Tuesday, March 27, 2018

चित्रकथा - 61: अभिनेता नरेन्द्र झा को श्रद्धांजलि

अंक - 61

अभिनेता नरेन्द्र झा को श्रद्धांजलि

फ़िल्मी चरित्र अभिनेता के रूप में नरेन्द्र झा







14 मार्च 2018 को जाने-माने चरित्र अभिनेता नरेन्द्र झा का मात्र 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। SRCC से अभिनय का डिप्लोमा, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री, और सुन्दर कदकाठी के नरेन्द्र झा जब मायानगरी बम्बई में क़दम रखे, तो विज्ञापन जगत ने उन्हें फ़ौरन गले लगा लिया। ’दूरदर्शन’ के पहले ’टेली-सोप’ धारावाहिक ’शान्ति’ से नरेन्द्र झा की पहचान बनी और बीसियों धारावाहिकों में उन्होंने आगे चल कर काम किया। इन दिनों जारी ’योग गुरु बाबा रामदेव’ में भी वो अभिनय कर रहे थे। करीब दस साल तक धारावाहिकों में अभिनय के बाद 2002 में उन्हें पहली बार किसी फ़िल्म में अभिनय का मौका मिला। नरेन्द्र झा के अभिनय क्षमता का लोहा दिग्गज फ़िल्मकार भी मानते थे। श्याम बेनेगल ने अपनी एकाधिक कृतियों में उन्हें कास्ट किया। आइए आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में हम नज़र डालें कुछ ऐसी बड़ी फ़िल्मों पर जिनमें नरेन्द्र झा द्वारा निभाए हुए किरदार यादगार रहे हैं। आज का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय नरेन्द्र झा की पुण्य स्मृति को!




रेन्द्र झा अभिनीत पहली फ़िल्म थी ’Fun2shh: Dudes in the 10th Century'। वर्ष 2003 की यह एक हास्य फ़िल्म थी जो एक कम बजट की फ़िल्म होने के बावजूद दर्शकों को ख़ूब गुदगुदाया। इस फ़िल्म में नरेन्द्र झा ने एक कमांडर का छोटा किरदार निभाया, लेकिन बड़ी बात यह कि इस फ़िल्म का वाचन अमिताभ बच्चन ने किया और अपनी पहली ही फ़िल्म में नरेन्द्र झा को फ़रीदा जलाल, गुल्शन ग्रोवर, परेश रावल, कादर ख़ान और आशिष विद्यार्थी जैसे अभिनेताओं के साथ काम करने का मौका मिला। नरेन्द्र झा के अभिनय क्षमता से महान फ़िल्मकार श्याम बेनेगल वाक़िफ़ थे। इसलिए अगले ही साल 2004 में बेनेगल ने अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’Bose - The Forgotten Hero' में नरेन्द्र झा को एक महत्वपूर्ण किरदार निभाने का मौका दिया। इस फ़िल्म में सचिन खेडेकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भूमिका निभा रहे थे। साथ में थे कुलभूषण खरबन्दा, रजित कपूर, दिव्या दत्ता, आरिफ़ ज़कारिया, इला अरुण, पंकज बेरी, सोनू सूद, राजेश्वरी सचदेव, राजपाल यादव तथा अन्य बड़े देश विदेश के कलाकार। अपनी दूसरी ही फ़िल्म में इतने विशाल आयाम के ऐतिहासिक फ़िल्म में अभिनय करने का मौका नरेन्द्र झा के लिए बहुत बड़ी बात थी। इस फ़िल्म में उनके द्वारा निभाए राजा हबीब-उर-रहमान ख़ान का किरदार आज भी याद है सब को। इस तरह का राष्ट्रवादी चरित्र नरेन्द्र झा पहली बार निभा रहे थे, और अपने अभिनय से इस किरदार को उन्होंने जीवन्त कर दिया। इन दो फ़िल्मों के अलावा वर्ष 2013 तक जिन फ़िल्मों में नरेन्द्र झा नज़र आए, वो हैं ’कच्ची सड़क’, ’एक दस्तक’ और ’चाँद पे तारे’। इसी दौरान दो तेलुगू फ़िल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया - ’छत्रपति’ और ’यामाडोंगा’। इन तमाम फ़िल्मों में उन्हें बहुत ज़्यादा ख्याति नहीं मिली।

नरेन्द्र झा का फ़िल्मों में सफलता का दौर शुरु हुआ वर्ष 2014 से जब उनकी फ़िल्म आई ’हैदर’। विशाल भारद्वाज द्वारा लिखे, और उनके ही द्वारा निर्मित व निर्देशित ’हैदर’ में शाहिद कपूर, तबु, श्रद्धा कपूर और के के मेनन ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। यह फ़िल्म असल में शेक्स्पीअर के ’हैमलेट’ और बशारत पीर के ’Curfewed Night' रचनाओं पर आधारित है, और विशाल ने इन दो रचनाओं को कश्मीर को पार्श्व में रख कर एक दूसरे से ऐसे जोड़ दिया है कि दर्शक मुग्ध हो गए। नरेन्द्र झा के निभाए हिलाल मीर के चरित्र की अगर बात करें तो 1995 में कश्मीरी विद्रोह के दौरान हिलाल मीर (नरेन्द्र झा) श्रीनगर स्थित एक डॉक्टर हैं जो अलगाववादी उग्रपंथी गुट के लीडर इख़लाक़ का उपांत्र-उच्छेदन करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस क्रिया को गुप्त रखने के लिए यह सर्जरी वो अपने घर पर ही करते हैं अपनी पत्नी ग़ज़ाला (तबु) की मर्ज़ी के ख़िलाफ़। लेकिन अगले ही दिन हिलाल उग्रवादियों को पनाह देने के जुर्म में पकड़ लिए जाते हैं और मुठभेड़ में इख़लाक़ मारा जाता है। हिलाल को पुलिस जिज्ञासावाद के लिए ले जाती है। हिलाल और ग़ज़ाला का बेटा हैदर (शाहिद कपूर) जब ’अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ से अपने पिता के ग़ायब होने की ख़बर पा कर घर लौटता है तो अपनी माँ ग़ज़ाला को हैदर के चाचा ख़ुर्रम (के के मेनन) के साथ हँसते-गाते देख कर हैरान रह जाता है। अपनी माँ के इस बरताव को समझ ना पा कर हैदर अपने पिता हिलाल की खोज शुरू कर देता है। इस खोजबीन के दौरान हैदर की मुलाक़ात रूहदार से होती है जो हैदर को बताता है कि वो हिलाल से एक ’डिटेन्शन कैम्प’ में मिला था। उसने आगे बताया कि हिलाल के भाई ख़ुर्रम ने ही हिलाल को बेरहमी से मार डाला। रूहदार ने हैदर को यह भी बताया कि उसके पिता हिलाल ने उसके लिए यह संदेश छोड़ा है कि हैदर ख़ुर्रम के विश्वासघात का बदला ले। यहाँ पर आकर हिलाल का किरदार ख़त्म होता है। इन फ़्लैशबैक दृश्यों में नरेन्द्र झा ने हिलाल के किरदार में बहुत ही सशक्त अभिनय किया है और सिद्ध किया है कि कहानी के इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए विशाल भारद्वाज द्वारा उनका चयन बिल्कुल सटीक था। ’हैदर’ में नरेन्द्र झा के अभिनय ने उन्हें फ़िल्म जगत में एक सशक्त अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया।

2015 की फ़िल्म ’हमारी अधूरी कहानी’ में नरेन्द्र झा पुलिस कमिशनर के रूप में नज़र आए। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि नरेन्द्र झा ने कई फ़िल्मों में पुलिस इन्स्पेक्टर या सरकारी अफ़सर की भूमिकाएँ निभाई हैं ठीक वैसे जैसे गुज़रे दौर में इफ़्तिख़ार निभाया करते थे। 2016 का वर्ष नरेन्द्र झा के फ़िल्मी करिअर का महत्वपूर्ण वर्ष माना जाएगा क्योंकि इसी साल एक ऐसी फ़िल्म आई थी जिसमें वो मुख्य नायक थे। परेश मेहता निर्मित तथा सुज़ाद इक़बाल ख़ान निर्देशित यह फ़िल्म थी ’My Father Iqbal’ जो जम्मु-कश्मीर के PWD विभाग के एक इंजिनीयर की सच्ची कहानी पर आधारित थी। ’हैदर’ में कश्मीरी की भूमिका अदा करने के बाद फिर एक बार उन्हें एक कश्मीरी चरित्र को निभाने का अवसर मिला इस फ़िल्म में। इक़बाल ख़ान के किरदार में नरेन्द्र झा ने अपने अभिनय का जादू चलाया, लेकिन कम बजट की फ़िल्म होने की वजह से यह फ़िल्म सही रूप में दर्शकों तक पहुँच नहीं सकी। ’यश राज फ़िल्म्स’ के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म की कहानी ’हैदर’ की ही तरह फिर एक बार कश्मीर के राजनैतिक और उग्रवादी पार्श्व पर आधारित होने की वजह से ही शायद लोगों ने इस फ़िल्म की ओर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। नरेन्द्र झा का किरदार कुछ इस तरह का है कि वो ना केवल एक ज़िम्मेदार पति और पिता है, बल्कि एक इमानदार नागरिक भी है। इक़बाल ख़ान का किरदार अपने बेटे के सपनों को पूरा करने के संघर्ष और अपने देश के प्रति कर्तव्यों का पालन करने की तड़प के इर्द-गिर्द घूमता है। एक आम देशभक्त नागरिक जो अपने देश के लिए लड़ता है, एक आम मध्यम-वर्गीय पति-पत्नी का रिश्ता और उस रिश्ते में प्यार और मनमुटाव, और अपने परिवार को हमेशा ख़ुश रखने का प्रयास, नरेन्द्र झा ने इक़बाल ख़ान के किरदार में इन सब आयामों का इस तरह से सजीव चित्रण किया है कि किरदार जैसे जी उठा हो।

