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Saturday, October 13, 2012

'सिने पहेली' के चौथे सेगमेण्ट का रोमांचक अंत, विजेता बने हैं....



सिने-पहेली # 41
 (13 अक्तूबर, 2012)

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का आपके मनपसंद स्तम्भ 'सिने पहेली' में। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति पर बस यही कहना चाहूँगा कि भई वाह, क्या मुकाबला था! आधे-आधे नंबर से कभी कोई आगे तो कभी कोई। वाक़ई ज़बरदस्त मुक़ाबला रहा, और इससे पहले कि हम 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के चौथे सेगमेण्ट के विजेताओं के नाम घोषित करें, पहले आपको बता देते हैं पिछली पहेली के सही जवाब।

पिछली पहेली के सही जवाब

1. किशोर कुमार - आशा भोसले - "जाने भी दे छोड़ यह बहाना" (बाप रे बाप)

2. जॉनी वाकर - गीता दत्त - "गोरी गोरी रात है" (छू मंतर)

3. शम्मी कपूर - शमशाद बेगम - "ओय चली चली कैसी हवा" (ब्लफ़ मास्टर)

4. दारा सिंह - शमशाद बेगम - "पतली कमर नाज़ुक उमर" (लुटेरा) /// दारा सिंह - आशा भोसले - "सबसे हो आला मेरी जान" (दि किलर्स)

5. गोप - शमशाद बेगम - "चलो होनोलुलु" (सनम)

पिछली पहेली के परिणाम

'सिने पहेली - 40' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक

2. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक

3. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक

4. सलमन ख़ान, दुबई --- 10 अंक

5. महेश बसंतनी, पिट्सबर्ग --- 8 अंक

6. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 8 अंक

7. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 8 अंक

8. इंदु पुरी गोस्वामी, चित्तौड़गढ़ --- 4 अंक

'सिने पहेली - सेगमेण्ट-4' के विजेता

'सिने पहेली' प्रतियोगिता के चौथे सेगमेण्ट के प्रथम तीन स्थान मिले हैं निम्नलिखित प्रतियोगियों को...

प्रथम स्थान
विजय कुमार व्यास, बीकानेर


द्वितीय स्थान
सलमान ख़ान, दुबई


तृतीय स्थान
गौतम केवलिया, बीकानेर तथा प्रकाश गोविंद, लखनऊ


चौथे सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोरकार्ड यह रहा...


सभी विजेताओं और सभी प्रतिभागियों को हार्दिक बधाई, और अगले सेगमेण्ट में भी इसी तरह की भागीदारी बनाये रखने का अनुरोध है। 

दोस्तों, चलिए अब शुरू किया जाए 'सिने पहेली' का पांचवां सेगमेण्ट। यानी कि 'सिने पहेली - 41'। पहेली पर जाने से पहले हम नये प्रतियोगियों का आह्वान करते हुए प्रतियोगिता के नियम दोहराना चाहेंगे।

नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथियों, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बतायें और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। अब महाविजेता कैसे बना जाये, आइए इस बारे में आपको बतायें।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जोड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेता के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...


4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।


और अब 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के पांचवें सेगमेण्ट की पहली कड़ी की पहेली...

दादामुनि के दस रूप 


आज 13 अक्टूबर है, दादामुनि अशोक कुमार का जन्मदिवस। इत्तेफ़ाक की बात है कि आज दादामुनि के छोटे भाई किशोर कुमार का स्मृति दिवस भी है। 1987 में आज के ही दिन एक तरफ़ अशोक कुमार के जन्मदिन की तैयारियां चल ही रही थीं कि किशोर कुमार सबको गुड-बाई कह कर हमेशा के लिए दूर चले गए। दोस्तों, किशोर कुमार के जन्मदिन 4 अगस्त को हमने 'सिने पहेली' उन पर केन्द्रित की थी, इसलिए आज 13 अक्टूबर की 'सिने पहेली' हम करते हैं दादामुनि अशोक कुमार के नाम। नीचे दादामुनि द्वारा निभाये गये 10 विविध चरित्रों की तसवीरें हम आपको दिखा रहे हैं। इन्हें देख कर आपको बताना है कि कौन सी तस्वीर किस फ़िल्म की है। बहुत आसान है, हर सही जवाब के लिए 1 अंक, इस तरह से आज की पहेली के कुल अंक हैं 10। आज से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए सभी प्रतियोगियों से आग्रह करते हैं कि इस सेगमेण्ट में बिना कोई एपिसोड मिस किए, पूरी लगन और मेहनत से पहेलियों को सुलझायें और इस प्रतियोगिता को और भी रोचक बनायें।

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जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 41" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 18 अक्टूबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!




'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता


दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने कीअन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।

Wednesday, August 15, 2012

स्वाधीनता दिवस विशेषांक : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 10


फ़िल्मों में प्रारम्भिक दौर के देशभक्ति गीत 

'रुकना तेरा काम नहीं चलना तेरी शान, चल चल रे नौजवान...'


हिन्दी फ़िल्मों में देशभक्ति गीतों का होना कोई नई बात नहीं है। 50 और 60 के दशकों में मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर के गाये देशभक्तिपूर्ण फ़िल्मी गीतों ने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की थी। परन्तु देशभक्ति के गीतों का यह सिलसिला शुरू हो चुका था, बोलती फ़िल्मों के पहले दौर से ही। ब्रिटिश शासन की लाख पाबन्दियों के बावजूद देशभक्त फ़िल्मकारों ने समय-समय पर देशभक्तिपूर्ण गीतों के माध्यम से जनजागरण उत्पन्न करने के प्रयास किये और हमारे स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज 66वें स्वाधीनता दिवस पर आइए 30 के दशक में बनने वाले फिल्मों के देशभक्तिपूर्ण गीतों पर एक दृष्टिपात करते हें, जिन्हें आज हम पूरी तरह से भूल चुके हैं।आज का यह अंक स्वतन्त्रता दिवस विशेषांक है, इसीलिए आज के अंक में हम मूक फिल्मों की चर्चा नहीं कर रहे हैं। आगामी अंक से यह चर्चा पूर्ववत की जाएगी।


