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Tuesday, August 21, 2012

एक सुरीला दौर जो बीतकर भी नहीं बीता -राजेश खन्ना


सुनिए काका को श्रद्धान्जली देने को तैयार किया गया हमारा खास पॉडकास्ट  


मूल स्क्रिप्ट 

यह पोडकास्ट समर्पित है हिन्दी फिल्मों के निर्विवादित पहले सुपरस्टार को। इनकी मक़बूलियत के किस्से परिकथाओं और जनश्रुतियों की तरह दुनिया में मशहूर हैं। हमें उम्मीद और पक्का यकीन है कि हमें इनका नाम बताने की ज़रूरत न होगी। चलिए तो नाम पर पर्दा रहते हुए हीं इनके बारे में दो-चार बातें कर ली जाएँ। इन महानुभाव का जन्म २९ दिसंबर १९४२ को ब्रिटिश इंडिया के बुरेवाला में हुआ था। जब जन्म हुआ तो नाम भी रखना था तो नाम रखा गया जतिन अरोड़ा। लेकिन ज्यादा दिनों तक न जतिन रहा और न हीं अरोड़ा। १९४८ में जब इनके माता-पिता इन्हें अपने रिश्तेदारों चुन्नी लाल खन्ना और लीलावती खन्ना को सौंपकर पंजाब के अमृतसर चले गए तो ये अरोड़ा से खन्ना हो लिए। इनके नए माता-पिता बंबई के गिरगांव के नजदीक ठाकुरगांव में रहते थे। यही इनका भी लालन-पालन और बढना-पढना हुआ। इन्होंने स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढाई की अपने बचपन के दोस्त रवि कपूर के साथ जो आगे चलकर जितेंद्र कहलाए। ज्यों-ज्यों इनकी उम्र बढती गई, इन्हें अपने सही हुनर की पहचान और परख की ज़रूरत महसूस हुई और ये एक जुनून के साथ अदाकारी की ओर हो लिए। उस वक़्त थियेटर का रूतबा था तो इन्होंने भी कई सारे नाटक किए, रंगमंच की शोभा बढाई। रंगमंच ने इनकी अदाकारी में इतने रंग भर दिए और इन्हें इतना मुखर कर दिया कि जब फिल्मों में इन्हें पहला मौका मिलना था तो इन्होंने रूखे-सूखे संवाद को अपने थियेटर के अंदाज़ से ऐसा रंगीन कर दिया कि सारे चयनकर्ता हक्के-बक्के रह गए।

 बात करते हैं जतिन खन्ना के रंगमंच के दिनों की। फिल्मों में आने से पहले इन्होंने अपने आप को रंगमंच पर खूब मांजा। इन्होंने कई नाटक मंचित किए। वार्डन रोड के भूलाभाई देसाई मेमोरियल इंस्टीयूट में ये नाटकों के रिहर्सल करते थे। उन्हीं दिनों गीताबाली ने वहां अपना दफ्तर खोला था। वह पंजाबी फिल्म 'रानो' की योजना बना रही थीं। गीता बाली ने इन्हें अपनी फिल्म में एक भूमिका दी और यह भविष्यवाणी भी कर दी कि तुम एक दिन बड़े स्टार बनोगे। इन्हें यकीन नहीं हुआ। ये ज्योतिषी से मिले। ज्योतिषी ने बताया कि अभिनेता के तौर पर इनका कोई भविष्य नहीं है। हां, अगर ये लोखंड (लोहा) का कारोबार करें तो सफल हो सकते हैं। ज्योतिषी की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और अभिनेता जतिन खन्ना का लोहा सभी ने माना।

 समय बीतता गया और देखते-देखते १९६५ आ गया। तब जतिन खन्ना महज २३ साल के थे। उस वक़्त "युनाइटेड प्रोड्युसर्स" जिसमें शीर्ष के १२ फिल्म निर्माता शामिल थे, ने एक ‘ऑल इंडिया टैलेंट हंट आयोजित किया था। निर्णायकों में चेतन आनंद, जी पी शिप्पी , नासिर हुसैन जैसे मंझे हुए निर्माता-निर्देशक थे। इस टैलेंट हंट में दस हज़ार से भी ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। जतिन खन्ना ने सबको पछाड़ते हुए जीत हासिल की। कहते हैं कि हारने वालों में विनोद मेहरा भी थे.. खैर वह कहानी फिर कभी। हाँ तो इस जीत के साथ यह निश्चित हो गया था कि जतिन खन्ना एक के बाद एक १२ निर्देशकों की फिल्मों में नज़र आएँगे। उस वक़्त यह जुमला बहुत मशहूर हुआ था कि जहाँ दूसरे नवोदित कलाकार फटे कपड़े और टूटी चप्पल में संघर्ष कर रहे थे, वहीं जतिन खन्ना का स्ट्रगल इनकी "इम्पाला" गाड़ी में होता था। हाँ तो जब फिल्मों का दौर शुरू होना था, तब इनके शुभचिंतकों को महसूस हुआ कि जतिन नाम "खास फिल्मी" नहीं लगता, यह किसी व्यावसायिक घराने से जुड़े इंसान का नाम लगता है, इसलिए इन्हें सलाह दिया गया कि जतिन की जगह ये "फिल्मों के किसी आम किरदार" का नाम रखे लें और तब "जतिन" "राजेश" में तब्दील हो गया। इन शुभचिंतकों में या तो इनके अपने चाचा के०के० तलवार थे या फिल्म निर्माता जी०पी०सिप्पी।

 जतिन राजेश कैसे हुए ये तो हम जान गए लेकिन राजेश काका कैसे हुए, चलिए यह भी जान लिया जाए। ज्यादातर लोगों को यह गलतफहमी रहती है कि राजेश खन्ना को "काका" यानि कि "चाचा" के नाम से संबोधित किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। पंजाबी में काका का मतलब होता है छोटा नन्हा-सा बच्चा। जब ये फिल्मों में आए तब इनकी उम्र बहुत हीं कम थी। इसलिए इनके सहकलाकारों और इनके निर्माता-निर्देशकों ने इन्हें प्यार से काका कहना शुरू कर दिया। फिर आगे क्या हुआ, यह तो इतिहास है। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन "काका" की पत्नी यानि कि डिंपल कपाड़िया भी इन्हें काका हीं कहा करती थीं, वैसे हीं जैसे दिलीप कुमार को शायरा बानो आज भी "साहब" हीं कहती हैं।

 राजेश खन्ना की सबसे पहली फिल्म आई "आखिरी खत"। इस फिल्म के निर्देशक थे चेतन आनंद। यह फिल्म १९६७ के ४०वें आस्कर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के श्रेणी में भेजी गई थी। आखिरी खत के बाद रविन्द्र दवे की "राज़" आई। समयक्रम के हिसाब से तो "राज़" बाद में आई थी, लेकिन "द हिन्दु" को दिए एक साक्षात्कार में राजेश खन्ना ने कहा था कि "भले हीं आखिरी खत मेरी पहली फिल्म थी, लेकिन पहला ब्रेक मुझे रविन्द्र दवे ने दिया था अपनी फिल्म राज़ में। इस फिल्म में मेरे साथ बबीता थीं, जो उस समय बहुत हीं मशहूर थीं। चूँकि मैं पहली बार कैमरे के सामने थे, इसलिए मेरे अंदर का कलाकार खुल कर बाहर आने में वक़्त ले रहा था। मैंने अपनी संवाद अदायगी तो दो-चार टेक में सही कर ली, लेकिन मेरा बडी लैंग्वेज और मेरा मूवमेंट अभी भी गलत हीं जा रहा था। तब रविन्द्र दवे ने मुझे सीन सही से समझाया और मेरे चलने के तरीके को परफेक्ट कर दिया।" "राज़" के बाद नासिर हुसैन की बहारों के सपने आई। बदकिस्मती से ये तीनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पे फ्लॉप हो गई। तीन लगातार फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद निश्चित था कि निर्माता इनसे कन्नी काटने लगेंगे और वही हुआ, वही होता रहा.. जब तक अराधना नहीं आई थी।

 आराधना १९४६ की हॉलीवुड की फिल्म "टू इच हिज़ ओन" की रीमेक थी। कहते हैं कि अराधना जब आठ रील तक फिल्मा ली गई थी, तब तक इसके निर्देशक शक्ति सामंता काका की नाकामयाबी से इतने परेशान हो चले थे कि उन्होंने काका को फिल्म से निकाल देने तक का ख्याल कर लिया था। ऐसा इसलिए क्योंकि सारे वितरकों ने इस फिल्म से खुद को दूर करने की घोषणा कर दी थी। लेकिन फिर न जाने क्या हुआ, शक्ति सामंता को अपने मुख्य अभिनेता पर यकीन हो आया और उन्होंने इस फिल्म में न एक सिर्फ़ एक बल्कि दो-दो काका हमें दिए। कहते हैं कि जिस दिन फिल्म रीलिज हुई उस दिन दोपहर बारह बजे तक सिनेमा हॉल्स लगभग खाली थे, लेकिन शाम तक माउथ पब्लिसिटी इतनी फैली कि हॉल्स के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लगाने पड़े। फिर तो राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर का एक फिल्म का सफर पूरी १२ फिल्मों तक चलता रहा। इस फिल्म से जुड़ी कुछ मज़ेदार कहानियाँ हैं। एक तो ये कि "रूप तेरा मस्ताना" हिन्दी फिल्मों का ऐसा पहला गाना है जो एक हीं टेक में फिल्माया गया था। इस फिल्म का एक और गाना "मेरे सपनों की रानी" सबको ज़रूर याद होगा। इस गाने की खासियत यह है कि काका की जीप और शर्मिला टैगोर की ट्वाय ट्रेन भले हीं एक साथ चलती दिखती हैं लेकिन दोनों का फिल्मांकन अलग-अलग जगहों पर हुआ था। शर्मिला उस वक़्त सत्यजीत रे की फिल्म कर रही थीं, इसलिए वो दार्जिलिंग न जा सकी और उनके दृश्य बंबे में हीं फिल्माए गए। काका अपनी धुन के पक्के थे इसलिए वे सुजीत कुमार को साथ लेकर निकल लिए दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की सैर करने।

 काका की एक और जो बहुत मक़बूल फिल्म थी वह थी "हाथी मेरे साथी"। इस फिल्म के निर्माता थे तेवार फिल्म्स के चिनप्पा तेवार, जो कि अपनी फिल्मों में जानवरों के इस्तेमाल के लिए मशहूर थे। यह पहली फिल्म थी जिसमें सलीम-जावेद ने पटकथा लिखी थी। और इसका सारा श्रेय काका को जाता है। बकौल जावेद साहब: "एक दिन राजेश खन्ना सलीम साहब के पास आएँ और उन्होने कहा कि मिस्टर तेवार ने उन्हें बहुत बड़ा साइनिंग अमाउंट दिया है, जिससे वे अपने बंगले आशिर्वाद की किश्तें चुका पाएँगे। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म की स्क्रिप्ट बेहतरीन क्या, अच्छी होने से भी कोसों दूर है। इसलिए वे चाहते थे कि हम दोनों सलीम और जावेद मिलकर इस पर काम करॆं और उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि हमें पैसों के साथ-साथ क्रेडिट भी पूरी मिले।" इस फिल्म से जुड़ा एक मज़ेदार वाक्या है। यह तो जगजाहिर था कि काका जब कामयाब हो लिए तो उन्होंने घड़ी पर ध्यान रखना लगभग छोड़ हीं दिया था। अगर फिल्म की शिफ्ट सुबह ६ बजे की हो तो ये सेट पर ३ बजे दिन में पहुँचते थे। अच्छे अदाकार थे इसलिए इन्हें ज्यादा टेक लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी, लेकिन निर्माता-निर्देशक को नुकसान तो सहना हीं पड़ता था। तो हुआ यूँ कि जब भी काका हाथी मेरे साथी के सेट पर पहुँचते थे तो देखते थे कि चिनप्पा तेवार एक स्पॉट ब्यॉय की पिटाई कर रहे हैं। यह हर रोज़ होता था। थक-हारकर एक दिन जब काका ने उस लड़के से पिटाई की वजह पूछी तो मालूम चला कि निर्माता होते थे गुस्सा काका से लेकिन चूँकि काका को कुछ कह नहीं सकते इसलिए उन्हें दिखाकर अपना गुस्सा निकालते थे। तब से काका ने यह कोशिश करनी शुरू कर दी वे सेट पर लेट न पहुँचें। 

काका को गीत-संगीत का बहुत शौक था और वे ध्यान रखते थे कि इनकी फिल्मों के गानें कहीं से कमजोर न रहें। इनके गानों मे पंचम और किशोर अमूमन नियमित और निश्चित थे। कई बार तो इन्होंने जिद्द ठान ली थी कि किशोर नहीं गाएँगे तो गाना हीं नहीं होगा। एक ऐसे हीं वाक्ये का ज़िक्र किशोर दा ने एक इंटरव्यु में किया था। उस दौरान काका की पंचम दा से कुछ अनबन हो गई थी। इसलिए उन्होंने "दुश्मन" फिल्म के निर्माता से कहकर पंचम दा की जगह "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" को साईन करवा लिया था। तो जब उस फिल्म के एक गाने "वादा तेरा वादा" को गाने कि बारी आई तो किशोर दा को महसूस हुआ कि इसे अगर रफ़ी साहब गाएँगे तो ज्यादा जमेगा। उन्होंने यह बात एल-पी को बताई लेकिन काका के सामने किसकी चलनी थी। काका ने सीधा-सीधा कह दिया कि या तो किशोर या तो कोई नहीं। हार मानकर किशोर दा को हामी भरनी पड़ी। आराधना के दौरान काका ने शक्ति सामंता को इतना कह दिया था कि किशोर उनकी आत्मा हैं और वे किशोर के शरीर। काका किशोर दा और पंचम दा के साथ-साथ आनंद बक्शी के भी काफी नजदीक थे। कहते हैं कि जब १९९२ में ससदीय उपचुनाव चल रहे थे तब ये बक्षी साहब से कविताएँ लिखवाकर उन्हें मंच पर पढा करते थे। १९८५ में इन्होने जब अपनी फिल्म "अलग-अलग" बनाई थी, तब इन्होंने वादे के अनुसार पंचम दा और बक्षी साहब को एक-एक कार उपहार में दिए थे। तो ऐसा था इनका गीत-संगीत से प्यार।

