Saturday, June 7, 2014

"रस्म-ए-उल्फ़त" के बाद और कोई गाना मत बजाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 33
 

रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 33वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'दिल की राहें' की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे..." के बारे में.




"मैं यह समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना ज़रूरी है, क्योंकि अगर उसमें इन्सानियत का जज़्बा नहीं है, तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। भगवान ने कुछ फ़नकारों को ज़्यादा ही जज़्बाती बनाया है। यह गाना मुझे बहुत पसन्द है, बहुत ख़ूबसूरती से गाया गया है, सुन के कुछ एक अजीब सी कैफ़ियत तारी होती है। दर्द भरा गाना है, पर दर्द भी इन्सान की ज़िन्दगी का हिस्सा है। इससे इन्सान कब तक दूर भाग सकता है?", ये शब्द निकले थे संगीतकार मदन मोहन के मुख से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़िल्म 'दिल की राहें' की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे" सुनवाने से पहले। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों व ग़ज़लों की बात करें तो ऐसा अक्सर हुआ कि वो फ़िल्में नहीं चली पर उन फ़िल्मों को आज तक अगर लोगों ने याद रखा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके गीतों की वजह से। केवल 70 के दशक की ही अगर बात करें तो 'महाराजा', 'दस्तक', 'माँ का आँचल', 'हँसते ज़ख़्म', 'मौसम' और 'दिल की राहें' कुछ ऐसी फ़िल्में हैं जो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा कमाल नहीं दिखा सके, पर आज इन फ़िल्मों के ज़िक्र पर सबसे पहले इनके गानें याद आते हैं। मदन मोहन की मौसिक़ी और लता मंगेशकर की आवाज़ में जितनी भी ग़ज़लें बनीं हैं, वो सभी एक से बढ़ कर एक है, और उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे ये जन्नत में बन कर धरती पर उतारे गये हैं। इन ग़ज़लों का पूरा श्रेय मदन मोहन और लता जी को दे दें और इनके शायरों को याद न करें, यह बहुत ग़लत बात जो जायेगी। राजा मेहन्दी अली ख़ाँ, राजेन्द्र कृष्ण और मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे ग़ज़लों को मदन मोहन ने सबसे ज़्यादा स्वरबद्ध किया। पर 1973 में दो फ़िल्में ऐसी आईं जिनमें बतौर गीतकार नक्श लायलपुरी साहब ने कमान सम्भाली। ये फ़िल्में थीं 'प्रभात' और 'दिल की राहें'। फ़िल्म 'प्रभात' में लता के गाये कई गीत थे जिनमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है मुजरा गीत "साक़ीया क़रीब आ, नज़र मिला..."। और फ़िल्म 'दिल की राहें' के गीतों और ग़ज़लों के तो क्या कहने! मन्ना डे और उषा मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो, मेरा गीत अमर हो जाये..." और लता मंगेशकर की गायी "रस्म-ए-उल्फ़त..." फ़िल्म की दो श्रेष्ठ रचनायें थीं। इन दो फ़िल्मों के अलावा नक्श साहब ने मदन जी के साथ एक और फ़िल्म के लिए भी गीत लिखे पर वह फ़िल्म नहीं बनी। 

नक्श ल्यायलपुरी और लता
"रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें" ग़ज़ल के बनने की कहानी चौंकाने वाली है। हुआ यूँ कि एक सिचुएशन पर गीत लिखने के लिए मदन मोहन ने नक्श लायलपुरी को एक धुन दे दी थी और नक्श साहब को गीत लिख कर रविवार की सुबह मदन जी के घर ले जाना था। और वह गीत अगले दिन (सोमवार) को रेकॉर्ड होना था क्योंकि लता जी ने डेट दे रखा था। तो नक्श साहब गीत लिख कर मदन मोहन के घर पहुँचे रविवार सुबह 11 बजे। उनका लिखा हुआ गीत मदन जी ने पढ़ा और उनसे कहा कि फ़िल्म के निर्माता (सुल्तान एच. दुर्रानी और एस. कौसर) ने कहा है कि उन्हें अपनी फ़िल्म में मदन मोहन से एक ग़ज़ल चाहिये। अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया, ऐसा निर्माता महोदय ने मदन मोहन से कहा है। तो अब मदन जी भी चाहते हैं कि उसी धुन पर नक्श साहब एक ग़ज़ल लिख दे। अब नक्श साहब मदन जी को ना भी नहीं कह सकते थे, वो दुविधा में पड़ गये। यह तनाव भी था कि अगले ही दिन रेकॉर्ड करना है, अगर लिख ना सके तो क्या होगा! लता जी की डेट बेकार हो जायेगी, वगेरह वगेरह। ये सब सोचते सोचते वो मदन जी के घर से बाहर निकल आये। उन्होंने घड़ी देखा, सुबह के 11 बज रहे थे। उन्होंने सोचा कि अगर वो पेडर रोड से मुलुंड वापस जाकर लिखेंगे तो काफ़ी समय बरबाद हो जायेगा, और फिर वापस भी आना है, इसलिए वो चौपाटी में फुटपाथ के एक कोने में जाकर बैठ गये। और मन ही मन सोचने लगे कि इतने कम समय में लिखें तो लिखें कैसे, गीत को ग़ज़ल बनायें तो बनायें कैसे, इस मुसीबत से निकले तो निकले कैसे? और ये सब सोचते-सोचते उनके मुख से निकल पड़े कि रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे। बस, कलम चलने लगी, कभी रुकती, कभी चलती, कभी वो सोचते, कभी मुस्कुराते, ऐसा करते करते ग़ज़ल पूरी हो गई। और शाम 4 बजे नक्श साहब जा पहुँचे मदन मोहन जी के घर। अगले दिन ग़ज़ल रेकॉर्ड हो गई। लता और मदन मोहन की जोड़ी के ग़ज़लों के बारे में तो सब जानते थे, इस बार नक्श साहब की भी ख़ूब तारीफ़ हुईं। नक्श साहब ने एक मुलाक़ात में बताया था कि बरसों बाद मदन मोहन जी की याद में मुंबई के चेम्बुर में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था जिसमें नक्श साहब को भी आमन्त्रित किया गया था। जब इस ग़ज़ल को बजाया गया, तब किसी ने कहा कि "रस्म-ए-उल्फ़त" के बाद और कोई गाना मत बजाना।