1930 के दशक के आते-आते पराधीनता की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ, देश आज़ादी के लिए ज़ोर-शोर से संघर्ष करने लगा। राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावनाओं को जगाने के लिए फ़िल्म और गीत-संगीत मुख्य भूमिकाएँ निभा सकती थीं। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने इस तरफ़ भी अपना शिकंजा कसा और समय-समय पर ऐसी फ़िल्मों और गीतों पर पाबंदियाँ लगाई जो देश की जनता को ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। फिर भी कई बार फ़िल्मों में इस तरह के कुछ गीत ज़रूर सुनाई पड़े। 1934 में अजन्ता सिनेटोन ने मुंशी प्रेमचंद की कथा पर आधारित फिल्म ‘मजदूर’ का निर्माण किया था, जिसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। राष्ट्रवादी फिल्मों के इतिहास में यह फिल्म प्रथम स्थान पर अंकित है। 1935 में संगीतकार नागरदास नायक ने 'भारतलक्ष्मी पिक्चर्स' की फ़िल्म 'बलिदान' में "जागो जागो भारतवासी..." गीत स्वरबद्ध किया था। इस गीत के बाद इसी वर्ष नागरदास की ही धुन पर पण्डित सुदर्शन का लिखा हुआ एक और देशभक्ति-भाव से ओत-प्रोत गीत आया "भारत की दीन दशा का तुम्हें भारतवालों, कुछ ध्यान नहीं...", फ़िल्म थी 'कुँवारी या विधवा'। इन दोनो गीतों के गायकों का पता नहीं चल सका है। चंदूलाल शाह निर्देशित 'देशवासी' भी इसी वर्ष आई पर इसके संगीतकार/गीतकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है, हाँ इतना ज़रूर बताया जा सकता है कि इस फ़िल्म में भी एक देशभक्ति गीत था "सेवा ख़ुशी से
संगीतकार, गायक और अभिनेता मास्टर मोहम्मद  
करो देश की रे जीवन हो जाए फूलबगिया..."। 'वाडिया मूवीटोन' की 1935 की फ़िल्मों में 'देश-दीपक' उल्लेखनीय है, जिसमें संगीत दिया था मास्टर मोहम्मद ने और गीत लिखे थे जोसेफ़ डेविड ने। सरदार मन्सूर की आवाज़ में फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत "हमको है जाँ से प्यारा, प्यारा वतन हमारा, हम बागबाँ हैं इसके..." लोकप्रिय हुआ था। इन बोलों को पढ़ कर इसकी "सारे जहाँ से अच्छा" गीत के साथ समानता मिलती है। 1936 में 'वाडिया मूवीटोन' की ही एक फ़िल्म आई 'जय भारत', जिसमें सरदार मंसूर और प्यारू क़व्वाल के अलावा मास्टर मोहम्मद ने भी कुछ गीत गाये थे। मास्टर मोहम्मद का गाया इसमें एक देशभक्ति गीत था "हम वतन के वतन हमारा, भारतमाता जय जय जय..."। आइए अब हम आपको फिल्म ‘जय भारत’ का यह दुर्लभ गीत सुनवाते है, जिसे मास्टर मोहम्मद और साथियों ने स्वर दिया है।

फिल्म – जय भारत : "हम वतन के वतन हमारा...” : मास्टर मोहम्मद और साथी


व्ही. शान्ताराम 
मास्टर मोहम्मद ने 1936 में बनी एक कम चर्चित फिल्म ‘लुटेरी ललना’ में सरिता और साथियों की आवाज़ में “झण्डा ऊँचा रहे हमारा...” गीत स्वरबद्ध किया था। मास्टर मोहम्मद ने इस दौर की फिल्मों में न केवल राष्ट्रवादी विचारों से युक्त गीतों पर बल दिया था, बल्कि तत्कालीन राजनीति में पनप रही हिन्दू-मुस्लिम अलगाववादी प्रवृत्तियों अपने गीतों के माध्यम से नकारते हुए परस्पर एकता को रेखांकित करने में अपनी भूमिका निभाई। फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट करने में व्ही. शान्ताराम का नाम शीर्ष फ़िल्मकारों में लिया जाता है। उनकी फिल्मों के कथानक और गीतों में समाज-सुधार के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान का भाव भी उपस्थित रहता था। 1937 में बनी उनकी द्विभाषी फिल्म ‘दुनिया न माने’ (हिन्दी) और ‘कंकु’ (मराठी) महिलाओं की शिक्षा, बेमेल विवाह और विधवा समस्या को रेखांकित किया गया था। इस फिल्म के एक गीत- “भारत शोभा में है सबसे आला...” में भारत-भूमि का गौरवशाली वर्णन किया गया है। फिल्म के संगीतकार थे केशव राव भोले और इसे स्वर दिया है फिल्म की एक बाल कलाकार बासन्ती ने। लीजिए आप भी सुनिए यह गीत।

फिल्म – दुनिया न माने : “भारत शोभा में है सबसे आला...” : बासन्ती


कवि प्रदीप 
1939 में 'बॉम्बे टॉकीज़' की फ़िल्म 'कंगन' में प्रदीप ने गीत भी लिखे और तीन गीत भी गाए। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्वयुद्ध रफ़्तार पकड़ रहा था। 1सितम्बर, 1939 को जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया, चारों तरफ़ राजनैतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। इधर हमारे देश में भी स्वाधीनता के लिए सरगर्मियाँ तेज़ होने लगीं थीं। ऐसे में फ़िल्म 'कंगन' में प्रदीप ने लिखा "राधा राधा प्यारी राधा, किसने हम आज़ाद परिंदों को बन्धन में बाँधा..."। गीतकार प्रदीप आरंभ से राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक थे। अपनी उग्र कविताओं के लिए वे विदेशी सत्ता के आँखों की किरकिरी बने हुए थे। ब्रिटिश राज में राष्ट्रीय भावों के गीत लिखने और उसका प्रचार करने पर सज़ा मिलती थी, ऐसे में प्रदीप ने कितनी चतुराई से इस गीत में राष्ट्रीयता के विचार भरे हैं। अशोक कुमार और लीला चिटनिस ने इस गीत को गाया था। स्वतन्त्रता दिवस के पावन पर्व पर आइए यह अर्थपूर्ण गीत भी सुनते चलें।

फिल्म – कंगन : "राधा प्यारी किसने हम आज़ाद परिंदों को बन्धन में बाँधा..." : अशोक कुमार और लीला चिटनीस



1939 में ही 'सागर मूवीटोन' की एक फ़िल्म आई 'कॉमरेड्स' जिसमें संगीत था अनिल विश्वास का। सुरेन्द्र, माया बनर्जी, हरीश और ज्योति अभिनीत इस फ़िल्म में सरहदी और कन्हैयालाल के साथ-साथ आह सीतापुरी ने भी कुछ गीत लिखे थे। फ़िल्म में एक देशभक्तिपूर्ण गीत "कर दे तू बलिदान बावरे..." स्वयं अनिल विश्वास ने ही गाया था। 1939 की ही स्टण्ट फ़िल्म 'पंजाब मेल' में नाडिया, सरिता देवी, शाहज़ादी, जॉन कावस आदि कलाकार थे। पण्डित 'ज्ञान' के लिखे गीतों को सरिता, सरदार मन्सूर और मोहम्मद ने स्वर दिया। फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे- "इस खादी में देश आज़ादी, दो कौड़ी में बेड़ा पार..." (सरिता, मोहम्मद, साथी) और "क़ैद में आए नन्ददुलारे, दुलारे भारत के रखवारे..." (सरिता, सरदार मन्सूर)। संगीतकार एस.पी. राणे का संगीत इस दशक के आरम्भिक वर्षों में ख़ूब गूँजा था। 1939 में उनकी धुनों से सजी एक ही फ़िल्म आई 'इन्द्र मूवीटोन' की 'इम्पीरियल मेल' (संगीतकार प्रेम कुमार के साथ)। सफ़दर मिर्ज़ा के लिखे इस फ़िल्म के गीत आज विस्मृत हो चुके हैं, पर इस फ़िल्म में एक देशभक्ति गीत था- "सुनो सुनो हे भाई, भारतमाता की दुहाई, ग़ैरों की ग़ुलामी करते…"।

