Showing posts with label sukhvinder singh. Show all posts
Showing posts with label sukhvinder singh. Show all posts

Friday, September 1, 2017

गीत अतीत 28 || हर गीत की एक कहानी होती है || बखेड़ा / हंस मत पगली || विक्की प्रसाद || सिद्धार्थ गरिमा || सुखविंदर सिंह || सुनिधि चौहान || अक्षय कुमार

Geet Ateet 28
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Bakheda
Toilet Ek Prem Katha 
Vickey Prasad
Also featuring Sidharth-Garima, Sukhvinder Singh & Sunidhi Chauhan


"जब मैंने अपनी नानी को देखा कि पिछले तीन चार साल में वो कुछ और बूढी हो गयीं है, तब मैंने अपने आप से पुछा कि अब नहीं तो कब ?... " -    विक्की प्रसाद 

टॉयलेट एक प्रेम कथा के माध्यम से एक ज़रूरी सन्देश दर्शकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है, फिल्म की सफलता में फिल्म के मधुर संगीत का भी बड़ा योगदान है. युवा संगीतकार विक्की प्रसाद ने आजकल के चालू ट्रेंड से हटकर फिल्म की पृठभूमि के अनुसार इसके गीतों को रचा है, सुनते हैं विक्की प्रसाद से इसी फिल्म के दो सबसे लोकप्रिय गीत "बखेड़ा" और "हंस मत पगली" के बनने की कहानी. प्ले पर क्लिक करें और सुने अपने दोस्त अपने साथी सजीव सारथी के साथ आज का एपिसोड.



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Friday, February 24, 2017

गीत अतीत 01 || हर गीत की एक कहानी होती है || ओ रे रंगरेज़ा || जॉली एल एल बी || जुनैद वसी


Geet Ateet 01 
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
O Re Ranreza - Jolly LLB
Junaid Wasi - Lyricist

बहुत दिनों बाद किसी फिल्म में एक बहुत ही दमदार सूफियाना कव्वाली सुनने को मिली है, फिल्म जौली एल एल बी 2 के इस गीत को स्वरबद्ध किया है फिल्म "नीरजा" से चर्चा में आये संगीतकार विशाल खुराना ने, सुखविंदर की दमदार आवाज़ ने इस कव्वाली को एक अलग ही बुलंदी दे दी है. शब्द लिखे हैं जुनैद वसी ने. शब्दों की बानगी देखिये ज़रा - "मैं हूँ माटी जग बाज़ार, तू कुम्हार है, मेरी कीमत क्या लगे सब तेरी मर्जी है, सुबह माथे तू ज़रा सा नूर जो मल दे, तो संवर जाए ये किस्मत इतनी अर्जी है...." तो सुनते हैं इन्हीं शब्दों के जादूगर जुनैद वसी से इस गीत के बनने की कहानी....प्ले का बट्टन दबाएँ और आनंद लें....



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

Tuesday, October 5, 2010

"क्रूक" में कुमार के साथ तो "आक्रोश" में इरशाद कामिल के साथ मेलोडी किंग प्रीतम की जोड़ी के क्या कहने!!

ताज़ा सुर ताल ३८/२०१०


सुजॊय - दोस्तों, नमस्कार, स्वागत है आप सभी का इस हफ़्ते के 'ताज़ा सुर ताल' में। विश्व दीपक जी, इस बार के लिए मैंने दो फ़िल्में चुनी हैं, और ये फ़िल्में हैं 'क्रूक' और 'आक्रोश'।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्या कोई कारण है इन दोनों को इकट्ठे चुनने के पीछे?

सुजॊय - जी हाँ, मैं बस उसी पे आ रहा था। एक नहीं बल्कि दो दो समानताएँ हैं इन दोनों फ़िल्मों में। एक तो यह कि दोनों के संगीतकार हैं प्रीतम। और उससे भी बड़ी समानता यह है कि इन दोनों की कहानी दो ज्वलंत सामयिक विषयों पर केन्द्रित है। जहाँ एक तरफ़ 'क्रूक' की कहानी आधारित है हाल में ऒस्ट्रेलिया में हुए भारतीयों पर हमले पर, वहीं दूसरी तरफ़ 'आक्रोश' केन्द्रित है हरियाणा में आये दिन हो रहे ऒनर किलिंग्स की घटनाओं पर।

विश्व दीपक - वाक़ई ये दो आज के दौर की दो गम्भीर समस्यायें हैं। तो शुरु किया जाए 'क्रूक' के साथ। मुकेश भट्ट निर्मित और मोहित सूरी निर्देशित 'क्रूक' के मुख्य कलाकार हैं इमरान हाश्मी, अर्जुन बजवा और नेहा शर्मा। प्रीतम का संगीत और कुमार के गीत। पहला गीत सुनते हैं "छल्ला इण्डिया तों आया"। पूरी तरह से पंजाबी फ़्लेवर का गाना है जिसे गाया है बब्बु मान और सुज़ेन डी'मेलो ने। पंजाबी भंगड़ा के साथ वेस्टर्ण फ़्युज़न में प्रीतम को महारथ हासिल है। "मौजा ही मौजा", "नगाड़ा", "दिल बोले हड़िप्पा" के बाद अब "छल्ला"।

सुजॊय - तो आइए इस थिरकन भरे गीत से आज के इस प्रस्तुति की शुरुआत की जाये।

गीत - छल्ला


सुजॊय - 'क्रूक' का दूसरा गीत है "मेरे बिना" जिसे गाया है निखिल डी'सूज़ा ने। अब तक निखिल की आवाज़ कई गायकों वाले गीतों में ही ली गयी थी जिसकी वजह से उनकी आवाज़ को अलग से पहचानने का मौका अब तक हमें नहीं मिल सका था। लेकिन इस गीत में केवल उन्ही की आवाज़ है। जिस तरह से जावेद अली और कार्तिक आजकल कामयाबी के पायदान चढ़ते जा रहे हैं, लगता है निखिल के भी अच्छे दिन उन्हें बाहें पसार कर बुला रहे हैं।

विश्व दीपक - गीत की बात करें तो इस गीत में रॊक इन्फ़्लुएन्स है और एक सॊफ़्ट रोमांटिक नंबर है यह। शुरु शुरु में इस गीत को सुनते हुए कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती, लेकिन गीत के ख़तम होते होते थोड़ी सी हमदर्दी होने लगती है इस गीत के साथ। निखिल ने अच्छा गाया है और क्योंकि उनका यह पहला एकल गाना है, तो उन्हें हमें मुबारक़बाद देनी ही चाहिए। वेल डन निखिल!

सुजॊय - वैसे निखिल ने हाल ही में 'अंजाना अंजानी' का शीर्षक गीत भी गाया है। 'उड़ान' और 'आयेशा' में भी गीत गाये हैं। लेकिन यह उनका पहला सोलो ट्रैक है। आइए अब सुनते हैं इस गीत को।

गीत - मेरे बिना


विश्व दीपक - 'क्रूक' भट्ट कैम्प की फ़िल्म है और नायक हैं इमरान हाश्मी। तो ज़ाहिर है कि इसके गानें उसी स्टाइल के होंगे। वही यूथ अपील वाले इमरान टाइप के गानें। पिछले कुछ फ़िल्मों में इमरान ने ऒनस्क्रीन किस करना बंद कर दिया था और वो फ़िल्में कुछ ख़ास नहीं चली (वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई को छोड़कर) शायद इसलिए वो इस बार 'क्रूक' में अपने उसी सिरियल किसर वाले अवतार में नज़र आयेंगे। ख़ैर, अगले गीत की बात की जाये। इस बार के.के की आवाज़। इमरान हाश्मी के फ़िल्मों में एक गीत के.के की आवाज़ में ज़रूर होता है क्योंकि के.के की आवाज़ में इमरान टाइप के गानें ख़ूब जँचते हैं।

सुजॊय - यह गीत है "तुझी में"। यह भी रॊक शैली में कम्पोज़ किया गाना है, लेकिन निखिल के मुक़ाबले के.के की दमदार आवाज़ को ध्यान में रखते हुए हार्डकोर रॊक का इस्तेमाल किया गया है। ड्रम्स और पियानो का ख़ूबसूरत संगम सुनने को मिलता है इस गीत में। लेकिन जो मुख्य साज़ है वह है १२ स्ट्रिंग वाला गिटार जो पूरे गीत में प्रधानता रखता है।

विश्व दीपक - यह सच है कि इस तरह के गानें प्रीतम पहले भी बना चुके हैं, लेकिन शायद अब तक हम इस अंदाज़ से उबे नहीं हैं, इसलिए अब भी इस तरह के गानें अच्छे लगते हैं। आइए सुनते हैं।

गीत - तुझी में


सुजॊय - और अब एक और गीत 'क्रूक' का हम सुनेंगे, फिर 'आक्रोश' की तरफ़ बढ़ेंगे। यह गीत है मोहित चौहान की आवाज़ में, "तुझको जो पाया"। इस गीत में अकोस्टिक गीटार मुख्य साज़ है, कोई रीदम नहीं है गाने में। मोहित चौहान की दिलकश आवाज़ से गीत में जान आयी है। दरसल यह गीत निखिल के गाये "मेरे बिना" गीत का ही एक दूसरा वर्ज़न है।

विश्व दीपक - इन दोनों की अगर तुलना करें तो मोहित चौहान की आवाज़ में जो गीत है वह ज़्यादा अच्छा सुनाई दे रहा है। मोहित चौहान का ताल्लुख़ हिमाचल की पहाड़ियों से है। और अजीब बात है कि उनकी आवाज़ में भी जैसे पहाड़ों जैसी शांति है, सुकून है। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल वाले गीतों में मोहित की शुद्ध आवाज़ को सुन कर वाक़ई दिल को सुकून मिलता है। इस पीढ़ी के पार्श्व गायकों का प्रतिनिधित्व करने वालों में मोहित चौहान का नाम एक आवश्यक नाम है। लीजिए सुनिए इस गीत को।

गीत - तुझको जो पाया


सुजॊय - आइए अब बढ़ा जाये 'आक्रोश' की ओर। क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी हरियाणा के ऒनर किलिंग्स पर है (लेकिन मेरे हिसाब से फिल्म यूपी, बिहार के किसी गाँव को ध्यान में रखकर फिल्माई गई है), शायद इसलिए इसका संगीत भी उसी अंदाज़ का है। प्रीतम के स्वरबद्ध इन गीतों को लिखा है इरशाद कामिल ने। अजय देवगन, अक्षय खन्ना और बिपाशा बासु अभिनीत इस फ़िल्म का एक आइटम नंबर आजकल टीवी चैनलों में ख़ूब सुनाई व दिखाई दे रहा है - "तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं"।

विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम" के बाद अब "इसक से मीठा"। और इस बार ठुमके लगा रही हैं समीरा रेड्डी। लेकिन हाल के आइटम नंबर की बात करें तो अब भी गुलज़ार साहब के "बीड़ी जल‍इ ले" से मीठा कुछ भी नहीं। ख़ैर, आइए हम ख़ुद ही सुन कर यह निर्णय लें, इस गीत को गाया है कल्पना पटोवारी और अजय झिंग्रन ने। कल्पना यूँ तो असम से संबंध रखती है, लेकिन इन्हें प्रसिद्धि मिली भोजपुरी गानों से। "जा तार परदेश बलमुआ" और "ए गो नेमुआ" जैसे सुपरहिट भोजपुरी गानों को गाने वाली यह गायिका हाल में हीं सिंगिंग के एक रियालटी शो में असम का प्रतिनिधित्व करती नज़र आईं थी। जहाँ तक इस गाने की बात है तो यह पूर्णत: एक कमर्शियल आइटम नंबर है और फ़िल्म की कहानी के लिए इसकी ज़रूरत थी भी। तो आइए इस गीत को सुन ही लिया जाये।

गीत - तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं


सुजॊय - अगला गीत ज़रा हट कर है। प्रीतम ने एक इंटरव्यु में कहा है कि उन्हें वो गानें कम्पोज़ करने में ज़्यादा अच्छे लगते है जिनमें मेलडी होता है। तो साहब इस बार उन्हें मेलडियस कम्पोज़िशन का मौका मिल ही गया। इस गीत में, जिसका शीर्षक है "सौदे बाज़ी", नवोदित गायक अनुपम आमोद ने अपनी आवाज़ दी है। प्रीतम की नये नये गायकों की खोज जारी है और इस बार वे अनुपम को ढूंढ़ लाये हैं। लगता है यह गीत अनुपम को दूर तक लेके जाएगा।

विश्व दीपक - वैसे इसी गीत का एक और वर्ज़न है जिसे जावेद अली से गवाया गया है। लेकिन आज हम अनुपम का स्वागत करते हुए उन्ही का गाया गीत सुनेंगे। पता नहीं इस गीत की धुन को सुनते हुए ऐसा लग रहा है कि जैसे इसी तरह की धुन का कोई और गाना पहले बन चुका है। शायद बाद में याद आ जाए!

