Friday, February 28, 2014

मिष्टी दोई जैसी बप्पी दा की आवाज़ और "घंटी गीत" बना साल का पहला देशव्यापी हिट

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 08 

बप्पी दा 
दोस्तों, साल 2014 के दो माह बीतने को हैं, और अब तक हम आपको 14 गीत सुनवा चुके हैं. आज हम आपको सुनवायेंगे दो ऐसे गीत जो लोकप्रियता के लिहाज से शीर्ष पायदानों पर विराजमान हैं, और ये दोनों ही गीत एक ही फिल्म से हैं. फिल्म "गुण्डे" के बारे में आपको बता दें कि ये फिल्म हिंदी के साथ साथ बांग्ला में भी बनी है. और इसका मशहूर घंटी गीत  बांग्ला में बप्पी दा ने गाया है. वैसे संगीतकार सोहैल सेन ने हिंदी संस्करण में भी बप्पी दा को क्रेडिट दिया है. हिंदी संस्करण आज पूरे भारत में धूम मचा रहा है, मगर हम आपको सुनवा रहे हैं गीत का बांग्ला संस्करण जिसे बप्पी दा से एकदम मस्त गाया है. सुनते सुनते झूमने लगो तो हमें दोष मत दीजियेगा...


नेहा बाशिन 
क्यों दोस्तों, मज़ा आया न...? चलिए अब बढते हैं गुण्डे  के एक और गीत की तरफ जो है एक कैब्रेट गीत. असलमे इश्कुम  फिल्माया गया है प्रियंका चोपडा पर और उनके लिए पार्श्व गायन किया है नेहा भासिन ने, जी हाँ वही जिनकी धुनकी  ने आपको दीवाना बना दिया था. नेहा आज की एक चर्चित आवाज़ का नाम है पर अपने आरंभिक दिनों को याद करते हुए एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि एक बार एक निर्माता के सामने ऑडिशन देते हुए उनसे पूछा गया कि कहीं आपकी आवाज़ बैठी हुई तो नहीं है, जवाब में नेहा डरते डरते बस यही कह पायी थी कि 'मेरी आवाज़ ही ऐसी है'...ये वो दौर था जब एक खास किस्म की आवाजें ही इंडस्ट्री में स्वीकार्य होती थी. दस साल में बहुत कुछ बदल चुका है, और नए अंदाज़ की आवाजें भी आज अपनी पहचान बना रही हैं. नेहा की सफलता इसका ही एक उदाहरण है. माईकल जेक्सन की मुरीद नेहा फिल्मों से इतर भी अपनी आवाज़ में गैर फिल्मों गीत रिलीस करती रहती हैं, और जल्दी ही उनका एक नया सिंगल भी आने वाला है. तो लीजिए फिलहाल सुनिए उनकी आवाज़ में इश्क को नशीला सलाम. 

Thursday, February 27, 2014

तलत में आवाज़ में महसूस हुई एक हारे हुए प्रेमी की तड़प

खरा सोना गीत # आँसू समझ के 
प्रस्तोता : लिंटा मनोज 
स्क्रिप्ट : सुजॉय चट्टर्जी
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 

Tuesday, February 25, 2014

शंकर पुणतांबेकर का व्यंग्य आम आदमी

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने माधवी चारुदत्ता के स्वर में मुंशी प्रेमचंद की कथा "स्त्री और पुरुष" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. शंकर पुणतांबेकर की व्यंग्यात्मक लघुकथा आम आदमी जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "आम आदमी" का गद्य हिन्दी समय ब्लॉग पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 40 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



हिन्दी और मराठी के साहित्यकार डॉ. शंकर पुणतांबेकर का जन्म 1923 में हुआ था। वे अपने मारक व्यंग्य रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं और 'व्यंग्यश्री', 'चकल्लस' व 'मुक्तिबोध पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।
 

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे... नहीं डूबने देंगे... नहीं डूबने देंगे।"
 (डॉ. शंकर पुणतांबेकर रचित "आम आदमी" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
आम आदमी MP3

#3rd Story, Aam Adami: Shankar Puntambekar/Hindi Audio Book/2014/3. Voice: Anurag Sharma

Monday, February 24, 2014

भीगी भीगी फ़ज़ाओं में लहराएँ आशा ताई के संग

खरा सोना गीत # भीगी भीगी फिज़ा 
प्रस्तोता : अंतरा चक्रवर्ती
स्क्रिप्ट : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 


Sunday, February 23, 2014

राग काफी गाने-बजाने का परिवेश

  

स्वरगोष्ठी – 156 में आज

फाल्गुन के रंग राग काफी के संग


‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली तीन कड़ियों से हम आपसे बसन्त ऋतु के संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। इसके उपरान्त रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से हो के रस-रंग को अभिव्यक्त करने के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। आज के अंक में हम पहले इस राग में एक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे परवीन सुल्ताना ने स्वर दिया है। इसके साथ ही डॉ. कमला शंकर का गिटार पर बजाया राग काफी की ठुमरी भी सुनेगे। आज की तीसरी प्रस्तुति डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा है।  


राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

आज की पहली प्रस्तुति राग काफी की ठुमरी है। यह ठुमरी विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगांव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान प्राप्त हुआ है। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग मिश्र काफी की कृष्ण की छेड़छाड़ से युक्त, श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक ठुमरी।


ठुमरी मिश्र काफी : ‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने राग काफी की ठुमरी का रसास्वादन किया। गायन में स्वर संयोजन के साथ ही गीत के शब्द भी रस उत्पत्ति में सहयोगी होते है। किन्तु वाद्य संगीत में शब्द नहीं होते। राग काफी श्रृंगार रस के परिवेश को रचने में पूर्ण समर्थ है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए अब हम आपको राग मिश्र काफी की ठुमरी का वादन सुनवाते हैं, वह भी पाश्चात्य संगीत वाद्य हवाइयन गिटार पर। दरअसल आज का पाश्चात्य हवाइयन गिटार प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य विचित्र वीणा का परिवर्तित रूप है। पिछले कुछ दशकों से कई भारतीय संगीतज्ञों ने गिटार में संशोधन कर उसे भारतीय संगीत के अनुकूल बनाया है। सुपरिचित संगीत विदुषी डॉ. कमला शंकर ने भारतीय संगीत के रागों के अनुकूल गिटार वाद्य में कुछ संशोधन किए हैं। कमला जी का गिटार बिना जोड़ की लकड़ी का बना हुआ है। इसमें स्वर और चिकारी के चार-चार तार तथा तरब के बारह तार लगे हैं। डॉ. कमला शंकर का जन्म 1966 में तमिलनाडु के तंजौर नामक जनपद में हुआ था। संगीत की पहली गुरु स्वयं इनकी माँ थीं। बाद में वाराणसी के पण्डित छन्नूलाल मिश्र से खयाल और ठुमरी की शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध सितारवादक विमलेन्दु मुखर्जी से कमला जी ने तंत्रवाद्य की बारीकियाँ सीखी। कमला जी हैं पहली महिला कलाकार हैं जिन्हें भारतीय संगीत के सन्दर्भ में पीएच डी की उपाधि मिली है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विचित्र वीणा वादक डॉ. गोपाल शंकर मिश्र के निर्देशन में उन्होने अपना शोधकार्य किया। गिटार वादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी में हम उनका गिटार पर बजाया राग मिश्र काफी की ठुमरी प्रस्तुत कर रहे हैं।


ठुमरी मिश्र काफी : गिटार वादन : डॉ. कमला शंकर




भारतीय उपशास्त्रीय संगीत की एक शैली है, टप्पा। अब हम आपको राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, पूरब अंग की सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. सोमा घोष। बनारस (वाराणसी) में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुम्बई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेन्दु घोष की पुत्रवधू है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। उन्हें आज जो प्रतिष्ठा मिली है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है, जिन्होने सोमा जी को नौकरी न करने का सुझाव दिया था। विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपनी दत्तक पुत्री बना लिया था। वर्ष 2001 के एक सांगीतिक आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी का गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबन्दी करोगी। सोमा जी को बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की। खाँ साहब ने सोमा जी को अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी भी बनाया था। सोमा जी ने संगीत की शिक्षा सेनिया घराने के पण्डित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की विदुषी बागेश्वरी देवी जी से ली। वर्ष 2002 में मुंबई के एक समारोह में सोमा जी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की ऐतिहासिक जुगलबन्दी हुई थी। उस आयोजन में अमिताभ बच्चन जी सपत्नीक टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में बैठे थे। सोमा जी ने खयाल गायकी को बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लोकप्रिय बनाया है। लीजिए, अब आप डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा सुनिए और स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश की सार्थक अनुभूति कीजिए। इसके साथ ही मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : ‘वीरा दे जानियाँ रबी...’ : डॉ. सोमा घोष





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 156वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह संगीत की कौन सी शैली है? इस संगीत शैली का नाम बताइए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और उनका नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 158वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 154वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित लालमणि मिश्र द्वारा प्रस्तुत तंत्रवाद्य पर एक रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- विचित्र वीणा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
 

Saturday, February 22, 2014

और आज बारी है 'सिने पहेली' के महामुक़ाबले की....

सिने पहेली : महा-मुक़ाबला




'सिने पहेली' के सभी चाहने वालों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, आज वह दिन आ गया है जिसका शायद आप सभी को बेसब्री से इन्तज़ार था। जी हाँ, आज बारी है 'सिने पहेली' प्रतियोगिता की अन्तिम भिड़न्त, यानी महामुकाबले की। जैसा कि पिछले हफ़्ते हमें पाँच प्रतियोगी मिल गये हैं इस महामुकाबले के लिए, आप पाँचों के बीच होगा यह आख़िरी जंग और इसी जंग के परिणाम से घोषित होगा 'सिने पहेली' का महाविजेता। आगे बढ़ने से पहले आइए एक बार फिर जान लें कि कौन पाँच खिलाड़ियों ने क्वालिफ़ाई किया है इस महासंग्राम में।



आप पाँचों को ढेरों शुभकामनाएँ और आप में से कोई भी जीत सकता है 'महाविजेता' का ख़िताब। अपने आप को ज़रा सा भी कम न समझें और जी-जान लगा दीजिये महाविजेता बनने के लिए। आपकी मेहनत ज़रूर रंग लायेगी। अब ज़्यादा समय न गँवाते हुए सीधे चलते हैं महामुक़ाबले के सवालों पर। तो ये रहे 10 सवाल जिन्हें आपको हल करने हैं-



महा-मुक़ाबले के सवाल


सिने पहेली के इस निर्णायक महामुक़ाबले के 10 सवाल ये रहे...

