Wednesday, October 5, 2016

"जब लफ़्ज़ों पर प्रहार होता है तो एक चीख सी निकल जाती है..." - विजय अकेला : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (31)

"एक पल का जीना" जैसे हिट गीत से बॉलीवुड में कदम रखने वाले गीतकार विजय अकेला एक बेहतरीन शायर और उन्दा लेखक भी हैं, फ़िल्मी गीतकारों जैसे आनंद बख्शी (मैं शायर बदनाम), जाँ निसार अख्तर (निगाहों के साए), और जावेद अख्तर (जावेद अख्तर और मैं) पर लिखी उनकी किताबें हर संगीतप्रेमी के लिए संग्रहनीय है. मिलिए इस हरफनमौला कलाकार से आज के इस विशेष एपिसोड में...



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Sunday, October 2, 2016

कजरी गीत : SWARGOSHTHI – 286 : KAJARI SONGS




स्वरगोष्ठी – 286 में आज

पावस ऋतु के राग – 7 : उपशास्त्रीय संगीत में कजरी

बड़े रामदास जी की रचना - ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’




बड़े रामदास जी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपसे कजरी गायन शैली पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। आज के अंक में हम कजरी गीतों के उपशास्त्रीय रूप की चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको काशी के सुविख्यात विद्वान बड़े रामदास की एक कजरी रचना को कुछ सुप्रसिद्ध गायक कलाकारों की आवाज़ों में प्रस्तुत करेंगे। 



विदुषी गिरिजा देवी
भारतीय संगीत की प्रत्येक विधाओं में वर्षा ऋतु के गीत-संगीत उपस्थित हैं। लोक संगीत के क्षेत्र में कजरी एक सशक्त विधा है। भारतीय पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास से लेकर आश्विन मास तक पूरे चार महीने उत्तर प्रदेश के ब्रज, बुन्देलखण्ड, अवध और पूरे पूर्वांचल और बिहार के प्रायः सभी हिस्से में कजरी गीतों की धूम मची रहती है। मूल रूप से कजरी लोक-संगीत की विधा है, किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जब बनारस (अब वाराणसी) के संगीतकारों ने ठुमरी को एक शैली के रूप में अपनाया, उसके पहले से ही कजरी परम्परागत लोकशैली के रूप विद्यमान रही। उपशास्त्रीय संगीत के रूप में अपना लिये जाने पर कजरी, ठुमरी का एक अटूट हिस्सा बनी। इस प्रकार कजरी के मूल लोक-संगीत का स्वररोप और ठुमरी के साथ रागदारी संगीत का हिस्सा बने स्वररोप का समानान्तर विकास हुआ। अगले अंक में हमारी चर्चा का विषय कजरी का लोक-स्वरूप होगा, किन्तु आज के अंक में हम आपसे कजरी के रागदारी संगीत के कलासाधकों द्वारा अपनाए गए स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

पण्डित रवि किचलू
पिछली कुछ शताब्दी से काशी अथवा वाराणसी प्रमुख संगीतज्ञों का गढ़ रहा है। इन्हीं में से एक महान संगीतज्ञ थे, पण्डित बड़े रामदास जी। आज के अंक में हम इन्हीं बड़े रामदास जी की एक कजरी रचना को तीन विभिन्न वरिष्ठ कलाकारों की आवाज में प्रस्तुत करेंगे। भारतीय लोक-संगीत के समृद्ध भण्डार में कुछ ऐसी संगीत शैलियाँ हैं, जिनका विस्तार क्षेत्रीयता की सीमा से बाहर निकल कर, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी और मीरजापुर जनपद तथा उसके आसपास के पूरे पूर्वाञ्चल क्षेत्र में कजरी गीतों की बहुलता है। वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभियक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित है। आज की संगोष्ठी का प्रारम्भ हम विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी, वर्षा ऋतु के रस-रंग से अभिसिंचित एक कजरी से करते है। यह प्रस्तुति युगल गीत रूप में है, जिसमें विदुषी गिरिजा देवी के साथ गायक रवि किचलू की आवाज़ भी है।


कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू


पण्डित छन्नूलाल मिश्र
मूलतः लोक-परम्परा से विकसित कजरी आज गाँव के चौपाल से लेकर प्रतिष्ठित शास्त्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी-गायकी को ऊँचाई पर पहुँचाने में अनेक लोक-कवियों, साहित्यकारों और संगीतज्ञों का स्तुत्य योगदान है। कजरी गीतों की प्राचीनता पर विचार करते समय जो सबसे पहला उदाहरण हमें उपलब्ध है, वह है- तेरहवीं शताब्दी में हज़रत अमीर खुसरो रचित कजरी-‘अम्मा मोरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया...’। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की एक रचना- ‘झूला किन डारो रे अमरैया...’, आज भी गायी जाती है। कजरी को समृद्ध करने में कवियों और संगीतज्ञों योगदान रहा है। भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखि, रसिक किशोरी, शायर सैयद अली मुहम्मद ‘शाद’, हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमधन’ की कजरी रचनाएँ उच्चकोटि की हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तो ब्रज, भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरियों की रचना की है। भारतेन्दु की कजरियाँ विदुषी गिरिजा देवी आज भी गाती हैं। आज के अंक में जो कजरी हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे बनारस घराने के विद्वान पण्डित बड़े रामदास ने रचा है। विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू के युगल स्वरों में आपने बड़े रामदास की रचना का रसास्वादन किया है। यही कजरी अब आप वर्तमान में विख्यात गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से सुनिए।


कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित छन्नूलाल मिश्र


पण्डित विद्याधर मिश्र
कवियों और शायरों के अलावा कजरी को प्रतिष्ठित करने में अनेक संगीतज्ञों की स्तुत्य भूमिका रही है। वाराणसी की संगीत परम्परा में बड़े रामदास जी का नाम पूरे आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होने भी अनेक कजरियों की रचना की थी। अब हम आपको बड़े रामदास जी द्वारा रचित उसी कजरी का एक बार फिर रसास्वादन कराते है। इस कजरी को उन्हीं के प्रपौत्र और गायक पण्डित विद्याधर मिश्र प्रस्तुत कर रहे हैं। विद्याधर जी बनारस घराने के सुप्रसिद्ध विद्वान, बड़े रामदास जी के पौत्र और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र के पुत्र हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। अब आप पण्डित विद्याधर मिश्र से दादरा ताल में निबद्ध अपने प्रपितामह बड़े रामदास की यह कजरी सुनिए। इस कजरी में आपको राग देस के साथ ही अन्य रागों की झलक भी मिलेगी आप यह कजरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित विद्याधर मिश्र




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 286वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय वाद्य संगीत की एक रचना अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक के उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह कौन सा वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

2 – संगीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल या तालों के नाम बताइए।

3 – वाद्य संगीत के वादक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 8 अक्तूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 288वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 284 की संगीत पहेली में हमने आपको 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिये गए एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – आशा भोसले

इस बार की पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। इन सभी को दो-दो अंक मिलते हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया का तीन में से केवल एक उत्तर ही सही रहा, उन्हें केवल एक अंक ही अंक मिलेगा। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ जारी है। आज के अंक में आपको लोक संगीत कजरी के उपशास्त्रीय स्वरूप के दर्शन हुए। अगले अंक में आपका साक्षात्कार कजरी गीत के लोक व अन्य स्वरूप से होगा। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Saturday, October 1, 2016

"मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की...", इस आरती के बहाने जानिए कि ’जय संतोषी माँ’ फ़िल्म की सफलता का वरदान कैसे अभिशाप में बदल गया!


एक गीत सौ कहानियाँ - 94
 

'मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना

रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 94-वीं कड़ी में आज जानिए 1975 की फ़िल्म ’जय संतोषी माँ’ के मशहूर गीत "मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की..." के बारे में जिसे उषा मंगेशकर ने गाया था। बोल कवि प्रदीप के और संगीत सी. अर्जुन का। 


