Saturday, September 8, 2012

'सिने पहेली' में आइए आज मनायें आशा जी का जनमदिन....


सिने-पहेली # 36 


(8 सितंबर, 2012) 


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का आपके मनपसंद स्तंभ 'सिने पहेली' में। आज 8 सितंबर है। आम लोगों के लिए शायद यह दिन स्मरणीय न हो, पर फ़िल्म-संगीत के जानकारों के लिए आज के दिन की अहमियत बहुत है। आज है पार्श्वगायिका आशा भोसले का जनमदिन। इसलिए आज की सिने पहेली आशा जी के नाम। दिल की गहराई में उतरने वाली, हर भाव, हर रंग को उजागर करने वाली आवाज़ है आशा जी की। उनकी आवाज़ की अगर हम तारीफ़ करें तो शायद शब्द भी फीके पड़ जाये उनकी आवाज़ की चमक के सामने। और यह चमक दिन-ब-दिन बढ़ती चली गई है अलग-अलग रंग बदलकर, ठीक वैसे जैसे कोई चित्रकार अलग-अलग रंगों से अपने चित्र को सुंदरता प्रदान करता चला जा रहा हो। आशा जी की आवाज़ ऐसी है कि कभी शराब और सुरूर की मादकता है तो कभी माँ की लोरी की ममता। वेदना और उदासी भरे गीतों में भी जान डाल देती है उनकी आवाज़। उनके पुराने गानों में भावों की गहराई को उन्होंने ऐसी सुंदरता से व्यक्त किया है कि उनकी आवाज़ के भोलेपन से सहसा विश्वास ही नहीं होता कि एक ही आवाज़ में इतनी सारी ख़ूबियाँ हो सकती है। आशा जी को एक बार फिर जनमदिन की शुभकामनाएँ देते हुए आइए शुरू किया जाये आज की सिने पहेली। चलिए पहेली पूछने से पहले महाविजेता बनने के नियमों का दोहराव कर देते हैं...

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। तीसरे सेगमेण्ट की समाप्ति पर अब तक का 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

और अब आज की पहेली...


आज की पहेली : "आलापाशा"


आशा जी को समर्पित आज की सिने पहेली में हम आपको सुनवाने जा रहे हैं एक मेडली। इसमें आपको कुल 10 गीतों की झलकियाँ सुनने को मिलेंगी, और इन झलकियों में कहीं न कहीं आशा जी आलाप ले रही हैं। आपको इन झलकियों को सुन कर पहचानने हैं इन गीतों के मुखड़े। हर सही जवाब के लिए 1 अंक, और आज की पहेली के कुल अंक हैं 10। लीजिए सुनिए यह मेडली और सुलझाइए यह पहेली जिसे हमने शीर्षक दी है 'आलापाशा'।





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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

1. उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

2. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 36" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें।

3. आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 13 सितंबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

4. सभी प्रतियोगियों ने निवेदन है कि सूत्र या हिंट के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के किसी भी संचालक या 'सिने पहेली' के किसी भी प्रतियोगी से फ़ोन पर या ईमेल के ज़रिए सम्पर्क न करे। हिंट माँगना और हिंट देना, दोनों इस प्रतियोगिता के खिलाफ़ हैं। अगर आपको हिंट चाहिए तो अपने दोस्तों, सहयोगियों या परिवार के सदस्यों से मदद ले सकते हैं जो 'सिने पहेली' के प्रतियोगी न हों।


पिछली पहेली के सही जवाब





पिछली पहेली के परिणाम


'सिने पहेली - 35' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. तरुशिखा सुरजन, नई दिल्ली --- 10 अंक

2. अल्पना वर्मा, अल-आइन, यू.ए.ई --- 10 अंक

3. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक

4. महेन्द्र कुमार रंगा, बीकानेर --- 10 अंक

5. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक

6. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक

7. महेश बसंतनी, पिट्सबर्ग, यू.एस.ए --- 10 अंक

8. अदिति चौहान, देहरादून --- 10 अंक

9. अमित चावला, दिल्ली --- 10 अंक

10. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 10 अंक

11. रीतेश खरे, मुंबई --- 10 अंक

12. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 10 अंक

13. मंदार नारायण, कोल्हापुर --- 10 अंक

14. निशांत अहलावत, गुड़गाँव --- 10 अंक

15. सलमन ख़ान, दुबई --- 10 अंक


और यह रहा चौथे सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर-कार्ड...




