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Sunday, March 15, 2015

रंग ठुमरी के : SWARGOSHTHI – 210 : THUMARI




 
स्वरगोष्ठी – 210 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 8 : ठुमरी

‘रस के भरे तोरे नैन...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय खयाल शैली के अन्तर्गत ‘चतुरंग’ गायकी का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक से हम उपशास्त्रीय संगीत के अन्तर्गत ‘ठुमरी’ गीतों पर चर्चा करेंगे और भारतीय संगीत जगत की सुप्रसिद्ध गायिकाएँ विदुषी गिरिजा देवी और बेगम अख्तर की गायी ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे। 


र्तमान में भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली ‘ठुमरी’ है। यह शैली कैशिकी वृत्ति की मानी जाती है। यह श्रृंगार रस प्रधान, कोमल भाव से युक्त, ललित रागबद्ध और भावपूर्ण गायकी है। अनेक प्राचीन ग्रन्थों में विभिन्न सामाजिक उत्सवों और मांगलिक अवसरों पर स्त्रियॉं द्वारा गायी जाने वाली कैशिकी वृत्ति के गीतों का उल्लेख मिलता है। भरत के नाट्यशास्त्र में भी यह उल्लेख है कि इस प्रकार के गीतों का प्रयोग नृत्य और नाट्य विधा में भावाभिव्यक्ति के लिए किया जाता था। आज भी कथक नृत्य में भाव प्रदर्शन के लिए ठुमरी गायन का प्रयोग किया जाता है। गीत के जिस प्रकार को आधुनिक ठुमरी के नाम से पहचाना जाता है उसका विकास नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में हुआ। अवध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत, नृत्य के प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब 1847 से 1856 तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। 7 फरवरी, 1856 को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो।

उन्नीसवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक ठुमरी का विकास नृत्याभिनय और स्वतंत्र गायकी के रूप में हुआ। आरम्भिक काल से ही ठुमरी की दो धाराएँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इसमें पहले प्रकार की ठुमरी नृत्य के साथ गायी जाने वाली ठुमरी है, जिसमें हावभाव और आंगिक अभिनय के तत्व प्रबल होते हैं। दूसरे प्राकार की ठुमरियों में बोलों की भावाभिव्यंजना, स्वर सन्निवेश और काकु का समन्वित प्रयोग होता है। इस प्रकार को ‘गानप्रधान ठुमरी’ कहा जा सकता है। गत्यात्मकता और भावावाभिव्यंजना के आधार पर भी ठुमरियों के दो भेद होते है। इन्हें क्रमशः ‘बोलबाँट की ठुमरी’ और ‘बोलबनाव की ठुमरी’ कहा जाता है। बोलबाँट की ठुमरी गतिप्रधान और बोलबनाव की ठुमरी भावप्रधान होती है। इस श्रृंखला में हम ठुमरी के इन प्रकारों पर आगे चल कर विस्तृत चर्चा करेंगे, परन्तु आज सबसे पहले हम आपको पूरब अंग की बोलबनाव की ठुमरी का एक उदाहरण सुनवाते हैं। राग भैरवी की यह ठुमरी दीपचंदी ताल में निबद्ध है और इसे प्रस्तुत कर रही हैं, विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी।



ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन साँवरिया...’ विदुषी गिरिजा देवी




उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लखनऊ में बोलबाँट और बोलबनाव दोनों प्रकार की ठुमरियों का प्रचलन रहा है। परन्तु बोलबाँट ठुमरियों का प्रसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ब्रज, दिल्ली आदि क्षेत्रों में अधिक हुआ। इसलिए इस प्रकार की ठुमरियों को ‘पछाहीं ठुमरी’ भी कहा जाने लगा। इसी प्रकार लखनऊ से पूर्व दिशा में अर्थात पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस और बिहार के कुछ क्षेत्रों में ठुमरी की जो शैली विकसित हुई उसे ‘पूरब अंग की ठुमरी’ कहा जाने लगा। 1956 में अँग्रेजों द्वारा बन्दी बनाए जाने के बाद नवाब वाजिद अली शाह को बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द करने के बाद लखनऊ के कई संगीतज्ञ कोलकाता जाकर बस गए। इन्हीं संगीतज्ञों के माध्यम से बंगाल में भी ठुमरी का प्रचार-प्रसार हुआ।

अब हम आपको एक ऐसी अप्रतिम ठुमरी गायिका की गायी ठुमरी सुनवाते हैं, जिन्होने अपनी अपनी शैली का स्वयं निर्माण किया। उस अप्रतिम गायिका का नाम है, अख्तरी बाई फैजाबादी अर्थात बेगम अख्तर, जिनका जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक शहर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया। उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यंत कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। बेगम अख्तर की गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। होली के माहौल में आप यह ठुमरी सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में कण्ठ संगीत की रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – इस रचना के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 मार्च, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 212वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 208वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको महान गायक पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत चतुरंग का एक एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग श्याम कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित जसराज। इस बार पहेली के तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का यह अंक हम पिछले रविवार को कुछ आपरिहार्य कारणों से नहीं प्रकाशित कर सके, जिसके लिए हमें खेद है। हम आपके इस प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ का निर्बाध प्रकाशन करने का प्रयास करते हैं, किन्तु कभी-कभी तकनीकी व्यवधान के कारण हम ऐसा नहीं कर पाते। भविष्य में हम स्तम्भ की निरन्तरता का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आज के अंक से हम जारी श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ के अन्तर्गत ठुमरी गायकी पर चर्चा शुरू की है। आपको यह अंक कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। अगले अंक में हम आपका परिचय ठुमरी के कुछ अन्य प्रकार कराएंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेने। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, November 11, 2012

नवोदित संगीत प्रतिभाओ के ताज़गी भरे स्वर


स्वरगोष्ठी - विशेष अंक में आज 

उत्तर प्रदेश की बाल, किशोर और युवा संगीत प्रतिभाएँ- देवांशु, पूजा, अपूर्वा और भैरवी


‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ 
देवांशु घोष को पुरस्कृत करते हुए 
महामहिम राज्यपाल
अन्य कला-विधाओं की भाँति पारम्परिक संगीत का विस्तार भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता रहा है। संगीत की नवोदित प्रतिभाओं को खोजने, प्रोत्साहित करने और उनकी प्रतिभा को सही दिशा देने में कुछ संस्थाएँ संलग्न हैं। इनमें एक नाम जुड़ता है, लखनऊ की संस्था ‘संगीत मिलन’ का। संगीत की शिक्षा, शोध और प्रचार-प्रसार में यह संस्था विगत ढाई दशक से संलग्न है। पिछले दिनों संस्था ने पूरे उत्तर प्रदेश में बाल, किशोर और युवा वर्ग की संगीत प्रतिभाओं को खोजने का अभियान चलाया, जिसका समापन गत रविवार को प्रदेश के महामहिम राज्यपाल बी.एल. जोशी के हाथों विजेता बच्चों को पुरस्कृत करा कर हुआ। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के विशेष अंक में हम इस प्रतिभा-खोज प्रतियोगिता में चुनी गईं संगीत प्रतिभाओं की गायकी से आपका परिचय कराएँगे।


