सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 12 || शकील बदायूनी

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 12
Shakeel Badauni

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के बारहवें एपिसोड में सुनिए कहानी सहज शब्दों के जादूगर शकील बदायुनी की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

ठुमरी पीलू और देश : SWARGOSHTHI – 341 : THUMARI PILU & DESH




स्वरगोष्ठी – 341 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 8 : ठुमरी पीलू और देश

दो भिन्न रागों में श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी  - “गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...”




आशा भोसले और मोहम्मद रफी
इकबाल बानो, उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हमारे सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन ने प्रस्तुत किया है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक हम आपको राग पीलू की एक परम्परागत ठुमरी पहले सुविख्यात गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में, फिर यही ठुमरी उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ के युगल स्वर में सुनेंगे। इसी ठुमरी का राग देश में प्रयोग 1964 की प्रदर्शित फिल्म – “मैं सुहागन हूँ” में संगीतकार लच्छीराम तँवर ने मोहम्मद रफी और आशा भोसले की युगल स्वर में किया था। 


ठुमरी पीलू : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : गायिका इकबाल बानो
ठुमरी पीलू : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ
ठुमरी देश : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी : फिल्म – मैं सुहागन हूँ







संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 341वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक और फिल्मी ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक के ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस ठुमरी में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 4 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 343वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 339वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1938 में प्रदर्शित फिल्म – “स्ट्रीट सिंगर” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – कुन्दनलाल सहगल

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इसके साथ ही इस बार हमारे एक नए प्रतिभागी, फर्रुखाबाद, उत्तरप्रदेश से विद्याप्रकाश दीक्षित ने भी तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस आठवीं कड़ी में आपने राग पीलू की एक पारम्परिक ठुमरी को गायिका इक़बाल बानो और उस्ताद अख्तर अली तथा ज़ाकिर अली खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसी ठुमरी के फिल्मी रूप का राग देश में गायन मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वर में आनन्द लिया। 

“स्वरगोष्ठी” 338वें अंक की पहेली के बारे टिप्पणी करते हुए हमारे एक पाठक Janardan Murhekar ने लिखा है - "लताजी द्वारा गाये "सौतेला भाई" के इस गीत ने मुझे अरसे से मोहित किया है। कब तक हंसध्वनि राग मे यह गीत बाँधा गया है, ऐसा मै समझता था। कृपया प्रकाश डालें।" 

जनार्दन जी से निवेदन है - "संगीत के विभिन्न ग्रन्थों और विद्वानों के अनसार राग हंसध्वनि और अड़ाना में पर्याप्त अन्तर होता है। मूलतः कर्नाटक पद्यति के राग हंसध्वनि में सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में मध्यम और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। राग की जाति औड़व-औड़व है। जबकि राग अड़ाना में गान्धार और धैवत स्वर कोमल और दोनों निषाद स्वर का प्रयोग होता है। आरोह में गान्धार वर्जित और अवरोह में वक्र प्रयोग होता है। इस राग की जाति षाडव-सम्पूर्ण होती है। आशा है, जनार्दन जी सन्तुष्ट हो गए होंगे।

आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में भी हम आपसे एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

चित्रकथा - 42: फ़िल्मी गीतों में पहेलियाँ

अंक - 42

फ़िल्मी गीतों में पहेलियाँ


"ईचक दाना बीचक दाना दाने उपर दाना..." 



किसी व्यक्ति की बुद्धि या समझ की परीक्षा लेने वाले एक प्रकार के प्रश्न, वाक्य अथवा वर्णन को पहेली (Puzzle) कहते हैं जिसमें किसी वस्तु का लक्षण या गुण घुमा फिराकर भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया गया हो और उसे बूझने अथवा उस विशेष वस्तु का ना बताने का प्रस्ताव किया गया हो। इसे 'बुझौवल' भी कहा जाता है। पहेली व्यक्ति के चतुरता को चुनौती देने वाले प्रश्न होते है। जिस तरह से गणित के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, उसी तरह से पहेलियों को भी नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता। पहेलियां आदि काल से व्यक्तित्व का हिस्सा रहीं हैं और रहेंगी। वे न केवल मनोरंजन करती हैं पर दिमाग को चुस्त एवं तरो-ताजा भी रखती हैं। हमारे फ़िल्मी गीतों में भी कई बार हमें पहेलियाँ मिली हैं और ये गीत पहेलियों की वजह से यादगार बन गए हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें कुछ ऐसे ही फ़िल्मी गीतों पर।


हिंदी में पहेलियों का व्यापक प्रचलन रहा है। पहेलियाँ मूलत: दो प्रकार की हैं। कुछ पहेलियाँ ऐसी हैं जिनमें उनकी वर्णित वस्तु को छिपाकर रखा गया है जो तत्काल स्पष्ट नहीं होता। कुछ ऐसी हैं जिनकी बूझ-वस्तु उनमें नहीं दी गई होती। इनमें बिन-बूझ पहेलियाँ ही ज़्यादा लोकप्रिय हुई हैं। 

"एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।।"

उपर्युक्त पहेली का उत्तर है आकाश, और मोती से संकेत तारों की ओर है।

हिंदी पहेलियों के संबंध में अब तक जो भी खोज कार्य हुए हैं उनमें पहेलियों का कई प्रकार से वर्गीकरण किया गया है। इन वर्गीकरणों से स्पष्ट है कि हिंदी में इतने सारे प्रकार की पहेलियों का प्रचलन है। विषयों के अनुसार पहेलियों को सात प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है, यथा: खेती-संबंधी (कुआँ, मक्के का भुट्टा), भोजन संबंधी (तरबूज़, लाल मिर्च), घरेलू वस्तु संबंधी (दीया, हुक्का, सुई, खाट), प्राणि संबंधी (खरगोश, ऊँट,) अंग, प्रत्यंग सबंधी (उस्तरा, बंदूक)। हिंदी की अन्य क्षेत्रीय बोलियों जैसे कि भोजपुरी, अवधी, बुंदेलखंडी, मैथिली आदि में भी पर्याप्त मात्रा में पहेलियाँ पाई जाती हैं।