धार्मिक फ़िल्मों की श्रेणी में ’जय संतोषी माँ’ फ़िल्म जैसी अपार सफलता और किसी फ़िल्म ने नहीं पायी।
निर्माता सतराम रोहड़ा
एक बहुत ही कम बजट की फ़िल्म के रूप में निर्मित यह फ़िल्म जब प्रदर्शित हुई, तब लगातार पाँच महीनों तक थिएटरों से उतर नहीं पायी और आशातीत व्यावसाय करते हुए इस फ़िल्म ने साथ में प्रदर्शित होने वाले ’शोले’ को कड़ी टक्कर देते हुए दूसरे नंबर पर रही (’शोले’ प्रथम रहा)। इस छोटी सी सी-ग्रेड कलाकारों की फ़िल्म की इस कामयाबी की किसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी, यहाँ तक कि फ़िल्म के निर्माता ने भी नहीं। निर्माता सतराम रोहड़ा अपनी पहली फ़िल्म ’रॉकी मेरा नाम’ के बुरी तरह असफल हो जाने से आर्थिक रूप से टूट चुके थे। तभी उन्हें एक महिला मिली जिन्होंने उन्हें 25,000 रुपये देने की बात कहीं इस शर्त पर कि वो संतोषी माँ पर एक फ़िल्म बनाएँगे। आर्थिक संकट में फँसे सतराम ने बिना किसी सवाल किए प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्होंने कम बजट के कलाकारों को इकट्ठा करना शुरु कर दिया। लेखक के रूप में पंडित प्रियदर्शी को लिया गया जो तीन दशक पूर्व हरद्वार से बम्बई एक फ़िल्म लेखक बनने आए थे पर क़िस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। अन्त में पौराणिक श्रेणी में (’सती सुलोचना’, ’देव कन्या’, ’नाह मेरे साथी’ आदि) भी कोई कमाल नहीं दिखा सके। फ़िल्म के लिए निर्देशक चुना गया विजय शर्मा को जो प्रियदर्शी के मित्र थे पिछले उन्नीस वर्षों से। विजय शर्मा की पहली फ़िल्म ’महापावन तीर्थ यात्रा’ पिट चुकी थी और एक सफल फ़िल्म के लिए प्यासे थे। अभिनेता (आशीष कुमार, कानन कौशल, अनीता गुहा), संगीतकार (सी. अर्जुन), गीतकार (कवि प्रदीप), और गायकों (उषा मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मन्ना डे) को भी बिलकुल कम बजट पर लिया गया। इन सब के बाद अब ढूंढ़ने की बारी थी वितरकों की। 


हुआ यूं कि एक दिन वितरक संदीप सेठी और उनके पार्टनर केदारनाथ अगरवाल एक होटल में बैठ कर रोहड़ा से
निर्देशक विजय शर्मा और लेखक प्रियदर्शी
इस फ़िल्म के बारे में सुना। इस फ़िल्म में हर वह बात थी जिसकी वजह से वितरक इससे दूर भागते। लेकिन वहाँ बैठीं अगरवाल जी की पत्नी को कहानी अच्छी लगी और अपने पति से इसे ख़रीदने का सुझाव दिया। इसके पीछे एक कारण था। बीस वर्ष के वैवाहिक जीवन के बावजूद अगरवाल दम्पति निस्संतान थे। तब मिसेस अगरवाल ने संतोषी व्रत रखा और उसके बाद उन्हें एक कन्या संतान की प्राप्ति हुई। इस बात की तरफ़ जब उन्होंने अपने पति का ध्यान आकर्षित किया, तब जाकर अगरवाल साहब ने इस फ़िल्म के वितरण की हर बड़ी टेरिटरी ख़रीद ली। फ़िल्म बन कर तैयार हो गई, और वितरकों ने सोलह-शुक्रवार का व्रत रखते हुए सत्रहवें शुक्रवार को फ़िल्म रिलीज़ करने का निर्णय लिया। ’शोले’ के साथ 30 मई को रिलीज़ हुई ’जय संतोषी माँ’। ’दीवार’, ’प्रतिज्ञा’, ’संयासी’, ’जुली’, ’आंधी’, ’चुपके चुपके’ और ’छोटी सी बात’ जैसी फ़िल्मों को पछाड़ते हुए ’जय संतोषी माँ’ दूसरे नंबर पर रही ’शोले’ के पीछे। जिस फ़िल्म की तरफ़ किसी ने ध्यान नहीं दिया था, वह फ़िल्म बहुत आगे निकल चुकी थी। HMV को इस फ़िल्म के गीतों के रेकॉर्ड्स की इतनी फ़रमाइशें मिली कि ऐसा पहली बार हुआ कि किसी पौराणिक फ़िल्म के लिए LP जारी किया जा रहा हो। गीतों के रेकॉर्ड ने भी कई रेकॉर्ड तोड़े। दिल्ली-यूपी क्षेत्र में इस फ़िल्म के आय की तुलना ’मुग़ल-ए-आज़म’ और ’अनारकली’ से की गई। इस फ़िल्म से जुड़े सभी लोग आर्थिक दृष्टि से बेहद लाभान्वित हुए। देखते ही देखते सतराम रोहड़ा और वितरक केदारनाथ अगरवाल करोड़पति बन गए। 