1. तीस के दशक के शुरुआती दौर का यह एक गीत है जिसका मुखड़ा शुरू होता है दो संगीतकारों के नामों से। जी हाँ, दो संगीतकारों का पूरा पूरा नाम (जैसा रेकॉर्ड/ कैसेट पर प्रकाशित होता रहा है) इस गीत के मुखड़े में मौजूद है। कौन सा गीत है यह? (10 अंक)

2. एक ऐसी फ़िल्म का नाम बताइये जिस फ़िल्म में मीना कुमारी का पार्श्वगायन तीन गायिकाओं ने किया है अलग अलग गीतों में - लता मंगेशकर, आशा भोसले और गीता दत्त। (10 अंक)

3. नीचे दिये हुए चित्र को ध्यान से देखिये और बताइये कि इसका नुसरत फ़तेह अली ख़ान से क्या वास्ता है? (10 अंक)



4. भारतीय सिनेमा का यह एक माइलस्टोन फ़िल्म है। इस फ़िल्म में एक ऐसा गीत है जिसमें एक अभिनेता का पार्श्वगायन दो गायक करते हैं और एक अभिनेत्री का पार्श्वगायन दो गायिकायें करती हैं। इसी गीत में ये ही दो गायक एक और अभिनेता का भी पार्श्वगायन करते हैं और ये ही दो गायिकायें एक और अभिनेत्री का भी पार्श्वगायन करती हैं। है न मज़ेदार? तो बताइये कि कौन सा गीत है यह? (10 अंक)

5. इन दो कलाकारों को पहचानिये। (5+5=10 अंक)



6. एक गीत ऐसा है जिसमें नरगिस का डबल रोल है, अर्थात्‍ नरगिस दो किरदार निभा रही हैं, और इन दो किरदारों को दो गायिकाओं ने अपनी आवाज़ें दी हैं। एक राजकुमारी और दूसरीं लता मंगेशकर। 50 के दशक के किसी फ़िल्म का यह गीत है। कौन सा गीत है यह? (10 अंक)

7. गुज़रे ज़माने के कुछ बेहद मशहूर कलाकारों की तस्वीरें आप नीचे देख सकते हैं। बताइये कि किस एक गीत के माध्यम से आप इन सभी कलाकारों को आपस में जोड़ सकते हैं? (10 अंक)



8. नीचे दिये हुए प्लेयर पर क्लिक कर संगीत के अंश को सुनें और बतायें कि यह किस गीत का इंटरल्यूड संगीत है। (10 अंक)


9. त्रिलोक कपूर, अभि भट्टाचार्य, सनी देओल और शाहरुख ख़ान को आप किस तरह से आपस में जोड़ सकते हैं? (10 अंक)

10. नीचे दिये हुये तसवीर को ध्यान से देख कर बताइये कि रिक्त स्थान पर किस फ़िल्म का पोस्टर होना चाहिये और क्यों? (10 अंक)





अपने जवाब आप हमें cine.paheli@yahoo.com पर 28 फ़रवरी भारतीय समयानुसार रात 10 बजे तक ज़रूर भेज दीजिये।

महाविजेता और पुरस्कारों की घोषणा 1 मार्च प्रात: 9 बजे इसी मंच पर की जायेगी।

तो आज बस इतना ही, देखते हैं किसमें कितना है दम। हम आप पाँचों महासंग्रामियों से यही कहेंगे कि 'All the Best'!!! परिणाम जो भी हो, आप सब पूरी कोशिश कीजिये इन सवालों को सुलझाने की, यही ज़्यादा ज़रूरी है! तो ढेरों शुभकामनाओं के साथ अब मैं विदा लेता हूँ, मुलाक़ात होगी अगले शनिवार 'महाविजेता' के नाम के साथ, नमस्कार!


