शनिवार, 31 मई 2014

"हरि दिन तो बीता शाम हुई..." - जानिये गायिका राजकुमारी के इस अन्तिम गीत की दास्तान


एक गीत सौ कहानियाँ - 32
 

हरि दिन तो बीता, शाम हुई ...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 32वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'किताब' के राजकुमारी की गायी लोरी "हरि दिन तो बीता शाम हुई..." के बारे में। 


1977 की यादगार फ़िल्म 'किताब' आपने ज़रूर देखी होगी। बहुत ही सुन्दर फ़िल्म, किरदार ऐसे कि जैसे हमारी-आपकी ज़िन्दगी के किरदार हों। फ़िल्म की मूल कहानी विख्यात बांग्ला लेखक समरेश बसु की कहानी 'पथिक' थी जिसे गुलज़ार साहब ने 'किताब' के रूप में हिन्दी दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया। बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद कार्य में भूषण बनमाली और देबब्रत सेनगुप्ता ने गुलज़ार की मदद की। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे उत्तम कुमार, विद्या सिन्हा, दीना पाठक, मास्टर राजू और मास्टर टिटो प्रमुख। फ़िल्म की हर बात अनोखी थी, और उतने ही अनोखे थे इस फ़िल्म के सभी गानें। गुलज़ार और पंचम की जोड़ी हर बार कुछ न कुछ कमाल कर जाते। पर इस फ़िल्म में तो इनकी जोड़ी ने वह कमाल किया है कि इसके जैसे गानें फिर किसी अन्य फ़िल्म में सुनाई नहीं दिये। फ़िल्म में कुल चार गीत थे - पंचम का गाया "धन्नो की आँखों में रात का सुरमा", पद्मिनी और शिवांगी की आवाज़ों में "मास्टरजी की आ गई चिट्ठी", सपन चक्रवर्ती का गाया "मेरे साथ चले ना साया" और राजकुमारी की आवाज़ में लोरी "हरि दिन तो बीता शाम हुई रात पार करा दे"। पहला और दूसरा गीत जितना मशहूर हुआ उसकी तुलना में बाकी दो गीत ज़्यादा सुनाई नहीं दिये और आज तो इन्हें दुनिया लगभग भुला ही चुकी है। इन चारों गीतों की एक ख़ास बात यह थी कि इन्हें उस दौर के लोकप्रिय गायकों से नहीं बल्कि कमचर्चित या कमसुने गायकों से गवाये गये। एक गीत तो पंचम ने ख़ुद गाया, एक गीत अपने सहयोगी सपन चक्रवर्ती से गवाया; पद्मिनी और शिवांगी को भी पंचम पहले से ही जानते थे, फ़िल्म 'यादों की बारात' से जिसमें इन दोनों ने लता मंगेशकर के साथ फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया था। 

तीन गीतों के गायक कलाकार फ़ाइनल हो गये, पर चौथे गीत की गायिका का चयन अभी बाक़ी था। पंचम और गुलज़ार, दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किससे यह गीत गवाया जाए! यह गीत एक लोरी थी जो दीना पाठक पर फ़िल्माया जाना था। इसलिए किसी कम उम्र की आवाज़ या किसी जानी-पहचानी आवाज़ से गवाना उन्हें उचित नहीं लग रहा था। जब दोनों की यह बातचीत चल रही थी तब वहाँ गुलज़ार साहब के ऐसिस्टैण्ट प्रदीप दुबे भी बैठे थे। जानते हैं ये प्रदीप दुबे कौन हैं? गायिका राजकुमारी जी के बेटे। राजकुमारी गुमनामी के अन्धेरे में चली गईं थीं। 40 के दशक के अन्त तक राजकुमारी ने पार्श्वगायन जगत में राज किया, पर लता, आशा, गीता आदि नये दौर की गायिकाओं के आने पर धीरे धीरे पिछड़ती गईं और धीरे धीरे दुनिया उन्हें भुलाती चली गई, और उनकी माली हालत भी गिरती चली गई। घर चलाने के लिए कल की मशहूर गायिका अब कोरस में नज़रे चुरा कर गातीं। 1972 की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के बैकग्राउण्ड स्कोर की जब रेकॉर्डिंग हो रही थी, तब नौशाद साहब ने अचानक कोरस में खड़ीं राजकुमारी को पहचान लिया। वो चौंक गये। नौशाद साहब को राजकुमारी की यह अवस्था देख कर बहुत बुरा लगा। संगीतकार बनने से पहले जिस गायिका के गानें सुना करते थे, जिनकी वो इतनी इज़्ज़त करते थे, वही गायिका दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए अब उन्हीं के कोरस में गा रही है, यह सोच कर उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने फ़ौरन फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के लिए एक गीत तैयार किया और राजकुमारी की एकल आवाज़ में रेकॉर्ड किया। यह गीत था "नजरिया की मारी"। लेकिन इस गीत के बाद भी किसी और संगीतकार ने उनकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। अब वापस आते हैं उनके बेटे प्रदीप दुबे पर जो गुलज़ार और पंचम के यहाँ बैठे थे। प्रदीप को देख कर गुलज़ार साहब को अचानक ख़याल आया कि क्यों न यह लोरी राजकुमारी जी से गवाया जाये। पंचम को भी आइडिया अच्छा लगा। दोनों के कहने पर प्रदीप ने पंचम और राजकुमारी की मुलाक़ात फ़िक्स कर दी। राजकुमारी उन दिनों मुंबई के किसी चाल में रहती थीं और अपनी गरीबी से जूझ रही थीं। तो उनसे मिलने पंचम ख़ुद उस चाल में गये। गुलज़ार-पंचम के बनाये गीत को गाने का ऑफ़र सुन कर राजकुमारी चौंक गईं और डर भी गईं कि क्या वो गा पायेंगी, क्या वो गीत के साथ न्याय कर पायेंगी! पंचम के समझाने पर वो मान गईं और इस तरह से रेकॉर्ड हुआ यह नायाब गीत जिसकी तुलना किसी अन्य गीत से नहीं की जा सकती। इस गीत को राजकुमारी जी का गाया अन्तिम फ़िल्मी गीत माना जाता है। पर कुछ लोगों का कहना है कि इसके बाद भी पंचम ने एक और गीत उनकी आवाज़ में रेकॉर्ड किया था, पर उसकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी।

पंचम और सपन चक्रवर्ती
"हरि दिन तो बीता शाम हुई" दरअसल एक बांग्ला गीत का हिन्दी संस्करण है। केवल धुन ही नहीं बल्कि गीत के बोल भी बांग्ला गीत के बोलों का ही लगभग अनुवाद है। मूल गीत एक बांग्ला लोकगीत है जिसके बोल हैं "होरि दिन तो गेलो शोन्धा होलो, पार कोरो आमारे" जिसका हिन्दी अनुवाद है "हरि, दिन तो बीता शाम हुई, मुझे पार करा दे", जिसका भाव यह है कि ज़िन्दगी तो बीत चुकी है, अब उस पार पहुँचा दे भगवान। पर 'किताब' के हिन्दी गीत में भाव को थोड़ा सा बदल कर उस पार पहुँचाने के स्थान पर रात पार कराने अर्थात दुखद या मुश्किल की घड़ियों को पार कराने की बात कही गई है। किस चतुराई से एक दार्शनिक भजन को लोरी में परिवर्तित किया है पंचम और गुलज़ार ने। वैसे कहा जाता है कि इस धुन की तरफ़ पंचम का ध्यान सपन चक्रवर्ती ने ही दिलाया था। एक और बात यह कि इस बांग्ला लोकगीत को सत्यजीत रे ने अपनी 1955 की माइलस्टोन फ़िल्म 'पौथेर पाँचाली' में चुनीबाला देवी से गवाया था। 2006 में बांग्ला फ़िल्म 'कृष्ण आमार प्राण' फ़िल्म में शिल्पि पाल ने इस भजन को गाया था। 2012 की बांग्ला फ़िल्म 'इडियट' में इस गीत के मुखड़े को लेकर नये अंदाज़ में एक गीत ज़ुबीन ने गाया था। ऐसी बात नहीं कि हिन्दी फ़िल्मों में इस धुन का इस्तेमाल केवल 'किताब' के इस गीत में ही हुआ है। राजेश रोशन एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि कई कई बार रबीन्द्रसंगीत और अन्य बांग्ला धुनों का प्रयोग अपने गीतों में किया है। इस धुन का इस्तेमाल उन्होंने 1998 की फ़िल्म 'युगपुरुष' के गीत "चले हम दो जन सैर को चले संग चली हरियाली" में किया था जिसे कुमार सानु और रवीन्द्र साठे ने गाया था। 

