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Saturday, July 26, 2014

रफ़ी साहब का अन्तिम सफ़र शब्बीर कुमार की भीगी यादों में...



स्मृतियों के स्वर - 06

"तू कहीं आसपास है दोस्त"

रफ़ी साहब का अन्तिम सफ़र शब्बीर कुमार की भीगी यादों में




''रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ, आपके इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - 'स्मृतियों के स्वर', जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों में। आज प्रस्तुत है मोहम्मद रफ़ी साहब के अन्तिम सफ़र का आँखों देखा हाल, उनके अनन्य भक्त और गायक शब्बीर कुमार की नज़रों से।



सूत्र : विविध भारती
कार्य्रक्रम : हमारे मेहमान
प्रसारण तिथि : 16 सितम्बर, 2009


"रमज़ान का सत्रहवाँ रोज़ा था, और मैं बस बैठा ही था घर में। तो हमारे एक पड़ोसी आये घर पे। वो अक्सर मुझसे हँसी मज़ाक किया करते थे, बड़े मज़ाहिया किस्म के इंसान हैं, अक्सर मज़ाक मस्ती चलती रहती थी। तो वो मेरे पास आये और बोले कि 'शब्बीर, बड़ा शॉकिंग्‍ न्यूज़ है'। मैंने पूछा 'क्या?', तो बोले 'रफ़ी साहब नहीं रहे'। मैंने कहा, 'देखिये, आपकी मज़ाक बहुत होती है, इतना बेहुदा और इतना घटिया मज़ाक ज़िन्दगी में कभी मेरे साथ मत कीजियेगा'। बोले, 'शब्बीर, मैं जानता हूँ कि आप रफ़ी साहब को कितना चाहते हैं, आप मेरे यहाँ चलिये, रेडियो में सुन लीजिये'। यह सुन के मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया था, मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता था, तो मैं उनके यहाँ गया तो बकायदा अनाउन्समेण्ट चल रही है रफ़ी साहब के बारे में, ज़िक्र हो रहे हैं और उनके गाने बज रहे हैं। फिर भी मुझे यकीन नहीं आ रहा है कि रफ़ी साहब नहीं रहे, और मैं बड़ा परेशान हो गया। वहाँ से मैं पडोस में हमारे एक थे, उनके यहाँ टेलीफ़ोन रहा करता था, उनके घर में मैं गया, उनके वहाँ से लोकल अख़्बार, जो बरोडा का है, 'लोकसत्ता', उसकी दीवाली का इश्यु जो है, उसकी कभी कभार मुझसे डिज़ाइन करवाया करते थे, तो वहाँ से मैंने 'लोकसत्ता' के कार्यालय में कॉल लगाई कि ऐसी ऐसी लोग बातें कर रहे हैं, तो क्या आज की हेडलाइन वही है, क्या निकल चुकी है अख़्बार? और मैं, यकीन करने को तैयार नहीं।

मेरी बहनें, उनकी ससुराल भी पास-पास में थी। वो भी भाग कर आ गईं कि आज भाई बहुत परेशान होंगे और कुछ दोस्त यार भी सुबह-सुबह मेरे यहाँ इकट्ठा हो गये हमारे घर पर। अब मेरी ज़हनी कैफ़ियत, न कुछ बोलते बन पड़ता था, न कुछ, मैं बिल्कुल शॉक्ड बैठा था। मेरी बहनों ने, भाइयों ने मिल कर पैसे इकट्ठे किये कि कैसे भी करके भाई को हम 'बाइ एअर' बम्बई भेज दें क्योंकि अख़्बार में लिखा था कि जुमे का रोज़ था, तो बान्द्रा जामा मस्जिद में जुमे के नमाज़ के बाद रफ़ी साहब का जनाज़ा वहाँ से ले जाया जायेगा। ज़्यादा वक़्त भी नहीं था। और मैं अगर ट्रेन से जाता हूँ तो मुझे ट्रेन मिली थी एक 'डीलक्स' जो यहाँ 4:30 - 5 बजे पहुँचती थी। तो मेरी बहनों ने पैसों की कलेक्शन की और मेरे दोस्तों को देकर कहा कि भाई को आज बाइ एअय भेज दीजिये। मैं तो बैठा हुआ था चुपचाप। उन लोगों ने एअरपोर्ट में कॉल लगाई, पता चला कि बम्बई की फ़्लाइट तो निकल गई है अभी 10 मिनट पहले। फिर वो आपस में तय कर रहे थे, मुझे तो होश था ही नहीं, तो क्या किया जाये, तो बोले कि 'आप डीलक्स से निकल जाइये'। मेरे दोस्तों ने कहा कि हम वक़्त से तो पहुँच नहीं पायेंगे, जनाज़े के, और रोज़े की नमाज़ें, तो बोले कि आप वहाँ पहुँच जाइये, वहाँ फ़ातिया पढ़ लीजियेगा। मैं तो ज़िन्दा लाश की तरह ही था, ट्रेन में बैठ गये। 10:30 की ट्रेन थी।