सुजॊय - इस गीत की ख़ासियत है इसकी सादगी। भारतीय साज़ों की ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं भले ही सिन्थेसाइज़र पर तय्यार किया गया हो। सुनते हैं अनुपम आमोद की आवाज़।

गीत - सौदे बाज़ी


विश्व दीपक - आज के दौर के एक और गायक जो सूफ़ी गीतों में ख़ूब अपना नाम कमा रहे हैं, वो हैं अपने राहत फ़तेह अली ख़ान साहब। कैलाश खेर ने जो मुक़ाम हासिल किया था, आज वही मुकाम राहत साहब का है। इस फ़िल्म में भी उनका उन्ही के टाइप का एक गाना है "मन की मत पे मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा"।

सुजॊय - सचमुच आज हर फ़िल्म में राहत साहब का एक गीत जैसे अनिवार्य हो गया है। क्योंकि आजकल वो 'छोटे उस्ताद' में नज़र आ रहे हैं, मैंने एक बात उनकी नोटिस की है कि वो बहुत ही विनम्र स्वभाव के हैं और बहुत ज़्यादा इमोशनल भी हैं। बात बात पे उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। और बार बार वो लेजेन्डरी गायकों का ज़िक्र करते रहते हैं। इतनी सफलता के बावजूद उनके अंदर जो विनम्रता है, वो साफ़ झलकती है।

विश्व दीपक - "मन की मत पे मत चलियो", इरशाद कामिल ने यमक अलंकार का क्या ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है "मत" शब्द में। दो जगह "मत" आता है लेकिन अलग अलग अर्थ के साथ।

सुजॊय - ठीक वैसे ही जैसे रवीन्द्र जैन ने लिखा था "सजना है मुझे सजना के लिए" और "जल जो ना होता तो जग जाता जल"। तो आइए सुनते हैं राहत साहब की आवाज़ में "मन की मत"।

गीत - मन की मत पे मत


विश्व दीपक - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत एक भक्ति रचना सुखविंदर सिंह की आवाज़ में "राम कथा", जिसमें रामायण के उस अध्याय का ज़िक्र है जिसमें भगवान राम ने रावण का वध कर सीता को मुक्त करवाया था। एक पौराणिक कथा के रूप में ही इस गीत में उसकी व्याख्या की गई है।

सुजॊय - देखना है कि फ़िल्म में इसका फ़िल्मांकन कैसे किया गया है। तब कहेंगे कि क्या "पल पल है भारी विपदा है आयी" के साथ इसका कोई टक्कर है या नहीं! आइए सुन लेते हैं यह गीत।

गीत - राम कथा


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसे लगे इन दोनों फ़िल्मों के गानें? हमने दोनों फ़िल्मों के चार चार गानें आपको सुनवाये और एक एक गानें छोड़ दिये हैं, लेकिन आपको यकीन दि्ला दें कि उससे आप किसी अच्छे गीत से वंचित नहीं हुए हैं। अगर आप मेरी पसंद की बात करें तो 'क्रूक' का "तुझको जो पाया" (मोहित चौहान) और 'आक्रोश' का "मन की मत पे मत जाना" (राहत फ़तेह अली ख़ान) मुझे सब से ज़्यादा पसंद आये। बाक़ी गानें सो-सो लगे। रेटिंग की बात है तो मेरी तरफ़ से दोनों ऐल्बमों को ३ - ३ अंक।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी टिप्पणियों को सर-आँखों पर रखते हुए मैं आपके द्वारा दिए गए रेटिग्स को बरकरार रखता हूँ। जहाँ तक प्रीतम के संगीत की बात है तो वो हर बार हर फिल्म में ऐसे कुछ गाने जरूर देते हैं, जिन्हें श्रोताओं
का भरपूर प्यार नसीब होता है। दोनों फिल्मों में ऐसे एक्-दो गाने जरूर हैं। संगीत और इन्स्ट्रुमेन्ट्स के बारे में आपने तो लगभग सब कुछ हीं कह दिया है, इसलिए मैं थोड़ा "बोलों" का जिक्र करूँगा। "कुमार" और "इरशाद कामिल" दोनों हीं अलग तरह के गाने लिखने के लिए जाने जाते हैं। फिर भी अगर मुझसे पूछा जाए कि किसके गाने "अन-कन्वेशनल" होते हैं और दिल को ज्यादा छूते हैं तो मैं इरशाद भाई का नाम लूँगा। इरशाद भाई ने जहाँ एक तरफ "तू जाने ना" लिखकर एकतरफा प्यार करने वालों को एक एंथम दिया है, वहीं "न शहद, न शीरा, न शक्कर" लिखकर "नौटंकी" वाले गानों को कुछ नए शब्द मुहैया कराए हैं। मैं उनके शब्द-सामर्थ्य और शब्द-चयन का कायल हूँ। आने वाली फिल्मों में भी मैं उनसे ऐसे हीं नए शब्दों और बोलों की उम्मीद रखता हूँ। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। उससे पहले सभी श्रोताओं के लिए एक सवाल/एक आग्रह/एक अपील: मैं चाहता हूँ कि हम समीक्षा में रेटिंग न दें, बल्कि बस इतना हीं लिख दिया करें कि कौन-सा गाना बहुत अच्छा है और कौन-सा थोड़ा कम। मैंने यह बात सुजॉय जी से भी कही है और उनके जवाब का इंतज़ार कर रहा हूँ। उनके जवाब के साथ-साथ मैं आप सबों की राय भी जानना चाहूँगा।

आवाज़ रेटिंग्स: क्रूक: ***, आक्रोश: ***

पाठको की रूचि में कमी होती देख आज से सवालों का सिलसिला(ट्रिविया) समाप्त किया जाता है.. सीमा जी, हमें मुआफ़ कीजिएगा, लेकिन आपके अलावा कहीं और से जवाब नहीं आता और आप भी पिछली कुछ कड़ियों में नदारद थीं, इसलिए सीने पर पत्थर रखकर हमें यह निर्णय लेना पड़ा :)

TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'लम्हा'।
२. "जियो, उठो, बढ़ो, जीतो"।
३. 'तलाश'।

Tuesday, August 17, 2010

"तेरे मस्त-मस्त दो नैन" गाता हुआ हुड़हुड़ाता आ पहुँचा है एक दबंग, जिसके लिए मुन्नी भी बदनाम हो गई..

ताज़ा सुर ताल ३१/२०१०

विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक में हम सभी का स्वागत करते हैं। सुजॊय जी, अब ऐसा लगने लगा है कि साल २०१० के हिट गीतों की फ़ेहरिस्त ने रफ़्तार पकड़ ली है; एक के बाद एक फ़िल्म आती जा रही है और हर फ़िल्म का कोई ना कोई गीत ज़रूर हिट हो रहा है।

सुजॊय - हिट गीतों की अगर बात करें तो कभी कभी कामयाब गीतों का फ़ॊरमुला फ़िल्मकारों और कुछ हद तक अभिनेता पर भी निर्भर करता है, ऐसा अक्सर देखा गया है। अब सलमान ख़ान को ही लीजिए, शायद ही उनका कोई फ़िल्म ऐसा होगा, जिसके गानें हिट ना हुए होंगे। वैसे तो उनकी फ़िल्में भी ख़ूब चलती हैं, लेकिन उनके फ़्लॊप फ़िल्मों के गानें भी कम से कम चल पड़ते हैं।

विश्व दीपक - ठीक कहा, इसी साल उनकी फ़िल्म 'वीर' बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही, लेकिन फ़िल्म के गाने चल पड़े थे, ख़ास कर "सलाम आया" गीत तो बहुत पसंद किया गया। पिछले कुछ सालों से सलमान ख़ान की फ़िल्मों में साजिद-वाजिद संगीत दे रहे हैं। 'तेरे नाम' की अपार कामयाबी के बावजूद सल्लु मिया ने हिमेश रेशम्मिया से साजिद वाजिद पर स्विच-ओवर कर लिया था। पिछले साल 'वाण्टेड' और इस साल जनवरी में प्रदर्शित 'वीर' के बाद अब सलमान और साजिद-वाजिद की तिकड़ी लेकर आए हैं फ़िल्म 'दबंग', और आज 'टी.एस.टी' में इसी फ़िल्म के गानें।

सुजॊय - 'दबंग' अभिनव कश्यप निर्देशित फ़िल्म है जिसमें सलमान ख़ान की नायिका बनी हैं नवोदित अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा। साथ मे हैं अरबाज़ ख़ान, सोनू सूद, विनोद खन्ना, डिम्पल कपाडिया, महेश मांजरेकर और ओम पुरी। यानी कि एक ज़बरदस्त स्टार-कास्ट है इस फ़िल्म में। साजिद वाजिद के धुनों पर गानें लिखे हैं जलीश शेरवानी ने। लेकिन एक गीत ललित पण्डित ने लिखा और स्वरबद्ध किया है। फ़ैज़ अनवर ने भी एक गीत लिखा है।

विश्व दीपक - कहते हैं सौ सुनार की एक लुहार की, तो यहाँ भी वही बात है, फ़ैज़ साहब ने जो एक गीत लिखा है, वही फ़िल्म के बाक़ी सभी गीतों पर भारी है। सुनते हैं राहत फ़तेह अली ख़ान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में वही गीत।

गीत - तेरे मस्त मस्त दो नैन


सुजॊय - वाह! अच्छा लगा। सूफ़ी क़व्वाली अंदाज़ का यह गीत राहत साहब के फ़िल्मी गायन करीयर का एक और यादगार गीत बनने जा रहा है। 'वीर' के "सुरीली अखियों वाली" के बाद, साजिद-वाजिद के लिए फिर एक बार उन्होंने अपने आप को सिद्ध किया है इस गीत में। साजिद वाजिद के कम्पोज़िशन्स की अच्छी बात यह लगती है कि वो भारतीय साज़ों की ध्वनियों का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं जिससे गीत ज़्यादा कर्णप्रिय बन जाता है।

विश्व दीपक - और रही बात इस गीत के बोलों की, तो फ़ैज़ अनवर, जो एक अनुभवी फ़िल्मी गीतकार रहे हैं और ९० के दशक में बहुत सारे हिट गीत दिए हैं, उन्होंने काव्यात्मक शैली अख़्तियार करते हुए इस गीत में लिखा है "माही वे आप सा, दिल ये बेताब सा, तड़पा जाए तड़पा तड़पा जाए, नैनों के झील में, उतरा था युंही दिल, डूबा जाए डूबा डूबा जाए..."। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि यह गीत हर लिहाज़ से सुपरहिट होने का स्तर रखता है। इस गीत के दो वर्ज़न हैं, हमने राहत साहब और श्रेया का युगल वर्ज़न सुना, राहत साहब का एकल वर्ज़न भी है। लगे हाथों उसे भी सुन लते हैं।

गीत - तेरे मस्त मस्त दो नैन (एकल)


सुजॊय - फ़िल्म का तीसरा गीत, या युं कहिए कि ऐल्बम का तीसरा गीत है "मुन्नी बदनाम" जिसे लिखा व स्वरबद्ध किया है जतिन ललित के ललित पण्डित ने। यह एक आइटम नंबर है जिसे ममता शर्मा और ऐश्वर्या ने गाया है। यह गीत मास के लिए है, क्लास के लिए नहीं। चलिए, इसे भी सुनते चलें....

गीत - मुन्नी बदनाम


विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए", आइटम नंबर होने के साथ इसमें कॊमिक एलीमेण्ट्स भी डाले गए हैं, जैसे कि "ले झंडु बाम हुई डारलिंग तेरे लिए", "शिल्पा सा फ़िगर, बेबो सी अदा" वगेरह। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "उत्तर प्रदेश" के एक पुराने लोक-गीत "लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए" से प्रेरित है। इसी लोक-गीत का इस्तेमाल बप्पी-लाहिड़ी भी एक फिल्म "रॉक डांसर" में कर चुके हैं, जहाँ "लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए" के बोल पर "जावेद जाफ़री" थिड़कते हुए नज़र आए थे। मुझे यह जानकारी मिलिब्लॉग और आईटूएफ़एस के कार्तिक से हासिल हुई है।

सुजॊय - बड़ी हीं अनूठी जानकारी है। खैर, इस मास नंबर के बाद बेहतर यही होगा कि हम अगले गीत की तरफ़ बढ़ें। ऐल्बम का चौथा गीत है सोनू निगम और श्रेया घोषाल का गाया एक नर्मोनाज़ुक रोमांटिक डुएट "चोरी किया रे जिया"। आइए सुनते हैं।

गीत - चोरी किया रे जिया


विश्व दीपक - वैसे तो सोनू और श्रेया के गाए कई यादगार डुएट्स हैं, इस गीत में वैसे कोई नई बात नहीं है, लेकिन गीत का रीदम और संगीत संयोजन अपीलिंग है। गिटार की मेलोडियस स्ट्रिंग्स और उस पर कैची बीट्स सुनने वाले को गीत के साथ जोड़े रखते हैं। सोनू और श्रेया की आवाज़ों ने फिर एक बार साबित किया कि आज के दौर में ये ही दो अव्वल नंबर पर हैं। साजिद-वाजिद ने बहुत से ऐसे रोमांटिक डुएट्स हमें दिए हैं जब भी उन्हें मौका दिया गया है। इस गीत को लिखा है जलीश शेरवानी ने जिन्होंने फ़िल्म 'मुझसे शादी करोगी' में भी "लाल दुपट्टा", "रब करे तुझको भी प्यार हो जाए" जैसे सफल रोमांटिक गीत लिख चुके हैं।

सुजॊय - अब बढ़ते हैं अगले गीत की तरफ़ जो है फ़िल्म का शीर्षक गीत, "हुड़ हुड़ दबंग"। विश्व दीपक जी, आपको "दबंग" शब्द का अर्थ पता है?