रेडियो ब्रॉडकास्टर अमीन सायानी ने जब एक इंटरव्यू में राजकुमारी जी से पूछा कि इतने अच्छे गाने गाने के बाद भी फ़िल्मों में गाना क्यों छोड़ा, तो राजकुमारी जी ने जवाब दिया - "मैंने फ़िल्मों के लिए गाना कब छोड़ा, मैंने छोड़ा नहीं, मैंने कुछ छोड़ा नहीं, वैसे लोगों ने बुलाना बन्द कर दिया। अब यह मैं नहीं बता पायूंगी कि क्यों बुलाना बन्द कर दिया"। कितना कष्ट हुआ होगा उन्हें ये शब्द कहते हुए इसका अन्दाज़ा लगाना कठिन नहीं। संयोग की बात देखिये कि उनके गाये इस अन्तिम गीत के बोल कैसे उन्हीं पर लागू हुए। हरि दिन तो बीता शाम हुई, रात पार करा दे। और एक दिन सचमुच युं लगा मानो मायूसी के अन्धेरों में घिरी हुई उस लम्बी काली रात का अन्त हो गया हो। जैसे निराशा के थपेड़ों में घिरी उस कश्ती को किनारा मिल गया हो। साल 2000 में गरीबी में घिरी राजकुमारी जी सदा के लिए शान्त हो गईं, भगवान ने उनकी रात पार करा दी। बस इतनी सी थी आज की कहानी।

फिल्म - किताब : 'हरि दिन तो बीता, शाम हुई...' : गायिका - राजकुमारी : संगीत - राहुलदेव बर्मन : गीत - गुलजार


 


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

बुधवार, 28 मई 2014

एक दर्द भरा नगमा हिमेश मार्का

ताज़ा सुर ताल - दर्द दिलों के  (एक्सपोस)

जब से हिमेश रेशमिया संगीत निर्देशन में आये हैं, तब से हम उन्हें बहुत से मुक्तलिफ़ रूपों में देख चुके हैं, हिमेश केवल हिट गीत देने में विश्वास रखते हैं और बहुत अधिक अपने 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर जाकर काम नहीं करते हैं, बावजूद इसके उनकी धुनों में एक ख़ास मिठास हमेशा से रही है (ओढ़नी , क्यों किसी को वफ़ा के बदले, तेरी मेरी प्रेम कहानी  आदि), हिमेश इन दिनों अपने निर्माताओं को डबल बोनान्जा बाँट रहे हैं, यानी कि जो उनकी अपनी कहानी पर फिल्म बनायेगा उसके लिए वो अभिनय भी करेगें और जाहिर है जब अभिनय करेगें तो संगीत में भी अपनी पूरी ताकत झोंक देंगें. कुछ ऐसा ही है उनकी ताज़ा पेशकश एक्सपोस  का हाल. इस एल्बम में भी हर मूड के गीत हैं और सब के साब हिमेश की पक्की छाप वाले. कुछ बहुत नया न देते हुए भी हिमेश ऐसे गीत बनाने में कामियाब हुए हैं जिनका हिट होना लगभग तय है. खासकर ये गीत जो हम आपको सुना रहे हैं इसमें वही चिर परिचित हिमेशिया माधुर्य भी है और शास्त्रीयता की मिठास भी. मोहम्मद इरफ़ान ने बहुत दिल से गाया है इसे (शुक्र है हिमेश ने खुद नहीं गाया ये गीत). समीर के लिखे इस गीत में, हर तबके में हर उम्र के लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने की कुव्वत है. बस दर्द को उभरने के लिए इरफ़ान की आवाज़ में जो जबरन कम्पन पैदा किया गया है वो कुछ खटकता है....खैर आज सुनिए ये ताज़ा तरीन गीत.  

रविवार, 25 मई 2014

तालवाद्य घटम् पर एक चर्चा


स्वरगोष्ठी – 169 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 7

एक सामान्य मिट्टी का घड़ा, जो लोक मंच के साथ ही शास्त्रीय मंच पर भी सुशोभित हुआ 



 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की सातवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे जो अवनद्ध वर्ग का वाद्य है और संगीत में ताल देने के लिए उपयोग किया जाता है। एक सामान्य मिट्टी का घड़ा पहले लोकवाद्य के रूप में ही प्रयोग किया जाता था, किन्तु कुछ कलासाधकों की साधना के बल पर आज ‘घटम्’ के रूप में शास्त्रीय मंचों पर प्रतिष्ठित है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमारे साथी सुमित चक्रवर्ती इस अनूठे तालवाद्य पर चर्चा कर रहे हैं। 
 



भारतीय संगीत में ताल की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। ताल किसी भी तालवाद्य से निकलने वाली ध्वनि का वह समयबद्ध चक्र है जो किसी भी गीत अथवा राग को गाते समय गायक को सुर लगाने के सही समय का बोध कराता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में जहाँ कुछ ताल बहुत सहज हैं वहीं कुछ ताल बहुत ही जटिल भी हैं। तालों के लिए कई प्रकार के वाद्‍यों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें तबला, ढोलक, पखावज, मृदंगम्, घटम्, आदि कुछ सर्वाधिक प्रचलित नाम हम सब जानते हैं।
घटम् मूलतः दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत में प्रयोग किया जाने वाला तालवाद्य है। राजस्थान के लोक संगीत में इसी के दो अनुरूप मड्गा तथा सुराही के नामों से प्रचलित हैं। यह एक मिट्टी का बरतन है जिसे वादक अपनी उँगलियो, अँगूठे, हथेलियों व हाथ के किनारों से घड़े के बाहरी सतह पर प्रहार कर बजाते हैं। इसके मुख पर खुले हाथों से प्रहार कर गूँज की ध्वनि उत्पन्न की जाती है जिसे 'गुमकी' कहते हैं। कभी-कभी वादक कलाकार घड़े के मुख को अपने नग्न पेट दबाकर एक गहरी गुमकी की ध्वनि भी उत्पन्न करते हैं। घटम् के अलग-अलग हिस्सों पर प्रहार करने पर भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ उत्पन्न की जाती हैं। वर्तमान में देश के सबसे लोकप्रिय घटम वादक टी.एच. विक्कु विनायकराम हैं। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा से पहले आइए, इनका घटम् वादन सुनते हैं। इस प्रस्तुति में विक्कु जी तालमाला का वादन कर रहे हैं।


घटम् वादन : तालमाला : वादक - टी.एच. विक्कु विनायकराम




वर्तमान में सबसे प्रसिद्ध घटम् वादकों में सबसे पहला नाम आता है, श्री थेटकुड़ी हरिहर विनायकराम का, जिन्हें संगीतप्रेमी प्यार से विक्कु विनायकराम कह कर सम्बोधित करते हैं। इस अनोखे तालवाद्य की कला को बचाने, शिखर तक पहुँचाने तथा इसे विश्वप्रसिद्ध करने में इनका योगदान उल्लेखनीय है। विक्कु जी का जन्म सन् 1942 में तत्कालीन मद्रास में हुआ था। उनके पिता श्री कलईमणि टी.आर. हरिहर शर्मा प्रसिद्ध संगीतज्ञ तथा संगीत के प्राध्यापक थे। विक्कु जी ने सात वर्ष की अल्पायु में ही घटम् वादन का प्रशिक्षण प्रारम्भ कर दिया था। 1955 में रामनवमी उत्सव के दौरान मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होने अपना आरंगेत्रम (प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति) दिया था। इस आरंगेत्रम से सम्बन्धित एक रोचक घटना भी जुड़ी है, वह यह कि जब विक्कु अपना अरंगेत्रम देने मंच पर जा रहे थे, तब गणेश नामक एक बच्चे ने उनका घटम् तोड़ दिया। इस घटना को वे आज भी अपने करियर के लिए शुभ मानते हैं। उन्होंने स्वयं को इतनी कम उम्र में इस प्रकार सिद्ध कर दिया कि शीघ्र ही वे एम. बालमुरलीकृष्ण, जी.एन. बालासुब्रह्मणियम, मदुरई मणि अय्यर और एम.एस. शुभलक्ष्मी जैसे कर्नाटक संगीत के दिग्गजों के साथ वादन करने लगे। विक्कु जी का अन्तर्राष्ट्रीय सफ़र शुरु हुआ 70 के दशक में कोलम्बिया (अमेरिका) से, जहाँ 'शक्ति' नामक बैण्ड से जुड़े जिसमें मुख्य सदस्य थे जॉन मक्लॉफ़्लिन तथा उस्ताद ज़ाकिर हुसैन। इसके बाद उनकी ख्याति में और वृद्धि हुई वर्ष 1992 में जब उन्हें 'प्लैनेट ड्रम' नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय संगीत अल्बम के लिए विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित 'ग्रेमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
 