शाम 4:30 को मैं बोरीवली पहुँचा। फिर पूछते-पाछते कि भाई मुझे बान्द्रा स्टेशन जाना है, बान्द्रा वेस्ट जाना है। तो पूछते-पाछते हम मस्जिद तक पहुँचे। पूरा सन्नाटा था, बारिश अपने पूरे शबाब पर थी। तो तीन चार टैक्सी थीं, बाक़ी पूरा सुनसान सन्नाटा था। वहाँ जाकर, टैक्सियों में रफ़ी साहब के गाने बज रहे हैं, और बड़ा ग़मज़दा माहौल था। तो वो टैक्सी वाले बोले कि उस फ़रिश्ते को तो बहुत देर पहले ही ले गये हैं, अब तक तो मिट्टी भी दे दी होंगी! मैंने उनसे पूछा कि कहाँ ले गये उनको? बोले कि जुहु कब्रिस्तान। मैंने बोला कि आप ले चलेंगे हमको? तो उनके टैक्सी में बैठ कर जुहु कब्रिस्तान की तरफ़ चल पड़े। जैसे-जैसे करीब आता गया, वैसे-वैसे हज़ारों की तादाद में लोगों को आते हुए देखा। तो यह था ही कि साहब को दफ़ना दिया होगा। तो वहाँ पहुँचे तो ला-तादाद फ़िल्मी हस्तियाँ, ला-तादाद उनके चाहनेवाले, और वहाँ बैठे हुए, बारिश ज़बरदस्त हो रही है। और मैं तो एक ही जोड़ी कपड़े पहनकर निकल गया था अपने दोस्तों के साथ। इतना इतना पानी था, काफ़ी पानी जम गया था, जूते भी मेरे पानी में भीगे हुए थे, कब्रिस्तान में बहुत सारा पानी था, बारिश हो रही थी। हम लोग वहाँ गये तो देखता हूँ कि रफ़ी साहब का जनाज़ा रखा हुआ है और तैयारी हो रही है। और चारों तरफ़ से पुलिस वाले हाथ से हाथ बाँधे एक सर्कल बना लिया था, ताकि कोई बाहर वाला अन्दर न आ सके, क्योंकि भीड इतनी थी कि उनको हाथ लगाने के लिए लोग बेकाबू हुए जा रहे थे। उस घेरे के अन्दर कुछ ख़ास लोग ही थे - उनकी फ़ैमिली के थे, शाहिद थे, युसुफ़ साहब, और उस वक़्त जॉनी विस्की साहब थे, जुनियर महमूद साहब भी थे। तो उनके साथ मैं शोज़ कर चुका था पहले, गुजरात में। तो मैंने कोशिश की कि अब मौका मिला है तो अब मैं नहीं छोड़ूंगा चाहे मुझे कुछ भी हो जाये। तो मैं उस सर्कल को तोड़ कर साहब तक पहुँचने की कोशिश की तो मुझे धक्का मारा पुलिस वालों ने। एक बार गिरते गिरते सम्भल गया। फिर दोबारा कोशिश की। तीसरी बार मुझे डंडा मारा उन लोगों ने। उस वक़्त मेरी घड़ी की बैण्ड ऐसे खुल गई। उस वक़्त ड्राइंग का शौक था तो पेन ऐसे ही रखता था जेब में। तो ये सब शोर हो रहा था तो जॉनी विस्की साहब ने देखा कि पुलिस ने किसी को डंडा मारा। तो देखा कि अरे ये तो शब्बीर है, ये गुजरात से आया है। तो उन्होंने पुलिस वालों से कहा कि इनको आने दो अंदर। और जब मैं पहुँचा तो साहब का जनाज़ा उठा, उनकी डेड बॉडी उठाई और किसी फ़रिश्ते ने उनको कब्र में उतारते वक़्त उनके क़दमों को मेरे हाथ में दे दिया। मैंने उनके क़दमों को पकड़ा तो यह मेरी घड़ी जो है न, ये नीचे गई, पेन मेरा क़ब्र में गया, और कब्र में भी पानी था, और यह बस मेरी आख़िरी मुलाक़ात।

करोड़ों दिलों में धड़कन बन कर धड़कते रहे हैं वो, और धड़कते रहेंगे। तेरे आने की आस है दोस्त, शाम फिर क्यों उदास है दोस्त, महकी महकी फ़िज़ा यह कहती है, तू कहीं आसपास है दोस्त। मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राहों में है, के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाह में है!!!"