साल 2016 में नरेन्द्र झा के अभिनय से सजी कुल छह फ़िल्में आईं। एक फ़िल्म की चर्चा हम कर चुके हैं, दूसरी फ़िल्म थी ’शोरगुल’। 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के पार्श्व पर बनी प्रणव कुमार सिंह निर्देशित इस फ़िल्म में जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, और आशुतोष राणा जैसे अभिनेताओं के साथ-साथ नरेन्द्र झा भी मुख्य किरदारों में शामिल थे। फ़िल्म को फ़िल्म-समीक्षकों के सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिली। गोधरा और गाय संबंधित शब्दों और संदर्भों को म्युट कर दिया गया था सेन्सर बोर्ड की ओर से। फ़िल्म के कई किरदार राजनेताओं से प्रेरित होने की वजह से फ़िल्म को लेकर विवाद भी खड़े हुए। नरेन्द्र झा द्वारा निभाया गया आलिम ख़ान का किरदार असल में आज़म ख़ान के किरदार से प्रेरित था जो उत्तर प्रदेश के एक जाने-माने राजनीतिज्ञ हैं। इस साल की नरेन्द्र झा की तीसरी फ़िल्म थी ’2016 The End’ जो जयदीप चोपड़ा की लिखी और निर्देशित फ़िल्म थी। फ़िल्म की कहानी कुछ दोस्तों की कहानी है जो सात दिनों के अन्दर दुनिया समाप्त हो जाने की ख़बर सुन कर बचे हुए सात दिन अपने अंदाज़ में जीने की कोशिशें करते हैं। इन दोस्तों की भूमिकाओं में जिन अभिनेताओं ने काम किया वो हैं दिव्येन्दु शर्मा, किकु शारदा, प्रिया बनर्जी, हर्शद चोपड़ा, राहुल रॉय और नरेन्द्र झा। यह फ़िल्म टॉम ऑल्टर के अभिनय से सजी आख़िरी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म को भी समीक्षकों ने अच्छी प्रतिक्रियाएँ दी पर व्यावसायिक तौर से असफल रही। 2016 की जिन तीन बड़ी फ़िल्मों में नरेन्द्र झा ने अभिनय किया, वो फ़िल्में हैं ’Force 2', 'मोहेन्जो दारो’ और ’घायल - वन्स अगेन’। ’Force 2' एक action spy thriller फ़िल्म थी जिसमें जॉन एब्रहम और सोनाक्षी सिंहा मुख्य किरदारों में नज़र आए थे। नरेन्द्र झा ने फ़िल्म में RAW Head अंजन दास की भूमिका अदा की थी जो एक महत्वपूर्ण किरदार था। फिर एक बार नरेन्द्र झा ने यह सिद्ध किया कि वो इस दौर के ’इफ़्तिख़ार’ हैं। ’मोहेन्जो दारो’ में जखिरो का किरदार निभा कर नरेन्द्र झा ने अपनी बहुमुखी प्रतिभावान (versatile) होने का प्रमाण दिया। क्योंकि नरेन्द्र झा ख़ुद एक इतिहास के विद्यार्थी रह चुके हैं, इसलिए यह फ़िल्म उनके दिल के बहुत क़रीब था। उन्हीं के शब्दों में, "मुझे ख़ुशी है कि ’मोहेन्जो दारो’ बनी और मैं उसका हिस्सा बना। क्योंकि प्राचीन इतिहास का मेरा शैक्षिक पार्श्व है, मुझे दुख होता अगर मैं इस फ़िल्म का हिस्सा नहीं होता।" इस फ़िल्म की व्यावसायिक असफलता से थोड़े निराश वो ज़रूर हुए थे, लेकिन आशुतोष गोवारिकर जैसे फ़िल्मकार के साथ काम करने का मौका पाकर नरेन्द्र झा अपने आप को ख़ुशक़िस्मत मानते थे। 1990 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’घायल’ की सीक्वील फ़िल्म ’घायल वन्स अगेन’ को धर्मेन्द्र ने फ़ाइनन्स किया और सनी देओल ने फ़िल्म लिखी और निर्देशित की। नरेन्द्र झा इस फ़िल्म में बिज़नेस टाइकून राज बंसल की भूमिका में नज़र आए थे। हालाँकि यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से चली नहीं, लेकिन एक खलनायक उद्योगपति के किरदार को नरेन्द्र झा ने बखूबी निभाया और दर्शकों व समीक्षकों की वाहवाही बटोरी।

2017 का साल भी नरेन्द्र झा के लिए बेहद कामयाब साल रहा। दो बड़ी फ़िल्मों में महत्वपूर्ण किरदारों में वो नज़र आए। इनमें पहली फ़िल्म शाहरुख़ ख़ान की ’रईस’ और दूसरी फ़िल्म हृतिक रोशन की ’काबिल’। ’रईस’ में नरेन्द्र झा और शाहरुख़ ख़ान ने स्क्रीन-स्पेस शेअर किया और मुसाभाई के किरदार में नरेन्द्र झा बिल्कुल छा गए। मुसाभाई मुंबई के एक स्मगलर है जो रईस (शाहरुख़) को अपनी ख़ुद की बिज़नेस स्थापित करने में मदद करते हैं। दोनों में अच्छी दोस्ती है, लेकिन बाद में जब रईस कंगाल हो जाता है तब मुसाभाई उसकी मदद करने के नाम पर उससे धोखे से RDX स्मगल करवा लेता है जिसका इस्तमाल देश भर में आतंकी हमलों में किया जाता है। इतनी बड़ी विश्वासघात को बर्दाश्त ना करते हुए रईस मुसाभाई को मार डालता है। रईस और मुसाभाई के चरित्रों में शाहरुख़ और नरेन्द्र झा ने एक दूसरे को ज़बरदस्त टक्कर दी है और दर्शकों के लिए यह कहना मुश्किल हो गया है कि किसने किससे बेहतर अभिनय किया है। ’रईस’ 25 जनवरी 2017 के दिन प्रदर्शित हुई थी। मज़ेदार बात यह है कि इसी दिन हृतिक रोशन की ’काबिल’ भी प्रदर्शित हुई और उसमें भी नरेन्द्र झा का महत्वपूर्ण किरदार था। फिर एक बार ’इफ़्तिख़ार’ की तरह वो पुलिस अफ़सर अमोल चौबे बने, जो एक रिश्वतखोर इन्स्पेक्टर हैं। नेत्रहीन दम्पति रोहन (हृतिक रोशन) और सुप्रिया (यामी गौतम) के साथ हुए अन्याय का बदला ही इस फ़िल्म की कहानी है। जब इन्स्पेक्टर चौबे सुप्रिया के बलात्कार के केस को रिश्वत लेकर नज़रंदाज़ कर देते हैं, तब रोहन उसे चुनौती देता है और कहता है कि क्योंकि चौबे ने उसके लिए कुछ नहीं किया, इसलिए वो ख़ुद अपनी पत्नी की बेइज़्ज़ती और मौत का बदला लेगा, और चौबे को पता तो चल जाएगा कि बदला उसी ने ली है लेकिन जान कर भी उसे पकड़ नहीं पाएगा, कोई सबूत नहीं मिल पाएगा। नरेन्द्र झा के इन्स्पेक्टर चौबे का यह किरदार मिश्रित चरित्र वाला है। एक बार लगता है कि उसे नायक रोहन के लिए सहानुभूति है, लेकिन अगले ही पल वो दबाव में आकर रिश्वत ले लेता है। नरेन्द्र झा ने इस किरदार को ऐसा उभारा है दर्शकों को समझते देर नहीं लगती कि भले चौबे रिश्वत लेता है लेकिन रोहन के लिए उसके दिल में थोड़ी बहुत हमदर्दी भी है। ’काबिल’ फ़िल्म का समापन नरेन्द्र झा के शॉट से ही होता है कि रोहन अपना बदला ले लेता है, और चौबे सोचता ही रह जाता है और रोहन की चुनौती को याद करता रह जाता है।