Shanta Apte & Bhatkar
हमारी हिन्दी फ़िल्मी गीतों में भी पहेलियाँ कई बार आई हैं, हालाँकि ऐसे गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। लेकिन यह सच है कि जब भी कभी पहेलियों को आधार बना कर किसी गीत की रचना की गई है, वह गीत यादगार बन गया है। पहेलियाँ वाले फ़िल्मी गीतों पर शोध करते हुए जो सबसे पुराना गीत हाथ लगा, वह है साल 1942 की फ़िल्म ’ज़मीनदार’ का गीत "बूझ सको तो बूझो मेरी एक पहेली बूझो"। क़मर जलालाबादी का लिखा और मास्टर ग़ुलाम हैदर द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को गाया था भाटकर और शान्ता आप्टे ने। ये वो ही स्नेहल भाटकर हैं जो आगे चल कर संगीतकार बनें। यह गीत अनूठा है क्योंकि गीत को सुनते हुए, पहेलियों को सुनते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे नायक और नायिका एक दूसरे के गुणों का बयाँ कर रहे हैं। लेकिन जब सामने वाला/ वाली जवाब देता या देती है, तब पता चलता है कि पहेली का जवाब तो कुछ और ही है। यही तो पहेली की परिभाषा है कि जिसके एक से ज़्यादा अर्थ निकल सकते हैं। दरसल इस गीत में नायक-नायिका एक दूसरे की टाँग खींच रहे हैं। भाटकर की आवाज़ में नायक की पहेली है - "नाजुक नाजुक उसकी कमरिया, कब से रेंगती है ऐ उसकी चुनरिया, चुपके चुपके रहती है शर्मीली रानी, कोई मुसाफ़िर देख ना ले कहीं मस्त जवानी, देखे जब अंग प्यारे तरसत हैं होंठ हमारे, तन उसका नागन इस तरह बलखाये, कोई देखे उसका दिल ललचाये, कोई तो बूझ बताए"। इसके जवाब में नायिका कहती हैं - "यह तो मैं हूँ"। इस पर नायक का जवाब होता है - "नहीं, ककड़ी।" इसी तरह से गीत के दूसरे हिस्से में पहेली पूछने की बारी है नायिका की। शान्ता आप्टे गाती हैं - "उस प्यारे की हर बात निराली, चेहरे पर लाली, दुख सुख के कांटों में रहने वाला, तूफ़ान की सख़्ती को सहने वाला, इक भोला भाला बनवासी, जब देखो हो दूर हो उदासी, उसके ऐ तन में भरी मिठास, जब चाहो आ जाये पास, दिल भी ख़ुश हो जाए, कोई तो बूझ बताए।" इस पर नायक का जवाब - "यह तो मैं हूँ!" और नायिका कहती हैं - "नहीं नहीं, बेर।"

1955 की फ़िल्म ’श्री 420’ में सर्वाधिक लोकप्रिय पहेली गीत आया "ईचक दाना बीचक दाना दाने उपर दाना, छज्जे उपर लड़की नाचे लड़का है दीवाना" जिसे हर किसी ने सुना है और इस गीत में शामिल पहेलियों के बारे में भी हर किसी को मालूमात है। इस गीत में स्कूल टीचर नर्गिस अपने छात्रों को पहेलियाँ पूछ रही हैं। वहाँ मौजूद राज कपूर भी पहेलियों के जवाबों का अंदाज़ा लगा रहे होते हैं लेकिन हर बार उनका जवाब ग़लत होता है और बच्चे सही जवाब दे जाते हैं। गीत के आख़िर में राज कपूर भी एक पहेली पूछते हैं और अब की बार नर्गिस भी मात खा जाती हैं क्योंकि उस पहेली का इजाद राज कपूर ने उसी वक़्त किया होता है जिसका जवाब सिर्फ़ उन्हीं को पता है। गीतकार हसरत जयपुरी ने किस ख़ूबसूरती के साथ इस गीत को रचा है। गीत में शामिल पहेलियों को सुन कर लगता ही नहीं कि हसरत साहब ने इन्हें बनाया है बल्कि ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से ये पहेलियाँ चली आ रही हों। शंकर-जयकिशन के संगीत में इस गीत को लता मंगेशकर, मुकेश और बच्चों ने गाया था। इस गीत के साथ एक रोचक उपाख्यान भी जुड़ा हुआ है। पूर्व क्रिकेटर बी. एस. चन्द्रशेखर गायक मुकेश के ज़बरदस्त फ़ैन थे। 90 के दशक में ज़ी टीवी के मशहूर शो ’अन्ताक्षरी’ के एक सेलिब्रिटी अंक में बी. एस. चन्द्रशेखर भी पधारे थे और वो हर बार किसी भी अक्षर से मुकेश के गाए गीत को पेश कर सभी को चकित कर रहे थे। जब "इ" से गाने की बारी आई तो उन्होंने "इचक दाना..." गाया। लेकिन दूसरी पंक्ति को वो "लड़का उपर लड़की नाचे लड़का है दीवाना" गा गए। मेज़बान अन्नु कपूर ने जैसे ही उन्हें सुधारा, वहाँ मौजूद दर्शकों के ठहाके छूट पड़े।

1961 की फ़िल्म ’ससुराल’ में एक बार फिर शंकर जयकिशन के संगीत में पहेली श्रेणी का एक गीत बना। शैलेन्द्र का लिखा और लता-रफ़ी का गाए इस गीत में एक प्रतियोगिता हो रही है नायक राजेन्द्र कुमार और नायिका बी. सरोजा देवी के बीच में जिसमें पहला एक सवाल पूछता है जिसका जवाब दूसरे को सवाल के रूप में ही देना है। इस तरह से बिल्कुल नए तरीके में लिखा यह गीत फ़िल्म संगीत के इतिहास का एकमात्र ऐसा गीत बना हुआ है। "एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो, हर सवाल का सवाल ही जवाब हो"। पहला सवाल है - "प्यार की बेला साथ सजन का फिर क्यों दिल घबराये, नईहर से घर जाती दुल्हन क्यों नैना छलकाये?" इसके जवाब में जो सवाल पूछा गया, वह है - "है मालूम कि जाना होगा, दुनियाँ एक सराय, फिर क्यों जाते वक़्त मुसाफ़िर रोये और रुलाये?" सवालों की दूसरी जोड़ी है - "चाँद के माथे दाग है फिर भी चाँद को लाज न आये, उसका घटता बढ़ता चेहरा क्यों सुन्दर कहलाये?"/ "काजल से नैनों की शोभा क्यों दुगुनी हो जाये, गोरे गोरे गाल पे काला तिल क्यों मन को भाये?" और तीसरी व अन्तिम सवालों की जोड़ी है - "उजियारे में जो परछाई पीछे पीछे आये, वही अन्धेरा होने पर क्यों साथ छोड़ छुप जाये?"/ "सुख में क्यों घेरे रहते हैं अपने और पराये, बुरी घड़ी में क्यों हर कोई देख के भी क़तराये?" जीवन की कितनी गहरी सच्चाइयों को शैलेन्द्र ने उजागर किया है इस गीत में, और यही सब इस गीत की सुन्दरता को बढ़ाते हैं। 