 काका ने दो साल में चौदह गोल्डन-जुब्ली फिल्में दी थीं। इन्होंने बहुत कम हीं मल्टी-स्टारर फिल्में की थीं। उन मल्टी-स्टारर में दो जो खासे लोकप्रिय हुए वे थे आनंद और नमकहराम। दोनों फिल्मों में काका के साथ थे तब के उभरते स्टार अमिताभ बच्चन। दोनों हीं फिल्में ऋषिकेष मुखर्जी यानि कि राज कपूर के बाबू मोशाय की थीं। आनंद के बारे में क्या कहा जाए। बच्चे-बच्चे की जुबान पर "बाबू मोशाय" और "ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ" आज भी वैसे हीं चस्पां है जैसे ३५ साल पहले था। कहते हैं कि भले हीं काका दूसरे निर्देशकों के सामने नखरे दिखाते हॊं लेकिन ऋषि दा के सामने उनकी एक न चलती थी। फिर भी अगर बीबीसी के संवाददाता जैक पिज़्ज़े की "बम्बे सुपरस्टार" नाम की डाक्यूमेंट्री देखें तो मालूम पड़ जाएगा कि नमकहराम की शूटिंग के दौरान काका के नखरे चरम पर थे। अमिताभ घंटों से इंतेज़ार कर रहे हैं, काका आते हैं, अपने संवाद देखते हैं, पढते हैं, निर्देशक को कुछ सुनाते हैं और निकल जाते हैं। वैसे भी अमिताभ और काका के बीच का यह फासला पुराने सूरज के डूबने के डर और नए के निकलने की तैयारी का था। तब के एक पत्रकार अली पीटर जॉन ने अपने संस्मरण में एक जगह लिखा भी था कि अमिताभ बच्चन के आगमन पर राजेश खन्ना की टिप्पणी थी कि ऐसे अटन-बटन आते-जाते रहते हैं। "बावर्ची" की शूटिंग के दौरान जया भादुड़ी और काका में इसी विषय पर बहस भी हो गई थी और जया भादुड़ी ने एक तरह से भविष्यवाणी कर दी थी कि "देखना एक दिन ये जो आदमी मेरे साथ खड़ा है वह कितना बड़ा स्टार होगा और वो जो अपने आप को खुदा समझता है वो कहीं का नहीं रहेगा।" काका की सबसे बड़ी खामी यही थी कि उन्होंने सफलता को सर पे चढा लिया। काश ऐसा न होता!!

 काका बड़े हीं मूडियल थे। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे बड़े निर्णय उन्होंने इसी ताव मॆं लिए थे। डिम्पल कपाड़िया से शादी के पहले उनकी अंजु महेंद्रु नाम की गर्लफ्रेंड हुआ करती थी और वे दोनों साथ रहते थे। किसी कारण से काका और अंजु महेंद्रु की माँ के बीच अनबन हो गई और अंजु घर छोड़कर चली गईं। अपने आप को सही साबित करने के लिए काका ने आनन-फानन में अपने से १५ साल छोटी डिंपल से शादी कर ली,जिनकी बॉबी अभी-अभी सुपरहिट हुई थी। काका की लाखों चाहने वालियों में डिंपल भी एक थीं और उन्होंने भी काका के घर के बाहर इनकी एक झलक का घंटों इंतेज़ार किया था, इसलिए डिंपल शादी के लिए झट तैयार हो गईं। ये अलग बात है कि काका ने उन्हें सुपरस्टार का खिताब देने वालीं देवयानी चौबल को झूठी कहानी बताई थी कि इन्होंने डिंपल को समुद्र में डूबने से बचाया था और उसी दौरान डिंपल की सुंदरता पर मोहित हो गए। ऐसा हीं ताव काका ने तब दिखाया था जब वे जुबली कुमार राजेंद्र कुमार से उनका डिंपल नाम का घर खरीद रहे थे। काका के पास उतने पैसे नहीं तो उन्होंने यश चोपड़ा से कहा था कि वे इनसे चाहे जिस फिल्म में काम करवा लें लेकिन तत्काल घर खरीदने का पैसा दे दें। घर खरीद लेने पर वे घर का नाम डिंपल हीं रहने देना चाहते थे। लेकिन चूँकि राजेंद्र कुमार की बेटी का नाम डिंपल था तो उन्होंने काका के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। काका ताव में तो जीत गए लेकिन इन्हें खून का घूंट पीकर अपने मकान का नाम "डिंपल" से "आशीर्वाद" करना पड़ा।

 १९७८-७९ के बाद काका को अपनी रोमांटिक हीरो की छवि छोड़कर दुसरे किरदार निभाने पड़े। इनमें से बहुत सारी फिल्में तो प्लॉप रहीं लेकिन आलोचकों ने इनके अभिनय को काफी सराहा। ऐसी हीं एक फिल्म थी "भारती राजा" की "रेड रोज़"। यह फिल्म भारती राजा की हीं १९७८ की तमिल फिल्म "सिगप्पु रोजक्कल" की रीमेक थी,जिसमें कमल हसन मुख्य अभिनेता थे। रेड रोज़ में काका का किरदार एक "साईकोपैथ" का था। माना जाता है कि काका का अभिनय कमल हसन से भी बेहतर था। ऐसी हीं लीक से हटकर एक फिल्म थी "खुदाई", जिसमें काका ने कमाल किया था। राजनीति में आने से पहले काका की अंतिम फिल्म डेविड धवन की स्वर्ग थी। आगे चलकर इन्होंने ऋषि कपूर की "आ अब लौट चलें" की,जिसमें ये उतने कामयाब न हो सके। काका की आखिरी फिल्म हाल में हीं सूर्खियों में रही मरहूम लैला खान के साथ "वफ़ा" थी। संयोग या यूँ कहें कि कुयोग देखिए कि वफ़ा के दोनों मुख्य कलाकार एक महिने के अंदर दिवंगत हो लिए। लैला खान को उसके पूरे परिवार के साथ किसी की गोलियों ने मौत के घाट उतार दिया तो काका को उनकी शराब की आदतों और लंबी बीमारी ने । काका आखिरी बार हैवल्स फैन के ऐड में पर्दे पर नज़र आए थे..... मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता। १८ जुलाई २०१२ को ऊपर वाले ने काका को हीं हम सबसे छीन लिया। "टाईम हो गया है, पैक अप" कहते हुए वे ज़िंदगी से मौत की और चल पड़े।

Saturday, July 21, 2012

पार्श्वगायक मुकेश के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति


सावन का महीना और मुकेश का अवतरण


हिन्दी फिल्मों में १९४१ से १९७६ तक सक्रिय रहने वाले मशहूर पार्श्वगायक स्वर्गीय मुकेश फिल्म-संगीत-क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ठ स्तर की गायकी के लिए हमेशा याद किये जाते रहे हैं। हिन्दी फिल्मों में उन्हें सर्वाधिक ख्याति उनके गाये दर्द भरे नगमों से मिली। इसके अलावा उन्होने कई ऐसे गीत भी गाये हैं, जो राग आधारित गीतों की श्रेणी में आते हैं। २२ जुलाई, २०१२ को मुकेश जी का ८८-वां सालगिरह है। आज उनके जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर रेडियो प्लेबैक इंडिया के नियमित पाठक और मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश, इस विशेष आलेख के माध्यम से मुकेश के गाये गीतों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही आपको सुनवा रहे हैं उनके गाये कुछ सुमधुर गीत।


मित्रों, मानसून के आने से ऋतुओं की रानी वर्षा, अपने पूरे चरम पर विराजमान है। दरअसल सावन के महीने और पार्श्वगायक मुकेश के बीच सम्बन्ध बहुत ही गहरा है। मुकेश जी की बहन चाँद रानी के अनुसार २२जुलाई, १९२३ को रविवार का दिन था, धूप खिली थी और मुकेश के जन्म के साथ ही अचानक सावन की रिमझिम बूँदें बरस पड़ीं और पूरा माहौल खुशनुमा हो गया। आइये शुरुआत करते हैं उन्हीं के गाये एक गीत से जो अक्सर घर पर किसी बच्चे के जन्म पर गया जाता है और हर माता-पिता अपने नवजात शिशु से ऐसी ही आशाएं लगाते होंगे जो इस गीत में विद्यमान है।

फिल्म ‘मन मन्दिर’ : "ऐ मेरे आँखों के पहले सपने..." : सहगायिका लता मंगेशकर 


आज पूरे भारतवर्ष में मुकेश को "दर्द भरे गीतों का जादूगर" कहा जाता है मगर राग आधारित गीतों से भी उनका लगाव रहा है। जब किसी एक साक्षात्कार में मुकेश जी से पूछा गया कि- "आप ने यूं तो सैकड़ों गाने गाये हैं मगर आप को किस तरह के गीत सबसे ज्यादा पसंद हैं?" इस पर उनका जवाब था- "अगर मुझे दस लाइट सॉंग (हलके फुल्के गाने) मिले और एक सैड (दर्द भरा गीत) मिले तो मैं दस लाइट छोड़कर एक सैड पसंद करूँगा और अगर मुझे दस सैड गाने मिले और एक क्लासिकल (शास्त्रीय), तो मैं दस सैड छोड़ कर एक क्लासिकल पसंद करूँगा!" तो आइये उन्ही का गाया एक राग आधारित गीत सुनवाते हैं। १९४८ में नौशाद के संगीत निर्देशन की एक फिल्म थी ‘अनोखी अदा’। इस फिल्म में मुकेश ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक बेहद सुरीला गाना गाया था- ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’। इस राग पर आधारित जो भी स्तरीय गीत अब तक बने हैं, उनमें यह गीत भी शामिल है। फिल्म में मुकेश के गाये इस गीत का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसे शमशाद बेगम ने गाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि गीत के दोनों संस्करण में दरबारी के सुर स्पष्ट उभर कर आते हैं।

फिल्म ‘अनोखी अदा’ : ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’ : राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित



यह भी एक विचित्र संयोग है कि मुकेश ने राग तिलक कामोद पर आधारित लगभग ७-८ गाने गाये हैं और ये सभी गाने बहुत लोकप्रिय हुए है। अब आइये आपको सुनवाते हैं, राग तिलक कामोद पर आधारित उनके प्रारंभिक दौर का एक सुमधुर गीत, जो उनके जीवन का पहला हिट गीत- "दिल जलता है तो जलने दे" (पहली नज़र) के आने से कुछ महीने पहले का है। फ़िल्म 'मूर्ति' का यह गीत राग तिलक कामोद पर आधारित है और इस गीत में उनकी सह-गायिकाएँ है- खुर्शीद और हमीदा बानो। संगीत बुलो सी रानी का है।

फिल्म ‘मूर्ति’ : "बदरिया बरस गई उस पार..." : राग तिलक कामोद पर आधारित



दोस्तों, समय सावन के महीने का है और मुकेश जी का जन्म भी इसी महीने में हुआ था, तो क्यूँ न सावन के मौसम पर उनका कोई गीत सुन लें। ऐसे अवसर के लिए सबसे पहला गीत जो हर किसी संगीत-प्रेमी या मुकेश-प्रेमी के मन में आता होगा, वह है फ़िल्म 'मिलन' का गीत "सावन का महीना पवन करे सोर..."। इस गीत के शुरुआत में आपने मुकेश और लता के बीच का संवाद जरूर पसंद किया होगा। कितने आश्चर्य की बात है कि लता जी "शोर" शब्द का सही उच्चारण कर रही हैं, मगर मुकेश हैं कि उन्हें "शोर" के बजाय "सोर" कहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। दरअसल फिल्म की कहानी के अनुसार ही ऐसा संवाद रखा गया है, जिसमें नायक गाँव का एक भोला-भाला, अनपढ़ इंसान है जो नायिका को गाने की शिक्षा दे रहा है, और पूरे उत्तर भारत के गाँवों के लोग 'श' को 'स' उच्चारण करते है, जिसको परदे पर और परदे के पीछे बखूबी प्रस्तुत किया गया है। इस गीत से जुड़ी परदे के पीछे की एक और बात मैं आप सब को बताना चाहता हूँ। हमारे साथी राजीव श्रीवास्तव (लेखक, कवि, गीतकार और फिल्मकार) जब संगीतकार-जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारेलाल जी से पूछा तो पता चला कि जब ये गीत रिकॉर्ड होना था, उसी दौरान मुकेश जी को दिल का दौरा पड़ गया। अस्पताल से उपचार के बाद गाना रिकॉर्ड होना था, सभी तैयारियां हो गई। लता और मुकेश दोनों ने अभ्यास कर लिया। मगर आज हम इस गीत को जिस प्रकार सुनते हैं, शायद उसका प्रारूप ऐसा न होता, अगर मुकेश जी न होते। असल में जब नायक, नायिका को गाने का अभ्यास करा रहा था, उस समय आलाप, नायक को अर्थात्‍ मुकेश जी को लेना था। मगर उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी में यह हिम्मत नहीं हुई कि आलाप के लिए उनसे आग्रह करें, जो मुकेश के लिए कष्टदायक हो सकता था। मगर मुकेश जी संगीत के प्रति समर्पित जीवट के गायक थे। वो इस बात को भली-भांति जान गए और अभ्यास के दौरान लता से शर्त भी रख ली कि अगर मेरा आलाप उपयुक्त नहीं हुआ तो वो लता को १०० रुपये देंगे, नहीं तो लता देंगी। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी को इस बात की बिलकुल भनक भी नहीं हुई कि कुछ बदलाव भी होने वाला है। गाना रिकॉर्ड होने से ठीक पहले वायदे के मुताबिक मुकेश जी ने अपने बटुवे से १०० रुपये का एक नोट निकाल कर, लता को चुपके से इशारा करते हुए शर्ट की जेब में डाल लिया। गाना शुरू हुआ, दोनों लोग गाने लगे, पहला अंतरा अपने अनुसार हुआ मगर जैसे ही दूसरा अंतरा पूरा हुआ, मुकेश जी ने आलाप लेना शुरू कर दिया। यह निश्चित किया गया था कि आलाप के स्थान पर वाद्य यंत्रों से भर दिया जाएगा। मुकेश के आलाप करते ही सब चौंक गए, किन्तु रेकार्डिंग जारी रहा। गाने की रेकॉर्डिंग समाप्त होने पर पता चला कि संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यही चाहते भी थे। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत आप भी सुनिए।

