Sunday, June 8, 2014

संगीत के प्रचार, प्रसार और संरक्षण में संलग्न एक साधक



स्वरगोष्ठी – 171 में आज

व्यक्तित्व – 1 : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे 

‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आपके प्रिय स्तम्भ की आज से एक नई लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ आरम्भ हो रही है। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम भारतीय संगीत के उच्चकोटि के कलाकार होने के साथ ही संगीत के शास्त्रीय और प्रायोगिक पक्ष के विद्वान पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। वर्ष 1983 से 1993 तक उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में सचिव पद पर रहते हुए उन्होने भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार के साथ ही अभिलेखीकरण का उल्लेखनीय कार्य किया था। आज 80 वर्ष की आयु में भी वे संगीत विषयक विभिन्न कार्यों में सक्रिय हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठकों के लिए सुपरिचित, इसराज और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने श्रीखण्डे जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख किया है। यह भी सुखद संयोग है कि श्रीखण्डे जी दो दिन बाद ही अर्थात 10 जून को अपनी आयु के 80 वर्ष पूर्ण कर 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीखण्डे जी को उनके 81वें जन्मदिवस पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता है।

 


ह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच से शास्त्रीय गायन के उच्चकोटि के कलाकार, संगीत के शास्त्रीय एवं प्रायोगिक पक्ष के मूर्धन्य विद्वान, संगीत के अभिलेखीकरण के विशेषज्ञ और संगीत संस्थाओं के योग्य प्रशासनिक अधिकारी पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व के उल्लेख करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह भी सौभाग्य का विषय है कि उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी मे 10 वर्षों तक श्रीखण्डे जी के साथ कार्य करने का अवसर भी मिला। इस अवधि में संगीत के इस बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में जो कुछ भी जान सका उसे आप सबके बीच बाँट रहा हूँ।

पं. श्रीखण्डे जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद स्थित उरई नामक एक छोटे नगर में 10 जून, 1934 को हुआ था। इनके पिता श्री विश्वास राव श्रीखण्डे ने इनकी सांगीतिक प्रतिभा को पहचान कर उरई के ही शिक्षक पं. प्रभुनाथ मिश्र से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दिलाई। इसके बाद इन्हें गायन की विविध विधाओं और क्लिष्ट रचनाओं की शिक्षा इलाहाबाद के प्रख्यात संगीतज्ञ पं. भोलानाथ भट्ट से प्राप्त हुई। शास्त्रीय गायन की उच्च शिक्षा विश्वविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ (इन्दौर) से इन्हें प्राप्त हुई। उस्ताद अमीर खाँ की रागानुसार सटीक सुरलगाव, मीड़, कण, गमक, मुर्की आदि से युक्त स्वर प्रस्तार एवं अन्यान्य कलात्मक विशेषताओं को इन्होंने अपनी गायकी में आत्मसात किया। युवावस्था में ही अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर आपके गायन की भरपूर प्रशंसा हुई। वर्ष 1958 से 1967 तक आकाशवाणी के दिल्ली, नागपुर और हैदराबाद केन्द्रों पर प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया। 1967 से 1972 तक जम्मू कश्मीर के इन्स्टीच्यूट आफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट में प्रधानाचार्य रहे। 1975 से 1982 के बीच भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की ओर से फीजी के सांस्कृतिक केन्द्र में और फिर उसके बाद मारीशस के महात्मा गाँधी संस्थान में निदेशक पद पर कार्य किया। 1983 में श्रीखण्डे जी ने उतार प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव पद पर कार्यभार ग्रहण किया और 1993 में यहीं से सेवानिवृत्त हुए। यहाँ प्रशासनिक दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्होने अकादमी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलायी। इस अवधि में उन्होने संगीत, नाटक और कथक नृत्य के प्रचार, प्रसार और विकास के अनेक नए कार्यक्रमों को मूर्तरूप दिया। इससे भी बढ़कर कम प्रचलित या लुप्तप्राय संगीत शैलियों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक ढंग से उनका संग्रह और अभिलेखीकरण करा कर अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध बनाने में श्रीखण्डे जी का योगदान स्तुत्य है।