विश्व दीपक - हाँ, "दबंग" यानी "निडर" या "निर्भय", जिसे अंग्रेज़ी में "fearless" कह सकते हैं। लेकिन कहीं भी दबंग शब्द का इस्तेमाल पोजिटीव सेन्स में नहीं होता। हम जिस किसी को भी दबंग के विशेषण से नवाज़ते हैं तो इसका मतलब ये होता है कि वह इंसान शक्तिशाली है और दूसरों को दबा कर रखता है। आज भी गाँवों में जमींदारों को इसलिए दबंग कहते हैं क्योंकि वे गरीब जनता का हक़ मारते हैं और जनता उनसे डरी हुई रहती है। "दबंग" और "दलित" एक दूसरे के पूरक हैं। वह जो लोगों को अपनी जूतों तल दबा कर रखे वह "दबंग" और वह जो "दबा" हुआ हो वह "दलित"। इसलिए "दबंग" का अर्थ "निडर" होते हुए भी यह एक निगेटिव वर्ड है। मेरे हिसाब से फिल्म में भी इसी नकारात्मक अर्थ को दर्शाया गया है।

सुजॊय - अच्छा! तो चलिए यह गीत सुन लेते हैं जिसे सुनते हुए मुझे यकीन है आप सब को फ़िल्म 'ओमकारा' का शीर्षक गीत ज़रूर याद आ जाएगा। वैसे इस गीत में भी आवाज़ सुखविंदर सिंह की ही है जिन्होंने 'ओमकारा' का वह गीत गाया था; और इस गीत में सुखविंदर के साथ वाजिद ने भी आवाज़ मिलायी है। "हुड़ हुड़ दबंग" फ़िल्म में सलमान ख़ान के किरदार को वर्णित करता होगा, ऐसा प्रतीत होता है।

गीत - हुड़ हुड़ दबंग


विश्व दीपक - कुछ हेवी ड्रम्स और वायलिन्स का ज़बरदस्त इस्तेमाल हुआ है; लोक शैली में बनाया गया है गीत वाक़ई "ओमकारा" से मिलता जुलता है। लेकिन बोलों के लिहाज़ से "ओमकारा" इससे बहुत उपर ही रहेगा। ख़ैर, गीत बुरा नहीं है। और आइए अब फ़िल्म का अंतिम गीत सुन लिया जाए, यह एक क़व्वाली है वाजिद, मास्टर सलीम, शबाब साबरी और साथियों की आवाज़ों में। "हमका पीनी है" एक ग्रामीण लोक शैली वाला गीत है जो पूरी तरह से सिचुएशनल है। जलीश शेरवानी के बोल।

सुजॊय - फिर एक बार शायद मास नंबर है, ना कि क्लास। ढोलक का मुख्य रूप से इस्तेमाल है, लीजिए आप भी सुनिए।

गीत - हमका पीनी है


सुजॊय - इन छह गीतों को सुन कर यही कह सकता हूँ कि "तेरे मस्त मस्त दो नैन" ही ऐल्बम का सर्वोत्तम गीत है.. असल में दोनों वर्जन्स हीं कमाल के हैं। जैसा कि शुरु में आपने कहा था "सौ सुन्हार की, एक लुहार की", अब मैं भी सहमत हो गया हूँ आप से। सोनू-श्रेया का "चोरी किया रे जिया" भी कर्णप्रिय रहा। विश्व दीपक जी, आज हम 'दबंग' के साथ साथ 'वी आर फ़मिली' के भी कुछ गानें सुनवाने वाले थे। लेकिन 'वी आरे फ़मिली' के गीतों को जब मैंने सुना तो मुझे लगा कि इस फ़िल्म के सभी गीतों को सुनवाना चाहिए। इसलिए अगर संभव हुआ तो अगले हफ़्ते हम 'वी आर फ़ैमिली' के गानें लेकर हाज़िर होंगे। क्या ख़याल है?

विश्व दीपक - जी, आपने सही कहा। वास्तव में मैने अभी तक "वी आर फ़ैमिली" के गाने नहीं सुने, इसलिए प्रोमोज़ में गाने सुनकर मुझे लगा कि कुछ हीं गाने सुनने लायक हैं। और यही कारण है कि पिछले टीएसटी में मैंने यह कह दिया था कि दोनों फिल्मों के गाने साथ करेंगे। लेकिन चूँकि आपने गाने सुने हैं और आपको वे गाने पसंद आए हैं, तब दोनों एलबमों की समीक्षा साथ करने का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। तो अगली टीएसटी "वी आर फ़ैमिली" पर हीं सजेगी। अलग बात है कि उस वक़्त आपके साथ मैं नही सजीव जी रहेंगे, क्योंकि मैं दस दिनों के लिए नदारद होने वाला हूँ.. घर जा रहा हूँ "रक्षा बंधन" के लिए। २९ को लौटूँगा, उसके बाद मैं फिर से आपके साथ आ जाऊँगा। ठीक है? :) जहाँ तक "दबंग" का सवाल है, तो मेरे हिसाब से गाने "मास" के लिए इस कारण से हैं क्योंकि फिल्म हीं "मास" के लिए है। यह फिल्म "वांटेड" की तर्ज़ पर बनाई गई मालूम होती है। जिस तरह वांटेड के गाने क्रिटिक्स ने एलबम सुनने के बाद नकार दिए थे, लेकिन फिल्म रीलिज होने पर उन्हीं गानों ने धूम मचा दी थी। मेरे हिसाब से इस फिल्म के गाने भी फिल्म आने के बाद उसी तरह का कमाल करने वाले हैं। शायद सलमान खान ने "साज़िद-वाज़िद" को ऐसी हिदायत हीं दी हो कि भाई गाने ऐसे बनाओ कि लोग झूम उठे.. वे गाने कितने दिन चलेंगे, इसका ख्याल रखने की कोई जरूरत नहीं। नहीं तो साज़िद-वाज़िद सुमधुर गाने देने में भी उस्ताद हैं। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का समापन करते हैं। जाते-जाते स्वतंत्रता दिवस की बधाईयाँ भी लेते जाईये। जय हिन्द!

आवाज़ रेटिंग्स: दबंग: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९१- संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद इन दिनों किस रियल्टी शो में नज़र आ रहे हैं?

TST ट्रिविया # ९२- फ़ैज़ अनवर का एक बड़ा ही मशहूर गीत है जो आया था २००१ की एक फ़िल्म में। गीत के एक अंतरे की पंक्ति है "फूल सा खिल के महका है ये दिल, फिर तुझे छू के बहका है ये दिल"। गीत का मुखड़ा बताइए।

TST ट्रिविया # ९३- 'दबंग' और 'वी आर फ़मिली' के साउंडट्रैक में आप दो समनाताएँ बताएँ।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. तुलसी कुमार... एल्बम का नाम - "लव हो जाये"
२. रॉकफ़ोर्ड .. उस गाने को "के के" ने गाया था।
३. सलीम-सुलेमान

सीमा जी, आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। तीसरे सवाल में शायद आप संगीतकार और प्रोगामर में कन्फ़्युज़ हो गईं। अगर जवाब "जतिन-ललित" होता तो हम पूँछते हीं क्यों? :) और वैसे भी टी०एस०टी० के किसी भी अंक में पूछा गया कोई भी सवाल उसी अंक से संबंधित होता है। तो फिर इस सवाल का जवाब तो "सलीम-सुलेमान" हीं होना था, क्योंकि सवाल में इस अंक के किसी और शख्स का तो नाम हीं नहीं आया था। आगे से ऐसे "हिंट्स" पर ध्यान रखिएगा। :)

Tuesday, April 27, 2010

बुल्ले शाह के "रांझा-रांझा" को "रावण" के रंग में रंग दिया रहमान और गुलज़ार ने... साथ है "बीरा" भी

ताज़ा सुर ताल १६/२०१०

सुजॊय - ताज़ा सुर ताल' के एक नए अंक के साथ हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक स्वागत करते हैं। पिछले हफ़्ते किसी कारण से 'टी.एस.टी' की यह महफ़िल सज नहीं पाई थी। दोस्तों, सजीव जी इन दिनों छुट्टियों के मूड में हैं, इसलिए आज मेरे साथ 'ताज़ा सुर ताल' में उनकी जगह पर हैं विश्व दीपक तन्हा जी। विश्व दीपक जी, वैसे तो आप 'आवाज़' में नए नहीं हैं, लेकिन इस स्तंभ में आप पहली बार मेरे साथ हैं। इसलिए मैं आपका स्वागत करता हूँ।

विश्व दीपक - शुक्रिया सुजॊय जी! मुझे भी बेहद आनंद आ रहा है इस स्तंभ में शामिल हो कर। वैसे मैं एक बार आपकी अनुपस्थिति में फ़िल्म 'रण' के गीत संगीत की चर्चा कर चुका हूँ इसी स्तंभ में। इसलिए यह कह सकते हैं कि यह दूसरी मर्तबा है कि मैं इस स्तंभ में शामिल हूँ बतौर होस्ट और जिस तरह का सजीव जी का मूड है, उस हिसाब से मुझे लगता है कि अगले एक-डेढ महीने तक मैं आपके साथ रहूँगा। खैर यह बताईये कि आज किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने का इरादा है?

सुजॊय - देखिए इन दिनों जिन फ़िल्मों के प्रोमोज़ और गीतों की झलकियाँ दिखाई व सुनाई दे रहीं हैं, उनमें कुछ नाम हैं 'बदमाश कंपनी', 'हाउसफ़ुल', 'मुस्कुराकर देख ज़रा'। लेकिन इन सब से बिल्कुल अलग हट कर जो फ़िल्म आनेवाली है और जिसके प्रति लोगों की उत्सुक्ता दिन ब दिन बढ़ती सी दिखाई दे रही है, वह फ़िल्म है 'रावण'। ऐसे में इस फ़िल्म की चर्चा इस स्तंभ में अनिवार्य हो जाता है।

विश्व दीपक - बिल्कुल ठीक कहा। मणिरत्नम निर्मित एवं निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय, विक्रम, गोविंदा, प्रियामणि, रविकिशन और निखिल द्विवेदी ने। गुलज़ार के गीत हैं और संगीत ए. आर. रहमान का।

सुजॊय - यानि कि पूरी की पूरी एक ज़बरदस्त टीम। देखना है कि अभिषेक-ऐश के साथ रहमान की तिकड़ी क्या वही कमाल दिखाती है जो कमाल फ़िल्म 'गुरु' में हुआ था!

विश्व दीपक - सिर्फ़ अभि-ऐश के साथ ही क्यों, मणिरत्नम और रहमान की ऐतिहासिक जोड़ी शुरु हुई थी १९९२ में 'रोजा' से। उसके बाद 'बॊम्बे', 'दिल से', 'साथिया', 'युवा' और 'गुरु' जैसी यादगार फ़िल्में। ऐसे में अगर लोगों को 'रावण' के म्युज़िक से उम्मीदें हैं तो वो जायज़ हीं हैं। तो चलिए शुरू करते हैं गीतों का सिलसिला। सुनते हैं पहला गीत और फिर चर्चा आगे बढ़ाते हैं।

गीत: बीरा बीरा


सुजॊय - दरअसल यह गीत फ़िल्म के मुख्य पात्र बीरा (अभिषेक बचन) से संबंधित है। जैसा कि आपने सुना कि गीत की धुन और रीदम ट्राइबल अंदाज़ का है। विजय प्रकाश, मुस्तफ़ा कुटोन और कीर्ति सगठिया का गाया यह गीत हो सकता है कि अलग से सुन कर बहुत ज़्यादा अपील ना करे, लेकिन फ़िल्म की कहानी, पात्र और सिचुयशन के मुताबिक ज़रूर सटीक होगी!