1967 की फ़िल्म ’मझली दीदी’ ॠषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म थी। इसमें एक बड़ा ही अनोखा पहेली भरा गीत था लता मंगेशकर, कमल बारोट और नीलिमा चटर्जी की आवाज़ों में। हेमन्त कुमार के संगीत में इसे कवि नीरज ने लिखा था। गीत में लता जी ने मीना कुमारी का पार्श्वगायन किया और कमल बारोट व नीलिमा चटर्जी ने बेबी सारिका, मास्टर ख़ालिद और बेबी रज़िया का प्लेबैक किया। ज़ाहिर है गीत में माँ (मीना कुमारी) अपने बच्चों से पहेलियाँ पूछ रही हैं। पहली पहेली है "मैं लाल लाल गुजकूँ, तू हाथ डाले मुझकूँ, मैं काट खाऊँ तुझकूँ, तू खाये जाये मुझकूँ, बताओ बताओ बताओ मैं कौन हूँ?" इसका जवाब बच्चे तुरन्त दे देते हैं - "बेर"। माँ दूसरी पहेली पूछती हैं - "एक अचम्भा ऐसा देखा, हाथी खड़ा नहाये, बताओ तो क्या है है?" इस बार बच्चे उलझ जाते हैं और कहते हैं "तुम ही बताओ ना माँ!" इस पर माँ पहेली को और थोड़ा बढ़ाते हुए कहती हैं - "चोंच ना डूबे घड़ा ना डूबे, चिड़िया प्यासी जाये, एक अचम्भा ऐसा देखा, हाथी खड़ा नहाये"। अब बच्चे बोल पड़ते हैं - "ओस!" तीसरी पहेली एक बच्ची पूछती है - "एक कटोरे में है कटोरा, बाप से ज़्यादा बेटा गोरा, पूजा में वह आता काम, कहो तो उसका क्या है नाम?" माँ जवाब देती है "नारियल"। अगली पहेली भी दूसरे बच्चे से आती है - "एक अंगुल के ग़ाज़ी मियाँ, दस अंगुल की पूँछ, चलते जाएँ ग़ाज़ी मियाँ, फँसती जाए पूँछ"। इस पर माँ का हाज़िर जवाब - "सुइ धागा।" अब फिर से माँ की बारी - "एक थाल मोती से भरा, सब के सर पर उल्टा धरा, आंधी आये पानी आये, मोती एक नहीं गिर पाये, बताओ तो क्या है?" इस बार बच्चे सही जवाब "आकाश" दे जाते हैं। गीत के अन्त में जब बच्चे और पहेलियों की ज़िद करते हैं, तब उनकी माँ कहती हैं कि उन्हें अभी बहुत काम है और बच्चों से पढ़ाई-लिखाई करने को कहती हैं और यह भी कहती हैं कि दोपहर में वो उनकी परीक्षा लेंगी। 

1967 की ही एक और फ़िल्म में पहेली भरा गीत है। म्युज़िकल ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’मिलन’ के गीतों को कौन नहीं जानता! भले "सावन का महीना पवन करे सोर" इस फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा है, लेकिन इसी फ़िल्म में एक और लता मंगेशकर, मुकेश और साथियों का गाया हुआ गीत है जिसकी पहेलियों की ख़ास बात यह है कि हर पहेली का जवाब है भगवान शिव जी। इस तरह से इस गीत में भक्ति रस भी प्रवाहित हो रहा है। लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में आनन्द बक्शी की यह रचना है "बोल गोरी बोल तेरा कौन पिया, कौन है वो तूने जिसे प्यार किया?" इसके जवाब में नायिका पहेली के रूप में जवाब देती है - "तू जाने ना उसका नाम, हर सुबह हर शाम, दुनिया ने उसी का नाम लिया, बोल तू ही बोल मेरा कौन पिया।" इस गीत में मज़ेदार बात यह है कि नायिका जहाँ शिव जी की प्रशंसा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ नायक शिव जी के दोष धर रहे हैं। पहले अन्तरे में जब मेले के लोग नायिका से पूछते हैं कि "है कौन सारे जग से निराला, कोई निशानी बतलाओ बाला", तब नायिका कहती हैं, "उसकी निशानी वो भोला भाला"। तब नायक मज़ा लेते हुए गाते हैं, "उसके गले में सर्पों की माला, वो कई हैं जिसके रूप, कहीं छाँव कहीं धूप, तेरा साजन है या बहरूपिया?" नायिका इससे विचलित नहीं होती और दूसरे अन्तरे में कहती हैं, "मन उसका मन्दिर प्राण पुजारी"। इस नायक का कटाक्ष, "घोड़ा न हाथी करे बैल सवारी"। नायिका का जवाब - "कैलाश पर्वत का वो तो जोगी"। नायक कहाँ हार मानने वाले - "अच्छा वही दर दर का भिखारी!"। नायिका - "हाँ, वो है भिखारी ठीक, लेके भक्ति की भीख, बदले में जगत को मोक्ष दिया"। अन्तिम अन्तरा नायिका शुरु करती हैं - "मैं जिसको भाऊँ जो मुझको भाये, इक दोष तो कोई उसमें बताये"। नायक का जवाब - "तू जिसपे मरती है हाय हाय, वो जटाओं में है गंगा बसाये"। और नायिका का अन्तिम जवाब है - "दो दिन का है साथ, युग-युग से मेरी बात, मैं हूँ बाती अगर तो वो दीया, बोल तू ही बोल मेरा कौन पिया"। बहुत ही सुन्दर रचना है और सबसे बड़ी बात यह है कि सभी को पहेलियों का जवाब पता है लेकिन इतने सुन्दर शब्दों से शिव जी का वर्णन किया गया है कि जितनी बार भी इस गीत को सुनें, अच्छा ही लगता है।