न्नीसवीं शताब्दी के उत्तर प्रदेश में संगीत-शिक्षा के अनेक केन्द्र थे। वर्तमान समय में भी यह प्रदेश संगीत-शिक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस विस्तृत प्रदेश में समय-समय पर नवोदित संगीत प्रतिभाओं को खोजने का अभियान सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर चलता ही रहता है। गैर-सरकारी स्तर पर पिछले दिनों संगीत-संस्था 'संगीत मिलन' ने प्रतिभ खोज का यह अभियान सफलतापूर्वक सम्पादित किया। पूरे उत्तर प्रदेश से तीन आयु-वर्ग में संगीत प्रतिभाओं को खोजना, सरल नहीं था, किन्तु संस्था के कर्मठ कार्यकर्ताओं- मिलन देवनाथ, अरुंधति चौधरी, प्रदीप नारायण, मंजुला रॉय, मनीषा सक्सेना, अंजना मिश्रा, तरुण तपन भट्टाचार्य आदि ने लगभग चार मास के अथक श्रम से इस अभियान को सफल बनाया।

देवांशु घोष 
यह प्रतियोगिता तीन चरणों में सम्पन्न हुई। प्रथम चरण में प्रदेश के नौ केन्द्रों- गाजियाबाद, मथुरा, आगरा, बरेली, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी और गोरखपुर में प्रतिभाओं का चयन किया गया। प्रथम चरण की प्रतियोगिता में पूरे प्रदेश से लगभग ४०० बाल, किशोर और युवा संगीत-विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। इनमें से ७८ का चयन दूसरे चरण की प्रतियोगिता के लिए किया गया। दूसरे चरण की प्रतियोगिता का आयोजन २८ अक्तूबर से २ नवम्बर के बीच लखनऊ में हुआ, जिसमें अन्तिम चरण के लिए २४ प्रतिभागियों को कुना गया। ३ नवम्बर को आयोजित अन्तिम चरण की प्रतियोगिता के दौरान प्रतिभागियो का उत्साह चरम पर था। उन्होने अपनी प्रतिभा का बढ़-चढ़ कर प्रदर्शन किया। वरिष्ठ शिक्षकों और संगीतज्ञों के एक दल ने मूल्यांकन कर विभिन्न पुरस्कारों के लिए इनका योग्यता के अनुसार निर्धारण किया। तीनों वर्गों में सर्वाधिक अंक अर्जित कर वाराणसी के देवांशु घोष ने ‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ (Classical Voice of Uttar Pradesh) का खिताब जीता। १० से १४ वर्ष आयु के बाल वर्ग के अन्तर्गत आने वाले देवांशु ने प्रतियोगिता के अन्तिम चरण में राग शंकरा का विलम्बित खयाल ‘हर हर महादेव...’ और द्रुत खयाल ‘तान तलवार ले...’ का गायन प्रस्तुत कर निर्णायकों समेत सभी दर्शकों को चकित कर दिया। देवांशु द्वारा राग शंकरा की प्रस्तुति का आप भी आनन्द लीजिए-

‘उत्तर प्रदेश की आवाज़’ : देवांशु घोष : वाराणसी : राग शंकरा



पूजा तिवारी 
बाल वर्ग में अन्तिम चरण की प्रतियोगिता के लिए कुल नौ बच्चों- आयुष श्रीवास्तव, शशांक दीक्षित, शाश्वत विश्वकर्मा और ऐश्वर्या गोपन (सभी कानपुर), भरत अंकित और देवांशु घोष (दोनों वाराणसी), चाहत मल्होत्रा और पूजा तिवारी (दोनों लखनऊ) तथा आरुल सेठ (गाजियाबाद) का चयन हुआ था। इनमें तीनों वर्गों में सर्वोच्च अंक पाकर देवांशु घोष तो ‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ बन ही चुके थे, इसके उपरान्त अधिकतम अंक अर्जित कर लखनऊ की पूजा तिवारी ने बालवर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसी क्रम में वाराणसी के भरत अंकित को दूसरा और लखनऊ की चाहत मल्होत्रा को बाल वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। आइए, बाल वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त पूजा तिवारी से राग मधुवन्ती सुनते हैं, जिसे उन्होने अन्तिम चयन के दौरान प्रस्तुत किया था। पूजा ने राग मधुवन्ती में दो खयाल प्रस्तुत किये। विलम्बित रचना के बोल थे- ‘लाल के नैना अंजन सोहे...’ और द्रुत खयाल के बोल थे- ‘पवन पुरवाई...’। बाल वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली इस बालिका की प्रस्तुति में स्पष्ट शब्दोच्चार का गुण भी आपको परिलक्षित होगा।


बाल वर्ग में प्रथम : पूजा तिवारी : लखनऊ : राग मधुवन्ती



अपूर्वा तिवारी
१५ से १९ वर्ष आयु अर्थात किशोर वर्ग में अन्तिम प्रतियोगिता के लिए सात प्रतियोगियों का चयन हुआ, जिनमें वाराणसी से चार- अपूर्वा तिवारी, चारुलता मुखर्जी, पूर्णेश भागवत और विलीना पात्रा, लखनऊ से दो- महिमा तिवारी और सृष्टि पाण्डेय तथा कानपुर से एकमात्र अपूर्वा भट्टाचार्य ने अन्तिम चरण में अपनी-अपनी प्रतिभा का श्रेष्ठ प्रदर्शन किया। यह भी एक संयोग ही था कि किशोर वर्ग में प्रथम, द्वितीय और तृतीय, तीनों स्थानों पर वाराणसी के प्रतियोगियों का आधिपत्य रहा। यही नहीं पूरे उत्तर प्रदेश से अन्तिम प्रतियोगिता के लिए चुने गए २४ प्रतियोगियों में वाराणसी और कानपुर से सात-सात तथा लखनऊ से छः प्रतिभागी थे। इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रदेश के इन तीन नगरों में संगीत-शिक्षण की व्यवस्था सन्तोषजनक है। किशोर वर्ग की अन्तिम प्रतियोगिता में प्रथम स्थान अपूर्वा तिवारी को, द्वितीय स्थान पूर्णेश भागवत को और तृतीय स्थान विलीना पात्रा को मिला। प्रथम स्थान प्राप्त अपूर्वा ने अन्तिम चरण में राग चन्द्रकौंस के दो खयाल क्रमशः ‘आवत ब्रज की नार...’ और ‘गोकुल गाँव के छोरा...’ का जैसा मोहक गायन प्रस्तुत किया था, उन्हें अब आप भी सुनिए। 