2017 में नरेन्द्र झा की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म आई थी ’विराम’। ’हैदर’, ’रईस’ और ’काबिल’ की कामयाबी के बाद नरेन्द्र झा एक चर्चित चरित्र फ़िल्म अभिनेता बन चुके थे। नवोदित निर्देशक ज़ियाउल्लाह ख़ान की परिपक्व प्रेम कहानी ’विराम’ में नरेन्द्र झा ने मुख्य नायक की भूमिका में अभिनय किया। इस फ़िल्म को केन फ़िल्म उत्सव में दिखाया गया था। यह एक बिल्कुल अलग ही तरह की प्रेम कहानी है जिसमें कई मोड़ और उतार-चढ़ाव हैं जिसे झा ने बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ उभारा है। ’रईस’ और ’काबिल’ के बाद नरेन्द्र झा के पास बहुत सारी फ़िल्मों के ऑफ़र आए लेकिन उन्होंने बहुत कम ही फ़िल्मों को ग्रहण किया। एक साक्षात्कार में नरेन्द्र झा ने बताया, "मैं कभी भी एक ही झटके में किसी फ़िल्म को करने के लिए मान नहीं जाता। पहले सब्जेक्ट और कैरेक्टर का विस्तारित रूप से पता लगाता हूँ। जब तक मुझे सारी जानकारी नहीं मिलती, तब तक मैं राज़ी नहीं होता। मैंने बहुत सी फ़िल्में रिजेक्ट कर दी है। कई लोग हैं जो किरदार को सही रूप से नहीं बताते और बाद में पता चलता है कि बहुत मामूली सा रोल है। इस तरह के प्रोड्युसर से मैं हमेशा किनारा करता आया हूँ।" नरेन्द्र झा के लिए फ़िल्म चाहे बड़ी हो या छोटी, कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, उन्हें फ़र्क पड़ता है इस बात से कि उनका किरदार किस तरह का है। फ़िल्म ’विराम’ की शूटिंग् के दौरान नरेन्द्र झा के पिता का निधन हो गया था पिछले वर्ष। नियति का खेल देखिए, एक ही वर्ष के अन्दर पिता ने पुत्र को भी अपने पास बुला लिया। इस तरह से फ़िल्म ’विराम’ से ही नरेन्द्र झा के जीवन में पूर्ण-विराम लग गया। 2018 की दो फ़िल्मों में नरेन्द्र झा अभिनय कर रहे थे - ’साहो’ और ’Race 3'। नरेन्द्र झा की असामयिक मृत्यु से अभिनय जगत को ज़बरदस्त धक्का लगा है और उनके जैसे दमदार अभिनय क्षमता वाले अभिनेता की कमी लम्बे समय तक खलती रहेगी। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से स्वर्गीय नरेन्द्र झा को श्रद्धा सुमन!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, March 25, 2018

कल्याण थाट : SWARGOSHTHI – 362 : KALYAN THAAT




स्वरगोष्ठी – 362 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 1 : राग कल्याण अर्थात यमन और भूपाली

विदुषी किशोरी अमोनकर से भूपाली का खयाल और मुकेश से कल्याण में एक फिल्मी गीत सुनिए




किशोरी अमोनकर
मुकेश
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। आज के अंक में कल्याण थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन और इस थाट के जन्य राग भूपाली पर चर्चा करेंगे।



कल्याण थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म॑, प ध, नि, अर्थात इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र होता है और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। मध्यकालीन ग्रन्थों में इस राग का यमन नाम से उल्लेख मिलता है। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में इसका नाम केवल कल्याण नाम से मिलता है। आधुनिक ग्रन्थों में यमन एक सम्पूर्ण जाति का राग है। यह कल्याण थाट का आश्रय राग होता है। आश्रय राग का अर्थ होता है, ऐसा राग, जिसमें थाट में प्रयुक्त स्वर की उपस्थिति हो। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- यमन, भूपाली, हिंडोल, हमीर, केदार, कामोद, नन्द, मारू बिहाग, छायानट, गौड़ सारंग आदि। इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी छः स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। वादी स्वर गान्धार और संवादी निषाद होता है। इसका गायन-वादन समय गोधूली बेला अर्थात सूर्यास्त से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक होता है। राग कल्याण अथवा यमन के आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, म॑, प, ध, नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध, प, म॑, ग, रे, सा होते हैं। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग यमन के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। वर्ष 1961 में एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी, जिसका नाम “संजोग” था। इस फिल्म में मदन मोहन ने राग कल्याण अथवा यमन को आधार बना कर एक गीत, “भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...” स्वरबद्ध किया था। यह गीत पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में प्रस्तुत किया गया है। लीजिए प्रस्तुत है, राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित वही गीत।

राग यमन : “भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...” : मुकेश : फिल्म – संजोग


कल्याण थाट के अन्य रागों में एक प्रमुख जन्य राग भूपाली है। यह औड़व-औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान होता है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पहले हिस्से में होता है। इन्हीं स्वरों को यदि उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए यह राग देशकार हो जाता है। इस राग में ध्रुवपद, खयाल और तराना गाया जाता है। राग भूपाली में ठुमरी नहीं गायी जाती। कुछ पुराने संगीतज्ञ इस राग में पंचम और ऋषभ स्वर की संगति करते है, किन्तु अधिकतर ऐसा नहीं करते। दक्षिण भारतीय संगीत में इस राग के समतुल्य राग मोहनम् होता है। अब हम आपको राग भूपाली के स्वरों में एक खयाल रचना सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने की विदुषी किशोरी अमोनकर। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं; “जब से तुम संग लागली प्रीत...”। आप राग भूपाली की इस रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत…” : विदुषी किशोरी अमोनकर



      


 संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 361वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 364वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 360वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “बीस साल बाद” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – शिवरंजनी और कहीं-कहीं राग सोहनी का स्पर्श, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की पहली कड़ी में आपने कल्याण थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित एक फिल्मी गीत, पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में सुना। इसके साथ ही कल्याण थाट के जन्य राग भूपाली का शास्त्रीय स्वरूप सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में रसास्वादन किया। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

कल्याण थाट : SWARGOSHTHI – 362 : KALYAN THAAT : 25 Mar. 2018

Sunday, March 18, 2018

राग शिवरंजनी : SWARGOSHTHI – 361 : RAG SHIVARANJANI





स्वरगोष्ठी – 361 में आज


पाँच स्वर के राग – 9 : “कहीं दीप जले कहीं दिल...”


संजीव अभ्यंकर से राग शिवरंजनी में खयाल और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए





लता मंगेशकर
संजीव अभ्यंकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की नौवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की नौवीं और समापन कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग शिवरंजनी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पण्डित संजीव अभ्यंकर द्वारा प्रस्तुत एक भक्ति रचना के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग शिवरंजनी के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिकाधिक उपयोग किया गया है। राग शिवरंजनी के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म “बीस साल बाद” से हेमन्त कुमार द्वारा स्वरबद्ध किया एक गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



श्रृंखला “पाँच स्वरों के राग” पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कुल आठ कड़ियों में सम्पन्न होनी थी। पेंसिलवेनिया, अमेरिका की हमारी नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने इस श्रृंखला में एक और राग शिवरंजनी को शामिल किये जाने का अनुरोध किया है। उन्हीं के अनुरोध पर आज हम इस श्रृंखला की समापन कड़ी में राग शिवरंजनी का परिचय और इस राग के दो उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। फिल्मों में राग शिवरंजनी पर आधारित कई गीत लोकप्रिय हुए हैं। इनमें से हमने 1961 में प्रदर्शित फिल्म “बीस साल बाद” का एक लोकप्रिय गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” चुना है। राग शिवरंजनी की छाया लिये इस गीत के संगीतकार हेमन्त कुमार थे और इसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इस गीत के बारे में फिल्म संगीत के विख्यात इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक “धुनों की यात्रा” में लिखा है, - फिल्मिस्तान स्टूडिओ के बन्द होने के बाद संगीतकार हेमन्त कुमार ने स्वयं अपनी प्रोडक्शन कम्पनी बनाने की सोची। इस कम्पनी का नाम उन्होने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध रचना “गीतांजलि” से प्रेरित होकर गीतांजली पिक्चर्स रखा। हेमन्त कुमार ने इस नई प्रोडक्शन कम्पनी के बैनर तले रहस्य रोमांच से परिपूर्ण फिल्में बनाईं। इस श्रृंखला की पहली फिल्म थी सर आर्थर कॉनन डायल के प्रसिद्ध उपन्यास “The Hound of the Baskervilles” से प्रभावित “बीस साल बाद”। 1961 में बनी इस हिन्दी फिल्म में शरलक होम्स तो न थे, और चूँकि हिन्दी फिल्म थी, अतः रोमांस के अवयव भी डालने जरूरी थे। फिल्म के रहस्यमय वातावरण को जीवन्त करता गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” तो आज भी लता मंगेशकर के सर्वश्रेष्ठ रहस्य गीतों में अपना स्थान रखता है। यह गीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योकि इसी गीत से लता मंगेशकर के जीवन का एक बड़ा महत्वपूर्ण मोड़ जुड़ा है। दरअसल उन दिनों लता मंगेशकर काफी बीमार हो गईं थी और बीमारी से उठने के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी आवाज़ पर भी बीमारी का बुरा असर पड़ा है। लता को लग रहा था कि रिहर्सलों में बात बन नहीं पा रही है। परन्तु हेमन्त कुमार ने उन्हें बिना बताए एक रिहर्सल को रिकार्ड कर लिया और उसी को रिकार्डिंग मान कर लता मंगेशकर को सुनाया और विश्वास दिला दिया कि उनकी आवाज़ पहले जैसी ही है। इस मुश्किल गीत को जब वे सफलतापूर्वक गा सकी तो उन्हें अपना खोया हुआ आत्मविश्वास वापस मिल गया। इस गीत को लता मंगेशकर द्वारा 1967 में उद्घोषित अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में स्थान दिया। राग शिवरंजनी की छाया लिये यह गीत आज भी संगीतप्रेमियों को बेसुध कर देता है। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी ने दृश्य की माँग के अनुकूल गीत रचे और हेमन्त कुमार ने लगभग सभी गीतों में विभिन्न रागों का आधार दिया। लीजिए, अब आप फिल्म “बीस साल बाद” का राग शिवरंजनी का आधार लिये गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” सुनिए।