'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, आशा जी जनमदिन की ढेरों शुभकामनाओं के साथ आपसे विदा ले रहे हैं, नमस्कार!

Friday, September 7, 2012

शब्दों के चाक पर - अंक 14- कहानी माटी की...

माटी सभी की कहानी कहेगी

अगर मिट्टी अपनी कहानी कहने बैठे तो इसकी कहानी में इंसानों की कई पीढियाँ निकल जाएँगी। अनगिनत इंसानों की अनगिनत जीवन-गाथएँ सिमट जाएँगी इसकी एक कहानी में ... और यकीन मानिए मिट्टी हर एक कहानी कहेगी. कुछ ऐसे ही भाव सजा कर लाये हैं हमारे कवि मित्र आज अपने शब्दों में. जिसे आवाज़ दी है अभिषेक ओझा ओर शैफाली गुप्ता ने. स्क्रिप्ट रची है विश्व दीपक ने ओर संयोजन सहयोग है वंदना गुप्ता, अनुराग शर्मा ओर सजीव सारथी का, तो सुनिए सुनाईये ओर छा जाईये.

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)



  या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 
"शब्दों के चाक पर" हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. इस साप्ताहिक कार्यक्रम में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी के फेसबुक ग्रुप में यहाँ जुड़ सकते है.

2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के प्रमुख पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगी. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से यह बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

4. किसी भी जानकारी के लिए आप हमारे संचालक विश्व दीपक जी से इस पते पर संपर्क कर सकते हैं-   vdeepaksingh@gmail.com 

Thursday, September 6, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 13


     
भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आपका स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में प्रत्येक मास के पहले और तीसरे गुरुवार को हम आपके लिए लेकर आते हैं, मूक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर के कुछ रोचक तथ्य और आलेख के दूसरे हिस्से में सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर की कोई उल्लेखनीय संगीत रचना और रचनाकार का परिचय। आज के अंक में हम आपसे इस युग के कुछ रोचक तथ्य साझा करेंगे।


‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले : मंच-नाटक का फिल्मांकन- ‘पुण्डलीक’

भारत में सिनेमा-निर्माण और प्रदर्शन के प्रयास 1896 से ही आरम्भ हुए थे। शुरुआती दौर में भारतीय और विदेशी फिल्मों में मात्र किसी घटना का फिल्मांकन कर कर दिया जाता था। 1899 में सावे दादा के नाम से विख्यात हरिश्चन्द्र सखाराम भटवाडेकर ने इंग्लैंड से सिने-कैमरा मँगवा कर दो पहलवानों के बीच कुश्ती का फिल्मांकन किया था। उस दौर में परदे पर चलती-फिरती देखना एक चमत्कार से कम नहीं था। चमत्कार के आगे कथ्य की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता था। परन्तु यह सिलसिला बहुत आगे तक नहीं चल सका। शीघ्र ही दर्शक इन कथा-विहीन टुकड़े-टुकड़े दास्तानों से ऊब गए। वर्ष 1900 में बम्बई के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर एफ.बी. थानावाला ने तत्कालीन बम्बई शहर के विशिष्ट स्थलों का फिल्मांकन किया और ‘स्प्लेंडिड न्यू व्यू ऑफ बाम्बे’ नामक भारत के प्रथम वृत्त-चित्र का निर्माण किया। फिल्म-दर्शकों के बीच यह प्रयोग भी क्षणिक सफलता का कारक रहा।
दादा साहेब तोरने