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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, April 26, 2014

"गोरी हैं कलाइयाँ" -- यही था उस साल का सर्वश्रेष्ठ गीत; जानिये कुछ बातें इस गीत से जुड़े...


एक गीत सौ कहानियाँ - 29
 

गोरी हैं कलाइयाँ, तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 29-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आज का अर्जुन' के गीत "गोरी हैं कलाइयाँ" के बारे में ... 



बप्पी दा और लता जी
प्पी लाहिड़ी को भले ही डिस्को किंग्‍ की उपाधि दी जाती है, पर उनकी ऐसी अनेक रचनायें हैं जिनमें शास्त्रीय संगीत, तथा बंगाल व अन्य प्रदेशों के लोक संगीत की झलक मिलती है। ऐसा ही एक गीत है 1990 की फ़िल्म 'आज का अर्जुन' का। राजस्थानी रंग में रंगा "गोरी हैं कलाइयाँ, तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ" गीत उस दौर के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक था। 80 के दशक में बप्पी दा स्वरबद्ध फ़िल्मों में अधिकतर पाश्चात्य अंदाज़ के या फिर चल्ताऊ क़िस्म के गीत हुआ करते थे जिनमें महिला स्वर आशा भोसले, एस. जानकी, अलिशा चिनॉय आदि गायिकाओं के होते थे। लेकिन उनका हमेशा यह प्रयास होता था कि हर फ़िल्म में कम से कम एक गीत ऐसा बनायें जिसे वो लता मंगेशकर से गवा सके। अत: लता जी को राज़ी करने के लिए वो उन्हीं की शैली में गीत कम्पोज़ किया करते। फ़िल्म 'हिम्मतवाला' में "नैनों में सपना, सपनों में सजना", फ़िल्म 'तोहफ़ा' में "अल्बेला मौसम, कहता है स्वागतम", फ़िल्म 'पाप की दुनिया' में "बंधन टूटे ना सारी ज़िन्दगी", फ़िल्म 'थानेदार' में "और भला क्या माँगू मैं रब से मुझे तेरा प्यार मिला", फ़िल्म 'गुरु' में "ज‍इयो ना ज‍इयो ना हमसे दूर कभी ज‍इयो ना" की तरह फ़िल्म 'आज का अर्जुन' में भी उन्होंने लता जी को ध्यान में रखते हुए "गोरी हैं कलाइयाँ" की रचना की। शब्बीर कुमार और साथियों के साथ गाया लता जी का यह गीत उस वर्ष का चोटी का गीत सिद्ध हुआ।

1990 में एक से एक कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में आईं, और अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'वार्षिक गीतमाला' में नामांकित होने वाले गीतों में 'किशन कन्हैया', 'चालबाज़', 'बहार आने तक', 'सौतन की बेटी', 'आशिक़ी', 'थानेदार', 'जीना तेरी गली में', 'तुम मेरे हो', 'चाँदनी', 'घर का चिराग', 'दिल', 'आयी मिलन की रात', 'मैंने प्यार किया', और 'हम' जैसी फ़िल्में शामिल थे, जिनके गानें सुपर-डुपर हिट हुए थे। ख़ुद बप्पी लाहिड़ी के तीन गीत चोटी का पायदान प्राप्त करने की लड़ाई में शामिल थे - "तम्मा तम्मा लोगे" (थानेदार), "तूतक तूतक तूतियाँ आइ लव यू" (घर का चिराग), और "गोरी हैं कलाइयाँ"। तमाम गीतों को पछाड़ता हुआ 'आज का अर्जुन' का यह गीत जा पहुँचा चोटी के पायदान पर और बन गया 'सॉंग्‍स ऑफ़ दि ईअर'। दूसरे पायदान पर "कबूतर जा जा" (मैंने प्यार किया) और तीसरे पायदान पर "मुझे नींद न आये" (दिल) गीत रहे।

