रविवार, 27 दिसंबर 2020

राग खमाज और बिलावल : SWARGOSHTHI – 494 : RAG KHAMAJ & BILAWAL





स्वरगोष्ठी – 494 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 10 : संगीतकार – खय्याम 

जब राज कपूर ने फिल्म “फिर सुबह होगी” के लिए स्वयं ही खय्याम का चुनाव किया 





पण्डित उल्हास कशालकर 

मुकेश और आशा भोसले 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हमने फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा की है। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जा रही है। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती थी। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की दसवीं और समापन कड़ी में हम 1958 में राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म "फिर सुबह होगी” से राग खमाज और बिलावल पर आधारित एक गीत; "वो सुबह कभी तो आएगी...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत खय्याम ने और स्वर; मुकेश और आशा भोसले ने दिया है। यह गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा है और राग खमाज तथा बिलावल पर आधारित है। राग खमाज के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम इस राग में निबद्ध एक रसभरी ठुमरी; “कोयलिया कूक सुनावे...” सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 




फिल्म "फिर सुबह होगी" में राज कपूर और माला सिन्हा 
जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” की समापन कड़ी में कृष्णमोहन मिश्र और “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” परिवार की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। इस श्रृंखला में हमने आपके लिए राज कपूर द्वारा निर्मित तीन फिल्मों और केवल अभिनीत सात फिल्मों के ऐसे गीतों को चुना, जिन पर या तो राज कपूर का प्रभाव था या उन गीतों से वे स्वयं प्रभावित हुए थे। गीतों को चुनते समय हमने इस बात का ध्यान भी रखा कि ये फिल्में राज कपूर के प्रारम्भिक एक दशक की हो और उनके अधिकतर फिल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन के अलावा अन्य संगीतकारों की हो। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में हम एक ऐसे गीत पर चर्चा करेंगे, जिस पर राज कपूर की समाजवादी विचारधारा का पूरा प्रभाव अंकित हुआ है। पिछले अंक में हमने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राज कपूर की समान विचारधारा पर चर्चा की थी। जिस प्रकार नेहरू जी तत्कालीन सोवियत रूस और चीन में लोकप्रिय थे, ठीक उसी प्रकार राज कपूर और उनकी फिल्में भी इन देशों में लोकप्रिय थीं 1958 में निर्माता और निर्देशक रमेश सहगल की फिल्म “फिर सुबह होगी” प्रदर्शित हुई थी। यह फिल्म रूसी उपन्यासकार फ़्योडोर दोस्तोएव्स्की की विश्वविख्यात कृति “क्राइम एण्ड पनिशमेंट” पर आधारित थी। रमेश सहगल इस फिल्म में नायक की भूमिका के लिए राज कपूर को और गीतकार के रूप में साहिर लुधियानवी को शामिल कर चुके थे। राज कपूर फिल्म के कथानक से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। फिल्म के संगीतकार का चयन अभी बाकी था। साहिर लुधियानवी ने एक दिन रमेश सहगल को संगीतकार खय्याम का नाम सुझाया। रमेश सहगल को उम्मीद थी कि राज कपूर शंकर जयकिशन के नाम का सुझाव देंगे। परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। रमेश सहगल ने राज कपूर और खय्याम की एक बैठक करा दी। 


