रविवार, 31 जनवरी 2016

राग छायानट : SWARGOSHTHI – 255 : RAG CHHAYANAT



स्वरगोष्ठी – 255 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 3 : राग छायानट

राग छायानट के स्वरों में दो ठुमकती प्रस्तुतियाँ



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला के तीसरे अंक में आज हम राग छायानट के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही इस राग में पहले पण्डित सत्यशील देशपाण्डे के स्वर में एक आकर्षक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे और फिर राग छायानट के स्वरो पर आधारित फिल्म ‘तलाश’ का एक गीत गायक मन्ना डे की आवाज़ में सुनवाएँगे।



जबहिं थाट कल्याण में, दोनों मध्यम पेखि,
प रे वादी-संवादि सों, छायानट को देखि।

दोनों मध्यम स्वर वाले रागों के क्रम में तीसरा राग ‘छायानट’ है। इससे पूर्व की कड़ियों में आपने राग कामोद और केदार का रसास्वादन किया था। यह दोनों राग, कल्याण थाट से सम्बद्ध हैं और इनको रात्रि के पहले प्रहर में ही गाने-बजाने की परम्परा है। आज का राग छायानट भी इसी वर्ग का राग है। राग छायानट, कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अवरोह में काभी-कभी राग की सुन्दरता को बढ़ाने के लिए विवादी स्वर के रूप में कोमल निषाद स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग दो पंचम स्वरों के बीच होता है। परन्तु गान्धार और पंचम स्वरों के बीच तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग कभी नहीं किया जाता। राग छायानट में तीव्र मध्यम स्वर को थाट-वाचक स्वर माना गया है। इसी आधार पर यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कुछ विद्वान इस राग में तीव्र मध्यम का प्रयोग नहीं करते और इसे बिलावल थाट का राग मानते है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। कुछ विद्वान इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ मानते हैं, किन्तु ऐसा मानने पर यह राग उत्तरांग प्रधान हो जाएगा। वास्तव में ऐसा है नहीं, राग में ऋषभ का स्थान इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे वादी स्वर माना जाता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का प्रथम प्रहर माना जाता है।

पं.सत्यशील देशपाण्डे
आपको राग छायानट का उदाहरण सुनवाने के लिए हमने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित सत्यशील देशपाण्डे के स्वरों में इस राग की एक आकर्षक बन्दिश का चयन किया है। पण्डित सत्यशील देशपाण्डे एक सृजनशील संगीतज्ञ और गायक हैं। 9 जनवरी, 1951 को मुम्बई में जन्मे पण्डित सत्यशील जी प्रख्यात संगीतज्ञ पण्डित वामनराव देशपाण्डे के पुत्र और शिष्य हैं। उनकी संगीत की शिक्षा जिस परिवेश में हुई उस परिवेश में पण्डित भीमसेन जोशी, विदुषी मोंगूबाई कुरडीकर पण्डित वसन्तराव देशपाण्डे, पण्डित कुमार गन्धर्व जैसे दिग्गज संगीतज्ञ छाए हुए थे। इनमें से पण्डित कुमार गन्धर्व की शैली ने पण्डित सत्यशील देशपाण्डे पर सर्वाधिक प्रभाव छोड़ा। आगे चल कर कुमार जी इनके प्रमुख गुरु बने। वर्तमान में पण्डित जी भावपूर्ण और कलात्मक गायकी में सिद्ध हैं। उन्होने कुछेक फिल्मों में भी अपनी गायकी का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्ष 1982 में प्रदर्शित फिल्म ‘विजेता’ में राग अहीरभैरव के स्वरों में गीत- ‘मन आनन्द आनन्द छायों...’ और 1991 में प्रदर्शित फिल्म ‘लेकिन’ में राग बिलासखानी तोड़ी के स्वरो पर आधारित गीत- ‘झूठे नैना बोलें साँची बतियाँ...’। आज के अंक में हम आपको पण्डित सत्यशील देशपाण्डे से राग छायानट की एक आकर्षक बन्दिश सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश के बोल हैं- ‘झनन झनन नन बाजे बिछुआ...’


राग छायानट : ‘झनन झनन नन बाजे बिछुआ...’ : पण्डित सत्यशील देशपाण्डे 




संगीतकार सचिनदेव बर्मन
राग छायानट का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रन्थों, जैसे- राग लक्षण, संगीत सारामृत, संगीत पारिजात आदि में मिलता है। परन्तु इन ग्राथों में राग छायानट का जो स्वरूप वर्णित किया गया है, वह आधुनिक छायानट से भिन्न है। अहोबल रचित ग्रन्थ ‘संगीत पारिजात’ में राग छायानट का जैसा स्वरूप दिया गया है वह आधुनिक छायानट के स्वरूप से थोड़ा समान है। राग छायानट का स्वरूप राग छाया और राग नट के मेल से बना है। इसमें सा रे, रे ग म प तथा सा रे सा, नट के और परे, रे ग म प, ग म रे सा, छाया राग के अंग हैं। परन्तु वर्तमान में छायानट का संयुक्त रूप इतना अधिक प्रचलित है कि बहुत कम संगीतज्ञों का ध्यान इसके दो मूल रागों पर जाता है। राग छायानट में इन दो रागों का मेल तो है ही, राग को गाते-बजाते समय कई अन्य रागों का आभास भी होता है, जैसे - अल्हैया बिलावल, कामोद और केदार। 

गायक मन्ना डे
राग छायानट पर आधारित एक फिल्मी गीत अब हम आपको सुनवाते हैं। यह राग आधारित गीत फिल्म ‘तलाश’ से पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में है। हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायकों में मन्ना डे ऐसे गायक हैं जो गीतों की संख्या से नहीं बल्कि गीतों की गुणबत्ता और संगीत-शैलियों की विविधता से पहचाने जाते हैं। पूरे छः दशक तक फिल्मों में हर प्रकार के गीतों के साथ-साथ राग आधारित गीतों के गायन में मन्ना डे का कोई विकल्प नहीं था। मन्ना डे के स्वर में आज का यह गीत राग छायानट पर आधारित है, जिसके संगीतकार है, सचिनदेव बर्मन। बर्मन दादा मन्ना डे की प्रतिभा से भलीभाँति परिचित थे। अपने आरम्भिक दौर में बर्मन दादा मन्ना डे के चाचा के.सी. डे से मार्गदर्शन प्राप्त करते थे। कुछ फिल्मों में मन्ना डे, बर्मन दादा के सहायक भी रहे। 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘मशाल’ में मन्ना डे का गाये और बर्मन दादा का संगीतबद्ध किये गीत- ‘ऊपर गगन विशाल...’ को अपार सफलता मिली और दोनों कलाकार स्थापित हो गए। 1969 की फिल्म ‘तलाश’ के लिए बर्मन दादा ने राग ‘छायानट’ पर आधारित एक गीत- ‘तेरे नैना तलाश करें जिसे...’ की संगीत रचना की। इस गीत को स्वर देने के लिए दादा के सामने मन्ना डे का कोई विकल्प नहीं था। सितारखानी ताल में निबद्ध इस गीत को गाकर मन्ना डे ने फिल्म के प्रसंग के साथ-साथ राग ‘छायानट’ का पूरा स्वरूप श्रोताओं के सम्मुख उपस्थित कर दिया है। बर्मन दादा ने तबला, तबला तरंग के साथ दक्षिण भारतीय ताल वाद्य मृदंगम का प्रयोग कर गीत को मनमोहक रूप दिया है। लीजिए, आप भी सुनिए दो सुरीले कलाकारों की मधुर कृति और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग छायानट : ‘तेरे नैना तलाश करें जिसे...’ : मन्ना डे : फिल्म – तलाश





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 255वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 6 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 257वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 253 की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – केदार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। इन विजेताओं में अहमदाबाद, गुजरात के अश्विनी विचारे ने पहली बार प्रतियोगिता में भाग लिया है। अश्विनी जी का ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक अभिनन्दन है।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के तीसरे अंक में आपने राग छायानट की चर्चा के सहभागी थे। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे एक पाठक और श्रोता नीरद जकातदार ने निम्नलिखित फरमाइश की है-