विश्व दीपक - और इस गीत की अवधि भी इतनी कम है कि जब तक इसकी रीदम और धुन ज़हन में चढ़ती है, तब तक गीत समाप्त हो चुका होता है। वैसे इसी तरह का एक गीत गुलज़ार साहब ने "ओंकारा" में भी लिखा था। वहाँ भी मुख्य नायक के इंट्रोडक्शन के लिए एक विशेष गीत की ज़रूरत थी। अलग बात यह है कि वहाँ पर गाने में दो अंतरे थे, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहब को अपनी बात एक हीं अंतरे में कहनी थी। और मेरे हिसाब से वो इसमें सफ़ल हुए हैं। सुजोय जी, शायद आपने यह ध्यान न दिया हो लेकिन इस गीत में रहमान की भी आवाज़ है, भले हीं उनका नाम सीडी कवर पर नहीं दिखता। यह तो आपको मानना हीं पड़ेगा कि अलग किस्म का संगीत है इसमें और हाँ कुछ-कुछ अफ़्रीकन तो कुछ-कुछ चाईनीज अफ़ेक्ट भी है।

सुजॊय - जी.. मुस्तफ़ा कुटोन का इस्तेमाल रहमान ने शायद इसी कारण से किया है। क्योंकि उनकी आवाज़ में एक्ज़ोटिक टच है।

विश्व दीपक - बहुत हद तक संभव है। चलिए अब आगे बढ़ते हैं और आ जाते है दूसरे गीत पर। पहले गीत से बिल्कुल अलग यह गीत है "बहने दे मुझे बहने दे"। इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'दिल से' के "सतरंगी रे" की याद आ ही जाती है।

सुजॊय - हाँ, ख़ास कर "बहने दे" "सतरंगी रे" के अंतरे "थोड़ा थोड़ा उन्स हुआ... मुझे मौत की गोद में सोने दे" से कुछ कुछ मिलता जुलता है। और इन दोनों गीतों में रहमान का स्टाइल साफ़ झलकता है। "सतरंगी" सोनू निगम की आवाज़ में था, और यह गीत गाया है कार्तिक ने। कार्तिक से रहमान ने फ़िल्म 'गजनी' में "बहका मैं बहका" गवाया था।

विश्व दीपक - कार्तिक ने हिंदी में बहुत कम गानें गाए हैं, लेकिन जो भी दो चार गानें इन्होने गाए हैं, सभी अच्छे हैं। उन्हे और ज़्यादा मौके मिलने चाहिए। इस गीत में बहुत सी अलग-अलग ध्वनियों का सहारा लिया गया है। कई उतार चढ़ाव को पार करते हुए ६ मिनट के इस गीत में कार्तिक एक ऐसे शख़्स के दिल की ख़्वाहिशें बयान करते हैं जो सारे बंधनों को तोड़ कर एक ज़िंदगी जीना चाहता है जो उसकी उसूलों पर हो।

गीत: बहने दे


सुजॊय - 'रावण' फ़िल्म का तीसरा गीत एक बार फिर "बीरा बीरा" के अंदाज़ का है। सुखविंदर सिंह की आवाज़ में एक ऐटिट्युड है, जो उन्होने कई गीतों में समय समय पर दिखाया है। इस गीत में भी उनकी गायकी का वही ऐटिट्युड भरा अंदाज़ सुनाई देता है। यह गीत है "ठोक दे किल्ली"

विश्व दीपक - इस गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है। ढोलक, पार्श्व में कोरस, शहनाई, और इलेक्ट्रिक गिटार, इन सब के फ़्युज़न से यह गीत एक प्रयोगधर्मी गीत बन गया है, और उस पर गुलज़ार साहब के ग़ैर पारंपरिक बोलों से गीत अनूठा बन गया है। लेकिन यह बात भी सच है कि इस तरह के गानें पूरी तरह से सिचुयशनल होते हैं जो फ़िल्म के परदे पर ही फ़िट बैठते हैं। आम जनता की ज़ुबाँ पर ये गानें मुश्किल से ही चढ पाते हैं।

सुजॊय - दरअसल यह फ़िल्म पर निर्भर करता है कि उसका संगीत किस तरह का होना चाहिए। अगर कहानी और प्लॊट अनुमति नहीं दे रहे हैं, तो संगीतकार भी कुछ ख़ास नहीं कर पाता। कुछ फ़िल्में संगीत के बलबूते पर चलती है और कुछ कहानी, अभिनय के बलबूते। उम्मीद करता हूँ कि यह फिल्म दोनों मायनों में सफ़ल हो।

विश्व दीपक - सुजोय जी, मैं आपकी बातों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ। और वैसे भी कोई गाना कितना भी सिचुएशनल क्यों न हो, अगर उस गाने में रहमान और गुलज़ार साहब के नाम जुड़ जाते है, तो उस गाने का असर दूसरे सिचुएशनल गानों से कहीं ज्यादा होता है। जैसे कि इसी गाने को ले लीजिए... गुलज़ार साहब ने बड़े हीं आसान शब्दों (किल्ली, बिल्ली, खिल्ली, दिल्ली... ) में बहुत हीं बड़ी कह दी है.. उदाहरण के लिए यह पंक्ति "अबकी बार हिसाब चुका ले, छिन के ले ले अपना हिस्सा.. अपना खून भी लाल हीं होगा... खोल के देख ले खाल की झिल्ली"।

गीत: ठोक दे किल्ली


विश्व दीपक - चौथा गीत है "रांझा रांझा ना कर हीरे जग बदनामी होये"। रेखा भारद्वाज, जावेद अली और अनुराधा श्रीराम के गाए इस गीत से आपको सुभाष घई की फ़िल्म 'ताल' के संगीत की याद न आ जाए तो कहिएगा। लोक शैली पर बना यह गीत जोशीला भी है, सेन्शुयल भी है, और सूफ़ियाना अंदाज़ का है। लोक संगीत के साथ में मोडर्न बीट्स और गिटार का सुंदर फ़्युज़न किया गया है इस गाने में।

सुजॊय - अनुराधा श्रीराम की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने में आई है। गुलज़ार साहब के लोकशैली के बोल बेहद असरदार हैं। वैसे गीत के शुरुआती बोलों(रांझा-रांझा करदी वे मैं आप्पे रांझा होई.. रांझा-रांझा सद्दो नी मैनु हीर न आंके कोई) का क्रेडिट सूफ़ी कवि बाब बुल्ले शाह को दिया गया है। मेरा ख़याल है इस साल के टॊप-१० गीतों में यह गीत शोभा पाएगी, देखते हैं क्या होता है!

विश्व दीपक - जी हाँ, मुझे भी इस गीत से पुरी उम्मीद है। "रेखा भारद्वाज" अपनी आवाज़ से ऐसा मायाजाल बुनती हैं कि उससे बाहर निकलना हम जैसे संगीत के साधकों के लिए संभव नहीं। "रांझा-रांझा" कहते समय उनकी आवाज़ का "हस्कीनेस" चरम पर मालूम पड़ता है। जावेद अली रहमान के पसंदीदा गायक होते जा रहे हैं और इस गाने में रेखा भारद्वाज के साथ इन्हें मौका देकर (जबकि इन दोनों की गायन-शैली पूरी अलग है) रहमान ने जावेद अली में अपना यकीन दर्शाया है। वैसे मैं यह सोच रहा था कि अगर जावेद अली की जगह कैलाश खेर होते तो गाने का सूफ़ियाना असर कमाल का होता। हो सकता है कि रहमान ने कुछ और सोचा हो। चलिए हम यह गाना सुन लेते हैं।

गीत: रांझा रांझा


सुजॊय - 'रावण' का साउंडट्रैक विविधता से भरा है। अब जो पाँचवा गीत हम सुनने जा रहे हैं, वह एक बहुत ही नर्म और कर्णप्रिय गीत है रीना भारद्वाज की आवाज़ में। यह गीत है "खिली रे"। यह एक उपशास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत है। इसमें नवीन कुमार की बांसुरी और असद ख़ान का बजाया सितार सुनने को मिलता है। तबले का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

विश्व दीपक - रीना भारद्वाज की आवाज़ बहुत ही मीठी है, पता नहीं उन्हे गायन के ज़्यादा मौके क्यों नहीं मिल पाए हैं। रीना जी ने जितने भी गानें गाए है, वो ज़्यादातर रहमान के लिए ही हैं। फिर एक बार सिचुयशनल गीत होने की वजह से इसकी लोकप्रियता पर प्रशचिन्ह लग जाता है। इस गीत को ऐश्वर्य राय पर फ़िल्माया गया होगा और रीना जी की आवाज़ उन पर बहुत ही फ़िट बैठी है। यानी कि अच्छा प्लेबैक!!

गीत: खिली रे


विश्व दीपक - 'रावण' एल्बम का आख़िरी गीत एक समूहगान है "कटा कटा बकरा"। दरसल यह एक हास्य रस का गीत है। सिचुयशन है कि एक आदमी की शादी हो रही है और उसके दोस्त लोग उसका मज़ाक उड़ाते हुए गा रहे हैं "कटा कटा बकरा"। समूह स्वरों में आप इला अरुण, सपना अवस्थी और कुणाल गांजावाला की आवाज़ें भी महसूस कर सकते हैं।

सुजॊय - इतना हीं नहीं इन तीनों के अलावा इस गाने में आठ और आवाज़े हैं.. लगता है कि रहमान बैकिंग वोकल्स में भी कोई समझौता नहीं करना चाहते। जहाँ तक इला अरुण और सपना अवस्थी की गायकी का सवाल है तो इन दोनों की आवाज़ों में बहुत हद तक समानता है, लेकिन इससे पहले ये दोनों कभी साथ में सुनाई नहीं दी थीं।

विश्व दीपक -इस गीत का मूल भाव कुछ-कुछ फ़िल्म 'रोजा' के "रुकमणि रुकमणि" जैसा लगता है। सुनने मे आया है कि "कटा कटा" गीत के लिए मणिरत्नम ने ५०० डान्सर्स का सहारा लिया है और इस गीत की शूटिंग ५ दिनों में पूरी की गई है। बहुत सारे ड्रम, ढोलक, तालियों की थापें, और शहनाई से इस गाने का संयोजन किया गया है। इसके लिए श्रेय जाता है मशहूर संगीत संयोजक रंजीत बारोट को। क्या आपको इसमें 'जोधा अकबर' के "अज़ीम-ओ-शान शहन्शाह" की झलक मिलती है?

गीत: कटा कटा


"रावण" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - तो विश्व दीपक जी, इस सभी ६ गीतों को सुनने के बाद मेरा रवैय्या इस फ़िल्म के साउंडट्रैक के बारे में यह बनता है कि रहमान ने नए क़िस्म का संगीत और संगीत संयोजन हमें दिया है, लेकिन सभी गीत सिचुयशनल होने की वजह से जनता की ज़ुबान पर चढ़ पाना मुश्किल सा लगता है। मेरी व्यक्तिगत पसंद है "रांझा रांझा" गीत। इस फ़िल्म को मेरी तरफ़ से शुभकामनाएँ!!!