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Friday, February 21, 2014

आईये घूम आयें बचपन की गलियों में इन ताज़ा गीतों के संग

ताज़ा सुर ताल - 2014 -07 - बचपन विशेष 

जेब (बाएं) और हनिया 
ताज़ा सुर ताल की एक और कड़ी में आपका स्वागत है, आज जो दो नए गीत हम चुनकर लाये हैं वो यक़ीनन आपको आपके बचपन में लौटा ले जायेगें. हाईवे  के संगीत की चर्चा हमने पिछले अंक में भी की थी, आज भी पहला गीत इसी फिल्म से. दोस्तों बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक होती है माँ की मीठी मीठी लोरियाँ जिसे सुनते हुए कब बरबस ही नींद आँखों में समा जाती थी पता भी नहीं चलता था. इन दिनों फिल्मों में लोरियाँ लौट सी आई है, तभी तो राऊडी राठोड  जैसी जबरदस्त व्यवसायिक फिल्मों में भी लोरियाँ सुनने को मिल जाती हैं. पर यकीन मानिये हाईवे की ये लोरी अब तक की सुनी हुई सब लोरियों से अल्हदा है, इस गीत में गीतकार इरशाद की मेहनत खास तौर पे कबीले तारीफ है. सुहा यानी लाल, और साहा यानी खरगोश, माँ अपने लाडले को लाल खरगोश कह कर संबोधित कर रही है, शब्दों का सुन्दर मेल इरशाद ने किया है उसका आनंद लेने के लिए आपको गीत बेहद ध्यान से सुनना पड़ेगा. रहमान की धुन ऐसी कि सुन कर उनके कट्टर आलोचक भी भी उनकी तारीफ किये बिना नहीं रह पायेगें. आखिर यूहीं तो नहीं उन्हें देश का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार कहा जाता है. एक और आश्चर्य है अलिया भट्ट की मधुर आवाज़, ये नटखट सी दिखने वाली लड़की इतना सुरीला भी गा सकती है यकीन नहीं होता, वैसे गीत में प्रमुख आवाज़ है पाकिस्तानी गायिका जेब की. ज़बुनिषा बंगेश, हनिया असलम के साथ मिलकर एक संगीत बैंड चलाती है, और उनकी आवाज़ की खनक वाकई बेमिसाल है. मैंने तो जब से ये गीत सुना है मेरे मोबाईल पर यही गीत इन दिनों लूप में चलता रहता है, मुझे यकीन है कि आप को भी ये गीत बचपन की बाहों में ले जायेगा, जहाँ माँ की लोरी में दुनिया समाती थी और बेफिक्र नींदों पलकों पे तारी हो जाया करती थी. लीजिए सुनिए - सुहा साहा...  


प्रीतम 
चलिए आगे बढते हैं बचपन के सपनों की तरफ, जो कुछ चुलबुले से होते हैं तो कुछ बवाले से. शादी के साईड एफ्फेक्ट्स  में दो बहुत ही प्रतिभाशाली और लीक से अलग चलने वाले फरहान अख्तर और विध्या बालन एक साथ आ रहे हैं. फिल्म में संगीत है हिट मशीन प्रीतम दा का. गीत लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने. वैसे इस गीत का एक संस्करण मोहित चौहान की आवाज़ में भी है पर हम आपके लिए लेकर आये हैं नन्हीं गायिका डीवा का गाया ये बच्चों वाला संस्करण, जो बहुत ही प्यारा और मधुर है. गीतकार स्वानंद किरकिरे ने हाल में दिए एक साक्षात्कार में बताया है कि इस गीत को लिखते हुए वो खुद भी रो पड़े थे. वैसे स्वानंद और सपनों का रिश्ता यूँ भी पुराना है. बावरा मन फिर से  चला सपने देखने  ... तो लीजिए आनंद लीजिए इस ताज़ा गीत का भी.  

Thursday, February 20, 2014

याद करें मन्ना दा को इस शानदार गीत के साथ

खरा सोना गीत : आयो कहाँ से घनश्याम
प्रस्तोता : अर्शना सिंह
स्क्रिप्ट : संज्ञा टंडन
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन

Wednesday, February 19, 2014

फिल्म 'सौ साल बाद' का रागमाला गीत







प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट




रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 6




राग भटियार, आभोगी, मेघ मल्हार और बसन्त बहार में पिरोया गया रागमाला गीत


‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’



फिल्म : सौ साल बाद (1966)
गायक : लता मंगेशकर और मन्ना डे
गीतकार : आनन्द बक्शी
संगीतकार : लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल
आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन





 
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Tuesday, February 18, 2014

मुंशी प्रेमचंद स्त्री और पुरुष

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में मुनीश शर्मा की कथा "लघु बोधकथा" सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी स्त्री और पुरुष जिसे स्वर दिया है माधवी चारुदत्ता ने।

प्रस्तुत व्यंग्य का गद्य "भारत डिस्कवरी" पर उपलब्ध है। "स्त्री और पुरुष" का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 26 सेकंड है। सुनिए और बताइये कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।





मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
 ~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"उन्होंने उस सुंदरी की कल्पना करनी शुरू की जो उनके हृदय की रानी होगी; उसमें ऊषा की प्रफुल्लता होगी, पुष्प की कोमलता, कुंदन की चमक, बसंत की छवि, कोयल की दनि ... ”
 (मुंशी प्रेमचंद कृत "स्त्री और पुरुष" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
स्त्री और पुरुष MP3

#Third Story, Stree Aur Purush : Munshi Premchand Hindi Audio Book/2014/03. Voice: Madhavi Charudatta

Monday, February 17, 2014

मादक आदयें आवाज़ की, गीता दत्त का नशीला जादू

खरा सोना गीत : अरे तौबा
प्रस्तोता : रचिता टंडन
स्क्रिप्ट : सुजॉय चट्टर्जी
प्रस्तुति : संज्ञा टंडन