देशभक्तिपूर्ण गीतों के संदर्भ में 1939 में प्रदर्शित 'वतन के लिए' फ़िल्म के दो गीतों का उल्लेख आवश्यक है। 'वनराज पिक्चर्स' के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म ने पराधीन भारत के लोगों में देशभक्ति के जज़्वे को जगाने के लिए दो गीत दिए; पहला "इतहाद करो, इतहाद करो, तुम हिन्द के रहने वालों..." और दूसरा "भारत के रहने वालों, कुछ होश तो संभालो, ये आशियाँ हमारा..."। इन दोनों गीतों को गुलशन सूफ़ी और बृजमाला ने गाया था। उधर 'न्यू थिएटर्स' के संगीतकार तिमिर बरन के कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1939 में उनकी संगीतबद्ध की हुई 'वन्देमातरम' रही। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस इस गीत के लिए एक ऐसी धुन चाहते थे जो समूहगान के रूप में गायी जाए और जिससे जोश पैदा हो, मातृभूमि के लिए मर-मिटने की। तिमिर बरन ने राग दुर्गा के स्वरों का आधार लेकर नेताजी की मनोकामना को पूरा किया और जब नेताजी ने अपनी 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का निर्माण किया तो सिंगापुर रेडियो से 'वन्देमातरम' के इसी संस्करण को प्रसारित कराया। 1939 के अन्तिम दौर में अशोक कुमार और लीला चिटनीस के अभिनय और गायन से सजी एक और फिल्म आई थी- ‘बन्धन’। इस फिल्म के एक गीत- “चल चल रे नौजवान...” ने उस समय के सभी कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया था। सरस्वती देवी के संगीत से सजे इस गीत को फिल्म के कई प्रसंगों में इस्तेमाल किया गया था। अब हम आपको इस गीत के दो संस्करण सुनवाते है। पहले संस्करण में अशोक कुमार और लीला चिटनीस की और दूसरे में बाल कलाकार सुरेश की आवाज़ें हैं।

फिल्म – बन्धन : “चल चल रे नौजवान...” : अशोक कुमार और लीला चिटनीस



फिल्म – बन्धन : “चल चल रे नौजवान...” : बाल कलाकार सुरेश

आगे चलकर नए दौर में बहुत से देशभक्ति गीत बने हैं, पर आज़ादी-पूर्व फ़िल्मी देशभक्ति गीतों का ख़ास महत्व इसलिए बन जाता है क्योंकि उस समय देश पराधीन था। एक तरफ़ जनसाधारण में राष्ट्रीयता के विचार जगाने थे और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासन के प्रतिबन्ध का भय था। फिल्म संगीत के माध्यम से स्वतन्त्रता संग्राम का अलख जगाने में फ़िल्मकारों ने जो सराहनीय योगदान दिया है, आज इस अंक के माध्यम से हम उनकी स्मृतियों को सादर नमन करते हैं।

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का पाँचवाँ गुरुवार होगा और इस सप्ताह हम प्रस्तुत करेंगे एक गैरप्रतियोगी संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।


आलेख : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, April 14, 2011

चलो हसीन गीत एक बनायें.....सुनिए कैसे 'शौक़ीन' दादामुनि अशोक कुमार ने स्वर दिया इस मजेदार गीत को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 635/2010/335

सितारों की सरगम', 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला में इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म अभिनेता-अभिनेत्रियों द्वारा गाये गये फ़िल्मी गीत। राज कपूर, दिलीप कुमार, मीना कुमारी और नूतन के बाद आज बारी हम सब के चहेते अभिनेता दादामुनि अशोक कुमार की। दोस्तों, आपको शायद याद होगा कि इस शृंखला की पहली कड़ी में हमनें यह कहा था कि इस शंखला में हम 'सिंगिंग् स्टार्स' को शामिल नहीं कर रहे हैं। इसलिए दादामुनि का नाम सुन कर शायद आप यह सवाल करें कि दादामुनि तो फ़िल्मों के पहले दशक में अभिनय के साथ साथ गायन भी किया करते थे, तो फिर उनका नाम कैसे इस शृंखला में शामिल हो रहा है? दरअसल बात ऐसी है दोस्तों कि भले ही अशोक कुमार नें उस दौर में अपने पर फ़िल्माये गानें ख़ुद ही गाया करते थे, लेकिन उनका नाम 'सिंगिंग् स्टार्स' की श्रेणी में दर्ज करवाना शायद सही नहीं होगा। दादामुनि की ही तरह उस दौर में बहुत से ऐसे अभिनेता थे जिन्हें प्लेबैक की तकनीक के न होने की वजह से अपने गानें ख़ुद ही गाने पड़ते थे, जिनमें मोतीलाल, पहाड़ी सान्याल जैसे नाम उल्लेखनीय है। यानी कि गायन उस ज़माने के अभिनेताओं की मजबूरी थी। और फिर दादामुनि नें स्वयं ही इस बात को स्वीकारा था विविध भारती के एक इंटरव्यु में, जिसमें उन्होंने कहा था, "जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक-अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होंने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उन्हीं की वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्हीं की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानि बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊँची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आये नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाये जाते थे ताकि हम जैसे गाने वाले आसानी से गा सके। मेरा अपना गाया हुआ एक गाना था "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर न जाने कोई"। मुझे याद है इस गाने को रेकॊर्ड में भरना मुश्किल पड़ गया था क्योंकि यह गाना था आधे मिनट का और इस आधे मिनट को तीन मिनट का बनाने के मुझे धीरे धीरे गाना पड़ा था। और उस रेकॊर्ड को सुन कर मैं रो दिया था। उसी वक़्त मैंने तय कर लिया था कि अगर मुझे फ़िल्मों में रहना है तो गाना सीखना ही पड़ेगा। मैं आठ महीनों तक राग यमन सीखता रहा।" दोस्तों, पार्श्वगायन की प्रथा लोकप्रिय होने के बाद अशोक कुमार को फ़िल्मों में गाने की ज़रूरत नहीं पड़ी और उनके गीत रफ़ी, मन्ना डे जैसे गायकों नें गाये, और वो एक अभिनेता के रूप में ही मशहूर हुए, न कि 'गायक-अभिनेता' के रूप में। इसलिए 'सितारों की सरगम' शृंखला में दादामुनि अशोक कुमार को शामिल करने में कोई वादा-ख़िलाफ़ी नहीं होगी।

