मंगलवार, 15 जनवरी 2008

कहानी 'एक और मुखौटा' का पॉडकास्ट

पिछले महीने हिन्द-युग्म ने कहानियों के पॉडकास्ट के प्रसारण की शुरूआत की थी। आज हम आपके समक्ष दूसरा पॉडकास्ट लेकर प्रस्तुत हैं। इस बार श्रीकांत मिश्र 'कांत', शोभा महेन्द्रू और श्वेता मिश्रा की टीम ने रंजना भाटिया की कहानी 'एक और मुखौटा' का पॉडकास्ट बनाया। अपने प्रयास में हिन्द-युग्म की यह टीम कितनी सफल रही है, ये तो आप श्रोता ही बतायेंगे।

नीचे के प्लेयर से सुनें और ज़रूर बतायें कि कैसा लगा?
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।

12 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया शोभा जी और श्रीकांत जी ..आप दोनों ने इस कहानी को अपनी आवाज़ दी और इस में जान फूंक दी ..जो आपने इस में बीच में ध्वनि का उचित उपयोग किया है उस में आपकी मेहनत नज़र आती है ..बहुत बहुत शुक्रिया इस को यूं सुनाने के लिए !!

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

मुझे रंजना जी की टिप्पणी से इत्तेफ़ाक है... कहानी पढने और कहानी सुनने में जमीन आसमान का अन्तर है... श्रीकान्त जी, शोभा जी व श्र्वेता जी बधाई के पात्र हैं...
कहानी एक छोटी सी गलतफ़हमी...शायद पाठको/श्रवणकारों को ऐसा लगे.. कि वजह से अचानक अन्त पा गई.. यह थोडा सा खला.

शैलेश भारतवासी ने कहा…

कहीं-कहीं कनैक्शन सतत न होने के कारण बाधा आई है, लेकिन प्रयास अनुकरणीय है। टीम को बधाई।

rajeev ने कहा…

आज आपके चिट्ठे पर कहानी और गीत सुनने का भी सुयोग मिला, बहुत ही बेहतरीन कोशिश है, डटे रहो हिन्द युग्म के भाइयों....हम आपके साथ हैं। मैंने भी ऑरकुट पर राजभाषा-सेवी नामक कम्यूनिटी शुरु की है, जहां सारे हिन्दी प्रेमियों व सेवियों का बहुमूल्य विचारों-प्रतिक्रियाओं सहित स्वागत है। सादर, राजीव सारस्वत

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav ने कहा…

बहुत बढ़िया जी बहुत बढ़िया..
सुन्दर पोडकास्ट..

टीम को हार्दिक बधाई..

अल्पना वर्मा ने कहा…

*कहानी सुनना अच्छा लगा.पहले पढ़ ली थी इसलिए घटना क्रम मालूम था.
*सब ने मेहनत की है. अच्छा प्रयास है
बहुत पहले आकाशवाणी पर ऐसी कहानियाँ सुना करती थी.
यह अच्छा किया कि आप ने दूसरा लिंक भी दिया है.
क्योंकि मैं ले प्लेयर नहीं सुन पाती हूँ.activate नहीं होता है.मैंने सारा सिस्टम चेक कर लिया है-
रियल प्लेयर सब ठीक है.मेरा सिस्टम भी up टू डेट है.

यही कारण है 'आवाज ' में श्रीकांत जी की कहानी भी इसीलिए अभी तक नहीं सुन पायी हूँ.
धन्यवाद -

सागर नाहर ने कहा…

प्रस्तुतिकरण बहुत सुन्दर है परन्तु कहानी का अन्त कुछ ज्यादा जल्दी हो गया।
एकदम अचानक ही !!!
टीम को बहुत बहुत बधाई।

sahil ने कहा…

बहुत ही अच्छा. पूरी टीम को बधाई.
आलोक सिंह "साहिल"

राज भाटिय़ा ने कहा…

रंजना जी, आज शुक्र्वार को थोडा समय मिला तो सब से पहले मेने *'एक और मुखौटा' सुनी,ओर मुझे आकशबाणी का हवामहल याद आ गया,आप की सारी टीम को मेरी ओर से बाधाई,अरे हा कहानी बहुत ही सुन्दर लगी मन भावन, बस अन्त मे दिल थोडा उदास हो गया.
धन्यवाद

दिवाकर मिश्र ने कहा…

रंजना जी ! बहुत अच्छी कहानी है । इसपर शुरू में तो करुण भाव आता है परन्तु जब वह नीरज को पहचान लेती है तो तो एक संतोष और सम्मान का भाव आता है । दिखता है कि उसकी आत्मा जागती है । उसका आत्मविश्वास अभी ज़िन्दा है । वह असहाय और नादान नहीं है । ज़िन्दगी को बोझ की तरह नहीं बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान के साथ जी रही है । यद्यपि नीरज का ऐसा होना समाज में ऐसे भावों की व्याप्ति के विषय में निराश सा कर सकता है परन्तु वह मीरा की स्वावलम्बन और स्वाभिमान के आगे दुःखी नहीं करता है । अच्छी कहानी के लिए बधाई । किसी का कुछ भी मत हो, मुझे इस कहानी का अन्त सकारात्मक लगा ।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद आप सबका जो इस कहानी को इतना प्यार दिया ..दिवाकर जी आपने कहानी के जिस सकारात्मक रूप को समझा वह सरहनीय है ..मैं कहना भी यही चाहती थी इस कहानी में कि अपने आत्म्समान से जीना ही जीना है .अभी आपके आईडी के लिए आपके ब्लाग को भी देखा और पहला ब्लाग देखा संस्कृत भाषा में .देख के बहुत अच्छा लगा मुझे ..संस्कृत भाषा पर इतनी पकड़ तो नही है पर इसको पढ़ने की कोशिश करना अच्छा लगता है ..अच्छा लगा आप यहाँ आये और इस कहानी को सराहा .शुक्रिया तहे दिल से आपका और सब दोस्तों का जिन्होंने इस पर दी गई आवाज़ की मेहनत को समझा और यूं हम सब को आगे बढ़ने के लिए होंसला दिया !!

गीता पंडित ने कहा…

प्रयास अनुकरणीय .....
टीम को बधाई।

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