'आज का अर्जुन' में अमिताभ बच्चन और जया प्रदा की जोड़ी नज़र आई। अभी हाल ही में फ़ेसबूक पर बिग बी ने इस गीत के बारे में अपना स्टेटस अपडेट करते हुए लिखा, "This was considered to be the piece de resistance of the movie and was filmed with such zest and energy that I had a trying time keeping in step with Jaya Prada. Bappi Lahiri’s music was winner. Gori hain kalaaiyan was such a hit in Rajasthan that I am told it was chanted throughout the streets and gullies of Jaipur, where the film producer KC Bokadia hails from." ("यह गीत इस फ़िल्म का मुख्य आकर्षण सिद्ध हुआ, और इस गीत को इतनी लगन और ऊर्जा के साथ फ़िल्माया गया कि मुझे जया प्रदा के साथ कदम से कदम मिलाने में बड़ी मुश्किल हुई। बप्पी लाहिड़ी का संगीत विजयी रहा। गोरी हैं कलाइयाँ राजस्थान में इतना ज़्यादा मक़बूल हुआ कि मुझे ऐसा बताया गया कि जयपुर की गलियों और मुहल्लों लगातार गाया गया जहाँ से के. सी. बोकाडिया ताल्लुख रखते थे")।

"गोरी हैं कलाइयाँ" गीत की एक बड़ी ख़ासीयत है मटकों का सुंदर प्रयोग। विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम को प्रस्तुत करते हुए बप्पी दा ने इस गीत के बारे में बताया, "इस गाने में मैंने पहली बार मटका, मिट्टी का, एक एक स्केल में यूज़ किया। लता जी जब स्टुडियो में आईं तो इतने सारे मटके देख कर कहा कि इतने मटके क्यों? मैंने कहा कि लता जी, मैं मटके से एक्स्पेरिमेण्ट कर रहा हूँ, तबला तरंग का। लता जी को भी बहुत पसंद आया, और यह गाना 1990 का नंबर वन सॉंग्‍ था। और आप लोगों को भी पसंद आया"। इस गीत में राजस्थानी लोक गीत "बन्ना रे बागा में झूला गाल्या" का प्रयोग किया गया है। कोरस इस पंक्ति को गाती हैं और इस पंक्ति के जवाब में लता जी गाती हैं "आया रे छैल भँवर जी आया"। "बन्ना रे..." गीत के साथ घूमर नृत्य शैली में नृत्य किया जाता है। घूमर नृत्य राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य राजस्थान में प्रचलित अत्यंत लोकप्रिय नृत्य है, जिसमें केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती हैं। इसमें लहँगा पहने हुए स्त्रियाँ गोल घेरे में लोकगीत गाती हुई नृत्य करती हैं। जब ये महिलाएँ विशिष्ट शैली में नाचती हैं तो उनके लहँगे का घेर एवं हाथों का संचालन अत्यंत आकर्षक होता है। इस नृत्य में महिलाएँ लम्बे घाघरे और रंगीन चुनरी पहनकर नृत्य करती हैं। इसी सौन्दर्य को "गोरी हैं कलाइयाँ" गीत में दर्शाया गया है।
शब्बीर कुमार


"गोरी हैं कलाइयाँ" गीत के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जब मैं इस गीत के गायक शब्बीर कुमार से फ़ेसबूक पर सम्पर्क किया तो कुछ और रोचक तथ्य सामने आ गए। शब्बीर कुमार ने बताया, "यह गीत किसी और ने गाया था। लेकिन शायद अमिताभ बच्चन जी ने मेरा नाम सजेस्ट किया कि यह गीत शब्बीर कुमार को लता जी के साथ गवाया जाए! और गीत का अन्तरा एक ही साँस में शब्बीर कुमार से रेकॉर्ड कराया जाए! वैसे मैं किसी भी सिंगर का रेकॉर्डेड गीत डब नहीं करता, यह मेरा उसूल है, लेकिन मुझे बाद में बताया गया कि यह गीत किसी जाने-माने गायक ने गाया था। यही इस गीत के पीछे की संक्षिप्त और सही जानकारी है।" शब्बीर कुमार ने उस गायक का नाम तो नहीं बताना चाहा, पर हम कुछ कुछ अंदाज़ा ज़रूर लगा सकते हैं। इस फ़िल्म में शब्बीर कुमार के अलावा दो गीतों में अमित कुमार की आवाज़ थी - "चली आना तू पान की दुकान में" और "ना जा रे ना जा रे"; तथा एक अन्य गीत में मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ थी। इसलिए हो न हो, इन दो गायकों में से किसी एक की आवाज़ में रेकॉर्ड हुई होगी। ख़ैर, जो भी है, अन्तिम सत्य यही है कि इस गीत ने अपार शोहरत हासिल की। यह गीत न तो लता मंगेशकर का गाया सर्वश्रेष्ठ गीत है, न शब्बीर कुमार का, और न ही इसके गीतकार अंजान या संगीतकार बप्पी लाहिड़ी की श्रेष्ठ रचना। फिर भी कुछ तो बात है इस गीत में जो इसे भीड़ से अलग करती है, और आज भी जब हम इस गीत को सुनते हैं तो जैसे दिल ख़ुश हो जाता है।