राग शिवरंजनी : “कहीं दीप जले कहीं दिल...” : लता मंगेशकर : फिल्म – बीस साल बाद


ग कोमल संवाद प स, म नि सुर दिए हटाय,
मध्य-रात्रि औड़व मधुर, शिवरंजनी सुहाय।
राग शिवरंजनी काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष पाँच स्वर होने के कारण यह औड़व-औड़व जाति का राग होता है। इस राग में गान्धार स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। आरोह के स्वर हैं; सा, रे, (कोमल), प, ध, सां और अवरोह के स्वर हैं; सां, ध, प, (कोमल), रे, सा। इस राग के कोमल गान्धार स्वर को यदि शुद्ध गान्धार बना कर प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली की अनुभूति होगी। यह ठुमरी अंग का राग माना जाता है। अतः इस राग में ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत अधिक गाये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर से लेकर मध्यरात्रि तक किया जाना उपयुक्त होता है। परन्तु ठुमरी रात्रि के पहले प्रहर में भी गायी जा सकती है। राग शिवरंजनी में श्रृंगार, विरह और भक्तिरस की रचनाएँ खूब निखरती हैं। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में एक भक्तिपरक् रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, युवा गायक पण्डित संजीव अभ्यंकर। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक से हम आपके अनुरोध पर एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे।

राग शिवरंजिनी : “तुम बिन कौन लेत खबर मोरी...” : पण्डित संजीव अभ्यंकर





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 361वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 363वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 359वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म “सुर संगम” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कलावती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, बीकानेर, राजस्थान से लक्ष्मीनारायण सोनी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की नौवीं और समापन कड़ी में आपने राग शिवरंजनी का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए पण्डित संजीव अभ्यंकर से एक खयाल रचना का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “बीस साल बाद” से राग शिवरंजनी के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



चित्रकथा - 60: प्यारेलाल वडाली को श्रद्धा सुमन, वडाली ब्रदर्स के फ़िल्मी गीतों के ज़रिए

अंक - 60

प्यारेलाल वडाली को श्रद्धा सुमन, वडाली ब्रदर्स के फ़िल्मी गीतों के ज़रिए


"मंदिर मस्जिद मैकद भी रंग दे..."





9 मार्च 2018 को जाने-माने सूफ़ी गायक जोड़ी वडाली ब्रदर्स के प्यारेलाल वडाली का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बड़े भाई पूरनचन्द वडाली के साथ प्यारेलाल वडाली ने ’वडाली ब्रदर्स’ के नाम से जोड़ी बनाई और पंजाबी सूफ़ी संगीत की निरन्तर सेवा की। वडाली बंधुओं की रचनाएँ सुनते हुए श्रोता ट्रान्स में चले जाते हैं, एक अजीब सा आकर्षण है इनकी गायकी में जो श्रोताओं को सम्मोहित करते हैं, मंत्रमुग्ध करते हैं। वडाली ब्रदर्स हमेशा फ़िल्मों में गाने से दूर दूर ही रहे, लेकिन क्योंकि ’चित्रकथा’ एक फ़िल्मी स्तंभ है, इसलिए इसमें वडाली ब्रदर्स के फ़िल्मी गीतों पर नज़र डालना ज़रूरी हो जाता है। तो आइए पढ़ें और जाने कि वडाली ब्रदर्स ने किन किन फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है वडाली ब्रदर्स पर, और हम देते हैं स्वर्गीय प्यारेलाल वडाली को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि!



डाली ब्रदर्स का ताल्लुख़ अमृत्सर से है। सूफ़ी गायकों के परिवार की पाँचवीं पीढ़ी में जन्में पूरनचन्द और प्यारेलाल के पिता थे ठाकुर दास जो उनके गाँव ’गुरु की वडाली’ में मशहूर गायक थे। शुरु में पूरनचन्द को संगीत से लगाव नहीं था, बल्कि उन्हें पहलवानी का शौक था। लेकिन एक बार 10 वर्ष की आयु में वो एक मेले में गए थे जो चिश्ती वंश के बाबा सादिक़ शाह को समर्पित था। उनके आसपास का वातावरण संगीत से गूंज रहा था। और वो विवश हो गए अपने भगवान के सामने अपनी गायकी के जल्वे दिखाने के लिए। जब उन्होंने "मिट्टी दियां मुर्तान ने दिल साडा मोह लिया" गाया, तो लोग उनके सामने पैसों और उपहारों की बारिश करने लगे। और पूरनचन्द को अहसास हो गया कि वो संगीत के लिए ही बने हैं। ठाकुर दास के चार बेटे थे, सभी संगीतज्ञ। उनमें से एक रागी जठ, दूसरे ढोली, और तीसरे प्यारेलाल जो पूरनचन्द के साथ अपनी आवाज़ मिलाने के लिए ही जैसे पैदा हुए थे। प्यारेलाल ने किसी से कोई तालीम नहीं ली, बल्कि बड़े भाई पूरनचन्द को ही अपना गुरु माना। उन दिनों यह रवायत थी कि दो भाई साथ में गाए, इस तरह से पूरनचन्द और प्यारेलाल साथ में गाने लगे। 

यह दिलचस्प बात है कि शुरुआती दिनों में प्यारेलाल वडाली कृष्णलीला के जल्सों में नृत्य किया करते थे। वो इतना अच्छा नृत्य करते कि दस दस गाँव इकट्ठा हो जाते थे उनका नृत्य देखने के लिए। इससे उनकी अच्छी कमाई भी हो जाती थी। फिर एक दिन एक सूफ़ी संत बाबा मस्तान शाहजी ने प्यारेलाल से कहा कि वो अपने पैरों से घुंगरू निकाल दे और सूफ़ी क़लाम और क़व्वाली गाना शुरु करे। पिता ठाकुर दास की इसमें आपत्ति थी क्योंकि नृत्य से अच्छे पैसे मिल रहे थे नियमित रूप से। लेकिन प्यारेलाल को सूफ़ी संत की बात अच्छी लगी और वो गाने लग गए। दोनों भाइयों ने मिल कर मंदिरों और जागरणों में गाना शुरु कर दिया। एक बार जलंधर में आयोजित होने वाले ’हरबल्लभ संगीत सम्मेलन’ की ख़बर उन्हें मिली और वो उसमें भाग लेने के लिए पहली बार अमृत्सर से बाहर निकले। लेकिन उनकी वेश-भूषा को देख कर जब आयोजकों ने उन्हें सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेने दिया तो वो दोनों हरबल्लभ मन्दिर के सामने ही बैठ कर अपना गायन शुरु कर दिया। उनकी पुर-असर जुगलबन्दी को सुन कर भीड़ जमा हो गई। और उस भीड़ में मौजूद थे आकाशवाणी जलंधर के एन. एम. भाटिया। उन्हें वडाली भाइयों की गायकी इतनी अच्छी लगी कि वहीं पर उन्होंने दोनों भाइयों को रेडियो स्टेशन आ कर अपना गाना रिकॉर्ड करवाने का निमंत्रण दिया। शुरु शुरु में आपत्ति जताने के बावजूद जब भाटिया साहब ने समझाया, तब वो मान गए और इस तरह से वडाली भाइयों का पहला गीत रिकॉर्ड हुआ। यह 1975 की बात थी।