फिल्म ‘मिलन’ : "सावन का महीना पवन करे सोर..." राग पहाड़ी पर आधारित

दोस्तों, मुकेश जी को जहाँ हम दर्द भरे गीतों का गायक मानते हैं, वहीँ संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी उन्हें "अपने गीतों का सही गवैया" मानते हैं। जब फिल्म सरस्वती चन्द्र का गीत "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड होना तय हुआ तो किसी शास्त्रीय गायक ने कल्याणजी से कहा- "हम जैसे सुरों के साधक बसों में धक्के खाते फिरते है और मुकेश एक फिल्मी पार्श्वगायक होकर मर्सिडीज़ में कैसे चलते हैं? उस वक्त तो कल्याणजी चुप रहे, मगर गाना रिकॉर्ड होने के बाद जब उन्हें सुनाया तो बोले "अब समझ में आया मुकेश मर्सिडीज़ में क्यों चलते हैं”? मुकेश बिना किसी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के राग आधारित गीत खूब गा लेते थे। दरअसल ये मुकेश जी का शास्त्रीय संगीत के प्रति लगाव ही था जो ऐसे गीत उनके होंठ लगते ही सुसज्जित हो उठते हैं। गायन की जो कुछ भी शिक्षा उन्होंने पायी, वो शुरुआती दिनों (१९४०-१९४५) में पंडित जगन्नाथ जी से मिली। अब आपको जो गीत सुनाया जा रहा है, वह राग कल्याण पर आधारित है।

फिल्म ‘सरस्वती चन्द्र’ : "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." : राग कल्याण पर आधारित



संगीतकार रोशन और गायक मुकेश न केवल फ़िल्मी दुनिया में एक दूसरे के व्यावसायिक तौर पर मित्र थे अपितु दोनों बचपन में एक ही विद्यालय के सहपाठी भी थे। जब भी कभी कोई विद्यालय में संगीत, नाटक इत्यादि कार्यक्रम का आयोजन होता, दोनों लोग ज़रूर शरीक होते। जहाँ मुकेश गीत गाते वहीँ रोशन संगीत की बागडोर सँभालते, उनका बखूबी साथ निभाते थे। तो आइये क्यूँ न एक बहुत ही लोकप्रिय गीत सुना जाये जो इन दो कलाकारों द्वारा सृजित किया गया है। इस गीत के बनने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है। इन्दीवर के लिखे इस गीत के लिए रोशन ने कुछ धुन तैयार की थी मगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा था। यूँ लगता था मानो कुछ कमी है, कुछ नया होना चाहिए जो उस समय के माझी, नाव, नदी आदि गीतों की धुनों से अलग हो। करीब पूरा महीना बीत गया मगर कुछ बात नहीं बनी। ऐसे में अचानक एक दिन रोशन, मुकेश और इन्दीवर के साथ अपना हारमोनियम लेकर कार से सैर पर निकले। एक जगह तालाब दिखा तो बैठ कर कुछ क्षण बिताने का मन हुआ। रोशन ने जैसे ही अपना पांव तालाब के शीतल जल में डाला, अचानक दोनों साथियों से बोल पड़े- "धुन बन रही है", जल्दी से कार से हारमोनियम लाये और वहीँ बैठे तीनों ने मिल कर गीत के संगीत की रचना कर डाली। अगले ही दिन स्टूडियो में जाकर यह गीत रिकॉर्ड हो गया। यह गीत लोक-धुन की सोंधी खुशबू से सराबोर है।

फिल्म ‘अनोखी रात’ : “ओह रे ताल मिले नदी के जल में..." : लोक संगीत पर आधारित

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मुकेश के गाये गीतों में राग-आधारित अनेक गीत लोकप्रिय हुए। इन गीतों में राग भैरवी और तिलक कामोद के स्वरों में गाये गीतों की संख्या अधिक हैं। ये दोनों राग उनकी आवाज़ में बहुत अच्छे भी लगते हैं। अब चलते-चलते राग भैरवी के सुरों पर आधारित एक प्यारा सा गीत आपको सुनाते हैं। यह गीत 1966 की फिल्म तीसरी कसम का है, जिसे मुकेश ने अपना स्वर दिया था। बीच-बीच में राज कपूर की आवाज भी है। इस गीत में लोक संगीत का स्पर्श है और भैरवी के स्वर भी मौजूद हैं।

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : “दुनिया बनाने वाले..." : राग भैरवी पर आधारित

शोध व आलेख- पंकज मुकेश

इसी गीत के साथ हम सब गायक मुकेश को अपनी भावांजलि अर्पित करते है। अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए radioplaybackindia@live.com पर मेल भेजें।

Saturday, November 19, 2011

"बुझ गई है राह से छाँव" - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि (भाग-२)

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 68

भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे पिछले हफ़्ते हमने श्रद्धांजलि अर्पित की स्वर्गीय डॉ. भूपेन हज़ारिका को। उनके जीवन सफ़र की कहानी बयान करते हुए हम आ पहुँचे थे सन् १९७४ में जब भूपेन दा नें अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' में संगीत दिया था। आइए उनकी दास्तान को आगे बढ़ाया जाये आज के इस अंक में। दो अंकों वाली इस लघु शृंखला 'बुझ गई है राह से छाँव' की यह है दूसरी व अन्तिम कड़ी।

भूपेन हज़ारिका नें असमीया और बंगला में बहुत से ग़ैर फ़िल्मी गीत तो गाये ही, असमीया और हिन्दी फ़िल्मों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। १९७५ की असमीया फ़िल्म 'चमेली मेमसाब' के संगीत के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। आपको याद होगा उषा मंगेशकर पर केन्द्रित असमीया गीतों के 'शनिवार विशेषांक' में हमने इस फ़िल्म का एक गीत आपको सुनवाया था। १९७६ में भूपेन दा नें अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा निर्मित हिन्दी फ़िल्म 'मेरा धरम मेरी माँ' को निर्देशित किया और इसमें संगीत देते हुए अरुणाचल के लोक-संगीत को फ़िल्मी धारा में ले आए। मैं माफ़ी चाहूंगा दोस्तों कि 'पुरवाई' शृंखला में हमने अरुणाचल के संगीत से सजी इस फ़िल्म का कोई भी सुनवा न सके। पर आज मैं आपके लिए इस दुर्लभ फ़िल्म का एक गीत ढूंढ लाया हूँ, आइए सुना जाए....

गीत - अरुणाचल हमारा (मेरा धरम मेरी माँ)


१९८५ में कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'एक पल', जो असम की पृष्ठभूमि पर निर्मित फ़िल्म थी, में भूपेन दा का संगीत बहुत पसन्द किया गया। पंकज राग के शब्दों में 'एक पल' में भूपेन हज़ारिका ने आसामी लोकसंगीत और भावसंगीत का बहुत ही लावण्यमय उपयोग "फूले दाना दाना" (भूपेन, भूपेन्द्र, नितिन मुकेश), बिदाई गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे" (उषा, हेमंती, भूपेन्द्र, भूपेन) जैसे गीतों में किया। "जाने क्या है जी डरता है" तो लता के स्वर में चाय बागानों के ख़ूबसूरत वातावरण में तैरती एक सुन्दर कविता ही लगती है। "मैं तो संग जाऊँ बनवास" (लता, भूपेन), "आने वाली है बहार सूने चमन में" (आशा, भूपेन्द्र) और "चुपके-चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं" (लता) जैसे गीतों में बहुत हल्के और मीठे ऑरकेस्ट्रेशन के बीच धुन का उपयोग भावनाओं को उभारने के लिए बड़े सशक्त तरीके से किया गया है।

गीत - चुपके-चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं (एक पल)


१९९७ में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी लेख टंडन की फ़िल्म आई 'मिल गई मंज़िल मुझे' जिसमें उन्होंने एक बार फिर असमीया संगीत का प्रयोग किया और फ़िल्म के तमाम गीत आशा, सूदेश भोसले, उदित नारायण, कविता कृष्णमूर्ति जैसे गायकों से गवाये। कल्पना लाजमी के अगली फ़िल्मों में भी भूपेन दा का ही संगीत था। १९९४ में 'रुदाली' के बाद १९९७ में 'दरमियान' में उन्होंने संगीत दिया। इस फ़िल्म में आशा और उदित का गाया डुएट "पिघलता हुआ ये समा" तो बहुत लोकप्रिय हुआ था। १९९६ की फ़िल्म 'साज़' में बस एक ही गीत उन्होंने कम्पोज़ किया। २००० में 'दमन' और २००२ में 'गजगामिनी' में भूपेन हज़ारिका का ही संगीत था। पुरस्कारों की बात करें तो पद्मश्री (१९७७), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रीय नागरिक सम्मान, असम का सर्वोच्च शंकरदेव पुरस्कार जैसे न जाने कितने और पुरस्कारों से सम्मानित भूपेन दा को १९९३ में दादा साहब फालके पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है। लेकिन इन सब पुरस्कारों से भी बड़ा जो पुरस्कार भूपेन दा को मिला, वह है लोगों का प्यार। यह लोगों का उनके प्रति प्यार ही तो है कि उनके जाने के बाद जब पिछले मंगलवार को उनकी अन्तेष्टि होनी थी, तो ऐसा जनसैलाब उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने उस क्षेत्र में उमड़ा कि असम सरकार को अन्तेष्टि क्रिया उस दिन के रद्द करनी पड़ी। अगले दिन बहुत सुबह सुबह २१ तोपों की सलामी के साथ गुवाहाटी में लाखों की तादाद में उपस्थित जनता नें उन्हें अश्रूपूर्ण विदाई दी। भूपेन दा चले गए। भूपेन दा से पहली जगजीत सिंह भी चले गए। इस तरह से फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कलाकार हम से एक एक कर बिछड़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में तो बस यही ख़याल आता है कि काश यह समय धीरे धीरे चलता।

गीत - समय ओ धीरे चलो (रुदाली)


'आवाज़' परिवार की तरफ़ से यह थी स्वर्गीय डॉ. भूपेन हज़ारिका की सुरीली स्मृति को श्रद्धा-सुमन और नमन। भूपेन जैसे कलाकार जा कर भी नहीं जाते। वो तो अपनी कला के ज़रिए यहीं रहते हैं, हमारे आसपास। आज अनुमति दीजिए, फिर मुलाकात होगी अगर ख़ुदा लाया तो, नमस्कार!

चित्र परिचय - भुपेन हजारिका को अंतिम विदाई देने को उमड़ा जनसमूह

Saturday, November 12, 2011

बुझ गई है राह से छाँव - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 67
बुझ गई है राह से छाँव - भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे आज श्रद्धांजलि उस महान कलाकार को जिनका नाम असमीया गीत-संगीत का पर्याय बन गया है, जिन्होने असम और उत्तरपूर्व के लोक-संगीत को दुनियाभर में फैलाने का अद्वितीय कार्य किया, जिन्होंने हिन्दी फ़िल्म-संगीत में असम की पहाड़ियों, चाय बागानों और वादियों का विशिष्ट संगीत देकर फ़िल्म-संगीत को ख़ास आयाम दिया, जो न केवल एक गायक और संगीतकार थे, बल्कि एक लेखक और फ़िल्मकार भी थे। पिछले शनिवार, ४ नवंबर को ८५ वर्ष की आयु में हमें अलविदा कह कर हमेशा के लिए जब भूपेन हज़ारिका चले गए तो उनका रचा एक गीत मुझे बार बार याद आने लगा..... "समय ओ धीरे चलो, बुझ गई है राह से छाँव, दूर है पी का गाँव, धीरे चलो...." आइए आज के इस विशेषांक में भूपेन दा के जीवन सफ़र के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों पर नज़र डालें।

भूपेन हज़ारिका का जन्म १ मार्च १९२६ को असम के नेफ़ा के पास सदिया नामक स्थान पर हुआ था। पिता संत शंकरदेव के भक्त थे और अपने उपदेश गायन के माध्यम से ही देते थे। बाल भूपेन में भी बचपन से ही संगीत की रुचि जागी और ११ वर्ष की आयु में उनका पहला ग़ैर-फ़िल्मी गीत रेकॉर्ड हुआ। फ़िल्म 'इन्द्र मालती' में उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया और इसी फ़िल्म में अपना पहला फ़िल्मी गीत "विश्व विजय नौजवान" भी गाया। तेजपुर से मैट्रिक और गुवाहाटी से इंटर पास करने के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया और साथ ही साथ शास्त्रीय संगीत भी सीखते रहे। १९४२ में साम्प्रदायिक एकता पर लिखा उनका एक गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा जो बाद में 'शीराज़' फ़िल्म में भी लिया गया। गुवाहाटी में कुछ दिनों के लिए अध्यापन करने के बाद वो जुड़े आकाशवाणी से और यहीं से छात्रवृत्ति लेकर वो गए अमरीका के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी 'मास कम्युनिकेशन' में एम.ए. करने। वहीं फ़िल्म माध्यम का भी गहन अध्ययन किया, रॉबर्ट स्टेन्स और रॉबर्ट फ्लैहर्टी से भी बहुत कुछ सीखा। वापसी में जहाज़ी सफ़र में जगह जगह से लोक-संगीत इकट्ठा करते हुए जब वो भारत पहुँचे तो उनके पास विश्वभर के लोक-संगीत का ख़ज़ाना था।

