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तू ही तो है....एक आशिक के अल्फ़ाज़ उसकी महबूबा के नाम

Season 3 of new Music, Song # 08 आज आवाज़ महोत्सव 2010 के आठवें गीत की बारी है। हम इन दिनों अपने श्रोताओं को प्रत्येक शुक्रवार एक ताज़ा गीत सुनवा रहे हैं। इस बार हम लाये हैं युवा गीतकार और संगीतकार जोड़ी प्रदीप-सागर द्वारा बना एक गीत। आवाज़ के श्रोता इस जोड़ी से पहले से परिचित हैं, जब इन्होंने ए आर रहमान को औस्कर मिलनी की बधाइयाँ एक गीत रचकर दी थी। इस बार के गीत में खास बात यह है कि इसे गाया भी खुद संगीतकार सागर पाटिल ने ही है। यह गीत भी पूरी तरह से इंटरनेटीय जुगलबंदी से बना है। गीत के बोल - एक अधूरी सी ख्वाहिश हो तुम , नई आज़ादी भी … कुछ सुनी कहानी हो तुम , नई पुरवाई सी … मै हर पल खुश हूँ बहुत , तू नसीब मेरे दिल के है … मै रहूँ जब भी जहाँ , तू करीब मेरी धुन के है … बस खुश है ये लम्हा तू जो है , तू ही तो है … अब न रहूँ मै तन्हा तू जो है , तू ही तो है … हर पल तेरा साथ है पाया , ग़म की सूनी राहों मे … ये दिल मंज़र भूल न पाया, तेरी मीठी बातों मे … तू हसीं है मेह्ज़बिं है, मीत है तू मेरे ख्वाबों सी साथ रहे तू संग चले तू दिल ने ये बस चाहा. बस खुश है ये लम्हा तू जो है , तू ही तो है … अब न...

फिल्मों गीतों की दास्ताँ गीता के जिक्र बिना कैसे पूरी हो...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ३० 'ओ ल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज वह गीत जिस गीत के बनने के बाद से गीता दत्त ओ.पी. नय्यर साहब को बाबूजी कह कर बुलाया करती थीं। आप समझ चुके होंगे, जी हाँ, "बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना"। उन दिनों गीता दत्त के गाए इस तरह के नशीले अंदाज़ वाले गीतों को काफ़ी बोल्ड समझा जाता था। कई बार तो सेन्सर बोर्ड की भी आपत्ति का सामना करना पड़ा है, जैसे कि एक बार हुआ था "जाता कहाँ है दीवाने, सब कुछ यहाँ है सनम" गीत को लेकर। आज के दौर में यह वाक़ई अजीब सा लगता है सोच कर! तो साहब मजरूह सुल्तानपुरी, ओ. पी. नय्यर, और गीता दत्त, ५० के दशक के मध्य भाग में इस तिकड़ी ने फ़िल्म संगीत जगत में जैसे हंगामा ही खड़ा कर दिया था। अपने शुरुआती दिनों में गीता दत्त को केवल भक्ति रचनाएँ ही गाने को मिलते थे। उनकी आवाज़ में भक्ति गीत बेहद सुदर जान पड़ते। ऐसा लगने लगा था कि गीता जी की प्रतिभा को भक्ति रस के खाँचे में ही क़ैद कर दिया जाएगा। लेकिन संगीतकार ओ. पी. नय्यर ने पहली बार अपनी पहली ही फ़िल्म 'आसमान' में गीता जी से गानें गवाए और यहा~म से शुरु हु...