Sunday, February 16, 2014

बसन्त ऋतु और राग बसन्त बहार SWARGOSHTHI – 155


स्वरगोष्ठी – 155 में आज

ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन राग बसन्त बहार से

‘माँ बसन्त आयो री...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, पिछली दो कड़ियों से हम आपसे बसन्त ऋतु के रागों की चर्चा कर रहे हैं। बसन्त ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त और राग बहार गाया-बजाया जाता है। परन्तु इन दोनों रागों के मेल से एक तीसरे राग ‘बसन्त बहार’ की सृष्टि भी होती है, जिसमें राग का स्वतंत्र अस्तित्व भी रहता है और दोनों रागों की छाया भी परिलक्षित होती है। दोनों रागों के सन्तुलित प्रयोग से राग ‘बसन्त बहार’ का वास्तविक सौन्दर्य निखरता है। कभी-कभी समर्थ कलासाधक प्रयुक्त दोनों रागों में से किसी एक को प्रधान बना कर दूसरे का स्पर्श देकर प्रस्तुति को एक नया रंग दे देते हैं। आज के अंक में हम पहले इस राग का एक अप्रचलित तंत्रवाद्य विचित्र वीणा पर वादन प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद अनूठे समूहगान के रूप में 2750 गायक-गायिकाओं के समवेत स्वर में राग बसन्त बहार की प्रस्तुति होगी। आज की इस कड़ी के अन्त में राग बसन्त बहार पर आधारित एक ऐतिहासिक फिल्मी गीत की प्रस्तुति भी की जाएगी जिसे पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे ने स्वर दिया था। 



ज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम राग बसन्त बहार पर चर्चा करेंगे। यद्यपि बसन्त ऋतु के मुख्य राग बसन्त और बहार हैं, किन्तु इन दोनों रागों के मेल से सृजित राग बसन्त बहार भी ऋतु का परिवेश रचने में समर्थ है। आज सबसे पहले हम आपको एक प्राचीन और लुप्तप्राय तंत्रवाद्य विचित्रवीणा पर राग ‘बसन्त बहार’ सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत किया है, बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलासाधक, शिक्षक और शोधकर्त्ता डॉ. लालमणि मिश्र ने। कृतित्व से पूर्व इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व को रेखांकित करना आवश्यक है।

डॉ. लालमणि मिश्र का जन्म 11 अगस्त, 1924 को कानपुर के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पाँच वर्ष की आयु में उन्हें स्कूल भेजा गया किन्तु 1930 में कानपुर के भीषण दंगों के कारण न केवल इनकी पढ़ाई छूटी बल्कि इनके पिता का व्यवसाय भी बर्बाद हो गया। परिवार को सुरक्षित बचाकर इनके पिता कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए। कोलकाता में बालक लालमणि की माँ को संगीत की शिक्षा प्रदान करने कथावाचक पण्डित गोबर्धन लाल घर आया करते थे। एक बार माँ को सिखाए गए 15 दिन के पाठ को यथावत सुना कर उन्होने पण्डित जी को चकित कर दिया। उसी दिन से लालमणि की विधिवत संगीत शिक्षा आरम्भ हो गई। पण्डित गोबर्धन लाल से उन्हें ध्रुवपद और भजन का ज्ञान मिला तो हारमोनियम वादक और शिक्षक विश्वनाथप्रसाद गुप्त से हारमोनियम बजाना सीखा। ध्रुवपद-धमार की विधिवत शिक्षा पण्डित कालिका प्रसाद से खयाल की शिक्षा रामपुर सेनिया घराने के उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य मेंहदी हुसेन खाँ से मिली। बिहार के मालिक घराने के शिष्य पण्डित शुकदेव राय से सितार वादन की तालीम मिली। मात्र 16 वर्ष की आयु में मुंगेर, बिहार के एक रईस परिवार के बच्चों के संगीत-शिक्षक बन गए। 1944 में कानपुर के कान्यकुब्ज कालेज में संगीत-शिक्षक नियुक्त हुए। इसी वर्ष सुप्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक उस्ताद अब्दुल अज़ीज खाँ (पटियाला) के वाद्य विचित्र वीणा से प्रभावित होकर उन्हीं से शिक्षा ग्रहण की और 1950 में लखनऊ के भातखण्डे जयन्ती समारोह में इस वाद्य को बजा कर विद्वानो की प्रशंसा अर्जित की। लालमणि जी 1951 में उदयशंकर के दल में बतौर संगीत निर्देशक नियुक्त हुए और 1954 तक देश-विदेश का भ्रमण किया। 1951 में कानपुर के गाँधी संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य बने। 1958 में पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के आग्रह पर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय में वाद्य विभाग के रीडर पद पर सुशोभित हुए और यहीं डीन और विभागाध्यक्ष भी हुए। संगीत की हर विधा में पारंगत पण्डित लालमणि मिश्र ने अपनी साधना और शोध के बल पर अपनी एक अलग शैली विकसित की जिसे ‘मिश्रवाणी’ के नाम से स्वीकार किया गया। 17 जुलाई, 1979 को मात्र 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। आइए अब पण्डित लालमणि मिश्र से सुनते हैं, राग बसन्त बहार-