संगीतकार ख़ैयाम  

लता मंगेशकर ने एक बार राज कपूर को एक तानपूरा भेंट किया था। खय्याम के साथ हुई बैठक में राज कपूर ने वही तानपूरा ख़ैयाम की ओर बढ़ाते हुए कुछ सुनाने का आग्रह किया। खय्याम ने उस नये तानपूरा के तारों को छेड़ते हुए राग पूरिया धनाश्री की एक बन्दिश सुनाई थी। राज कपूर खय्याम की गायकी से प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म के शीर्षक गीत की धुन बनाने को कहा। खय्याम इस फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। राज कपूर की सहमति मिल जाने के बाद उन्होने फिल्म के शीर्षक गीत की पाँच अलग अलग धुने बनाई। अगली बैठक में राज कपूर ने जब गीत पांचों धुने सुनी तो वे खय्याम की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हुए और फिल्म के सभी गीतों की धुनें बनाने की पूरी स्वतन्त्रता दे दी। इस प्रकार राज कपूर, खय्याम, साहिर लुधियानवी और रमेश सहगल के अनूठे समागम से फिल्म “फिर सुबह होगी” के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। फिल्म तो सफल नहीं हुई किन्तु श्रृंगार प्रधान गीतों के उस दौर में यथार्थवादी गीत एक नई ताजगी लेकर आए थे, अतः गीत खूब चले। राज कपूर और खय्याम के भेंट प्रसंग हमने पंकज राग की पुस्तक “धुनों की यात्रा” से साभार उद्धृत किया है। मेरे एक पत्रकार मित्र प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार, एक मशहूर किस्सा संगीतकार खय्याम बताते हैं कि 1958 में रमेश सहगल एक फिल्म बना रहे थे “फिर सुबह होगी” फिल्म के हीरो राज कपूर थे और उन्हीं के पसन्द के संगीतकार शंकर जयकिशन थे। गीत लिखने की ज़िम्मेदारी साहिर के कंधों पर थी। उन्होने रमेश सहगल से पूछा कि संगीतकार कौन है, तो उन्होने सारे कहानी बता दी। इस पर वो बोले कि जिसने इस फिल्म के मूल लेखक दोस्तोवस्की के नावेल “क्राइम ऐंड पनिशमेंट” को न सिर्फ पढ़ा हो बल्कि समझा भी हो वही इस फिल्म का संगीत बनायेगा। उन्होंने कहा कि मैं तो ऐसे आदमी को जानता भी नहीं हूँ। तब साहिर ने कहा; मैं जानता हूँ, वो हैं खय्याम। इस पर रमेश सहगल ने कहा कि ठीक है मैं उन्हें राज साहब से मिलवा दूँगा अगर वे ओ.के. कर देंगे तो मुझे कोई एतराज नहीं। साहिर ने नज्म लिखी “वो सुबह कभी तो आयेगी...”। खय्याम ने इस नज़्म की पाँच धुने बनाईं। राज कपूर ने सुनीं और पांचों को पास कर दिया। फिल्म “फिर सुबह होगी” में खय्याम ने राज कपूर पर फिल्माए गए गीतों को मुकेश से गवाया था। मुख्य शीर्षक गीत; “वो सुबह कभी तो आएगी...” के दो संस्करण हैं, एक संस्करण में केवल मुकेश का और दूसरे में मुकेश के साथ आशा भोसले का स्वर है। मुकेश की आवाज़ में एक अन्य गीत; “आसमाँ पे है खुदा, और ज़मीं पे हम...” तत्कालीन फिल्मी गीतों की बनी छवि तोड़ने में सफल हुआ था। फिल्म प्रेमियों ने इस गीत और संगीत के नयेपन को खूब सराहा था। फिल्म के अन्य गीत; “चीन ओ अरब हमारा...”, “फिर ना कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला...” आदि अपनी सहज धुनों के कारण खूब सराहे गए। आज की समापन कड़ी में हम आपको फिल्म के शीर्षक गीत का वही संस्करण सुनवाते हैं, जिसे मुकेश और आशा भोसले ने स्वर दिया था। लीजिए, साहिर लुधियानवी का गीत, खय्याम का संगीत, मुकेश और आशा भोसले के युगल स्वरों से युक्त फिल्म “फिर सुबह होगी” का यह गीत सुनिए। इस गीत के आरम्भ में राग खमाज का आधार है और बाद में राग बिलावल का स्पर्श भी है। फिल्म “फिर सुबह होगी” का यह गीत राज कपूर और माला सिन्हा पर फिल्माया गया है। इस दृश्य में माला सिन्हा राज कपूर की बाहों में हैं और गीत के आरम्भ से अन्त तक दोनों इसी मुद्रा में रहते हैं। 

राग खमाज व बिलावल : “वो सुबह कभी तो आएगी...” : मुकेश और आशा भोसले : संगीत – खय्याम 


खमाज थाट के स्वर होते हैं; सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒(कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग “खमाज” कहलाता है। “खमाज” राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। यह चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें द्रुत खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आदि गाया जाता है। इस राग में विलम्बित खयाल नहीं गाया जाता। यद्यपि आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, किन्तु ठुमरी गाते समय कभी कभी आरोह में भी ऋषभ स्वर का प्रयोग किया जाता है। राग खमाज से मिलता जुलता राग तिलंग होता है। राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने ग्वालियर घराने के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में एक रसभरी ठुमरी सुनवा रहे हैं। 

राग खमाज : “कोयलिया कूक सुनावे...” : ठुमरी : पण्डित उल्हास कशालकर 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 495 और 496वें अंक में वर्ष 2020 के महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ सम्मिलित की जाएँगी, अतः इस अंक में हम कोई भी पहेली नहीं दे रहे हैं। 496वें अंक से संगीत पहेली का सिलसिला पुनः आरम्भ होगा। 

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 492वें अंक में हमने आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म "अब दिल्ली दूर नहीं” से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - मारू बिहाग और यमन कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा एवं कहरवा का एक प्रकार तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले, गीता दत्त और साथी 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दसवीं और समापन कड़ी में आज आपने राज कपूर व माला सिन्हा द्वारा अभिनीत फिल्म "फिर सुबह होगी” के एक गीत का रसास्वादन किया, फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी तथा संगीतकार खय्याम का परिचय भी प्राप्त किया। यह गीत राग खमाज और बिलावल पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में एक रसभरी ठुमरी का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग खमाज और बिलावल : SWARGOSHTHI – 494 : RAG KHAMAJ & BILAWAL : 27 दिसम्बर, 2020 



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