तालवाद्य के रूप में घड़े अथवा घटम् का प्रयोग 40 और 50 के दशक की एकाध फिल्मों में किया गया था। फिल्मी गीतों में घड़े का सम्भवतः सबसे पहला प्रयोग संगीतकार नौशाद ने 1942 में प्रदर्शित ए.आर. कारदार की फिल्म 'शारदा' के एक गीत- 'पंछी जा पीछे रहा है बचपन मेरा...' में किया था। यह गीत सुरैया ने गाया था। आगे चल कर अभिनेत्री और पार्श्वगायिका बेबी सुरैया का पदार्पण 1942 में कारदार की बनाई दो फिल्मों से हुआ था। इनमें पहली फिल्म 'नई दुनिया' और दूसरी 'शारदा' थी। इसी प्रकार 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘बारादरी’ के एक गीत में ताल के लिए घड़े का अत्यन्त प्रभावी उपयोग किया गया था। संगीतकार नाशाद का संगीतबद्ध यह लोकप्रिय गीत तलत महमूद की आवाज़ में है। गीत के बोल हैं- 'तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती...’। राग पहाड़ी का स्पर्श लिये इस गीत में घड़े के माध्यम से कहरवा ताल का अनूठा सृजन किया गया है। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने अनुमति दीजिए।



फिल्म – बारादरी : ‘तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती...’ : तलत महमूद : संगीत – नाशाद 





आज की पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 169वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको लोक संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस स्वरवाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह किस प्रदेश का लोक संगीत है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 167वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नागिन' के एक बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- बीन अथवा पुंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म नागिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर जारी श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय एक अनूठे तालवाद्य ‘घटम्’ से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक और लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।  



आलेख : सुमित चक्रवर्ती 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 24 मई 2014

"मेरी यादों में साहिर लुधियानवी" - हसन कमाल



स्मृतियों के स्वर - 02

"मेरी यादों में साहिर लुधियानवी" - हसन कमाल



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। आज से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लायूंगा कुछ अनमोल मोतियाँ और आपके साथ बाँटूंगा हमारे इस नये स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। हम और आप साथ मिल कर गुज़रेंगे स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। तो आइये आज इसकी दूसरी कड़ी में पढ़ें गीतकार और शायर हसन कमाल की यादों में साहिर लुधियानवी को। साहिर साहब से अपनी पहली मुलाक़ात और अन्य यादों के बारे में बता रहे हैं हसन कमाल साहब।




सूत्र: विविध भारती, मुंबई

कार्य्रक्रम: "मेरी यादों में साहिर लुधियानवी" - हसन कमाल

प्रसारण वर्ष: 1999

पुन: प्रसारण तिथि: 1 मार्च 2008 ('स्वर्ण स्मृति' के अन्तर्गत)


साहिर लुधियानवी को श्रंद्धांजलि स्वरूप एक कार्यक्रम में हसन कमाल (बायें से दूसरे)

साहिर लुधियानवी साहब से मेरी पहली मुलाक़ात लखनऊ में हुई थी, जब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी का स्टुडेण्ट था, और वो यूनिवर्सिटी के एक मुशायरे में पहली बार लखनऊ आ रहे थे। यह वह ज़माना था जब साहिर लुधियानवी का वह क्रेज़ था कि लोग कहते थे कि अगर कोई साहिर लुधियानवी का नाम नहीं जानता, तो या तो वो शायरी के बारे में कुछ नहीं जानता, या फिर वो नौजवाँ नहीं, क्योंकि साहिर लुधियानवी उस ज़माने में नौजवानों के महबूबतरीन शायर हुआ करते थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं उन्हें रिसीव करने के लिए दूसरे स्टुडेण्ट्स के साथ चारबाग़ पहुँचा, तो मेरी ख़ुशी का यह हाल था कि जैसे न जाने यह मेरी ज़िन्दगी का कौन सा दिन है और इस हस्ती के दीदार के बग़ैर हमें यह लग रहा था कि ज़िन्दगी अधूरी रहेगी। वो तशरीफ़ लाये, हम लोग उन्हें वहाँ से रिसीव करके लाये, और उन्हें एक होटल में ठहराया गया, और मेरा उनसे तार्रूफ़ यह कह कर करवाया गया कि 'साहिर लुधियानवी साहब, ये हसन कमाल हैं, हमारे बहुत ही तेज़ और तर्रार क़िस्म के तालीबिल्मों में, स्टुडेण्ट्स में, और इनकी सबसे बड़ी ख़ुसूसियत यह है कि इन्हें आप की नज़्म 'परछाइयाँ', जो 19 पन्नों की लम्बी नज़्म थी, ज़बानी याद है'। साहिर साहब बहुत ख़ुश हुए, और शाम को जब हम उन्हें लेने गये तो वक़्त से कुछ पहले पहुँच गये थे, तो उन्होंने बात करते करते अचानक कहा कि 'भाई, किसी ने मुझे बताया कि तुम्हे 'परछाइयाँ' पूरी याद है?' मैंने अर्ज़ किया कि 'जी हाँ'। कहने लगे कि 'अच्छा, तो सुनाओ'। और मैंने पूरी 'परछाइयाँ' नज़्म उनको एक ही नशिश्ट में पढ़ कर सुना दी। और वो सुनते रहे। और जब नज़्म ख़त्म हुई तो उनका कमेण्ट यह था कि 'भई ऐसा है कि मैं पंजाबी हूँ, और शेर बहुत बुरा पढ़ता हूँ, और आज जब तुमको अपनी नज़्म पढ़ते सुना, तो मुझे यह महसूस हो रहा है कि आज के मुशायरे में मेरे बजाय मेरी शायरी तुम ही सुनाना'।

हसन कमाल
यह वह ज़माना था जब उनके गीत भी अपना रंग जमा चुके थे, और फ़िल्म 'नौजवान' में उनका गाना "ठण्डी हवायें, लहराके आयें", 'टैक्सी ड्राइवर' में उनका गाना "जायें तो जायें कहाँ", ये सब चारों तरफ़ मुल्क भर में गूंज रहे थे, और मैं समझता हूँ उसी दौर में उनका एक नज़्म 'धूल का फूल' भी रिलीज़ हुई थी। तो मैंने उनसे शिकायत की कि 'धूल का फूल' के गाने मैंने सुने हैं साहिर साहब, गाने बहुत अच्छे हैं, मगर महेन्द्र कपूर साहब ने दो एक तलफ़्फ़ुज़ में ग़लती की है। कहने लगे 'कहाँ?', मैंने कहा मिसाल के तौर पर उसमें एक गाना है कि "बेक़रारों की दुनिया", "सम्भल जायें हम बेक़रारों की दुनिया", उन्होंने "बेकरारों की दुनिया" गाया है, ना कि "बेक़रारों की दुनिया"। तो उन्होंने कहा कि तलफ़्फ़ुज़ की ग़लती उनसे (महेन्द्र कपूर से) हुई। फिर कहने लगे कि "तलफ़्फ़ुज़ की ग़लती तो मुझसे भी होती है, मैं भी पंजाबी हूँ"। और वो मेरी ज़िन्दगी का यादगार दिन था क्योंकि साहिर उस वक़्त महबूबतरीन शायर थे।

फिर मैं बम्बई आया, तो उनसे मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू हुआ। और वो मुझे बहुत अज़ीज़ लगते थे, और अक्सर उनके यहाँ जब पार्टी वगेरह होती थी, मुझे बुलाते थे और नौजवान कह कर बुलाते थे। और कहते थे कि 'यह ख़िदमत तुम्हारे सुपूर्त है'। और यह सिलसिला काफ़ी अरसे तक चलता रहा। उनके इन्तकाल की ख़बर मैंने कनाडा में सुनी। हम लोग एक मुशायरे में वहाँ गये हुए थे जब यह मालूम हुआ कि साहिर साहब इस दुनिया में नहीं रहे और मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं कमरा बन्द करके बहुत देर तक रोया किया था।

युवा साहिर
साहिर की नज़्मों ने मोटिवेट किया नौजवानों को। साहिर की नज़्मों ने एक प्रोग्रेसिव रुमानियत का तसव्वुर दिया, और साहिर की नज़्मों ने एक आग सी लगा दी थी उस वक़्त के माहौल में। आप यकीन करें कि मैंने आज तक इतना महबूब शायर नहीं देखा। उनके कलाम के बारे में लोगों के मुख़्तलीफ़ रायें हैं, क्रिटिक्स के कुछ हैं, सुनने वालों की कुछ हैं, पढ़ने वालों की कुछ हैं, लेकिन मुझे यह अच्छी तरह से मालूम है कि उनके जो मजमूयें हैं, कलाम हैं 'तल्ख़ियाँ', आज तक 'तल्ख़ियाँ' के जितने एडिशन्स छपे हैं, किसी दूसरी शायरी के, मजमूयें के नहीं छपे। यह मैं आज के दौर की बात कर रहा हूँ, ग़ालिब वगेरह की तो ख़ैर बात अलग है, लेकिन जो आज़ादी के बाद, जिन शायरों के नाम हमारे सामने आते हैं, उनमें साहिर लुधियानवी वाहिद नाम है जिसकी किताब के 21 एडिशन उस वक़्त छप चुके थे जिस वक़्त वो ज़िन्दा थे। और आज तक यह सिलसिला जारी है। एक ख़ुसूसी बात जो मैंने उनमें नोट की थी वह यह कि वो अपनी मक़बूलियत को पहचानते हुए भी और जानते हुए भी कभी यह नहीं भूले कि उनकी अपनी जड़ें कहाँ हैं। यानी वो जब भी तन्हा होते थे, तो एक बात यह कहते थे कि 'मैंने जो शायरी की है, उसकी जड़ें फ़ैज़ और मजाज़ के यहान हैं'। और उन्होंने मजाज़ को बहुत दिनों तक अपने यहाँ महमान भी रखा। मजाज़ के वो बे-इन्तहा कायल थे, मजाज़ से बे-इन्तहा मोहब्बत करते थे।