आज की कड़ी के लिए अशोक कुमार के गाये गीतों में कौन सा गीत सुनवायें? जी नहीं, हम ३० के दशक का कोई गीत नहीं सुनवायेंगे। इसके चार दशक बाद दादामुनि की एक बेहद चर्चित फ़िल्म आयी थी 'आशीर्वाद', जिसमें उनका मुख्य चरित्र था फ़िल्म में। एक मानसिक रोगी की भूमिका में बच्चों के लिए उनके गाये "रेल गाड़ी" और "नानी की नाव चली" गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। लेकिन ये दोनों ही गीतों में गीत की विशेषता कम और नर्सरी राइम की महक ज़्यादा थी। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में दादामुनि नें फ़िल्म 'कंगन' में एक गीत गाया था "प्रभुजी मेरे अवगुण चित ना धरो"। साल १९८२ में बासु चटर्जी की एक हास्य फ़िल्म आयी थी 'शौकीन', जिसके मुख्य चरित्रों में थे तीन वृद्ध, जिन्हें पर्दे पर साकार किया था हिंदी सिनेमा के तीन स्तंभ अभिनेता - ए. के. हंगल, उत्पल दत्त और दादामुनि अशोक कुमार नें। साथ में थे मिथुन चक्रवर्ती और रति अग्निहोत्री। इस फ़िल्म में दादामुनि की आवाज़ में एक बड़ा ही अनूठा गीत था जिसे उन्होंने गायिका चिरश्री भट्टाचार्य के साथ मिल कर गाया था। राहुल देव बर्मन का संगीत था और गीतकार थे योगेश। मारुति राव और मनोहारी सिंह संगीत सहायक के रूप में काम किया था इस फ़िल्म में। हाँ तो दादामुनि और चिरश्री की युगल आवाज़ों में यह गीत था "चलो हसीन गीत एक बनाये, वह गीत फिर बनाके गुनगुनायें, ख़यालों को चलो ज़रा सजायें, नशे में क्यों न झूम झूम जायें"। फ़िल्मांकन में दादामुनि और रति अग्निहोत्री पियानो पे बैठ कर एक गीत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़ा ही गुदगुदाने वाला गीत है और दादामुनि का अंदाज़-ए-बयाँ भी क्या ख़ूब है। ३० के दशक में जो यमन उन्होंने सीखा था, शायद उसी का नतीजा था कि इस उम्र में भी उन्होंने इस गीत को इतने अच्छे तरीके से निभाया। और गीत तो गीत, वो इसके फ़िल्मांकन में रति को नृत्य भी सिखाते हुए नज़र आते हैं। लाल कोट पहनें दादामुनि पर फ़िल्माया यह गीत निस्संदेह एक अनोखा गीत है और यही गीत है आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी की शान। दादामुनि के अभिनय के साथ साथ उनकी गायन प्रतिभा को भी सलाम करते हुए आइए सुनें 'सितारों की सरगम' लघु शृंखला की पाँचवीं कड़ी का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि दादामुनि अशोक कुमार का असली नाम था कुमुद लाल गंगोपाध्याय। फ़िल्मों के पहले दौर में उनके अभिनय व गायन से सजी कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम हैं - जीवन नैया, अछूत कन्या, झूला, बंधन, कंगन, किस्मत।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 6/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान है, चलिए आज इसी अभिनेता के बारे में कुछ सवाल हो जाए

सवाल १ - ये अपनी धरम पत्नी की पहली में फिल्म में हीरो चुने जाने वाले थे, पर नहीं चुने गए, किस एक्टर की झोली में गया ये रोल - ३ अंक
सवाल २ - किस अभिनेता के साथ दो बार काम करते हुए इन्हें फिल्म फेयर सह अभिनेता का पुरस्कार मिला - 2 अंक
सवाल ३ - इस कलाकार ने सबसे पहली बार किस फिल्म में पार्श्वगायन किया था और वो गीत कौन सा था - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह कल तो अमित जी बाज़ी मार गए, वैसे आधे पड़ाव तक अभी भी अनजाना जी खासी बढ़त बनाये हुए हैं, पर इस बार प्रतीक जी भी अच्छा मुकाबला पेश कर रहे हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, December 19, 2010

मैं बन की चिड़िया बन के.....ये गीत है उन दिनों का जब भारतीय रुपहले पर्दे पर प्रेम ने पहली करवट ली थी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 551/2010/251

मस्कार दोस्तों! स्वागत है बहुत बहुत आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस सुरीली महफ़िल में। पिछली कड़ी के साथ ही पिछले बीस अंकों से चली आ रही लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' सम्पन्न हो गई, और आज से एक नई लघु शृंखला का आग़ाज़ हम कर रहे हैं। और यहाँ पर आपको इस बात की याद दिला दूँ कि यह साल २०१० की आख़िरी लघु शृंखला होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। जी हाँ, देखते ही देखते यह साल भी अब विदाई के मूड में आ गया है। तो कहिए साल के आख़िरी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' लघु शृंखला को कैसे यादगार बनाया जाए? क्योंकि साल के इन आख़िरी कुछ दिनों में हम सभी छुट्टी के मूड में होते हैं, हमारा मिज़ाज हल्का फुल्का होता है, मौसम भी बड़ा ख़ुशरंग होता है, इसलिए हमने सोचा कि इस लघु शृंखला को कुछ बेहद सुरीले प्यार भरे युगल गीतों से सजायी जाये। जब से फ़िल्म संगीत की शुरुआत हुई है, तभी से प्यार भरे युगल गीतों का भी रिवाज़ चला आ रहा है, और उस ज़माने से लेकर आज तक ये प्रेम गीत ना केवल फ़िल्मों की शान हैं, बल्कि फ़िल्म के बाहर भी सुनें तो एक अलग ही अनुभूति प्रदान करते हैं। और जो लोग प्यार करते हैं, उनके लिए तो जैसे दिल के तराने बन जाया करते हैं ऐसे गीत। तो आइए आज से अगले दस अंकों में हम सुनें ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक में बनने वाली कुछ बेहद लोकप्रिय फ़िल्मी युगल रचनाएँ, जिन्हें हमने आज तक अपने सीने से लगाये रखा है। वैसे तो इनके अलावा भी बेशुमार सुमधुर युगल गीत हैं, बस युं समझ लीजिए कि आँखें बंद करके समुंदर से एक मुट्ठी मोतियाँ हम निकाल लाये हैं, और आँखें खोलने पर ही देखा कि ये मोती कौन कौन से हैं। पेश-ए-ख़िदमत है साल २०१० के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अंतिम लघु शृंखला 'एक मैं और एक तू'। जैसा कि हमने कहा कि हम युगल गीतों का यह सफ़र ३० के दशक से शुरु करेंगे, तो फिर ऐसे में फ़िल्म 'अछूत कन्या' के उस यादगार गीत से ही क्यों ना शुभारम्भ की जाए! "मैं बन की चिड़िया बनके बन बन बोलूँ रे, मैं बन का पंछी बनके संग संग डोलूँ रे"। अशोक कुमार और देविका रानी के गाये इस गीत का उल्लेख आज भी कई जगहों पर चल पड़ता है। और इस गीत को सुनते ही आज भी पेड़ की टहनी पर बैठीं देविका रानी और उनके पीछे खड़े दादामुनि अशोक कुमार का वह दृष्य जैसे आँखों के सामने आ जाता है।