Respected Sir,

We would really appreciate if artists like Pt.Manu Srivastava gets a chance to perform with you. Manu Srivastava born and brought up in USA and performed all over in USA, Canada and India too. .He also runs an academy in USA named as 'Phoenix Gharana', where more than 300 students learning Indian Classical Music. And incredibally all our students learning and performing all over usa and getting such huge response. Manu sir has now performed in large crowds of India as well including prestigious Balagandharva Sangeet Mahotsav.
Sir, We want to grow indian classical music well not only in usa but also in india too. And for that purpose we won't mind in supporting you. As we are well aware that ,to organize good concerts of indian classical music, needs good financial background support.
Phoenix Gharana is looking to collaborate with major organizations like you and may be it would be beneficial for both parties in the future to collaborate and grow and take things overseas. We will support you in all ways possible if you are really working on grass route to promote Indian Classical Music...Lets Indian Classical Music reaches upto golden peak.. and i assure you, you will love my guru's performance and enjoy it. Hoping a positive response from you. We can have plan out everything if you are interested...You can find him on youtube too, also you can visit our official website of Phonenix Gharana.

Regards, Nirad Jakatdar

धन्यवाद, नीरद जी। हम आपकी फरमाइश को पूरा करने का प्रयत्न अवश्य करेंगे। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


शनिवार, 30 जनवरी 2016

चित्रशाला - 06: फ़िल्मों में महात्मा गांधी

चित्रशाला - 06

फ़िल्मों में महात्मा गांधी




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज 30 जनवरी, शहीद दिवस है। आज ही के दिन सन् 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का देहवसान हुआ था। स्वाधीनता के बाद आज के इस दिन को राष्ट्र ’शहीद दिवस’ के रूप में पालित करता है। आइए बापू और इस देश पर अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आज की इस विशेष प्रस्तुति में उन फ़िल्मों की चर्चा करें जो या तो महात्मा गांधी पर आधातित हैं या जिनमें उन्हें विशिष्टता से दिखाया गया है।




हात्मा गांधी जी पर बनने वाली फ़िल्मों की चर्चा शुरू करने से पहले एक रोचक तथ्य बताना चाहता हूँ। साल 1934 में पुणे की ’प्रभात फ़िल्म कंपनी’ ने ’अमृत मंथन’ फ़िल्म की अपार सफलता के बाद संत एकनाथ पर एक फ़िल्म बनाना चाहा था। शुरुआत में इस फ़िल्म का सीर्षक ‘महात्मा’ रखा गया था, पर ब्रिटिश राज की आपत्ति को ध्यान में रखते हुए सेन्सर बोर्ड ने इस शीर्षक की अनुमति नहीं दी, और अंत में फ़िल्म का नाम रखा गया ‘धर्मात्मा’। इसी से पता चलता है कि ब्रिटिश शासन को महात्मा गांधी के चरित्र से कितना डर था। ख़ैर, शोध करते हुए पता चला कि गांधी जी पर बनने वाली सबसे पुरानी फ़िल्म है ’Mahatma Gandhi, 20th Century Prophet’। यह 1941 की एक वृत्तचित्र है जिसका निर्माण भ्रमण-लेखक व पत्रकार ए. के. चेट्टिआर ने किया था। इस फ़िल्म में गांधी जी द्वारा एक विदेशी पत्रकार को दिए साक्षात्कार का विडियो फ़ूटेज भी दिखाया गया है। 1941 में बनने के बावजूद अंग्रेज़ों के डर से इस फ़िल्म का प्रदर्शन स्वाधीनता तक नहीं हो सकी। ’नैशनल गांधी म्युज़िअ’म’ के निर्देशक ए. अन्नामलाई के अनुसार इस फ़िल्म को पहली बार 15 अगस्त 1947 को दिखाया गया था, पर उसके बाद यह फ़िल्म 1959 तक कहीं खो गई थी। इस फ़िल्म को अंग्रेज़ी में डब करके 1953 में अमरीका के सैन फ़्रान्सिस्को में 10 फ़रवरी के दिन दिखाया गया था।

साल 1963 में महात्मा गांधी पर जो फ़िल्म बनी, वह थी ’Nine Hours to Rama'। यह फ़िल्म हॉली वूड के निर्देशक मार्क रॉबसन ने बनाई थी। फ़िल्म में गांधी जी की हत्या से पहले नाथुराम गोडसे ने जो नौ घण्टे बिताये थे, उसके बारे में दिखाया गया था। फ़िल्म की कहानी लिखी थी नेल्सन गिदिंग् जो आधारित थी स्टैन्ली वोल्पर्ट के इसी शीर्षक के किताब पर। फ़िल्म में गांधी जी का रोल निभाया था अभिनेता जे. एस. कश्यप ने और नाथुराम गोडसे का रोल निभाया था Horst Buchholz ने। इसके बाद 1968 में गांधी जी पर एक वृत्तचित्र बनी थी। फ़िल्म का नाम था ’Mahatma - Life of Gandhi (1869 - 1948)'। इस फ़िल्म में गांधी जी के जीवन की कहानी और उनकी अनवरत सत्य की खोज को दिखाया गया है। अंग्रेज़ी में बनी इस श्याम-श्वेत फ़िल्म में गांधी जी की कही बातों का वाचन किया गया था। फ़िल्म की पटकथा, वाचन और निर्देशन किया था विट्ठलभाई ज़वेरी ने। 33 रील की फ़िल्म की लम्बाई थी पाँच घण्टे नौ मिनट। फ़िल्म को ’गांधी नैशनल मेमोरियल फ़ण्” ने ’फ़िल्म्स डिविज़न ऑफ़ इण्डिय” के सहयोग से बनाया था।

1982 में अब तक की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म बनी जिसका नाम था ’गांधी’। रिचर्ड ऐटेन्बोरो की इस फ़िल्म में गांधी की भूमिका निभाई थी बेन किन्सले ने। फ़िल्म गांधी जी के जीवन के विभिन्न संस्मरणों पर आधारित थी। इस फ़िल्म में गांधी जी के जीवन की अलग अलग घटनाओँ को दर्शाया गया। इसके बाद सन् 1993 में एक फ़िल्म आई केतन मेहता की ’सरदार’। फ़िल्म की कहानी सरदार पटेल के जीवन पर आधारित थी। फ़िल्म सरदार पटेल और महात्मा गांधी के आज़ादी के लिए किए गए संघर्ष को दर्शाती है। इसमें दिखाया गया कि शुरुआत में सरदार आज़ादी के लिए गांधी जी की बनाई नीतियों का विरोध किया करते थे, पर गांधी जी के एक भाषण को सुनने के बाद उनकी सोच बदल गई। फ़िल्म में सरदार की भूमिका निभाई थी परेश रावल ने और गांधी जी की भूमिका को निभाने का सौभाग्य मिला था अभिनेता अन्नु कपूर को। इस फ़िल्म में नेहरु का रोल किया था बेंजमिन गिलानी ने।

1996 में फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने भी महात्मा गांधी पर फ़िल्म बनाई ’The Making of Mahatma', फ़िल्म की कहानी फ़ातिमा मीर की लिखी किताब ’The Apprenticeship of Mahatma' पर आधारित थी। फ़िल्म में गांधी जी के साथ दक्षिण अफ़्रीका में बिताए गए समय के बारे में बताया गया है। फ़िल्म में युवा गांधी का रोल किया था अभिनेता रजत कपूर ने। 2000 में जब्बर पटेल निर्मित फ़िल्म ’डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर’ में महात्मा गांधी की भूमिका निभाई अभिनेता मोहन गोखले ने। इस किरदार के लिए मोहन गोखले को काफ़ी वाह-वाही मिली थी। 2000 में ही कमल हासन ने फ़िल्म बनाई ’हे राम’, इस फ़िल्म में भी नाथुराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के बारे में दिखाया गया था। फ़िल्म में गांधी जी की भूमिका निभाई नसीरुद्दीन शाह ने जबकि यह भूमिका सबसे पहले मोहन गोखले और अन्नु कपूर को ऑफ़र की गई थी लेकिन उन दोनो ने इनकार कर दिया था। फ़िल्म में कमल ने साकेत राम की भूमिका निभाई थी जो गांधी जी को मारना चाहता था लेकिन बाद में जिसका मानसिक परिवर्तन हो जाता है। 