रोहड़ा और अगरवाल, दोनों ने इस फ़िल्म की अपार सफलता से प्रसन्न होकर संतोषी माता का मन्दिर बनाने
सी. अर्जुन और कवि प्रदीप
की घोषणा की। लेकिन दिन निकलते चले गए, ये भी अपने अपने कामों में व्यस्त होते गए, संतोषी माता का मन्दिर नहीं बन पाया। इसे भाग्य का खेल ही समझिए, या कोई अलौकिक घटना या फिर मन्दिर नहीं बनाने का अभिशाप, कि देखते ही देखते ’जय संतोषी माँ’ फ़िल्म से जुड़े कई लोग बिलकुल बरबाद हो गए। निर्माता सतराम रोहड़ा ने अपनी अगली चार फ़िल्मों की घोषणा कर दी, पर एक भी फ़िल्म बन नहीं पाई। इस वजह से उन्हें भारे एक्षति हुई और अपने उधार चुकाने के लिए उन्हें अपनी पूरी सम्पत्ति बेचनी पड़ गई। ’जय संतोषी माँ’ फ़िल्म से जो अर्थ उन्होंने अर्जित की थी, सब उनके हाथ से निकल गया। आज सतराम रोहड़ा शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में गाना गा कर गुज़ारा कर रहे हैं। एक कोर्ट केस की वजह से बॉम्बे हाइ कोर्ट के चक्कर भी वो काट रहे हैं। उधर वितरक केदारनाथ अगरवाल को भी अपने व्यावसाय में भारी नुकसान उठाना पड़ा और अपने आलीशान बंगले को बेच कर एक घिंजी चाल में जाकर रहना पड़ रहा है। सबकुछ ख़तम हो गया उनका। उनके दोस्त संदीप सेठी (वो भी इस फ़िल्म के एक वितरक थे), उनके साथ भी कुछ हद तक यही हुआ और वो बन गए विनोद खन्ना के सेक्रेटरी। सिर्फ़ निर्माता-वितरक ही नहीं, इस अभिशाप से कई और लोग भी नहीं बच सके। निर्देशक विजय शर्मा को यह सफलता हज़म नहीं हुई और वो एक शराबी में परिणित हो गए और सारा पैसा शराब और नशे में गँवा दिया, और एक दिन मुंबई की एक सड़क पर उनकी लाश दिखी, किसी ने उन्हें पहचाना तक नहीं। अभिनेता आशीष कुमार और कानन कौशल का भी करीयर वहीं ख़त्म हो गया। गीतकार कवि प्रदीप को भी शेष आयु में आर्थिक कष्ट उठानी पड़ी, सी. अर्जुन इस फ़िल्म की सफलता के बावजूद आगे कुछ ख़ास कर नहीं सके, उषा मंगेशकर को भी गिने चुने कुछ गीतों के अतिरिक्त कुछ बड़ा नहीं मिला। है ना आश्चर्य में डाल देने वाली घटना? कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें विज्ञान द्वारा समझाया नहीं जा सकता, और ’जय संतोषी माँ’ फ़िल्म से जुड़ी यह घटना उन्हीं में से एक है।