'अछूत कन्या' १९३६ की फ़िल्म थी जो बनी थी 'बॊम्बे टॊकीज़' के बैनर तले। संगीतकार थीं सरस्वती देवी। यह वह दौर था जब गांधीजी ने अस्पृश्यता को दूर करने के लिए एक मिशन चला रखी थी। निरंजन पाल की लिखी कहानी पर आधारित इस फ़िल्म में भी अछूतप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया गया था। पंडित नेहरु और सरोजिनी नायडू 'बॊम्बे टॊकीज़' में जाकर यह फ़िल्म देखी थी। 'अछूत कन्या' पहली बोलती फ़िल्म है जिसके गानें सर्वसाधारण में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुए। सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि इसके गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड्स इंगलैण्ड तक भेजे गये। कहा जाता है कि सरस्वती देवी घण्टों तक अशोक कुमार और देविका रानी को गाना सिखाती थीं, ठीक वैसे जैसे कोई स्कूल टीचर बच्चों को नर्सरी राइम सिखाती है। उस ज़मानें में प्लेबैक का चलन शुरु नहीं हुआ था, इसलिए अभिनेता अशोक कुमार और देविका रानी को अपने गानें ख़ुद ही गाने थे। ऐसे में संगीतकार के लिए बहुत मुश्किल हुआ करता था कम्पोज़ करना और जहाँ तक हो सके वो धुनें ऐसी बनाते थे जो अभिनेता आसानी से गा सके। इसलिए बहुत ज़्यादा उन्नत कम्पोज़िशन करना सम्भव नहीं होता था। फिर भी आज का प्रस्तुत गीत उस ज़माने में ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि उससे पहले किसी फ़िल्मी गीत ने नहीं की थी। उस समय के प्रचलित नाट्य संगीत और शास्त्रीय संगीत के बंधनों से बाहर निकलकर सरस्वती देवी ने हल्के फुल्के अंदाज़ में इस फ़िल्म के गानें बनाये जो बहुत सराहे गये। इस फ़िल्म के संगीत की एक और महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहूँगा। फ़िल्म में एक गीत है "कित गये हो खेवनहार"। कहा जाता है कि इस गीत को सरस्वती देवी की बहन चन्द्रप्रभा द्वारा गाया जाना था जो उस फ़िल्म में अभिनय कर रही थीं। लेकिन जिस दिन इस गाने की शूटिंग् थी, उस दिन उनका गला ख़राब हो गया और गाने की हालत में नहीं थीं। ऐसे में सरस्वती देवी ने पर्दे के पीछे खड़े होकर ख़ुद गीत को गाया जब कि चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ हिलाये। इस तरह से सरस्वती देवी ने प्लेबैक की नींव रखी। वैसे पहले प्लेबैक का श्रेय न्यु थिएटर्स के आर. सी. बोराल को जाता है जिन्होंने १९३५ की फ़िल्म 'धूप-छाँव' में इसकी शुरुआत की थी, लेकिन उस फ़िल्म में उस अभिनेता ने अपने लिए ही प्लेबैक किया। "प्योर प्लेबैक" की बात करे तो सरस्वती देवी ने अपनी बहन चन्द्रप्रभा के लिए प्लेबैक कर 'प्लेबैक' के असली अर्थ को साकार किया। तो लीजिए दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर प्रस्तुत है हिंदी सिने संगीत का ना केवल पहला मशहूर युगल गीत, बल्कि यु कहें कि पहला मशहूर गीत। अशोक कुमार और देविका रानी के साथ साथ सरस्वती देवी को भी 'आवाज़' का सलाम।



क्या आप जानते हैं...
कि सरस्वती देवी का असली नाम था ख़ुरशीद मंचशेर मिनोचा होमजी (Khursheed Manchersher Minocher Homji)। उस समय पारसी महिलाओं को फ़िल्म और संगीत में जाने की अनुमति नहीं थी। इसलिए उन्हें अपना नाम बदल कर इस क्षेत्र में उतरना पड़ा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस युगल गीत की गायिका हैं नूरजहाँ.

सवाल १ - गायक बताएं - १ अंक
सवाल २ - एक अमर प्रेम कहानी पर आधारित थी फिल्म, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस संगीतकार की अंतिम फिल्म थी ये - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पहले सवाल के साथ शरद जी ने बढ़त बनाई है, पर क्या वो पिछली बार की तरह इस बार भी श्याम जी से पिछड़ जायेगें आगे चल कर या वो और अमित जी मिलकर ४ बार के विजेता श्याम जी को पछाड पायेंगें, देखना दिलचस्प होगा, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, February 13, 2010

मेरा बुलबुल सो रहा है शोर तू न मचा...कवि प्रदीप और अनिल दा का रचा एक अनमोल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 344/2010/44