फिल्म - आज का अर्जुन : 'गोरी हैं कलाइयाँ तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियाँ...' : लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार : संगीत - बप्पी लाहिड़ी 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, April 23, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - एक मुलाक़ात शब्बीर कुमार से

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 38

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! आज शनिवार की इस विशेष प्रस्तुति के लिए हम लेकर आये हैं फ़िल्म जगत के जाने-माने पार्श्वगायक शब्बीर कुमार से एक छोटी सी मुलाक़ात। छोटी इसलिए क्योंकि शब्बीर साहब का हाल ही में विविध भारती ने भी एक साक्षात्कार लिया था, जिसमें बहुत ही विस्तार से शब्बीर साहब नें अपने जीवन के बारे में और अपने संगीत करीयर के बारे में बताया था। बचपन की बातें, किस तरह से संगीत में उनकी दिलचस्पी हुई, रफ़ी साहब के वे कैसे फ़ैन बने, रफ़ी साहब से उनकी पहली मुलाक़ात कब और किस तरह से हुई, रफ़ी साहब के अंतिम सफ़र में वो किस तरीके से शरीक हुए, वो ख़ुद एक पार्श्वगायक कैसे बने, ये सब कुछ विविध भारती के उस साक्षात्कार में आ चुका है। आप में से जो श्रोता-पाठक उस कार्यक्रम को सुनने से चूक गये थे, उनके लिए इस साक्षात्कार का लिखित रूप हमनें 'विविध भारती लिस्नर्स क्लब' में पोस्ट किया था। ये रहे उसके लिंक्स:

'आज के महमान - शब्बीर कुमार - भाग-१-१'

'आज के महमान - शब्बीर कुमार - भाग-१-२'

'आज के महमान - शब्बीर कुमार - भाग-२-१'

'आज के महमान - शब्बीर कुमार - भाग-२-२'

दोस्तों, युं तो उपर्युक्त साक्षात्कार में शब्बीर कुमार से सभी अहम विषयों पर बातचीत हो चुकी थी, लेकिन पिछले दिनों जब शब्बीर साहब को मैंने अपने फ़ेसबूक में ऐड किया और उन्होंने उसकी मंज़ूरी दी, तो मेरे मन में दो चार सवाल जगे जो मैं उनसे जानना चाहता था, और मेरे ख़याल से जो सवाल विविध भारती के उस साक्षात्कार में शामिल नहीं हुए थे। मैंने शब्बीर साहब से मेरे सवाल भेजने की अनुमति माँगी जिसकी उन्होंने तुरंत स्वीकृति दे दी। तो ये रहे मेरे सवाल और शब्बीर कुमार के जवाब।

सुजॉय - शब्बीर जी, सबसे पहले आपका बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने मुझे फ़ेसबूक में ऐड किया। मैंने विविध भारती पर आप्का इंटरव्यु सुना है और बहुत ही विस्तार से आपनें उसमें अपने बारे में बताया है। फिर भी मेरे मन में कुछ सवाल है जो मैं आपको पूछना चाहता हूँ अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो?

शब्बीर जी - ज़रूर पूछिये!

सुजॉय - शुक्रिया! शब्बीर जी, आपनें हाल ही में फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' में एक गीत गाया है सुनिधि चौहान के साथ। यह बताइए कि इतने साल आप कहाँ थे? मुझे जितना याद है मैंने पिछली बार आपकी आवाज़ कपूर परिवार की फ़िल्म 'आ अब लौट चलें' में सुना था और गीत था "ओ यारों माफ़ करना"।

शब्बीर जी - वैसे मैं कभी भी इस इंडस्ट्री से बाहर नहीं हुआ था। ईश्वर की कृपा से मैं नियमित रूप से गा भी रहा था। 'आ अब लौट चलें' के बाद भी मैंने कई फ़िल्मों में गीत गाया है जैसे कि 'आवारा पागल दीवाना', 'आन', 'दिल ढूंढता है' वगेरह। और मैं प्रादेशिक फ़िल्मों में भी लगातार गाता रहा हूँ। लेकिन ये सभी गानें लोगों की नज़र में ज़्यादा नहीं आ सके।

सुजॉय - अच्छा, 'हाउसफ़ुल' में गाने का ऒफ़र आपको कैसे मिला?

