Tuesday, July 31, 2018

ऑडियो: कुत्सा (मुंशी प्रेमचंद)

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में उन्हीं की लघुकथा 'हल' सुनी थी।

आज, मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन के अवसर पर, हम आपकी सेवा में उन्हीं की एक कथा कुत्सा  प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

एक शताब्दी से हिन्दी (एवं उर्दू) साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद का नाम एक सूर्य की तरह चमक रहा है। विशेषकर, ज़मीन से जुड़े एक कथाकार के रूप में उनकी अलग ही पहचान है। उनके पात्रों और कथाओं का क्षेत्र काफी विस्तृत है फिर भी उनकी अनेक कथाएँ भारत के ग्रामीण मानस का चित्रण करती हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे उर्दू में नवाब राय और हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखते रहे। आम आदमी की बेबसी हो या हृदयहीनों की अय्याशी, बचपन का आनंद हो या बुढ़ापे की जरावस्था, उनकी कहानियों में सभी अवस्थाएँ मिलेंगी और सभी भाव भी। उनकी कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं और अनेक रेडियो व टीवी कार्यक्रम भी। उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसंबर 1915 के अंक में "सौत" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और उनकी अंतिम प्रकाशित (1936) कहानी "कफन" थी।

"कुत्सा" का कुल प्रसारण समय 9 मिनट 49 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूँ।
 ~ मुंशी प्रेमचंद (1880-1936)

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"जोरू न जाँता, अल्लाह मियाँ से नाता।”
 (मुंशी प्रेमचन्द कृत "कुत्सा" से एक अंश)


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कुत्सा MP3

#Fifteenth Story, Kutsa: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2018/15. Voice: Anurag Sharma

3 comments:

वाणी गीत said...

सत्य और असत्य का फैसला कभी मुश्किल हो जाता है.
अच्छी कहानी!

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की १३८ वीं जयंती “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गोपेश मोहन जैसवाल said...

बहुत सुन्दर ! कहानी की प्रस्तुति बहुत प्रभावशाली है. प्रेमचंद की इस रोचक कहानी को मैंने पढ़ा नहीं था, आज उसे सुन लिया. शर्मा जी, आपका प्रयास सराहनीय है. इस नए अनुभव का आनंद दिलाने के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया !

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