सन् 2005 में अनुपम खेर ने एक फ़िल्म बनाई ’मैंने गांधी को नहीं मारा’, जिसमें उन्होंने सेवा-निवृत्त हिन्दी प्रोफ़ेसर उत्तम चौधरी का रोल निभाया था जो डीमेन्शिया नामक बीमारी से पीड़ित था और गांधी जी की हत्या के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार समझता था। यहाँ पर यह याद दिलाना ज़रूरी है कि श्याम बेनेगल की चर्चित टीवी धारावाहिक ’भारत एक खोज’ में महात्मा गांधी की भूमिका को अनुपम खेर ने ही निभाया था जो आज तक लोगों को याद है। साल 2006 में विधु विनोद चोपड़ा की फ़िल्म ’लगे रहो मुन्नाभाई’ में भी गांधी जी को एक अलग ढंग से दिखाया गया। इसमें गांधी जी की भूमिका निभाई दिलीप प्रभावलकर ने। 2007 में फिर एक बार गांधी जी पर फ़िल्म बनी ’Gandhi - My Father'। इस फ़िल्म का निर्माण अनिल कपूर ने किया था। फ़िल्म गांधी जी और उनके बेटे हरिलाल के रिश्ते पर आधारित थी। इसमें गांधी जी की भूमिका निभाई थी दर्शन जरीवाला ने और उनके बेटे का रोल किया था अक्षय खन्ना ने। साल 2009 में तेलुगू में ’महात्मा’ नाम से फ़िल्म बनी थी जिसमें श्रीकान्त ने महात्मा का रोल निभाया था। जब भी फ़िल्मों में गांधी जी को कम अवधि वाले रोल में दिखाया गया तो अभिनेता सुरेन्द्र रंजन को उन रोलों के लिए चुना गया। वीर सावरकर, शहीद भगत सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे महानेताओं पर बनने वाली फ़िल्मों में हमने कई बार सुरेन्द्र रंजन को गांधी जी के किरदार में देखा। 

तो यह था जनवरी माह के पाँचवें और अन्तिम शनिवार को प्रस्तुत किया जाने वाला हमारा विशेषांक - 'चित्रशाला'। आज के इस अंक में हमने महात्मा गाँधी के बलिदान दिवस पर उनके किरदारों से सजी फिल्मों की चर्चा। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। 


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





मंगलवार, 26 जनवरी 2016

उषा छाबड़ा की कहानी स्वेटर

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में उन्हीं की कथा "ब्रोचेता एस्पान्या" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, उषा छाबड़ा की शिक्षाप्रद लघुकथा स्वेटर, उन्हीं के स्वर में।

उषा जी साहित्यिक अभिरुचि वाली अध्यापिका हैं। वे पिछले उन्नीस वर्षों से दिल्ली पब्लिक स्कूल ,रोहिणी में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। उन्होंने कक्षा नर्सरी से कक्षा आठवीं तक के स्तर के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें एवं व्याकरण की पुस्तक श्रृंखला भी लिखी हैं। वे बच्चों एवं शिक्षकों के लिए वर्कशॉप लेती रहती हैं। बच्चों को कहानियाँ सुनाना उन्हें बेहद पसंद है। उनकी कविताओं की पुस्तक "ताक धिना धिन" और उस पर आधारित ऑडियो सीडी प्रकाशित हो चुकी हैं। आप उनकी आवाज़ में पंडित सुदर्शन की कालजयी कहानी "हार की जीत" तथा उनकी अपनी कहानियाँ "बचपन का भोलापन" व प्रश्न पहले ही सुन चुके हैं। आप उनसे उनके ब्लॉग अनोखी पाठशाला पर मिल सकते हैं।

इस कहानी स्वेटर का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 56 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



इंसानियत की मशाल सब मिलकर उठाएं
जश्न मानवता का एक जुट हों मनाएं
चलो सब एक हो नया गीत गुनगुनाएं
प्रेम के संदेश को जन जन में फैलाएं
~ उषा छाबड़ा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


"क्या तुम्हें गर्मी ज़्यादा लगती है?”
 (उषा छाबड़ा की लघुकथा "स्वेटर" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
स्वेटर MP3

#Fourth Story, Seater: Usha Chhabra/Hindi Audio Book/2016/4. Voice: Usha Chhabra

रविवार, 24 जनवरी 2016

राग केदार : SWARGOSHTHI – 254 : RAG KEDAR




स्वरगोष्ठी – 254 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 2 : राग केदार

डॉ. एन. राजम् से वायलिन पर और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत में सुनिए राग केदार




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर नये वर्ष की पहली श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा करेंगे, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला के दूसरे अंक में आज हम राग केदार के स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं। राग केदार में पहले हम वायलिन पर डॉ. एन. राजम् द्वारा गायकी अंग में प्रस्तुत एक रचना सुनवाएँगे। पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल स्वरों में एक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद राग केदार के फिल्मी प्रयोग को सुनवाने के लिए फिल्म मुगल-ए-आजम का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।


दो मध्यम केदार में, स म संवाद सम्हार, 
आरोहण रे ग बरज कर, उतरत अल्प गान्धार। 


एन. राजम्
  क्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वाङ्ग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार का अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित वायलिन पर एक आकर्षक रचना सुनवाते हैं। गायकी अंग में यह रचना विश्वविख्यात वायलिन-साधिका डॉ. एन. राजम् ने प्रस्तुत किया है। डॉ. राजम् की वायलिन पर तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए।


राग केदार : वायलिन पर तीनताल में निबद्ध रचना : डॉ. एन. राजम् 




लता मंगेशकर और नौशाद
राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का नियम शिथिल हो जाता है। राग केदार पर आधारित फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए अब हम आपको मुगलकाल के वैभव से युक्त फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का एक गीत सुनवाते हैं। नौशाद की संगीत प्रतिभा को शिखर पर ले जाने में 1960 की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस फिल्म का पूरा संगीत ही अविस्मरणीय रहा है। फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग कर वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके...’। राग सोहनी में निबद्ध इस ठुमरी गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। आज के इस अंक में हमने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ से एक अन्य गीत लिया है, जो राग केदार पर आधारित है। लता मंगेशकर का गाया यह गीत है- ‘बेकस पे करम कीजिये सरकार-ए-मदीना...’, जिसे नौशाद ने राग केदार के स्वरों का आधार लेकर दादरा ताल में निबद्ध किया था। नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ का यह गीत राग केदार पर आधारित गीतों की सूची में एक अच्छा उदाहरण है। आपके लिए प्रस्तुत है यह गीत।


राग - केदार : ‘बेकस पे करम कीजिये...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मुगल-ए-आज़म






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 254वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 30 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 256वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 252 की संगीत पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘चित्रलेखा’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

नए वर्ष की इस पहली पहेली में कुल आठ प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। इन आठ विजेताओं में दो संगीत-प्रेमियों ने पहली बार प्रतियोगिता में भाग लिया है। नए प्रतिभागी है- नागपुर, महाराष्ट्र से प्रशान्त पुराणिक और अहमदाबाद, गुजरात से सौरभ रींडाणी। प्रशान्त जी और सौरभ जी का ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हार्दिक स्वागत है। एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने भी इस बार भाग लिया है। आशा है, दिनेश जी निरन्तरता बनाये रखेंगे। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी आठ प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज आप वर्ष 2016 की नई श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ के दूसरे अंक के साक्षी बने। इस अंक में हमने आपसे राग केदार पर चर्चा की। अगले अंक में हम ‘स्वरगोष्ठी’ पर दोनों मध्यम स्वर से युक्त एक अन्य राग पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


शनिवार, 23 जनवरी 2016

BAATON BAATON MEIN -15: INTERVIEW OF MUSIC DIRECTOR/SINGER SOHAIL SEN

बातों बातों में - 15

संगीतकार और पर्श्वगायक सोहेल सेन से बातचीत 


"आज के म्युज़िक की स्थिति काफ़ी मज़बूत है और दुनिया भर में हमारा संगीत फल-फूल रहा है। "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज जनवरी 2016 का चौथा शनिवार है। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं इस दौर के जाने-माने संगीतकार और पर्श्वगायक सोहेल सेन से की हुई दीर्घ बातचीत के सम्पादित अंश। सोहेल सेन ’Whats your Raashee', 'गुंडे’, ’मेरे ब्रदर की दुल्हन’, और ’एक था टैगर’ जैसी फ़िल्मों में सफल संगीत दे चुके हैं। आइए मिलते हैं उनसे।

    


सोहेल, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर!