किशोर वर्ग में प्रथम : अपूर्वा तिवारी : वाराणसी : राग चन्द्रकौंस


बी. भैरवी

प्रदेश स्तर पर आयोजित इस संगीत-प्रतिभा-प्रतियोगिता के युवा वर्ग में २० से २४ वर्ष आयु के संगीत-प्रतिभाओं ने हिस्सा लिया। इस वर्ग में अन्तिम चरण के लिए लखनऊ से दो, देविका रॉय और शैलेन्द्र यादव, कानपुर से भी दो, अपर्णा द्विवेदी और सीता यादव, बरेली से जयश्री मुखर्जी, वाराणसी से बी. भैरवी, आगरा से शीतल चौहान, इलाहाबाद से विनीता श्रीवास्तव का चयन किया गया था। इन प्रतियोगियों के बीच काँटे की टक्कर रही। अन्ततः इस वर्ग में प्रथम स्थान की हकदार वाराणसी की बी. भैरवी बनीं। द्वितीय स्थान आगरा की शीतल चौहान को और तृतीय स्थान लखनऊ की देविका रॉय ने प्राप्त किया। प्रथम पुरस्कार पाने वाली बी. भैरवी ने अन्तिम चरण की प्रतियोगिता में राग पूरिया धनाश्री में दो चटकदार खयाल प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया था। इस प्रस्तुति में विलम्बित खयाल के बोल थे- ‘बलि बलि जाऊँ...’ और द्रुत तीनताल की अत्यन्त लोकप्रिय बन्दिश ‘पायलिया झनकार मोरी...’ थी। बी. भैरवी की गायी राग पूरिया धनाश्री की इन दोनों रचनाओं का रसास्वादन आप भी कीजिए। 


युवा वर्ग में प्रथम : बी. भैरवी : वाराणसी : राग पूरिया धनाश्री 


महामहिम राज्यपाल के साथ विजेता बच्चे
इन विजयी संगीत-प्रतिभाओं के अलावा प्रथम चरण की प्रतियोगिता प्रदेश के जिन अलग-अलग केन्द्रों पर आयोजित हुई थी, उन केन्द्रों पर सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को भी पुरस्कृत किया गया। नगर की श्रेष्ठ प्रतिभा के रूप में पुरस्कृत इन प्रतिभाओं ने पुरस्कार वितरण समारोह के अवसर पर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल बी.एल. जोशी के सम्मुख अलग-अलग रागों की बन्दिशों से पिरोयी एक आकर्षक रागमाला प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया। इस प्रस्तुति के प्रतिभागी थे, शीतल चौहान (आगरा), पूजा तिवारी (लखनऊ), अपूर्वा तिवारी (वाराणसी), आरुल सेठ (गाजियाबाद), सीता यादव (कानपुर), विनीत श्रीवास्तव (इलाहाबाद), जयश्री मुखर्जी (बरेली) तथा कृतिका (गोरखपुर)। महामहिम राज्यपाल ने विजेताओं को पुरस्कृत करते हुए इस तथ्य पर आश्चर्य व्यक्त किया कि अधिकांश प्रतिभाएँ पारम्परिक संगीत परिवार के नहीं हैं। उन्होने संस्था के कार्यकर्त्ताओं की भरपूर सराहना भी की।

संगीत प्रतिभाओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का उपहार 

‘संगीत मिलन’ द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता के बाल, किशोर और युवा वर्ग के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। आप सबको हम अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ की सहर्ष सदस्यता प्रदान करते हैं। आप सब निरन्तर हमारे सम्पर्क में रहें और समय-समय पर अपनी प्रगति से हमें अवगत कराते रहें। आप अपने कार्यक्रमों के चित्र, आडियो, वीडियो आदि हमे भेजिए, विशेष अवसरों पर हम उनका उपयोग करेंगे। आपकी सांगीतिक गतिविधियाँ ‘स्वरगोष्ठी’ अथवा हमारे अन्य नियमित स्तम्भ में शामिल कर हमें खुशी होगी। नीचे दिये गए ई-मेल पर आप बेहिचक हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।  


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक विशेष अंक है, जिसके माध्यम से हमने संगीत के कुछ नवोदित हस्ताक्षरों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है। इसलिए इस अंक में हम पहेली नहीं दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक से पहेलियों का सिलसिला पूर्ववत जारी रहेगा। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com  या  radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस अंक में हमने आपसे कुछ नवोदित प्रतिभाओं परिचय कराया है। इसके लिए हमने जारी श्रृंखला को एक सप्ताह का विराम दिया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में अपनी जारी श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के अन्तर्गत हम प्रस्तुत करेंगे, एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी भैरवी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’। यह ठुमरी आप पण्डित भीमसेन जोशी, विदुषी गिरिजा देवी, पण्डित राजन-साजन मिश्र और फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में चर्चित गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में सुनेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में रविवार, प्रातः ९-३० बजे हम इसी मंच पर पुनः मिलेंगे। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, January 1, 2012

सुर संगम में आज- सुर संगम की पचास अंकों की यात्रा

सुर संगम- 50 : यादें
‘सुर संगम’ के सभी पाठकों/श्रोताओं का इस स्वर्ण जयन्ती अंक में हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, २ जनवरी २०११ को हमने शास्त्रीय और लोक संगीत से अनुराग रखने वाले रसिकों के लिए इस श्रृंखला का शुभारम्भ किया था। हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने इस स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था- शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के इस स्वर्ण जयन्ती अंक के माध्यम से हम पिछले एक वर्ष के अंकों का स्वतः मूल्यांकन करेंगे और आपकी सहभागिता का उल्लेख भी करेंगे।

Sunday, December 25, 2011

सुर संगम में आज- संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी

गज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

Sunday, December 18, 2011

स्वर-सम्राट उस्ताद अब्दुल करीम खाँ : जिनका कुत्ता भी सुरीला था


उस्ताद अब्दुल करीम खाँ सम्पूर्ण भारतीय संगीत का प्रतिनिधित्व करते थे। वे उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। दक्षिण के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उत्तर भारतीय संगीत में शामिल किया और सरगम के विशिष्ट अन्दाज को उत्तर भारत में प्रचलित किया। उनकी कल्पना विस्तृत और अनूठी थी, जिसके बल पर उन्होने भारतीय संगीत को एक नया आयाम और क्षितिज प्रदान किया।