राग बसन्त बहार : विचित्र वीणा : डॉ. लालमणि मिश्र



बसन्त ऋतु का अत्यन्त मोहक राग ‘बसन्त बहार’ दो रागों के मेल से बना है। कुछ विद्वान इसे ‘छायालग राग’ कहते हैं। आम तौर पर इस राग के आरोह में बहार और अवरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यदि आरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो इसे पूर्वांग प्रधान रूप देना आवश्यक है। षडज से मध्यम तक दोनों रागों के स्वर समान होते हैं, तथा मध्यम के बाद के स्वर दोनों रागों में अन्तर कर देते हैं। राग ‘बसन्त बहार’ दो प्रकार से प्रचलन में है। यदि बसन्त को प्रमुखता देनी हो तो इसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत लेना चाहिए। ऐसे में वादी स्वर षडज और संवादी पंचम हो जाता है। काफी थाट के अन्तर्गत लेने पर राग बहार प्रमुख हो जाता है और वादी मध्यम और संवादी षडज हो जाता है। अन्य ऋतुओं में इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु बसन्त ऋतु में इसका प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है।

आज की इस संगीत-गोष्ठी में हम आपको राग ‘बसन्त बहार’ की एक और अनूठी प्रस्तुति सुनवा रहे हैं। दो वर्ष पूर्व पुणे में एक महत्वाकांक्षी सांगीतिक अनुष्ठान आयोजित हुआ था। सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी के सान्निध्य में देश भर से आमंत्रित 2750 शास्त्रीय गायक कलासाधकों ने जाने-माने गायक बन्धु पण्डित राजन और साजन मिश्र के नेतृत्व में राग ‘बसन्त बहार’ और तीनताल में निबद्ध एक बन्दिश समवेत स्वर में प्रस्तुत किया गया था। यह प्रस्तुति ‘अन्तर्नाद’ संस्था की थी, जिसके लिए 27,000 वर्गफुट आकार का मंच बनाया गया था। आकाश तक गूँजती यह रचना बनारस के संगीतज्ञ पण्डित बड़े रामदास की है। आइए इसी अनूठी प्रस्तुति का रसास्वादन करते हैं।


राग बसन्त बहार : ‘माँ बसन्त आयो री...’ : पण्डित राजन-साजन मिश्र व 2750 स्वर 



राग बसन्त बहार पर आधारित आज का फिल्मी गीत हमने 1956 में प्रदर्शित, राग के नाम पर ही रखे गए शीर्षक अर्थात फिल्म ‘बसन्त बहार’ से लिया है। यह एक संगीत-प्रधान फिल्म थी, जिसके संगीतकार शंकर-जयकिशन थे। राग आधारित गीतों की रचना फिल्म के कथानक की माँग भी थी और उस दौर में इस संगीतकार जोड़ी के लिए चुनौती भी। शंकर-जयकिशन ने शास्त्रीय संगीत के दो दिग्गजों- पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी के सरताज पण्डित रामनारायण को यह ज़िम्मेदारी सौंपी। पण्डित भीमसेन जोशी ने फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र को राग बसन्त की एक पारम्परिक बन्दिश गाकर सुनाई और शैलेन्द्र ने 12 मात्रा के ताल पर शब्द रचे। पण्डित जी के साथ पार्श्वगायक मन्ना डे को भी गाना था। मन्ना डे ने जब यह सुना तो पहले उन्होने मना किया, लेकिन बाद में राजी हुए। इस प्रकार भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास इतिहास में एक अविस्मरणीय गीत दर्ज़ हुआ। शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फिल्म के शीर्षक के अनुरूप यह गीत राग 'बसन्त बहार' पर आधारित है। गीतकार शैलेन्द्र की यह रचना है। इस फिल्म में उस समय के सर्वाधिक चर्चित और सफल अभिनेता भारतभूषण नायक थे और निर्माता थे आर. चन्द्रा। संगीतकार शंकर-जयकिशन ने फिल्म के अधिकतर गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित रखे थे। इससे पूर्व भारतभूषण की कई फिल्मों में मोहम्मद रफ़ी उनके लिए सफल गायन कर चुके थे। शशि भारतभूषण के भाई शशिभूषण इस फिल्म में मोहम्मद रफ़ी को ही लेने का आग्रह कर रहे थे, जबकि फिल्म निर्देशक मयप्पन मुकेश से गवाना चाहते थे। यह बात जब शंकर जी को मालूम हुआ तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि राग आधारित इन गीतों को मन्ना डे के अलावा और कोई गा ही नहीं सकता। यह विवाद इतना बढ़ गया कि शंकर-जयकिशन को इस फिल्म से हटने की धमकी तक देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी। फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के गाये गीत 'मील के पत्थर' सिद्ध हुए। आइए सुनते है, इस फिल्म का एक गीत ‘केतकी गुलाब जुही चम्पक बन फूले...’। यह गीत पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे की आवाज में प्रस्तुत है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म बसन्त बहार : ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूलें...’ : पं. भीमसेन जोशी और मन्ना डे 




आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ की 155वीं संगीत पहेली में हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – यह रचना सुन कर क्या आप वाद्य यंत्र को पहचान रहे हैं? यदि हाँ तो तत्काल हमें उसका नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 157वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ की 153वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित वी.जी. जोग के वायलिन वादन के एक पुराने रिकार्ड का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बहार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक बसन्त ऋतु के रागों पर केन्द्रित था। यह सिलसिला आगामी अंक में भी जारी रहेगा। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, February 15, 2014

10 सेगमेण्ट्स - 100 एपिसोड्स - 43 प्रतियोगी - 'सिने पहेली' का सफ़र अपने अंजाम की तरफ़...