१९४३। इस वर्ष ने ३ प्रमुख फ़िल्में देखी - क़िस्मत, तानसेन, और शकुंतला। 'तानसेन' रणजीत मूवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने सहगल और ख़ुर्शीद से कुछ ऐसे गानें गवाए कि फ़िल्म तो सुपर डुपर हिट साबित हुआ ही, खेमचंद जी और सहगल साहब के करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित हुआ। प्रभात से निकल कर और अपनी निजी बैनर 'राजकमल कलामंदिर' की स्थापना कर वी. शांताराम ने इस साल बनाई फ़िल्म 'शकुंतला', जिसके गीत संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाया। संगीतकार वसंत देसाई की इसी फ़िल्म से सही अर्थ में करीयर शुरु हुआ था। और १९४३ में बॊम्बे टॊकीज़ की सफलतम फ़िल्म आई 'क़िस्मत'। 'क़िस्मत' को लिखा व निर्देशित किया था ज्ञान मुखर्जी ने। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद बॊम्बे टॊकीज़ में राजनीति चल पड़ी थी। देवीका रानी और शशधर मुखर्जी के बीच चल रही उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच ही यह फ़िल्म बनी। अशोक कुमार और मुम्ताज़ शांति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। देश भर में कई कई जुबिलीज़ मनाने के अलावा यह फ़िल्म कलकत्ता के 'चित्र प्लाज़ा' थिएटर में लगातार १९६ हफ़्तों (३ साल) तक प्रदर्शित होती रही। इस रिकार्ड को तोड़ा था रमेश सिप्पी की फ़िल्म 'शोले' ने। 'क़िस्मत' एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म रही क्योंकि इस फ़िल्म में बचपन में बिछड़ने और अंत में फिर मिल जाने की कहानी थी। संगीत की दृष्टि से 'क़िस्मत' अनिल बिस्वास की बॊम्बे टॊकीज़ में सब से उल्लेखनीय फ़िल्म रही। धीरे धीरे पार्श्वगायन की तकनीक को संगीतकार अपनाने लगे थे, और अच्छे गायक गायिकाएँ इस क्षेत्र में क़दम रख रहे थे। ऐसे में संगीतकार भी गीतों में नए प्रयोग ला रहे थे। इस फ़िल्म के तमाम गीत गली गली गूंजने लगे थे। ख़ास कर कवि प्रदीप के लिखे "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने तो जैसे पराधीन भारत के लोगों के रग रग में वतन परस्ती के जस्बे का संचार कर दिया था। इसी फ़िल्म में एक नर्मो नाज़ुक लोरी भी थी जिसे शायद आज भी फ़िल्म संगीत के सर्वश्रेष्ठ लोरियों में गिना जाता है! "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल ना मचा"। कवि प्रदीप की गीत रचना, अनिल दा का संगीत। इसी गीत को हमने चुना है १९४३ का प्रतिनिधित्व करने के लिए।

फ़िल्म 'क़िस्मत' के गीतों की बात करें तो उन दिनों अमीरबाई कर्नाटकी अनिल दा की पहली पसंद हुआ करती थीं। फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से ६ गीतों में ही अमीरबाई की आवाज़ शामिल थी। उपर ज़िक्र किए गए दो गीतों के अलावा इस फ़िल्म में अमीरबाई ने दो दुख भरे गीत गाए - "ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा", और "अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया"। जहाँ तक आज के प्रस्तुत गीत का सवाल है, इसके दो वर्ज़न है, एक में अमीरबाई के साथ आवाज़ है अशोक कुमार की, और दूसरे में अरुण कुमार की। दरसल अरुण कुमार अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे जो अच्छा भी गाते थे और जिनकी आवाज़ अशोक कुमार से कुछ कुछ मिलती थी। इसलिए बॊम्बे टॊकीज़ के कुछ फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक उन्होने किया था। लेकिन इस गीत को दोनों से ही अलग अलग गवाया गया और दोनों वर्ज़न ही उपलब्ध हैं। आज हम आपको इस गीत के दोनों वर्ज़न सुनवाएँगे। कहा जाता है कि अनिल बिस्वास ने मज़ाक मज़ाक में कहा था कि यही एकमात्र ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया था। यह भी कहा जाता है कि अनिल दा अशोक कुमार के गायन से कुछ ज़्यादा संतुष्ट नहीं होते थे, इसलिए वो अरुण कुमार से ही उनके गानें गवाने में विश्वास रखते थे। इस फ़िल्म में अरुण कुमार ने अमीरबाई के साथ एक और युगल गीत गाया था जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी था, "हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाए, ये जो एक दिन हँसाए एक दिन रुलाए"। अरुण कुमार का गाया "तेरे दुख के दिन फिरेंगे ले दुआ मेरी लिए जा" भी एक दार्शनिक गीत है इस फ़िल्म का। अनिल दा की बहन और गायिका पारुल घोष का "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" शास्त्रीय रंग में ढला हुआ इसी फ़िल्म का एक सुरीला नग़मा था। इससे पहले कि आज का गीत आप सुनें, उस दौर का दादामुनि अशोक कुमार ने सन्‍ १९६८ में विविध भारती पर किस तरह से वर्णन किया था, आइए जानें उन्ही के कहे हुए शब्दों में। "दरअसल जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उनकी वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्ही की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानी बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊंची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाए जाते थे ताक़ी हम जैसे गानेवाले आसानी से गा सके। मैं अपनी पुरानी फ़िल्मों से कुछ मुखड़े सुना सकता हूँ, (गाते हुए) "मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे", "चल चल रे नौजवान", "चली रे चली रे मेरी नाव चली रे", "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है...", "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर ना जाने कोई"। ये पहले पहले बॊम्बे टॊकीज़ के गीतों में "रे" का इस्तेमाल बहुत किया जाता था।" तो आइए दोस्तों, अब इस गीत को सुनें, पहले अशोक कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में, और फिर अरुण कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में।



दूसरा संस्करण


चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

देख रही तेरा रस्ता कब से
अब तो आजा बेदर्दी सैयां,
रो रो अखियाँ तरसे संगदिल,
मन से पडूं मैं तेरे पैयां..

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये फिल्म इस बेहद कामियाब संगीतकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही, हम किस संगीतकार की बात कर रहे हैं- सही जवाब के होंगें २ अंक.
3. इस गीत की गायिका का नाम बताएं जिसका हाल के सालों में एक रीमिक्स संस्करण भी आया-सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. इस गीत के गीतकार उस दौर के सफल गीतकारों में थे उनका नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
पहेली में नए प्रयोगों के चलते खूब मज़ा आ रहा है. रोहित जी अब तक ७ अंकों के साथ आगे चल रहे हैं, शरद जी हैं ५ अंकों पर, इंदु जी नाराज़ हो गयी क्या ? अरे व्यस्तता के चलते आपका स्वागत नहीं कर पाए, वैसे स्वागत तो मेहमानों का होता है न, आप तो ओल्ड इस गोल्ड की सरताज सदस्या ठहरीं. वैसे पहेली के सुझावों के लिए हम शरद जी का धन्येवाद देते हैं. ताज्जब इस बात का है कि सही गीत पता लग जाने के बाद भी कोई अन्य सवालों के जवाब लेकर हाज़िर नहीं हो रहा. शायद इस शृंखला के मुश्किल गीतों के कारण ऐसा हो...अवध जी हमें मेल किया और सभी सवालों के जवाब दे डाले. नियमानुसार एक से अधिक सही जवाब देने पर कोई अंक नहीं दिए जाने हैं, पर अवध जी का जवाब अन्य लोगों तक नहीं पहुंचा और उनका कंप्यूटर खराब होने के करण हो सकता है उन्हें नियमों की सही जानकारी न हो, तो इस पहली गलती को नज़र अंदाज़ कर हम उन्हें २ अंक देते हैं, ताकि उनका भी खाता खुले...सभी विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 13, 2009

महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' का संगीतबद्ध रूप

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-4: जो तुम आ जाते एक बार

हर वर्ष 14 सितम्बर का दिन हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। हिन्दी सेवी संस्थाएँ तरह-तरह के सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन करती हैं। सरकारी उपक्रम तो हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा व हिन्दी मास अभियान चलाने जैसी बातें करते हैं। लेकिन हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। बल्कि इससे एक दिन पहले महीयसी महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' का संगीतबद्ध संस्करण जारी कर रहे हैं।

हिन्द-युग्म डॉट कॉम अपने आवाज़ मंच पर गीतकास्ट प्रतियोगिता के माध्यम से हिन्दी के स्तम्भ कवियों की एक-एक कविताओं को संगीतबद्ध/स्वरबद्ध करने की प्रतियोगिता आयोजित करता है। इसमें हमने शुरूआती शृंखला के तौर पर छायवादी युगीन कवियों की कविताओं को स्वरबद्ध करने की प्रतियोगिता रखी। जिसके अंतर्गत अब तक जयशंकर प्रसाद की कविता ' अरुण यह मधुमय देश हमारा', सुमित्रानंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' को संगीतबद्ध किया जा चुका है। आज हम छायावादी युग की अंतिम कड़ी यानी महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' का परिणाम लेकर हाज़िर हैं।

जब हमें लगा कि कविता को स्वरबद्ध करना मुश्किल है, तब हमें बहुत अधिक प्रविष्टियाँ मिली। जबकि इस बार हमें महसूस हो रहा था कि महादेवी वर्मा की यह कविता बहुत आसानी से संगीतबद्ध हो जायेगी तो मात्र 10 प्रतिभागियों ने इसमें भाग लिया। लेकिन सजीव सारथी, अनुराग शर्मा, यूनुस खान, आदित्य प्रकाश और शैलेश भारतवासी सरीखे निर्णायकों ने कहा कि इस बार संगीत संयोजन, गायकी और उच्चारण के स्तर पर प्रविष्टियाँ पहले से कहीं बेहतर हैं। तब हमें बहुत संतोष भी मिला।

पाँच जजों द्वारा मिले औसत अंकों के आधार में हमने कृष्ण राज कुमार और श्रीनिवास पांडा/कुहू गुप्ता को संयुक्त विजेता घोषित करने का निर्णय लिया है। इस तरह से प्रथम स्थान के लिए निर्धारित रु 2000 और दूसरे स्थान के निर्धारित के लिए निर्धारित रु 1000 को जोड़कर आधी-आधी राशि इन दो विजेताओं (विजेता समूहों) को दी जायेगी।

आपको याद होगा की श्रीनिवास पांडा के संगीत-निर्देशन में बिस्वजीत नंदा द्वारा गायी गई निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' को भी पहला स्थान प्राप्त हुआ था। इस बार संगीतकार श्रीनिवास ने कुहू गुप्ता के रूप में बहुत ऊर्जावान गायिका हिन्द-युग्म को दिया है।


श्रीनिवास/कुहू

श्रीनिवास
कुहू
कुहू युग्म पर पहली बार शिरकत कर रही हैं। पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 5 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं।

श्रीनिवास हिन्द-युग्म के लिए बिलकुल नये संगीतकार हैं। 'स्नेह-निर्झर बह गया है' के माध्यम से आवाज़ पर इन्होंने अपनी एंट्री की थी। मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 1500 का नग़द पुरस्कार

विशेष- अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-
64kbps

128kbps



इसी स्थान पर कृष्ण राजकुमार की प्रविष्टि भी शामिल है।


कृष्ण राज कुमार

कृष्ण राज कुमार एक ऐसे गायक-संगीतकार हैं जिनके बारे में जानकर और सुनकर हर किसी को सलाम करने का मन करता है। गीतकास्ट प्रतियोगिता अभी तक 4 बार आयोजित हुई है, इन्होंने चारों दफा इसमें भाग लिया है और निर्णायकों का ध्यान आकृष्ट किया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार और इस बार महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 1500 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-
64kbps

128kbps



तीसरे स्थान के विजेता आवाज़ के दैनिक श्रोता हैं। ओल्ड इज़ गोल्ड के गेस्ट-होस्ट रह चुके हैं। आवाज़ से ही कैरिऑके में अपनी आवाज़ डालना सीखे हैं और आज तीसरे स्थान के विजेता हैं। इस प्रविष्टि में संगीत इनका है और संगीत संयोजन इनके मित्र ब्रजेश दाधीच का। आवाज़ भी इन्हीं की है।


शरद तैलंग

शरद तैलंग सुगम संगीत के आकाशवाणी कलाकार, कवि, रंगकर्मी और राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य हैं। वे भारत विकास परिषद के अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय सम्मेलन के सांस्कृतिक सचिव भी रह चुके हैं।

आप अनेक साहित्यिक व संगीत संस्थाओँ के सदस्य अथवा पदाधिकारी रह चुके है, अनेकों संगीत एवं नाट्य प्रतियोगिताओँ में निर्णायक रह चुके हैं तथा देश के केरल, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र प्रदेशों के अनेक शहरों में अपनी संगीत प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं। आपकी रचनाएँ देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओँ जैसे धर्मयुग, हंस, मरु गुलशन, मरु चक्र, सौगात, राजस्थान पत्रिका, राष्ट्रदूत, माधुरी, दैनिक भास्कर आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं।

ऑल इण्डिया आर्टिस्ट एसोसिएशन शिमला, जिला प्रशासन कोटा आई. एल. क्लब तथा अनेक संस्थानों द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका हैं। आप आवाज़ पर बहुचर्चित स्तम्भ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अतिथि-होस्ट रह चुके हैं।

पुरस्कार- तृतीय पुरस्कार, रु 1000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।

गीत सुनें-
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इनके अतिरिक्त हम रफ़ीक शेख, कमल किशोर सिंह, रमेश धुस्सा, अम्बरीष श्रीवास्तव, शारदा अरोरा, कमलप्रीत सिंह, और अर्चना चाओजी इत्यादि के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है। हम निवेदन करेंगे कि आप इसी ऊर्जा के साथ गीतकास्ट के अन्य अंक में भी भाग लेते रहें।


इस कड़ी के प्रायोजक है डैलास, अमेरिका के अशोक कुमार हैं जो पिछले 30 सालों से अमेरिका में हैं, आई आई टी, दिल्ली के प्रोडक्ट हैं। डैलास, अमेरिका में भौतिकी के प्रोफेसर हैं, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के आजीवन सदस्य हैं। और हिन्दी-सेवा के लिए डैलास में एक सक्रिय नाम हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।

Monday, August 4, 2008

वो खंडवा का शरारती छोरा

किशोर कुमार का नाम आते ही जेहन में जाने कितनी तस्वीरें, जाने कितनी सदायें उभर कर आ जाती है. किशोर दा यानी एक हरफनमौला कलाकार, एक सम्पूर्ण गायक, एक लाजवाब शक्सियत. युग्म के वाहक और किशोर दा के जबरदस्त मुरीद, अवनीश तिवारी से हमने गुजारिश की कि वो किशोर दा पर, "आवाज़" के लिए एक श्रृंखला करें. आज हम सब के प्यारे किशोर दा का जन्मदिन है, तो हमने सोचा क्यों न आज से ही इस श्रृंखला का शुभारम्भ किया जाए. पेश है अवनीश तिवारी की इस श्रृंखला का पहला अंक, इसमें उन्होंने किशोर दा के फिल्मी सफर के शुरूवाती दस सालों पर फोकस किया है, साथ में है कुछ दुर्लभ तस्वीरें भी.