गुवाहाटी वापस लौट कर फिर एक बार उन्होंने अध्यापन किया, पर जल्दी ही पूर्ण मनोयोग से वो गीत-संगीत-सिनेमा से जुड़ गए। इप्टा (IPTA) के वे सक्रीय सदस्य थे। असम के बिहू, बन गीत और बागानों के लोक संगीत को राष्ट्रीय फ़लक पर स्थापित करने का श्रेय भूपेन दा को ही जाता है। असमीया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से वो फ़िल्म-संगीतकार बने। उसके बाद 'मनीराम देवान' और 'एरा बाटोर सुर' जैसी फ़िल्मों के गीतों नें चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। उसके बाद उनके लिखे, निर्देशित और संगीतबद्ध 'शकुंतला', 'प्रतिध्वनि' और 'लटिघटि' के लिए उन्हे लगातार तीन बार राष्ट्रपति पदक भी मिला। भूपेन हज़ारिका का व्यक्तित्व उसी समय इतना विराट बन चुका था कि १९६७ में विधान सभा चुनाव उनसे लड़वाया गया और उन्हें जीत भी हासिल हुई। १९६७-७२ तक विधान सभा सदस्य के रूप में उन्होंने असम में पहले स्टुडियो की स्थापना करवाई।

बांगलादेश के जन्म के उपलक्ष्य में भूपेन हज़ारिका की रचित 'जय जय नवजात बांगलादेश' को अपार लोकप्रियता मिली थी। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के दिनों में प्रसिद्ध अमरीकी बीग्रो गायक पॉल रोबसन के मित्र रहे हज़ारिका अश्वेतों के अधिकारों के लिए लड़ाई से बहुत प्रभावित रहे हैं। रोबसन की प्रसिद्ध रचना 'Old man river' से प्रेरणा लेकर हज़ारिका ने ब्रह्मपुत्र पर अपनी यादगार रचना "बूढ़ा लुई तुमि बुआ कियो" (बूढ़े ब्रह्मपुत्र तुम बहते क्यों हो?)। इसी गीत का हिन्दी संस्करण भी आया, जिसमें ब्रह्मपुत्र के स्थान पर गंगा का उल्लेख हुआ। "विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार, निशब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों?" आइए भूपेन दा की इसी कालजयी रचना को यहाँ पर सुना जाए।

गीत - गंगा बहती हो क्यों (ग़ैर फ़िल्म)


१९६३ में भूपेन दा के संगीत में असमीया फ़िल्म 'मनीराम देवान' में उन्होंने एक गीत रचा व गाया जो उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में दर्ज हुआ। गीत के बोल थे "बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई"। इसी गीत की धुन पर दशकों बाद कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'रुदाली' में भूपेन दा नें "दिल हूम हूम करे गरजाए" कम्पोज़ कर इस धुन को असम से निकाल कर विश्व भर में फैला दिया। आइए इन दोनों गीतों को एक के बाद एक सुनें, पहले प्रस्तुत है असमीया संस्करण।

गीत - बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई (मनीराम देवान - असमीया)


फ़िल्म 'रुदाली' में इस गीत को लता मंगेशकर और भूपेन हज़ारिका, दोनों नें ही अलग अलग गाया था। सुनते हैं भूपेन दा की आवाज़। ख़ास बात देखिये, यह संगीत है असम का, पर 'रुदाली' फ़िल्म का पार्श्व था राजस्थान। तो किस तरह से पूर्व और पश्चिम को भूपेन दा नें एकाकार कर दिया इस गीत में, ताज्जुब होती है! कोई और संगीतकार होता तो राजस्थानी लोक-संगीत का इस्तेमाल किया होता, पर भूपेन दा नें ऐसा नहीं किया। यही उनकी खासियत थी कि कभी उन्होंने अपने जड़ों को नहीं छोड़ा।

गीत - दिल हूम हूम करे घबराए (रुदाली)


हिन्दी फ़िल्म जगत में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी १९७४ की 'आरोप'। दोस्तों, आपको याद होगा अभी हाल ही में 'पुरवाई' शृंखला में हमने दो गीत भूपेन दा के सुनवाये थे, जिनमें एक 'आरोप' का भी था "जब से तूने बंसी बजाई रे..."। इसी फ़िल्म में उन्होंने लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया युगल गीत "नैनों में दर्पण है, दर्पण में कोई देखूँ जिसे सुबह शाम" ख़ूब ख़ूब चला था। भूपेन दा के संगीत की खासियत रही है कि उन्होंने न केवल असम के संगीत का बार बार प्रयोग किया, बल्कि उनका संगीत हमेशा कोमल रहा, जिन्हें सुन कर मन को सुकून मिलती है। आइए फ़िल्म 'आरोप' के इस युगल गीत को सुना जाये, पर उससे पहले लता जी की भूपेन दा को श्रद्धांजलि ट्विटर के माध्यम से... "भूपेन हज़ारिका जी, एक बहुत ही गुणी कलाकार थे, वो बहुत अच्छे संगीतकार और गायक तो थे ही, पर साथ-साथ बहुत अच्छे कवि और फ़िल्म डिरेक्टर भी थे। उनकी असमीया फ़िल्म (एरा बाटोर सुर) में मुझे गाने का मौका मिला यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। ऐसा महान कलाकार अब हमारे बीच नहीं रहा इसका मुझे बहुत दुख है, ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।"

गीत - नैनों में दर्पण है (आरोप)


भूपेन हज़ारिका से संबंधित कुछ और जानकारी हम अगले सप्ताह के अंक में जारी रखेंगे। भूपेन दा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज की यह प्रस्तुति हम यहीं समाप्त करते हैं, नमस्कार!

Sunday, December 27, 2009

मिर्ज़ा ग़ालिब की 212वीं जयंती पर ख़ास

आज से 212 वर्ष पहले एक महाकवि का जन्म हुआ जिसकी शायरी को समझने में लोग कई दशक गुजार देते हैं, लेकिन मर्म समझ नहीं पाते। आज रश्मि प्रभा उर्दू कविता के उसी महाउस्ताद को याद कर रही हैं अपने खूबसूरत अंदाज़ में। आवाज़ ने मिर्ज़ा ग़ालिब के ऊपर कई प्रस्तुतियाँ देकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया है। शिशिर पारखी जो खुद पुणे से हैं, ने उर्दू कविता के 7 उस्ताद शायरों के क़लामों का एक एल्बम एहतराम निकाला था,जिसे आवाज़ ने रीलिज किया था। इसकी छठवीं कड़ी मिर्ज़ा ग़ालिब के ग़ज़ल 'तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले' को समर्पित थी। आवाज़ के स्थई स्तम्भकार संजय पटेल ने लता मंगेशकर की आवाज़ में ग़ालिब की ग़ज़लों की चर्चा दो खण्डों (पहला और दूसरा) में की थी। संगीत की दुनिया पर अपना कलम चलाने वाली अनिता कुमार ने भी बेग़म अख़्तर की आवाज़ में मिर्जा ग़ालिब की एक रचना 'जिक्र उस परीवश का और फ़िर बयां अपना...' हमें सुनवाया था।

लेकिन आज रश्मि प्रभा बिलकुल नये अंदाज़ में अपना श्रद्धासुमन अर्पित कर रही हैं। सुनिए और बताइए-

Thursday, November 26, 2009

...और एक सितारा डूब गया....लेखक/निर्देशक अबरार अल्वी को अंतिम सलाम

"वो मेरे खासमखास सलीम आरिफ के चाचा थे, दरअसल फिल्मों में मेरे सबसे शुरूआती कामों में से एक उनकी लिखी हुई स्क्रिप्ट्स के लिए संवाद लिखने का ही था. हम दोनों ने उन दिनों काफी समय साथ गुजरा था, वे उम्र भर गुरु दत्त से ही जुड़े रहे, गुरु दत्त और उनके भाई आत्मा राम के आलावा शायद ही किसी के लिए उन्होंने लेखन किया हो, मैं जानकी कुटीर में बसे उनके घर के आस पास से जब भी गुजरता था, रुक कर उन्हें सलाम करने अवश्य जाता था, इंडस्ट्री का एक और स्तम्भ गिर गया है"- ये कहना है गुलज़ार साहब का, और वो बात कर रहे थे इंडस्ट्री के जाने माने स्क्रीन लेखक अबरार अल्वी के बारे में, जिनका पिछले सप्ताह ८२ साल की उम्र में देहांत हो गया. वाकई फिल्म जगत का एक और सितारा डूब गया.

वैसे अबरार साहब का अधिकतम काम गुरु दत्त के साथ ही रहा, और गुरु दत्त ने ही उन पर "साहब बीबी और गुलाम" का निर्देशन सौंपा. इस लम्बी जुगलबंदी की शुरुआत "जाल" के सेट पर हुई, जब गुरु दत्त किसी दृश्य के फिल्म्कांकन को लेकर असमंजस में थे और अबरार ने उन्हें रास्ता दिखाया, गुरु उनसे इतने प्रभवित हुए की अगली फिल्म "आर पार" के लेखन के लिए उन्हें अनुबंधित कर लिया. तब से अबरार, गुरु के होकर रह गए. "कागज़ के फूल" की तबाह करने वाली असफलता ने गुरु दत्त को तोड़ कर रख दिया था, शायद उन्हें अपने नाम पर भी भरोसा नहीं रहा था, तब उन्होंने "साहब बीबी और गुलाम" के निर्देशन की बागडोर दी अबरार के हाथों में, अबरार ने अपनी इस फिल्म में सब कुछ झोंक दिया, आज भी ये एक फिल्म काफी है, अबरार का नाम इंडस्ट्री में कायम रखने के लिए. अपनी इस क्लासिक फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला. फिल्म को राष्ट्रपति का रजत सम्मान तो मिला ही, १९६३ में बर्लिन फिल्म समारोह में स्क्रीनिंग और ओस्कार के लिए भारतीय फिल्म के रूप में प्रविष्ठित होने का गौरव भी. पर चूँकि फिल्म गुरु दत्त फिल्म्स के बैनर पर बनी थी, विवाद उठा कि कहीं वास्तव में इस फिल्म का निर्देशन कहीं गुरुदत्त ने तो नहीं किया था, हालाँकि गुरुदत्त ने कभी ऐसा कोई दावा नहीं किया, पर अबरार ने खुद एक बार ये स्वीकार किया कि फिल्म के गीत गुरुदत्त ने फिल्माए थे.

अबरार ने गुरुदत्त से अलग भी लेखन में कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्में की जैसे संघर्ष, सूरज, छोटी सी मुलाकात, मनोरंजन, शिकार और साथी, पर उनका नाम आते ही जिक्र आता है गुरु दत्त का, और ख़याल आता है, प्यासा, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चाँद और साहिब बीबी और गुलाम जैसी क्लासिक फिल्मों का. शाहरुख़ खान अभिनीत विफल फिल्म "गुड्डू" संभवता उनकी अंतिम फिल्म रही...उनकी ३ बेटियां और २ बेटे हैं...उनकी पत्नी और उनके परिवार को ही नहीं वरन पूरी फिल्म इंडस्ट्री को आज इस अनुभवी और गहरी चोट करने वाले स्क्रीन के कलम योद्धा के जाने का गम है. अबरार साहब को तमाम युग्म परिवार की भाव भीनी श्रद्धाजंली.

Wednesday, June 24, 2009

कवि हेमंत के शब्द और कुमार आदित्य की संगीत-संगत

पिछले सप्ताह आपने कुमार आदित्य विक्रम द्वारा स्वरबद्ध चाँद शुक्ला की एक ग़ज़ल का आनंद लिया। आदित्य में सूर्य की भाँति न खत्म होने वाली संगीत-संयोजन और गायन की ऊर्जा है। व्यवसायिकरण के इस दौर में भी आदित्य पूरी मुश्तैदी के साथ कविताओं को संगीतबद्ध करने का हौसला रखते हैं। आवाज़ भी ऐसी प्रतिभाओं को सलाम करने से कभी नहीं चूकता।

एक बार फिर हम कुमार आदित्य विक्रम की ही प्रस्तुति लेकर हाज़िर हैं जो एक युवाकवि को श्रद्धाँजलि है। कुमार आदित्य ने स्व. कवि हेमंत की दो कविताओं का संगीत भी तैयार किया है और गाया भी है।

स्वर्गीय कवि हेमंत

जन्म: 23 मई 1977, उज्जैन (म.प्र.)
शिक्षा: सॉफ़्टवेयर कम्प्यूटर इंजीनियर
लेखन: हिन्दी, अंग्रेज़ी, मराठी में कविता-लेखन
रचनाएँ: (1) मेरे रहते (कविता-संग्रह) / सं. डा. प्रमिला वर्मा
(2) समकालीन युवा कवियों का संग्रह / सं. डा. विनय
(3) सौ-वर्ष की प्रेम कविताओं का संग्रह / सं. वीरेंद्रकुमार बरनवाल
निधन: 5 अगस्त 2000 — सड़क दुर्घटना में।
हेमंत की मृत्यु के बादः इनकी माँ प्रसिद्ध लेखिका संतोष श्रीवास्तव (अध्यक्ष: हेमंत फाउण्डेशन) ने हेमंत की स्मृति में `हेमंत फाउण्डेशन´ नामक साहित्यिक संस्था की स्थापना की। संस्था द्वारा प्रति वर्ष `हेमंत स्मृति कविता सम्मान´ का आयोजन किया जाता है, जिसके तहत 11 हज़ार की धनराशि, शॉल, स्मृति-चिन्ह सम्भावनाशील युवा कवि को (निर्णायकों द्वारा चुने गये) समारोहपूर्वक प्रदान किया जाता है।


तुम हँसी



तुम हँसी!
डाली से ताज़ी पँखुरियाँ झर गयीं।
घोसलों में दुबकी
गौरैयाँ सब चौंक गयीं
लिपे-पुते आँगन में
खीलें बिखर गयीं,
तुम हँसी!
दूर-दूर चाँदनी छिटक गयी!
नदी तट की बालू पर
चाँदी बिखर गयी,
तुम हँसी!
ओस नशा बन गयी
दूब लचक-लचक गयी,
पोर-पोर झूम गयी।
मन लगा जागने
तनहाई टूट गयी।
तुम चुभीं दिल में
कामना की कील सी,
तुम हँसी!