भारतीय और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, दोनों में ही माहिर थे सलिल दा

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २९ 'ओ ल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज प्रस्तुत है गीतकार योगेश का लिखा, सलिल चौधरी का संगीतबद्ध किया हुआ फ़िल्म 'छोटी सी बात' का शीर्षक गीत। इस गीत को आप '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में सुन चुके हैं। गीतकार योगेश द्वारा प्रस्तुत 'जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं - "मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद मुझे लखनऊ छोड़ना पड़ा। हमारे एक आत्मीय संबंधी बम्बई में फ़िल्म लाइन में थे, सोचा कि कहीं ना कहीं लगा देंगे, पर ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। बल्कि मेरा एक दोस्त जो मेरे साथ क्लास-५ से साथ में है, वह मेरे साथ बम्बई आ गया। उसी ने मुझसे कहा कि तुम्हे फ़िल्म-लाइन में ही जाना है। यहाँ आकर पहले ३ सालों तक तो भटकते रहे। ३ सालों तक कई संगीतकारों से 'कल आइए परसों आइए' ही सुनता रहा। ऐसे करते करते एक दिन रोबिन बनर्जी ने मुझे बुलाया और कहा कि एक लो बजट फ़िल्म है, जिसके लिए मैं गानें बना रहा हूँ। एक साल तक हम गानें बनाते रहे और गानें स्टॊक होते गए। तो जब 'सखी रॊबिन' फ़िल्म के लिए निर्माता ने गानें मँगवाए, एक ही दिन...

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं.. मेहदी साहब के सुपुत्र ने कुछ इस तरह उभारा फ़राज़ की ख्वाहिशों को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८४ पा किस्तान से खबर है कि अस्वस्थ होने के बावजूद मेहदी हसन एक बार फिर अपनी जन्मभूमि पर आना चाहते हैं। राजस्थान के शेखावटी अंचल में झुंझुनूं जिले के लूणा गांव की हवा में आज भी मेहदी हसन की खुशबू तैरती है। देश विभाजन के बाद लगभग २० वर्ष की उम्र में वे लूणा गांव से उखड़ कर पाकिस्तान चले गये थे, लेकिन इस गांव की यादें आज तक उनका पीछा करती हैं। वक्त के साथ उनके ज्यादातर संगी-साथी भी अब इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक आज भी महसूस की जा सकती है। छूटी हुई जन्मस्थली की मिट्टी से किसी इंसान को कितना प्यार हो सकता है, इसे १९७७ के उन दिनों में झांक कर देखा जा सकता है, जब मेहदी हसन पाकिस्तान जाने के बाद पहली बार लूणा आये और यहां की मिट्टी में लोट-पोट हो कर रोने लगे। उस समय जयपुर में गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर आये थे और उनकी इच्छा पर उन्हें लूणा गांव ले जाया गया था। कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ़ रहा था, तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। काफिला थम गया। सड़क किनारे एक टीले पर छो...

प्रेम में आपसी छेड छाड, नोंक झोंक आदि रहा फ़िल्मी युगल गीतों का विषय अमूमन

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २८ 'ओ ल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज हमने जिस गीत का रिवाइव्ड वर्ज़न शामिल किया है, उसका ऒरिजिनल वर्ज़न तो अभी इस महफ़िल में बजना बाक़ी है। बड़ा ही प्यारा युगल गीत है फ़िल्म 'मॊडर्ण गर्ल' का, जिसे सुमन कल्याणपुर और मुकेश ने गाया था। आपको याद होगा यह गीत कि जिसमें नायक नायिका को थोड़ी देर और ठहरने का आग्रह कर रहा है - "ये मौसम रंगीन समा, ठहर ज़रा ओ जानेजाँ, तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार है, तो फिर कैसा शर्माना"। नायिका पूरी शालीनता बनाए रखते हुए जवाब देती है कि "रुक तो मैं जाऊँ जानेजाँ, मुझको है इंकार कहाँ, तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार सनम न बन जाए अफ़साना"। इस भाव और सिचुयशन पर और भी बहुत से गीत बने हैं, जिनके बारे में हम विस्तृत चर्चा उस दिन करेंगे जिस दिन हम इस गीत का ऒरिजिनल वर्ज़न सुनेंगे। आज बस इतना ही बता रहे हैं कि इस गीत को लिखा है गुलशन बावरा ने और इसके संगीतकार हैं रवि। गीत फ़िल्माया गया था प्रदीप कुमार और साईदा ख़ान पर। तो इस गीत को सुनने से पहले बस दो शब्द गुलशन बावरा से जुड़े हुए. गुलशन बावरा का जन्म शेखपुरा पंजाब में ह...