मूक फिल्मों के इस दौर में कथा-चित्र की ओर बढ़ते कदम के अन्तर्गत 1903 में कलकत्ता के हीरालाल और मोतीलाल सेन बन्धुओं ने बांग्ला के सुविख्यात रंगकर्मी अमरनाथ दत्त के सहयोग से कुछ ऐसे मंच-नाटकों का फिल्मांकन किया था, जो जन-जन में लोकप्रिय थे। परन्तु यह प्रयोग अधिक सफल नहीं रहा। इस प्रयोग को 1912 में बम्बई में नारायण गोविन्द चित्रे ने दुहराया। उन्होने आर.पी. टिपणीस और कैमरामैन जॉन्सन के सहयोग से अत्यन्त चर्चित मंच-नाटक ‘पुण्डलीक’ का फिल्मांकन किया। नाटक के निर्देशक रामचन्द्र तोरने उपाख्य दादा साहेब तोरने ने किया था। बम्बई के मंगलदास वाड़ी में संगीत मंडली नामक एक व्यावसायिक नाट्य संस्था ने ‘पुण्डलीक’ का मंचन किया था। इस पूरे नाटक का 8000 फुट लम्बा फिल्मांकन किया गया था। 18मई, 2013 को इस फिल्म का प्रदर्शन गिरगाँव स्थित कोरोनेशन थियेटर में किया गया था। इस बार यह प्रयोग काफी सफल रहा। कथा-चित्र की ओर बढ़ते भारतीय सिनेमा के कदमों में फिल्म ‘पुण्डलीक’ की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। परन्तु भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह फिल्म एक कथा-चित्र के रूप में दर्ज़ नहीं हुई। कारण स्पष्ट था, पूरी फिल्म मंच-नाटक के शिल्प में थी। इसी वर्ष एस.एन. पाटनकर ने एक पौराणिक प्रसंग पर लगभग 1000 फुट लम्बाई के लघु कथा-चित्र ‘सावित्री’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के निर्माण में पाटनकर के सहयोगी थे, ए.पी. करंदीकर और वी.पी. दिवेकर। परन्तु अनेक तकनीकी कारणों से इस फिल्म का प्रदर्शन ही नहीं हो सका।

सवाक युग के धरोहर : रूढ़ियों के विरुद्ध- 'चण्डीदास'

मूक फिल्मों के युग में अधिकतर फिल्में पौराणिक या अत्यन्त लोकप्रिय कथानकों पर बनीं। परन्तु आवाज़ के आगमन के साथ फ़िल्मकारों का ध्यान पराधीन भारत की विसंगतियों की ओर गया। वाणीयुक्त सिनेमा के आरम्भिक दौर में ऐसी कई फिल्में बनी, जिनमें सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध जनमानस को जगाने का प्रयास किया गया था। 1931 में बनी फिल्म ‘आलमआरा’ से भारतीय फिल्मों में आवाज़ आई और 1932 में कलकत्ता की न्यू थियेटर कम्पनी ने बांग्ला भाषा में फिल्म ‘चण्डीदास’ का निर्माण किया। फिल्म के इस बांग्ला संस्करण का निर्देशन देवकी बोस ने किया था और नायक चण्डीदास की भूमिका में दुर्गादास बनर्जी को प्रस्तुत किया गया था। फिल्म को आशातीत सफलता मिली। कलकत्ता के चित्रा थियेटर में यह फिल्म निरन्तर 64 सप्ताह तक चली। इस सफलता से उत्साहित होकर न्यू थियेटर ने 1934 में फिल्म ‘चण्डीदास’ के हिन्दी संस्करण का निर्माण किया। हिन्दी संस्करण का निर्देशन नितिन बोस ने किया था और फिल्म के नायक की भूमिका में थे, कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल। गायक और अभिनेता के रूप में यह सहगल की पहली बड़ी सफलता थी। फिल्म ‘चण्डीदास’ की चर्चा जारी रहेगी, लेकिन पहले इस फिल्म का एक मनमोहक गीत ‘देखत वाको ही रूप...’ सहगल साहब की आवाज़ में सुनते हैं।

फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘देखत वाको ही रूप...’ : के.एल. सहगल