’जय संतोषी माँ’ फ़िल्म की आरती "मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की" इस फ़िल्म की सर्वाधिक लोकप्रिय
उषा मंगेशकर
गीत रहा है। आज तक इसे फ़िल्मी आरतियों में श्रेष्ठ माना जाता है। जब पैसों की कमी की वजह से सतराम रोहड़ा ने सी. अर्जुन को बतौर संगीतकार चुना, तब सी. अर्जुन के ज़रिए कवि प्रदीप को इस फ़िल्म के साइन करवाया जा सका, जिसके दो कारण थे - कवि प्रदीप सी. अर्जुन के मित्र थे, और प्रदीप जी संतोषी माँ को मानते थे। गीतकार - संगीतकार तय होने पर सी. अर्जुन को गायक-गायिकाओं की ज़रूरत आन पड़ी। दिमाग़ में लता और रफ़ी थे, पर इस कम बजट की फ़िल्म के लिए उन्हें समझौता करना पड़ा। लता की जगह आ गईं उषा, और रफ़ी के जगह आ गए महेन्द्र कपूर। उस ज़माने में सी. अर्जुन को ग़रीबों का मदन मोहन भी कहा जाता था। ख़ैर, उषा मंगेशकर ने केवल एक शर्त रखी कि इस फ़िल्म का पहला गीत संतोषी माँ के दिन, यानी कि शुक्रवार के दिन ही रेकॉर्ड हो। ऐसा ही हुआ और यह आरती एक शुक्रवार के दिन रेकॉर्ड हुई and the rest is history!!! 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, September 29, 2016

नव दधीचि हड्डियां गलाएँ, आओ फिर से दिया जलाएँ... अटल जी के शब्दों को मिला लता जी की आवाज़ का पुर-असर जादू



कहकशाँ - 20
लता मंगेशकर की आवाज़ में अटल बिहारी वाजपेयी की रचना   
"आओ फिर से दिया जलाएँ..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ में अटल बिहारी वाजपेयी की रचना "आओ फिर से दिया जलाएँ..."।


राजनीति और साहित्य साथ-साथ नहीं चलते। इसका कारण यह नहीं कि राजनीतिज्ञ अच्छा साहित्यकार नहीं हो सकता या फिर एक साहित्यकार अच्छी राजनीति नहीं कर सकता, बल्कि यह है कि उस साहित्यकार को लोग "राजनीति" के चश्मे से देखने लगते हैं। उसकी रचनाओं को पसंद या नापसंद करने की कसौटी बस उसकी प्रतिभा नहीं रह जाती, बल्कि यह भी होती है कि वह जिस राजनीतिक दल से संबंध रखता है, उस दल की क्या सोच है और पढने वाले उस सोच से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं। अगर पढने वाले उसी सोच के हुए या फिर उस दल के हिमायती हुए तब तो वो साहित्यकार को भी खूब मन से सराहेंगे, लेकिन अगर विरोधी दल के हुए तो साहित्यकार या तो "उदासीनता" का शिकार होगा या फिर नकारा जाएगा... कम ही मौके ऐसे होते हैं, जहाँ उस राजनीतिज्ञ साहित्यकार की प्रतिभा का सही मूल्यांकन हो पाता है। वैसे यह बहस बहुत ज़्यादा मायना नहीं रखती, क्योंकि "राजनीति" में "साहित्य" और "साहित्यकार" के बहुत कम ही उदाहरण देखने को मिलते है, जितने "साहित्य" में "राजनीति" के। "साहित्य" में "राजनीति" की घुसपैठ... हाँ भाई यह भी होती है और बड़े जोर-शोर से होती है, लेकिन यह मंच उस मुद्दे को उठाने का नहीं है, इसलिए "साहित्य में राजनीति" वाले बात को यहीं विराम देते हैं और "राजनीति" में "साहित्य" की ओर मुख़ातिब होते हैं। अगर आपसे पूछा जाए कि जब भी इस विषय पर बात होती है तो आपको सबसे पहले किनका नाम याद आता है.. (मैं यहाँ पर हिन्दी साहित्य की बात कर रहा हूँ, इसलिए उम्मीद है कि अपने जवाब एक ही होंगे), तो निस्संदेह आपका उत्तर एक ही इंसान के पक्ष में जाएगा और वे इंसान हैं हमारे पूर्व प्रधानमंत्री "श्री अटल बिहारी वाजपेयी"। यहाँ पर यह ध्यान देने की बात है कि इस आलेख का लेखक यानि कि मैं किसी भी दलगत पक्षपात/आरक्षण के कारण अटल जी का ज़िक्र नहीं कर रहा, बल्कि साहित्य में उनके योगदान को महत्वपूर्ण मानते हुए उनकी रचना को इस महफ़िल का हिस्सा बना रहा हूँ। अटल जी की इस रचना का चुनाव करने के पीछे एक और बड़ी शक्ति है और उस शक्ति का नाम है "स्वर-कोकिला", जिन्होंने इसे गाने से पहले वही बात कही थी, जो मैंने अभी-अभी कही है: "मैं उन्हें एक कवि की तरह देखती हूँ और वो मुझे एक गायिका की तौर पे.. हमारे बीच राजनीति कभी भी नहीं आती।"