साहिर लुधियानवी के मौत के बाद मुशायरों की दुनिया में कोई ऐसा मकबूक शायर नज़र नहीं आया कि जिसको हम आम ज़बान में क्राउड-पुलर कह सके। साहिर का नाम लेते ही जैसे लड़कों और लड़कियों के ठक लग जाते थे। मुझे मालूम है कि जब वो लुधियाना बुलाये गये एक बार, यहाँ वो कभी स्टुडेण्ट रहा करते थे, तो उस वक़्त लुधियाना में जब यह मालूम हुआ कि साहिर लुधियानवी आ गये हैं, तो कोई भी नौजवान पढ़ा लिखा, मर्द, औरत, लड़का और लड़की ऐसा नहीं था जो उस कॉलेज में मौजूद न हो जहाँ वो अपना कलाम सुना रहे थे, मुझे उनका ज़िक्र हुआ तो मीर का शेर याद आया जो उन पर बहुत सादिक़ाता है कि "पैदा कहाँ है कि ऐसे परागन्दातबा लोग, अफ़सोस तुमको मीर से सोहोबत नहीं रही"। मेरी ख़ुशनसीबी है कि मेरी साहिर साहब से सोहोबत रही और ख़ूब रही, मोहब्बतें रही, लड़ाइयाँ रही, प्यार रहा, और ये सब मेरी ज़िन्दगी की बहुत ख़ूबसूरत निशानियाँ हैं।


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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार विविध भारती के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।


तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

गुरुवार, 22 मई 2014

क्या लगाई तुमने ये कसम कसम से...

खरा सोना गीत - देखो कसम से 

छेड़ छाड़ और मस्ती से भरे इस युगल गीत को फिर से याद करें हमारे प्रस्तोता अनुज श्रीवास्तव के साथ, स्क्रिप्ट है सुजोय की और प्रस्तुति सहयोग है संज्ञा टंडन का. 

बुधवार, 21 मई 2014

होंठों को मुस्कुराने और गुनगुनाने की वजह देती अरिजीत की आवाज़

ताज़ा सुर ताल - मुस्कुराने  (सिटी लाईट्स)

दोस्तों पिछले करीब २ सालों से हम सब इस युवा गायक के दीवाने हो रखे हैं, उस का हर नया गीत भीतर एक गहरी हलचल पैदा कर देता है और हम सब की छुपी या जाहिर आशिकी को जैसे आवाज़ मिल जाती है. रोमानियत को गहरे से आत्मसात करती ये आवाज़ है अरिजीत सिंह की. ताज़ा प्रस्तुति में आज फिर से अरिजीत का जादू महकेगा, गीत के बोल है..मुकुराने की वजह तुम हो... और इस गीत को वजह और वजूद दिया है जीत गांगुली ने. कभी प्रीतम के जोड़ीदार रहे जीत के लिए खुद प्रीतम ने एक बार कहा था कि जब लोग जीत की काबिलियत को समझेगें तो उसके दीवाने हो जायेगें, प्रीतम दा की ये बात एकदम सही लग रही है आज के सन्दर्भ में. धीरे धीरे श्रोता जीत की जादू भरी धुनों में डूब रहे हैं इन दिनों. फिल्म सिटी लाईट्स का है ये गीत. इस फिल्म में हमें दुबारा दिखेगा राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक हंसल मेहता और अभिनेता राजकुमार राव की बेमिसाल जोड़ी का नया अंदाज़. आप में से जिन दर्शकों ने इनकी 'शाहिद' देखी हो उन्हें यक़ीनन इस फिल्म का बेहद बेसब्री से इंतज़ार होगा. फिल्म को महेश भट्ट लेकर आ रहे हैं और इसे वो अपनी सबसे बहतरीन कृतियों में से एक मान रहे हैं. ब्रिटिश फिल्म मेट्रो मनिला  पर आधारित इस फिल्म की चर्चा हम आगे भी जारी रखेगें, फिलहाल सुनते हैं ये गजब का गीत.... 

मंगलवार, 20 मई 2014

अनुराग शर्मा की लघुकथा ईमान की लूट

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा के स्वर में हरिशंकर परसाई के व्यंग्य "बदचलन" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा का एक लघु व्यंग्य ईमान की लूट जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत कथा का गद्य "बर्ग वार्ता ब्लॉग" पर उपलब्ध है। "ईमान की लूट" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 58 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



प्रश्न कठिन हो जाते हैं, हर उत्तर पे इतराते हैं
मैं चिंता में घुल जाता हूँ, चलूँ तो पथ डिग जाते हैं।
 ~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"गांधीवादी ने कहा कि उसने सबसे थप्पड़ खाये हैं इसलिए वह सबसे ज़्यादा हिस्से का हकदार है।”
 (अनुराग शर्मा कृत "ईमान की लूट" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
ईमान की लूट MP3

#Sixth Story, Pakistan Mein Iman Ki Loot: Anurag Sharma Hindi Audio Book/2014/6. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 19 मई 2014

तुझे ओर की तम्मंना मुझे तेरी आरज़ू है....

खरा सोना गीत - जिसे तू कबूल कर ले 

चंद्रमुखी के समर्पण को उभरता ये गीत है जिसमें लोक संगीत की भी महक है, जानिये इस गीत से जुडी कुछ और बातें हमारी प्रस्तोता श्वेता पाण्डेय के साथ, स्क्रिप्ट है सुजोय की और प्रस्तुति है संज्ञा टंडन की.  

रविवार, 18 मई 2014

एक सुषिर लोकवाद्य बीन, महुवर अथवा पुंगी

स्वरगोष्ठी – 168 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 6

'मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार...'  नागों को भी झूमने पर विवश कर देने वाला वाद्य


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की छठीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे जो सुषिर वर्ग का वाद्य है, अर्थात बाँसुरी या शहनाई की तरह इस वाद्य को भी हवा से फूँक कर बजाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि बीन के स्वर से नाग मुग्ध होकर झूमने लगते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के हमारे साथी सुजॉय चटर्जी इस सुषिर वाद्य पर चर्चा कर रहे हैं। 


दोस्तों, आपने शास्त्रीय मंचों पर कई ऐसे वाद्य देखे-सुने होंगे जो मूलतः लोकवाद्य श्रेणी में आते हैं, किन्तु गुणी संगीतज्ञों ने उनमें आवश्यक परिमार्जन कर शास्त्रीय संगीत के उपयुक्त बनाया। आज हमारी चर्चा में एक ऐसा लोकवाद्य है जो आज भी अपने मौलिक रूप में लोकमंचों पर ही सुशोभित है। वह वाद्य बीन है, जो कोई शास्त्रीय साज़ नहीं है, बल्कि इसे हम लोक-साज़ ही कहेंगे, क्योंकि इसका प्रयोग लोक संगीत मे स्वरवाद्य के रूप में ही होता है। इस साज का सर्वाधिक प्रयोग एक समुदाय विशेष के लोग अपने जीविकोपार्जन के लिए करते हैं। यह सपेरों का समुदाय है। बीन को आज हम सपेरों और साँपों से जोड़ते हैं। बीन वाद्य को पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उत्तर और पूर्व भारत में इसे पुंगी, तुम्बी, महुवर, नागासर और सपेरा बाँसुरी के नामों से पुकारा जाता है, तो दक्षिण में नागस्वरम, महुदी, पुंगी और पमबत्ती कुज़ल नाम से प्रचलित है। पुंगी या बीन को सपेरे की पत्नी का दर्जा दिया जाता है और इस साज़ का विकास शुरु में लोक संगीत के लिए किया गया था।

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग-अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ की जो संरचना है, वह हर स्थान पर लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फुट होती है। पारम्परिक तौर पर बीन या पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बाँस के दो पाइप लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है। इनमें से एक पाइप मेलोडी के लिए और दूसरा ड्रोन इफ़ेक्ट के लिए होती है। सबसे उपर लौकी के सूखे खोल के अन्दर एक ट्यूब डाला जाता है। वादक बाँसुरी की तरह है इसके सिरे पर फूँक मारता है। लौकी के खोल के अंदर फूँकने पर इसमें हवा भरती है और नीचे के हिस्से में लगे जिवाला से बाहर निकलती है। इन दोनों पाइपों में एक 'बीटिंग रीड' होती है जो ध्वनि उत्पन्न करती है। हम पहले ही यह चर्चा कर चुके हैं कि एक पाइप से मेलोडी बजती है और दूसरे से ड्रोन इफ़ेक्ट आता है। आधुनिक संस्करण में बाँस की दो पाइप के अलावा एक लम्बे मेटलिक ट्यूब का इस्तेमाल होता है। यह भी ड्रोन का काम करता है। पुंगी या बीन बजाते वक़्त हवा की निरन्तरता जरूरी है। फूँक में कोई ठहराव मुमकिन नहीं है। इसलिए इसे बजाने का जो सबसे प्रचलित तरीका है, वह है गोलाकार तरीके से साँस लेने का, जिसे हम अंग्रेज़ी में 'सर्कुलर ब्रीदिंग' कहते हैं। आइए, अब हम आपको समूह में बीन वादन सुनवाते हैं। इसे राजस्थान के लोक कलाकारों ने प्रस्तुत किया है।