Sunday, December 11, 2011

बाँस की बाँसुरी और सुरों का रंग : पण्डित रघुनाथ सेठ के संग


आज बाँसुरी शास्त्रीय संगीत के मंच पर स्वतन्त्र वाद्य, संगति वाद्य, सुगम और लोक-संगीत का मधुर और लोकप्रिय वाद्य बन चुका है। सामान्य तौर पर देखने में बाँस की, खोखली, बेलनाकार आकृति होती है, किन्तु इस सुषिर वाद्य की वादन तकनीक सरल नहीं है। बाँसुरी का अस्तित्व महाभारतकाल से पूर्व कृष्ण से जुड़े प्रसंगों में उपलब्ध है। शास्त्रीय वाद्य के रूप में इसे उत्तर भारत के साथ दक्षिण भारत के संगीत में समान रूप से लोकप्रियता प्राप्त है। पण्डित रघुनाथ सेठ की छवि वर्तमान बाँसुरी वादकों में प्रयोगशील वादक के रूप में लोकप्रिय है। आज के अंक में हम पण्डित रघुनाथ सेठ की बाँसुरी पर चर्चा करेंगे।

Sunday, November 27, 2011

‘ए हो जन्मी है बिटिया हमार...’ कन्या-जन्म पर पारम्परिक सोहर का अभाव है

सुर संगम- 46 – संस्कार गीतों में अन्तरंग पारिवारिक सम्बन्धों की सोंधी सुगन्ध

संस्कार गीतों की नयी श्रृंखला - दूसरा भाग

‘सुर संगम’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब लोक-संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछले अंक से हमने संस्कार गीतों की श्रृंखला आरम्भ की है। प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार सम्पूर्ण मानव जीवन को १६ संस्कारों में बाँटा गया है। इन विशेष अवसरों पर विशेष लोक-धुनों में गीतों को गाने की परम्परा है। हमने पिछले अंक में जातकर्म संस्कार, अर्थात पुत्र-जन्म के मांगलिक अवसर पर गाये जाने ‘सोहर’ गीतों की चर्चा की थी। आज के अंक में हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव और रस का महत्त्व होता है। प्रत्येक अवसरों के लिए प्रकृतिक रूप से उपजी धुने शताब्दियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रहीं हैं। लोक-गीतकार इन धुनों में अपने बोली के शब्दों को समायोजित करके गाने लगता है। इन गीतों में सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों की बात होती है, इसी प्रकार सोहर गीतों में सास-बहू, ननद-भाभी और देवर-भाभी के नोक-झोक के रोचक प्रसंग होते हैं। उल्लास और संवेदनशीलता का भाव मुखर होता है। नवजात शिशु की तुलना राम, कृष्ण, लव-कुश आदि से की जाती है और पौराणिक प्रसंगों को लौकिक रूप दे दिया जाता है। मात्र लय पर आधारित, भावप्रधान गीतों में सोहर गीत सम्भवतः सबसे प्राचीन है। पुत्र-जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले सोहर में उल्लास और उत्साह का भाव होता है, किन्तु जन्म से पूर्व के गीतों में माँ और नवागत शिशु के प्रति मंगल-कामनाएँ की जाती हैं। अधिकतर गीतों में देवी-देवताओं की प्रार्थना भी की जाती है। अब हम आपको एक ऐसा सोहर सुनवाते हैं, जिसमे सन्तान-प्राप्ति के लिए माँ गंगा से प्रार्थना की गई है।

Sunday, November 13, 2011

सुर संगम में आज - एन. राजम् के वायलिन-तंत्र बजते नहीं, गाते हैं...

सुर संगम- 43 – संगीत विदुषी डॉ. एन. राजम् की संगीत-साधना


सुर संगम के इस सुरीले सफर में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आज एक बेहद सुरीले गज-तंत्र वाद्य वायलिन और इस वाद्य की स्वर-साधिका डॉ. एन. राजम् के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आपसे चर्चा करने जा रहा हूँ। डॉ. राजम् वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्य पर उत्तर भारतीय संगीत पद्यति को गायकी अंग में वादन करने वाली प्रथम महिला स्वर-साधिका हैं। उनकी वायलिन पर अब तक जो कुछ भी बजाया गया है, उसका प्रारम्भ स्वयं उन्हीं से हुआ है। गायकी अंग में वायलिन-वादन उनकी विशेषता भी है और उनका अविष्कार भी।

डॉ. राजम् के पिता नारायण अय्यर कर्नाटक संगीत पद्यति के सुप्रसिद्ध वायलिन वादक और गुरु थे। वायलिन की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुई। बाद में सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से उन्हें उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में शिक्षा मिली। इस प्रकार शीघ्र ही उन्हें संगीत की दोनों पद्यतियों में कुशलता प्राप्त हुई। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर अपने प्रदर्शन-कार्यक्रमों में एन. राजम् को वायलिन संगति के लिए बैठाया करते थे। संगति के दौरान उनका यही प्रयास होता था कि उनके गुरु जो क्रियाएँ कण्ठ से करते हों, उन्हें यथावत वायलिन के तंत्रों पर उतारा जाए। इस साधना के बल पर मात्र १७ वर्ष की आयु में एन. राजम् गायकी अंग में वायलिन-वादन में दक्ष हो गईं। उस दौर के संगीतविदों ने गायकी शैली में वायलिन-वादन को एक नया आविष्कार माना और इसका श्रेय एन. राजम् को दिया गया। उनके गायकी अंग के वादन में जैसी मिठास और करुणा है, उसे सुन कर ही अनुभव किया जा सकता है। उनके वादन में कोई चमत्कारिक लटके-झटके नहीं, बल्कि सादगी और तन्मयता है। सुनने वालों को ऐसा प्रतीत होता है, मानो वायलिन के तंत्र बजते नहीं बल्कि गा रहे हों। लीजिए, डॉ. एन. राजम् के वायलिन को राग जयजयवन्ती का गायन करते हुए, आप भी सुनें। प्रस्तुति में पण्डित अभिजीत बनर्जी ने तबला संगति की है।