आगे बढ्ने से पहले आइए, श्रीखण्डे जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के शास्त्रीय गायक पक्ष का अवलोकन करते चलें। वर्तमान में श्रीखण्डे जी की आयु 80 वर्ष हो चुकी है। लगभग दो वर्ष पूर्व संगीत-प्रेमियों की एक बैठक में उन्होने राग बागेश्री का गायन प्रस्तुत किया था। अब हम आपको उसी प्रस्तुति का एक अंश सुनवाते हैं। पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे द्वारा प्रस्तुत राग बागेश्री के खयाल की इस प्रस्तुति में तबला संगति अनिल खरे ने और वायलिन संगति श्रीपाद तिलक ने की है।


राग बागेश्री : खयाल तीनताल : ‘बलमा मोरी तोरे संग लागली प्रीत...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे





श्रीखण्डे जी ने अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध करने के लिए शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक, सभी विधाओं के वरिष्ठ संगीतज्ञों को आमंत्रित कर उनकी रिकार्डिंग कराई। श्रीखण्डे जी ऐसे अन्वेषक हैं जो महासागर की अथाह गहराई में प्रवेश करके रत्नों को प्राप्त कर लेते हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत के वाद्यों के विविध पक्षों से जुड़ी जानकारियों एवं दुर्लभ, पारम्परिक रचनाओं की खोज व उनकी रिकार्डिंग कराई और भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ कराया। ध्रुवपद क्षेत्र में स्व. बालजी चतुर्वेदी, स्व. रामचतुर मलिक, स्व. सियाराम तिवारी, स्व. जिया मोहिउद्दीन डागर (रुद्रवीणा), खयाल गायन के क्षेत्र में स्व. काशीनाथ बोडस, स्व. हरिशंकर मिश्र, स्व. मल्लिकार्जुन मंसूर, स्व. जी.एन. नातू, स्व. के.जी. गिण्डे, स्व. रामाश्रय झा आदि, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत के दिग्गज कलाकारों की रिकार्डिंग से अकादमी समृद्ध है। इसी प्रकार श्रीखण्डे जी ने वाद्य संगीत के वरिष्ठ कलाकारों को आमंत्रित कर उनकी वार्ता और प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग कराई। अकादमी में संग्रहीत सांगीतिक सामग्री का अध्ययन कर अनेक शोधछात्र और अध्येता लाभान्वित हो चुके हैं। श्रीखण्डे जी ने अपने कार्यकाल में लगभग 3000 घण्टे की गुणात्मक महत्त्व की विविध पारम्परिक व दुर्लभ सामग्री का संग्रह कराया था।

अभिलेखागार को समृद्ध बनाने के अलावा श्रीखण्डे जी ने कई नए कार्यक्रमों का सूत्रपात और पहले से जारी कई कार्यक्रमों को विस्तार भी दिया था। इनमें अकादमी की सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना, सम्भागीय व प्रादेशिक संगीत प्रतियोगिता, कथक समारोह, नाट्य समारोह, कठपुतली समारोह, अवध संध्या आदि के आयोजन में उनकी दृष्टि की सराहना कलाप्रेमी आज भी करते हैं। कलाप्रेमियों से सीधे संवाद के लिए उन्होने कलामित्र योजना का आरम्भ भी किया था। कलासाधकों और कलाप्रेमियों के बीच उन्होने सेतु बनाने का सफल प्रयास किया। आइए, अब श्रीखण्डे जी की आवाज़ में एक ठुमरी सुनी जाए। पूरब अंग की मिश्र खमाज की इस ठुमरी में तबला संगति सतीश तारे ने और हारमोनियम संगति विवेक दातार ने की है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म के बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमें उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस गीतांश में आपको किस राग का आधार दिख रहा है? राग का नाम लिखिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 169वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य सारंगी के लोक स्वरूप में वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थानी सारंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थान। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से एक नवीन श्रृंखला आरम्भ हुई है। इस श्रृंखला में हम शास्त्रीय संगीत के कुछ ऐसे कलाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच प्रदर्शन के अलावा अन्य क्षेत्रों में यश पाया है। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे संगीतकार की चर्चा करेंगे जिन्होंने फिल्म संगीत को रागों से सुसज्जित कर अपना योगदान किया है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



आलेख : श्रीकुमार मिश्र  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


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