इस रिकॉर्डिंग् की ख़बर आग की तरह फ़ैल गई और वडाली ब्रदर्स को पंजाब के बाहर भी काम मिलने लगे। विभिन्न शहरों के कॉलेज, विश्वविद्यालयों से होते हुए नामचीन फ़नकारों की महफ़िलों में भी वडाली भाइयों को गाने के न्योते मिलने लगे। इन तमाम बुलन्दियों पर पहुँचने के बाद भी दोनों भाइयों का यही मानना था कि संगीत और गायन उनके लिए ईश्वर की सेवा है, उससे ज़्यादा और कुछ नहीं। पूरनचन्द के शब्दों में - "हमारा तालुख़ तो चश्म-ए-शाही से है। ख़ुदा का संगीत बहता रहे। बस यही दुआ है, और यही हमारा इनाम।" वडाली ब्रदर्स की ख़ास बात यह है कि उनके रिकॉर्ड किए हुए गीतों या ऐल्बमों की संख्या बहुत कम है। जब उनसे पूछा गया कि व्यावसायिक रिकॉर्डिंग् से उन्होंने अपने आप को दूर क्यों रखा, तो उनका जवाब था - "हमारा मन कभी भी व्यावसायिक लोकप्रियता के पीछे नहीं भागता था। हाल में दोस्ती के नाते ’आ मिल यार’ ऐल्बम हमने किया। ’पैग़ाम-ए-इश्क़’, ’इश्क़ मुसाफ़िर’ और ’Folk Music of Punjab’ भी इसी Music Today कंपनी ने निकाली। इन सभी ऐल्बमों में संगीत पारम्परिक है और साज़ों की भीड़ नहीं। आलाप और तानें ही हावी हैं।"

वडाली बंधुओं ने बाबा फरीद की रचनाओं का एक खास अलबम ‘फरीद’ भी किया था। ‘तू माने या ना माने दिलदारा असां तो तैनूं रब मनया’, ‘दम दम करो फरीद’, ‘टुरया टुरया जा फरीदा’, ‘तुम इधर देख लो या उधर देख लो’ जैसी नायाब रचनाओं से सज़ा ये अलबम सचमुच अलग ही तरंग चढ़ा देता है। ख़ैर, आज हम वडाली ब्रदर्स की फ़िल्मी रचनाओं की बात करेंगे। वडाली ब्रदर्स को फ़िल्मों में गाने का पहला न्योता साल 1986 की फ़िल्म ’एक चादर मैली सी’ के लिए मिला था जिसमें सरदार पंछी गीत लिख रहे थे और अनु मलिक संगीत तैयार कर रहे थे। पंजाबी पार्श्व पर बनी इस फ़िल्म में वडाली भाइयों का गाया एक गीत फ़िल्म के निर्देशक सुखवंत धड्डा रखना चाहते थे। लेकिन उस समय तक वडाली भाइयों ने अपने जीवन काल में कभी कोई फ़िल्म नहीं देख रखी थी। बड़े भाई पूरनचन्द के शब्दों में - "हम तो बस रब से लय लगाते हैं। फ़कीरों की बानी (वाणी) को सुर देते हैं। इसी में हमें सुख मिलता है।" ’एक चादर मैली सी’ में जिस गीत के लिए उन्हें न्योता मिला था, उनके हिसाब से उसे गाने का कोई अर्थ नहीं था। लेकिन बरसों बाद 2003 में जब अमृता प्रीतम की उपन्यास पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म ’पिंजर’ बन रही थी, तब संगीतकार उत्तम सिंह ने वडाली भाइयों से फ़िल्म के दो गीत गाने का आग्रह किया। अब तक उन्होंने कुछ फ़िल्में देख ली थी और मौजूदा फ़िल्मों की एक राय उन्होंने बना ली थी। इसलिए कभी किसी फ़िल्म में गाने के बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन ’पिंजर’ की कहानी पूरनचन्द वडाली के दिल को छू गई। देश के बटवारे के पहले के और बाद के पंजाब पर क्या क्या गुज़री, ये सब कुछ इस फ़िल्म में दिखाया जाने वाला था। फ़िल्म की कहानी सुनते हुए वडाली बंधु की आँखों में आंसू आ गए थे। और यही दर्द उत्तम सिंह के संगीत में भी उन्हें नज़र आया जब उत्तम सिंह ने उन्हें वो दो गीत गा कर सुनाया। गुलज़ार साहब के बोलों का भी ज़बरदस्त असर हुआ वडाली ब्रदर्स पर। बस फिर क्या था, पहली बार किसी फ़िल्म में वडाली ब्रदर्स की दिलकश जुगलबन्दी सुनाई दी। वडाली भाइयों ने एक साक्षात्कार में यह बताया कि उन्हें सबसे अच्छी बात यह लगी कि उत्तम सिंह ने उन पर कोई अलग स्टाइल थोप नहीं दिया, बल्कि उनके स्टाइल को ही बरकरार रखने का सुझाव दिया। पूरनचन्द के तकनीक और प्यारेलाल की ज़िन्दादिल आवाज़ ने इन दो गीतों में जान डाल दी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था "मार उडारी"। जसपिन्दर नरूला, प्रीति उत्तम, अमय दाते, उदित नारायण, साधना सरगम, कविता कृष्णमूर्ति, सुरेश वाडकर और रूप कुमार राठौड़ जैसे फ़िल्मी गायकों के बीच वडाली ब्रदर्स के वो दो गीत भीड़ से अलग हट के सुनाई दिए। पहला गीत था गुलज़ार का लिखा हुआ - "दर्दा मारया माहिया, मेरे दर्द छुड़ा छुड़ा, किस्मत अंधी बावरी, मेरा हाथ छुड़ा"। मेले के पार्श्व में फ़िल्माया यह गीत एक ख़ुशमिज़ाज पंजाबी नृत्य प्रधान गीत है जिसमें भंगड़ा और गिद्दा नृत्य शैलियों का प्रदर्शन है। जसपिन्दर नरूला के साथ गाए गए इस गीत को सुनते ही जैसे गीत हमारे अन्दर समा जाता है और ऐसा लगता है कि बस यह गीत चलता ही रहे, कभी ख़त्म ना हो। समीक्षक श्री अनिल करमेले कहते हैं कि फिल्‍म में इस मोड़ पर यह गाना आता है कि आपको बेचैनी के भँवर में फंसा लेता है। गुलज़ार के अलफ़ाज़ और वडाली बंधुओं के स्‍वर का जादू है कि दिल में फांस सी चुभती हैं ये पंक्तियां—‘किकली कलीर की/ जां जाए हीर की/ जागे भी जगाए भी/ खांसी बूढ़े फकीर की’।

ऐसा ही दूसरा गीत भी है जिसमें वडाली ब्रदर्स के साथ प्रीति उत्तम की आवाज़ है। यह अमृता प्रीतम की रचना है - "वारिस शाह, बजा अखा वाले शाह नू कितो करा विचो बोले, आज अखा वाले शाह नु वाह दिसाऊ, कित्तो कब्रा विचो बोले, थी आज किताबे इश्क़ दा कोई अगला वर्ग फूल..."। पहले गीत से बिल्कुल विपरीत जा कर यह एक बिना साज़ों वाला दर्द भरा मार्मिक गीत है जिसे वडाली ब्रदर्स की आवाज़ों में सुनते हुए जैसे कलेजा चीर जाता है। "एक रोई सी थी पंजाब दी, पिरोई, तू लिख लिख मारी नैन वैन, आज लखा दिया रोंदा लखा दिया रोंदिया तूने वारिस शाह नु कहन..."। भले यह पूर्णत: पंजाबी गीत है, लेकिन ध्यान से कई बार सुनने पर इसका भावार्थ समझ में आ ही जाता है। "उठ दर्द मंदा-दियां दर्दिया, उठ तक अपना पंजाब, आज बेले लाशां विशियां, ते लहू तो बाली चढ़ाव।" अनिल करमेले ने बड़ी ख़ूबसूरती से इस गीत की समीक्षा की है। वो कहते हैं - "ये अमृता की चिट्ठी है वारिस शाह को कि उठो, तुमने प्रेम का पाठ पढ़ाया था ना वारिस शाह! देखो क्‍या हाल है तुम्‍हारे पंजाब का। वो खून से सना है। इसे गाने के लिए दर्द के जिस समंदर की ज़रूरत होती है—वो वडाली बंधुओं में था। पंजाब के गायकों में दर्द और मस्‍ती का बेमिसाल जोड़ होता है। वहां की मिट्टी ही ऐसी है।"