शब्बीर जी - 'हाउसफ़ुल' साजिद ख़ान की फ़िल्म थी और साजिद मेरा बहुत बड़ा फ़ैन है। मुझे उनका ही कॉल आया था 'हाउसफ़ुल' में गाने के लिए।

सुजॉय - शब्बीर जी, आपनें जब गाना शुरु किया था, उस समय से लेकर आज तक, पूरा का पूरा युग बीत गया है, फ़िल्म संगीत का भी चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। इस परिवर्तन को आप किस रूप में देखते हैं? मेरा मतलब है कि लता जी, आशा जी, अनुराधा जी, इन सब के साथ लाइव रेकॉडिंग् करने के बाद आज ट्रैक पर गाना कैसा लगता है?

शब्बीर जी - ८० के दशक तक मैंने ६०-पीस ऒर्केस्ट्रा के साथ और म्युज़िक ऐरेंजर्स के साथ रेकॉर्ड किया है। लेकिन अब तकनीक इतना आगे बढ़ चुका है कि एक एक शब्द को अलग से डब किया जा सकता है। कोई भी ग़लती को सुधारा जा सकता है। इससे गायक के लिए काम बहुत आसान हो गया है, जो अच्छी बात है। लेकिन मैं समझता हूँ कि आज के दौर में गीत की आत्मा चली गई है। उस ज़माने में गायक जो मेहनत या ईफ़ोर्ट लगाता था, वह अब ज़रा सी कहीं पे कम हो गई है।

सुजॉय - क्या आपको याद है कि वह कौन सा गीत था जिसे आपने पहली बार ट्रैक पे गाया था?

शब्बीर जी - जी नहीं, यह तो मुझे अब याद नहीं कि मेरा पहला ट्रैक पे गाया हुआ गीत कौन सा था, लेकिन मैं यह ज़रूर बताना चाहूँगा कि किसी रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में रेकॉर्ड किया गया मेरा पहला गीत फ़िल्म 'तजुर्बा' में था।

सुजॉय - लता जी के साथ पहली बार गाने का अनुभव कैसा था? नर्वस थे आप?

शब्बीर जी - लता जी के साथ डुएट गाना मेरे सपने से परे था। लेकिन यह आशातीत स्वप्न सच साबित हुई फ़िल्म 'बेताब' में, जिसके लिए मैं पंचम दा को शत शत धन्यवाद देता हूँ। और मेरा पहला गीत लता जी के साथ "बादल युं गरजता है" रेकॉर्ड हुआ। और रही बात नर्वसनेस की, वह तो मैं यकीनन था ही।

सुजॉय - हा हा हा, कितने गीत गाये होंगे लता जी के साथ अब तक?

शब्बीर जी - अब तक मैंने लता दीदी के साथ ४८ गीत गा चुका हूँ, जो मैं समझता हूँ मेरे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है।

सुजॉय - बहुत सही बात है! कौन नहीं चाहता लता जी के साथ गाना या काम करना! अच्छा शब्बीर जी, आपके गाये गीतों की बात करें तो वह एक कौन सा गीत है जो आपका सब से पसंदीदा गीत रहा है, जो सब से ज़्यादा आपके दिल के क़रीब है? या कि वह गीत अभी आना बाक़ी है?

शब्बीर जी - मैंने अब तक ४५०० से ज़्यादा गीत गाया है, और इनमें से बहुत से गीत हैं जो मेरे दिल के बहुत ही करीब है। लेकिन एक गीत जो मेरे दिल के सब से ज़्यादा करीब है, वह है "ज़ीहाल-ए-मुस्क़ीन", फ़िल्म 'ग़ुलामी' का।

सुजॉय - वाह! यह गीत मुझे भी बेहद पसंद है और मुझे याद है बचपन में जब मैं इस गीत को सुनता था तो इसके बोल समझ में नहीं आते थे, लेकिन फिर भी गीत बहुत भाता था। शब्बीर जी, अब एक आख़िरी सवाल और यह सवाल है रफ़ी साहब से जुड़ा हुआ। रफ़ी साहब की मृत्यु के बाद कई गायक आये जिनकी आवाज़ में रफ़ी साहब जैसी आवाज़ की छाया थी। इनमें आप शामिल तो हैं ही, आपके अलावा मोहम्मद अज़ीज़, अनवर, देबाशीष दासगुप्ता, और यहाँ तक कि सोनू निगम भी रफ़ी साहब को अपना गुरु माना। मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि इनमें आपकी आवाज़ सब से ज़्यादा रफ़ी साहब की आवाज़ के क़रीब है। इस पर आपका क्या कहना है?