नमस्कार, और शुक्रिया आपका मुझे याद करने के लिए।

आपका परिवार कई पीढ़ियों से संगीत की सेवा में लगा हुआ है; जमाल सेन, शम्भु सेन, दिलीप सेन - समीर सेन, और अब इस पीढ़ी में आप। बहुत ख़ुशी हो रही है आपसे बातचीत करने का मौक़ा पाकर।

धन्यवाद!

सोहेल, सबसे पहले तो हम जानना चाहेंगे आपके पारिवरिक उपाधि ’सेन’ के बारे में। जहाँ तक मैं जानता हूँ, यह उपाधि बंगाली समुदाय के लोगों में होती है। तो क्या आपका मूल परिवार बंगाल से था?

जी बिल्कुल नहीं, हम राजस्थान से ताल्लुक रखते हैं। चुरु ज़िले में सुजानगढ़ का नाम आपने सुना होगा...

जी बिल्कुल सुना है

हम वहीं के हैं, हमारे पुर्वज वहीं के हैं।

तो फिर यह "सेन" कहाँ से, मेरा मतलब है....

इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है। हमारा जो ख़ानदान है, वह तानसेन के ज़माने से चला आ रहा है।

तानसेन यानी कि संगीत सम्राट तानसेन??

जी हाँ, 16-वीं शताब्दी में हमारे ख़ानदान में एक हमारे पुर्वज थे जिनका नाम था केसरजी। उन्हें संगीत में गहरी रुचि थी और वो तानसेन के शिष्य बन गए थे। वो संगीत सम्राट तानसेन के ऐसे परम भक्त बन गए, उनके ऐसे उपासक बन गए कि उन्होंने अपने नाम के आगे "सेन" लगाना शुरू कर दिया। इस तरह से हमारे परिवार को "सेन" की उपाधि मिली तानसेन से।

क्या बात है! यह तो बड़ा ही रोमांचक तथ्य है, आज से करीब 500 साल पहले की बात।

जी बिल्कुल! और केसर सेन के बाद भी हम पीढ़ी में संगीत की धारा बहती चली आई, जो अब तक कायम है।

वाक़ई एक महान परिवार है आपका। अच्छा यह बताइए कि केसर सेन के बाद और किन पुर्वजों ने संगीत में योगदान दिया है, उसका इतिहास कुछ बता सकते हैं?

केसर सेन के बाद एक के बाद एक बहुत सी पीढ़ियाँ आईं, उनका लेखा-जोखा तो नहीं है, मुझे पिछली पाँच पीढ़ियों के बारे में पता है। मेरे परददादा के पिता, यानी कि मेरे Great Great Grandfather, उनका नाम था जीवन सेन। उस समय देश स्वाधीन नहीं हुआ था, और राजाओं का शासन चलता था कुछ राज्यों में। तो जीवन सेन राजदरबारी संगीतज्ञ हुआ करते थे जिसे हम Court Musician कहते हैं। आगे चलकर जब थिएटर की परम्परा शुरू हुई, उस समय पारसी थिएटर का काफ़ी प्रचलन हुआ। तो जीवन सेन ने पारसी थिएटर में भी संगीत दिया है।

जीवन सेन के बाद अगली पीढ़ी में कौन आए?


Jamal Sen
जीवन सेन के पुत्र थे जमाल सेन। उन्हें संगीत और नृत्य, दोनों से लगाव था और दोनों में पारंगत थे। कथक नृत्य में वो पारदर्शी थे। उस समय ब्रिटिश राज जारी था, और ऐसे में "वन्देमातरम" गाने का क्या नतीजा हो सकता है इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं।

जी जी।

तो उन्होंने "वन्देमातरम" गाया और ब्रिटिश सरकार के Most Wanted Rebels में उनका नाम दर्ज हो गया। जब रेडियो शुरू हुआ तो वो रेडियो के नामी आर्टिस्ट बने और 1935 के आसपास मास्टर ग़ुलाम हैदर को बम्बई स्थानान्तरित करवाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

जमाल सेन जी, जैसा कि आप बता रहे हैं "वन्देमातरम" गा कर ब्रिटिश सरकार के चक्षुशूल बन गए तो क्या स्वदेशी नेताओं के साथ भी उनका मेल-जोल था?

जी हाँ, जमाल सेन जी उस समय के तमाम शीर्ष के नेताओं, जैसे कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, श्री लाल बहादुर शास्त्री, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरु, के सम्पर्क में रहे। ग़ुलाम हैदर के वो सहायक रहे और ’ख़ज़ान्ची’ फ़िल्म के गीतों में उन्होंने तबला और ढोलक बजाया। देश स्वाधीन होने के बाद वो एक स्वतन्त्र संगीतकार बने और कई फ़िल्मों में संगीत निर्देशन किया, जैसे कि ’शोख़ियाँ’, ’रंगीला’, ’अमर शहीद’, ’दाएरा’, ’पतित पावन’, ’मनचली’, ’धरमपत्नी’, ’बग़दाद’, कस्तूरी’ आदि।

इन फ़िल्मों में से कोई गीत आपको पसन्द है?

फ़िल्म ’शोख़ियाँ’ का लता जी का गाया गीत "सपना बन साजन आए, हम देख देख मुस्काए..." मेरे पसन्दीदा गीतों में से एक है, और आपको बता दूँ कि एक लम्बे अरसे तक यह गीत मेरे मोबाइल का रिंग् टोन भी रहा है।

वाह, क्या बात है! अच्छा, जीवन सेन और जमाल सेन के बाद अगली पीढ़ी में कौन आए?


Shambhu Sen & Jamal Sen
जमाल सेन के पुत्र शम्भु सेन। अपने पिता की तरह संगीत और नृत्य, दोनों में पारंगत शम्भु सेन जी शीर्ष के नृत्य निर्देशक बने और हेमा मालिनी, योगिता बाली, सारिका, लक्ष्मी छाया, मनीषा और सुजाता जैसी अभिनेत्रियों को नृत्य सिखाया। फ़िल्म संगीतकार के रूप में उन्होंने बस एक ही फ़िल्म ’मृगतृष्णा’ में संगीत दिया था जो 1975 की फ़िल्म थी। रफ़ी साहब की आवाज़ में इस फ़िल्म का "नवकल्पना नवरूप से रचना रची जब नार की" बहुत हिट हुआ था। लता जी के गाए इस फ़िल्म के "सुन मन के मीत मेरे प्रेम गीत आजा रे..." की भी क्या बात है!

वाक़ई, यह अफ़सोसजनक बात ही है कि उन्होंने आगे किसी फ़िल्म में संगीत नहीं दिया। ख़ैर, हम तीन पीढ़ियों की बात कर चुके, चौथी पीढ़ी में कौन आए?