सिने पहेली



 
नमस्कार, दोस्तों। आज 'सिने पहेली' के 100वें एपिसोड के परिणामों के साथ 10 सेगमेण्ट्स का यह लम्बा सफ़र पूरा हो रहा है। हालाँकि महामुकाबला अभी बाक़ी है, पर 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के नियमित एपिसोड्स आज सम्पन्न हो रहे हैं। शुरू से लेकर अब तक इस प्रतियोगिता में कुल 43 प्रतियोगियों ने भाग लिया है। इनमें से कुछ प्रतियोगी शुरू से लेकर अन्त तक जुड़े रहे (जैसे कि प्रकाश गोविन्द और पंकज मुकेश); कुछ प्रतियोगी थोड़े बाद में जुड़े पर अन्त तक जुड़े रहे (जैसे कि विजय कुमार व्यास और चन्द्रकान्त दीक्षित); कुछ खिलाड़ी शुरू से लेकर अन्त तक जुड़े तो रहे पर नियमित रूप से नहीं भाग लिया (जैसे कि इन्दु पुरी गोस्वामी और क्षिति तिवारी); और बाक़ी प्रतियोगी ऐसे रहे जिन्होंने बीच में ही खेल छोड़ दिया। इस तरह से मिले-जुले रूप में इन 43 प्रतियोगियों ने 'सिने पहेली' प्रतियोगिता को सजाया, सँवारा और दिलचस्प बनाया। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के तरफ़ से मैं आप सभी 43 प्रतियोगियों को धन्यवाद देता हूँ, और उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में भी किसी अन्य स्तम्भ के माध्यम से आप सब से दोबारा बातचीत होगी। 'सिने पहेली' के 10वें सेगमेण्ट्स के विजेताओं के नाम घोषित करने से पहले आइए नज़र डालें पहेली के सही जवाबों पर।



सिने पहेली - 100 का हल




उत्‍तर 1. Son Of India
उत्‍तर 2. Murder
उत्‍तर 3. Night in London
उत्‍तर 4. Gambler
उत्‍तर 5. Indian
उत्‍तर 6. Opera House
उत्‍तर 7. Bombay To Goa
उत्‍तर 8. Dream Girl
उत्‍तर 9. Bluff Master
उत्‍तर 10.Singapore



पिछली पहेली के विजेता


इस बार हमारे चार नियमित प्रतियोगियों ने भाग लिया, और सबसे पहले 100% सही जवाब भेज कर 'सरताज प्रतियोगी' बने लखनऊ के श्री प्रकाश गोविन्द। बहुत बहुत बधाई आपको प्रकाश जी! 10-वें सेगमेण्ट की समाप्ति पर सम्मिलित स्कोर कार्ड कुछ इस तरह का बना...




इस तरह से पूरे 100% अंक अर्जित कर इस दसवें सेगमेण्ट के विजेता बने हैं- 
श्री विजय कुमार व्यास
दूसरे स्थान पर हैं- 

श्री प्रकाश गोविन्द 
और तीसरे स्थान पर अच्छी टक्कर दी- 
श्री पंकज मुकेश ने।
श्री चन्द्रकान्त दीक्षित
 

ने भी अच्छे स्पोर्ट्समैनशिप का परिचय दिया।
आप चारों को बहुत बहुत बधाई। 


और अब तालिका पर नज़र डालने की बारी, यानी कि निर्णायक 'महाविजेता स्कोर कार्ड' पर। 





'महाविजेता स्कोर कार्ड' में नाम दर्ज होने वाले सभी 9 खिलाड़ियों को हार्दिक बधाई हमारी ओर से। आप में से कुछ खिलाड़ी ऐसे हैं जो इस खेल को छोड़ चुके हैं, जैसे कि गौतम केवलिया, रीतेश खरे, सलमन ख़ान, और महेश बसन्तनी। आप सभी को हमने ईमेल के माध्यम से सम्पर्क किया और पाया कि आप महामुकाबले में भाग ले पाने में असमर्थ हैं।

इस तरह से महामुकाबले के लिए शीर्ष के पाँच प्रतियोगी ये रहे...