1967 से 1969 के दरमियाँ कई और गीतों में पहेलियों का समावेश हुआ है। 1968 की फ़िल्म ’आशिर्वाद’ के "रेल गाड़ी", "नानी की नाव चली", "जीवन से लम्बे हैं बंधु" और "झिर झिर बरसे सावनी अखियाँ" गीत हमने कई कई बार सुने हैं। लेकिन इसी फ़िल्म में एक पहेली गीत भी है जिसकी तरफ़ लोगों का कम ही ध्यान गया है। गुलज़ार का लिखा और वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया यह गीत आशा भोसले, हेमलता, अशोक कुमार, हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, मिर्ज़ा साहिब और बिपिन गुप्ता ने गाया है। एक उर्जा समृद्ध लोक शैली का गीत है महाराष्ट्र के लावणी नृत्य शैली में रचा हुआ। 9 मिनट 30 सेकण्ड अवधि के इस गीत में लावणी नर्तकियाँ दर्शकों से पहेलियाँ पूछ रहे हैं। लेकिन अन्त में दर्शकों में बैठे अशोक कुमार एक ऐसी पहेली पूछते हैं जिसका नर्तकी दल जवाब नहीं दे पाते और वो हार मान लेते हैं। नर्तकियों द्वारा पूछी गई पहली पहेली थी - "है एक पहेली बड़ी नवेली, जो बूझे तो बने कलन्दर, और ना बूझे तो बन्दर बन्दर बन्दर। कई बरस तो कभी ना आए, और आए तो कभी ना जाए, काटो, फेंको, फिर आ जाए, बूझे कोई यह बतालाए।" दर्शक इसका जवाब दे देते हैं - "दाढ़ी"। दूसरी पहेली पूछती हैं नर्तकियाँ - "राधा नाम की लड़की थी इक, ऊँचे कद की, तुमको उसकी बात सुनाऊँ, अरे क्या कहती थी, क्या करती थी, गागर में जब अग्नि भर के सर पे रख ली, जमुना पाँव में पड़ के बोली, तड़पे मचले मचले, हो जितनी बार मुझे फूंकोगे आग लगा के, उतनी बार उठेगी तन से धुएँ की बदली बदली, कौन थी राधा, कौन थी जमुना?" इसके जवाब में दर्शकों में बैठे हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय अपनी ही अंदाज़ में हुक्का पीते हुए यह समझा देते हैं कि इस पहेली का जवाब है "हुक्का"। नर्तकी दल तुरन्त तीसरी पहेली पर चली आती हैं - "कान पकड़ कर नाक पे दोनो घुटने टेके, उठकर दो आँखों में आँखें डाल के देखे, क्यों कलन्दर बनोगे बन्दर, चलेगा चुल्लु या लाऊँ समुन्दर?" इस पहेली का जवाब अशोक कुमार देते हैं पहेली वाले अंदाज़ में - "सारी जवानी कोई ना आए आँख मिलाने, आज बुढापे में कोई कैसे पहचाने, कान पकड़ कर नाक पे दोनो घुटने टेके, तब आँखों पर चढ़ के चश्मा आँख को देखे", यानी सही जवाब है "चश्मा"। अब इससे पहली की नर्तकियाँ कोई और पहेली पूछतीं, अशोक कुमार उन्हीं से एक पहेली पूछ बैठे - "अच्छा अब के तुम सब मेरी बात बताओ, और न समझो तुम तो सारे गोबर खाओ, एक दफ़ा एक दोस्त के घर पे सोचा था वो घर पे होगा, जा कर देखा दोस्त नहीं है, उस दोस्त की सुन्दर पत्नी को जिस हाल में पाया, तौबा तौबा देखा और पसीना आया, माँ को भी एक बार यूं ही देखा था लेकिन, बहन को देख के मुश्किल से दिल को समझाया, ऐसी कितनी सुन्दर सुन्दर नारियाँ देखी भैया, लेकिन अपनी पत्नी को उस हाल में देख ना पाया। अब कहो कलन्दर हाल बताओ, वरना लंगड़ी चाल दिखाओ।" जब नर्तकी दल इस पहेली का जवाब नहीं दे पाती, तब अशोक कुमार जवाब देते हैं - "अब सुनो जवाब, माँ को देखा बहन को देखा, देखी भाभी अच्छी, लेकिन अपनी पत्नी को देखा है किस ने विधवा?"

1969 की फ़िल्म ’अनजाना’ में आनन्द बक्शी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, लता मंगेशकर और मुकेश ने फिर एक बार लेकर आए एक पहेली गीत। ’श्री 420’ के "ईचक दाना" के बाद जैसे ऐसे गीतों के लिए लता-मुकेश फ़िक्स हो गए हों। ख़ैर, ’अनजाना’ के पहेली गीत में राजेन्द्र कुमार और बबिता एक दूसरे से पहेलियाँ पूछते हैं। इस गीत के पहेलियों की ख़ासियत यह है कि जवाब में सामने वाला/वाली चार-चार जवाब देता/देती है जो सही है, लेकिन पहेली पूछने वाला/वाली का जवाब तो कुछ और ही है। और सुन्दरता यह है कि जवाब देने वाले का जो चौथा जवाब होता है, उसी से तुक मिलाता हुआ जवाब होता है पहेली पूछने वाले/वाली का। मज़ेदार पहेलियों, ख़ूबसूरत कम्पोज़िशन और बेहतरीन गायकी की वजह से यह गीत काफ़ी मक़बूल हुआ था। इस गीत में शामिल पहेलियों और उनके जवाब इस प्रकार हैं।