तुम्हारे आसपास



वासंती नभ हो, छिटके जब चाँदनी
दूर-दूर महक उठे, चंपा गुलबक़ावली
करना तब याद मुझे।
गाती हों ढोलक पर मिल कर सहेलियाँ
रचती हों मेंहदी से नाज़ुक हथेलियाँ
करना तब याद मुझे।
ठुकराये तुमको जब जीवन के मोड़ कई
घिरती हो तनहाई, लगे कोई चोट नई
करना तब याद मुझे।
मैं नभ सा छा जाऊँगा
करोगी जब याद मुझे।

Monday, May 25, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना - अंतिम कडी

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र...., हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक... ,रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम..., और अमर प्रेम, अजनबी और अनुराग जैसी कामियाब फिल्मों का सफ़र अब पढें आगे....


शक्ति सामंत को समर्पित 'आवाज़' की यह प्रस्तुति "सफल हुई तेरी आराधना" एक प्रयास है शक्तिदा के 'फ़िल्मोग्राफी' को बारीक़ी से जानने का और उनके फ़िल्मों के सदाबहार 'हिट' गीतों को एक बार फिर से सुनने का। पिछले अंक में हमने ज़िक्र किया था १९७४ की फ़िल्म 'अजनबी' का। आइए अब आगे बढ़ते हैं और क़दम रखते हैं सन १९७५ में। यह साल भी शक्तिदा के लिए एक महत्वपूर्ण साल रहा, इसी साल आयी फ़िल्म 'अमानुष' जिसका निर्माण व निर्देशन दोनो ही उन्होने किया। पहली बार बंगला के सर्वोत्तम नायक उत्तम कुमार को लेकर उन्होने यह फ़िल्म बनायी, साथ में थीं उनकी प्रिय अभिनेत्री शर्मिला। इसी फ़िल्म के बारे में बता रहे हैं ख़ुद शक्तिदा - "१९७२ में कलकत्ता में 'नक्सालाइट' का बहुत ज़्यादा 'प्राबलेम' शुरु हो गया था। कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री का बुरा हाल था। उससे पहले उत्तमदा ने एक 'पिक्चर' यहाँ बनाई थी 'छोटी सी मुलाक़ात' जो शायद अच्छी नहीं चली थी, या जो भी थी, 'He couldn't establish himself yet'। तो एक दिन रात को उन्होने ऐसे ही कह दिया कि 'क्या मैं दोबारा यहाँ पे आ नहीं सकता हूँ?' मैने कहा 'ज़रूर, मैं आपको लेकर एक 'पिक्चर' बनाउँगा'। तो मैने सोचा कि यह बंगला 'पिक्चर' है तो ज़्यादातर 'आर्टिस्ट्स' वहीं के ले लूँ। कुछ यहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को छोड़कर सब वहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को मैने लिया। और भगवान की दया से वह पिक्चर भी चल पड़ी।"

'अमानुष' फ़िल्म की 'शूटिंग भी रोमांच से भरा हुआ था। इस फ़िल्म को 'शूट' करने के लिए शक्तिदा अपनी पूरी टीम को लेकर बंगाल के सामुद्रिक इलाके 'सुंदरबन' गए जो 'रायल बेंगाल टाइगर' के लिए प्रसिद्ध है। पूरी टीम के लिए वह एक अविस्मरणीय यात्रा रही। वहाँ पर सिर्फ़ एक ऐसी जगह थी जहाँ शेर नहीं आ सकते थे। एक छोटा सा द्वीप जिसके चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी। वहाँ पर १५० लोगों के रहने लायक तंबू लगाये गये थे और 'मोटर बोट्स' की सहायता से सामानों का आवाजाही हो रहा था। उन लोगों ने साफ़ देखा की पानी में छोटी छोटी 'शार्क' मछलियाँ तैर रही हैं। इसलिए उन्हे यह निर्देश था कि कोई भी पानी में ना उतरें। साथ ही यह भी बताया गया था कि रात में कोई तंबू से बाहर ना निकले, यहाँ तक कि हाथ भी तंबू से बाहर ना निकालें क्युंकि एक ताज़े माँस के टुकड़े के लिए ख़ूंखार शेर पानी में डुबकी लगाए छुपे होते हैं। 'अमानुष' के शुरुआती दिनों में शक्तिदा उत्तम कुमार के घर ख़ूब जाया करते थे। उन्ही के घर पर वो गायक संगीतकार श्यामल मित्रा से मिले, और वहीं पर उन्होने श्यामलदा से निवेदन किया कि वो इस फ़िल्म के गीतों को स्वरबद्ध करें। श्यामल मित्रा इस बात पर राज़ी हुए कि गीतों के बोल अच्छे स्तर के होने चाहिए।

गीत: दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (अमानुष)


'अमानुष' फ़िल्म में गीत लिखे थे इंदीवर साहब ने। कितनी अजीब बात है कि 'अमानुष' के इस 'हिट' गीत के लिए गीतकार इंदीवर और गायक किशोर कुमार को 'फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड' से सम्मानित किया गया, लेकिन संगीतकार श्यामल मित्रा वंचित रह गये। ख़ुशी फिर भी इस बात की रही कि हिंदी फ़िल्मों के पहली ब्रेक में ही उन्होने अपार सफलता हासिल की। हिंदी फ़िल्मों में आने से पहले वे बंगाल के जानेमाने गायक और संगीतकार बन चुके थे। फ़िल्म 'अमानुष' में इस तरह के असाधारण गाने लिखने के बाद शक्तिदा इंदीवर साहब के 'फ़ैन' बन गए। लेकिन क्या आपको पता है कि इंदीवर का लिखा कौन सा गाना शक्तिदा को सबसे ज़्यादा पसंद था? वह गीत था १९५४ की फ़िल्म 'बादबान' का। यह गीत सुनने से पहले आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के संवाद और स्क्रीनप्ले शक्तिदा ने ख़ुद लिखे थे जो उन दिनो निर्देशक फणी मजुमदार के सहायक के रूप में काम कर रहे थे बौम्बे टाकीज़ में। बौम्बे टाकीज़ की आर्थिक अवस्था बहुत ख़राब हो चुकी थी। यह फ़िल्म इस कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों के लिए बनाई गयी थी, जिसके लिए किसी भी कलाकार ने कोई पैसे नहीं लिए। अशोक कुमार, देव आनंद, लीला चिटनिस, उषा किरन जैसे कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार थे तिमिर बरन और एस. के पाल। अभी उपर इंदीवर के लिखे जिस गीत का ज़िक्र हम कर रहे थे, उसे गाया था गीता दत्त ने, और एक वर्ज़न हेमन्त कुमार की आवाज़ में भी था। सुनिए गीताजी की वेदना भरी आवाज़ में "कैसे कोई जीये ज़हर है ज़िंदगी"।

गीत: कैसे कोई जियें ज़हर है ज़िंदगी (बादबान)


अमानुष के बाद ७० के दशक के आख़िर के चंद सालों में भी शक्तिदा के फ़िल्मों का जादू वैसा ही बरक़रार रहा। निर्माता-निर्देशक के रूप मे १९७७ मे उनकी फ़िल्म आयी 'आनंद आश्रम' जो 'अमानुष' की ही तरह बंगाल के पार्श्वभूमि पर बनाया गया था। इस फ़िल्म का निर्माण बंगला में भी किया गया था, और इस फ़िल्म मे भी उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर ने अभिनय किया था। बतौर निर्माता, शक्तिदा ने १९७६ मे फ़िल्म 'बालिका बधु' का निर्माण किया, जिसका एक बार फिर बंगाल की धरती से ताल्लुख़ था। शरतचंद्र की बंगला उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म को निर्देशित किया था तरु मजुम्दार ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा। गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीत दिया राहुल देव बर्मन ने। इस फ़िल्म मे आशा भोसले, मोह्द रफ़ी, किशोर कुमार, अमित कुमार और चंद्राणी मुखर्जी ने तो गीत गाये ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म मे आनद बक्शी, आर.डी. बर्मन और उनके सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती ने भी गानें गाये, और वह भी अलग अलग एकल गीत। इस फ़िल्म का मशहूर होली गीत हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे आपको सुनवा ही चुके हैं। बतौर निर्देशक, शक्तिदा ने १९७६ मे 'महबूबा', १९७७ में 'अनुरोध' और १९७९ मे 'दि ग्रेट गैम्बलर' जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन किया। ये सभी फ़िल्में अपने ज़माने की सुपरहिट फ़िल्में रहीं हैं। वह दौर ऐसा था दोस्तों कि सफल फ़िल्में कहें या शक्तिदा की फ़िल्में कहें, मतलब एक ही निकलता था।

गीत: आप के अनुरोध पे मैं यह गीत सुनाता हूँ (अनुरोध)


८० के दशक के आते आते फ़िल्मों का मिज़ाज बदलने लगा था। कोमलता फ़िल्मों से विलुप्त होती जा रही थी और उनकी जगह ले रहा था 'ऐक्शन' फ़िल्में। बावजूद इस बदलती मिज़ाज के, शक्तिदा ने अपना वही अंदाज़ बरक़रार रखा। इस दशक मे जिन हिंदी फ़िल्मों के वो निर्माता-निर्देशक बने, वो फ़िल्में थीं 'बरसात की एक रात', 'अय्याश', और 'आर-पार'। इन फ़िल्मों के अलावा उन्होने 'आमने सामने', 'मैं आवारा हूँ', 'पाले ख़ान' और 'आख़िरी बाज़ी' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया, तथा 'ख़्वाब', 'आवाज़', और 'अलग अलग' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। ९० के दशक मे 'गीतांजली' फ़िल्म के वो निर्माता-निर्देशक रहे, तथा 'आँखों में तुम हो' का निर्माण किया व 'दुश्मन' का निर्देशन किया।

शक्ति दा आज इतनी दूर चले गये हैं लेकिन जो काम वो कर गये हैं, उसकी लौ हमेशा नयी पीढ़ी को राह दिखाती रहेगी, नये फ़िल्मकारों को अच्छी फ़िल्में बनाने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। दूसरे शब्दों में उनकी आराधना ज़रूर सफल होगी। चलते चलते उनकी फ़िल्म 'आनंद आश्रम' के शीर्षक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है "सफल वही जीवन है, औरों के लिए जो अर्पण है"। शक्तिदा ने भी अपना पूरा जीवन फ़िल्म जगत को और पूरे समाज को सीख देनेवाली अच्छी अच्छी फ़िल्में देते हुए गुज़ार दिये। शक्तिदा को हिंद युग्म की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धाजंली।

५ अंकों के इस पूरे आलेख को तैयार करने में विविध भारती के निम्नलिखित कार्यक्रमों से जानकारियाँ बटोरी गयीं:

१. युनूस ख़ान द्वारा प्रस्तुत शक्तिदा को श्रद्धांजलि - "सफल होगी तेरी आराधना"
२. कमल शर्मा से की गयी शक्तिदा की लम्बी बातचीत - "उजाले उनकी यादों के"
३. शक्तिदा द्वारा प्रस्तुत फ़ौजी भाइयों के लिए "विशेष जयमाला" कार्यक्रम


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
समाप्त



Tuesday, May 19, 2009

"ज़िंदगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी - प्रकाश मेहरा को हिंद युग्म की श्रद्धांजली

एक नौजवान, नाकाम और हताश, मुंबई में मिली असफलताओं का बोझ दिल में लिए घर लौटने की तैयारी कर रहा था कि उसे एक युवा निर्देशक ने रुकने की हिदायत दी, और अपनी एक छोटे बजट की फिल्म में उस नौजवान को मुख्य रोल की पेशकश दी. नौजवान ने उस निर्देशक पर विश्वास किया और सोचा कि एक आखिरी दाव खेल लिया जाए. फिल्म बनी और और जब दर्शकों तक पहुँची तो कमियाबी की एक नयी कहानी लिखी जा चुकी थी... दोस्तों, वो नौजवान थे अमिताभ बच्चन और वो युवा निर्देशक थे प्रकाश मेहरा.