फिल्म ‘चण्डीदास’ के कथानक की पृष्ठभूमि में पन्द्रहवीं शताब्दी के बंगाल का परिवेश है, जब राधा-कृष्ण को आराध्य मान कर वैष्णव सम्प्रदाय का विस्तार हो रहा था। फिल्म का नायक चण्डीदास शिक्षक और कवि के साथ-साथ वैष्णव सम्प्रदाय का प्रचारक भी है। उच्च कुल के नायक के साथ अस्पृश्य जाति की नायिका के आत्मिक प्रेम सम्बन्धों के माध्यम से फिल्म में तत्कालीन समाज मे व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध घोष किया गया था। नायिका रामी की भूमिका में अभिनेत्री उमाशशि ने अभिनय किया था। तत्कालीन आवश्यकता के अनुसार अपने हिस्से के गीतों को उमाशशि ने ही स्वर दिया था। फिल्म में उनके गाये एक गीत को पहले हम सुनते हैं।

फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘बसन्त ऋतु आई आली...’ : उमाशशि
आर.सी. बोराल


फिल्म ‘चण्डीदास’ के संवाद और गीत-लेखन तत्कालीन पारसी नाटकों के विख्यात लेखक आगा हस्र कश्मीरी ने किया था। गीतों में 15वीं शताब्दी के बंगाल में प्रचलित वैष्णव संगीत की छाया दिखाने का प्रयास भी किया गया था। विशेष रूप से सहगल के गाये गीतों में इसकी झलक मिलती है। फिल्म का संगीत राय चन्द्र (आर.सी.) बोराल ने तैयार किया था। यह निर्विवाद है कि बोलती फिल्मों के आरम्भिक दौर के संगीत में मधुर आर्केस्ट्रा के प्रयोग का श्रेय आर.सी. बोराल को ही दिया जाता है और वे इसके हकदार भी थे। फिल्म में के.एल. सहगल और उमाशशि के अलावा पहाड़ी सान्याल, अभि सान्याल, एच. सिद्दीकी, एम. अंसारी, नवाब, अनवरी बाई और पार्वती ने अभिनय किया था। तमाम संघर्षों के बाद अन्ततः चण्डीदास (के.एल. सहगल) और रामी (उमाशशि) का पुनर्मिलन होता है और वे अपने मित्र बैजू (पहाड़ी सान्याल) और उसकी पत्नी कुसुम (सम्भवतः पार्वती) के साथ रूढ़ियों के विरुद्ध प्रेम के विजय-गीत गाते हुए गाँव का परित्याग कर देते हैं। फिल्म के इस गीत में इन्हीं चारो कलाकारों के स्वर हैं, जिसे अब हम आपको सुनवा रहे हैं।

फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘प्रेम की जय जय...’ : के.एल. सहगल, उमाशशि, पहाड़ी सान्याल और पार्वती


‘चण्डीदास’ वाणीयुक्त सिनेमा के प्रारम्भिक दौर की एक सफलतम फिल्म थी। यह हमारा सौभाग्य है कि रूढ़िग्रस्त समाज को प्रेरित और आन्दोलित करने में सफल इस फिल्म के कुछ गीत आज भी एक अमूल्य धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इस फिल्म को इस बात का श्रेय भी प्राप्त है कि आगे चल कर इसी विषय पर अशोक कुमार और देविका रानी अभिनीत फिल्म ‘अछूत कन्या’ का निर्माण भी हुआ था। इस फिल्म की चर्चा हम अगले किसी अंक में करेंगे। आज के अंक से यहीं विराम लेने के लिए अब हमें अनुमति दीजिए।

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का दूसरा गुरुवार होगा और इस सप्ताह हम प्रस्तुत करेंगे एक प्रतियोगी संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

कृष्णमोहन मिश्र

Wednesday, September 5, 2012

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट -वर्षा कालीन राग (पहला भाग)