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं.. लोक, शास्त्रीय और पाश्चात्य-संगीत की मोहक जुगलबंदी का नाम है "राजनीति"

ताज़ा सुर ताल १९/२०१० विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों, 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़ी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। आज जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा हम करने जा रहे हैं वह है प्रकाश झा की अपकमिंग् फ़िल्म 'राजनीति'। १० बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश झा ने हमेशा ही अपने फ़िल्मों में समाज और राजनीति के असली चेहरों से हमारा बावस्ता करवाया है। और 'राजनीति' भी शायद उसी जौनर की फ़िल्म है। सुजॊय - हाँ, और सुनने में आया है कि 'राजनीति' की कहानी जो है वह सीधे 'महाभारत' से प्रेरित है। दर-असल यह एक ऐसी औरत के सफर की कहानी है जो भ्रष्टाचार से लड़ती हुईं देश की प्रधान मंत्री बन जाती हैं। कैटरीना कैफ़ ने ही यह किरदार निभाया है और ऐसा कहा जा रहा है कि यह चरित्र सोनिया गांधी से काफ़ी मिलता-जुलता है, वैसे कैटरीना का यह कहना है कि उन्होंने प्रियंका गाँधी के हावभाव को अपनाया है। ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर न जाते हुए आइए अब सीधे फ़िल्म के संगीत पक्ष पर आ जाते हैं। विश्व दीपक - लेकिन उससे पहले कम से कम हम इतना ज़रूर बता दें कि 'राजनीति' में कैटरीना कैफ़ के अ...

नौशाद - शकील की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को जन जन का संगीत बनाया उसका सरलीकरण करके

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २७ 'ओ ल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज प्रस्तुत है शक़ील - नौशाद की एक रचना जिसे फ़िल्म के लिए मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। फ़िल्म 'दुलारी' का यह गीत है "सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे"। १९४९ का साल शक़ील-नौशाद के लिए एक सुखद साल रहा। महबूब ख़ान की फ़िल्म 'अंदाज़', ताजमहल पिक्चर्स की फ़िल्म 'चांदनी रात', तथा ए. आर. कारदार साहब की दो फ़िल्में 'दिल्लगी' और 'दुलारी' इसी साल प्रदर्शित हुई थी और ये सभी फ़िल्मों का गीत संगीत बेहद लोकप्रिय सिद्ध हुआ था। आज ज़िक्र 'दुलारी' का। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुरेश, मधुबाला और गीता बाली। फ़िल्म का निर्देशन कारदार साहब ने ख़ुद ही किया था। आज के प्रस्तुत गीत पर हम अभी आते हैं, लेकिन उससे पहले आपको यह बताना चाहेंगे कि इसी फ़िल्म में लता जी और रफ़ी साहब ने अपना पहला डुएट गीत गाया था, यानी कि इसी फ़िल्म ने हमें दिया पहला 'लता-रफ़ी डुएट' और वह गीत था "मिल मिल के गाएँगे दो दिल यहाँ, एक तेरा एक मेरा"। एक और ऐसा युगल गीत था "रात रंगीली मस्त ...