प्रकाश मेहरा, एक एक ऐसे जादूगर फ़िल्मकार, जिन्होने ज़िंदगी को एक जुआ समझकर पूरे आन बान से हाथ की सफ़ाई, और हेरा फेरी की हर ज़ंजीर तोड़ी, और तब जाकर कहलाये मुक़द्दर का सिकंदर । फ़िल्म जगत के ये सिकंदर यानी कि असंख्य हिट फ़िल्मों के निर्माता, निर्देशक और गीतकार प्रकाश मेहरा अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी मृत्यु की ख़बर सुनकर न जाने क्यों सबसे पहले 'मुक़द्दर का सिकंदर' फ़िल्म के शीर्षक गीत की वो लाइनें याद आ रहीं हैं कि -

"ज़िंदगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी,
मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी,
मर के जीने की अदा जो दुनिया को सिखलाएगा,
वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमन कहलाएगा।"


प्रकाश मेहरा फ़िल्म इंडस्ट्री के एक सशक्त स्तम्भ रहे हैं और उनके चले जाने से फ़िल्म जगत मे मानो एक विशाल शून्य सा पैदा हो गया है। प्रकाश मेहरा जब फ़िल्म इंडस्ट्री मे आये थे तब अपने शुरूआती दिनों में वो गीत लेखन का काम करते थे, यानी कि वो एक गीतकार के हैसियत से यहाँ पधारे थे। उस वक़्त उनका साथ दिया था संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंदजी ने। तभी तो जब वो ख़ुद निर्माता निर्देशक बने, तो उन्होने अपनी फ़िल्मों के संगीत के लिए कल्याणजी आनंदजी को ही चुना। उजाला और प्रोफेसर जैसी फिल्मों में उन्होंने प्रोडक्शन नियंत्रण का काम संभाला पर बतौर निर्देशक प्रकाश मेहरा की पहचान बनी फ़िल्म 'हसीना मान जाएगी' से। शशी कपूर और बबिता अभिनीत यह फ़िल्म बेहद सफल रही और इसके सभी गीत भी बेहद मकबूल रहे ख़ास कर "बेखुदी में सनम" और "कभी रात दिन ..". इस फ़िल्म की सफलता ने मेहरा साहब को इंडस्ट्री मे स्थापित कर दिया और फिर उसके बाद वो एक के बाद एक सफल फ़िल्में लगातार देते चले गये, जैसे कि मेला (इस फिल्म में फिरोज़ खान और संजय खान एक साथ नज़र आये), आन बान, समाधी (इसी फिल्म में था वो मशहूर गीत "काँटा लगा"), वगैरह.

बात १९७२ की है जब प्रकाश मेहरा एक नयी कास्ट के साथ एक 'लो बजट' फ़िल्म बनाने की सोच रहे थे। इस फ़िल्म मे एक पठान की भूमिका के लिए वो प्राण साहब को 'साइन' करवाना चाह रहे थे। लेकिन मनोज कुमार ने उसी समय अपनी फ़िल्म 'शोर' मे भी उन्हे ऐसे ही एक रोल का ऑफर कर चुके थे। आख़िर मे प्राण साहब ने प्रकाश मेहरा को ही 'हाँ' कहा था। अब तक तो आप समझ ही गये होंगे कि हम किस फिल्म का ज़िक्र कर रहे हैं. ये फिल्म थी सन १९७३ मे प्रदर्शित 'ज़ंजीर'। और यही वह फ़िल्म थी जिसने हमें दिया एक महानायक, 'मेगा स्टार औफ़ द मिलेनियम' अमिताभ बच्चन, और उनके साथ थीं जया भादुड़ी। इस फ़िल्म के गीत "यारी है इमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी" के लिए गीतकार गुलशन बावरा को उस साल के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार दिया गया था। प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन का साथ जो 'ज़ंजीर' से बना था, आगे आनेवाले दिनों में हम सब ने देखा उस जोड़ी को सफलता का नया इतिहास रचते हुए फ़िल्म लावारिस, शराबी, हेरा फेरी, मुक़द्दर का सिकंदर, और नमक हलाल जैसी सुपरहिट फ़िल्मों में।

फ़िल्म 'ज़ंजीर' से पहले प्रकाश मेहरा स्थापित तो हो चुके थे, लेकिन इस फ़िल्म ने उन्हे एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँचाया जहाँ से वो फ़िल्म इंडस्ट्री पर हुकुमत करने लगे। उन्होने फ़िल्म निर्माण मे अपने हाथ ऐसे जमाये कि १९७४ मे कहलायी 'हाथ की सफ़ाई'। जी हाँ, रणधीर कपूर, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना और सिमि गरेवाल अभिनीत यह फ़िल्म भी काफ़ी हिट रही, फ़िल्म के गाने भी लोकप्रिय हुए, ख़ासकर "वादा करले साजना" गीत तो अक्सर सुनाई दे जाता है। क्योंकि प्रकाश मेहरा ख़ुद भी एक गीतकार रहे हैं, उनके फ़िल्मों में गीत संगीत का पक्ष हमेशा ही मज़बूत रहा है। अपनी खुद की लगभग हर फिल्म में उनका एक गीत अवश्य होता था, फिल्म शराबी में "इन्तहा हो गयी..." गीत के लिए उन्हें गीतकार अनजान के साथ फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार का नामांकन भी मिला. इसी फ़िल्म के लिए संगीतकार बप्पी लाहिड़ी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार मिला था।

१९७८ मे प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन ने जो हंगामा किया वो आज एक इतिहास बन चुका है, और हमेशा हमेशा के लिए हमारे दिल मे बस गया है। हमारा इशारा 'मुक़द्दर का सिकंदर' फ़िल्म की तरफ़ है। फिल्म अपने गीत संगीत, सशक्त कहानी और जबरदस्त स्टार कास्ट के चलते इस कदर कामियाब हुई कि इस फिल्म से जुड़े हर कलाकार के कैरियर के लिए एक मील का पत्थर बन गयी. पर जानकार शराबी को उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानते हैं, जिसमें उन्होंने अमिताभ से एक जटिल किरदार को परदे पर साकार करवाया. अमिताभ और प्रकाश की जोड़ी आखिरी बार नज़र आई फिल्म जादूगर में. ये फिल्म नाकामियाब रही. प्रकाश की आखिरी फिल्म रही पुरु राजकुमार अभिनीत बाल ब्रमचारी. प्रकाश मेहरा ने ही इंडस्ट्री को अलका याग्निक जैसी गायिका दी.

आज प्रकाश मेहरा हमसे बहुत दूर चले गये हैं जहाँ से लौटना संभव नहीं। लेकिन वो हमेशा अमर रहेंगे अपनी लोकप्रिय फ़िल्मों के ज़रिये, अपनी कामयाब फ़िल्मों के ज़रिये वो लोगों के दिलों मे हमेशा राज करते रहेंगे।

"वो सिकंदर क्या था जिसने ज़ुल्म से जीता जहाँ,
प्यार से जीते दिलों को वो झुका दे आसमाँ,
जो सितारों पर कहानी प्यार की लिख जाएगा,
वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमन कहलाएगा।"


अपनी फ़िल्मों के ज़रिए लोगों को प्यार करना सिखाया है प्रकाश मेहरा ने। प्यार के कई आयामों को साकार करने वाले प्रकाश मेहरा ज़िंदा हैं और हमेशा रहेंगे अपने चाहनेवालों के दिलों में। हिंद युग्म की तरफ़ से प्रकाश मेहरा की स्मृति को श्रद्धा सुमन, भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। हम आज आपके लिए लाये हैं उनकी तीन फिल्मों से कुछ यादगार सीन. देखिये और याद कीजिये उस निर्देशक को जिनकी इन फिल्मों ने हमें कई यादगार लम्हें दिए हैं जीवन के.



प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी


Saturday, April 11, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 1)


ज़िन्दगी की आख़िरी सच्चाई है मृत्यु। जो भी इस धरती पर आता है, उसे एक न एक दिन इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर जाना ही पड़ता है। लेकिन कुछ लोग यहाँ से जा कर भी नहीं जाते, हमारे दिलों में बसे रहते हैं, हमेशा हमेशा के लिए, और जिनकी यादें हमें रह रह कर याद आती हैं। अपनी कला और प्रतिभा के ज़रिये ऐसे लोग कुछ ऐसा अमिट छाप छोड़ जाते हैं इस दुनिया में कि जो मिटाये नहीं मिट सकते। उनका यश इतना अपार होता है कि सूरज चाँद की तरह जिनकी रोशनी युगों युगों तक, बल्कि अनंतकाल तक प्रकाशमान रहती है। ऐसे ही एक महान कलाकार, फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक शक्ति सामंत अब हमारे बीच नहीं रहे। गत ९ अप्रैल को मुंबई में ८३ वर्ष की आयु में उन्होने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह कर अपनी अनंत यात्रा पर चले गये। लेकिन वो हमेशा जीवंत रहेंगे, हमारे दिलों में सदा राज करेंगे अपनी अनगिनत मशहूर फ़िल्मों और उन 'हिट' फ़िल्मों के सुमधुर गीतों के ज़रिये। मेरी तरफ़ से, 'आवाज़' की तरफ़ से, और 'आवाज़' के सभी पाठकों तथा श्रोताओं की तरफ़ से स्वर्गीय शक्ति सामंत को हम श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।

गीत: सारा प्यार तुम्हारा मैने बांध लिया है आँचल में (आनंद आश्रम)


शक्ति सामंत का जन्म बंगाल के बर्धमान में हुआ था। उनके पिता एक इंजिनीयर थे जिनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस वक़्त शक्तिजी केवल डेढ़ साल के थे। पढ़ाई के लिए उन्हे उत्तर प्रदेश के बदायुँ में उनके चाचा के पास भेज दिया गया। देहरादून से अपनी 'इंटरमिडीयट' पास करने के बाद उन्होने कलकत्ते जाकर 'इंजिनीयरिंग एंट्रान्स' की परीक्षा दी और अव्वल भी आये। लेकिन जब वो भर्ती के लिए गये तो उन्हे यह कह कर वापस कर दिया गया कि वह परीक्षा केवल बंगाल, बिहार और ओड़िसा के छात्रों के लिए थी और वो यु.पी से आये हुए थे। दुर्भाग्य यहीं पे ख़तम नहीं हुई। जब वो वापस यु.पी गये तो वहाँ पर सभी कालेजों में भर्ती की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। उनका एक साल बिना किसी वजह के बरबाद हो गया। उनके चाचा के कहने पर शक्ति उनके साथ उनके काम में हाथ बँटाने लग गये। साथ ही साथ वो थियटर और ड्रामा के अपने शौक को भी पूरा करते रहे। एक रात जब वो थियटर के रिहर्सल से घर देर से लौटे तो उनके चाचा ने उन्हे कुछ भला बुरा सुनाया। उन्हे उनका वह बर्ताव पसंद नहीं आया और उन्होने अपने चाचा का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।

गीत: काहे को रोये चाहे जो होये सफल होगी तेरी आरधना (आराधना)


अपने चाचा के घर से निकलने के बाद शक्ति मुंबई के आस-पास काम की तलाश कर रहे थे क्युंकि उन्हे पता था कि उनका अंतिम मुक़ाम यह कला-नगरी ही है। उन्हे दापोली में एक 'ऐंग्लो हाई स्कूल' में नौकरी मिल गई। यहाँ से मुंबई स्टीमर से एक घंटे में पहुँची जा सकती थी। उस स्कूल के छात्र ज़्यादातर अफ़्रीकन मुस्लिम थे और २३-२४ साल की आयु के थे, जब कि वो ख़ुद २१ साल के थे। शक्ति ने देखा कि स्कूल में छात्रों की चहुँमुखी विकास के लिए साज़-ओ-सामान का बड़ा अभाव है। उन्होने स्कूल के प्रिन्सिपल से इस बात का ज़िक्र किया और छात्रों के लिए खेल-कूद के कई चीज़ें खरीदवाये। छात्र शक्ति के इस अंदाज़ से मुतासिर हुए और उनके अच्छे दोस्त बन गये। अपने चाचा के साथ काम करते हुए शक्ति को महीने के ३००० रुपय मिलते थे, जब कि यहाँ उन्हे केवल १३० रुपय मिलते। उसमे से ३० रुपय खर्च होते और १०० रुपय वो बचा लेते। फ़िल्म जगत में कुछ करने की उनकी दिली तमन्ना उन्हे हर शुक्रवार मुंबई खींच ले जाती। शुक्रवार शाम को वो स्टीमर से मुंबई जाते, वहाँ पर काम ढ़ूंढ़ते और फिर सोमवार की सुबह वापस आ जाते। वो कई फ़िल्म निर्मातायों से मिले, लेकिन वह राजनैतिक हलचल का समय था। देश के बँटवारे के बाद बहुत सारे कलाकार पाक़िस्तान चले गये थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए बुरा वक़्त चल रहा था। शक्ति अंत में जाकर दादामुनि अशोक कुमार से मिले, जो उनके पसंदीदा अभिनेता भी थे, और जो उन दिनो 'बॊम्बे टॊकीज़' से जुड़े हुए थे। दादामुनि ने उन्हे इस शर्त पर सहायक निर्देशक के तौर पर 'बॊम्बे टॊकीज़' में रख लिया कि उन्हे कोई तनख्वाह नहीं मिलेगी, सिवाय दोपहर के खाने और चाय के। शक्ति राज़ी हो गये। यु.पी में रहने की वजह से उनकी हिंदी काफ़ी अच्छी थी। इसलिए वहाँ पर फनी मजुमदार के बंगला में लिखे चीज़ों को वो हिंदी में अनुवाद किया करते। इस काम के लिए उन्हे पैसे ज़रूर दिये गये। कुछ दिनो के बाद शक्ति ने अशोक कुमार से अपने दिल की बात कही कि वो मुंबई दरसल अभिनेता बनने आये हैं। पर उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व को समझकर दादामुनि ने उनसे अभिनय में नहीं बल्कि फ़िल्म निर्माण के तक़नीकी क्षेत्र में हाथ आज़माने के लिए कहा। दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि शक्ति सामंत ने सबसे पहली बार किस फ़िल्म की 'शूटिंग' देखी थी? वह एक गाना था फ़िल्म 'मशाल' का। जब उन्होने देखा कि एक तांगे को एक टेबल के उपर स्थिर रखा गया है और 'फ़्रेम' में सिर्फ़ घूमते हुए पहिये को दिखाया जा रहा है तो उन्हे बड़ी हैरत हुई। क्या आप सुनना नहीं चाहेंगे इस गीत को? सुनिये मन्न डे की आवाज़ में "ऊपर गगन विशाल" इसी फिल्म मशाल से.