तीसरी पीढ़ी की बात अभी ख़त्म नहीं हुई है, जमाल सेन के दूसरे बेटे थे दिलीप सेन। पर उन्होंने चौथी पीढ़ी के समीर सेन के साथ जोड़ी बनाई।

ये समीर सेन किनके पुत्र हैं?

समीर सेन शम्भु सेन के पुत्र हैं।

अच्छा-अच्छा, इसका मतलब चाचा-भतीजे की जोड़ी है दिलीप सेन-समीर सेन की जोड़ी? तीसरी और चौथी पीढ़ी का संगम एक तरह से कह सकते हैं।


Dilip Sen - Sameer Sen
बिल्कुल ठीक! दिलीप सेन - समीर सेन ने लम्बी पारी खेली है फ़िल्म जगत में और उनके बहुत से गाने सुपरहिट हुए हैं। ’आइना’, ’ये दिल्लगी’, ’मुक़ाबला’, ’मेहरबान’,  ’हक़ीक़त’, ’इतिहास’, ’रघुवीर’, ’ज़िद्दी’, ’अफ़लातून’, ’सलाखें’, ’तू चोर मैं सिपाही’, 'अर्जुन पण्डित’, ’ज़ुल्मी’ आदि फ़िल्मों के गानें ख़ूब चले थे।

वाक़ई एक लम्बी लिस्ट है दिलीप-सेन - समीर सेन के हिट गीतों की। इस लम्बी लिस्ट को एक तरफ़ रखते हुए अगर मैं आपसे पूछूँ कि इनमें आपका पसन्दीदा वह एक गाना कौन सा है, तो?

वह गीत है फ़िल्म ’मेहरबान’ का, "अगर आसमाँ तक मेरे हाथ जाते, तो क़दमों में तेरे सितारे बिछाते..."। सोनू निगम का गाया हुआ यह गीत है।

बहुत अच्छा गीत है। कोई ख़ास याद जुड़ी है इस गीत के साथ?

यह गीत मुझे इसलिए इतना पसन्द है क्योंकि इसी गीत को मैं पियानो पर बजाया करता था जब मैं पियानो सीख रहा था। यह गीत सुनते ही आज भी मुझे वो पियानो सीखने के बचपन के दिन याद आ जाते हैं।

अच्छा सोहेल जी, समीर सेन हो गए चौथी पीढ़ी के। अब बढ़ना चाहेंगे अगली पीढ़ी की ओर।

अगली पीढ़ी, यानी पाँचवीं पीढ़ी, यानी कि मैं। मैं समीर सेन का बेटा हूँ और हमारे परिवार के संगीत की परम्परा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ।

बहुत अच्छा लगा आपके परिवार और पिछली पीढ़ियों के बारे में जान कर। अब आप से बातचीत को आगे बढ़ाते हैं। तो बताइए अपने बचपन के बारे में, कैसे थे वो दिन?


आप समझ सकते हैं कि ऐसे गहन संगीतमय पारिवारिक पार्श्व से सम्बन्ध रखने की वजह से मेरी जो शुरुआती स्मृतियाँ हैं, वो पूर्णत: संगीत में ही डूबी हुई हैं। सुबह रियाज़ सुन कर जागा करता, ख़ुद भी रियाज़ करता। 6 बरस की उम्र से ही मैं तबला और अलग अलग आघात-वाद्ययन्त्र (percussion instruments) सीखने लगा था। पियानो भी लगभग उसी समय सीखना शुरू किया। दादाजी, यानी कि शम्भु सेन जी से मैं शास्त्रीय संगीत सीखा।

उनसे नृत्य नहीं सीखा?

जी नहीं, मैं एक गायक और एक संगीतकार हूँ।

अपने स्कूल और दोस्तों के बारे में कुछ बताइए?

जहाँ तक स्कूल की बात है, मैंने ख़ूब आन्न्द लिया स्कूल का, मेरे बहुत से दोस्त हुए। मैं खेलकूद में काफ़ी अच्छा था, मैं एक बहुत अच्छा एथलीट था। मुझे खेलों से बहुत लगाव रहा है। मुझे 100 मीटर स्प्रिण्ट दौड़ने का बहुत शौक़ था और मैंने अपने स्कूल में सातवीं कक्षा तक स्वर्णपदक विजेता रहा, फिर उसके बाद संगीत खेल पर हावी होने लगा। अगर संगीत के क्षेत्र में नहीं आता तो यकीनन मैं खेल के मैदान में रहा होता।

आपके शारीरिक गठन को देख कर इसमें कोई संदेह नहीं है कि खेलकूद में भी आप अपने परिवार का नाम रोशन करते! अच्छा यह बताइए कि आपने प्रोफ़ेशनली किस उम्र में संगीत के क्षेत्र में आए?


मैं उस समय 13 साल का था जब मुझे मेरा पहला ब्रेक मिला। वह एक टेलीफ़िल्म थी ’रोशनी’ शीर्षक से जिसमें कविता कृष्णमूर्ति ने मेरे कम्पोज़ किए हुए गीत गाए।

बहुत ही कम उम्र थी उस वक़्त आपकी। फिर इसके बाद कौन से मौक़े आए संगीत देने की?

फिर इसके बाद करीब-करीब 9 साल मैंने दिलीप सेन - समीर सेन जी के सहायक के रूप में काम किया और फ़िल्म संगीत की तमाम बारीक़ियाँ सीखी। इनमें बालाजी प्रोडक्शन्स के तमाम टीवी सीरियल्स के टाइटल ट्रैक्स शामिल हैं। और उनमें से क‍इयों में तो आप मेरी आवाज़ भी सुन सकते हैं।

अच्छा, बालाजी के सीरियल्स में काम करने के बाद फिर आगे क्या हुआ?

उस वक़्त मैं कोई 22-23 साल का था जब मुझे कुछ फ़िल्में मिली, जैसे कि ’सिर्फ़’ ’The Murderer' वगेरह, जो नहीं चली। ’सिर्फ़’ में शिबानी कश्यप भी संगीतकार थीं मेरे साथ।

2008 में ’सिर्फ़’ आई थी जिसमें आपने तनन्नुम मलिक के साथ एक गीत भी गाया था "तुझपे फ़िदा है मेरा दिल दीवाना" जो चर्चित रहा। और इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "ज़िन्दगी की कहानी यही है, हार में ही तो जीत छुपी है" भी सुन्दर रचना है। और जैसा कि आप कह रहे थे कि ये फ़िल्में नहीं चली तो इस गीत के बोलों के मुताबिक़ हार में ही तो जीत छुपी है, जो आगे चलकर आपके क़दम चूमी। फिर उसके बाद कौन सी फ़िल्म आई?

फिर आई ’Whats Your Raashee?'

और इस फ़िल्म ने रातों रात आपको सबकी नज़र में ला खड़ा किया। आशुतोष गोवारिकर की यह फ़िल्म कैसे मिली आपको? आशुतोष जी उससे पहले ए. आर. रहमान जैसे बड़े संगीतकार के साथ काम करते थे, तो आप जैसे नवान्तुक को लेने का फ़ैसला क्यों लिया?


उस समय, मुझे पता है, ए. आर. रहमान सर उपलब्ध नहीं थे क्योंकि वो ’Slumdog Millionaire’ को लेकर काफ़ी व्यस्त थे। उन्ही दिनों मेरे पिता ने आशुतोष जी से सम्पर्क किया और मेरे काम और कम्पोज़िशन्स के बारे में उन्हें बताया। और मेरे साथ उनकी एक मीटिंग् फ़िक्स करवा दी। मैं आशुतोष जी से मिलने गया, उन्हें मेरे कम्पोज़ की हुई धुनें सुनाई जो उन्हें बहुत अच्छी लगी। उसके बाद फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उस फ़िल्म में कुल 13 अलग अल्ग क़िस्म के गीतों की ज़रूरत थी, जिनमें 12 गीत तो बारह राशिओं से सम्बंधित थे। मुझे लगता है कि मैंने हर गीत के साथ पूरा-पूरा न्याय किया। फ़िल्म को बनने में डेढ़ साल लगे।

फ़िल्म तो ज़्यादा चली नहीं, पर इसके गाने हिट ज़रूर हुए थे। क्या इन गीतों की धुनें आपके बैंक में पहले से ही मौजूद थी?