वो कौन है वो कौन है जो रूठ जाती है, चीज़ वो नाज़ुक बड़ी है टूट जाती है, बोलो बोलो?
प्रीत?
नहीं।
रीत?
नहीं।
नींद?
नहीं।
डोरी?
डोरी नहीं गोरी।


वो कौन है वो कौन है जग जिससे डरटा है, जागता है रात भर और आहें भरता है, बोलो बोलो?
मोर?
नहीं।
चोर?
नहीं।
चकोर?
नहीं।
दिया?
दिया नहीं पिया।


वो कौन है वो कौन है जो ऐसी होती है, दिल तड़पता है उसका और आँख रोती है, बोलो बोलो?
हवा?
नहीं।
घटा?
नहीं।
धुआँ?
नहीं।
याद?
याद नहीं फ़रियाद।

वो कौन है वो कौन है एक उलझन होती है, दोस्त अगर आती है लेकिन दुश्मन होती है, बोलो बोलो?
रात?
नहीं।
घात?
नहीं।
बारात?
नहीं।
निशानी?
निशानी नहीं जवानी।

वो कौन है वो कौन है परदेस जाती है, प्रेमियों के लेके वो संदेस आती है, बोलो बोलो?
लगन?
नहीं।
किरण?
नहीं।
पवन?
नहीं?
मिट्टी?
मिट्टी नहीं चिट्ठी।


वो कौन है वो कौन है सबको समझाता है, रास्ता ख़ुद अपने घर का भूल जाता है, बोलो बोलो?
धरा?
नहीं।
तारा?
नहीं।
इशारा?
नहीं।
दीवाना?
दीवाना नहीं अनजाना।

और इस तरह से फ़िल्म के शीर्षक के साथ यह पहेली गीत सम्पन्न होता है।

70 के दशक में पहेली वाले गीत लगभग ख़त्म हो गए। बस 1972 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ में गीत था "तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, आगे तीतर, पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर?"। आशा भोसले, मुकेश, सिम्मी गरेवाल और बच्चों की आवाज़ों में हसरत जयपुरी का लिखा और शंकर-जयकिशन का स्वरबद्ध यह गीत एक अनोखा गीत है। वैसे सिर्फ़ मुखड़े में ही तीतर वाली पहेली है, बाक़ी गीत के अन्तरों में पहेलियाँ नहीं बल्कि ’स्पूनरिज़्म’ की पंक्तियाँ  हैं (स्पूनरिज़्म का अर्थ है दो या ‍अधिक शब्दों के आरम्भिक अक्षरों का आकस्मिक हेर-फेर या स्थानान्तरण जिससे पंक्ति बोलने में मुश्किल होती है)। 80 के दशक में बस एक पहेली भरा गीत आया 1985 की फ़िल्म ’अर्जुन’ में। जावेद अख़्तर का लिखा, राहुल देव बर्मन का संगीतबद्ध किया और आशा भोसले, डिम्पल, सनी देओल और बच्चों का गाया यह गीत है "मुन्नी पप्पु और चुनमुन, आओ पहेली बूझे हम..."। इस गीत में टीचर बनी डिम्पल कापड़िया छोटे बच्चों को पहेलियाँ पूछती हैं, लेकिन सनी देओल हर पहेली के जवाब में "नौकरी" बोल देते हैं। सनी के इस तरह से "नौकरी" का दोहराव इस फ़िल्म के भाव (बेरोज़गारी) को सुन्दर तरीके से उजागर करता है। मज़े की बात यह भी है कि ’श्री 420’ वाले "ईचक दाना" में भी कुछ कुछ इसी तरह का सिचुएशन है। राहुल रवैल ने शायद उस गीत से प्रेरणा लेकर ’अर्जुन’ के इस गीत की कल्पना की होगी। इस गीत में शामिल पहेलियों पर ग़ौर किया जाए! 

"आए कहाँ से ख़बर नहीं, क्यों क्यों आए नज़र नहीं, जिए न हम वो अगर नहीं, उसकी ज़रूरत हर पल सुबह शाम, बोलो बच्चों क्या है उसका नाम?" 
"नौकरी?" 
"जी नहीं, हवा।"


"उसकी सुबह उसके दिन, उसके कारण ये पलछिन, दुनिया अंधेरी उसके बिन, दूर बहुत है लेकिन उसका धाम, बोलो चुनमुन क्या है उसका नाम?"
"घड़ी?"
"नहीं रे बाबा।"
"नौकरी?"
"मैं बताऊँ, मैं बताऊँ? सूरज।"

"उसका प्यार ज़माने में है आज, सुन्दर और अनूप है, ठंडी मीठी धूप हैं वो, इक देवी का रूप है वो, उसक प्यार ज़माने में है आज, बोलो मुन्नी क्या है उसका नाम?"
"नौकरी?"
"जी नहीं, माँ।"

फ़िल्म ’अर्जुन’ के इस गीत के साथ ही फ़िल्मी गीतों में पहेलियों का सिलसिला हमेशा के लिए ख़त्म हो गया। लेकिन इन गिने-चुने पहेली गीतों ने फ़िल्म-संगीत के धरोहर में विविधता लाने की कोशिशें की और इसी वजह से ये गीत अलग हट कत सुनाई देते हैं और इन्हें रसिकों ने अपने दिल के क़रीब रखे हुए हैं।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

संगीत-साम्राज्ञी विदुषी गिरिजा देवी की स्मृतियों को सादर नमन


स्वरगोष्ठी – विशेष अंक में आज


विदुषी गिरिजा देवी को भावपूर्ण स्वरांजलि

“बाबुल मोरा नैहर छूटल जाए...”