साल 2003 में ही वडाली ब्रदर्स को अश्‍विन चौधरी की फ़िल्म ’धूप’ में भी गाने का निमंत्रण मिला जिसमें निदा फ़ाज़ली के लिखे गीत थे और ललित सेन का संगीत था। फ़िल्म के अधिकांश गीत जगजीत सिंह, हरिहरन और श्रेया घोषाल ने गाए, लेकिन एक गीत के लिए वडाली ब्रदर्स को न्योता भेजा गया। और इस गीत को गा कर वडाली बंधु ने साबित किया कि सौ सुन्हार की, एक लुहार की। "चेहरा चेहरा चेहरा, मेरे यार का चेहरा, जैसा मेरे यार का चेहरा, वैसा ही, वैसा ही, वैसा ही संसार का चेहरा..." - यह क़व्वाली शैली की रचना है जो फ़िल्मी क़व्वाली शैली की तरह बहुत ज़्यादा तेज़ रफ़्तार वाली तो नहीं है, लेकिन असर में किसी से कम नहीं। दोनों भाई जब बारी-बारी से गाते हैं "मिट्टी से मिट्टी मिले, होके सभी निशान, किसमें कितना कौन है, कैसे हो पहचान, सदियों से हर नूर की मंज़िल मेरे तेरे प्यार का सेहरा, चेहरा चेहरा चेहरा...", सिर्फ़ एक बार सुन कर दिल नहीं भरता और लूप में सुनते रहने को जी चाहता है। फ़िल्म ’धूप’ की इस क़व्वाली के बाद वडाली ब्रदर्स ने फ़िल्मों से मुंह फेर लिया और अगले छह सालों तक फ़िल्मों में सुनाई नहीं दिए। साल 2010 में तमिल फ़िल्म ’चिक्कु बुक्कु’ के गीत "तूरल निन्द्रालुम" में उनकी आवाज़ें फिर एक बार गूंजी, साथ में थे हरिहरन और अनुराधा श्रीराम। के. मणीगंदन निर्देशित इस फ़िल्म में संगीत था Colonoal Cousins Hari & Lesle का और गीत लिखे वाली ने। हालांकि इस गीत में वडाली ब्रदर्स की आवाज़ गीत के अन्तरालों में ही सुनाई देती है, लेकिन उसी में वो अपनी अलग छाप छोड़ जाते हैं। 

2011 में ’तनु वेड्स मनु’ में मुख्य संगीतकार थे कृष्णा और गीतकार थे राजशेखर। फ़िल्म का "ऐ रंग्रेज़ मेरे यह बात बता..." सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा। इसके दो संस्करण थे - पहला फ़िल्म के संगीतकार कृष्णा की आवाज़ में और दूसरा वडाली ब्रदर्स की आवाज़ों में। दो संस्करणों की आपस में तुलना करके हम कृष्णा को छोटा सिद्ध नहीं करना चाहते, लेकिन यह ज़रूर है कि वडाली ब्रदर्स की जुगलबन्दी ने उनके संस्करण में जैसे जान फूंख दी है। इससे पहले भी रंग देने के विषय पर ढेरों फ़िल्मी गीत बन चुके हैं, लेकिन इस गीत में जो सूफ़ियाना अंदाज़ है, जो पुर-असर आवाज़ों और भावनाओं का संगम है, ऐसा पहले कभी सुनने को नहीं मिला। "मेरी हद भी रंग, सरहद भी रंग दे, अनहद भी रंग दे, मस्जिद मंदिर मैकद भी रंग दे"। इस गीत के साथ फ़िल्म ’पिंजर’ के गीत "दर्दा मारया माहिया" के एक अन्तरे की काफ़ी समानता है। फ़िल्म ’पिंजर’ के गीत में गुलज़ार लिखते हैं - "मौसम बदले चोला रंग, रंग बसंती आवे, सरसों पीली धूप सी चलती आवे, मैं भी पीली पड़ गई ऐसा रंग उड़ा, दर्दा मारया माहिया मेरे दर्द छुड़ा..."। और इसी भाव पर "ऐ रंग्रेज़..." में अन्तरा है - "के दिल बना गया सौदाई, ये कौन से पानी में तूने, कौन सा रंग घोला है, मेरा बसंती चोला है, अब तुम से क्या मैं सिक्व करूं, मैंने ही कहा था ज़िद करके, रंग देख मेरी ही तरंग में, रंग दे, रंग दे, चुनरी पे रंग..."। "मेरा रंग दे बसंती चोला" गीत के बाद "बसंती चोला" का इतना सुन्दर प्रयोग इन्हीं दो गीतों में सुनने को मिला है।

2011 में ही फिर एक बार वडाली बंधुओं से फ़िल्मी गीत गवाने का निर्णय लिया गया, इस बार पंकज कपूर निर्देशित फ़िल्म ’मौसम’ के लिए, जिसमें पंकज कपूर के बेटे शाहिद कपूर नायक की भूमिका निभा रहे थे। फ़िल्म में प्रीतम का संगीत था और गीत लिखे इरशाद कामिल ने। फ़िल्म में कुल 6 गीत थे, लेकिन हर गीत के एकाधिक संस्करण होने की वजह से कुल 13 गीतों का ऐल्बम बन खड़ा हुआ। वडाली ब्रदर्स की आवाज़ें बस एक ही गीत में गूंजी - "इक तू ही तू ही तू ही"। इस गीत के कुल तीन संस्करण हैं। पहला संस्करण मूल संस्करण है जिसे हंस राज हंस ने गाया है। दूसरा संस्करण है शाहिद माल्या की आवाज़ में जिसे "reprise version" कहा गया। और तीसरा संस्करण है "महफ़िल मिक्स" जिसे वडाली बंधुओं ने अंजाम तक पहुँचाया। पहले दो संस्करणों की शुरुआत होती है कुछ इन शब्दों से - "तेरा शहर जो पीछे छूट रहा, कुछ अंदर अंदर टूट रहा, हैरान है मेरे दो नैना, ये झरना कहाँ से फूट रहा।" जहाँ हंस राज हंस की आवाज़ में पंजाब की मिट्टी की एक देहाती ख़ुशबू है, वहीं शाहिद माल्या की आवाज़ में भी पंजाबी रंग है लेकिन उनकी आवाज़ नर्म है और उनकी आवाज़ जैसे आज की पीढ़ी की युवा की आवाज़ जैसी है। वडाली ब्रदर्स के संस्करण में ये शुरुआती पंक्तियाँ तो नहीं हैं, लेकिन जैसे ही वडाली बंधुओं की आवाज़ में "मेंडा तो है रब खो गया, मेंडा तो है सब खो गया, तेरिया मोहब्बताने लुटफूट सांया, तेरिया मोहब्बताने सचिया सताया, खाली हाथ मोड़ी ना तू, खाली हाथ आइया..." शुरु होता है, एक अलग ही समां बंध जाता है। हालांकि इस संस्करण में पाश्चात्य संगीत को फ़्युज़ किया गया है, लेकिन इससे गीत की आत्मा बरक़रार है। यही तो है वडाली ब्रदर्स की गायकी का जादू कि वो जो भी गीत गाते हैं, हर गीत में वो ही मध्यमणि बन कर रह जाते हैं। और श्रोताओं को अगर कुछ याद रहती है तो बस उनकी आवाज़, उनका अंदाज़, उनकी गायकी, उनका सूफ़ियाना मिज़ाज।

तो यहाँ पर आकर ख़त्म होती है वडाली ब्रदर्स के गाए फ़िल्मी गीतों का सफ़र। 2011 के बाद फिर कभी उनकी आवाज़ किसी फ़िल्मी गीत में सुनाई नहीं दी। जब एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछा कि वो अपने अब तक सफ़र के लिए क्या कहना चाहेंगे तो उन्होंने कहा - "जब तक बिका ना था, कोई पूछता ना था, मुझे ख़रीद कर अनमोल कर दिया।" वडाली ब्रदर्स की गायकी ऐसी है कि उनकी हर रचना को सुनते हुए जैसे हमारे दोनों हाथ प्रार्थना में उठ जाते हैं। उनकी आवाज़ में वो पाक़ीज़गी है कि उन्हें सुनते हुए जैसे उपरवाले के साथ एक जुड़ाव सा हो जाता है, हम ट्रान्स में चले जाते हैं। प्यारेलाल वडाली के चले जाने से वडाली ब्रदर्स की जोड़ी टूट गई है, उनके जाने से ऐसा लगा जैसे कि उपरवाले के साथ हमारा रिश्ता कायम करवाने वाला ही चला गया है। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से स्वर्गीय प्यारेलाल वडाली को भावभीनी श्रद्धांजलि, और पूरनचन्द वडाली साहब को इस मुश्किल घड़ी में हिम्मत रखने की दुआ और उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु होने की कामना करते हैं।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, March 13, 2018

भावनाओं का सम्बल - ज्योत्सना सिंह

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कहानी दो घड़े का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं ज्योत्सना सिंह की लघुकथा "भावनाओं का सम्बल", जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 25 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

लघुकथा भावनाओं का सम्बल का गद्य 'सेतु' द्वैभाषिक पत्रिका पर उपलब्ध है। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

ज्योत्सना सिंह: इंडिया वॉच चैनल, लखनऊ पुस्तक मेला, दिल्ली विश्व पुस्तक मेला, केकेसी डिग्री कॉलेज, आदि में काव्य पाठ। नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, अमर उजाला, जन ख़बर लाइव आदि दैनिक पेपर में रचनायें प्रकाशित।

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"तुम भी अच्छे चक्कर में फँस गए हो दादा। मानो तो एक सलाह दूँ?"
(ज्योत्सना सिंह की "भावनाओं का सम्बल" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
भावनाओं का सम्बल mp3

#Sixth Story: Bhavnaon Ka Sambal; Author: Jyotsna Singh; Voice: Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2018/6.