जी नहीं, इस फ़िल्म की सभी धुनें ताज़े कम्पोज़ किए मैंने स्क्रिप्ट के अनुसार। यह सच है कि मेरे बैंक में सौ से अधिक धुनें मौजूद हैं पर मैं निर्देशक के बताए हुए सितुएशन के मुताबिक नई धुनें कम्पोज़ करने में विश्वास रखता हूँ।

एक तरफ़ आशुतोष गोवारिकर, दूसरी तरफ़ जावेद अख़्तर, कैसा लगा इतने बड़े बड़े नामों के साथ करने में?

जैसे सपना सच हो गया। जावेद साहब ख़ुद एक लीजेन्ड हैं और उनके साथ काम करने का सौभाग्य मुझे मिला, और क्या कह सकता हूँ!

इन गीतों के बोल जावेद साहब ने पहले लिखे थे या धुनें पहले बनी थीं?

धुनें पहले बनी थीं।

जब वरिष्ठ कलाकारों के साथ कोई नवोदित कलाकार काम करता है तो उसके काम में काफ़ी हस्तक्षेप होता है। क्या आपके साथ इस फ़िल्म में यही हुआ?


आप यह कह लीजिए कि अच्छे के लिए कीमती सलाह मुझे मिली आशुतोष सर से क्योंकि वो ख़ुद एक संगीत के अच्छे जानकार हैं। उनके सुझावों पर ग़ौर करने से मेरा काम और निखर के आया है इसमें कोई संदेह नहीं। ऐसा करते हुए मुझे बहुत मज़ा आया।

इस फ़िल्म के कुल 13 गीतों में से 7 में आपकी आवाज़ भी शामिल है। संगीतकार होने के साथ-साथ एक अच्छे गायक के रूप में भी आप उभर रहे हैं। दोनों में से कौन सी विधा आपको ज़्यादा पसन्द है?

मुझे दोनों ही बहुत ज़्यादा पसन्द है।

’Whats Your Raashee?' के बाद कौन सी फ़िल्म आई आपकी?

’खेलें हम जी जान से’। यह भी आशुतोष सर की निर्देशित फ़िल्म थी और जावेद साहब गीतकार थे।

जी हाँ, मुझे याद है, यह फ़िल्म Chittagong Uprising की घटना पर आधारित थी, इसमें भी आपने बड़ा अनूठा संगीत दिया, बंगाल के लोक संगीत के अनुसार?

जी हाँ, एक गीत था पामेला जैन और रंजिनी जोसे का गाया हुआ जो बंगाल के लोक धुन पर आधारित था।

जिस तरह से रहमान ने ’स्वदेस’ में "ये जो देस है तेरा" गाया था, इस फ़िल्म में आपने "ये देस है मेरा" गाया बहुत ख़ूबसूरती से।

धन्यवाद! इस फ़िल्म में रोमान्टिक गाना था "सपने सलौने" जिसे मैंने और पामेला जैन ने गाया था। फिर "वन्देमातरम" का जो संस्करण इस फ़िल्म के लिए हमने बनाया था, उसकी भी चर्चा हुई थी। इसे Cine Singers Association Chorus Group के कलाकारों ने गाया, और फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया था सुरेश वाडकर जी की संगीत संस्था के कलाकारों ने।

फिर अगली फ़िल्म कौन सी थी?

’मेरे ब्रदर की दुल्हन’। यह ’यश राज’ की फ़िल्म थी जिसमें इमरान ख़ान, अली ज़फ़र, कटरीना कैफ़ आदि थे। इस फ़िल्म में "धुनकी" गीत बहुत हिट हुआ था।

जी जी, नेहा भसीन का गाया यह गीत ख़ूब चला था। इस फ़िल्म के तमाम गीतों में भी आपने नए नए प्रयोग किए थे।

’मेरे ब्रदर की दुल्हन’ (MBKD) की पूरी टीम को "कैसा यह इश्क़ है..." गीत पहले दिन से ही बहुत पसन्द आया; और एक दिन मैंने आदि सर (आदित्य चोपड़ा) से पूछा कि उनका पसन्दीदा गीत इस फ़िल्म का कौन सा है, तो उनका जवाब था कि यूं तो सभी गीत मुझे अच्छे लगे, पर "धुनकि" ज़बरदस्त हिट होने वाला है। और जब ऐल्बम रिलीज़ हुई तो वही हुआ जो आदि सर ने कहा था।

’यशराज’ की फ़िल्म MBKD में संगीत देने का अनुभव कैसा रहा?

बहुत ही मज़ेदार अनुभव रहा क्योंकि फ़िल्म की पूरी कास्ट और क्रू युवा थी और बड़े दोस्ताना माहौल में काम होता था। MBKD का संगीत तैयार करते हुए वाक़ई हमने बहुत मज़े किए, हंगामे किए।

MBKD के बाद ही शायद आपको सलमान ख़ान की फ़िल्म ’एक था टाइगर’ का प्रस्ताव मिला था?

नहीं, ’एक था टाइगर’ से पहले एक और फ़िल्म मिली थी ’From Sydney with Love'। लेकिन यह फ़िल्म चल नहीं पाई, इसलिए इसके गाने भी लोगों ने सुने नहीं।

जी जी, याद आया, यह मशहूर फ़िल्मकार प्रमोद चक्रवर्ती की फ़िल्म थी जो ’प्रमोद फ़िल्म्स’ के स्वर्णजयन्ती के उपलक्ष्य पर बनी थी। ’ज़िद्दी’, ’लव इन टोकियो’, ’नास्तिक’, ’दीदार’, ’बारूद’ जैसी न जाने कितनी सफल फ़िल्में इस बैनर की रही है।

हाँ, और इस वजह से मुझे भी इस फ़िल्म से काफ़ी सारी उम्मीदें थीं।

पर आपका संगीत इस फ़िल्म में ताज़ी हवा के झोंकों की तरह सुनाई दिया, ख़ास कर "प्यारी प्यारी..." और "नैनो रे..." गीत तो बहुत अच्छे रहे।

शुक्रिया!

अच्छा अब आते हैं अगली फ़िल्म ’एक था टाइगर’ पर। सलमान ख़ान की फ़िल्म के लिए संगीत देना अपने आप में बड़ी बात है क्योंकि सलमान ख़ान गीत-संगीत पर बहुत ध्यान देते हैं। तो किस तरह से मिला आपको ’एक था टाइगर’?

हुआ यूं कि उस समय ’धूम 3' और ’एक था टाइगर’, दोनों यशराज की फ़िल्में थीं, इन दोनों के लिए प्रीतम जी को संगीतकार लिया गया था। पर क्योंकि दोनों फ़िल्मों का संगीत एक ही समय में पूरा करना था, इसलिए प्रीतम जी के लिए दोनों पर काम करना मुश्किल हो रहा था। प्रीतम जी की व्यस्तता को देखते हुए आदि सर ने उन्हें एक फ़िल्म से मुक्त करने का निर्णय लिया। क्योंकि प्रीतम जी पहले से ’धूम’ से जुड़े हुए थे, इसलिए ’एक था टाइगर’ से उन्हें मुक्त कर दिया गया। उन्हीं दिनों ’मेरे ब्रदर की दुल्हन’ फ़िल्म के संगीत से आदि सर मुझसे काफ़ी ख़ुश थे, इसलिए ’एक था टाइगर’ के लिए उन्होंने मुझे चुन लिया।

इससे आपके और प्रीतम जी के बीच में कोई अनबन तो नहीं हुई?