याल, ठुमरी, चैती, कजरी आदि की अप्रतिम गायिका विदुषी गिरिजा देवी का गत 24 अक्टूबर, मंगलवार को कोलकाता के एक निजी चिकित्सालय में निधन हो गया। वे 88 वर्ष की थी। पिछले कुछ दिनो से वे अस्वस्थ थी। उनके निधन से पूरब अंग ठुमरी का एक महत्वपूर्ण स्थान रिक्त हो गया। उप-शास्त्रीय संगीत को वर्तमान में संगीत के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने में विदुषी गिरिजा देवी के योगदान को सदियों तक स्मरण किया जाता रहेगा। आयु के नौवें दशक में भी सक्रिय गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को कला और संस्कृति की राजधानी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत से उनका विशेष लगाव था। मात्र पाँच वर्ष की गिरिजा के लिए उन्होने संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी ने स्वीकार किया है कि उनके प्रथम गुरु उनके पिता ही थे। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। नौ वर्ष की आयु में ही एक हिन्दी फिल्म ‘याद रहे’ में गिरिजा देवी ने अभिनय भी किया था। गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उनके पति मधुसूदन जैन भी संगीत और काव्य-प्रेमी थे। उन्होने गिरिजा देवी की कला को सदा प्रोत्साहित किया। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कौन रोक सका है? 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूट रहीं थीं। संगीत के क्षेत्र में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय संगीत को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का जो अभियान छेड़ा था, उसका सार्थक परिणाम आज़ादी के बाद नज़र आने लगा था। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। 1949 में रेडियो से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई, वह आज तक जारी है। गिरिजा देवी ने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी अपना योगदान किया। 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी ने आमंत्रित किया। वहाँ रह कर उन्होने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये, बल्कि शोधकार्य भी कराये। इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक विद्यार्थियों को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी को 1972 में ‘पद्मश्री’, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1999 में ‘पद्मभूषण’ और 2010 में संगीत नाटक अकादमी का फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किये गए। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतन्त्रता से पूर्व काल के संगीत की विशेषज्ञ और संवाहिका रही हैं। ऐसी विदुषी को सभी संगीत-प्रेमियों की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम आपको उन्हीं के स्वरों में पहले एक चैती गीत और फिर नवाब वाजिद अली शाह की एक ठुमरी राग भैरवी में पिरोयी हुई सुनवा रहे हैं। चैती गीत की भाव-भूमि लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है। आप उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए यह चैती गीत ठुमरी सुनिए।

चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : स्वर - विदुषी गिरिजा देवी



ठुमरी भैरवी : "बाबुल मोरा नैहर छूटल जाए..." : स्वर - विदुषी गिरिजा देवी



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथा विश्वसनीय

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको नई-पुरानी, प्रसिद्ध-अल्पज्ञात, मौलिक-अनूदित, हर प्रकार की हिंदी कहानियाँ सुनवाते रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में कविता वर्मा की लघुकथा "अहसास" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथा "विश्वसनीय", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 53 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। लघुकथा का गद्य 'सेतु पत्रिका' पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

सुदर्शन रत्नाकर
अनेक साहित्यक संस्थानों द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित। हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 2013-14 का 'श्रेष्ठ महिला रचनाकार' का पुरस्कार। केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुस्तकें एवं कहानियाँ पुरस्कृत।

हर सप्ताह "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

“शायद रखते हुए तुम्हारे हाथ से एक झुमका गिर गया था।”
(सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथा "विश्वसनीय" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें।
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
विश्वसनीय MP3

#Eighteenth Story, Vishwasneey: Sudarshan Ratnakar/Hindi Audio Book/2017/18. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

फ़िल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 11 || राजेंद्र कुमार

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 11
Rajendra Kumar

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के ग्यारहवें एपिसोड में सुनिए कहानी राजेंद्र कुमार की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 
नूतन 
हृषिकेश मुखर्जी 
मजरूह सुल्तानपुरी
साधना 
एस डी बर्मन

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

ठुमरी भैरवी : SWARGOSHTHI – 340 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 340 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : ठुमरी भैरवी

पण्डित भीमसेन और सहगल के स्वर में लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती कालजयी ठुमरी – “बाबुल मोरा...”




कुन्दनलाल सहगल
पण्डित भीमसेन जोशी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक हम आपको अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सुविख्यात ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ का गायन पारम्परिक और फिल्मी दोनों रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग भैरवी की इस ठुमरी का पारम्परिक गायन पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में और फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ मेँ कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। 



ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी
ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी युगल ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस युगल ठुमरी में किस गायक और गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 28 अक्टूबर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 342वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 338वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म – “सौतेला भाई” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारे तीन पाठकों ने केवल एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है। चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और हमारी एक नई प्रतिभागी अंजलि जोशी को केवल एक-एक अंक ही दिया जाता है। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस सातवीं कड़ी में आपने एक पारम्परिक ठुमरी को राग भैरवी में पण्डित भीमसेन जोशी और फिल्मी रूप का सुविख्यात गायक कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

चित्रकथा - 41: भाई-दूज विशेष: फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ

अंक - 41

भाई-दूज विशेष: फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ


"एक हज़ारों में मेरी बहना है..." 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज रक्षाबंधन है, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। दोस्तों, हिन्दी सिने संगीत जगत में कई भाई-बहन की जोड़ियों ने काम किया है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर आइए ’चित्रशाला’ के ज़रिए याद करें कुछ ऐसे भाई-बहनों को जिन्होंने फ़िल्म संगीत को समृद्ध किया है। तो आइए क्यों ना आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में हम याद करें कुछ ऐसी ही भाई-बहन की जोड़ियों को जिन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में अपनी पहचान बनाई हैं, अपनी छाप छोड़ी है।




क ही परिवार के दो भाई या दो बहनों के फ़िल्म संगीत जगत में काम करने के उदाहरण तो हमें बहुत से मिल जायेंगे, पर एक ही परिवार से एक भाई और एक बहन की जोड़ियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर की तरफ़ चलें तो सबसे पहले जिस भाई-बहन की जोड़ी हमें याद आती है, वह है सुनहरे दौर के फ़िल्म संगीतकारों में भीष्म-पितामह की हैसियत रखने वाले संगीतकार अनिल बिस्वास और फ़िल्म संगीत की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की जोड़ी। पारुल घोष अनिल दा से दो वर्ष छोटी थीं। भाई बहन दोनों में संगीत के बीज बोये उनकी माँ ने जिन्हें संगीत से बहुत लगाव था। पारुल का विवाह अनिल दा के मित्र और बांसुरी नवाज़ पंडित पन्नालाल घोष से सम्पन्न हुआ और संगीत की धारा बहती चली गई। भाई ने अपनी बहन को अपने द्वारा स्वरबद्ध किए हुए बहुत से गीत गवाए, जिनमें पारुल घोष का सबसे हिट गीत "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" भी शामिल है।

