70 फिल्मों का रहा ये साथ. बाद में आशा ने आर डी बर्मन से विवाह कर लिया. पर ओ पी ने हमेशा ये कहा कि आर डी ने अपने बेहतर गाने लता से गवाए और आशा को हमेशा दूसरा ही स्थान दिया. रफी को सर्वश्रेष्ठ गायक मानते थे. पर मुकेश और महेंद्र कपूर के साथ भी उनके बेहद कामियाब गीत सुने जा सकते हैं.

उदहारण के लिए "संबंध" का ये गीत ही लीजिये -


ओ पी ने लता मंगेशकर सम्मान को लेने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था -"एक संगीतकार कैसे वो सम्मान ले सकता है जो एक गायक या गायिका के नाम पर हों. संगीतकार गायक से उपर होता है. दूसरी बात लता अभी जीवित हैं उनके नाम पर सम्मान देना ग़लत है और तीसरा कारण ये कि मैंने कभी लता के साथ काम नही किया, इसलिए मैं इस पुरस्कार के स्वीकार करने में असमर्थ हूँ...मेरा सबसे बड़ा सम्मान तो मेरे श्रोताओं के प्यार के रूप में मुझे मिल ही चुका है..." सच ही तो है आज भी उनके गीत हम सब की जुबां पर बरबस आ जाते हैं, कौन सा ऐसा राष्ट्रीय त्यौहार है जब ये गीत स्कूलों में नही बजता...



गुरुदत्त को याद कर ओ पी बहुत भावुक हो जाते थे, उस रात को याद कर वो बताते हैं -"उस दिन जब मैं घर आया तो मुझे मेरी पत्नी ने बताया कि राज कपूर का फ़ोन आया था और बता रहे थे कि गुरुदत्त बेतहाशा रोये जा रहे हैं और मुझसे (ओ पी से)मिलना चाह रहे हैं. मैं उस दिन बहुत थका हुआ थे और नींद की ज़रूरत महसूस कर रहा था यूँ भी मुझे अगली सुबह उनसे मिलना ही था तो मैं नही गया...अगली सुबह जब उनके घर पहुँचा तब तक सब खत्म हो चुका था मैंने अपनी आदत स्वरुप खुले आम गीता और वहीदा को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया. वहीदा शायद मुझसे नफरत करती थी...". संगीत के बदलते रूप से वो दुखी नही थे -"सब कुछ बदलता है समय के साथ लाजमी है संगीत भी बदलेगा. पर सात सुरों की शुद्धता कभी कम नही हो सकती, गीत भद्दे लिखे जा सकते हैं, नृत्य भद्दे हो सकते हैं पर संगीत कभी भद्दा नही हो सकता."



अपनी कुछ बाजीगारियों का ज़िक्र भी उन्होंने किया है कुछ जगहों पर मसलन - "मैं कभी भी १५ मिनट से अधिक नही लेता था कोई धुन बनने में, पर निर्माताओं को हमेशा १०-१५ दिन आगे की तारिख देता था ताकि उन्हें ये काम इतना सरल न लगे..." और उनके इस बयान पर ध्यान दीजिये ज़रा- "मैंने कभी भी अपने समय के संगीतकारों को नही सुना, दूसरे क्या कर रहे हैं मैं जान कर ये जानने की कोशिश नही करता था क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरे संगीत पर उनका या मशहूर होती, चलन में रहती चीज़ों का असर आए. मैं बस अपने ही गीत सुनता हूँ, तब भी और अब भी. एक बात है जिस पर मुझे हमेशा फक्र रहा है वो हैं मेरी इमानदारी अपने संगीत के प्रति, जिसके साथ मैंने कभी समझौता नही किया...". लगता है जैसे ओ पी बस अपने यादगार नग्मों को हम श्रोताओं को देने के लिए ही इस धरती पर आए थे. अन्तिम दो सालों में उन्होंने अपने संगीत को भी सुनना छोड़ दिया था. हाँ पर एक फ़िल्म थी जिसे वो एक दिन में भी कई बार देख लेते थे. १९६५ में आई "ये रात फ़िर न आएगी" के बारे में ओ पी का कहना थे कि इस फ़िल्म को देख कर उन्हें एक अलग ही अनुभूति होती है. नैयर साहब के गीतों से हम आवाज़ की महफ़िल सजाये रखेंगे ये वादा है. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इसी फ़िल्म के इस बेहद खूबसूरत गीत के साथ जिसे आवाज़ दी है.....(बताने की ज़रूरत है क्या ?....)




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