अटल जी.. इनका कब जन्म हुआ और इनकी उपलब्धियाँ क्या-क्या हैं, मैं अगर इन बातों का वर्णन करने लगा तो इनकी राजनीतिक गतिविधियों से बचना मुश्किल होगा, इसलिए सही होगा कि हम सीधे-सीधे इनकी रचनाओं की ओर रुख कर लें। "कवि के रूप में अटल" - इस विषय पर "हिन्दी का विकिपीडिया" कुछ ऐसे विचार रखता है: 

"मेरी इक्यावन कविताएं" वाजपेयी जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। अटल बिहारी वाजपेयी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस घूम रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता प्रकट होती रही। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेलवास सभी हालातों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में अभिव्यक्ति पायी। उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएँ हैं:

मृत्यु या हत्या
अमर बलिदान (लोक सभा मे अटल जी वक्तव्यों का संग्रह)
कैदी कविराय की कुन्डलियाँ
संसद में तीन दशक
अमर आग है
कुछ लेख कुछ भाषण
सेक्युलर वाद
राजनीति की रपटीली राहें
बिन्दु बिन्दु विचार
न दैन्यं न पलायनम
मेरी इक्यावन कविताएँ...इत्यादि

बात जब अटल जी की कविताओं की ही हो रही है तो क्यों न इनकी कुछ पंक्तियों का आनंद लिया जाए:

क) हमें ध्येय के लिए 
जीने, जूझने और 
आवश्यकता पड़ने पर 
मरने के संकल्प को दोहराना है। 

आग्नेय परीक्षा की 
इस घड़ी में 
आइए, अर्जुन की तरह 
उद्घोष करें : 
"न दैन्यं न पलायनम्।" ("न दैन्यं न पलायनम्" से)

ख) पहली अनुभूति:
गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं 
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ

दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पाता हूँ ("दो अनुभूतियाँ" से)

ग) ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ..

....
न वसंत हो, न पतझड़, 
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़, 
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा। 

मेरे प्रभु! 
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, 
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, 
इतनी रुखाई कभी मत देना। ("ऊँचाई" से)

रचनाएँ तो और भी कई सारी हैं, लेकिन "वक़्त" और "जगह" की पाबंदी को ध्यान में रखते हुए आइये आज की नज़्म से रूबरू होते हैं। "आओ फिर से दिया जलाएँ" एक ऐसी नज़्म है, जो मन से हार चुके और पथ से भटक चुके पथिकों को फिर से उठ खड़ा होने और सही राह पर चलने की सीख देती है। शुद्ध हिन्दी के शब्दों का चुनाव अटल जी ने बड़ी ही सावधानी से किया है, इसलिए कोई भी शब्द अकारण आया प्रतीत नहीं होता। अटल जी ने इसे जिस ख़ूबसूरती से लिखा है, उसी ख़ूबसूरती से लता जी ने अपनी आवाज़ का इसे अमलीजामा पहनाया है। इन दोनों बड़ी हस्तियों के बीच अपने आप को संयत रखते हुए "मयूरेश पाई" ने भी इसे बड़े ही "सौम्य" और "सरल" संगीत से संवारा है। लेकिन इस गीत की जो बात सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है गीत की शुरूआत में बच्चों का एक स्वर में हूक भरना। यह गीत "अंतर्नाद" एलबम का हिस्सा है, जो साल 2004 में रीलिज हुई थी और जिसमें अटल जी के लिखे और लता जी के गाए सात गाने थे। अटल जी और लता जी की यह जोड़ी कितनी कारगर है यह तो इसी बात से ज़ाहिर है कि अंग्रेजी में अटल को उल्टा पढने से लता हो जाता है (यह बात ख़ुद लता जी ने कही थी इस एलबम के रीलिज के मौके पर)। इसी ट्रीविया के साथ चलिए हम और आप सुनते हैं यह नज़्म:

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोह जाल में
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ






’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, September 28, 2016

"हर गीत की अपनी एक किस्मत होती है, हिट हो या न हो" - अज़ीम शिराज़ी : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (30)

"वार छोड़ न यार", "जैकपोट", और "१९२० लन्दन" जैसी फिल्मों में गीत लिख चुके शायर गीतकार अज़ीम शिराज़ी हैं हमारे आज के मेहमान, कार्यक्रम एक मुलाकात ज़रूरी है में, जानिये "कभी जो बादल बरसे" जैसे हिट गीत के कलमकार की ये कहानी...



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Tuesday, September 27, 2016

दीपक मशाल की लघुकथा निमंत्रण

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में संतोष श्रीवास्तव की कथा "शहतूत पक गये हैं" का पाठ सुना था।

24 सितम्बर को दीपक मशाल को जन्मदिन की शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है उनकी लघुकथा निमंत्रण, जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत लघुकथा "निमंत्रण" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 55 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कुछ बड़े लोगों से मिला था कभी,
तबसे कोई बड़ा नहीं लगता
इतनी बौनी है दुनिया कि कोई,
खड़ा हुआ भी खड़ा नहीं लगता
 ~ दीपक मशाल

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"सेठजी के लिये यह बात अनुभवों की गिनती में इजाफा भर नहीं थी।”
 (दीपक मशाल की लघुकथा "निमंत्रण" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
निमंत्रण MP3

#Eighteenth Story, Nimantran; Dipak Mashal; Hindi Audio Book/2016/18. Voice: Pooja Anil

Sunday, September 25, 2016

जयन्त मल्हार : SWARGOSHTHI – 285 : JAYANT MALHAR




स्वरगोष्ठी – 285 में आज

पावस ऋतु के राग – 6 : बसन्त देसाई की अन्तिम रचना

‘मेहा बरसने लगा है आज...’ और ‘ऋतु आई सावन की...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हम राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले हम आशा भोसले की आवाज़ में एक फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है, जिसके संगीतकार हैं बसन्त देसाई। दूसरे चरण में राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का हमने चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है।



आशा भोसले
र्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों में राग जयन्त मल्हार या जयन्ती मल्हार एक कम प्रचलित राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। आज हम राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह दूसरा गीत है। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत।


राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक


विनायक राव पटवर्धन
पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ में राग जयन्त मल्हार का विवरण नहीं मिलता। आपके लिए हमने इस राग का विवरण हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक ‘राग परिचय’ के चौथे भाग से लिया है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि(कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि(कोमल) म प, प म ग रे ग(कोमल) रे सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशेष प्रक्रिया है। पूर्वांग में जयजयवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं। आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह बन्दिश आप भी सुनिए।


राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 285वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको उपशास्त्रीय लोक संगीत में समान रूप से लोकप्रिय शैली से लिये गए गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – भारतीय संगीत की यह कौन सी शैली है? उस शैली का नाम बताइए।

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 1 अक्टूबर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम ‘स्वरगोष्ठी’ के 287वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 283 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मीरा मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – वाणी जयराम

इस बार की संगीत पहेली में चार प्रतिभागियों ने प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस बार की पहेली में हमारे नियमित विजेता प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। आप सभी चार विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ की आज यह छठी कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग जयन्त मल्हार का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले मल्हार अंग के कुछ रागों को चुन कर आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं। अगले अंक में हम आपको पावस ऋतु में ही गायी जाने वाली उपशास्त्रीय और लोक सगीत में समान रूप से प्रचलित संगीत शैली के कुछ उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी कड़ी में वर्षा ऋतु का ही एक राग प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 

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