शब्बीर जी - इस ख़ूबसूरत कॉम्प्लिमेण्ट के लिए मुझे आपका शुक्रिया अदा करना चाहिए :-) वैसे विविध भारती के उस इंटरव्यु में मैं यह बता चुका हूँ कि अगर लोग यह कहते हैं कि मेरी आवाज़ रफ़ी साहब से मिलती है तो यह उनकी हसीन ग़लतफ़हमी है और कुछ नहीं।

सुजॉय - बहुत बहुत शुक्रिया शब्बीर जी, आपनें अपनी व्यस्तता के बावजूद हमारे सवालों के जवाब देने के लिए वक़्त निकाला। चलते चलते आपका पसंदीदा गीत फ़िल्म 'ग़ुलामी' का, हम अपने श्रोता-पाठकों को सुनवा रहे हैं।

शब्बीर जी - गॉड ब्लेस यू!

सुजॉय - सुनते हैं गुलज़ार के बोल, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत, लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार की आवाज़ें। फ़िल्म 'ग़ुलामी' का यह गीत फ़िल्माया गया था अनीता राज और मिथुन चक्रवर्ती पर।

गीत - ज़ीहाल-ए-मुस्क़ीन (ग़ुलामी)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष'। आशा है आपको अच्छा लगा होगा। आप से अनुरोध है कि 'ईमेल के बहाने यादों के बहाने' के लिए हमें oig@hindyugm.com पर ईमेल लिखें, जिसमें आप अपने जीवन की कोई यादगार घटना या संस्मरण लिख सकते हैं। अगले हफ़्ते एक और ख़ास प्रस्तुति के साथ हाज़िर होंगे। लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' नियमीत अंक लेकर हम कल शाम ६:३० बजे फिर उपस्थित होंगे, तब तक के लिए मुझे अनुमति दीजिये, और आप सुमित के साथ कल सुबह 'सुर-संगम' में ज़रूर तशरीफ़ लाइएगा, नमस्कार!

Wednesday, February 23, 2011

जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है....जबरदस्त सकारात्मक ऊर्जा है इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 599/2010/299

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और फिर एक बार स्वागत है इस महफ़िल में जिसमें हम इन दिनों पियानो की बातें कर रहे हैं। आइए आज पियानो का वैज्ञानिक पक्ष आज़माया जाए। सीधे सरल शब्दों में जब भी किसी 'की' पर वार होता है, एक चेन रीऐक्शन होता है जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। पहले 'की' 'विपेन' को उपर उठाता है, जो 'जैक' को 'हैमर रोलर' पर वार करवाता है। उसके बाद हैमर रोलर लीवर को उपर उठाता है। 'की' 'डैम्पर' को भी उपर की तरफ़ उठाता है, और जैसे ही 'हैमर' 'वायर' को स्ट्राइक करके ही वापस अपनी जगह चला जाता है और वायर में वाइब्रेशन होने लगती है, रेज़ोनेट होने लगता है। जब 'की' को छोड़ दिया जाता है, तो डैम्पर वापस स्ट्रिंग्स पर आ जाता है जिससे कि वायर का वाइब्रेशन बंद हो जाता है। वाइब्रेटिंग पियानो स्ट्रिंग्स से उत्पन्न ध्वनियाँ इतनी ज़ोरदार नहीं होती कि सुनाई दे, इसलिए इस वाइब्रेशन को एक बड़े साउण्ड-बोर्ड में पहुँचा दिया जाता है जो हवा को हिलाती है, और इस तरह से उर्जा ध्वनि तरंगों में परिवर्तित हो जाती हैं। अब बात आती है कि ये ध्वनि तरंगें किस तरह की होंगी, कितनी ऊँची पट्टी होगी। तीन चीज़ें हैं जो उस वाइब्रेशन के पिच पर असर करती हैं। ये हैं लम्बाई (वायर जितनी छोती होगी, पिच उतना ऊँचा होगा), चौड़ाई (वायर जितनी पतली होगी, पिच उतना ऊँचा होगा), और टेन्शन (वायर जितनी टाइट होगी, पिच उतना ऊँचा होगा)। एक वाइब्रेटिंग वायर अपने आप को कई छोटे वायरों में बाँट लेती है। और प्रत्येक भाग एक अपना अलग पिच उत्पन्न करती है, जिसे 'पार्शियल' (partial) कहते हैं। किसी वाइब्रेटिंग स्ट्रिंग में एक फ़ण्डमेण्टल होता है और पार्शियल्स का एक पूरा सीरीज़ होता है। इस विज्ञान को अगर और ज़्यादा गहराई से जानना हो तो आप किसी भी कॊलेज फ़िज़िक्स पुस्तक के 'साउण्ड' अध्याय को रेफ़र कर सकते हैं।