समूह बीन वादन : राजस्थानी लोक धुन




पुंगी या बीन साज़ का इस्तेमाल राजस्थान के विख्यात लोकनृत्य, कालबेलिया में अनिवार्य रूप से होता है। इस नृत्य का कालबेलिया नामकरण इसी नाम से पहचाने जाने वाली एक बंजारा जाति के नाम पर पर हुआ है। यह जाति प्राचीन काल से ही एक जगह से दूसरे जगह पर निरन्तर घूमती रहती है। जीविकोपार्जन के लिए ये लोग साँपों को पकड़ते हैं और उनके ज़हर का व्यापार करते हैं। शायद इसी वजह से कालबेलिया लोकनृत्य के पोशाक में और नृत्य की मुद्राओं में भी सर्पों की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। कालबेलिया जाति को सपेरा, जोगिरा, और जोगी भी कहते हैं और ये स्वयं को हिन्दू मानते है। इनके पूर्वज कांलिपार हैं, जो गुरु गोरखनाथ के बारहवें उत्तराधिकारी थे। कालबेलिया सबसे ज़्यादा राजस्थान के पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़ और उदयपुर ज़िलों में पाये जाते हैं। कालबेलिया नृत्य इनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें पुरुष संगीत का पक्ष संभालते हैं। और इस पक्ष को संभालने के लिए जिन साज़ों का वे सहारा लेते हैं, उनमें शामिल हैं बीन या पुंगी, डफ़ली, खंजरी, मोरचंग, खुरालिओ और ढोलक, जिनसे नर्तकियों के लिए रिदम उत्पन्न की जाती है। जैसे जैसे नृत्य आगे बढ़ता है, रिदम और तेज़ होती जाती है। इन नर्तकियों का शरीर इतना लचीला होता है कि देख कर ऐसा लगता है जैसे रबर के बनें हैं। जिस तरह से बीन बजाकर साँपों को आकर्षित और वश में किया जाता है, कालबेलिया की नर्तकियाँ भी उसी अंदाज़ में बीन और ढोलक के इर्द-गिर्द लहरा कर नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

बीन का इस्तेमाल कई हिन्दी फ़िल्मी गीतों में भी हुआ है। और जब भी कभी साँपों के विषय पर फ़िल्म बनी तो बीन के पीसेस बहुतायत में शामिल हुए। कभी हारमोनियम और क्लेवायलिन से बीन की ध्वनि उत्पन्न की गई तो कभी कोई और सीन्थेसाइज़र से। क्योंकि मूल बीन बजाने में कठिन अभ्यास की जरूरत होती है, इसलिए ज़्यादातर गीतों में अन्य साज़ों पर मिलते-जुलते आवाज़ को उत्पन्न कर इस्तेमाल किया गया। किसी और साज़ के इस्तेमाल से बीन का ईफ़ेक्ट लाया गया है ज़्यादातर गीतों में। आइए, 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नागिन' का बेहद लोकप्रिय गीत सुनते हैं, लता मंगेशकर की आवाज़ में। इसके संगीतकार हेमन्त कुमार थे और गीत में बीन की आकर्षक धुन के वादक कल्याण जी थे। संगीतकार कल्याण जी-आनन्द जी जोड़ी के कल्याण जी उन दिनों हेमन्त कुमार के सहायक थे। गीत के शुरुआत में बीन की धुन का एक लम्बा टुकड़ा इस्तेमाल हुआ है। यह हिस्सा इतना अधिक लोकप्रिय हुआ था कि आज छः दशक बाद भी अगर किसी सन्दर्भ में बीन के धुन की ज़रूरत पड़ती है, तो इसी पीस का सहारा लिया जाता है। आप बीन की मोहक धुन से युक्त इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म - नागिन : ‘मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार...’ : लता मंगेशकर : संगीत – हेमन्त कुमार





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 168वें अंक की पहेली में आज हम आपको लगभग छः दशक पुराने एक लोकप्रिय फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत के इस अंश में किस ताल वाद्य का प्रयोग किया गया है? ताल वाद्य का नाम बताइए।

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 166वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको प्राचीन सुरबहार वाद्य पर प्रस्तुत तालबद्ध रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न के रूप में हमने प्रस्तुत रचना का राग पूछा था, जिसका सही उत्तर है- राग जैजैवन्ती। पहेली के दूसरे दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- धमार ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के अन्तर्गत लोकवाद्य बीन के बारे में चर्चा की। अगले अंक में हम एक ऐसे लोक तालवाद्य की चर्चा करेंगे, जो आज शास्त्रीय मंचों पर भी शोभायमान हो चुका है। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 


शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 17 मई 2014

"मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" - फ़िल्म इतिहास में कोई रंग नहीं राज कपूर की फ़िल्मों के बिना


एक गीत सौ कहानियाँ - 31
 

मैं हूँ ख़ुशरंग हिना...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 31वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'हिना' के लोकप्रिय शीर्षक गीत "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" के बारे में।


राज कपूर न केवल एक फ़िल्मकार थे, संगीत की समझ भी उनमें उतनी ही थी। और यही कारण था कि उनकी समस्त फ़िल्मों का संगीत सफल रहा है, सदाबहार रहा है। हिट फ़िल्मों की तो बात ही छोड़ देते हैं, उनकी असफल फ़िल्मों के गीत भी सदाबहार रहे हैं। हर गीत के लिए वो उतनी ही मेहनत करते थे जितनी मेहनत फ़िल्म के अन्य पक्षों के लिए। एक-एक गीत में वो ख़ुद लगे रहते थे गीतकार-संगीतकार के साथ। गीतकार और संगीतकार से हर गीत में फेर- बदल करवाते थे। आसानी से किसी गीत को स्वीकृति देना राज कपूर की आदत नहीं थी। इसके चलते उनके गीतकारों और संगीतकारों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती। गीतकार नक्श ल्यायलपुरी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वो जब फ़िल्म 'हिना' के लिए "चिट्ठिये दर्द फ़िराक़ वालिये" गीत लिख कर लाये, तो उसे पढ़ कर राज कपूर ने यह कहा कि यह पहला गाना है जिसे मैं बिना किसी फेर-बदल करवाये अप्रूव कर रहा हूँ। नक्श ल्यायलपुरी के लिए यह गर्व की बात थी। फ़िल्म 'हिना' की बात चली है तो बता दें कि 1985 में 'राम तेरी गंगा मैली' की अपार सफलता के बाद राज कपूर का अगला बड़ा प्रोजेक्ट था 'हिना'। यह फ़िल्म रिलीज़ तो हुई 1991 में, पर इसका निर्माण काफ़ी पहले से ही शुरू हो चुका था। बल्कि 'राम तेरी गंगा मैली' फ़िल्म के गीतों के रेकॉर्डिंग के समय से ही राज कपूर और रवीन्द्र जैन के बीच फ़िल्म 'हिना' के गीतों की चर्चा शुरू हो चुकी थी। 1988 में राज कपूर के निधन के बाद उनके बेटे रणधीर कपूर ने फ़िल्म की कमान सम्भाली और इसे पूरी सफलता के साथ अंजाम दिया और इसे एक यादगार फ़िल्म के रूप में स्थापित किया। राज कपूर अपनी फ़िल्मों को पर्फ़ेक्ट बनाने के लिए किस हद तक जा सकते थे, फ़िल्म 'हिना' से जुड़ी दो बातों से पता चलता है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि नायक नदी में बह कर भारत से पाक़िस्तान जा पहुँचते हैं और वहीं एक पाक़िस्तानी लड़की के सम्पर्क में आते हैं। इस नायिका की भूमिका के लिए राज कपूर ने किसी भारतीय अभिनेत्री को न चुन कर एक लम्बी खोज के बाद पाक़िस्तानी नायिका ज़ेबा को चुना। इतना ही नहीं, पाक़िस्तानी किरदारों के संवाद लेखन के लिए पाक़िस्तान की जानी-मानी लेखिका हसीना मोइन को राज़ी करवाया। बहुत कम फ़िल्मकार इतनी दूर की सोचते हैं। 

