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Thursday, October 1, 2009

दर्द-ए-उल्फ़त छुपाऊँ कहाँ....लता ने किया एक मासूम सवाल शंकर जयकिशन के संगीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 219

गीतकार शैलेन्द्र, संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन और गायिका लता मंगेशकर की जब एक साथ बात चलती है तो इतने सारे मशहूर, हिट और शानदार गीत एक के बाद एक ज़हन में आते जाते हैं कि जिनका कोई अंत नहीं। चाहे राज कपूर की फ़िल्मों के गानें हों या किसी और फ़िल्मकार के, इस टीम ने 'बरसात' से जो सुरीली बरसात शुरु की थी उसकी मोतियों जैसी बूँदें हमें आज तक भीगो रही है। लेकिन ऐसे बेशुमार हिट गीतों के बीच बहुत से ऐसे गीत भी समय समय पर बने हैं जो उतनी ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुए और इन हिट गीतों की चमक धमक में इनकी मंद ज्योति कहीं गुम हो गई, खो गई, लोगों ने भुला दिया, समय ने उन पर पर्दा डाल दिया। ऐसा ही एक गीत आज के अंक में सुनिए। फ़िल्म 'औरत' का यह गीत है "दर्द-ए-उल्फ़त छुपाऊँ कहाँ, दिल की दुनिया बसाऊँ कहाँ"। बड़ा ही ख़ुशरंग और ख़ुशमिज़ाज गीत है यह जिसमें है पहले पहले प्यार की बचैनी और मीठे मीठे दर्द का ज़िक्र है। मज़ेदार बात यह है कि बिल्कुल इसी तरह का गीत शंकर जयकिशन ने अपनी पहली ही फ़िल्म 'बरसात' में लता जी से गवाया था। याद है न आपको हसरत साहब का लिखा "मुझे किसी से प्यार हो गया"? बस, बिल्कुल उसी अंदाज़ का गीत है, फ़र्क बस इतना कि इस बार शैलेन्द्र साहब है यहाँ गीतकार. एक और मज़ेदार बात यह कि इसी फ़िल्म 'औरत' में हसरत जयपुरी साहब ने भी लता जी से पहले प्यार पर आधारित एक गीत गवाया था "नैनों से नैन हुए चार आज मेरा दिल आ गया, अरमान पे छायी है बहार आज मेरा दिल आ गया"। इसी साल १९५३ में फ़िल्म 'आस' में एक बार फिर शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन ने लता जी से गवाया "मैं हूँ तेरे सपनों की रानी तूने मुझे पहचाना ना, हरदम तेरे दिल में रही मैं फिर भी रहा तू अंजाना"। फ़िल्म 'औरत' बनी थी सन् १९५३ में 'वर्मा फ़िल्म्स' के बैनर तले। बी. वर्मा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे बीना राय और प्रेमनाथ। लता जी के गाए कुछ गीतों का ज़िक्र हमने अभी किया, लेकिन एक और ज़रूरी बात यह भी कि फ़िल्म 'औरत' का शीर्षक गीत लता जी से नहीं बल्कि आशा जी से गवाया गया था, जिसके बोल थे "लोग औरत को फोकट जिस्म समझते हैं"। महबूब ख़ान ने 'औरत' शीर्षक से सन् १९४० में एक फ़िल्म बनाई और उसी का रीमेक बनाया 'मदर इंडिया' के नाम से जिसे हिंदी सिनेमा का एक मील का पत्थर माना जाता है।

दोस्तों, लता जी और ख़ास कर जयकिशन जी की आपस में अच्छी दोस्ती थी, और दोनों एक दूसरे से ख़ूब झगड़ते भी थे, नोक झोक चलती ही रहती थी। उन्ही दिनों को और जयकिशन जी को याद करते हुए लता जी ने अमीन सायानी साहब के उस इंटरव्यू में क्या कहा था, आइए आज के इस अंक में उसी पर नज़र डालते हैं। "जयकिशन और मैं, हम दोनो हम-उम्र थे। बस ६ महीनों का फ़र्क था हम दोनों में। 'बरसात' और 'नगिना' जैसी फ़िल्मों के बाद हम लोगों का एक बड़ा मज़ेदार ग्रूप बन गया था। हम लोग यानी शंकर साहब, शैलेन्द्र जी, हसरत साहब, मुकेश भ‍इया। हम सब एक साथ काम भी करते, घूमने भी जाते, तर्ज़ें भी डिस्कस करते, और कभी कभी बहुत झगड़े भी होते थे। बस छोटी छोटी बातों पर, ख़ास तौर पर जयकिशन के साथ। कभी मैं उनकी धुन की बुराई करती तो कभी वो मेरी आवाज़ पर कोई जुमला कर देते। और इस तरह जब ठनती तो दिनों तक ठनी रहती। मुझे याद है, मैने एक बार झुंझलाकर उससे कह दिया कि जाओ, अब मैं तुम्हारे लिए नहीं गाती, किसी और से गवा लेना, यह कह कर मैं चल दी अपने घर। घर पहुँचकर मैं भी पछताई और वो भी पछताए। लेकिन दोनों ही अड़े रहे। फिर शैलेन्द्र और शंकर भाई उन्हे पकड़कर मेरे घर ले आए। और बस फिर दोस्ती वैसी की वैसी।" तो दोस्तों, आइए सुनते हैं आज का यह गीत और एक बार फिर से शुक्रिया अदा करते हैं अजय देशपाण्डे जी का जिनके सहयोग से लता जी के गाए ये तमाम दुर्लभ नग़में हमें प्राप्त हुए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अनिल बिस्वास के लिए गाया लता ने ये दुर्लभ गीत.
२. कैफ भोपाली के लिखे इस गीत को बूझ कर ३ अंक पाने के है आज आखिरी मौका.
३. मुखड़े में शब्द है -"कश्ती".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी बधाई हो..३ अंक और आपके खाते में हैं.....आपका स्कोर है ३७, अब आप सबसे आगे हैं अंकों के मामले में ...बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, September 30, 2009