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट के इस ग्यारहवें एपिसोड के साथ आज हम अपने बोर्ड में शामिल कर रहे हैं हमसे जुडी नयी हमसफ़र संज्ञा टंडन जी को. संज्ञा जी १९७७ में रायपुर आकाशवाणी केंद्र की पहली भुगतान प्राप्त बाल कलाकार हैं. १९८६ से १९८८ तक आप युववाणी उद्गोषिका रही,  तत्पश्चात १९९१ से बिलासपुर आकाशवाणी की निमेत्तिक उद्गोषिका हैं. संज्ञा जी ने छत्तीसगढ़ के लगभग सभी आकशवाणी केन्द्रों के लिए प्रायोजित कार्यक्रमों का निर्माण किया है. हर प्रकार के कार्यक्रमों के मंच संचालन में माहिर संज्ञा जी एक सफल ऑनलाईन वोईस ओवर आर्टिस्ट भी हैं. आईये सुनें उनकी आवाज़ में आज वर्षा कालीन राग कार्यक्रम का ये पहला भाग. स्क्रिप्ट है स्वर गोष्टी के संचालक कृष्णमोहन मिश्र जी की.


Tuesday, September 4, 2012

वो लोग ही कुछ और होते हैं - अभिषेक ओझा

'बोलती कहानियां' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने उषा महाजन की कहानी "बचपन" का पॉडकास्ट शेफाली गुप्ता की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अभिषेक ओझा की कहानी "वो लोग ही कुछ और होते हैं", आवाज़ अनुराग शर्मा की।

कहानी "वो लोग ही कुछ और होते हैं" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 59 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट ओझा-उवाच पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

वास्तविकता तो ये है कि किसे फुर्सत है मेरे बारे में सोचने की, लेकिन ये मानव मन भी न!
~ अभिषेक ओझा

हर मंगलवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

"उस दुपहरी की लू में लोगों को काम करते देख थोड़ी शर्मिन्दगी तो जरुर हुई और शायद यही कारण था कि मैंने उस आदमी पर ध्यान दिया।"
(अभिषेक ओझा की "वो लोग ही कुछ और होते हैं" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

#29th Story, Vo Log: Abhishek Ojha/Hindi Audio Book/2012/29. Voice: Anurag Sharma

Monday, September 3, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१४) जलपरी - द डेजर्ट मरमेड, और आपकी बात

संगीत समीक्षा - जलपरी - द डेजर्ट मरमेड




इस सप्ताह प्रदर्शित होने वाली फिल्मों में एक बाल फिल्म है 'जलपरी: The Desert Mermaid".हिंदी फिल्मों में ऐसा कम ही होता है जब बच्चों के लिए बनी किसी फिल्म को बच्चों के साथ साथ व्यस्क दर्शकों का प्यार भी मिले. इसकी एक वजह ये भी है कि बच्चों के लिए बनी फिल्मों को ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय रूप से प्रस्तुत किया जाता है.पिछले कुछ समय से इसमें परिवर्तन आया है और बच्चों की फिल्मों के स्वरुप को बदला है. इसी कड़ी में एक और कड़ी जोड़ती है 'जलपरी'.

जलपरी का निर्देशन करा है 'आई एम कलाम' के निर्देशक नीला माधब पांडा ने.फिल्म कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित है जो आज भी भारत के कई राज्यों में की जाती है.फिल्म की कहानी लिखी है दीपक वेंकटेशन ने. इसका संगीत दिया है आशीष चौहान त और MIDIval Punditz के नाम से मशहूर दिल्ली बेस्ड  Indian fusion group ने. इस  fusion group के कलाकार हैं गोरव राणा और तपन राज. इस फिल्म का कांस फिल्म समारोह में प्रदर्शन हो चुका है.


इस फिल्म का पहला गाना है 'बरगद'. इसे गया है गुलाल फिल्म से चर्चा में आये पियूष मिश्रा ने. इस एल्बम का ये सबसे बढ़िया गाना है. इसे बात आप जितनी बार सुनेंगे हर बार कहीं खो जायेंगे. इस गाने को लिखा भी पियूष मिश्रा ने ही है और संगीतबद्ध भी करा है. ये गाना मंत्रमुग्ध कर देता है. इस गाने को सुनकर आपको गुलाल फिल्म का 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए' याद आ सकता है.