और अब आते हैं दूसरे क़िस्से पर जो एक बार फिर साबित करेगा राज कपूर के अपने फ़िल्म-निर्माण के प्रति समर्पण को। इस क़िस्से के बारे में फ़िल्म के संगीतकार (व कुछ गीतों के गीतकार) रवीन्द्र जैन के अपने शब्दों में- 'हिना' के साथ भी बड़ा मज़ेदार क़िस्सा हुआ। वो किस्सा बयाँ करने से पहले मैं सागर साहब (रामानन्द सागर) को प्रणाम करता हूँ, कल तक हमारे साथ थे; 'रामायण' जो हमारा महाकाव्य, जिसको उन्होंने घर-घर पहुँचाया, अपने नाम के अनुरूप, राम का आनन्द और उसका सागर, आनन्द का सागर बहाने वाले, घर-घर पहुँचाने वाले रामानन्द सागर, उनका यह सीरियल कर रहा था मैं, 'रामायण'। तो उनका एक गाना रेकॉर्ड करके उसी दिन फिर मैंने वह गाना राज साहब को सुनाया। वह गाना था, सिचुएशन बहुत अजीब थी, कैकेयी और भरत के बीच में था, भरत ने कभी माँ बुलाया नहीं उनको, तो उनकी आपस में बातचीत हो रही थी कहीं, और एक फ़कीर को हमने गाना दिया, बैकग्राउण्ड से गा रहा था, "ओ मैया तैने का ठानी मन में, राम-सिया भेज देरी बन में"। मैंने यह गा कर राज साहब को सुनाया और कहा कि यह गाना आज मैंने रेकॉर्ड किया है। तो उन्होंने कहा कि देख देख देख, तूने यह गाना सुनाया न, मेरे रोंगटे खड़े हो गये, देख देख देख। यह सुन कर मुझे बड़ा अच्छा लगा, लेकिन अगले ही पल वो अपनी पत्नी की तरफ़ देख कर बोले कि अब ये 'हिना' नहीं कर सकता। मैंने सोचा कि मर गये, यह क्या हो गया! मैं सोच में पड़ गया कि क्या करें! फिर उस दिन तो मैं चला आया वहाँ से। मेरा बड़ा मन था कि यह इतना बड़ा प्रोजेक्ट मेरे हाथ से चला जायेगा! तो करीब-करीब सात दिन बाद मुझे इनका फोन आया, जो राज साहब के यहाँ प्रोडक्शन देखते थे, उन्होंने कहा कि राज साहब ने कहा है कि उनके साथ श्रीनगर चलना है। तो मैं, मेरी पत्नी दिव्या, राज जी और कृष्णा भाभी, हम लोग कश्मीर गये। कुछ नहीं साहब, कोई ज़िक्र नहीं फ़िल्म का, न गीत-संगीत का, बस चलो आज यहाँ, कल वहाँ, शिकारे में घूमो, यहाँ खाना खाओ, चलो ये करो वो करो, यही सब करते रहे पूरे 25 दिनों तक। और इधर मुंबई में मेरा सारा काम पेन्डिंग पड़ा हुआ है। तो 25 दिनों बाद मुम्बई लौटने पर मुझे पता चला कि यह सब ताम-झाम राज जी ने इसलिए किया ताकि मेरे दिमाग़ से 'रामायण' निकाल दे और 'हिना' डाल दे। ताकि मैं खुले दिमाग से 'हिना' के बारे में सोच सकूँ। इसके लिए इन्होंने इतनी कोशिश की, मुझे कश्मीर ले गये, लोगों से मिलवाया, कास्ट के जो लोग थे, बंजारे, उनको बुलाया, तो ये सब प्रयत्न  'हिना' के लिए था। आप ही बताइये उनके अलावा कौन सा फ़िल्मकार इस हद तक जा सकता है अपनी फ़िल्म के संगीत के लिए जो सर्वोत्तम है, वह सुनिश्चित करने के लिए!

2 जून 1988 को राज कपूर चल बसे। तब तक इस फ़िल्म के केवल तीन ही गीत रेकॉर्ड हुए थे - "चिट्ठिये दर्द फ़िराक वालिये", "देर न हो जाये कहीं" और एक तीसरा गाना था जिसे बाद में फ़िल्म से हटा दिया गया था। रवीन्द्र जैन से ही पता चला कि उस समय राज कपूर एक और फ़िल्म बनाने की सोच रहे थे 'घुंघट के पट खोल'। अपने अन्तिम दिनों में राज कपूर दिल्ली गये दादा साहब फालके पुरस्कार स्वीकार करने, पर वापस नहीं लौटे। उन्हें पुर्वाभास हो गया था। तभी दिल्ली जाते हुए अपनी पत्नी से कह गये कि 'I am going as a passenger but would return as a cargo!' उनके अन्तिम समय में रवीन्द्र जैन भी उनसे मिलने गये और उनसे वादा किया कि 'हिना' बन कर रहेगा। संगीतकार के साथ राज कपूर के काम करने के तरीके के बारे में रवीन्द्र जैन ने बताया, "राज साहब अपने कलाकारों को ख़ुश रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। उत्तम खाना-पीना, उत्तम होटल, वो कभी खर्चे की परवाह नहीं करते। हमेशा सम्मान से बात करते। उनका दिमाग़ बिल्कुल साफ़ रहता और वो जानते कि उन्हें क्या चाहिये। वो गीत के सिचुएशन को डिटेल में समझाते। वो कहते कि अगर तुम्हे और अधिक साज़िन्दे चाहिये तो ले लो, अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़ेमस स्टुडियो की दीवारें भी तोड़ दी जाएगी, जगह बनाने के लिए, पर केवल उतने ही साज़िन्दे रखना जितनों की ज़रूरत है, न एक ज़्यादा, न एक कम।" फ़िल्म 'हिना' के शीर्षक गीत के लिए जब बातचीत चल रही थी, राज साहब समझाने लगे कि नायिका हिना का इन्ट्रोडक्शन सीन है जिसमें वो अपने बारे में ख़ुद बता रही है, इस सितुएशन पर गीत चाहिए। रवीन्द्र जैन लिख लाये "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, ज़िन्दगानी में कोई रंग नहीं मेरे बिना"; यह सुन कर राज साहब बहुत ख़ुश हुए और कहा कि बिल्कुल ऐसे ही मुखड़े की उन्हें उम्मीद थी।

'हिना' फ़िल्म का यह शीर्षक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है। रवीन्द्र जैन ने यह स्वीकार किया है कि लता जी के साथ उनका सम्बन्ध हमेशा तनावपूर्ण रहा है। उनके अनुसार लताजी शायद यह समझती थी कि वो नये गायिकाओं (हेमलता व आरती मुखर्जी) को बढ़ावा दे रहे हैं। पर सच्चाई यह थी कि रवीन्द्र जैन के फ़िल्मों के निर्माता छोटे बजट के निर्माता थे जो या तो लता जी को अफ़ोर्ड नहीं कर पाते या लता जी के डेट्स के लिए लम्बे समय तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। पर लता जी आख़िर तक रवीन्द्र जैन को ग़लत ही समझती रहीं, ऐसी धारणा है रवीन्द्र जैन साहब की। राज कपूर की फ़िल्म न होती तो शायद 'राम तेरी गंगा मैली' और 'हिना' के संगीतकार कोई और होते या फिर इन गीतों में आवाज़ किसी और गायिका की होती। वैसे लता जी की शान में रवीन्द्र जैन कहते हैं - "हमने पिछली सदी में देखा, और इस सदी में भी देख रहे हैं कि लता जी का कोई जोड़ नहीं है। ईश्वर प्रदत्त जो आवाज़ उन्होंने पायी है, वह आवाज़ फिर दोबारा किसी और को नहीं मिल सकती।" ख़ैर, "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जो फ़िल्म के अन्तिम सीन से पहले फ़िल्म में आता है। बोलों पर अगर ग़ौर करें तो अहसास होता है कि सैड वर्ज़न मुख्य गीत से बेहतर लिखा गया है। बहुत ही अर्थपूर्ण शब्दों में रवीन्द्र जैन ने इसे पिरोया है जिसमें लता के साथ मोहम्मद अज़ीज़ की भी आवाज़ शामिल है --

"किसलिए मासूम रूहों को तड़पने की सज़ा,
अपने बन्दों की ख़ुशी से क्यों जला करता है तू
मुनसिफ़ें तक़दीर मिल जायेगा तो पूछेंगे हम
किस बिना पे ज़िन्दगी का फ़ैसला करता है तू।"

इससे भी बेहतर अन्तिम अन्तरे के बोल हैं जिन्हें सुनते हुए आँखें नम हुए बिना नहीं रह पाते।

"हो वो औरत कि हिना, फ़र्क़ क़िस्मत में नहीं,
रंग लाने के लिए दोनों पीसती ही रही,
मिट के ख़ुश होने का दोनों का है इक ढंग हिना,
मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, प्यारी ख़ुशरंग हिना।"

इन पंक्तियों के बाद कुछ और कहना अनावश्यक है। इस गीत ही की तरह राज कपूर के लिए भी हम यही कह सकते हैं फ़िल्मी इतिहास में भी कोई रंग नहीं उनकी फ़िल्मों के बिना। और साथ ही सलाम रवीन्द्र जैन साहब को भी! और अब आप इस गीत के दोनों संस्करण सुनिए। पहले में लता मंगेशकर की और दूसरे में लता जी के साथ मोहम्मद अजीज की आवाज शामिल है।