अनिल बिस्वास - पारुल घोष के बाद जिस जोड़ी का ज़िक्र हमारे ज़हन में आता है, वह है पार्श्वगायिका गीता दत्त और कमचर्चित संगीतकार मुकुल रॉय की। मुकुल रॉय जो आजकल महाराष्ट्र के नासिक में रहते हैं, उन्होंने अपनी बहन गीता दत्त की जीवनी "Geeta Dutt - The Skylark" को प्रकाशित करने में लेखिका हेमन्ती बनर्जी की बहुत सहायता की है। मुकुल रॉय अपनी बहन की तरह कामयाब तो नहीं हुए, पर ’सैलाब’, ’डीटेक्टिव’ और ’भेद’ जैसी फ़िल्मों में उनके स्वरबद्ध गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। गीता दत्त की आवाज़ में ’डीटेक्टिव’ का "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" और ’सैलाब’ का "है यह दुनिया कौन सी ऐ दिल" गली गली गूंजा करता था। मुकुल अपनी बहन के बहुत करीब थे और गीता दत्त की ज़िन्दगी में जब निराशा और हताशा ने घर कर लिया था, तब मुकुल ही थे जिन्होंने उनका हमेशा साथ दिया। गुरु दत्त और गीता दत्त की असामयिक मृत्यु के बाद इनकी संतानों - तरुण और अरुण - को मुकुल रॉय ने ही बड़ा किया। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

एक ऐसा परिवार जिसने फ़िल्म संगीत जगत को शायद सर्वाधिक योगदान दिया है, वह है मंगेशकर परिवार। चार बहनों और एक भाई ने मिल कर संगीत का ऐसा ताना-बाना बुना है कि फ़िल्म संगीत का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसके कम से कम आधे हिस्से में इस परिवार के किसी ना किसी का उल्लेख रहेगा। मंगेशकर परिवार के बारे में नई बात बताने को अब कुछ बाक़ी नहीं बचा है। लता, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ - चार बहनें और एक भाई - स्वाभाविक है कि इन चारों दीदी से हृदयनाथ को अपार प्यार मिला। हालाँकि हृदयनाथ हिन्दी फ़िल्म जगत में ज़्यादा काम नहीं कर सके, पर मराठी और ग़ैर फ़िल्म-संगीत में उनका योगदान उल्लेखनीय है। लता, आशा और उषा ने उनके बहुत सी सुन्दर रचनाओं को कंठ दिया है। मंगेशकर परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अगली पीढ़ी में भी जारी रहा। आशा की संताने - हेमन्त और वर्षा - जब संगीतकार और गायिका बनीं तब आशा की ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। आशा के शब्दों में, "कोई भी क्षण ज़िन्दगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है ना? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मिली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। यह क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। और वह गाना था फ़िल्म ’जादू-टोना’ का "यह गाँव प्यारा-प्यारा..."।" अफ़सोस की बात है कि हेमन्त और वर्षा, दोनों में से किसी को भी सफलता नहीं मिली, और वर्षा ने तो हाल ही में आत्महत्या भी कर ली।

भाई-बहन का रिश्ता हमेशा ख़ून का ही रिश्ता हो यह ज़रूरी नहीं। लता मंगेशकर का मदन मोहन के साथ सगे भाई जैसा ही रिश्ता था। इस रिश्ते की शुरुआत और पहली बार राखी बंधवाने का क़िस्सा लता के शब्दों में कुछ यूं है - "मैं पहली बार मदन भ‍इया से उनका स्वरबद्ध कोई गीत गाने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ एक डुएट गीत गाने के लिए मिली थी। मास्टर ग़ुलाम हैदर ने हम दोनो को फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन के रिश्ते के गीत को गाने के लिए बुलाया था जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले मेरा छोटा सा दिल डोले..."। गीत के बाद हम दोनों ने एक दूसरे की तारीफ़ की और तुरन्त हमारे बीच एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने मुझसे यह वादा लिया कि जब भी वो संगीतकार बनेंगे तो उनकी पहली फ़िल्म में मुझे गाना पड़ेगा। मैंने वादा किया। पर किसी कारण से मैं उनकी पहली फ़िल्म ’आँखें’ में नहीं गा सकी और हमारे मीठे रिश्ते में एक खटास आई। मदन भ‍इया का दिल टूट गया। पर कुछ ही दिनों में मदन भ‍इया हमारे घर आए और कहा कि हमारा रिश्ता भाई-बहन के एक प्यार भरे गीत से शुरु हुआ था, आज रक्षाबंधन है, मेरी कलाई पर यह राखी बाँधो और वादा करो कि हम हमेशा भाई-बहन रहेंगे और तुम हमेशा मेरे लिए गाओगी। उन्हें राखी बाँधते हुए मेरी आँखों से आँसू टपकने लगी।"

संगीत के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण परिवार रहा है पंडित जसराज जी का। सुलक्षणा, विजेता, जतिन और ललित उन्हीं के भतीजी/भतीजे हैं। जब जतिन और ललित फ़िल्म जगत में आए तब तक सुलक्षणा फ़िल्मों से संयास ले चुकी थीं। इसलिए सुलक्षणा द्वारा जतिन-ललित के किसी गीत के गाने की जानकारी नहीं है। छोटी बहन विजेता ने ज़रूर जतिन-ललित के निर्देशन में कुछ गीत गाई हैं जिनमें "जवाँ हो यारों यह तुमको हुआ क्या" (जो जीता वही सिकन्दर) और "सच्ची यह कहानी है" (कभी हाँ कभी ना) चर्चित रहे। मंगेशकर और पंडित परिवार के बाद अब ज़िक्र शिवराम परिवार का। संगीतकार पंडित शिवराम कृष्ण का नाम आज लोग लगभग भुला चुके हैं पर चार पीढ़ियों से उनका परिवार संगीत की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। संगीतकार जोड़ी जुगल किशोर और तिलक राज उन्हीं के बेटे हैं जिन्होंने ’भीगी पलकें’, ’समय की धारा’ आदि फ़िल्मों में संगीत दिया है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ को दिए एक साक्षात्कार में जुगल किशोर जी ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए अपनी बहनों का भी उल्लेख किया था कुछ इस तरह - "तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत उसी ने ही गाया था। हम लोग आठ भाई बहने हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेअर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेअर, तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।" अपनी बहन के नाम पर ऑरकेस्ट्रा रखने वाले जुगल किशोर और तिलक राज ने अपनी बहन जयश्री को फ़िल्म ’समय की धारा’ और ’तेरे बिना क्या जीना’ में गीत गवाया था। मशहूर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने बरसों पहले अपनी बेटी रीमा को लौन्च किया था, और अब हाल में उनके बेटे बप्पा ने भी फ़िल्म जगत में क़दम रख दिया है। नए-नए संगीतकार बने बप्पा लाहिड़ी ने बहन रीमा को अपनी पहली फ़िल्म ’जय वीरू’ में हार्ड कौर के साथ एक गीत गवाया है "ऐसा लश्कारा..."। 