रात के राही थम न जाना....लता की पुकार, साहिर के शब्दों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 218

'मेरी आवाज़ ही पहचान है' शृंखला की आज की कड़ी में लता जी के जिस दुर्लभ नग़मे की बारी है, उसके गीतकार और संगीतकार हैं साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन, जिन्होने एक साथ बहुत सारी फ़िल्मों के गानें बनाए हैं। और लगे हाथ आप को यह भी बता दें कि बहुत जल्द हम इस गीतकार- संगीतकार जोड़ी के गीतों से सजी एक पूरी की पूरी शृंखला आप की सेवा में प्रस्तुत करने जा रहे हैं। तो आज जिस गीत को हमने चुना है, या युं कहें कि आज के लिए जिस गीत को लता जी के अनन्य भक्त नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे ने हमें चुन कर भेजा है, वह गीत है फ़िल्म 'बाबला' का, "रात के राही थक मत जाना, सुबह की मंज़िल दूर नहीं"। एक बहुत ही आशावादी गीत है जिसके हर एक शब्द में यही सीख दी गई है कि दुखों से इंसान को कभी घबराना नहीं चाहिए, हर रात के बाद सुबह को आना ही पड़ता है। इस तरह आशावादी रचनाएँ बहुत सारी यहाँ बनी हैं और जिनमें से बहुत सारे बेहद लोकप्रिय भी हुए हैं। लेकिन फ़िल्म 'बाबला' के इस गीत को बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया है और समय के साथ साथ मानो इस गीत पर धूल सी जम गयी है। आज हमारी छोटी सी कोशिश है इस धूल की परत को साफ़ करने की और इस भूले बिसरे गीत की मधुरता में खो जाने की तथा इसमें दी गई उपदेश पर अमल करने की। फ़िल्म 'बाबला' बनी थी सन् १९५३ में एम. पी. प्रोडक्शन्स के बैनर तले, जिसका निर्देशन किया था अग्रदूत ने। दोस्तों, आप को एम. पी प्रोडक्शन्स की बारे में पता है ना? यह वही बैनर है जिसने सन् १९४२ में कानन बाला को लेकर बनाई थी फ़िल्म 'जवाब' जिसमें कानन बाला का गाया "दुनिया ये दुनिया तूफ़ान मेल" उस ज़माने का सब से हिट गीत बन गया था। इससे पहले कानन बाला न्यु थियटर्स से अनुबंधित थीं, लेकिन फ़िल्म 'जवाब' से वो 'फ़्रीलांसिंग' पर उतर आईं। ख़ैर, एम. पी. प्रोडक्शन्स की फ़िल्म 'बाबला' के मुख्य कलाकार थे मास्टर नीरेन, शोभा सेन, मंजु डे, हीरालाल और परेश बैनर्जी। ये सभी कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री के कलाकार थे। इस फ़िल्म में लता जी के साथ साथ तलत साहब ने भी कुछ गीत गाए थे।

आज जब बर्मन दादा और लता जी की एक साथ बात चली है तो आज हम जानेंगे लता जी क्या कहती हैं इस सदाबहार संगीतकार के बारे में, जिन्हे वो पिता समाम मानती हैं। लता जी और दादा के बीच में हुई अन-बन की बात तो हम एक दफ़ा कर चुके हैं, आज कुछ और हो जाए। अमीन सायानी के उस इंटरव्यू का ही हिस्सा है यह अंश - "बर्मन दादा हमेशा डरे रहते थे। उनको लगता था कि लता अगर नहीं आई तो गाना मेरा क्या होगा! वो जब ख़ुद गा कर बताते थे तो हम लोगों को थोड़ी मुश्किल होती थी कि हम दादा की तरह कैसे गाएंगे। तो उनकी आवाज़ ज़रा सी टूटती थी। तो वो हम नहीं, मतलब मैं नहीं कर सकती थी। पर मैं उनसे हमेशा पूछती थी कि दादा, ये कैसे गाऊँ? तो वो बताते थे कि तुम इसे इस तरह गाओ तो अच्छा लगेगा। जब वो बहुत ज़्यादा 'ऐप्रीशिएट' करते थे तो उनकी एक ख़ास बात थी कि वो पान खिलाते थे, (हँसते हुए), क्योंकि वो ख़ुद पान खाते थे। पर वो पान किसी को नहीं देते थे, पर जिसको दिया वो समझ लीजिए कि उससे वो बहुत ख़ुश हैं। और वो पान मुझे हमेशा देते थे।" दोस्तों, आज बर्मन दादा तो नहीं रहे लेकिन लता जी की यादों में वो ज़रूर ज़िंदा हैं और ज़िंदा हैं अपने अनगिनत लोकप्रिय गीतों के ज़रिए। लता जी की तरफ़ से बर्मन दादा के नाम हम यही कह सकते हैं कि "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए, हम भरी दुनिया में तन्हा रह गए"। तो आइए, आप और हम मिल कर सुनते हैं फ़िल्म 'बाबला' से लता, साहिर और दादा बर्मन की यह बेमिसाल रचना "रात के राही थक मत जाना, सुबह की मंज़िल दूर नहीं"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक मस्ती भरा गीत शैलेन्द्र का लिखा, लता का गाया.
२. धुन है शंकर जयकिशन की.
३. गीत चुलबुला है पर इस शब्द से शुरू होता है -"दर्दे.."