गीत: ऊपर गगन विशाल (मशाल)


अभिनय करने कि चाहत अभी पूरी तरह से बुझी नहीं थी शक्ति सामंत के दिल में। वो फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल निभाकर इस शौक को पूरा कर लेते थे। उनके अनुसार उन्हे हर फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर का रोल दे दिया जाता था और एक ही संवाद हर फ़िल्म में उन्हे कहना पड़ता कि "फ़ॊलो कार नम्बर फ़लाना, इंस्पेक्टर फ़लाना स्पीकींग"। फ़िल्म जगत से जुड़े रहने की वजह से कई बड़ी हस्तियों से उनकी जान-पहचान होने लगी थी। दो ऐसे बड़े लोग थे गुरु दत्त और लेखक ब्रजेन्द्र गौड़। गौड़ साहब को फ़िल्म 'कस्तुरी' निर्देशित करने का न्योता मिला, लेकिन किसी दूसरी कंपनी की फ़िल्म में व्यस्त रहने की वजह से इस दायित्व को वो ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होने शक्ति सामंत से उन्हे इस फ़िल्म मे उनकी मदद करने को कहा। सामंत साहब ने इस काम के २५० रुपय लिए थे। किसी फ़िल्म से यह उनकी पहली कमाई थी। 'कस्तुरी' १९५४ की फ़िल्म थी जिसमें संगीत था पंकज मल्लिक का। शक्ति सामंत की कहानी को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते चलें इसी फ़िल्म का एक गीत पंकज मल्लिक की आवाज़ में जिसे ब्रजेन्द्र गौड़ ने ही लिखा था।

गीत: काहे हुआ नादान मनवा (कस्तुरी)


गीतकार और निर्माता एस. एच. बिहारी तथा लेखक दरोगाजी 'इंस्पेक्टर' नामक फ़िल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे थे। फ़िल्म को 'प्रोड्यूस' करवाने के लिए वो लोग नाडियाडवाला के पास जा पहुँचे। नाडियाडवाला ने कहा कि इस कहानी पर सफल फ़िल्म बनाने के लिए मशहूर और महँगे अभिनेतायों जैसे कि अशोक कुमार, प्राण वगैरह को लेना पड़ेगा। बजट का संतुलन बिगड़ न जाये इसलिए उन लोगों ने इस फ़िल्म के लिए किसी नये निर्देशक को नियुक्त करने की सोची ताकी निर्देशक के लिए ज़्यादा पैसे न खर्चने पड़े। और इस तरह से शक्ति सामंत ने अपनी पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर' का निर्देशन किया जो रिलीज़ हुई सन १९५६ में पुष्पा पिक्चर्स के बैनर तले। फ़िल्म 'हिट' रही और इस फ़िल्म के बाद उन्हे फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म के गाने भी ख़ासा पसंद किये गये। इस फ़िल्म के संगीतकार थे हेमन्त कुमार। उन्ही की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक सदाबहार नग्मा यहाँ पर पेश है - "दिल छेड़ कोई ऐसा नग़मा जिसे सुन ज़माना खो जाये, ये आह मेरी दुनिया के लिये सपनों का तराना हो जाये"। इस गीत का एक एक शब्द जैसे शक्ति सामंत के लिए ही उस वक़्त लिखी गई थी। उनकी फ़िल्मों को देख कर ज़माना उनमें आज भी खो जाता हैं, उनकी फ़िल्मों के मधुर गीतों में आज भी अपने दिल का कोई तराना ढ़ूंढ़ते हैं लोग।

गीत: दिल छेड़ कोई ऐसा नग्मा (इंस्पेक्टर)


शक्ति सामंत ने काम तो पहले 'इंस्पेक्टर' का ही शुरु किया था लेकिन उनकी दूसरी फ़िल्म 'बहू' पहले प्रदर्शित हो गई। साल था १९५५। करण दीवान और उषा किरण अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार भी हेमन्त कुमार ही थे। तलत महमूद और गीता दत्त की आवाज़ों में इस फ़िल्म का एक युगलगीत आपको सुनवाये बग़ैर मैं आगे नहीं बढ़ सकता क्युंकि यह गीत इतना ख़ूबसूरत है कि एक बहुत लम्बे अरसे के बाद इस गीत को सुनने का मौका आप भी छोड़ना नहीं चाहेंगे।

गीत: ठंडी हवाओं में तारों की छायों में आज बलम मेरा डोले जिया (बहू)


'बहू' और 'इंस्पेक्टर' में शक्ति सामंत के निर्देशन की काफ़ी प्रशंसा हुई और वो सही माईने मे दुनिया के नज़र में आये। पुष्पा पिक्चर्स ने 'इंस्पेक्टर' की कामयाबी से ख़ुश होकर शक्ति सामंत को अपनी अगली फ़िल्म 'हिल स्टेशन' को निर्देशित करने का फिर एक बार मौका दिया। इस फ़िल्म में मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और बीना राय। और एक बार फिर हेमन्त कुमार का संगीत। १९५७ की इस फ़िल्म का एक बहुत ही मीठा, बहुत ही सुरीला गीत गाया था लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार ने। सुनते चलिये इस गीत को।

गीत: नयी मंज़िल नयी राहें नया है महरबान अपना (हिल स्टेशन)


"नयी मंज़िल नयी राहें नया है मेहरबान अपना, न जाने जाके ठहरेगा कहाँ यह कारवाँ अपना", दोस्तों, शक्ति सामंत के जीवन का कारवाँ तो ठहर गया है हमेशा हमेशा के लिए, लेकिन जैसा कि शुरु में ही मैने कहा था कि कला और कलाकार कभी नहीं मरते, कला कालजयी होता है, वक्त उसको छू भी नहीं सकता। शक्ति सामंत की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तों, बहुत जल्द इस लेख और शक्ति-दा के फ़िल्मों के कुछ और सुमधुर गीतों के साथ हम फिर वापस आयेंगे।


(पढ़िए-सुनिए इस संगीतमयी आलेखमाला की दूसरी किस्त)


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Friday, December 12, 2008

आम आदमी की रगों में दौड़ता एक कवि प्रदीप

11 दिसंबर को इनकी 10वीं पुण्यतिथि पर विशेष।

कविता, गीत या फिर लेखन की कोई और विधा हो, वो तभी मुकम्मल होती है जब वो सभी सरहदें लांघ कर एक देश से दूसरे देश और दूसरे देश से तीसरे देश तक जा पहुंचे। यद्यपि ऐसे रचनाकारों की गिनती बहुत कम है, लेकिन उन रचनाकारों में एक अग्रणी नाम प्रख्यात कवि और गीतकार प्रदीप का आता है। मध्य प्रदेश में जन्मा यह कवि 11 दिसंबर 1998 को हमें छोड़कर चला गया तो सबकी आंखें नम तो हुई लेकिन प्रदीप की रचनाएँ हर देशवासी और साहित्यप्रेमी की रगों में दौड़ती रही और यह रवानगी का सफर निरंतर चलते रहने वाला है। उनकी रचनाएं उस समय भी देशवासियों में वही जोश भर रही थी जब ताज पर कुछ आतंकियों ने खूनी खेल खेला था, जो जोश आज़ादी के समय अंग्रेज़ों के खिलाफ प्रदीप की रचनाओं ने भरा था।
प्रदीप के कुछ मशहूर गीत

आज हिमालय की चोटी (क़िस्मत)


ऐ मेरे वतन के लोगो


आओ बच्चे तुम्हें दिखाएँ (जागृति)


हम लाये हैं तूफान से(जागृति)


साबरमती के संत तूने (जागृति)


ऊपर गगन विशाल (मशाल)


कितना बदल गया इंसान (नास्तिक)


छोटी सी उम्र में लिखने का शौक प्रदीप को ऐसा चढ़ा कि उनका गीत "हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो दुनिया वालो ये हिंदोस्तान हमारा है"। फिल्म 'किस्मत' में शुमार कर लिया गया। इस गाने के बाद मानो प्रदीप की किस्मत जाग उठी। बाद में ये गीत आजादी की लड़ाई में देशभक्तों में जोश भरने वाला टॉनिक बन गया। अंग्रेज़ों की तिलमिलाहट तब स्पष्ट झलकी जब इस गीत पर प्रदीप के खिलाफ अंग्रेज़ों ने गिरफ्तारी वॉरंट जारी कर दिया।
इस कवि की लेखनी में जो कशिश थी, उसी ने पंडित नेहरू की आँखें उस समय छलका दीं जब प्रदीप का गाना "ऐ मेरे वतन के लोगो, तू खूब लगा लो नारा" नेहरू ने सुना। इस गीत को सुनकर आज भी देश भाव विभोर हो उठता है और यह गीत आज भी उतना ही सटीक है, जितना लिखे जाने के समय था, इसी को लेखक की जीवंतता कहा जा सकता। बड़े–बड़े नामी लेखक और बड़ी-बड़ी रचनाएं आईं मगर इस गीत के आगे सभी देशभकित गीत फीके नज़र आते हैं। प्रदीप की लेखनी में एक ख़ासियत ये थी कि उनकी रचनाएं किसी वर्ग विशेष या फिर किसी रजतनीतिक विचारधारा से ओत–प्रोत नहीं थी। यही कारण था कि प्रदीप की रचनाएं छोटे-छोटे फेरबदल के साथ पाकिस्तान ने भी प्रयोग की। उनके कुछ उदाहरण देखिए :-

‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल’ ये गीत पाकिस्तान को इतना भाया कि पाकिस्तान की फिल्मों में ये ऐसे आया, ‘यूं दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान, ए कायदे आज़म तेरा एहसान है एहसान’। इसी प्रकार ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दोस्तान की’, गीत को पाकिस्तान में कुछ ऐसे गाया गया:- ‘ आओ बच्चो सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की’
दाल, चावल और सादा जीवन व्यतीत करने वाले कवि प्रदीप ने यह लिखकर दिया कि ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत से मिलने वाली रॉयलटी की राशि शहीद सैनिकों की विधवा पत्नियों को दी जाए, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रदीप कवि के साथ एक उदार और सच्ची देशभक्त लेखक भी थे।
लेखक निदा फाज़ली उन्हें एक अच्छा लेखक होने के साथ एक बेहतर गीतकार भी मानते हैं। शायद निदा फाज़ली साहब का यह विचार है भी सचमुच पुष्ट, इसीलिये प्रदीप को ‘दादा साहेब फालके’ पुरस्कार से भी अलंकृत किया गया। यह प्रदीप की सशक्त लेखनी ही है कि पाकिस्तान ने प्रभावित होकर हिन्दी फिल्म ‘जागृति’ का रीमेक ‘ बेदारी’ बना डाला जो वहां पर आज भी लोकप्रिय है।
राम किशोर द्विवेदी से कवि प्रदीप तक का यह सफ़र आज 11 दिसंवर 2008 को उनकी 10वीं पुण्यतिथि पर जहां उनकी याद दिलाता है, वहीं नम आंखों से पूरा देश उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है----
नियति को कौन टाल पाया है लेकिन प्रदीप के नग़्में उन्हें जन्म-जन्म तक ज़ीवित रखेंगे।

प्रस्तुति- प्रकाश बादल

Sunday, November 16, 2008

बस एक धुन याद आ गई थी....संगीतकार रोशन की याद में

संगीतकार रोशन की ४१ वीं पुण्यतिथी पर हिंद युग्म आवाज़ की श्रद्धांजली

संगीतकार रोशन अक्सर अनिल दा (अनिल बिस्वास) को रिकॉर्डिंग करते हुए देखने जाया करते थे. एक दिन अनिल दा रिकॉर्डिंग कर रहे थे "कहाँ तक हम गम उठाये..." गीत की,कि उन्होंने पीछे से किसी के सुबकने की आवाज़ सुनी.मुड कर देखा तो रोशन आँखों में आंसू लिए खड़े थे. भावुक स्वरों में ये उनके शब्द थे- "दादा, क्या मैं कभी कुछ ऐसा बना पाउँगा..." अनिल दा ने उन्हें डांट कर कहा "ऐसा बात मत कहो...कौन जाने तुम इससे भी बेहतर बेहतर गीत बनाओ किसी दिन..." कितना सच कहा था अनिल दा ने.


बात १९४९ की है. निर्देशक केदार शर्मा फ़िल्म बना रहे थे "नेकी और बदी", जिसके संगीतकार थे स्नेहल भटकर. तभी उन्हें मिला हाल ही में दिल्ली से मुंबई पहुँचा एक युवा संगीतकार रोशन, जिसकी धुनों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने स्नेहल साहब से बात कर फ़िल्म "नेकी और बदी" का काम रोशन साहब को सौंप दिया. फ़िल्म नही चली पर केदार जी को अपनी "खोज" पर पूरा विशवास था तो उन्होंने अगली फ़िल्म "बावरे नैन" से रोशन साहब को फ़िर से एक नई शुरुआत करने का मौका दिया. इस बार रोशन साहब भी नही चूके. १९५० में आई इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद मकबूल हुए विशेषकर -"ख्यालों में किसी के इस तरह आया नही करते...","तेरी दुनिया में दिल लगता नही..." और "सुन बैरी बालम सच बोल रे इब क्या होगा..." ने तो रातों रात रोशन साहब को इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया.

मुश्किल से मुश्किल रागों पर रोशन साहब ने धुनें बनाईं और इतनी सहजता से उन्हें आम श्रोताओं तक पहुंचाया कि वो आज तक हम सब के मन से उतर नही पाये. फिल्मों में कव्वालियों को उन्होंने नया रंग दिया. सोचिये ज़रा क्या ये गीत कभी पुराने हो सकते हैं - "निगाहें मिलाने को जी चाहता है...", "लागा चुनरी में दाग....", "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा....", "बहारों ने मेरा चमन लूटकर...", "मिले न फूल तो...", "कारवां गुजर गया ....", "रहें न रहें हम...", "ओ रे ताल मिले..." या फ़िर रफी साहब का गाया फ़िल्म चित्रलेखा का वो अमर गीत "मन रे तू काहे न धीर धरे...."