अपने मनचाहे साज़ के साथ मदन जी
मदन मोहन के बारे में गीतकार और शायर नक्श लायल्पुरी के क्या विचार हैं, उन्हीं के शब्दों में पढ़िये - "उनसे मिलने से पहले मैंने जो कुछ भी सुन रखा था मदन मोहन के बारे में, कि वो शॉर्ट-टेम्पर्ड हैं, वगेरह वगेरह, वो सब ग़लत बातें हैं। वो ऐसे पहले संगीतकार थे जिन्होंने मेरे सर पर कभी पहाड़ नहीं रखा। वो गीतकारों और शायरों को छूट देते थे। वो किसी सिटिंग्‍ में ज़्यादा से ज़्यादा 20 मिनट बैठते और मुझे कभी भी किसी गीत को पूरा करने के लिए कभी समय की पाबन्दी नहीं दी। निर्माता जब किसी धुन को सिलेक्ट कर लेते थे, तब मदन जी मुझे बुलाते और समझाते। वो समय के बड़े पाबन्द थे और अगर कोई देर से आया तो वो ग़ुस्सा हो जाते थे। किसी गीत को कम्पोज़ करने के लिए वो 10 मिनट का समय लेते थे। लेकिन जब कोई निर्माता उन्हें साइन करवाने आते तो वो उनसे एक महीने का समय माँग लेते ताकि उन्हें अपना मनपसन्द स्टुडियो, मनपसन्द कलाकार और साज़िन्दों से डेट्स मिल जाये। इन सब चीज़ों के लिए वो किसी की ख़ुशामद करना बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। स्टुडियो, साज़िन्दे और गायक तय हो जाने पर वो पाँच-छह गीत एक के बाद एक रेकॉर्ड कर लेते, एक गीत प्रति दिन के हिसाब से।" नक्श लायलपुरी के उस मुलाक़ात में उन्होंने यह बताया कि मदन मोहन फ़िल्म 'लैला मजनूं' में नक्श साहब को बतौर गीतकार लेना चाहते थे। मदन मोहन साहिर लुधियानवी को नहीं लेना चाहते थे क्योंकि साहिर अपने गीतों में फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते और उधर मदन मोहन की आदत थी कि हर गीत में कुछ न कुछ फेरबदल कर देते थे। पर 'लैला मजनूं' के निर्माता एच. एस. रवैल साहिर के पक्ष में थे, और मदन जी को झुकना पड़ा क्योंकि उन्हें उस वक़्त पैसों को सख़्त ज़रूरत थी अपने लोनावला के बंगले के निर्माण के लिए। 'लैला मजनूं' के रिलीज़ के बाद मदन मोहन जब नक्श लायलपुरी से मिले तो उनसे कहा कि वो 'लैला मजनूं' से भी बड़े फ़िल्म में नक्श साहब से गीत लिखवायेंगे, पर वह दिन आने से पहले ही मदन जी अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। उसी मुलाक़ात में जब नक्श साहब से यह पूछा गया कि मदन जी का कौन सा गीत उन्हें सर्वाधिक पसन्द है, तो उन्होंने फ़िल्म 'अनपढ़' के "आपकी नज़रों ने समझा" की तरफ़ इशारा किया। नक्श साहब ने यह भी बताया कि इसी गीत के मीटर पर उन्होंने फ़िल्म 'दिल की राहें' में ही एक गीत लिखा था "आप की बातें करें या अपना अफ़साना कहें, होश में दोनो नहीं हैं किसको दीवाना कहें"। पर "रस्म-ए-उल्फ़त" ही ज़्यादा मशहूर हुआ।

उस्ताद रईस ख़ाँ

मदन मोहन के गीतों में बहुत बार हमें सुन्दर सितार की ध्वनियाँ सुनने को मिली हैं। अन्य गीतों की तरह "रस्म-ए-उल्फ़त" में भी जो सितार के सुरीले पीस बजे हैं, उन्हें बजाया है सितार के उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने। ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। इस गीत के बाद मदन जी के बहुत सारे यादगार गीतों में उन्होंने सितार बजाया और सितार के इन टुकड़ों ने गीतों को सजाने-सँवारने में अलंकार का काम किया। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टाइमिंग कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लतफ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गईं और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। बस इतनी सी थी आज के गीत की दास्तान। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए। गीत आरम्भ होने से पहले मदन मोहन की ही आवाज़ में वह टिप्पणी भी सुनिए जिसका उल्लेख इस आलेख के आरम्भ में किया गया है। गीत के अन्त में उस्ताद रईस खाँ का बजाया सितार पर झाला भी आप सुन सकते हैं।


फिल्म - दिल की राहें : 'रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...' : गायिका - लता मंगेशकर : संगीत - मदन मोहन : गीत - नक्श लायलपुरी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

2 comments:

vijay kumar sappatti said...

one of my very favorite sir !.... I am in love with Madan mohan compositions !

Madhavi said...

Beautiful Song. Nice Informative Article

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