अब तक जितने भी भाई-बहन जोड़ियों की हमने बातें की, उन सब में भाई संगीतकार और बहन गायिका हैं। अब ज़िक्र करते हैं उन भाई-बहन जोड़ियों की जिनमें भाई और बहन दोनो ही गायक/गायिका हैं। पहली जोड़ी है नाज़िया हसन और ज़ोहेब हसन की। नाज़िया और ज़ोहेब, दोनों का बचपन कराची और लंदन में बीता। 70 के दशक के अन्त में दोनो ने साथ मिल कर "संग संग चलें" और "कलियों का मेला" जैसे लोकप्रिय म्युज़िकल शोज़ में गाया। 1976 में दोनो नज़र आये Beyond the Last Mountain फ़िल्म के एक गीत में। नाज़िया हसन की पहली और बेहद कामयाब ऐल्बम ’डिस्को दीवाने’ में ज़ोहेब की भी आवाज़ शामिल थी। इसके बाद ’बूम बूम’ ऐल्बम भी ख़ूब चला, जिसके गाने ’स्टार’ फ़िल्म में लिया गया। बप्पी लाहिड़ी ने नाज़िया और ज़ेहेब से फ़िल्म ’शीला’ में गीत गवाये। नाज़िय को जितनी लोकप्रियता हासिल हुई, भाई ज़ोहेब को उतनी कामयाबी नहीं मिली। अफ़सोस की बात है कि मात्र 35 वर्ष की आयु में नाज़िया हसन इस दुनिया से चल बसीं और भाई-बहन की यह जोड़ी टूट गई। सरहद के इस पार इसी तरह की एक जोड़ी रही है शान और सागरिका की। पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम जमाने से पहले संगीतकार मानस मुखर्जी के बेटे शान ने अपनी बड़ी बहन सागरिका के साथ मैगनासाउण्ड कंपनी के साथ एक अनुबन्ध किया और कई ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स में गाये जिनमें ’नौजवान’ और ’Q – Funk’ ख़ास चर्चित रहे। जिस तरह से बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब की जोड़ी को काफ़ी काम दिये, वैसे ही शान और सागरिका से भी बहुत से गीत और रीमिक्स गवाये। शान-सागरिका की जोड़ी भी बहुत ज़्यादा नहीं चल सकी क्योंकि शान पार्श्वगायन में व्यस्त हो गए और सागरिका का भी अपना अलग स्टाइल था। पर भाई-बहन के आपसी रिश्ते में कभी दरार नहीं आई। मशहूर पार्श्वगायिका अलका याज्ञनिक ने अपने भाई समीर याज्ञनिक के साथ मिल कर एक प्राइवेट ऐल्बम ’दिल था यहाँ अभी’ में गीत गाए। अपने भाई को बढ़ावा मिल सके इसी उद्देश्य से अलका ने यह ऐल्बम की जिसके गीत पसन्द तो बहुत किए गए पर समीर के करीयर को सँवारने में यह ऐल्बम असफल रही।

इस तरह से हर दशक में भाई-बहन की जोड़ियाँ हिन्दी फ़िल्म-संगीत जगत में आती रही हैं और शायद आगे भी आती रहेंगी, और यह परम्परा यूं ही चलती रहेगी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

फ़िल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 10 || एस डी बर्मन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 10
S.D.Burman 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के दसवें एपिसोड में सुनिए कहानी बेमिसाल बर्मन दा की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 
नूतन 
हृषिकेश मुखर्जी 
मजरूह सुल्तानपुरी
साधना 


रविवार, 15 अक्तूबर 2017

ठुमरी भैरवी, खमाज और अड़ाना : SWARGOSHTHI – 339 : THUMARI BHAIRAVI, KHAMAJ & ADANA




स्वरगोष्ठी – 339 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 6 : ठुमरी भैरवी, खमाज और अड़ाना

तीन भिन्न रागों में रसूलन बाई, रोशनआरा बेगम और लता मगेशकर से सुनिए एक ठुमरी – “जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...”




लता मंगेशकर
रोशनआरा बेगम  और  रसूलन  बाई 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हमने आपके लिए एक ऐसी पारम्परिक ठुमरी का चयन किया है, जिसके पारम्परिक स्वरूप को तीन अलग-अलग रागों में अपने समय की सुविख्यात गायिकाओं- रसूलन बाई और रोशनआरा बेगम ने स्वर दिया है, तो इसी ठुमरी के परिमार्जित फिल्मी संस्करण को लता मंगेशकर ने अनूठे अंदाज से प्रस्तुत किया है। लता जी के स्वर में यह फिल्मी ठुमरी गीत फिल्म “सौतेला भाई” से लिया गया है।




ठुमरी भैरवी : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : विदुषी रसूलन बाई
ठुमरी खमाज : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : रोशनआरा बेगम
राग अड़ाना : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – सौतेला भाई




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 339वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस विख्यात नायक और गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 21 अक्टूबर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 341वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 337वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित फिल्म – “बाजूबन्द” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस छठी कड़ी में आपने एक ही पारम्परिक ठुमरी को राग भैरवी, खमाज और अड़ाना में क्रमशः रसूलन बाई, रोशनआरा बेगम और फिल्मी रूप लता मंगेशकर के स्वरों में रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