फिल्म - हिना : 'मैं हूँ खुशरंग हिना, प्यारी खुशरंग हिना...' : लता मंगेशकर और मोहम्मद अज़ीज़ : गीत-संगीत - रवीन्द्र जैन






अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

गुरुवार, 15 मई 2014

दुनिया के सवालों में उलझी एक मार्मिक रचना

खरा सोना गीत - दुनिया करे सवाल तो 

हमारे प्रस्तोता अनुज श्रीवास्तव के साथ आईये ताज़ा करें मीना कुमारी और लता की जुगलबंदी का ये गीत जिसे साहिर-रोशन के रचे बहतरीन गीतों में गिना जाता रहा है. स्क्रिप्ट है सुजोय की और प्रस्तुति है संज्ञा टंडन की  


रविवार, 11 मई 2014

एक समृद्ध तंत्रवाद्य सुरबहार


स्वरगोष्ठी – 167 में आज


संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 5


तंत्रवाद्य सुरबहार से उपजते गम्भीर और गमकयुक्त सुरों की बहार

 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने सहयोगी सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे स्वरवाद्य की चर्चा करेंगे जिसका प्रचलन अब लगभग नहीं के बराबर हो रहा है। आज के सर्वाधिक प्रचलित तंत्रवाद्य सितार से विकसित होकर बना ‘सुरबहार’ वाद्य अब लगभग अप्रचलित सा होकर रह गया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के हमारे साथी लेखक और सहयोगी सुमित चक्रवर्ती लुप्तप्राय तंत्रवाद्य सुरबहार पर चर्चा कर रहे हैं। 
 



उस्ताद इमरत खाँ 
‘परिवर्तन संसार का नियम है’- इस उक्ति को प्रायः हम सब सुनते हैं और प्रयोग भी करते रहते हैं। इस सृष्टि में शायद ही कोई ऐसी रचना हो जिसमें कभी परिवर्तन न आया हो। हमारे आदिकालीन भारतीय संगीत में समय-समय पर कई प्रकार के परिवर्तन होते रहे हैं। संगीत के गायन पक्ष के साथ-साथ वाद्य संगीत भी कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर ग़ुज़रता रहा है। वैदिक काल के अनेक तंत्रवाद्य विकसित होकर आज भी प्रचलित हैं। सुरबहार की तंत्रवाद्य श्रेणी के अन्तर्गत गणना की जाती है। वर्तमान में बेहद लोकप्रिय तंत्रवाद्य सितार स्वयं इम्प्रोवाइज़ किया हुआ वाद्य है। परन्तु सितार को भी इम्प्रोवाइज़ कर सुरबहार नामक वाद्य की रचना की गई थी। यूँ तो माना जाता है कि सुरबहार वाद्य का विकास 1825 में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद इमदाद खाँ के पिता उस्ताद साहेबदाद ख़ाँ ने की थी। परन्तु कई जगहों पर इसके सर्जक के रूप में लखनऊ के सितार वादक उस्ताद ग़ुलाम मुहम्मद का भी उल्लेख पाया जाता है। सुरबहार के तारों पर आघात कर इसे बजाया जाता है। सितार की तरह इसमें स्वरों के परदे होते हैं। इस वाद्य की ऊँचाई लगभग 130 सेंटीमीटर होती है। इसमें चार तार स्वर के, चार तार चिकारी के और 15 से 17 तक अनुकम्पी स्वरों के तार लगाए जाते हैं। इसे धातु के तार से बने शंक्वाकार मिज़राब से बजाया जाता है। वादक अपने दाहिने हाँथ की तर्जनी उँगली में मिज़राब पहन कर सुरबहार के तारों को झंकृत करते हैं। सुरबहार तथा सितार में मूल अन्तर यह है कि सुरबहार को नीचे के नोट्स पर बजाया जाता है। इसी कारण इसे 'बेस सितार' (Bass Sitar) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सितार के मुक़ाबले इसका तल भाग थोड़ा चपटा होता है तथा इसके तार भी सितार से भिन्न थोड़े मोटे होते हैं। अपनी इसी बनावट के कारण इससे निकलने वाली ध्वनि गमक से युक्त होती है। सुरबहार की रचना के पीछे मूल उद्देश्य था- पारम्परिक रुद्रवीणा वाद्य के सर्वथा अनुकूल ध्रुपद शैली में आलाप को प्रस्तुत करना। इस वाद्य पर ध्रुपद अंग में आलाप, जोड़ और झाला का वादन अत्यन्त भावपूर्ण अनुभूति कराता है। कुशल वादक पहले सुरबहार पर आलाप, जोड़ और झाला वादन करते हैं, फिर गत बजाने के लिए सितार वाद्य का प्रयोग करते हैं। आइए, अब हम आपको इमदादखानी घराने के सुरबहार और सितार के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद इमरत खाँ का सुरबहार पर बजाया राग यमन कल्याण में आलाप, जोड़ और झाला सुनवाते है।


सुर बहार वादन : राग - यमन कल्याण : आलाप, जोड़ और झाला : उस्ताद इमरत खाँ




पण्डित शिवमाथ मिश्र और देवव्रत मिश्र 
उस्ताद इमरत खान सुरबहार और सितार के विश्वविख्यात वादक हैं। खाँ साहब इमदादखानी अर्थात इटावा घराने का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ इनके बड़े भाई थे। इमरत खाँ ने अनेक वर्षों तक अपने अग्रज के साथ युगल वादन भी किया है। इनके पिता उस्ताद इनायत खाँ (1894-1938) और दादा उस्ताद इमदाद खाँ (1848-1920) ने सुरबहार वादन की विकसित परम्परा को स्थापित किया था। मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री और पण्डित रविशंकर की पहली पत्नी विदुषी अन्नपूर्णा देवी भी सुरबहार की कुशल कलासाधिका रही हैं। सेनिया घराने के उस्ताद मुश्ताक खाँ को सुरबहार पर ध्रुपद अंग के उत्कृष्ट वादक के रूप में ख्याति मिली थी। उनका सुरबहार वादन सुनने वालों को लगभग रुद्रवीणा जैसे स्वरों की अनुभूति कराती थी। पिछली आधी शताब्दी में कुछ गुणी कलासाधकों ने सुरबहार को अपनाया और बेहतर प्रयोग किये। संगीतज्ञों ने इस वाद्य को दो शैलियों में बजाया, एक तो पारम्परिक ध्रुपद अंग से और दूसरा, गतकारी अंग से। दुर्भाग्यवश कई कारणों से सुरबहार अन्य तंत्रवाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। शायद इसका सबसे प्रमुख कारण है, इसकी विशाल बनावट, जिसके कारण इसे सम्भालने में और यातायात में असुविधा होती है। अब हम आपको सुरबहार पर ध्रुपद अंग की एक तालबद्ध रचना सुनवाते हैं, जो युगलवादन रूप में प्रस्तुत किया गया है। उत्तर भारतीय संगीत का एक प्रमुख केन्द्र वाराणसी भी है। यहाँ भी तंत्रवाद्य की समृद्ध परम्परा रही है। वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व संगीत विभागाध्यक्ष पण्डित शिवनाथ मिश्र और उनके प्रतिभावान सुपुत्र देवव्रत मिश्र ने युगल रूप में सुरबहार वादन प्रस्तुत किया है। आप सुरबहार पर राग जैजैवन्ती, धमार ताल में सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


युगल सुर बहार वादन : राग – जैजैवन्ती : धमार ताल में गत : पण्डित शिवनाथ मिश्र और देवव्रत मिश्र





आज की पहेली


स्वरगोष्ठी’ के 167वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको लगभग छः दशक पुराने एक फिल्मी गीत में बजाए गए लोकवाद्य वादन का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस स्वरवाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस फिल्म के गीत का अंश है? फिल्म का नाम हमें लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 169वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 165वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको लोक-ताल-वाद्य नक्कारा वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- नक्कारा अथवा नगाड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- आठ मात्रा का कहरवा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर जारी श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय एक कम प्रचलित तंत्र वाद्य सुरबहार से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 




शोध एवं आलेख : सुमित चक्रवर्ती 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
  

शनिवार, 10 मई 2014

गायिका जुथिका रॉय के पहली बार रेडियो पर गाने का अनुभव



स्मृतियों के स्वर - 01

गायिका जुथिका रॉय के पहली बार रेडियो पर गाने का अनुभव



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। आज से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लायूंगा कुछ अनमोल मोतियाँ और आपके साथ बाँटूंगा हमारे इस नये स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। हम और आप साथ मिल कर गुज़रेंगे स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। तो आइये आज इसकी पहली कड़ी में मिलें गुज़रे ज़माने की सुप्रसिद्ध भजन गायिका जुथिका रॉय से और जानें कि बरसों बरस पहले जब पहली बार उन्होंने रेडियो पर अपना पहला गीत गाया था, वह अनुभव कैसा था।




सूत्र: विविध भारती, मुंबई

कार्य्रक्रम: आज के महमान - जुथिका रॉय से उद्‍घोषक कमल शर्मा की बातचीत

प्रसारण तिथि: 18 फ़रवरी 2009




जुथिका जी, आपका इस कार्यक्रम में बहुत-बहुत स्वागत है, नमस्कार!