आप पाँच प्रतियोगियों को बहुत बहुत बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ। अब आप पाँचों के बीच होगा महामुकाबला, और इसी महामुकाबले के परिणाम से तय होगा 'सिने पहेली' का महाविजेता। 'सिने पहेली' महामुकाबले की पहेली प्रस्तुत की जायेगी अगले शनिवार 22 फ़रवरी भारतीय समयानुसार प्रात: 9 बजे। आपके उत्तर एक ही ईमेल में हमें 28 फ़रवरी भारतीय समयानुसार रात 10 बजे तक प्राप्त हो जाने चाहिए। महाविजेता की घोषणा 1 मार्च प्रात: 9 बजे की जायेगी

तो आज बस इतना ही, 'सिने पहेली' प्रतियोगिता से जुड़े सभी प्रतियोगियों और पाठकों को एक बार फिर से धन्यवाद देते हुए, विजेताओं को मुबारक़बाद देते हुए, और महाविजेता के दावेदारों को शुभकामनायें देते हुए आज मैं आपसे विदा लेता हूँ। फिर मुलाक़ात होगी महामुक़ाबले के मैदान पर, ज़रूर पधारियेगा अगले शनिवार सुबह 6 बजे। नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Friday, February 14, 2014

बॉलीवुड में उतरी नूरां बहनें तो शेखर रव्जिवानी भी पहुंचें माईक के पीछे

ताज़ा सुर ताल # 2014-06


खुद गायक सोनू निगम मानते हैं कि संगीतकार विशाल ओर शेखर न सिर्फ एक बहतरीन संगीतकार जोड़ी है बल्कि दोनों ही बहुत बढ़िया गायक भी है. विशाल तो अन्य बड़े संगीतकारों जैसे शंकर एहसान लॉय और विशाल भारद्वाज के लिए भी गायन कर चुके हैं. आज हम सुनेगें, इस जोड़ी के दूसरे संगीतकार की रूमानी गायिकी. दोस्तों क्या आप जानते हैं कि विशाल दादलानी और शेखर रव्जिवानी को प्यार में कभी कभी  के लिए अलग अलग तौर पर संगीतकार चुना गया था, चूँकि दोनों एक दूसरे से परिचित थे तो इन्होने अपनी अपनी धुनों को एक दूसरे के साथ बांटा और इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि वो मिलकर कुछ बड़ा धमाल कर सकते हैं. यहीं से शुरुआत हुई विशाल शेखर की ये जोड़ी. ओम शान्ति ओम  के बाद वो शाहरुख के पसंदीदा संगीतकारों में आ गए, और पिछले ही साल चेन्नई एक्सप्रेस  की कामियाबी ने इस समीकरण को और मजबूत कर दिया. शाहरुख के साथ साथ निर्देशक करण जौहर भी उनके खास मुरीद रहे हैं, करण द्वारा निर्मित बहुत सी फिल्मों में विशाल शेखर सुरों का जादू चला चुके हैं. इसी कड़ी की ताज़ा पेशकश है हँसी तो फँसी  जहाँ विशाल शेखर के साथ जुड़े हैं गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य. शेखर ने इस रोमांटिक गीत के लिए अमिताभ से एक कैची शब्द की फरमाईश की. अमिताभ ने उन्हें शब्द दिया बेतहाशा, मगर तभी उन्हें एक और शब्द भी याद आया जहेनसीब , इस शब्द के आस पास जब शेखर ने धुन संवारी तो उन्होंने बेतहाशा को भी मुखड़े में रखा, क्योंकि अमिताभ का सुझाया ये पहला शब्द भी उन्हें बेहद पसंद आया था. तो लीजिए सुनिए जेहनसीब जिसे गाया है खुद शेखर ने, साथ दिया है चिन्मई श्रीपदा ने.
     

आज के एपिसोड का दूसरा गीत वो है जिसका बहुत दिनों से इन्तेज़ार था, तब से, जब से इरशाद कामिल ने फेसबुक पर इस गीत की रिकॉर्डिंग की खबर दी और नूरां बहनों की तारीफ की थी. नूरां बहनें यानी ज्योति और सुल्ताना नाम की दो कमसिन उम्र गायिकाएं, जिनकी आवाज़ और अदायगी बड़े बड़े सूफी गायकों को भी हैरत में डाल चुकी है. ऐसा लगता है जैसे ये आवाजें कई जन्मों से खलाओं में गूँज रही थी, और सदियों का रियाज़ इन्हें कुदरती तौर पर नसीब हो गया हो. एम् टी वी पर जुगनी  गाकर मशहूर हुई नूरां बहनें सीधे ही रहमान के स्टूडियो में दाखिल हुई और पटखा गुडिये  जैसा अनूठा गीत श्रोताओं के लिए तैयार हो गया. ये है फिल्म हाईवे  के लिए रहमान और इरशाद कामिल का तोहफा. वैसे आपको बताते चलें कि पहले इम्तियाज़ अली की इस नई फिल्म के लिए संगीत के नाम पर सिर्फ पार्श्व संगीत तक सीमित रहने का ही इरादा था, पर सौभाग्य से फिल्म की टीम ने इस फैसले को बदल दिया और अब इस एल्बम में है ९ एकदम ताज़े गीत, जिनका जिक्र हम आगे भी करेगें, फिलहाल सुनिए सूफी संगीत का ये जादू. 


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