बिल्कुल नहीं, बल्कि प्रीतम जी बहुत ख़ुश हुए यह सुन कर कि मैं ’एक था टाइगर’ कर रहा हूँ। उन्होंने कहा कि उन्हें मेरा संगीत बहुत अच्छा लगता है और ’एक था टाइगर’ के लिए मुझे शुभकामनाएँ भी दी उन्होंने।

इस फ़िल्म में आपके कुल तीन गीत थे "लापता", "बंजारा" और "सं‍इयारा"। एक गीत साजिद-वाजिद का भी था जो सलमान ख़ान के पसन्दीदा संगीतकारों में से हैं। लेकिन लोगों ने जब इसके गाने सुने तो सभी ने स्वीकारा कि सलमान की हाल की फ़िल्मों, ’दबंग’, ’वान्टेड’, ’बॉडीगार्ड’ और ’रेडी’, से बेहतर और स्तरीय है ’एक था टाइगर’ का संगीत।

इसके लिए मुझे "BIG Star Most Entertaining Music of the Year" का पुरस्कार मिला था।

और अब बात करते हैं ’गुंडे’ की। लोकप्रियता और सफलता के पैमाने पर अगर मापा जाए तो ’गुंडे’ आपकी अब तक की सबसे सफल फ़िल्म है। इस फ़िल्म के बारे में बताइए?
with 'Gunday' team

शुरू से ही अली अब्बास ज़फ़र ने यह साफ़ कर दिया था कि उन्हें इस फ़िल्म का संगीत समकालीन चाहिए और जो इस धरती से जुड़ा हुआ हो।

वैसे भी आपने जब भी किसी फ़िल्म में संगीत दिया है, आपका हर गीत अपने आप में अनूठा रहा है। क्या तरीक़ा अपनाते हैं आप?

किसी फ़िल्म के लिए जब संगीत देना हो तो कुछ बातों पर ध्यान रखना पड़ता है, जैसे कि कहानी, काल (पीरियड), चरित्रों की भाषा/बोली, और सबसे ज़रूरी बात है निर्देशक की दृष्टि।

’गुंडे’ 70 के दशक के कोलकाता के पार्श्व पर बनी है। इस वजह से इसके संगीत के लिए आपने किन किन बातों पर ग़ौर किया?

’गुंडे’ 70-80 के दशक के समय की कहानी पर बनी फ़िल्म है, उस समय तरह तरह के साज़ जैसे कि ड्रम, गिटार, सरोद, संतूर, सितार आदि प्रयोग में लाये जाते थे, इसलिए हमने भी इस फ़िल्म के गीतों में उन्हें शामिल करने की कोशिश की है। इनके साथ-साथ बंगाल के लोक-संगीत (बाउल संगीत) को भी ध्यान में रखा है।

इस फ़िल्म के तमाम गीतों के बारे में बताइए?

फ़िल्म की जो सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है, वह है "तूने मारी एन्ट्रियाँ..."। इस गीत के लिए हमें काफ़ी मेहनत करनी पड़ी क्योंकि यह फ़िल्म का एकमात्र ऐसा गीत है जिसमें तीनों मुख्य कलाकार (अर्जुन, रणवीर और प्रियंका) शामिल हैं, नृत्य कर रहे हैं, मज़े ले रहे हैं। सिचुएशन के हिसाब से एक ऐसा गीत चाहिए था जो गाने में आसान हो और साथ ही मस्ती-भरा हो। इस गीत के लिए हमने शिवमणि को भी बुलाया था ड्रम्स और परक्युशन के लिए। कुल मिलाकर इस गीत को बनाते समय हमें बहुत मज़ा आया।

आपको जितना मज़ा इस गीत को बनाते हुए आया, उतना ही मज़ा इसे सुनते हुए श्रोताओं को आता है। अच्छा, आपका फ़ेवरीट गीत कौन सा है इस फ़िल्म का?

मेरा फ़ेवरीट है "जिया" जिसे अरिजीत सिंह ने गाया था। यह इस ऐल्बम का एकमात्र प्रेम गीत है। इसकी जो धुन है, उसकी रचना मैंने आठ साल पहले की थी और आठ साल के बाद जाकर यह अपने अंजाम तक पहुँचा है, इसलिए यह मेरे लिए बहुत ख़ास है। उस दिन अरिजीत की तबीयत ठीक नहीं थी, फिर भी वो आए और जैसे ही गीत सुना, उन्होंने इसे उसी वक़्त गाने का निर्णय लिया। "जिया" की जो सबसे अच्छी बात है, वह है इसके इन्टरल्यूड की जो बहती हुई धारा है, उसे कम्पोज़ करते हुए मुझे बहुत अच्छा लगा।

’गुन्डे’ के बाक़ी गीतों के बारे में भी बताइए?
with Ali Abbas Zafar & Bappi Lahiri

इस फ़िल्म का जो सबसे पहला गीत हमने रेकॉर्ड किया था, वह था "जश्न-ए-इश्क़ा..."। उस समय मैं ’एक था टाइगर’ रेकॉर्ड कर रहा था। पैक-अप के बाद मैं अली से मिला यशराज स्टुडियो के कैन्टीन में। यूं तो हमने पूरे प्रोजेक्ट की चर्चा की, पर ख़ास तौर से इस गीत के बारे में विस्तृत चर्चा की। इस गीत में बहुत से इलेक्ट्रिक गिटार और सात-आठ ड्रम्स का प्रयोग किया। ’रिदम ऑफ़ जश्न-ए-इश्क़ा’ इसी गीत का विस्तार है जिसके लिए हमने तौफ़िक़ अंकल (तौफ़िक़ कुरेशी) और उनके ग्रूप को आमन्त्रित किया था सारे परक्युशन्स को बजाने के लिए। फिर "असलाम-ए-इश्क़ुम..." भी एक मुश्किल ट्रैक था क्योंकि अली इस फ़िल्म में एक कैबरे नंबर माँग रहे थे और उसमें भी 70 के दशक की फ़ील चाहिए थी। साथ ही आज के दौर के लोगों के दिलों को भी छूना था। इसलिए हमने इस गीत के लिए बप्पी दा को प्रस्ताव दिया और उनके सुझाये बारीकियों को इस गीत में शामिल किया। "स‍इयाँ" में समकालीन दृष्टिकोण की आवश्यक्ता थी ताकि यह एक महज आम दर्द भरा गीत ना लगे। हमने पूरे गीत में बस एक ढोलक का प्रयोग किया। साथ में कुछ ड्रम्स और रॉक गिटार का भी प्रयोग किया इसे एक यूनिक फ़ील देने के लिए। "मन लुन्तो मौला" एक सूफ़ी क़व्वाली है जिसे पारम्परिक रूप देने का फ़ैसला लिया गया, जैसे कि नुसरत फ़तेह अली ख़ान की क़व्वालियों में होती है। यह क़व्वाली मेरे लिए बहुत ख़ास है क्योंकि इसमें मेरे पिताजी (समीर सेन) ने पूरा रिदम अरेंजमेण्ट किया है क्लासिकल वर्ज़न के लिए। 

और इस फ़िल्म का जो शीर्षक गीत है, उसे आपने ही गाया था एक लम्बे अरसे के बाद। इस गीत के बारे में बताइए?

इस गीत के लिए मुझे अली अब्बास ज़फ़र ने पूरी छूट दे रखी रखी थी कि इसमें मैं कुछ भी कर सकता हूँ। इसलिए मैंने इसमें रैप और डब स्टेप भी डाला। और हाँ, तीन साल के बाद फिर से माइक के सामने आकर मुझे एक सुखद अनुभूति हुई।

आजकल आप किन फ़िल्मों पर काम कर रहे हैं?

मैं आनन्द एल. राय की कुछ फ़िल्मों के लिए काम कर रहा हूँ; फिर प्रकाश झा साहब की एक फ़िल्म है उस पर काम कर रहा हूँ। ’हाउसफ़ुल-3’ का भी मैं संगीत तैयार करने जा रहा हूँ जिसके निर्माता हैं साजिद नडियाडवाला।

वाह! यानी आप कई बड़े निर्माताओं के साथ काम करने जा रहे हैं, आपको बहुत सारी शुभकामनाएँ।

धन्यवाद।

आज जिस तरह का संगीत बाज़ार में चल रहा है या जिस तरह के संगीत का निर्माण हो रहा है, उसके बारे में क्या विचार हैं आपके?