संगीत के आकाश में अपनी चमक फैलाने को आतुर एक और नन्हा सितारा - पी. भाविनी

लगभग ७ वर्ष पूर्व की बात है मैं ग्वालियर में ’उदभव’ संस्था द्वारा आयोजित ’राज्य स्तरीय गायन प्रतियोगिता- सुर ताल’ में निर्णायक के रूप में गया था उस दिन वहाँ राज्य भर से लगभग ३०० प्रतियोगी आए हुए थे, जिसमें ५ साल से लेकर ५० साल तक के गायक गायिकाएं शामिल थे। कुछ प्रतियोगियों के बाद मंच पर एक ७ वर्ष की बच्ची ने प्रवेश किया। मंच पर आने के पश्चात उसने जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल गाना प्रारम्भ किया। उसकी उम्र को देखते हुए उसकी गायकी, स्वर, ताल तथा शब्दों का उच्चारण सुन कर हम निर्णायक तथा सभी दर्शक मंत्र मुग्ध हो रहे थे। प्रतियोगिता में स्वयं की पसंद के गीत गाने के पश्चात एक गीत निर्णायकों की पंसद का भी सुनाना था। मैंनें उसके कोन्फिडेन्स को देख कर उसे एक कठिन गीत फ़िल्म ’माचिस’ का लता जी का ’पानी पानी रे भरे पानी रे, नैनों में नीन्दे भर जा’ गाने को कहा। उस बच्ची ने जब यह गीत समाप्त किया तो इस गीत की जो बारीकियाँ थी उस को उस बच्ची ने जिस तरह से निभाया मैं समझ नहीं पा रहा था कि उसकी प्रशंसा में क्या कहूँ। फ़िर कुछ दो तीन साल बाद एक दिन जीटीवी के कार्यक्रम ’सारेगामापा’ देखते समय उस कार्यक्रम के प्रति...

फिल्म के विषय और संगीत को अद्भुत रूप से मिलाने में भारतीय फिल्म निर्देशकों का विश्व में कहीं कोई सानी नहीं

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २६ म नोज कुमार की सुपर हिट देश भक्ति फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का गीत है "कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए"। आज इसी गीत का रिवाइवल संस्करण प्रस्तुत हो रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। इंदीवर जी ने इस गीत में प्यार करने का एक अलग ही तरीका इख्तियार किया है कि नायक का प्यार इतना गहरा है कि वह नायिका को जीवन के किसी भी मोड़ पर, किसी भी वक़त, किसी भी हालत में अपना लेगा, नायिका कभी भी उसके पास वापस लौट सकती है। "अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं, बहुत चाहनेवाले मिल जाएँगे, अभी रूप का एक सागर हो तुम, कमल जितने चाहोगी खिल जाएँगे, दर्पण तुम्हे जब डराने लगे, जवानी भी दामन छुड़ाने लगे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा सर झुका है झुका ही रहेगा तुम्हारे लिए"। इससे बेहतरीन अभिव्यक्ति शायद ही कोई शब्दों में लिख सके। दोस्तों, इंदीवर जी का लिखा यह मेरा सब से पसंदीदा गीत रहा है। इस गीत के रिकार्डिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा आनंदजी ने विविध भारती के 'उजाले...

हास्य गीतों की परंपरा को भी बखूबी निभाया है पीढ़ी दर पीढ़ी संगीतकारों -गीतकारों ने

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २५ आ ज कल्याणजी-आनंदजी के गीत की बारी। फ़िल्म 'कसौटी' में प्राण साहब पर फ़िल्माया गया था किशोर कुमार का नेपाली अंदाज़ में गाया हुआ एक बेहद लोकप्रिय हास्य गीत "हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है"। क्योंकि बात हास्य गीत की हो रही है और आप यह भी जानते होंगे कि कल्याणजी भाई का कैसा ज़बरदस्त 'सेन्स ऒफ़ ह्युमर' हुआ करता था। तो चलिए यह गीत सुनने से पहले कल्याणजी के कहे कुछ शब्द हो जाए, जिनसे उनके इस सेन्स ऒफ़ ह्युमर का एक छोटा सा नमूना आपके सामने प्रस्तुत हो जाएगा। कल्याणजी भाई कहते हैं (सौजन्य: विविध भारती): "यह ह्युमर का सबजेक्ट निकल आया है तो मैं कहूँगा कि ह्युमर को मैं बहुत महत्व देता हूँ। क्या है कि जहाँ हम जाएँ लोग हँसते नहीं, तो इसमें सब से ज़्यादा अगर किसी ने मुझे इन्स्पायर किया तो वो हैं आचार्य रजनीश जी, यानी कि ओशो। उन्होने मुझे बोला था कि 'कल्याणजी, आप का जो आर्ट है, उसको आप डेवेलप कीजिए, वह कमाल का आर्ट है। तो उन्होने मुझे बहुत इन्स्पायर किया। जब फ़िल्म बनी थी 'नन्हा फ़रिश्ता', तो वह मद्रास की पहली फ़िल्म थी हमारी। ...