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला में कल आपने ८० के दशक का एक गीत सुना था और आज भी हम इसी दशक में रहेंगे, और कल के और आज के गाने में एक और समानता यह है कि इन दोनों गानों में कुछ हद तक जीवन दर्शन की बातें छुपी हुईं हैं। "जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले" के बाद आज बारी है "ज़िंदगी हर क़दम एक नई जंग है, जीत जाएँगे हम तू अगर संग है"। जी हाँ, १९८५ की ब्लॊकबस्टर फ़िल्म 'मेरी जंग' का सब से उल्लेखनीय यह गीत है हमारे आज के अंक का गीत। यह गीत भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ था और फ़िल्म की कहानी के साथ भी सीधी सीधी जुड़ी हुई है। फ़िल्म की शुरुआत में नूतन और गिरिश करनाड अपने बच्चों के साथ इस गीत को गाते हुए नज़र आते हैं (लता और नितिन मुकेश की आवाज़ों में)। एक ग़लत केस में गिरिश करनाड फँस जाते हैं और उन्हें फाँसी हो जाती है, जिसे नूतन सह नहीं पातीं और मानसिक संतुलन खो बैठती हैं। उनका बेटा अनिल कपूर अपनी माँ और बहन की देखभाल करता है, और कोशिश करता रहता है कि अपनी माँ की याद्दाश्त वापस ला सके। और इस प्रयास में उनका सहारा बनता है वही गीत, और बार बार वो इस गीत को गाते रहते हैं। इस तरह से इस गीत के दो और वर्ज़न है फ़िल्म में, एक शब्बीर कुमार का एकल और एक में शब्बीर कुमार के साथ लता जी भी हैं, जो फ़िल्माया गया है अनिल कपूर और उनकी नायिका मीनाक्षी शेषाद्री पर। और आख़िरकार यही गीत नूतन की याद्दाश्त वापस लाता है। एन.एन. सिप्पी निर्मित और सुभाष घई निर्देशित इस फ़िल्म को लोगों ने हाथों हाथ लिया, और फ़िल्मफ़ेयर में इस फ़िल्म में जानदार अभिनय के लिए नूतन और अमरीश पुरी, दोनों को ही सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री और सह-अभिनेता के पुरस्कार मिले। 'मेरी जंग' के गीतकार थे आनंद बक्शी और संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। इस गीत में पियानो का इस्तेमाल जितना सुंदर है, उतने ही शानदार हैं इसके बोल। पूर्णत: आशावादी स्वर में लिखे इस गीत को जब भी हम सुनते हैं, दिल में जैसे एक जोश उत्पन्न हो जाता है ज़िंदगी को एक चैलेंज की तरह स्वीकार करने का। और अगर आप मायूस हैं, टेन्शन में है, दुखी हैं, तो यकीन मानिये, यह गीत किसी दवा से कम कारगर नहीं है। आज़माके देखिएगा कभी! तो आइए इस ख़ूबसूरत गीत को सुना जाये, पहले लता मंगेशकर और नितिन मुकेश की आवाज़ों में और उसके बाद शब्बीर कुमार और लता मंगेशकर की आवाज़ों में। इस गीत में आप मेरी पसंद भी शामिल कर लीजिए, बचपन से लेकर आज तक यह मेरे फ़ेवरिट गीतों में से एक रहा है। और दोस्तों, आज चलते चलते 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तरफ़ से हम भी आप से यही कहना चाहेंगे कि जीत जाएँगे हम आप अगर हमारे संग है। तो अपना साथ युंही बनाये रखिएगा, हमेशा।





क्या आप जानते हैं...
कि यामाहा पियानो कंपनी ने एक नई तरह का पियानो बनाया है जिसकी कीमत कुछ ३३३,००० अमरीकी डॊलर्स है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - १९९१ में प्रदर्शित हुई थी ये फिल्म.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक की ये पहली फिल्म थी, और वो मुख्यता अभिनय तक सीमित रहते हैं, कौन हैं ये - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्माता कौन थे - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
कल तो अंजाना जी जल्दबाजी में बुरी तरह चूक गए, और ये चूक उन्हें भारी पड़ सकती है....यानी आज फैसला मैच की अंतिम गेंद पर होगा...अंजाना जी आपसे ऐसी शिकायत की उम्मीद नहीं थी...ये तो गुगली है बीच बीच में नहीं पड़े तो सपाट पिच में गेम का मज़ा नहीं रहता...इसे स्पोर्ट्समैन शिप के साथ लीजिए...मौसम क्रिकेट का है इसलिए हम भी जरा उसी भाषा में बतिया रहे हैं....वैसे विजय जी आपको भी कुछ शिकायत थी...कुछ हद तक दूर हुई या नहीं...:)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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