मैं आशावादी हूँ, और यही मानता हूँ कि आज के म्युज़िक इन्डस्ट्री की जो स्थिति है, वह काफ़ी माज़बूत है और दुनिया भर में हमारा संगीत फल-फूल रहा है। बाहर के लोग भारतीय संगीत से प्यार कर रहे हैं और उसकी सराहना भी हो रही है पूरे विश्व में।

आपके कौन कौन से पसन्दीदा कलाकार हैं?

मैं जॉन विलिअम्स का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ जिन्होंने ’Jaws’, ’Star Wars’, ’Superman', 'E.T', 'Jurassic Park', 'Saving Private Ryan' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था। मैं यह मानता हूँ कि उनके संगीत ने सुपरमैन के करेक्टर में जान डाल दी है। मुझे जेम्स होर्नर का संगीत भी बेहद पसन्द है। और जहाँ तक बॉलीवूड संगीत की बात है, मुझे आर. डी. बर्मन जी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जी, शंकर-जयकिशन जी का संगीत पसन्द है, और सबसे ज़्यादा पसन्द है मदन मोहन जी के कम्पोज़िशन्स। मदन मोहन जी और लता जी का जो कम्बिनेशन है, इनकी जो ग़ज़लें हैं, वो बस पर्फ़ेक्ट हैं। फिर मेरे दादाजी शम्भु सेन जी भी मेरे फ़ेवरीट म्युज़िक डिरेक्टर हैं।

लता जी के ज़िक्र से ध्यान आया कि जमाल सेन, शम्भु सेन, दिलीप सेन - समीर सेन, इन सभी के लिए लता जी ने गाया है। क्या आपको नहीं लगता कि अगर आपका कोई कम्पोज़िशन लता जी गा देती हैं तो यह अपने आप में एक रेकॉर्ड बन जाएगी एक ही परिवार की चार पीढ़ियों के संगीतकारों के लिए लता जी के गायन की?

यह तो किसी सपने के सच होने वाली बात होगी, लता जी के साथ काम करना! काश आपकी यह बात सच हो!

सोहेल, आप फ़ोटोजेनिक हैं, शारीरिक गठन, उच्चता, दर्शन, सभी बहुत अच्छा है। क्या आपने कभी अभिनय के क्षेत्र में क़दम रखने के बारे में नहीं सोचा?

धन्यवाद आपका इस प्रशंसा के लिए! यह सच है कि एक समय ऐसा भी था जब मेरे पिता बड़े ज़ोर-शोर से मुझे अभिनय जगत में उतारने की तैयारी कर रहे थे। मेरे कुछ फ़ोटो-शूट्स भी हुए थे। पर अन्तत: मैंने अपने आप को संगीत जगत में भी स्थित किया और उसमें डूबता चला गया। और मुझे ऐसा लगता है कि संगीत ही वह क्षेत्र है जिसमें मैं अपना श्रेष्ठ दे सकता हूँ। यह मुझे चुबौतीपूर्ण लगता है और यही मेरा आवेग भी है, और वासना भी।

जब आप संगीत नहीं दे रहे होते या गाना नहीं गा रहे होते तो क्या करते हैं? मतलब कि ख़ाली वक़्त में क्या करते हैं?

मैं घंटों टीवी देख सकता हूँ, PS4 खेलने का बहुत शौक़ है। मुझे Formula 1 भी बहुत पसन्द है। मुझे तरह तरह के गैजेट इकट्ठा करने और उनसे खेलने का बहुत शौक़ है। 

सोहेल, बहुत बहुत शुक्रिया आपका, आपने इतना लम्बा समय हमें दिया, अपने बारे में, अपने गीतों के बारे में इतनी अनूठी जानकारियाँ दी, आपको आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए हम ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं।

बहुत बहुत धन्यवाद! मुझे भी बहुत अच्छा लगा आप से बात करते हुए।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





मंगलवार, 19 जनवरी 2016

सुनिए पूजा अनिल की कहानी ब्रोचेता एस्पान्या

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में मुंशी प्रेमचंद की कहानी "रसिक संपादक" का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं स्पेन से पूजा अनिल की कहानी ब्रोचेता एस्पान्या उन्हीं के  स्वर में।

प्रस्तुत कथा का गद्य "अभिव्यक्ति" पर उपलब्ध है। "ब्रोचेता एस्पान्या" का कुल प्रसारण समय 16 मिनट 39 सेकंड है। सुनिए और बताइये कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



लेखिका: पूजा अनिल
उदयपुर, राजस्थान में जन्मीं पूजा अनिल सन् १९९९ से स्पेन की राजधानी मेड्रिड में रह रही हैं। साहित्य पढ़ने लिखने में बचपन से ही रुचि रही। ब्लॉग 'एक बूँद' का संचालन तथा हिन्द युग्म तथा पत्रिकाओं में आलेख, साक्षात्कार, निबंध व कवितायें प्रकाशित हुई हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"रेस्तराँ की मालकिन मारिया और उसकी बेटी सोफिया अक्सर वहाँ मिल जाती हैं।”
 (पूजा अनिल कृत "ब्रोचेता एस्पान्या" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
ब्रोचेता एस्पान्या MP3

#Third Story, Brocheta Espanya; Pooja Anil; Hindi Audio Book/2016/03. Voice: Pooja Anil

रविवार, 17 जनवरी 2016

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 253 : RAG KAMOD





स्वरगोष्ठी – 253 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 1 : राग कामोद

‘ए री जाने न दूँगी...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर नये वर्ष की पहली श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की आज से शुरुआत हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा करेंगे, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम राग कामोद के स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं। राग कामोद में पहले हम पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल स्वरों में एक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद इसी बन्दिश के फिल्मी प्रयोग का एक उदाहरण लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवाएँगे।


कल्याणहिं के थाट में दोनों मध्यम लाय,
प-रि वादी-संवादि कर, तब कामोद सुहाय।

राजन और साजन मिश्र
संगीत के विद्यार्थियों को राग के ढाँचे का परिचय देने के उद्देश्य से उपरोक्त दोहे का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही राग के स्वरों की जानकारी ‘लक्षण गीत’ के माध्यम से भी दी जाती है। इस श्रृंखला और आज के अंक में हम आपसे दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक प्राचीन ग्रन्थकारों के आधार पर बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘एरी जाने न दूँगी...’। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है।


राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 



सी. रामचन्द्र के साथ रोशन और लता
श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। इन रागो की चर्चा हम इसी श्रृंखला के आगामी अंकों में करेंगे। ऊपर आपने राग कामोद की जो बन्दिश सुनी है, उस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने भी साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 253वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्म संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 255वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में हमने संगीत पहेली को विराम दिया था, अतः इस अंक का कोई भी परिणाम और विजेता नहीं है। 252वें अंक की पहेली का परिणाम और विजेताओं की सूची हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से आरम्भ श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का यह पहला अंक था, जिसमें आप राग कामोद की चर्चा के सहभागी थे। इससे पहले 251 और 252वें अंकों में आप बीते वर्ष के सिंहावलोकन अंकों के साक्षी बने। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारी एक नियमित पाठक और श्रोता तथा वर्ष 2015 की पहेली की एक महाविजेता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया ने निम्नलिखित विचार व्यक्त किया है – 
‘I want to take this opportunity to express my gratitude to you and all those who worked with you for making "Swargoshthi" a wonderful base for all music lovers, classical, light or film music where they can listen to music, read about the life-sketch of different artists, expand their awareness of music to be able to appreciate and enjoy the divinity felt as a result. I am also very impressed by the Shrunkhala and Paheli which I look forward to every week and try and participate as much as possible.Today, it gives me such joy to win the music quiz and I am speechless to describe how it touches my heart. I think this is very important to make our thinking and feelings so engrossed in music which will enable us to increase our knowledge. With regards, Vijaya Rajkotia.
आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