विश्व दीपक - आपका अंदेशा बेबुनियाद नहीं है। हो सकता है कि ये गाने फिल्म रीलिज होने के बाद हीं लोगों को पसंद आएँ। लेकिन मेरा हमेशा हीं यह व्यक्तिगत मत रहा है कि रहमान के गाने लोगों की समझ और लोगों की ज़हन पर धीरे-धीरे चढते हैं। इन दिनों रहमान हर फिल्म में कोई नया प्रयोग कर रहे हैं और इस कारण संगीत की मामूली या नहीं के बराबर समझ रखने वाले लोगों को रहमान के ये प्रयोग अटपटे-से लगते हैं। फिर भी मैं हर किसी से यह गुजारिश करूँगा कि बस एक बार(या एक बार भी नहीं) सुनकर इन गानों को खारिज़ न करें। गानों को आप पर असर करने का समय दें, फिर देखना कि आप कैसे इन गानों के दिवाने हो जाते हैं।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४६- रीना भारद्वाज ने अपना पहला गीत रहमान की धुन पर ही गाया था। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४७- अनुराधा श्रीरम की गायकी में लोक शैली की झलक हम इससे पहले अनिल कपूर आभिनीत एक फ़िल्म में सुन चुके हैं। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४८- यह अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्य राय की एक फ़िल्म का युगलगीत है। इस गीत के पुरुष गायक ने हृतिक रोशन के करीयर के पहली सुपरहिट फ़िल्म में भी एक धमाकेदार गीत गाया था। गीत के अंतरे में एक लाइन है "जीता था पहले भी मगर युं था लगता, सीने में शायद तेरी कुछ कमी है"। बताइए हम किस गीत की बात कर रहे हैं, फ़िल्म का नाम क्या है, और गायक कौन हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. इन तीनों फ़िल्मों में अभिनेताओं ने गीत गाए हैं, 'जोश' में शहरुख़ ख़ान (अपुन बोला तू मेरी लैला), 'हेल्लो ब्रदर' में सलमान ख़ान (चांदी की डाल पर सोने का मोर), और 'काइट्स' में हृतिक रोशन।
२. फ़िल्म 'अनुभव' के लिए राजेश रोशन ने गाया था "बाहों में आजा, सीने से मेरे तू लग जा सनम, दिल मेरा है बेक़रार"।
३. हृतिक ने ६ वर्ष की आयु में जीतेन्द्र - रीना रॊय अभिनीत फ़िल्म 'आशा' में पहली बार अभिनय किया था।

सीमा जी, आपका जवाब सही है। बधाई स्वीकारें।

Thursday, September 24, 2009

ऑस्कर जीत के बाद लौटे हैं रहमान मगर इस बार रंग है "ब्लू"

ताजा सुर ताल (24)

ताजा सुर ताल में आज में आज सुनिए हिंदुस्तान की अब तक की सबसे महंगी फिल्म "ब्लू" का एक गुस्ताख गीत

सुजॉय - सजीव, लगता है कि अब वह वक़्त आ गया है कि हमारे यहाँ भी पारंपरिक फ़िल्मी कहानियों से आगे निकलकर हॉलीवुड की तरह नए नए विषयों पर फ़िल्में बनने लगी हैं।

सजीव- किस फ़िल्म की तरफ़ तुम्हारा इशारा है सुजॉय?

सुजॉय- अक्षय कुमार की नई फ़िल्म 'ब्लू'। इस ऐक्शन फ़िल्म की कहानी केन्द्रित है समुंदर के नीचे छुपे हुए ख़ज़ाने की जिसकी रखवाली कर रहे हैं शार्क मछलियाँ। अमेरिकी लेखक जोशुआ लुरी और ब्रायान सुलिवन ने इस कहानी को लिखा है और गायिका कायली मिनोग ने भी अतिथी कलाकार के रूप में इस फ़िल्म में एक गीत गाया है जो उन्ही पर फ़िल्माया गया है।

सजीव- हाँ, मैने भी सुना है इस फ़िल्म के बारे में। क्यों ना थोड़ी सी जानकारी और दी जाए इस फ़िल्म से संबंधित! कहानी ऐसी है कि सागर और सैम दो भाई हैं, जिन्हे गुप्तधन ढ़ूंढने का ज़बरदस्त शौक है। सागर की पत्नी मोना के साथ वे बहामा के लिए निकल पड़ते हैं समुंदर के २०० फ़ीट नीचे छुपे किसी ख़ज़ाने को ढ़ूंढने के लिए। लेकिन उनकी मुलाक़त होती है आरव से जो उसी गुप्तधन को ढ़ूंढने के लिए वहाँ पे आया हुआ है। फ़िल्म का ज़्यादातर हिस्सा समुंदर के नीचे फ़िल्माया गया है, और इसीलिए फ़िल्म का शीर्षक भी रखा गया है 'ब्लू'।

सुजॉय- भई, मुझे तो बहुत इंटरेस्टिंग लग रही है, मैं तो ज़रूर देखूँगा यह फ़िल्म। वैसे फ़िल्म में कलाकार भी अच्छे हैं - संजय दत्त, अक्षय कुमार, ज़ायद ख़ान और लारा दत्ता। इन्ही चार लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है कहानी। सुना है कि बैंकॉक में इन सभी कलाकारों को फ़िल्म की शूटिंग शुरु होने से पहले स्कूबा डायविंग की ट्रेनिंग लेनी पड़ी है। अच्छा सजीव, पता है फ़िल्म में संगीत किसका है?

सजीव- हाँ, ए. आर. रहमान का। कुल ७ ट्रैक्स हैं इस ऐल्बम में। गानें लिखे हैं अब्बास टायरवाला, मयूर पुरी और रक़ीब आलम ने, और गीतों में आवाज़ें हैं सोनू निगम, उदित नारायण, श्रेया घोषाल, सुखविंदर सिंह, राशिद अली, नीरज श्रीधर, मधुश्री, सोनू कक्कर, विजय प्रकाश, जसप्रीत सिंह, दिल्शाद और रक़ीब की, साथ ही एक गीत में कायली मिनोग और सुज़ैन डी'मेलो की भी आवाज़ें हैं।

सुजॉय- यानी की ये ऑस्कर में जीत के बाद रहमान साहब की पहली प्रर्दशित फिल्म होगी, तो आज हम कौन सा गीत सुनवाएँगे?

सजीव- वही गीत जो इन दिनों काफ़ी सुना और देखा जा रहा है। श्रेया और सुखविंदर का गाया "आज दिल गुस्ताख़ है, पानियों में आग है"। ये एक पेशानेट गीत है और श्रेया ने खूब जम कर गाया है इसे, ३ बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित इस गायिका ने खुद को कभी किसी इमेज में कैद नहीं होने दिया....हाँ सुखविंदर की आवाज़ कुछ ख़ास नहीं जमी इस गीत में....हो सकता है उनका चुनाव नायक संजय दत्त को जेहन में रख कर किया गया है....

सुजॉय- मैने यह गीत सुना है, और बहुत दिनों के बाद ऐसा लगा कि ए. आर. रहमान कुछ अलग हट के बनाया है, वर्ना पिछले कई फ़िल्मों से पीरियड फ़िल्मों में संगीत देते देते वो थोड़े से टाइप-कास्ट होते जा रहे थे।

सजीव- हाँ, दरअसल रहमान साहब फिल्म के मूड के हिसाब से संगीत देने में माहिर हैं, अब यदि तेज़ बीट्स संगीत की बात की जाए तो "हम से मुकाबलa" से लेकर "गजनी" तक एक लम्बी सूची है, वहीँ आत्मीय और मेलोडी वाले संगीत पर गौर करें तो "रोजा" से लेकर 'जोधा अकबर" और "जाने तू..." जैसी फिल्मों में उनका संगीत कितना मधुर था ये बात हम सब जानते हैं. "ब्लू" की अगर बात की जाए तो ये एक तेज़ तर्रार एक्शन फिल्म है तो जाहिर है इसमें हर रंग का कुछ न कुछ होना चाहिए था, इस बड़े बजट फिल्म संगीत भी बड़े कैनवास का दिया है रहमान ने. कहते हैं कायली पर जो गीत फिल्माया गया है उस पर पूरे ६ करोड़ का खर्चा आया है, सुजोय अगर ६ करोड़ मिल जाए तो आप कितनी फिल्में बना सकते हैं ?

सुजॉय - कम से कम २ अच्छी फिल्में तो बन ही सकती है....

सजीव - तो सोचिये हमारी दो फिल्मों का खर्चा लेकर इन लोगों ने एक गीत फिल्मा दिया .....हा हा हा...खैर बड़े निर्माताओं की बड़ी बातें हैं ये...हम जिस गीत की आज बात कर रहे हैं इस गीत में भी जहाँ एक तरफ़ रोमांस है, वहीं दूसरी ओर इसका म्युज़िक ऐरेंजमेंट भी कमाल का है।

सुजॉय - ऐकोस्टिक गीटार का बहुत ही सुंदर इस्तेमाल सुनने को मिलता है इस गीत में, और जो ध्वनियाँ, जो संगीत इस गीत में सुनाई देता है वह बहुत ही मॊडर्ण है, कॊंटेम्पोररी है, लेकिन एक मेलडी भी है, मिठास भी है। अनर्थक शोर शराबा नहीं है, बल्कि एक सूथिंग नंबर है। कई बार सुनते सुनते गीत ज़हन में बसने लगता है। एक और बात कि इस गीत का जो अंत है, उसमें गीत का वॊल्युम धीरे धीरे कम हो कर गीत समाप्त हो जाता है। इस तरह का समापन पुराने दौर में काफ़ी सुनने को मिला है, लेकिन पिछले दो दशकों के गीतों को अगर आप सुनें तो पाएँगे कि गानें झट से समाप्त होते हैं ना कि ग्रैजुअली। तो बहुत दिनों के बाद इस तरह का ग्रैजुअल एंडिंग सुनने को मिला है।

सजीव- बिल्कुल! ऑस्कर मिलने के बाद अब रहमान से काफ़ी उम्मीदें हैं सभी को। तो ज़ाहिर बात है कि वो जल्द बाज़ी में आकर अपने संगीत के स्तर को गिरने नहीं देंगे, और आगे भी नए नए उनके प्रयोग हमें सुनने को मिलेंगे। तुम कितने अंक दोगे इस गीत को?

सुजॉय - मैं दूँगा ४ अंक। आपका क्या ख़याल है?

सजीव - बिलकुल सही मैं भी ४ अंक दूंगा.

सुजॉय- तो चलिए सुनते हैं गीत, इस फ़िल्म से तो मुझे बहुत सारी उम्मीदें हैं, देखते हैं कि फ़िल्म कैसी बनी है। एक बात तो ज़ाहिर है कि अगर हमारी जनता ने फ़िल्म को सर आँखों पर बिठा लिया तो आगे भी इस तरह की ग़ैर पारंपरिक फ़िल्में हमारे यहाँ और भी बनेंगी। क्या पता यह एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म साबित हो जाए!

सजीव- ज़रूर! हमारी शुभकामनाएँ फ़िल्म के निर्माता धिलिन मेहता के साथ है....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, August 24, 2009

पतवार पहन जाना... ये आग का दरिया है....गीत संगीत के माध्यम से चेता रहे हैं विशाल और गुलज़ार.

ताजा सुर ताल (16)

ताजा सुर ताल में आज पेश है फिल्म "कमीने" का एक थीम आधारित गीत.

सजीव - मैं सजीव स्वागत करता हूँ ताजा सुर ताल के इस नए अंक में अपने साथी सुजॉय के साथ आप सब का...

सुजॉय - सजीव क्या आप जानते हैं कि संगीतकार विशाल भारद्वाज के पिता राम भारद्वाज किसी समय गीतकार हुआ करते थे। जुर्म और सज़ा, ज़िंदगी और तूफ़ान, जैसी फ़िल्मों में उन्होने गानें लिखे थे..

सजीव - अच्छा...आश्चर्य हुआ सुनकर....

सुजॉय - हाँ और सुनिए... विशाल का ज़िंदगी में सब से बड़ा सपना था एक क्रिकेटर बनने का। उन्होप्ने 'अंडर-१९' में अपने राज्य को रीप्रेज़ेंट भी किया था। हालाँकि उनके पिता चाहते थे कि विशाल एक संगीतकार बने, उन्होने अपने बेटे को क्रिकेट खेलने से नहीं रोका।

सजीव - ठीक है सुजॉय मैं समझ गया कि आज आप विशाल की ताजा फिल्म "कमीने" से कोई गीत श्रोताओं को सुनायेंगें, तभी आप उनके बारे में गूगली सवाल कर रहे हैं मुझसे....चलिए इसी बहाने हमारे श्रोता भी अपने इस प्रिय संगीतकार को करीब से जान पायेंगें...आप और बताएं ...