इस एल्बम का दूसरा गाना हाथ में थारी साजे चूड़ा गाया है  रिंकू ने. इस गाने में मंजीरे और घड़े का खूब इस्तेमाल हुआ है. यह गाना राजस्थानी लोक संगीत पर आधारित है. ठेठ गवनई अंदाज में इस गाने को गाया गया  है.

इस एल्बम में कुल मिलाकर तीन गाने हैं. तीसरा गाना नीली नीली खिली सी दुनिया गाने को बोल दिए हैं शुभा मुद्गल ने. इस गाने के बोल लिखे हैं प्रोतीक मजूमदार ने और संगीत दिया है MIDIval Punditz ने.

इस एल्बम में संगीत और बोल दोनों मिलाकर बेहतरीन हैं. इस एल्बम को रेडिओ प्लेबैक इंडिया देता है ४.८ की रेटिंग ५ में से.




और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Sunday, September 2, 2012

आशा भोसले : ८०वें जन्मदिवस पर एक स्वरांजलि



स्वरगोष्ठी – ८६ में आज

फिल्म संगीत को विविध शैलियों से सजाने वाली कोकिलकंठी गायिका

संगीत के क्षेत्र में ऐसा उदाहरण बहुत कम मिलता है, जब किसी कलाकार ने मात्र अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लीक से अलग हट कर एक ऐसा मार्ग चुना हो, जो तत्कालीन देश, काल और परिवेश से कुछ भिन्न प्रतीत होता है। परन्तु आगे चल कर वही कार्य एक मानक के रूप में स्थापित हो जाता है। फिल्म संगीत के क्षेत्र में आशा भोसले इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। आगामी ८सितम्बर को विश्वविख्यात पार्श्वगायिका आशा भोसले का ८०वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर के लिए आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने उनके गाये कुछ राग आधारित गीतों का चयन किया है। ये गीत उनकी बहुआयामी गायकी को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।

आज की चर्चित पार्श्वगायिका आशा भोसले का जन्म ८सितम्बर, १९३३ को महाराष्ट्र के सांगली में मराठी रंगमंच के सुप्रसिद्ध अभिनेता और गायक दीनानाथ मंगेशकर के घर दूसरी पुत्री के रूप में हुआ था। दीनानाथ जी की बड़ी पुत्री और आशा भोसले की बड़ी बहन विश्वविख्यात लता मंगेशकर हैं, जिनका जन्म २८सितम्बर, १९२९ को हुआ था। दोनों बहनों की प्रारम्भिक संगीत-शिक्षा अपने पिता से ही प्राप्त हुई। अभी लता की आयु मात्र १३ और आशा की ९ वर्ष थी, तभी इनके पिता का देहान्त हो गया। अब परिवार के भरण-पोषण का दायित्व इन दोनों बहनों पर आ गया। अपनी बड़ी बहन लता के साथ आशा भी फिल्मों में अभिनय और गायन करने लगीं। आशा भोसले (तब मंगेशकर) को १९४३ में मराठी फिल्म ‘माझा वाल’ में संगीतकार दत्ता डावजेकर ने गायन का अवसर दिया। इस फिल्म के एक गीत- ‘चला चला नव बाला...’ को उन्होने अकेले आशा से ही नहीं, बल्कि चारो मंगेशकर बहनों से गवाया। भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में यह गीत चारो मंगेशकर बहनों द्वारा गाये जाने के कारण तो दर्ज़ है ही, आशा भोसले के गाये पहले गीत के रूप में भी हमेशा याद रखा जाएगा। मात्र दस वर्ष की आयु में फिल्मों में पदार्पण तो हो गया, किन्तु आगे का मार्ग इतना सरल नहीं था।