१९६४ में आई चित्रलेखा भी केदार शर्मा की रीमेक थी रंगीन रजत पटल पर. तुलसी दास की दो पंक्तियों से प्रेरित होकर (मन तू कहे न धीर धरे अब, धीरे धीरे सब काज सुधरता...) केदार जी ने ही इस स्थायी का सुझाव दिया था जिसे साहिर साहब ने मुक्कमल रूप दिया और रफी साहब ने आवाज़. इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर के गाये इन दो गीतों को भी याद कीजिये -"संसार से भागे फिरते हो..." और "ऐ री जाने न दूँगी...". रागों का इतने शुद्ध रूप में अन्य किसी फ़िल्म संगीतकार ने इस मात्रा में प्रयोग नही किया, जैसा रोशन साहब ने किया.

आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम ये अमर गीत एक बार फ़िर सुन लें - "मन रे तू काहे न धीर धरे..."



वापस आते हैं रोशन साहब के संगीत सफर पर. गुजरांवाला से लखनऊ के मौरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक में दाखिला लेने आए रोशन साहब से कॉलेज के प्रधानाचार्य ने कॉल बेल बजाकर उस स्वर के नाद को पहचानने को कहा. सही नाद पहचानने के एवज में उन्हें दाखिला मिला. मुंबई कूच करने से पहले उन्होंने दिल्ली के आल इंडिया रेडियो में १० साल जलतरंग वादक के रूप में काम किया. बावरे नैन की सफलता के बाद उन्होंने ५० के दशक में मल्हार, शीशम और ऐ के अब्बास की अनहोनी जैसी फिल्मों में संगीत दिया. अनहोनी में तलत महमूद का गाया "मैं दिल हूँ एक अरमान भरा..." रोशन के १० बहतरीन गीतों में से एक कहा जा सकता है. १९६० में मिली एक और बड़ी सफलता फ़िल्म बरसात की रात के रूप में. "जिंदगी भर नही भूलेगी..." और याद कीजिये वो मशहूर और लाजवाब कव्वाली "न तो कारवां की तलाश है...". सुरों का उतार चढाव, शब्दों की लयकारी, और ताल में संजीदगी भी मस्ती भी, क्या नही है इस कव्वाली में. आगे बढ़ेंगे पर इस कव्वाली को सुने बिना नही, सुनिए -



1963 में आई फ़िल्म ताज महल ने रोशन साहब के संगीत सफर में चार चाँद लगा दिए. "जो वादा किया ...." और पाँव छू लेने दो..." जैसे गीत आज भी अपने नर्मो नाज़ुक मिजाज़ के मामले में नासानी हैं. इसी फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला. इंडस्ट्री के दांव पेंचों से दूर रोशन उम्र भर बस संगीत की ही साधना करते रहे. वो अपने समकालीन संगीतकारों से बहुत अलग थे. वो मेलोडी को साज़ बाजों से अधिक ताजीह देते थे. शास्त्रीय संगीत पर भी उनकी पकड़ बखूबी झलकती थी, कुछ गीत तो उन्होंने शुद्ध बंदिश के बनाये जैसे - "आली पिया बिन.." (राग यमन). वो फ़िल्म के मूड और फ़िल्म की सिचुएशन को गीत में उभारने के लिए नए प्रयोगों से भी नही चूकते थे. "दुनिया करे सवाल तो हम..." और "तुम एक बार मोहब्बत का..." जैसे गीत आम फिल्मी गीतों से अलग छंद रुपी थे. वाध्यों के लेकर उनकी समझ बेमिसाल थी.

स्वभाव से हंसमुख रोशन साहब संसार से विदा भी हुए तो हँसते हँसते..जी हाँ, एक पार्टी में अदाकार प्राण के किसी चुटकुले पर वो इतनी जोर से हँसे कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा और ५० वर्ष की उम्र में, आज ही के दिन १९६७ में वो हम सब को छोड़ कर चले गए. उनके बेटे और मशहूर निर्देशक राकेश रोशन उन्हें याद करते हुए बताते हैं -"अक्सर वो हमें रात के २ बजे जगे हुए मिल जाते थे पूछने पर कहते थे - बस एक धुन याद आ गई..." ऐसे थे हम सब के प्रिय रोशन साहब. उन्होंने कम काम किया पर जो भी किया लाजवाब किया. फ़िल्म इंडस्ट्री से उन्हें वो सब नही मिला,जिसके कि वो हक़दार थे पर ४१ सालों के बाद आज भी हर संगीत प्रेमी ह्रदय उनके गीतों को सुन धड़कता है, इससे बड़ी कमियाबी एक कलाकार के लिए क्या होगी.शायद ये गीत उनके संगीत की अमरता को सही रूप से वर्णित करता है. लता मंगेशकर, फ़िल्म ममता में - "रहें न रहें हम, महका करेंगे बन के कली बन के सबा बागे वफा में ....", गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी. सुनें और याद करें रोशन साहब को -




Friday, October 31, 2008

देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं...

सचिन देव बर्मन साहब की ३३ वीं पुण्यतिथि पर दिलीप कवठेकर का विशेष आलेख -

सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है, जो हम जैसे सुरमई संगीत के दीवानों के दिल में अंदर तक जा बसा है. मेरा दावा है कि अगर आप और हम से यह पूछा जाये कि आप को सचिन दा के संगीतबद्ध किये गये गानों में किस मूड़ के, या किस Genre के गीत सबसे ज़्यादा पसंद है, तो आप कहेंगे, कि ऐसी को विधा नही होगी, या ऐसी कोई सिने संगीत की जगह नही होगी जिस में सचिन दा के मेलोड़ी भरे गाने नहीं हों.

आप उनकी किसी भी धुन को लें. शास्त्रीय, लोक गीत, पाश्चात्य संगीत की चाशनी में डूबे हुए गाने. ठहरी हुई या तेज़ चलन की बंदिशें. संवेदनशील मन में कुदेरे गये दर्द भरे नग्में, या हास्य की टाईमिंग लिये संवाद करते हुए हल्के फ़ुल्के फ़ुलझडी़यांनुमा गीत. जहां उनके समकालीन गुणी संगीतकारों नें अपने अपने धुनों की एक पहचान बना ली थी, सचिन दा हमेशा हर धुन में कोई ना कोई नवीनता देने के लिये पूरी मेहनत करते थे.

इसीलिये, उनके बारे में सही ही कहा है, देव आनंद नें (जिन्होने अपने लगभग हर फ़िल्म में - बाज़ी से प्रेम पुजारी तक सचिन दा का ही संगीत लिया था)- He was One of the Most Cultured & and Sophisticated Music Director,I have ever encountered !
हालांकि गीतकार जावेद अख्त़र नें उनके साथ काम नहीं किया लेकिन वे भी कायल थे सचिन दा की धुनों के रेंज से - चलती का नाम गाड़ी - सुजाता - गाईड़ - अभिमान.

शायद इसीलिये वे फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी. अपने १९४६ (शिकारी ) से शुरु हुए और त्याग (१९७७) तक के फ़िल्मी संगीत के सफ़र में ८९ फ़िल्मों के लिये लगभग ६६६ गीतों के संगीत रचना करते हुए देव आनंद, गुरुदत्त, हृषिकेश मुखर्जी, विजय आनंद, शक्ति सामंत आदि सशक्त निर्माताओं के साथ काम किया.

गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.

संगीत के कंपोज़िशन के साथ ही वाद्यों के ओर्केस्ट्राइज़ेशन की भी बारीकीयां उन्हे पता थी.एक दिन किसी कारणवश एक की जगह दो वायोलीन वादक रिकॊर्डिन्ग में बजा रहे थे, तो दादा नें कंट्रोल केबिन से साज़ों के हुजूम में से यह बात पकड़ ली.उन्होने कहा, मैं एक ही वायोलीन का इफ़ेक्ट चाहता हूं.

वे इस बात को मानते थे, और अपने बेटे राहुल को भी उन्होने यह बात बडे़ गंभीरता से समझाई थी कि हमेशा कुछ नया सृजन किया करो, ताकि लोगों में यह आतुरता बनी रहे, कि अब क्या. जब तीसरी मंज़िल फ़िल्म के लिये पंचम ने सभी गीत लगभग वेस्टर्न स्टाईल से दिये तो दादा बेहद खुश हुए. वे धोती कुर्ता ज़रूर पहनते थे मगर मन से बडे आधुनिक या मोडर्न थे.

पंचम से वे बेहद प्यार करते थे. एक दिन जब वे कहीं टहल रहे थे तो बच्चों के किसी समूह में से एक ने कहा- देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं. वे उस दिन बडे खुश होकर सब को पान खिलाने लगे (वे जब खुश होते थे तो सब को पान खिलाया करते थे)

किसी कारणवश प्यासा के समय उनकी बातचीत लता से बंद हो गयी थी. तो उन्होने आशा से गाने गवाये, मगर बाद में पंचम की वजह से वह रुठना खत्म हुआ.

सचिन दा से समय तक गीत पहले लिखे जाते थे, बाद में धुन बनाई जाती थी. दादा इतने नैसर्गिक कम्पोज़र थे कि मिनटों में धुन बना लेते थे, और इसीलियी उन्होने यह प्रथा पहली बार डाली कि पहले धुन बनेगी बाद में उसपर बोल बिठाये जायेंगे. साहिर, मजरूह और शैलेंद्र के साथ उनके कई गीत बनें, मगर देव आनंद नें नीरज, हसरत और पं. नरेन्द्र शर्मा से भी कई गीत लिखवाये जो हिन्दी में साहित्यिक वज़न रखते थे. पं. नरेन्द्र शर्मा से तो वे बडे़ खुश रहते थे क्योंकि वे भी मिनटों में कोई भी गीत रच लेते थे, वह भी बहर में, और विषय से बाबस्ता.

प्यासा फ़िल्म में गुरुदत्त नें उनसे एक गीत बिना किसी साज़ के भी बनवाया और रफ़ी से गवाया था. (तंग आ चुके है कश्मकशे जिंदगी से हम- जो बाद में फ़िल्म लाईट हाऊस में एन.दत्ता के निर्देशन में आशा नें भी गाया). साहिर की एक काव्य संग्रह 'परछाईयां' से उन्होने कुछ चुनिंदा रचनायें चुनी और सचिन दा से धुन बनवाई. जैसे जिन्हे -नाज़ है हिन्द पर वो कहां है, जाने वो कैसे लोग थे - फ़िल्म के बाकी गानो में आपको सचिन दा के अंदाज़ के गानें मिले होंगे- सर जो तेरा चकराये, हम आप की आंखों में आदि. मगर आपनें भी सुन ही लिया है, कि दूसरे गीत कितने अलग ढंग से संगीत बद्ध किये दादा नें.

अभी अभी साहिर की भी पुण्यतिथि थी. यह फ़िल्म उनके गुरुदत्त और सचिन दा के जोडी़ का एक काव्यात्मक ऊंचाई प्राप्त करने वाला कमाल ही था, जो प्यासा के बाद दादा और साहिर के मनमुटाव के बाद टूट गया. सचिन दा का बोलबाला तब इतना बढ़ गया था कि गुरुदत्त को कागज़ के फ़ूल फ़िल्म के समय दोनों में से जब एक को चुनना पडा़ तो उन्होने दादा को ही चुना.

किशोर कुमार को एक अलग अंदाज़ में गवाने का श्रेय भी दादा को ही जाता है. उन्होंनें देव आनंद के लिये किशोर कुमार की आवाज़ को जो प्रयोग किया वह इतिहास बन गया. बाद में राजेश खन्ना के लिये भी किशोर की आवाज़ लेकर किशोर को दूसरी इनिंग में नया जीवन दिया, जिसके बाद किशोर नें कभी भी पीछे मुड़ कर नही देखा.

उसके बावजूद, सचिन दा ने देव आनंद के लिये हमेशा ही किशोर से नहीं गवाया, बल्कि रफ़ी साहब से भी गवाया, जैसे जैसे भी गाने की ज़रूरत होती थी. तीन देवियां में - ऐसे तो ना देखो, और अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब, तेरे घर के सामने में तू कहां , ये बता और छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा,गाईड़ में तेरे मेरे सपने और गाता रहे मेरा दिल, आदि.

उनके गीतों में जो लोकगीतों की महक थी वह उत्तर पूर्व भारत के भटियाली, सारी औत धमैल आदि ट्रेडिशन से उपजी थी. उनकी आवाज़ पतली ज़रूर थी मगर दमदार और एक विशिष्ट लहजे की वजह से पृष्ठभूमि में गाये जाने वाले गीतों के लिये बड़ी सराही गयी.

और एक बात अंतिम, सचिन दा के सहायक के रूप में भी जयदेव (वर्मा) जो एक अच्छे सरोद वादक और गिटारिस्ट भी थे, का शास्त्रीय अनुभव भी मिला और पंचम की वजह से गानों में ताल वाद्यों के अलग अलग प्रयोग भी सुनने को मिले, वह एक अलग विषय है.

'बड़ी सूनी सूनी सी है, ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ' इस गीत के रिकॊर्डिंग के दो दिन बाद ही वे हमें छोड़ कर चले गये और गाने के बोल सार्थक कर गये.

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर

(उपर के चित्र में है दादा अपनी पत्नी मीरा के साथ, मध्य में देव आनंद और आर डी बर्मन के साथ और नीचे है किशोर कुमार के साथ)

सुनते हैं सचिन दा के स्वरबद्ध किए कुछ गीत. हमने कोशिश की है कि इस संकलन में सचिन दा के संगीत खजाने में से हर रंग के कुछ गीत समेटे जायें. काम बेहद मुश्किल था, हम कितने सफल हुए हैं ये आप सुनकर बतायें.



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