आज तो बहुत ही आनन्द का दिन है। बहुत बरस पहले मैं आकाशवाणी में आयी थी, आज फिर से विविध भारती में आ रही हूँ।


और हमारे लिये भी ऐतिहासिक पल है, विविध भारती के श्रोताओं के लिये भी, मेरे लिये भी, और हमारे पूरे परिवार के लिए भी, कि आप हमारे इस कार्यक्रम में पधारीं हैं और आप से बातचीत करने का मौका हमें मिला है। क्योंकि बात रेडियो की है और रेडियो के स्टुडियो में आप आयीं हैं और आकाशवाणी का एक महत्वपूर्ण लोकप्रिय चैनल है विविध भारती, मुझे जहाँ तक मालूम है, और बहुत से श्रोताओं को भी मालूम होगा, कुछ लोग शायद यह नहीं जानते होंगे कि आपके गायन की शुरुआत एक तो बचपन से हुई और रेडियो से हुई, तो कितनी बरस की थीं आप जब पहली बार रेडियो पर गाना गाया?

जब मैं सात बरस की थी, उस वक़्त मैं रेडियो पर पहली दफ़े गायी हूँ। मेरे पिताजी का बहुत शौक था कि मैं छोटी उम्र से ही रेडियो पर ग्रामोफ़ोन में गाना करूँ। इसलिए जब मैं सात बरस की हुई तो पिताजी मुझे रेडियो पर ले आये और ऑडिशन दिया मैंने, और पास भी हो गई, और एक दिन के बाद हमको कॉनट्रैक्ट मिल गया। पहले मेरी पाँच मिनट का कॉनट्रैक्ट था और उसमें मेरा एक गाना था। तो मैं रबीन्द्र संगीत गायी थी, जिसके बोल थे "आर रेखो ना आँधारे आमाय, देखते दाओ" (अनुवाद - "और मुझे अंधेरे में मत रखो, मुझे देखने दो")।


क्या बात है! आपको अभी भी याद है आपने क्या गाया था?

हाँ, थोड़ा-थोड़ा याद है।


81 या  82 साल पहले आपने यह गाया होगा, और रेडियो पर मैं समझता हूँ कि यह 1927 के आसपास का गाना होगा। तब आकाशवाणी की बस शुरुआत ही हुई थी।

जी, एकदम शुरुआत में।


आपको कुछ याद है कौन कौन लोग थे उस वक़्त आपके ऑडिशन में, कोई दिग्गज हस्ती?

नहीं, एक घटना है जो बहुत अच्छी तरह अभी तक मुझे याद है। मैं जब गाने लगी तो उधर इन्स्ट्रुमेण्ट नहीं था, खाली, क्योंकि एकदम शुरू के समय में मैं गायी थी, कोई यन्त्र या कोई ऐकोम्पनिस्ट हमारे साथ नहीं बजाये। मैंने बिल्कुल खाली गले से यह गाना गायी।


अकेले, यानी आपके साथ कोई संगत नहीं था।

नहीं, पेटी (हारमोनियम) भी नहीं। गाया मैंने, ब्रॉडकास्ट हुआ, सभी ने सुना। लेकिन मैं नहीं सुन पायी, मेरी बहुत इच्छा हुई कि कैसे मैं यह सुनूंगी, किस के पास से मैं जान सकूंगी कि मेरा गाना कैसा हुआ, सबको कैसा लगा, यही चिन्ता लेकर मैं घर वापस आयी। वापस आने के बाद मैंने देखा कि सारे खड़े हैं, किसी के चेहरे पर आनन्द नहीं है, सभी निराश बन कर खड़े हैं। तो मैंने पूछा कि मेरा गाना कैसा लगा? पहले को पूछा, उन्होंने आहिस्ते आहिस्ते बोला कि "दीदी, मैंने तो सिर्फ़ दो लाइन ही सुना है"। तो फिर मैंने दूसरे को पूछा कि आपको कैसा लगा? तो बोले कि "दीदी, मैं कान में देने के बाद...", उस वक़्त रेडियो में हेडफ़ोन होता था, कोई साउण्ड बॉक्स नहीं होता था, इसलिए कान में लगाकर सुनना पड़ता था, तो बोले, "देखिये दीदी, एक लाइन सुनने के पहले ही किसी ने मेरे कान से ले लिया, मैं बराबर सुन नहीं पाया कि कैसा हुआ"। तो तीसरे को मैंने पूछा कि कैसा लगा, तो बोली कि "देखिये बहुत देर तक मैं अपेक्षा करते करते जब कान में ले लिया तो पीछे से कौन छो मार कर ऐसे ले लिया"।


मतलब हेडफ़ोन छीन लिया।

"एक वर्ड भी नहीं सुना"। तो मैं शेष जो वहाँ पे खड़ा था, उससे पूछा कि बताइये न कैसा लगा मेरा गाना, मुझे बहुत इच्छा है कि मुझे पता चले कि कैसा हुआ गाना, तो बोले कि "रेणु, जब तक मैं कान में लिया तो कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा चल रही थी"। वो तो नाराज़ हो गया (जुथिका जी ये सब कहते कहते हँस पड़ीं)। तो यह घटना मुझे अभी तक याद है। उस वक़्त इसी तरह हम लोग सुनते थे। सब लोग एक दो लाइन सुनते थे, सुनने के लिए सब लोग खड़े रहते थे लेकिन सबको थोड़ा-थोड़ा ही सुनने को मिलता था।


अच्छा, तो क्योंकि आपने पहली रचना बांगला में गायीं और वह रबीन्द्र संगीत था, घर में आपके संगीत का माहौल था? आपके पिताजी या माँ संगीत में रुचि रखते थे? किसने सिखाया आपको? कहाँ से संस्कार मिले इसके आपको?

मेरे घर में संगीत तो सब कोई पसन्द करते थे, सुनते थे, मेरे पिताजी के पिताजी थे प्रियनाथ रॉय, मेरे पिताजी सत्येन्द्रनाथ रॉय, और मेरे काकाजी, माताजी, सभी को गाने का बहुत शौक था। लेकिन वह ज़माना ऐसा था कि कोई लड़की तो गाना नहीं गा सकती थी। हमारे देश में, शेनहाटी में हम रहते थे, तो उधर तो गाना नहीं गा सकते थे। बाहर तो नहीं गा सकते थे, लेकिन घर में हमारे पिताजी सिखाते थे। ऑफ़िस से वापस आने के बाद हमें साथ में लेकर बैठते थे, सुनाते थे। और रेकॉर्ड्स, उस ज़माने के जो सब बड़े-बड़े शिल्पि थे, वो पिताजी ले आते थे और बजाते थे, और उन रेकॉर्ड्स से हमें गाना सिखाते थे। के. सी. डे, कानन बाला, इन्दु बाला, और भी बहुत अच्छे-अच्छे गाने हमको सिखाते थे। इसी तरह हम चलते थे, लेकिन बाहर जा कर गाना नहीं हो सकता था। मेरी माँ बहुत फ़ाइट करती थी कि क्यों नहीं जायेगी बाहर? बाहर नहीं जायेगी, पढ़ाई नहीं करेगी, गाना नहीं गायेगी, तो कैसे चलेगा? माताजी ने बहुत फ़ाइट करके हम लोगों को स्कूल भेजा, गाना भी सिखाया, सब कुछ माताजी ने किया।


मतलब माताजी बहुत ही प्रगतिशील विचारों की थीं और उस दौर में जब समाज में इस तरह का नज़रिया नहीं था लड़कियों के बारे में, वो सोचती थीं कि लड़कियों को भी इस तरह का मौका मिले।

जी।


और आपके पिताजी भी, हमें मालूम है कि एडुकेशन इन्स्पेक्टर थे। तो उनका भी बड़ा योगदान रहा आपको पढ़ाने लिखाने में, है न?

हाँ, पिताजी का ऐसा मानना था कि समाज में कोई गोलमाल होगा, लोग नाराज़ होंगे, इसमें नहीं जाना, चुपचाप रहो, इस तरह का था उनका। लेकिन माताजी का ऐसा नहीं था। समाज में गोलमाल होगा तो बाद में ठीक हो जायेगा, पिताजी ना नहीं करते थे लेकिन वैसे भी नहीं थे।


माँ ढाल बन के खड़ी थीं।

हाँ, माताजी ने सब कुछ किया, हमको स्कूल भी भेजा और मास्टर भी रखा पढ़ाने के लिए। हमने इन्स्ट्रुमेण्ट्स भी सीखा - वायलिन, एसराज, दिलरुबा।

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तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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