डॉ. एन. राजम् : राग – जयजयवन्ती : आलाप और बन्दिश


एन. राजम् की प्रारम्भिक संगीत शिक्षा दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत पद्यति में हुई थी। उन दिनों दक्षिण भारत में वायलिन प्रचलित हो चुका था, किन्तु उत्तर भारतीय संगीत में इस वाद्य का पदार्पण नया-नया ही हुआ था। एन. राजम् की आयु उस समय मात्र १२ वर्ष थी। अपने गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मार्गदर्शन में उन्होने वायलिन को गायकी अंग में बजाने का निश्चय किया। स्वर और लय का ज्ञान तो उन्हें पहले से ही था, गुरु जी की स्वरावली का अनुसरण करते-करते वादन में भाव, रस और माधुर्य उत्पन्न करने की कठोर साधना उन्होने की। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि गायन की सभी विधाओं की बारीकियों का गहन अध्ययन कर वायलिन पर साध लिया। उन दिनों अधिकतर वादको ने तंत्रकारी अंग में ही वायलिन को अपनाया था। परन्तु एन. राजम् का मानना था कि सारंगी की भाँति वायलिन भी गायकी अंग के निकट है। आइए अब सुनते हैं- डॉ. एन. राजम् से राग दरबारी की दो खयाल रचनाएँ जो विलम्बित एकताल में और द्रुत तीनताल में निबद्ध है।

डॉ. एन. राजम् : राग – दरबारी : विलम्बित एकताल और द्रुत तीनताल


विदुषी एन. राजम् के गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ग्वालियर घराने के थे, इसलिए स्वयं को इसी घराने की शिष्या मानतीं हैं। घरानॉ के सम्बन्ध में उनका मत है कि कलाकार को किसी एक ही घराने में बंध कर नहीं रहना चाहिए, बल्कि हर घराने की अच्छाइयों का अनुकरण करना चाहिए। घरानों की प्राचीन परम्परा के अनुसार तीन पीढ़ियों तक यदि विधा की विशेषता कायम रहे तो प्रथम पीढ़ी के नाम से घराना स्वतः स्थापित हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में राजम् जी के नाम से भी यदि एक नए घराने का नामकरण हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉ. राजम् को प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता पण्डित नारायण अय्यर से मिली। उनके बड़े भाई पण्डित टी.एन. कृष्णन् कर्नाटक संगीत पद्यति के प्रतिष्ठित और शीर्षस्थ वायलिन-वादक रहे हैं। डॉ. राजम् की एक भतीजी कला रामनाथ वर्तमान में विख्यात वायलिन-वादिका हैं। राजम् जी की सुपुत्री और शिष्या संगीता शंकर अपनी माँ की शैली में ही गायकी अंग में वादन कर रहीं हैं। यही नहीं संगीता की दो बेटियाँ अर्थात डॉ. राजम् की नातिनें- नंदिनी और रागिनी भी अपनी माँ और नानी के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं।

और अब इस अंक को विराम देते हुए हम आपको विदुषी डॉ. एन. राजम् द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी का एक दादरा सुनवाते हैं। यह उल्लेखनीय है कि उनके गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ने मंच पर कभी भी ठुमरी-दादरा प्रस्तुत नहीं किया। उपशास्त्रीय संगीत का ज्ञान उन्होने वाराणसी में प्राप्त किया था। वाराणसी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय में पहले प्रोफेसर और बाद में विभागाध्यक्ष होकर सेवानिवृत्त हुई। लीजिए, सुनिए- विदुषी डॉ. एन. राजम् की वायलिन पर राग भैरवी में दादरा-

डॉ. एन. राजम् : राग – भैरवी : दादरा


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 44 की पहेली : इस ऑडियो क्लिप को सुन कर संस्कार गीतों के अन्तर्गत आने वाली लोक संगीत की विधा को पहचानिए। सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे 5 अंक


चित्र परिचय
ऊपर बाएं - विदुषी डा. एन. राजम्
नीचे दायें - डा. एन. राजम्अपनी सुपुत्री संगीता शंकर के साथ


पिछ्ली पहेली का परिणाम : सुर संगम के 43वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन और राग दरबारी। इस अंक की पहेली के पहले भाग का सही उत्तर हमारे एक नए पाठक/श्रोता उज्ज्वल कुमार ने और दूसरे भाग का सही उत्तर क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों विजेताओं को मिलते हैं 5-5 अंक। इन्हें हार्दिक बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और संगीत-कलासाधक अथवा विधा के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, November 6, 2011

मौसिकी अर्श के आफताब : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

सुर संगम- 42 – उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया


भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है- आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। ‘सुर संगम’ के आज के अंक में हम इन्हीं महान गायक कलासाधक को श्रद्धा-सुमन अर्पित करेंगे। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं उस्ताद फ़ैयाज़ खान उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे।

फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। आइए आपको भी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग ‘तिलंग’ में नोम-तोम का आलाप सुनवाते हैं।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ : आलाप नोम-तोम – राग तिलंग


फ़ैयाज़ खाँ के नाना का घराना खयाल गायकों का था। नाना ने बचपन से ही कठोर रियाज़ कराया। संगीत के घरानों में संगीत-शिक्षा के लिए एक कठोर व्रत का पालन शिष्य से कराया जाता है, जिसे ‘चिल्ला’ कहा जाता है। इस व्रत के अनुसार शिष्य को निरन्तर बारह वर्षों तक प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक संगीत का अभ्यास करना होता है। प्रशिक्षण की इस अवधि में फ़ैयाज़ खाँ ने स्वर-साधना, ध्रुवपद और होरी गायन का कठिन अभ्यास किया। २५ वर्ष की आयु तक वे लोकप्रिय होने लगे थे। उनकी गायकी पर अपने नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ के अतिरिक्त तत्कालीन महान गायक नत्थन खाँ, जयपुर के अब्दुल खाँ और सेनिया घराने के अमीर खाँ का भी प्रभाव था। आइए अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ‘भंखार’ में आलाप और तीनताल में एक खयाल सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं –“हे करतार...”।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ : खयाल - आलाप और बन्दिश – राग भंखार


पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के चार दशकों तक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ देश में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों के प्राण हुआ करते थे। संगीत-प्रेमियों को सम्मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता उनकी गायकी में थी। उस दौर में उन्हें जनसामान्य की ओर से ‘महफिल के बादशाह’ के नाम से पुकारा जाता था। १९३० के आसपास उस्ताद ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निवास स्थान जोरासांकों ठाकुरबाड़ी में आयोजित संगीत समारोह में भाग लिया था। समारोह के दौरान वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर” की उपाधि दे दी। अपने प्रभावशाली संगीत से उन्होने देश के सभी संगीत केन्द्रों में खूब यश अर्जित किया। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। १९३८ में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया।