Sunday, March 11, 2018

राग कलावती : SWARGOSHTHI – 360 : RAG KALAVATI




स्वरगोष्ठी – 360 में आज

पाँच स्वर के राग – 8 : “मैका पिया बुलावे अपने मन्दिरवा...”

विदुषी गंगूबाई हंगल से राग कलावती की बन्दिश और लता मंगेशकर व सुरेश वाडकर से फिल्म का गीत सुनिए





विदुषी गंगूबाई हंगल
सुरेश वाडकर और लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग कलावती का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वरों में प्रस्तुत राग कलावती की एक बन्दिश के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग कलावती के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग कलावती के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म “सुर संगम” से लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का स्वरबद्ध किया एक गीत –“मैका पिया बुलावे अपने मन्दिरवा...” लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज के अंक में हम पाँच स्वरों वाले एक और प्रचलित राग, कलावती पर आपसे चर्चा करेंगे और इस राग में दो उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे। पिछले अंक में हमने 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” से संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का राग विभास पर आधारीर एक गीत प्रस्तुत किया था। आज के अंक में भी हमने 1985 की ही दूसरी फिल्म “सुर संगम” से एक गीत चुना है। परन्तु इस गीत का राग विभास नहीं बल्कि राग कलावती है। फिल्म “सुर संगम” एक महान संगीतज्ञ के आदर्श जीवन पर आधारित है। फिल्म में संगीत-शिक्षण की प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा को भी रेखांकित किया गया है। एक संगीतज्ञ के जीवन पर केन्द्रित होने के कारण लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के लिए गीतों में विभिन्न रागों के समावेश की चुनौती थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन्होने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होने संगीतज्ञ के केन्द्रीय चरित्र के लिए सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन साजन मिश्र बन्धु के बड़े भाई पण्डित राजन मिश्र के स्वर का चयन किया। फिल्म के अन्य पुरुष चरित्र के लिए सुरेश वाडकर, स्त्री चरित्र के लिए लता मंगेशकर और बाल कलाकार के लिए दक्षिण भारत की गायिका पी. सुशीला की आवाज़ को चुना। फिल्म “सुर संगम” से लिया गया आज का गीत राग कलावती के स्वरों पर आधारित है। फिल्म में यह गीत संगीतज्ञ की बेटी और उनके होने वाले दामाद पर फिल्माया गया है। स्वर दिया है, लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर ने। गीतकार वसन्त देव और संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं।

राग कलावती : “मैका पिया बुलावे अपने मन्दिरवा...” : लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर : फिल्म – सुर संगम


कलावती रे म वर्जित, कोमल लेत निषाद,
मध्यरात्रि में गाइए, प स का है संवाद।
राग कलावती को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और मध्यम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग कलावती में निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है और शेष स्वर शुद्ध होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर और मध्यरात्रि माना जाता है। यह कर्नाटक पद्धति का राग है, जो अब उत्तर भारतीय संगीत में पर्याप्त लोकप्रिय राग हो गया है। उत्तर भारतीय संगीत पद्धति के स्वरों के अनुसार राग झिंझोटी में ऋषभ और मध्यम स्वर वर्जित कर देने से राग कलावती की रचना होती है। आरोह में कोमल निषाद स्वर का वक्र प्रयोग किया जाता है, किन्तु अवरोह में सीधा प्रयोग किया जाता है। ग, प, ग, सा, के प्रयोग से राग शंकरा का आभास होता है, किन्तु कोमल निषाद और धैवत के दीर्घ प्रयोग से राग कलावती का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। राग कलावती का समप्रकृति राग जनसम्मोहिनी होता है। राग कलावती का शास्त्रीय स्वरूप समझने के लिए अब हम आपको किराना घराने की सुविख्यात गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वर में इस राग की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी सप्ताह 5 मार्च को इस महान गायिका का 106वाँ जन्मदिन मनाया गया है। पद्मविभूषण सम्मान से अलंकृत विदुषी गांगूबाई हंगल के स्वर में अब आप तीनताल में निबद्ध यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कलावती : “बोलन लागी कोयलिया...” : विदुषी गंगूबाई हंगल



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 17 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 362वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 358वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – विभास, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – सुरेश वाडकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, राजस्थान से हमारी एक पुरानी पाठक चित्तौड़गढ़, राजस्थान से इन्दुपुरी गोस्वामी, हमारी एक नई पाठक आशा भानप और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की आठवीं कड़ी में आपने राग कलावती का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी गंगूबाई हंगल से एक खयाल रचना का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सुर संगम” से राग कलावती के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, March 10, 2018

चित्रकथा - 59: शम्मी आंटी को श्रद्धांजलि उनके संघर्ष की कहानी के साथ

अंक - 59

शम्मी आंटी को श्रद्धांजलि


"प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम..."




24 April 1929 – 6 March 2018


6 मार्च 2018 को जानीमानी अभिनेत्री शम्मी (शम्मी आंटी) का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक सशक्त अभिनेत्री, एक मिलनसार इंसान, और एक ख़ूबसूरत सितारा, यानी कि शम्मी आंटी। जी हाँ, प्यार से लोग उनके नाम के साथ "आंटी" लगाते हैं। शम्मी आंटी ने शुरुआत बतौर फ़िल्म नायिका की थीं, फिर आगे चल कर चरित्र अभिनेत्री और फिर टेलीविज़न के परदे पर भी ख़ूब लोकप्रियता हासिल की। अधिकतर कलाकारों का संघर्ष जहाँ उनके अरिअर के शुरुआती समय में होता है, वहाँ शम्मी जी का संघर्ष उस समय शुरु हुआ जब वो अपने करिअर के शीर्ष पर थीं। ऐसा क्यों? यही हम जानने की कोशिश करेंगे आज के ’चित्रकथा’ के इस अंक में। तो आइए पढ़ें शम्मी आंटी के संघर्ष की कहानी। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है अभिनेत्री शम्मी (आंटी) की पुण्य स्मृति को!






म्मी आंटी का असली नाम था नरगिस रबाड़ी। मात्र तीन वर्ष की आयु में पिता को खोने के बाद, उनकी माँ ने धार्मिक कार्यक्रमों में खाना बनाने का काम कर के नरगिस और उनकी बहन मणि की परवरिश की। 13 वर्ष की आयु में अपनी माँ का हाथ बंटाने के लिए नरगिस ने दवाई के कारखाने में दवाई पैकिंग् करने की नौकरी कर ली जिसके लिए उन्हें 100 रुपये मासिक वेतन मिलते थे। फ़िल्मों में उनका आना अचानक ही हुआ। उनके पारिवारिक मित्र चिनू मामा फ़िल्मकार महबूब ख़ान के साथ काम कर रहे थे और अभिनेता-निर्माता शेख मु्ख्तार से भी उनकी अच्छी जान पहचान थी। उन्हीं दिनों शेख़ मुख्तार अपनी अगली फ़िल्म के लिए दूसरी नायिका की तलाश कर रहे थे जिसमें पहली नायिका के रूप में बेगम पारा का चयन हो चुका था। जब चिनू मामा ने नरगिस रबाड़ी को यह बात बताई तो वो अपनी क़िस्म्त आज़माने के लिए तैयार हो गईं। स्क्रीन टेस्ट में पास भी हो गईं लेकिन एक शर्त पर कि वो अपना नाम बदल लेंगी क्योंकि नरगिस के नाम से एक सफल अभिनेत्री इंडस्ट्री में मौजूद हैं। इस तरह से फ़िल्म के निर्देशक तारा हरिश ने उनका नाम रख दिया "शम्मी" और यह फ़िल्म थी ’उस्ताद पेड्रो’ जो 1949 में बन कर प्रद्रशित हुई। 18 वर्ष की आयु में फ़िल्म साइन कर यह फ़िल्म उनके 20 वर्ष की आयु में प्रदर्शित हुई। बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म कामयाब सिद्ध हुई। तारा हरिश गायक मुकेश द्वारा निर्मित फ़िल्म ’मल्हार’ भी निर्देशित कर रहे थे। इस फ़िल्म में उन्होंने शम्मी को बतौर मुख्य नायिका चुना। ’मल्हार’ के सुमधुर हिट गीतों ने शम्मी को स्टार का दर्जा दिलवा दिया। शम्मी की तीसरी फ़िल्म आई 1952 में - ’संगदिल’। दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ किया हुआ यह फ़िल्म ख़ास नहीं चली। लेकिन के. आसिफ़ की हिट फ़िल्म ’मुसाफ़िरख़ाना’ की सफलता के बाद शम्मी को एक के बाद एक फ़िल्मों के ऑफ़र आते चले गए। शम्मी की ख़ास बात यह थी कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उन्हें नायिका के ही रोल चाहिए। नायिका, दूसरी नायिका, खलनायिका, हास्य और अन्य चरित्र भूमिकाओं में लगातार फ़िल्में करती चली गईं। 1970 तक उनके अभिनय से सजी महत्वपूर्ण फ़िल्में रहीं ’इलज़ाम’, ’पहली झलक’, ’बंदिश’, ’आज़ाद’, ’हलाकू’, ’सन ऑफ़ सिन्दबाद’, ’राज तुलक’, ’ख़ज़ांची’, ’घर संसार’, ’आख़िरी दाव’, ’कंगन’, ’भाई-बहन’, ’दिल अपना और प्रीत पराई’, ’हाफ़ टिकट’, ’इशारा’, ’जब जब फूल खिले’, ’प्रीत न जाने रीत’, ’आमने सामने’, ’उपकार’, ’इत्तेफ़ाक़’, ’साजन’, ’डोली’, ’राजा साब’ और ’दि ट्रेन’ प्रमुख।