सुनो कहानी: पंकज सुबीर की कहानी तुम लोग

तुम लोग - पंकज सुबीर 'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं रोचक कहानियां, नई और पुरानी। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हरिशंकर परसाई की दर्दनाक कहानी " बाबू की बदली " का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं पंकज सुबीर की कहानी "तुम लोग" , जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 15 मिनट 58 सेकंड। प्रस्तुत कहानी का टेक्स्ट सुखनवर पत्रिका के मार्च-अप्रैल अंक में उपलब्ध है। पंकज सुबीर की कहानियां पलाश और ईस्ट इंडिया कम्पनी आप पहले ही आवाज़ पर सुन चुके हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें। एक एक रंग को खूबसूरती के साथ सजाया है प्रकृति ने इसकी पंखुरियों पर, बीच में ज़र्द पीले रंग का छींटा, फ़िर सिंदूरी और किनारों पर कहीं कहीं चटख़ लाल, संपूर्णता का एहसास लिये। ~ पंकज सुबीर हर शनिवार क...

कुछ गीत इंडस्ट्री में ऐसे भी बने जिनका सम्बन्ध केवल फिल्म और उसके किरदारों तक सीमित नहीं था...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २४ "चै न से हमको कभी आप ने जीने ना दिया, ज़हर जो चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया"। फ़िल्म 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' का यह दिल को छू लेने वाला गीत आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की महफ़िल को रोशन कर रहा है। ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले ने साथ साथ फ़िल्म संगीत में एक लम्बी पारी खेली है। करीब करीब १५ सालों तक एक के बाद एक सुपर डुपर हिट गानें ये दोनों देते चले आए हैं। कहा जाता है कि प्रोफ़ेशनल से कुछ हद तक उनका रिश्ता पर्सनल भी हो गया था। ७० के दशक के आते आते जब नय्यर साहब का स्थान शिखर से डगमगा रहा था, उन दिनों दोनों के बीच भी मतभेद होने शुरु हो गए थे। दोनों ही अपने अपने उसूलों के पक्के। फलस्वरूप, दोनों ने एक दूसरे से किनारा कर लिया सन् १९७२ में। इसके ठीक कुछ दिन पहले ही इस गीत की रिकार्डिंग् हुई थी। दोनों के बीच चाहे कुछ भी मतभेद चल रहा हो, दोनों ने ही प्रोफ़ेशनलिज़्म का उदाहरण प्रस्तुत किया और गीत में जान डाल दी। फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इस फ़िल्म के गानें चारों तरफ़ छा गए। ख़ास कर यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि फ़िल्मफ़ेयर ...

दिल यार यार करता है- संगीत सत्र की सूफी-पेशकश

Season 3 of new Music, Song # 07 हिन्द-युग्म हिन्दी का पहला ऐसा ऑनलाइन मंच हैं जहाँ इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीत-निर्माण की शुरूआत हुई। इन दिनों हिन्द-युग्म संगीतबद्ध गीतों के तीसरे संत्र 'आवाज़ महोत्सव 2010' चला रहा है, जिसके अंतर्गत 4 अप्रैल 2010 से प्रत्येक शुक्रवार हम एक नया गीत रीलिज कर रहे हैं। हिन्द-युग्म के आदिसंगीतकार ऋषि एस हर बार कुछ नया करने में विश्वास रखते हैं। आज जो गीत हम रीलिज कर रहे हैं, उसमें ऋषि के संगीत का बिलकुल नया रूप उभरकर आया है। साथ में हैं हिन्द-युग्म से पहली बार जुड रहे गायक रमेश चेल्लामणि। गीत के बोल - तेरी चाहत में जीता है, तेरी चाहत में मरता है, तेरी सोहबत को तरसता है तेरी कुर्बत को तड़पता है, कैसा दीवाना है.... ये दिल यार यार करता है, ये दिल यार यार करता है... लौट के आजा सोहणे सजन, तुझ बिन सूना, ये मन आँगन, साँसों के तार टूटे है, धड़कन की ताल मध्यम है, कहीं देर न हो जाए, ये दिल यार यार करता है, ये दिल यार यार करता है... आँखों से छलका है ग़म, सीने में अटका है दम, सब देखे कर के जतन, होता ही नहीं दर्द कम, इतना भी तो न कर सितम इतना भी न बन बे रहम, क...