उस्ताद की गायकी में जवारीदार स्वर, राग दरबारी का गान्धार, राग श्री का ऋषभ और अनूठी लयकारी श्रोताओं को सम्मोहित करती थी। बोलतान में गीत की पंक्तियों का चमत्कारिक प्रदर्शन किया करते थे। वे स्वर, भाषा, अर्थ, भाव, लय सभी का भरपूर आनन्द लेकर गाते थे। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। उनके द्वारा गायी गई उपशास्त्रीय रचनाओं में- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी....”, “पानी भरे री कौन अलबेली...” आदि आज भी संगीत प्रेमियों का बीच लोकप्रिय है। इस आलेख को विराम देने से पहले आइए आपको सुनवाते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध अत्यन्त लोकप्रिय दादरा। खाँ साहब का निधन ५ नवम्बर, १९५० को हुआ था। कल उनकी ६०वीं पुण्यतिथि थी, इस अवसर पर हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ को समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए आज यहीं विराम लेते हैं।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ : ठुमरी (दादरा) – राग - भैरवी


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 43 की पहेली : इस ऑडियो क्लिप को सुन कर संगीत वाद्य को पहचानिए। सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे 5 अंक, और यदि आपने राग की पहचान भी कर ली तो आपको मिलेंगे 5 बोनस अंक।


पिछ्ली पहेली का परिणाम : सुर संगम के 40वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर और विजेता के नाम की घोषणा पिछले अंक में गायक जगजीत सिंह पर विशेष श्रद्धांजलि अंक के कारण हम नहीं कर सके। 40वें अंक की पहेली की विजेता क्षिति तिवारी हैं, बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और संगीत-कलासाधक के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, October 30, 2011

नज़रे करम फरमाओ...जगजीत सिंह के बेमिसाल मगर कमचर्चित शास्त्रीय गायन की एक झलक

सुर संगम- 41 – गायक जगजीत सिंह की संगीत-साधना को नमन


‘ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी गीत-संगीत प्रेमियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र आज ‘सुर संगम’ के नए अंक में स्वागत करता हूँ। पिछले दिनों १० अक्तूबर को विख्यात गीत, ग़ज़ल, भजन और लोक संगीत के गायक और साधक जगजीत सिंह के मखमली स्वर मौन हो गए। सुगम संगीत के इन सभी क्षेत्रों में जगजीत सिंह न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में बल्कि पूरे विश्व में लोकप्रिय थे। ‘सुर संगम’ के आज के अंक में हम भारतीय संगीत में उनके प्रयोगधर्मी कार्यों पर चर्चा करेंगे।

जगजीत सिंह का जन्म ८ फरवरी, १९४१ को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी सरकारी कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गाँव का रहने वाला है। उनकी प्रारम्म्भिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में माध्यमिक शिक्षा के लिए जालन्धर आ गए। डी.ए.वी. कॉलेज से स्नातक की और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की।

जगजीत सिंह को बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला था। गंगानगर मे ही पण्डित छगनलाल शर्मा से दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखा। बाद में सेनिया घराने के उस्ताद जमाल खाँ से ख्याल, ठुमरी और ध्रुवपद की बारीकियाँ सीखीं। आगे चल कर उन्होने ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में कुछ नये प्रयोग कर संगीत की इसी विधा में आशातीत सफलता प्राप्त की, परन्तु जब भी उन्हें अवसर मिला, अपनी रागदारी संगीत शिक्षा को अनेक संगीत सभाओं में प्रकट किया। जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत किये गए अधिकतर ग़ज़लों, गीतों और भजनों में रागों का स्पर्श स्पष्ट परिलक्षित होता है। राग दरबारी और भैरवी उनके प्रिय राग थे। आइए, आपको सुनवाते हैं, जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी का तराना, जिसे उन्होने अपनी कई सभाओं में प्रस्तुत किया था।

जगजीत सिंह : तराना : राग – भैरवी : ताल – तीनताल


द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस तराना में जगजीत सिंह की लयकारी का कौशल सराहनीय है। अतिद्रुत लय में तबले के साथ युगलबन्दी का प्रदर्शन कर उन्होने रागदारी संगीत के प्रति अपनी अभिरुचि को प्रकट किया है। जगजीत सिंह १९५५ में मुम्बई आ गए। यहाँ से उनके संघर्ष का दौर आरम्भ हुआ। मुम्बई में रहते हुए विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर, वैवाहिक समारोह अथवा अन्य मांगलिक अवसरों पर गीत-ग़ज़लें गाकर अपना गुजर करते रहे। उन दिनों देश के स्वतंत्र होने के बावजूद ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में दरबारी परम्परा कायम थी। संगीत की यह विधा रईसों, जमींदारों और अरबी-फारसी से युक्त क्लिष्ट उर्दू के बुद्धिजीवियों के बीच ही प्रचलित थी। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को इस दरबारी परम्परा से निकाल कर जनसामान्य के बीच लोकप्रिय करने का प्रयत्न किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन्हें अपने इस प्रयास में आशातीत सफलता मिली।
उस दौर में ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेग़म अख्तर, तलत महमूद और मेंहदी हसन जैसे दिग्गजॉ के प्रयत्नों से ग़ज़ल, अरबी और फारसी के दायरे से निकल कर उर्दू के साथ नये अंदाज़ में सामने आने को बेताब थी। ऐसे में जगजीत सिंह, अपनी रेशमी आवाज़, रागदारी संगीत का प्रारम्भिक प्रशिक्षण तथा संगति वाद्यों में क्रान्तिकारी बदलाव कर इस अभियान के अगुआ बन गए। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर जगजीत सिंह के स्वर में सुनते हैं- राग दरबारी, द्रुत एकताल में निबद्ध एक छोटा खयाल।

जगजीत सिंह : खयाल- “नजरे करम फरमाओ...” : राग – दरबारी : ताल – द्रुत एकताल


जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब सरल और सहज अन्दाज़ में गाना आरम्भ किया तो जनसामान्य की अभिरुचि ग़ज़लों की ओर बढ़ी। उन्होने हुस्न और इश्क़ से युक्त पारम्परिक ग़ज़लों के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम आदमी की ज़िंदगी को भी अपने सुरों से सजाया। जैसे- ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूँ..’, ‘मैं रोया परदेश में...’, ‘ये दौलत भी ले लो...’, ‘माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...’ जैसी रचनाओं में आम आदमी को अपने जीवन का यथार्थ नज़र आया। पुरानी ग़ज़ल गायकी शैली में केवल सारंगी और तबले की संगति का चलन था, किन्तु जगजीत सिंह ने सारंगी का स्थान पर वायलिन को अपनाया। उन्होने संगति वाद्यों में गिटार और सन्तूर आदि वाद्यों को भी जोड़ा। ग़ज़ल को जनरुचि का हिस्सा बनाने के बाद १९८१ में उन्होने फिल्म ‘प्रेमगीत’ से अपने फिल्मी गायन का सफर शुरू किया। इस फिल्म का गीत-‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो...’ वास्तव में एक अमर गीत सिद्ध हुआ।