आशा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हमारी यह चर्चा जारी रहेगी, इस बीच आज की आशा भोसले की गायन क्षमता का एक कम चर्चित पक्ष आपके सम्मुख रखना चाहता हूँ। विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने १९९५ में आशा जी को कैलीफोर्निया बुलवाया। खाँ साहब ने सरोद-वादन और गायन की जुगलबन्दी पर एक रिकार्ड बनाने की योजना बनाई थी। इस रिकार्ड में ११ विभिन्न रागों की बन्दिशों को शामिल किया गया था। आशा जी के लिए यह सम्मान की बात थी कि खाँ साहब ने इस कार्य के लिए उन्हें आमंत्रित किया। बाद में इस जुगलबन्दी का यह रिकार्ड सर्वत्र प्रशंसित हुआ और ग्रेमी पुरस्कार के लिए नामांकित भी हुआ। आइए, अब हम इसी रिकार्ड से उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद-वादन और आशा भोसले के गायन की जुगलबन्दी से सुसज्जित राग मियाँ की मल्हार का तराना सुनते हैं। यह तराना तीनताल में निबद्ध है।

राग मियाँ की मल्हार : सरोद-गायन जुगलबन्दी : उस्ताद अली अकबर खाँ और आशा भोसले



१९४८ में संगीतकार हंसराज बहल के निर्देशन में आशा भोसले को पहली बार हिन्दी फिल्म ‘चुनरिया’ का गीत ‘सावन आया आया रे...’ गाने का अवसर मिला। यह गीत उन्होने ज़ोहरा बाई और गीता राय के साथ गाया था। आशा जी से एकल गीत गवाने का श्रेय भी हंसराज बहल को ही दिया जाएगा, जिन्होने १९४९ में फिल्म ‘रात की रानी’ का गीत- ‘हैं मौज में अपने बेगाने, दो चार इधर दो चार उधर...’ गाने का अवसर दिया। १९५० के दशक में उन्हें ए.आर. कुरेशी (विख्यात तबला वादक उस्ताद अल्लारक्खा खाँ), सज्जाद हुसेन, गुलाम मोहम्मद आदि के संगीत निर्देशन में कुछ फिल्में मिली, किन्तु इनमें से अधिकतर फिल्में चली नहीं। इसी बीच आशा जी ने अपने परिवारवालों की इच्छा के विरुद्ध जाकर मात्र १६ वर्ष की आयु में अपने ३१ वर्षीय प्रेमी गणपत राव भोसले से विवाह कर लिया। यह विवाह सफल नहीं रहा और लगभग एक दशक के कलहपूर्ण वैवाहिक जीवन का १९६० में सम्बन्ध-विच्छेद हो गया। इसके साथ ही तत्कालीन पार्श्वगायिकाओं के बीच स्वयं को स्थापित करने का संघर्ष भी जारी था।

आशा जी की संघर्षपूर्ण संगीत-यात्रा को यहाँ पर थोड़ा विराम देकर आइए, सुनते है, उनकी प्रतिभा का अतुलनीय उदाहरण। १९८७ में गीतकार गुलजार, संगीतकार राहुलदेव बर्मन और गायिका आशा भोसले की प्रतिभाओं के मेल से एक अनूठा अल्बम ‘दिल पड़ोसी है’ जारी हुआ था। इस अल्बम का एक गीत ‘भीनी भीनी भोर आई...’ आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। यह रचना राग मियाँ की तोड़ी, तीनताल में बाँधी गई है।

राग मियाँ की तोड़ी : ‘भीनी भीनी भोर आई...’ : स्वर - आशा भोसले



छठे दशक के आरम्भ में पार्श्वगायन के क्षेत्र में गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर का वर्चस्व था। इन गायिकाओं के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए आशा भोसले को हर कदम पर परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ा। इस दौरान उन्होने १९५२ में दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म ‘संगदिल’, १९५३ में विमल राय निर्देशित फिल्म ‘परिणीता’ और १९५४ में राज कपूर की फिल्म ‘बूट पालिश’ के गीतों को अपेक्षाकृत बेहतर गाया था, किन्तु उनकी प्रतिभा को सही पहचान तब मिली जब संगीतकार ओ.पी. नैयर ने १९५६ की फिल्म ‘सी.आई.डी.’ में उन्हें गाने का अवसर दिया। इस फिल्म का एक गीत ‘लेके पहला पहला प्यार...’ आशा भोसले ने मोहम्मद रफी और शमशाद बेगम के साथ मिल कर गाया था। उन दिनों यह गीत गली-गली में गूँजा था। इसी के बाद १९५७ में ओ.पी. नैयर के संगीत से सजी बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ में भी आशा भोसले को गाने अवसर मिला। इस फिल्म के प्रदर्शित होते ही आशा भोसले की पहचान प्रथम श्रेणी की गायिकाओं में होने लगी। फिल्म ‘नया दौर’ में आशा भोसले ने मोहम्मद रफी के साथ ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी...’, ‘साथी हाथ बढ़ाना...’, ‘माँग के साथ तुम्हारा...’ तथा शमशाद बेगम के साथ ‘रेशमी सलवार कुर्ता जाली का...’ जैसे लोकप्रिय गीत गाये थे।