४०० एपिसोडों के लंबे सफर में ओल्ड इस गोल्ड ने याद किये कुछ ऐसे फनकारों को भी जिन्हें समय ने भुला ही दिया था

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २३ ४० के दशक की एक प्रमुख गायिका रहीं हैं ज़ोहराबाई अंबालेवाली। भले ही फ़िल्म संगीत का सुनेहरा दौर ५० के दशक से माना जाता है, लेकिन सुनहरे गीतों का यह सिलसिला ४० के दशक के मध्य भाग से ही शुरु हो चुका था, और इसी दौरान ज़ोहराबाई के गाए एक से एक हिट गीत आ रहे थे। नौशाद साहब के संगीत में ज़ोहराबाई ने फ़िल्म 'रतन' में एक गीत गाया था " अखियाँ मिलाके जिया भरमके चले नहीं जाना ", जो शायद ज़ोहराबाई का सब से लोकप्रिय गीत साबित हुआ। आज इसी गीत का रिवाइव्ड वर्ज़न प्रस्तुत है। इस फ़िल्म के संगीत से जुड़ी कुछ बड़ी ही दिलचस्प और मज़ेदार बातें नौशाद साहब ने विविध भारती के 'नौशादनामा' शृंखला में कहे थे सन् २००० में, आइए आज उन्ही पर एक नज़र दौड़ाएँ। नौशाद साहब से बातचीत कर रहे हैं कमल शर्मा। प्र: अच्छा वह क़िस्सा कि जब आप की शादी में बैण्ड वाले आप के ही गानें की धुन बजा रहे थे, उसके बारे में कुछ बताइए। उ: १९४४ में 'रतन' के गानें बहुत हिट हो गए थे। उससे पहले मैं घर छोड़ कर बम्बई आया था। एक दिन मेरे वालिद ने मुझसे कहा था कि 'तुमने मेरा कहना क...

गुलज़ार के महकते शब्दों पर "पंचम" सुरों की शबनम यानी कुछ ऐसे गीत जो जेहन में ताज़ा मिले, खिले फूलों से

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २२ 'ओ ल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की २२-वें कड़ी में आप सभी का एक बार फिर हार्दिक स्वागत है। आज पेश है गुलज़ार और पंचम की सदाबहार जोड़ी का एक नायाब नग़मा फ़िल्म 'घर' का। इस फ़िल्म से किशोर कुमार का गाया " फिर वही रात है " आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं आज इस फ़िल्म से जिस गीत का कवर वर्ज़न हम आप तक पहुँचा रहे हैं, वह है "आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज़ हैं, आप से भी ख़ूबसूरत आप के अंदाज़ हैं"। लता-किशोर का गाया ये युगल गीत आज भी अक्सर रेडियो पर सुनने को मिल जाता है। दोस्तों, पंचम दा के निधन के बाद गुलज़ार साहब ने अपने इस अज़ीज़ दोस्त को याद करते हुए काफ़ी कुछ कहे हैं समय समय पर। यहाँ पे हम उन्ही में से कुछ अंश पेश कर रहे हैं। इन्हे विविध भारती पर प्रसारित किया गया था विशेष कार्यक्रम 'पंचम के बनाए गुलज़ार के मन चाहे गीत' के अन्तर्गत। "याद है बारिशो के वो दिन थे पंचम? पहाड़ियों के नीचे वादियों में धुंध से झाँक कर रेल की पटरियाँ गुज़रती थीं, और हम दोनों रेल की पटरियों पर बैठे, जैसे धुंध में दो पौधें हों...