१९९० में एक सड़क दुर्घटना में जगजीत सिंह के इकलौते पुत्र विवेक का निधन हो गया। इस रिक्तता की पूर्ति के लिए उन्होने अपनी संगीत-साधना को ही माध्यम बनाया और आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए। इस दौर में उन्होने अनेक भक्त कवियों के पदों सहित गुरुवाणी को अपनी वाणी दी। आइए इस अंक को विराम देने से पहले जगजीत सिंह के स्वरों में उपशास्त्रीय रचनाओं से भी साक्षात्कार कराते हैं। यह हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि भैरवी उनका सर्वप्रिय राग था। आपको सुनवाने के लिए हमने चुना है, जगजीत सिंह की आवाज़ में दो ठुमरी रचनाएँ। एक मंच प्रदर्शन के दौरान उन्होने पहले भैरवी के स्वरों में थोड़ा आलाप किया, फिर बिना ताल के नवाब वाजिद आली शाह की रचना- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...’ और फिर तीनताल में निबद्ध पारम्परिक ठुमरी भैरवी- ‘बाजूबन्द खुल-खुल जाए...’ प्रस्तुत किया है। अन्त में उन्होने तीनताल में निबद्ध तराना का एक अंश भी प्रस्तुत किया है। आइए सुनते हैं, जगजीत सिंह की विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण।

जगजीत सिंह : ठुमरी और तराना : राग – भैरवी


आज के इस अंक को विराम देने से पहले हम “हिंदयुग्म” परिवार और समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से सुगम संगीत के युग-पुरुष जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और संगीत-कलासाधक के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, October 9, 2011

सुर संगम में आज - सरोद के पर्याय हैं- उस्ताद अमजद अली खाँ

सुर संगम- 38 – उस्ताद अमजद अली खान साहब को जन्मदिवस (9 अक्तूबर) की हार्दिक शुभकामनाएँ


आज ‘सुर संगम’ के इस नये अंक में, आप सब संगीत-रसिकों का, कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक स्वागत है। आज देश के जाने-माने संगीतज्ञ और सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का जन्मदिन है। इस अवसर पर हम 'सुर-संगम' परिवार और देश-विदेश के करोड़ों संगीत-प्रेमियों की ओर से उस्ताद का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ सरोद-वादकों में शिखर पर हैं और ‘सरोद-सम्राट’ की उपाधि से विभूषित हैं।

९ अक्तूबर, १९४५ को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली खाँ को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र में ही संगीत-शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए। उस्ताद अमजद अली खाँ और उनके सरोद पर चर्चा जारी रखेंगे। यहाँ थोड़ा रुक कर आइए उस्ताद के सरोद-वादन का आनन्द लेते हैं।

उस्ताद अमजद अली खाँ : राग – श्याम कल्याण : तीनताल मध्य लय


अमजद अली खाँ को बचपन में ही सरोद से ऐसा लगाव हुआ कि युवावस्था तक आते-आते एक श्रेष्ठ सरोद-वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद-वादन की शैली में विकास के लिए कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने अनेक नये रागों की रचना भी की है। ये नवसृजित राग हैं- किरण रंजिनी, हरिप्रिया कान्हड़ा, शिवांजलि, श्यामश्री, सुहाग भैरव, ललितध्वनि, अमीरी तोड़ी, जवाहर मंजरी, और बापू कौंस। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ संगीत जगत के सर्वश्रेष्ठ सरोद-वादक हैं। उनके वादन में इकहरी तानें, गमक, खयाल की बढ़त का काम अत्यंत आकर्षक होता है। आइए, यहाँ थोड़ा रुक कर सरोद पर खाँ साहब का बजाया एक और मोहक राग- कामोद का आनन्द लेते हैं। यह प्रस्तुति चौदह मात्रा की चाँचर ताल में है। तबला संगति उस्ताद शफ़ात अहमद खाँ ने की थी।

उस्ताद अमजद अली खाँ : राग – कामोद : चाँचर ताल


युवावस्था में ही उस्ताद अमजद अली खाँ ने सरोद-वादन में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी। १९७१ में उन्होने द्वितीय एशियाई अन्तर्राष्ट्रीय संगीत-सम्मेलन में भाग लेकर ‘रोस्टम पुरस्कार’ प्राप्त किया था। यह सम्मेलन यूनेस्को की ओर से पेरिस में आयोजित किया गया था, जिसमें उन्होने ‘आकाशवाणी’ के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। अमजद अली ने यह पुरस्कार मात्र २६ वर्ष की आयु में प्रपट किया था, जबकि इससे पूर्व १९६९ में यही ‘रोस्टम पुरस्कार’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ को शहनाई-वादन के लिए प्राप्त हो चुका था। १९६३ में मात्र १८ वर्ष की आयु में उन्होने पहली अमेरिका यात्रा की थी। इस यात्रा में पण्डित बिरजू महाराज के नृत्य-दल की प्रस्तुति के साथ अमजद अली खाँ का सरोद-वादन भी हुआ था। इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह था कि खाँ साहब के सरोद-वादन में पण्डित बिरजू महाराज ने तबला संगति की थी और खाँ साहब ने कथक संरचनाओं में सरोद की संगति की थी।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने देश-विदेश के अनेक महत्त्वपूर्ण संगीत केन्द्रों में प्रदर्शन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। इनमें कुछ प्रमुख हैं- रायल अल्बर्ट हाल, रायल फेस्टिवल हाल, केनेडी सेंटर, हाउस ऑफ कामन्स, फ़्रंकफ़र्ट का मोजर्ट हाल, शिकागो सिंफनी सेंटर, आस्ट्रेलिया के सेंट जेम्स पैलेस और ओपेरा हाउस आदि। खाँ साहब अनेकानेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किये जा चुके हैं। इनमें कुछ प्रमुख सम्मान हैं- भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’ सम्मान, संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान, यूनेस्को पुरस्कार, यूनिसेफ का राष्ट्रीय राजदूत सम्मान आदि। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ के दो पुत्र- अमान और अयान सहित देश-विदेश के अनेक शिष्य सरोद वादन की पताका फहरा रहे हैं। ‘हिंदयुग्म’ और ‘सुर संगम’ की ओर से आज उस्ताद अमजद अली खाँ को जन्म-दिन के अवसर पर शत-शत बधाई अर्पित करते हुए अपने पाठकों को सुनवाते हैं, उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत राग ‘भैरवी’ में एक दादरा।

उस्ताद अमजद अली खाँ : राग – भैरवी : दादरा ताल


अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और शास्त्रीय अथवा लोक कलासाधक के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, October 2, 2011