आशा भोसले की संगीत-यात्रा की इस संक्षिप्त गाथा को एक बार फिर विराम देकर अब हम आपको उनका गाया एक ऐसा गीत प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे उनके अनुज हृदयनाथ मंगेशकर ने फिल्म ‘लेकिन’ के लिए संगीतबद्ध किया है। १९९१ में प्रदर्शित इस फिल्म के गीत गुलजार ने रचे और इस गीत को हृदयनाथ मंगेशकर ने राग विलासखानी तोड़ी के सुरों से सजाया है। गीत के आरम्भ में आलाप और अन्त में तराना गायन में सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक सत्यशील देशपाण्डे का स्वर है।

राग विलासखानी तोड़ी : फिल्म लेकिन : ‘झूठे नैना बोलें साँची बतियाँ...’ : आशा भोसले और सत्यशील देशपाण्डे



आशा भोसले के जीवन में चार फिल्मों का महत्त्व ‘मील के पत्थर’ के रूप में है। ये फिल्में हैं- नया दौर- १९५७, तीसरी मंज़िल- १९६६, उमराव जान- १९८१ और रँगीला- १९९५। इन फिल्मों के संगीतकार ओ.पी. नैयर, राहुलदेव बर्मन, ख़ैयाम और ए.आर. रहमान के संगीतबद्ध गीतों को गाकर उन्होने फिल्म संगीत के अलग-अलग युगों और शैलियों का प्रतिनिधित्व किया। राहुलदेव बर्मन से तो आगे चल कर १९८० में उन्होने दूसरा विवाह किया और उसे अन्त तक निभाया। संगीतकार रवि के अनेक गीतों को आशा भोसले ने अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। १९५५ की फिल्म ‘वचन’ का गीत- ‘चन्दा मामा दूर के...’ तो आज भी श्रेष्ठ बाल-गीत के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा रवि के संगीत निर्देशन में आशा जी ने घराना, दिल्ली का ठग, गृहस्थी, फूल और पत्थर, काजल आदि फिल्मों में अत्यन्त लोकप्रिय गीतों को स्वर दिया। आइए, अब हम रवि का संगीतबद्ध किया, आशा जी का गाया, फिल्म काजल का भक्ति-गीत- ‘तोरा मन दर्पण कहलाए...’ सुनते हैं। १९६५ में प्रदर्शित इस फिल्म में संगीतकार रवि ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित स्वरों में गीत को पिरोया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत के भक्ति-रस का आप आस्वादन कीजिए और आशा जी को उनके ८०वें जन्मदिवस पर रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए मुझे ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग दरबारी कान्हड़ा : फिल्म काजल : ‘तोरा मन दर्पण कहलाए...’ : आशा भोसले



आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ९०वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१_ संगीत की यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२_ ताल की पहचान कीजिए और हमे ताल का नाम भी बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८८वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के ८४वें अंक की पहेली में हमने आपको सितार-वादक उस्ताद विलायत खान को एक मंच प्रदर्शन के दौरान एक बन्दिश गाते हुए सुनवाया था और आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग हमीर। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। इन्हें मिलते हैं २-२ अंक। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में रागदारी संगीत की विख्यात विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे का हम जन्मदिवस मनाएँगे और उन्हीं का संगीत सुन कर अपनी शुभकामनाएँ अर्पित करेंगे। आप सब संगीत-प्रेमी इस अनुष्ठान में सादर आमंत्रित हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० बजे आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

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