सुजॉय - जी सजीव, जाने माने गायक और सुर साधक सुरेश वाडकर ने विशाल भारद्वाज को फ़िल्मकार गुलज़ार से मिलवाया। गुलज़ार साहब उन दिनों अपनी नई फ़िल्म 'माचिस' पर काम कर रहे थे। सोना सोने को पहचान ही लेता है, और गुलज़ार साहब ने भी विशाल के प्रतिभा को पहचान लिया और उन्हे 'माचिस' के संगीत का भार दे दिया। "छोड़ आए हम वो गलियाँ", "चप्पा चप्पा चरखा चले" तथा "पानी पानी रे" जैसे इस फ़िल्म के गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की, और विशाल भारद्वाज रातों रात सुर्खियों में आ गए।

सजीव - कहते हैं ना कि जब तक कोई सफल नहीं हो जाता, उसे कोई नहीं पूछता। 'फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड' मिलने से पहले तक हर कोई विशाल भारद्वाज से मुँह फेरते रहे और जैसे उन्हे अवार्ड मिला, वही लोग शुभकामनायों के साथ गुल्दस्ते भेजने लगे। ख़ैर, ये तो दुनिया का नियम है, और इसलिए विशाल ने भी इसे अपने दिल पे नहीं लिया बिल्कुल अपने ही बनाए उस गीत की तरह "दिल पे मत ले यार"। पर यही चुभन जोश बन कर विशाल भारद्वाज में पनपने लगी, और कुछ कर दिखाने की चाहत सदा उनके मन में रहने लगी। 'माचिस' के अद्‍भुत संगीत से प्रभावित हो कर कमल हासन ने उन्हे 'चाची ४२०' के संगीत का दायित्व दे दिया। उपरवाला जब देता है तब छप्पड़ फाड़ के देता है। राम गोपाल वर्मा ने विशाल को दिया 'सत्या' का संगीत और गुलज़ार ने एक बार फिर अपनी फ़िल्म 'हु तु तु' के संगीत की ज़िम्मीदारी उन्हे सौंपी। और इस तरह से विशाल भारद्वाज का संगीत जलधारा की तरह बहने लगी "छई छपा छई छप्पाक छई" करती हुई।

सुजॉय - हाँ और विशाल भारद्वाज की ताजातरीन प्रस्तुति है फिल्म 'कमीने' का संगीत, जो इन दिनों ख़ूब पसंद किए जा रहा हैं। आज 'ताज़ा सुरताल' में इसी फ़िल्म का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण गीत आप को सुनवा रहे हैं। विशाल की यह फ़िल्म है, ज़ाहिर है संगीत भी उन्ही का है और गानें लिखे हैं उनके चहेते गीतकार गुलज़ार साहब ने। कमाल की बात देखिए, कभी गुलज़ार ने अपनी बनायी फ़िल्म 'माचिस' में विशाल को ब्रेक दिया था, आज वही विशाल जब एक सुप्रतिष्ठित फ़िल्मकार व संगीतकार बन गए हैं, तो उनकी निर्मित फ़िल्म में वही गुलज़ार साहब गानें लिख रहे हैं। तो हाँ, 'कमीने' के जिस गीत की हम आज बात कर रहे हैं उसे इन दिनों आप हर चैनल पर देख और सुन रहे होंगे, "फ़टाक"। सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर और साथियों के गाए इस गीत में आज की एक ज्वलंत समस्या और उसके हल की तरह हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है। HIV virus को काले भंवरे का रूप दे कर इससे होने वाली जान लेवा बिमारी AIDS की रोक थाम के लिए ज़रूरी प्रयासों की बात की गई है इस गीत में। भले ही गीत के फ़िल्मांकन में रेड लाइट अरिया को दर्शाया गया है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी जिस खुले विचारों से यौन संबंधों में बंध रही है, यह गीत सिर्फ़ वेश्यालयो के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए समान मायने रखता है।

सजीव - अगर मैं अपने विचार रखूं, तो इस एल्बम का सबसे उत्कृष्ट गीत है, जहाँ शब्द गायिकी और संगीत सभी कुछ परफेक्ट है. सबसे अच्छी बात है ये है कि ये एक सामान्य प्रेम गीत आदि न होकर आज के सबसे ज्वलंत मुद्दे को केंद्र में रख कर बनाया गया है. मेरे ख्याल से इस गीत एक बहुत बढ़िया माध्यम बनाया जा सकता है AIDS के प्रति लोगों को जगुरुक बनाने में. गुलज़ार साहब के क्या कहने, ग़ालिब के मशहूर शेर "ये इश्क नहीं आसाँ..." का इस्तेमाल गुलज़ार साहब ने शानदार तरीके से किया है कि बस मुँह से वाह वाह ही निकलती है -

"ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
."

गीत के बोल यदि इस गीत की जान है तो गायक सुखविंदर और कैलाश ने इतना बढ़िया गाया है जिससे गीत को एक अलग ही स्तर मिल गया है, ये दोनों ही आज के सबसे हरफनमौला गायकों में हैं जो सिर्फ गले से नहीं दिल से गाते हैं.(सुखविंदर जब कहते हैं "कि आया रात का जाया रे ..." सुनियेगा) और विशाल के संगीत की भी जितनी तारीफ की जाए कम है..."फाटक" शब्द को जिस खूबी से इस्तेमाल किया है वो गीत में आम आदमी की रूचि को बरकरार रखता है साथ ही ये एक प्रतीक भी है इस बिमारी से शरीर और मन पर होने वाली मार का (जैसे ध्वनि हों कोडों की). गीत का फिल्माकन भी भी बेहद शानदार है, एक बार फिर विशाल और उनके नृत्य संयोजक बधाई के पात्र हैं. आपका क्या ख्याल है सुजॉय...

सुजॉय - दोस्तों, आप ने फ़िल्म 'मनचली' का वो गीत तो सुना होगा ना, लता जी की आवाज़ में, "कली कली चूमे, गली गली घूमें, भँवरा बे-इमान, कभी इस बाग़ में, कभी उस बाग़ में"। बे-इमान भँवरे की इसी स्वभाव को बड़ी ही चतुराई से गुलज़ार साहब ने यह संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया है कि भँवरे की तरह फूल फूल पे मत न मंडराओ, यानी कि एकाधिक यौन संबंध मत रखो, और अगर रखो तो सुरक्षा को ध्यान में रख कर। दोस्तों, अब आगे इससे ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप गीत सुनिए। दहेज, शोषण, बाल मज़दूरी, आदि तमाम सामाजिक मुद्दों पर कई गानें बने हैं, लेकिन आज की इस ज्वलंत समस्या पर पहली बार किसी फ़िल्मकार ने बीड़ा उठाया है, जिसकी तारीफ़ किए बिना हम नहीं रह सकते। विशाल भारद्वाज और गुलज़ार साहब को थ्री चीयर्स!!! गीत के बोल कुछ यूं है -

भवंरा भवंरा आया रे,
गुनगुन करता आया रे,
फटाक फटाक.....
सुन सुन करता गलियों से अब तक कोई न भाया रे
सौदा करे सहेली का,
सर पे तेल चमेली का,
कान में इतर का भाया रे....
फटाक फटाक...

गिनती न करना इसकी यारों में,
आवारा घूमे गलियारों में
चिपकू हमेशा सताएगा,
ये जायेगा फिर लौटा आएगा,
फूल के सारे कतरे हैं,
जान के सारे खतरे हैं...
कि आया रता का जाया रे...
फटाक फटाक.....

जितना भी झूठ बोले थोडा है,
कीडों की बस्ती का मकौड़ा है,
ये रातों का बिच्छू है कटेगा,
ये जहरीला है जहर चाटेगा...
दरवाजों पे कुंडे दो,
दफा करो ये गुंडे,
ये शैतान का साया रे....
फटाक फटाक...

ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
ये नैया डूबे न
ये भंवरा काटे न.....

और अब सुनिए ये गीत -




आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.सुखविंदर और कैलाश खेर ने इस गीत से पहले रहमान के संगीत निर्देशन के एक मशहूर दोगाना गाया है, जानते हैं कौन सा है वो गीत ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया नीलम जी ने बधाई...शमिख जी, शैलेश जी, नीलम जी और मंजू जी सभी ने रेटिंग देकर हौंसला बढाया आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Tuesday, August 11, 2009

खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला.....गुलाम अली की मार्फ़त पूछ रहे हैं आनंद बख्शी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३७

दिशा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर आज हाज़िर हैं हम। आज के अंक में जो गज़ल हम आप सबको सुनवाने जा रहे हैं वह वास्तव में तो एक फिल्म से ली हुई है लेकिन हमारे आज के फ़नकार ने इस गज़ल को मंच से इतनी बार पेश किया है कि लोग अब इसे गैर-फ़िल्मी गज़ल मानने लगे हैं। इस गज़ल की गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि एकबारगी तो हमें भरोसा हीं नहीं हुआ कि इसे माननीय अनु मलिक साहब ने संगीतबद्ध किया होगा। फिर हमने अंतर्जाल की खाक छान दी ताकि हमें वास्तविक संगीतकार की जानकारी मिल जाए। ज्यादातर जगहों पर अनु मलिक का हीं नाम था ,लेकिन कुछ लोग अब भी यह दावा करते हैं कि इसे गुलाम अली(हमारे आज के फ़नकार) ने खुद हीं संगीतबद्ध किया है। वैसे हमारी खोज को तब विराम मिला जब गुलाम अली साहब का एक साक्षात्कार हमारे हाथ लगा। उन्होंने उस साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इस गज़ल में संगीत अनु मलिक का हीं है। स्क्रीन इंडिया के एक इंटरव्यू में उनसे जब यह पूछा गया कि अनु मलिक का कहना है कि महेश भट्ट की फ़िल्म "आवारगी" की एक गज़ल "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना बैठा" को उन्होंने हीं कम्पोज़ किया है। क्या आप भी यह मानते हैं? तो इस पर गुलाम अली साहब ने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि "हाँ यह उनकी हीं ओरिजिनल कम्पोजिशन थी। मैने बस उनके लिए हीं नहीं बल्कि नदीम-श्रवण के लिए भी बेवफ़ा फ़िल्म की एक गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। ये उनकी अपनी धुने हैं। दिल मानता तो नहीं, लेकिन जब गुलाम अली साहब ने खुद हीं ऐसा कहा है तो सारी अटकलें यहीं समाप्त हो जाती हैं। तो आप सब अब तक यह समझ हीं गए होंगे कि हमारी आज की गज़ल कौन-सी है और इसे किसने अपनी आवाज़ से सजाया है। इस गज़ल के साथ एक और शख्स का नाम जुड़ा है। वैसे तो हिंदी फ़िल्मों में इनसे बड़ा गीतकार आज तक कोई नहीं हुआ लेकिन गज़लों के मामले में इनका हाथ कुछ तंग है। इस हाल में अगर आपको यह पता चले कि आज की गज़ल इन्हीं की लिखी हुई है तो एक सुखद आश्चर्य होता है। तो चलिए जानकारियों का सफ़र शुरू करते हैं गुलाम अली के साथ।

यह तो सबको पता है कि गुलाम अली साहब ने अपने शुरूआती दिनों में रेडियो लाहौर में गायकी की थी। उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम "एक मुलाकात" में गुलाम अली साहब कहते हैं: असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है. पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे. इसके अलावा उनसे जब पूछा गया कि क्या बड़े गुलाम अली खां साहब ने भी यह कहा था कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे तो उनका जवाब कुछ यूँ था: जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं. उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है. गुलाम अली साहब के अनुसार उनके जीवन और गाने में कोई फ़र्क नहीं है। वे अपने जीवन को अपनी गायकी से अलग करके नहीं देख सकते। उन्हीं के शब्दों में: मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता. मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं. गुलाम अली से जुड़ी और भी कई सारी मज़ेदार बातें हैं,लेकिन वे सब फिर कभी। अभी आनंद बख्शी साहब (जी हाँ यह गज़ल उन्हीं की लिखी हुई है...चौंक गए ना!) की ओर रूख करते हैं।

आनंद बख्शी साहब एक ऐसे शख्स हैं, जिनके गीतों को सुनकर न जाने कितनी पीढियाँ (हमारी पीढी और हमसे एक सोपान पहले की पीढी तो निस्संदेह)जवान हुई हैं। भले हीं इस दौरान हम में से कई लोगों ने उन्हें भुला दिया हो लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं। हम जैसे भूले-भटकों को राह दिखाने के लिए हीं "विनय प्रजापति" जी आनंद बख्शी साहब पर एक ब्लाग चला रहे हैं। मौका मिले तो एक बार आप भी चक्कर लगा के आ जाईयेगा। वैसे आनंद बख्शी के जीवन के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन चूँकि हमें कुछ अलग करने की आदत है, इसलिए हम उनके सुपुत्र "राकेश आनंद बख्शी" की कही कुछ बातें लेकर यहाँ हाज़िर हुए हैं। ये बातें उन्होंने "सुपर मैग्जीन" के साथ इंटरव्यू में कहीं थी। मेरे पिताजी ने १९५७ से २००२ के बीच ८०० से भी ज्यादा फिल्मों के लिए ३५०० से भी ज्यादा गाने लिखे हैं। इतना होने के बावजूद जब भी वो कोई नया गाना लिखने बैठते तो उन्हें हर बार यह लगता था कि कहीं इस बार वे असफ़ल न हो जाएँ। इस डर के बावजूद वे सफ़ल हुए और इसका एकमात्र कारण यह था कि हर बार वे ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करते थे। उन्हें अपनी सफ़लता पर तनिक भी दंभ न था। उन्होंने मुझे सिखाया कि "खुद पर संदेह होना या फिर आत्म-विश्वास की कमी आम चीजें हैं। इनसे कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि ये सारी चीजें हीं हमें ताकत देती हैं।" उनका मानना था कि "हिट फ़िल्म बनाना या हिट स्क्रिप्ट लिखना बड़ी बात नहीं है। हिट और फ्लाप तो आते जाते रहते हैं, हमें इन पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इनके बाद या इनके दौरान आपका औरों के साथ कैसा बर्ताव रहा है, आप खुद किस तरह के इंसान बन गए हैं या बन रहे हैं और आपने कैसे दोस्त बनाए हैं।" मेरे पिताजी ने अपने डर पर काबू पाने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं जिनका इस्तेमाल सुभाष घई साहब ने अपनी एक फ़िल्म में भी किया है। उस कविता या कहिए उस गीत का मुखड़ा इस तरह था:

मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा,
मैं कोई हर्फ़ नहीं जो बदल जाऊँगा,
मैं तो जादू हूँ, मैं जादू हूँ, चल जाऊँगा।


कहते हैं कि आनंद बख्शी ने जब "आपकी कसम" के लिए "ज़िंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते" लिखा था तो जावेद अख्तर साहब उनके घर तक चले गए थे और उनसे उनकी कलम की माँग कर दी थी। आनंद बख्शी साहब ने कहा कि आपको अपनी कलम देकर यूँ तो मैं बहुत खुश होऊँगा लेकिन क्या करूँ मुझे यह कलम किशोर कुमार ने गिफ़्ट में दी है। आनंद बख्शी साहब नए फ़नकारों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। सुखविंदर सिंह उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि "चूँकि मैं खुद एक संगीतकार हूँ इसलिए जब मैं दूसरों के लिए गाता हूँ तो अपना इनपुट दिए बिना रहा नहीं जाता और इसलिए गाना दिल से नहीं कर पाता। बख्शी साहब ने एक बार मुझे कहा था कि जब तुम स्टुडियो में एक गायक की हैसियत से आओ तो अपने अंदर बैठे संगीतकार को घर छोड़कर हीं आना और तब से मैं उनकी इस बात को फौलो कर रहा हूँ। और अब मुझे कोई दिक्कत नहीं आती।" तो ऐसे गुणी थे हमारे आनंद बख्शी साहब। उन्हें याद करते हुए चलिए हम अब सुनते हैं आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुद्दत के बाद उस ने जो की ___ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..