70 के दशक के आते आते अब वो 40 वर्ष की आयु की हो चुकी थीं। लगातार काम करते हुए उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति काफ़ी मज़बूत बना ली थी और उन्होंने अब शादी करके घर-परिवार बसाने का निर्णय लिया। इसी दौरान उनकी मित्रता एक आकांक्षी निर्देशक सुल्तान अहमद से हुई, जो फ़िल्म जगत में स्थापित होने के लिए उन दिनों संघर्षरत थे। शम्मी की फ़िल्म जगत में उस समय काफ़ी जान-पहचान थी, उन्हें लोग इज़्ज़त करते थे। इस वजह से सुल्तान अहमद को इंडस्ट्री में काम दिलाने में शम्मी जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ’प्यार का रिश्ता’ (’73), 'हीरा’ (’73), ’गंगा की सौगंध’ ('78) जैसी फ़िल्मों में सुल्तान अहमद को दाख़िला शम्मी जी की वजह से ही मिली थी। शम्मी जी के ज़रिए राजेश खन्ना, सुनिल दत्त और आशा पारेख जैसे नामी अभिनेता सुल्तान अहमद की फ़िल्मों में काम करने के लिए राज़ी हो गए क्योंकि ये सभी शम्मी जी को पहचानते थे और उनकी इज़्ज़त करते थे। शम्मी और सुल्तान अहमद भी एक दूसरे के क़रीब आने लगे और दोनों ने शादी कर ली। शम्मी ने फिर सुल्तान अहमद की फ़िल्मों के बाहर अभिनय करना भी बन्द कर दिया और परिवार की तरफ़ ध्यान देने लगीं। शादी के सात साल बाद भी शम्मी माँ नहीं बन सकीं। दो बार उनका गर्भपात हो गया। इसी दौरान शम्मी और सुल्तान अहमद ने एक घर ख़रीदने का निर्णय लिया। हालाँकि सुल्तान अहमद ने यह मकान शम्मी जी के नाम से ही ख़रीदना चाहा, पर शम्मी जी ने यह कहा कि इसे उनकी ननंद के नाम ख़रीदना चाहिए क्योंकि उनकी ननंद के पास न कोई नौकरी थी और न कोई सहारा। कोई औरत अपने पैसों से ख़रीदा हुआ घर अपनी ननंद के नाम कर दे, ऐसा आज तक किसे ने सुना है कहीं!! ऐसी थीं शम्मी जी। उधर सुल्तान अहमद के भाई का परिवार भी उनके साथ ही रहता था। क्योंकि भाई की पत्नी अशिक्षित थीं, इसलिए शम्मी जी उनके बच्चे का ख़याल रखती थीं और उन्होंने उस बच्चे का दाख़िला शिमला के एक अच्छे स्कूल में करवाया। इस तरह से शम्मी जी ने उस परिवार की निस्वार्थ सेवा की और अपना पूरा अर्थ परिवार के लिए लगा दिया।

शम्मी जी की सुल्तान अहमद को फ़िल्म जगत में स्थापित करने की मदद तथा उनके परिवार के लिए किया गया निस्वार्थ त्याग और सेवा का मूल्य सुल्तान अहमद ने चुकाया उन्हें तलाक़ देकर। सुल्तान अहमद का एक दूसरी औरत से संबंध स्थापित हुआ जिस वजह से शम्मी जी के साथ उनके रिश्ते में दरार पड़ गई। अपने आत्मसम्मान को बरक़रार रखते हुए शम्मी जी 1980 में एक दिन अपना घर, अपना पैसा, अपनी गाड़ी, अपना परिवार, सब कुछ छोड़ कर अपनी माँ के पास अपने पुराने घर में चली गईं। इस घटना की वजह से सुल्तान अहमद पर फ़िल्म जगत की कई बड़ी हस्तियाँ नाराज़ हुईं जिनमें नरगिस और सुनिल दत्त शामिल थे। अब शम्मी जी के लिए फ़िल्म जगत में दूसरी पारी शुरु करने की बारी थी अपने आप को दुबारा अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए। फ़िल्म जगत में लोग उनकी इज़्ज़त करते थे, सुनिल दत्त के सहयोग से आठ दिनों के अन्दर उन्हें 'The Burning Train' में एक रोल दिलवाया। राजेश खन्ना ने भी ’रेड रोज़’, ’आँचल’, ’कुदरत’, ’आवारा बाप’ और ’स्वर्ग’ जैसी फ़िल्मों में उन्हें रोल दिलवाये जिस वजह से वो एक बार फिर से सबकी नज़र में आ गईं और फिर एक बार उनकी गाड़ी चल पड़ी। इस सफलता को देखते हुए शम्मी जी ने ’पिघलता आसमान’ नामक एक फ़िल्म बनाने की सोची। राजेश खन्ना नायक थे और उन्हीं के ज़रिए इसमाइल श्रॉफ़ निर्देशक चुने गए। पर खन्ना और श्रॉफ़ के बीच किसी मतभेद की वजह से खन्ना इस फ़िल्म से निकल गए। शशि कपूर ने शम्मी जी की ख़ातिर फ़िल्म को स्वीकार कर लिया पर इसमाइल श्रॉफ़ अपनी आदतों से बाज़ नहीं आए। अन्त में निर्देशन का कोई तजुर्बा न होते हुए भी शम्मी जी को ख़ुद इस फ़िल्म को निर्देशित करना पड़ा, और फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, और शम्मी जी का सारा पैसा डूब गया। वो फिर एक बार ज़ीरो पर पहुँच गईं।


अब उनकी तीसरी पारी के शुरु होने की बारी थी। उनके करिअर को फिर एक बार पुनर्जीवित करने के लिए राजेश खन्ना ने दूरदर्शन के कुछ कार्यक्रमों को प्रोड्युस करने के लिए शम्मी जी का नाम रेकमेण्ड कर दिया। टेलीविज़न जगत में वो बेहद लोकप्रिय हो उठीं। ’देख भाई देख’, ’ज़बान सम्भाल के’, ’श्रीमान श्रीमती’, ’कभी ये कभी वो’ और ’फ़िल्मी चक्कर’ जैसे धारावाहिकों ने कामयाबी के झंडे गाढ़ दिए। और इस कामयाबी से वो फिर एक बार फ़िल्मों में भी नज़र आने लगीं। ’कूली नंबर वन’, ’हम’, ’मर्दों वाली बात’, ’गुरुदेव’, ’गोपी किशन’, ’हम साथ-साथ हैं’ और ’इम्तिहान’ जैसी फ़िल्में उनकी इस दौर की फ़िल्में रहीं। टीवी और इन फ़िल्मों में अभिनय की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति सुधर गई और अपने अन्तिम समय तक वो शारीरिक रूप से सक्रीय थीं और अन्त तक अभिनय करने की लालसा उनके मन में थी। अभी पाँच साल पहले 83 वर्ष की आयु में वो ’शिरीं फ़रहाद की निकल पड़ी’ फ़िल्म में नज़र आई थीं। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि इसमें डेज़ी इरानी ने भी अभिनय किया है। डेज़ी इरानी इसमें शम्मी आंटी की पुत्रवधु का चरित्र निभाया, और मज़ेदार बात यह कि डेज़ी इरानी की पहली फ़िल्म ’बंदिश’ (1955) में भी शम्मी जी ने अभिनय किया था। शम्मी आंटी एक ऐसी शख़्सियत हैं जिन्होंने अपनी सहनशीलता, संघर्ष करने के जसबे और हर बार अपने आप को मुसीबतों से बाहर निकालने के दृढ़ संकल्प का परिचय एक बार नहीं बल्कि बार बार दिया। अभी 6 मार्च को शम्मी आंटी हम सबको छोड कर चली गईं और इसके ठीक दो दिन बाद 8 मार्च को हमने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया। इस विशेष दिन पर शम्मी जी बार बार याद आती रहीं। आख़िर शम्मी आंटी जैसी महिला बहुत कम पैदा होती हैं, है ना? ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से हम शम्मी आंटी को देते हैं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि। उनके अभिनय से सजी फ़िल्में और धारावाहिक आने वाली पीढ़ियों को लम्बे समय तक प्रेरित करते रहेंगे अच्छा और सहज अभिनय करने के लिए, और यह भी सिखाते रहेंगे कि किसी भी अभिनेत्री को टाइप-कास्ट ना होकर हर तरह के किरदार निभाने रहने चाहिए। यही एक सच्चे कलाकार की पहचान है!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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