किशोर कुमार ( कालावधी १९४७ - १९६० )- वो खंडवा का शरारती छोरा

यह एक कठिन प्रश्न है कि किशोर कुमार जैसे हरफनमौला व्यक्तित्व के विषय में जिक्र करते समय कहाँ से शुरुवात करें आइये सीधे बढ़ते है उनके पेशेवर जीवन ( प्रोफेसनल करिअर ) के साथ , जो उनकी पहचान है बात करते है उनके शुरू के दशक की, याने १९४७ - १९६० तक की बड़े भाई अशोक कुमार के फिल्मों में पैर जमाने के बाद छोटे भाई आभास यानी हमारे चहेते किशोर और मझले भाई अनूप बम्बई ( मुम्बई ) आ गए आभास की उम्र १८ बरस थी छुटपन से ही कुंदन लाल सहगल का अनुसरण ( follow up ) कर उनके गीतों को गाने में माहीर किशोर को पहला मौका पार्श्व गायक ( play back singer ) के रूप में मिला फ़िल्म "जिद्दी" में और गाना था - "मरने की दुआएं क्या मांगू " देव आनद पर फिल्माए इस गीत में कुछ भी नया नही था और के. एल. सहगल की नक़ल जैसी थी इसके पहले किशोर ने एक समूह गीत में भी भाग लिया था उन्ही दिनों आभास ने अपना नाम बदल कर किशोर रख लिया कहा जाता है कि नाम में बहुत कुछ होता है तभी तो यह नाम आज तक याद किया जा रहा है

अदाकारी में कामयाबी की मंजिलों को चुमते दादा मुनी याने अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर भी अभिनय (acting) में ही मन लगाये लेकिन मन मौजी किशोर को यह दिखावे कि दुनिया कम भाती रही बड़े भाई के दबाव से अभिनय शुरू किया साथ - साथ अपने लिए गीत भी गाये लेकिन शुरुवाती दौर का यह सफर इतना मशहूर नही हो पा रहा था " शिकारी" नाम की एक फ़िल्म में उन्होंने अपना पहला अभिनय किया

इन बरसों की कुछ यादगार फिल्में -

१९५१ - आन्दोलन - अभिनय किया

१९५४ - नौकरी - सफल निर्देशक बिमल रॉय की फ़िल्म में किशोर ने अभिनय किया और गाया भी
एक मीठा गीत है - " छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में ...." ख्याल आया ?

१९५६ - नयी दिल्ली का गाना - " नखरेवाली ..."

१९५६ - फंटूस - इसका एक गीत " दुखी मन मेरे ..." आज भी मन को भाव विभोर करता है यह एक ऐसा गीत है जो सच में किशोर के उन दिनों की जदोजहत को बयान करता है ध्यान से सुनने पर मुझे ऐसा लगा जैसे सहगल और किशोर दोनों कि आवाज़ मिली है इसमे किशोर अपने माने गुरु सहगल को सुनते और सीखते अपनी पहचान बनाने में लगे थे यह उसी बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है जगजीत सिंह जैसे गायकों ने भी यह गीत दोहराया है अपनी आवाज में

१९५७ - नौ दो ग्यारह - सदाबहार गीत " आंखों में क्या जी ...."

१९५७ - मुसाफिर

१९५८ - दिल्ली का ठग - अभिनेत्री नूतन और किशोर की एक सौगात - " हम तो मोहब्बत करेगा ..."

किशोर की आवाज़ में उनके इस दशक का मेरा सबसे पसंदीदा गीत "दुखी मन मेरे", ज़रूर सुनें -



अशोक कुमार के घर आए संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ( S. D. Burman) ने किशोर को बाथरूम में गाते सूना और उनकी तारीफ़ करते हुए उन्हें आपने आवाज़ में गाने की सलाह दी दो गुणों का मेल किसी नए कृति का सृजक होता है बर्मन दा और किशोर मिले और शुरू हुया एक ऐसा सफर जो हिन्दी फ़िल्म जगत का एक सुनहरा इतिहास बन गया बर्मन जी ने किशोर को और निखारा और दोनों ने उस दशक में कई अच्छे गीत दिए

दोनों के कुछ सफल प्रयोग -

१९५४ - मुनीमजी ,

१९५६ - फंटूस - पहले ही बताया इस के बारे में ,

१९५७ - Paying Guest ,

१९५८- फ़िल्म चलती का नाम गाडी के गीत ह्म्म्म... इस फ़िल्म के सभी गानों में तो किशोर ने आवाज़ दी थी
इस फ़िल्म के लिए क्या कहा जाए - superb

दशक में किशोर ने मेहनत कर अपनी पहचान तो लगभग बना ली थी लेकिन अभी तक आवाज़ से ज्यादा अभिनय के लिए ही मशहूर हुए थे १९५१ में रुमा गुहा के साथ शादी की लेकिन यह केवल ८ बरस तक ही कामयाब रही रुमा खास कर बंगला की अभिनेत्री और गायिका है इस दंपत्ति ने हमे अमित कुमार के नाम से एक नया कलाकार दिया

इस तरह शुरूवात के दशक में किशोर की आवाज देव आनंद के लिए पहचान बनी , आशा और लता जी का संग हुया और एस. डी. बर्मन जैसे गुरु का हाथ मिला

ये कुछ दुर्लभ तस्वीरें है पहला किशोर और देव जी का है



दूसरे में किशोर और रफी जी के साथ हैं कुछ और बड़े धुरंधर भी, खोजिये और बताएं ये कौन कौन हैं.



किशोर कुमार के शुरुवात के दिनों की कहानी को मै अपने इन शेरों से रोकता हूँ -

अभिनय - गायकी, कला में वो लाजवाब था ,
सिने जगत में आया एक नया आफताब था ,
आया बोम्बे वो खंडवा का शरारती छोरा ,
जैसे राजकुमार चला कोई बनने नवाब था ,
वक्त की रफ़्तार में गिरते - संभलते रहा ,
नया मुकाम हासील करना उसका ख्वाब था


धन्यवाद

बाबू अब तो चलते हैं,
अगले माह मिलेंगे
पम्प पम्प पम्प .....



(जारी...)

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