आपके विकल्प हैं -
a) करम, b) लुत्फ़, c) मेहर, d) ख़ुशी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ज़ब्त" और शेर कुछ यूं था -

ज़ब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...

फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले पकड़ा कुलदीप जी ने। उन्होंने इस शब्द पर दो शेर भी पेश किए जिनके शायर के बारे में उन्हें जानकारी नही थी। ये रहे दो शेर:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सरे बज्म ये क्या हुआ
मेरी आंख कैसे छलक गयी मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जनून को ज़ब्त सीखा लूं तो फिर चले जाना
में अपनेआप को संभाल लूं तो फिर चले जाना

इन दो शेरों के साथ-साथ उन्होंने परवीन शाकिर, हफ़िज जौनपुरी, मोहसिन नकवी,शकील बदायूंनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शेरो भोपाली, शहजाद अहमद और इब्राहीम जौक़ के भी शेर पेश किए। अब चूँकि सारे शेर यहाँ हाज़िर नहीं किए जा सकते, इसलिए ज़ौक साहब के इस शेर के साथ कुलदीप जी की टिप्पणियों को इज़्ज़त बख्शते हैं। वैसे भी कुलदीप जी ने इस बार वही शेर पेश किए जिसमें "ज़ब्त" शब्द की आमद थी। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार की शोभा बढाने वाले ज़ौक साहब का शेर कुछ यूँ है:

ना करता ज़ब्त मैं गिरिया तो ऐ "जौक" इक घडी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के गर्क आसमान होता

शामिख साहब कोई बात नहीं...देर आयद दुरूस्त आयद। जनाब असदुल्लाह खान ग़ालिब के इस शेर के साथ आपने जबरदस्त वापसी की है:

ऐ दिले-ना-आकिबतअंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त

फ़िराक़ साहब की पूरी गज़ल वैसे तो हमें खूब भायी लेकिन क्या करें पूरी गज़ल यहाँ पेश नहीं कर सकते इसलिए इसी शेर के साथ काम चला लेते हैं:

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

रचना जी, यह क्या, क्या कह रही हैं आप। हमारी इस महफ़िल में आने वाला कोई भी शख्स बड़ा या छोटा नहीं है। हम सब तो गज़लों के मुरीद हैं और इस नाते गज़ल-भाई या गज़ल-बहन हुए। तो फिर भाई-बहनों में क्या ऊँच-नीच। आप इसी तरह अपने शेरों के साथ हमारी महफ़िल की शोभा बढाते रहिए:

सारे गम जब्त करलूं एक सहारा तो दिया होता
चल पड़ता तेरी रह में एक इशारा तो दिया होता

दर्पण जी, अब क्या कहें हम.....चूँकि आप गुलज़ार साहब के बहुत बड़े फ़ैन हैं इसलिए इस नाते तो हमारे दोस्त हुए। फिर आपको चैलेंज क्यों देना। हम तो यह चाहेंगे कि आप गुलज़ार साहब के बारे में अपना कुछ अनुभव लिख कर आवाज़ को hindyugm@gmail.com पर मेल कर दें। वह क्या है कि इस रविवार को हम गुलज़ार साहब पर एक आलेख पेश करने वाले हैं, उनका जन्मदिन जो आ रहा है। आशा करते हैं कि आपकी इंट्री ज़रूर आएगी।

मनु जी, यह क्या.. आप आएँ और दर्पण जी को पहचान कर चल दिए। आपके शेर कहाँ गए?

मंजु जी, आपकी पंक्तियाँ भी खूबसूरत हैं:

दिल की बज्म में तेरी वफा का राज था .
जब्त कर लिया राज तूने
दिया बेवफा का साथ था

सुमित जी, आप देर हो गए, कोई बात नहीं, आए तो सही। यह रहा आपका शेर:

कमाल ऐ जब्त ऐ मोहब्बत इसी को कहते है,
तमाम उम्र जबान पर न उनका नाम आये।

हमारे कुछ उस्ताद महफ़िल में दिखे हीं नहीं जैसे अदा जी, दिशा जी, पूजा जी, नीलम जी। वहीं शरद जी आए तो लेकिन उन्होंने कोई शेर पेश नहीं किया। आखिर ऐसी नाराज़गी क्यों। उम्मीद करते हैं कि इस बार आप सब टिप्पणी करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, July 15, 2009

आजा आजा दिल निचोड़े....लौट आई है गुलज़ार और विशाल की जोड़ी इस जबरदस्त गीत के साथ

ताजा सुर ताल (9)

रसों पहले मनोज कुमार की फिल्म आई थी- "रोटी कपडा और मकान", यदि आपको ये फिल्म याद हो तो यकीनन वो गीत भी याद होगा जो जीनत अमान पर फिल्माया गया था- "हाय हाय ये मजबूरी...". लक्ष्मीकांत प्यारेलाल थे संगीतकार और इस गीत की खासियत थी वो सेक्सोफोन का हौन्टिंग पीस जो गीत की मादकता को और बढा देता है. उसी पीस को आवाज़ के माध्यम से इस्तेमाल किया है विशाल भारद्वाज ने फिल्म "कमीने" के 'धन ताना न" गीत में जो बज रहा है हमारे ताजा सुर ताल के आज के अंक में. पर जो भी समानता है उपरोक्त गीत के साथ वो बस यहीं तक खत्म हो जाती है. जैसे ही बीट्स शुरू होती है एक नए गीत का सृजन हो जाता है. गीत थीम और मूड के हिसाब से भी उस पुराने गीत के बेहद अलग है. दरअसल ये धुन हम सब के लिए जानी पहचानी यूं भी है कि आम जीवन में भी जब हमें किसी को हैरत में डालना हो या फिर किसी बड़े राज़ से पर्दा हटाना हो, या किसी को कोई सरप्राईस रुपी तोहफा देना हो, तो हम भी इस धुन का इस्तेमाल करते है, हमारी हिंदी फिल्मों में ये पार्श्व संगीत की तरह खूब इस्तेमाल हुआ है, शायद यही वजह है कि इस धुन के बजते ही हम स्वाभाविक रूप से गीत से जुड़ जाते हैं. "ओमकारा" और "नो स्मोकिंग" के बाद विशाल भारद्वाज और गुलज़ार साहब की हिट जोड़ी लौटी है इस गीत के साथ -

आजा आजा दिल निचोड़े,
रात की मटकी फोडें,
कोई गुड लक् निकालें,
आज गुल्लक तो फोडें...


सुखविंदर की ऊर्जा से भरी हुई आवाज़ को सुनकर यूं भी जोश आ जाता है, साथ में जो गायक हैं उनका चयन एक सुखद आश्चर्य है, ये हैं विशाल शेखर जोड़ी के विशाल दादलानी. जब एक संगीतकार किसी दूसरे संगीतकार की आवाज़ का इस्तेमाल अपने गीत के लिए करे तो ये एक अच्छा चिन्ह है.

दिल दिलदारा मेरा तेली का तेल,
कौडी कौडी पैसा पैसा पैसे का खेल....
धन ताना ताना न न.....


गुलज़ार साहब अपने शब्द चयन से आपको कभी निराश नहीं करते, बातों ही बातों में कई बड़े राज़ भी खोल जाते हैं वो जिन्दगी के. गौर फरमाएं -

आजा कि वन वे है ये जिन्दगी की गली
एक ही चांस है....
आगे हवा ही हवा है अगर सांस है तो ये रोमांस है....
यही कहते हैं यही सुनते हैं....
जो भी जाता है जाता है, वो फिर से आता नहीं....

आजा आजा....

संगीत संयोजन विशाल का अद्भुत है जो पूरे गाने में आपको चूकने नहीं देता. बेस गीटार की उठती हुई धुन, और ताल का अनोखा संयोजन गीत को ऐसी गति देता है जो उसके मूड को पूरी तरह जचता है -

कोई चाल ऐसी चलो यार अब कि समुन्दर भी
पुल पे चले,
फिर मैं चलूँ उसपे या तू चले शहर हो अपने पैरों तले...
कई खबरें हैं, कहीं कब्रे हैं,
जो भी सोये हैं कब्रों में उनको जगाना नहीं.....

आजा आजा....


शहर की रात और सपनों की उठान, मस्ती और जीने की तेज़ तड़प, बहुत कम समय में बहुत कुछ पाने की ललक, ये गीत इस सभी जज्बातों को एकदम सटीक अभिव्यक्ति देता है. आर डी बर्मन साहब के बाद यदि कोई संवेदनात्मक तरीके गुलज़ार साहब की काव्यात्मक लेखनी को परवाज़ दे सकता है तो वो सिर्फ और सिर्फ विशाल भारद्वाज ही हैं. ख़ुशी की बात ये है कि फिल्म "कमीने" के संगीत ने इस जोड़ी की सफलता में एक पृष्ठ और जोड़ दिया है, अन्य गीतों का जिक्र आगे, अभी सुनते हैं फिल्म "कमीने" से ये दमदार गीत.



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. विशाल के संगीत निर्देशन में एक सूफी गीत दिलेर मेहंदी ने गाया है, गुलज़ार साहब का लिखा. क्या याद है आपको वो गीत ? और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, January 4, 2009

"हौले हौले" से "जय हो"...- सुखविंदर सिंह का जलवा

सुनिए गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित फ़िल्म स्लमडोग मिलनिअर का जबरदस्त गीत "जय हो..."

आवाज़ के टीम और श्रोताओं ने मिल कर जिस गीत को साल २००८ का सरताज गीत चुना वो है फ़िल्म "रब ने बना दी जोड़ी" का "हौले हौले..." . हौले हौले से जादू बिखेरने वाले इस गीत को गाया है "छैयां छैयां" से रातों रातों सुपर सिंगर बने सुखविंदर सिंह ने. तब से अब तक हर साल सुखविंदर अपने किसी न किसी गीत के माध्यम से टॉप सूची में रहते ही हैं. जहाँ इसी साल फ़िल्म टशन में उनका गाया "दिल हारा रे..." भी हमारी सूची में अपनी जगह बनने में कामियाब रहा वही बीते सालों पर नज़र डालें तो "दर्द-ऐ-डिस्को", "चक दे इंडिया" और ओमकारा के शीर्षक गीत के अलावा इसी फ़िल्म का "बीडी जलाई ले" खासा लोकप्रिय हुआ था. पर कई मायनों में अगर हम देखें तो "हौले हौले" उनकी परिचित शैली से बिल्कुल अलग तरह का गीत है और पहली बार सुनने पर यकीं ही नही होता कि ये वाकई सुखविंदर का गीत है.


और अब हॉलीवुड के सबसे बड़े निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म के लिए भी वो गा रहे हैं. ख़ुद सुखविंदर के शब्दों में "स्टीवन स्पीलबर्ग की टीम ने मुझसे संपर्क किया और ये गीत गाने की गुजारिश की, ये एक पारंपरिक लोक गीत है जो कच्छ गुजरात की मिटटी का है और ये गीत जीवन के उत्सव की बात करता है, वैसे मेरा हॉलीवुड कनेक्शन तो "स्लमडोग मिलनिअर" से ही शुरू हो चुका था जहाँ मैंने रहमान जी का स्वरबद्ध किया और गुलज़ार जी का लिखा "जय हो" गीत गाया था. ये गीत मेरा ख़ुद का बहुत पसंदीदा है, मैं जब भी इसे सुनता हूँ, मुस्कुराने लगता हूँ..."