सुर संगम में आज - इसराज की मोहक ध्वनि और पण्डित श्रीकुमार मिश्र

सुर संगम- 37 – सितार और सारंगी, दोनों के गुण हैं इन वाद्यों में
(दूसरा भाग)


पढ़ें पहला भाग

राग-रस-रंग की सुरीली महफिल ‘सुर संगम’ के एक और नये अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। गत सप्ताह हमने एक ऐसे लुप्तप्राय तंत्रवाद्य 'मयूरी वीणा' पर चर्चा आरम्भ की थी, जिसका चलन लगभग एक शताब्दी पूर्व समाप्त हो चुका था, किन्तु भारतीय संगीत के क्षेत्र में समय-समय पर ऐसे भी संगीतकार हुए हैं, जिन्होने लुप्तप्राय वाद्यों और संगीत-शैलियों का पुनरोद्धार किया है। जाने-माने इसराज-वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र एक ऐसे ही कलासाधक हैं, जिन्होने विभिन्न संगीत-ग्रन्थों का अध्ययन कर लगभग लुप्त हो चुके तंत्रवाद्य 'मयूरी वीणा' का नव-निर्माण किया। पिछले अंक में हमने पंजाब में इस वाद्य के विकास पर आपसे चर्चा की थी। आज के अंक में हम बंगाल में वाद्य के विकास की पंडित श्रीकुमार मिश्र द्वारा दी गई जानकारी आपसे बाँटेंगे।

बंगाल के विष्णुपुर घराने के रामकेशव भट्टाचार्य सुप्रसिद्ध ताऊस अर्थात मयूरी वीणा वादक थे। उन्होने भी इस वाद्य को संक्षिप्त रूप देने के लिए इसकी कुण्डी से मोर की आकृति को हटा दिया और इस नए स्वरूप का नाम 'इसराज' रखा। पंजाब का 'दिलरुबा' और बंगाल का 'इसराज' दरअसल एक ही वाद्य के दो नाम हैं। दोनों की उत्पत्ति 'मयूरी वीणा' से हुई है। इस श्रेणी के वाद्य वर्तमान सितार और सारंगी के मिश्रित रूप है। इसराज या दिलरुबा वाद्यों की उत्पत्ति के बाद ताऊस या मयूरी वीणा का चलन प्रायः बन्द हो गया था। लगभग दो शताब्दी पूर्व इसराज की उत्पत्ति के बाद अनेक ख्यातिप्राप्त इसराज-वादक हुए हैं। रामपुर के सेनिया घराने के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद वज़ीर खाँ कोलकाता में १८९२ से १८९९ तक रहे। इस दौरान उन्होने अमृतलाल दत्त को सुरबहार और इसराज-वादन की शिक्षा दी। उस्ताद अलाउद्दीन खाँ, जो उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य थे, ने भी कोलकाता में इसराज-वादन की शिक्षा ग्रहण की थी। बंगाल के वादकों में स्वतंत्र वादन की परम्परा भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। इसराज पर चमत्कारिक गतकारी शैली का विकास भी बंगाल में ही हुआ।

गया घराने के सूत्रधार हनुमान दास (१८३८-१९३६) कोलकाता में निवास करते थे और स्वतंत्र इसराज-वादन करते थे। हनुमान दास जी के शिष्य थे- कन्हाईलाल ठेडी, हाबू दत्त, कालिदास पाल, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, सुरेन्द्रनाथ, दिनेन्द्रनाथ, ब्रजेन्द्रकिशोर रायचौधरी, प्रकाशचन्द्र सेन, शीतल चन्द्र मुखर्जी आदि। ब्रजेन्द्रकिशोर रायचौधरी और प्रकाशचन्द्र सेन से सेनिया घराने के सितार-वादक इमदाद खाँ ने इसराज-वादन की शिक्षा ग्रहण की थी। कोलकाता में ही मुंशी भृगुनाथ लाल और इनके शिष्य शिवप्रसाद त्रिपाठी ‘गायनाचार्य’ इसराज वादन करते थे। शिवप्रसाद जी के शिष्य थे रामजी मिश्र व्यास। वर्तमान में सक्रिय इसराज-वादक और ‘मयूरी वीणा’ के वर्तमान स्वरूप के अन्वेषक पण्डित श्रीकुमार मिश्र, पं॰ रामजी मिश्र व्यास के पुत्र और शिष्य हैं। अपने पिता से दीक्षा लेने के अलावा इन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर शिक्षा भी ग्रहण की है। ‘ताऊस अर्थात मयूरी वीणा’ से उत्पन्न ‘दिलरुबा’ तथा ‘इसराज’ वाद्य का प्रचलन पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र में अधिक रहा है। सिख समाज और रागी कीर्तन के साथ इस वाद्य का प्रचलन आज भी है। पंजाब के भाई वतन सिंह (निधन-१९६६) प्रसिद्ध दिलरुबा-वादक थे। फिल्म-संगीतकारों में रोशन और एस.डी. बातिश इस वाद्य के कुशल वादक रहे हैं।


गुजरात के नागर दास और उनके शिष्य मास्टर वाडीलाल प्रख्यात दिलरुबा-वादक थे। इनके शिष्य कनकराय त्रिवेदी ने दो उँगलियों की वादन तकनीक का प्रयोग विकसित किया था। त्रिवेदी जी ने इसी तकनीक की शिक्षा श्रीकुमार जी को भी प्रदान की है। वर्तमान में ओमप्रकाश मोहन, चतुर सिंह, और भगत सिंह दिलरुबा के और अलाउद्दीन खाँ तथा विजय चटर्जी इसराज के गुणी कलाकार हैं। श्रीकुमार मिश्र एकमात्र ऐसे कलाकार हैं, जो परम्परागत इसराज के साथ-साथ स्वविकसित ‘मयूरी वीणा’ का भी वादन करते हैं। आइए अब हम आपको सुनवाते हैं पण्डित श्रीकुमार मिश्र का बजाया इसराज पर राग मधुवन्ती। तबला संगति ठाकुर प्रसाद मिश्र ने की है। आप इस सुरीले वाद्य पर मोहक राग का आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं अनुमति दीजिये।

इसराज वादन : राग मधुवन्ती : कलाकार – श्रीकुमार मिश्र


अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और शास्त्रीय अथवा लोक कलासाधक के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० अमित जी द्वारा प्रस्तुत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

संलग्न चित्र परिचय

१- इसराज वाद्य
२- तीन तन्त्रवाद्यों का अनूठा संगम (बाएँ से) श्रीकुमार मिश्र (इसराज), विनोद मिश्र (सारंगी) और भानु बनर्जी (वायलिन).
३- सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार और गायक एस.डी. बातिश दिलरुबा वादन करते हुए : एक दुर्लभ चित्र.



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