गौरतलब है कि रहमान को इसी फ़िल्म के लिए गोल्डन ग्लोब का नामांकन मिला है. रहमान के बारे में सुखविंदर कहते हैं -"वो एक जीनिअस हैं जिन्होंने भारतीय संगीत को विश्व मंच दिया है. स्वभाव से भी वो बहुत शांत और जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं, उन्हें कविता से प्रेम है और वह शख्स संगीत खाता है संगीत पीता है और संगीत से ही साँस लेता है, उनके रोम रोम में संगीत है और उनके जेहन में दिन रात बस संगीत का जनून छाया रहता है..."

बहरहाल इस नए साल में हम सब तो यही चाहेंगें कि रहमान साहब अपनी इस फ़िल्म के लिए गोल्डन ग्लोब जीते. ये भारतीय संगीत के लिए एक बड़ी घटना होगी. सुखविंदर भी इस साल अपने नए गीतों से हम सब को चकित करते रहें. आने वाली फ़िल्म "बिल्लू बार्बर" में उनके गाये गीत श्रोता जल्दी ही सुनेंगें, फिलहाल हम आपको सुनवाते हैं, गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित फ़िल्म "स्लमडोग मिलनिअर" से सुखविंदर का गाया गीत "जय हो...". कहते हैं जीनिअस के काम पहली बार में कम समझ आता है, पर हमारे शब्दों पर यकीन करें इस गीत को धैर्य के साथ ४-५ बार सुनें और अगर इसका जादू आपके सर चढ़ कर न बोले तो कहियेगा. तो सुनिए और दुआ कीजिये कि "जय हो" हमारे संगीत कर्णधारों की विश्व मंच पर भी.



Thursday, January 1, 2009

सरताज गीत 2008 - आवाज़ की वार्षिक गीतमाला में

वर्ष 2008 के श्रेष्ट 50 फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या 10 से 01 तक

पिछले अंक में हम आपको 20वें पायदान से 11वें पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

10वें पायदान - है गुजारिश - फ़िल्म गजिनी

अगर इस गीत को आप ध्यान से सुनें तो तो शुरू में और बीच बीच में एक गुनगुनाहट (हम्मिंग) सुनाई देती है, जो सोनू निगम की याद दिलाते हैं, जी हाँ ये हिस्सा सोनू ने ही गाया है, दरअसल इस धुन पर रहमान ने एक गीत बनाया था जिसे सोनू की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था, पर अफ़सोस वो फ़िल्म नही बन पायी, जब फ़िल्म गजिनी के लिए इसी धुन पर जब प्रसून ने नए शब्द बिठाये, तब सोनू को फ़िर तलब किया गया, पर निगम उन दिनों विदेश में होने के कारण रिकॉर्डिंग के लिए उपलब्ध नही हो पाये तो रहमान ने जावेद अली से गीत को मुक्कमल करवाया पर हम्मिंग सोनू वाली (जो मूल गाने में थी) ही उन्होंने रहने दी. यकीं न हो गीत दुबारा सुनें.



9वें पायदान - इन लम्हों के दामन में - फ़िल्म -जोधा अकबर
एक बार रहमान का जादू है यहाँ, कितना खूबसूरत है ये गाना ये आप सुनकर ही जान पाएंगे. गीत में विविध भाव हैं, उतार चढाव हैं, जिसे मधु श्री और सोनू निगम ने अपनी आवाजों से बखूबी पेश किया है, शब्दों से कमाल किया है एक बार जावेद साहब ने. जावेद साहब ने एक तरफ़ इस पीरीअड फ़िल्म के लिए बोल लिखे वहीँ रॉक ऑन के लिए नए ज़माने के गीत लिखे. वाकई उनकी रैंज कमाल की है


8वें पायदान - डांस पे चांस- फ़िल्म- रब ने बना दी जोड़ी

अब अगर आपको नाचना नही आता तो फ़िक्र करने कि कोई जरुरत नही. बस ये मदमस्त गीत सुनिए और 5 मिनट में नाचना सीख जाईये, गीत की खासियत इसके अलहदा से सुनिए देते बोल ही हैं और सुनिधि की झूमा देने वाली आवाज़ भी, उस पर बीच बीच में देसी ठसका लिए आते हैं लाभ जंजुआ. सलीम सुलेमान ने इस फ़िल्म एक लम्बी छलांग लगायी है...आप भी सीखिए नाचने के गुर इस गीत को सुन.


7वें पायदान - तू मुस्कुरा - फ़िल्म - युवराज
शुक्र है सुनने को मिली हमारी अलका की भी आवाज़ टॉप १० में आकर, दरअसल नए कलाकारों की भीड़ में पुराने गायक गायिकाओं की आवाज़ कहीं सुनने को मिले अचानक तो बेहद सुखद लगता है, और इसी गीत के साथ पहली बार इस गीतमाला में शामिल हुए हैं हमारे गुलज़ार साहब भी. सुंदर बोल पर रहमान का मधुर संगीत और जावेद अली के साथ अलका याग्निक की मन को छूती ये आवाज़ यही है फ़िल्म युवराज के "तू मुस्कुरा" गीत की खूबियाँ.


6वें पायदान - मर जावां- फ़िल्म- फैशन

इरफान सिद्दीक का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं, उनके लिखे इस गीत में और सलीम सुलेमान के रचे इस संगीत में मिटटी की खुशबू है. स्क्रीन पर इसे एक फैशन शो का हिस्सा दिखाया गया है. जाहिर सी बात, दृश्य प्राथमिक थे और गीत को सिर्फ़ उसे सहयोग देना था पर श्रुति पाठक के गाये इस गीत ने संगीत प्रेमियों पर ऐसा जादू किया कि ये फ़िल्म का सबसे लोकप्रिय गीत बन कर उभर कर सामने आया. निश्चित ही इस गीत लंबे समय तक संगीत के चाहने वालों के दिल में अपनी जगह बनाये रखने की समर्थता है.....मर जावां ...


5वें पायदान - कहीं तो कहीं तो - फ़िल्म - जाने तू या जाने न

इस फ़िल्म की और इसके संगीत की हम पहले भी इस गीतमाला में खूब चर्चा कर चुके हैं, ये पांचवां गीत है इस फ़िल्म का जो हमारे टॉप 50 का हिस्सा है, और किसी फ़िल्म को ये सम्मान नही मिला जोधा अकबर के हालाँकि 4 गीत हैं. पर फ़िर भी जाने तू या जाने न के हर गीत युवा प्रेमियों के दिल की बात कहता प्रतीत होता है. पांचवीं पायदान पर इस फ़िल्म का सबसे मीठा और सबसे खूबसूरत गीत है. ज़रा सुनिए रशीद अली और वसुंधरा दास ने कितना डूब कर गाया है इसे. "कहीं तो कोई तो है नशा तेरी मेरी हर मुलाकात में...." जैसे बोल लिखकर अब्बास टायरवाला ने साबित किया है वो सिर्फ़ चालू किस्म के नही ज़ज्बाती गीत भी बखूबी लिख सकते हैं....सुनिए....और डूब जाईये ...


चौथे पायदान - आज वे हवाओं में - फ़िल्म - युवराज

आवाज़ का दरिया हूँ, बहता हूँ मैं नीली रातों में, मैं जागता रहता हूँ नींद भरी झील सी आँखों में....बताईये ज़रा ऐसे बोल किसकी निशानी है, जी हाँ गुलज़ार साहब के कलम की बूँद बूँद छाप है इस शानदार गीत में, शुरू का अलाप लिया है ख़ुद रहमान ने बाद का मोर्चा संभाला है बेन्नी दयाल और श्रेया घोषाल ने पर ये गुलज़ार साहब के शब्द ही हैं जो इस गीत को बरसों बाद भी हमें गुनगुनाने के लिए मजबूर करेगा. ये रहमान का अन्तिम गीत है इस गीतमाला में तो पेश हैं ये नग्मा उसी संगीत सम्राट के नाम... आजा वे हवाओं में...


तीसरे पायदान - तेरी और - फ़िल्म - सिंग इस किंग
राहत साहब की उडानों वाली आवाज़ को कहीं कहीं थाम कर रोकती श्रेया की मधुर पुकार..."एक हीर थी और एक राँझा...कहते हैं मेरे गाँव में...", गीत में प्रीतम ने बेहद भारतीय वाद्यों से कमाल का समां बांधा है, ये सच है चोरी के आरोपों ने प्रीतम की छवि ख़राब की है पर इस संगीतकार में गजब की प्रतिभा भी है ख़ास कर जब ये देसी अंदाज़ के गीत बनाते हैं तो ऐसा मौहौल रच देते हैं की सुनने वाला बस खो सा जाता है याद कीजिये फ़िल्म जब वी मेट का "नगाडा" गीत, ये गीत भी बेहद खूबसूरत है. मयूर पुरी ने लिखे हैं इसके बोल, और यकीनन बहुत कमाल के शब्द चुने हैं उन्होंने. ऑंखें बंद कर सुनें राहत फतह अली खान को गाते हुए...तेरी ओर...


दूसरे पायदान - रॉक ऑन - फ़िल्म -रॉक ऑन

कहते हैं मात्र 5 दिन साथ रह कर शंकर, एहसान, लोय, फरहान, और जावेद साहब ने मिलकर इस फ़िल्म 9 ट्रेक रच डाले. जिसमें से 8 ही एल्बम में शामिल हो पाये. 6 गीतों को स्वर दिया ख़ुद फरहान ने. दरअसल रॉक संगीत को भारत में स्थापित करने की कोशिश इससे पहले भी कई बार हुई है, पर ख़ुद के रचे गानों में दम न होने के जब रॉक बैंड नाकाम होकर कवर वर्जन गाने लगे तो कहा जाने लगा कि हिंदुस्तान में रॉक का कोई भविष्य नही. पर इस फ़िल्म के गीतों ने हिन्दी रॉक संगीत को एकदम से रोक्किंग बना दिया है. दरअसल रॉक संगीत में कविता का बहुत बढ़िया इस्तेमाल हो सकता है, जैसा कि इस फ़िल्म के कई गीतों में देखने को मिला है तो आगे भी इस तरह के प्रयोग होते रहें तो अच्छा है. ये गीत मन में एक नई आशा भरता है. अपने ख्वाबों को दबाना छोड़ दें और खुल कर पंख फैलाएं ऊंची उडानों के लिए.....शायद नए साल पर रॉक ऑन आपको यही संदेश देना चाहता है....आपके सपनें है आपके अपने..रॉक ऑन .



सरताज गीत २००८ - हौले हौले - फ़िल्म -रब ने बना दी जोड़ी

आम आदमी की जीवनचर्या और उसकी सोच को परिभाषित करता है ये हमारा नम्बर 1 गीत "हौले हौले सब कुछ होता है...तू सब्र तो कर सब्र का फल मीठा होता है". अब आप कहेंगे ये तो पुरानी सीख है, पर दोस्तों दरअसल इस गीत के माध्यम से ये गीत सही समय पर आया है, अंधी दौड़ में भागते हर मध्यम वर्गीय आदमी ने अचानक जल्द से जल्द अमीर बनने का सपना देखा. बाज़ार बदला बहुत से दिल बैठ गए....सेंसेक्स की मार से घायल आम आदमी जो अपने मेहनत की जमा पूँजी को डूबता देख रहा था उसके लिए राहत और सबक बन कर आया जयदीप सहानी का लिखा ये गीत. "चक दे" के बाद जयदीप का ये एक और बड़ा गीत है जो शीर्ष स्थान तक पहुँचा है. संगीत सलीम सुलेमान का और आवाज़ है सुखविंदर सिंह जिन्होंने इस गीत को गाकर अपने सभी आलोचकों के मुँह बंद कर दिए हैं....सरताज गीत 2008 ...हौले हौले से सुनिए ज़रा....






साल 2008 के 5 गैर फिल्मी गीत -

5. आसमान - के के
4. आवेगी या नही - रब्बी शेरगिल
3. दौलत शोहरत - कैलाश खेर
2. सोचता हूँ मैं - सोनू निगम
1. सांवरे - रूप कुमार राठोड


सुनिए इन गीतों को भी -



वर्ष २००९ भी इसी प्रकार संगीतमय गुजरे इसी कमाना के साथ हम विदा लेते हैं, नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ. यदि आपने आज की हमारी विशेष प्रस्तुति नही सुनी तो यहाँ सुनिए.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