पिछली पहेली का परिणाम -

वाह वाह लता जी के दुर्लभ गीतों की मुश्किल पहेली का जवाब देने आये नए प्रतिभागी, मुरारी पारीख....बधाई आपका खाता खुला है ३ शानदार अंकों से. आशा है आगे भी आप इसी तरह सक्रिय रहेंगें...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, September 29, 2009

दुखियारे नैना ढूँढ़े पिया को... इन्दीवर के बोल और लता के स्वर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 217

'मेरी आवाज़ ही पहचान है' के तहत इन दिनों आप सुन रहे हैं लता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीत जिन्हे चुनकर हमें भेजा है नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे ने। अब तक आप ने जिन संगीतकारों की रचनाएँ इस शृंखला में सुने, वे थे खेमचंद प्रकाश, मास्टर ग़ुलाम हैदर, हुस्नलाल भगतराम, पंडित गोबिन्दराम और सी. रामचन्द्र। आज जिस संगीतकार की बारी है, वो एक ऐसे संगीतकार रहे जिनके साथ लता जी का भाई बहन का गहरा रिश्ता बना और इन दोनों ने मिलकर फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को कुछ इस तरह समृद्ध किया कि आज दशकों बाद भी उन तमाम सुरीली मोतियों से रोशन है यह ख़ज़ाना। इन दोनों ने ख़ास कर फ़िल्मी ग़ज़लों की धारा ही बदल दी और उन्हे आम गीतों की तरह लोकप्रिय बनाया। जी हाँ, हम आज संगीतकार मदन मोहन की ही बात कर रहे हैं। अपने मदन भ‍इया के बारे में लता जी ने समय समय पर कई इंटरव्यू में कहे हैं, आज भी हम ऐसी ही एक इंटरव्यू के अंश लेकर उपस्थित हुए हैं। लता जी का यह इंटरव्यू अमीन सायानी ने कुछ साल पहले लिया था। "मदन भ‍इया के बारे में मैं यही कहूँगी कि जब भी रिकार्डिंग होती थी तो उनका एक यही होता था कि रिहर्सल वगेरह करते रहते थे, तो वो गाते ही रहते थे, और मुझसे कहते थे कि इसमें से तुमको जो ठीक लगे वो उठा लो। घर की बात थी, मैं उनके घर जाती थी, कभी कभी मैं सारा सारा दिन उनके साथ रहती थी, खाना बहुत अच्छा बनाते थे, 'म्युज़िक डिरेक्टर' मेरे हिसाब से बहुत बड़े थे, जैसे ग़ज़लें उन्होने बनाई, फ़िल्मों के लिए, किसी ने नहीं बनाई। बहुत लोगों ने कोशिश की और आज भी लोग कोशिश कर रहे हैं कि मदन मोहन की स्टाइल की ग़ज़ल बनाएँ पर कोई बना नहीं सकता है। अब ये सुनिए कि उनको संगीत की कितनी बड़ी देन थी। आमद का यह हाल था कि हारमोनियम लेके बैठे और धुन युँही चुटकियों में बन जाती। कभी मोटर चलाते हुए, कभी लिफ़्ट में उपर या नीचे जाते हुए भी तो धुन तैयार हो जाती। मदन भ‍इया एक दो साल मिलिटरी में रहे थे। और शायद इसी वजह से उनकी उपरी बरताव में एक सख़ती हुआ करती थी। कई बार बड़े रफ़ से लगते थे। बातें खरी खरी मुँह पर सुना देते थे। प्यार भी उनका युं होता था कि बस हाथ उठाया और धम से मार दिया। मगर यह सख़ती सिर्फ़ उपर की थी, अंदर से तो वो बड़े भावुक थे और बड़े नरम। और यही नरमी, यह भावुकता, कभी कभी झलक दिखला जाती थी दिल को छू लेने वाली धुनों में ढलकर।"

लता मंगेशकर और मदन मोहन की जोड़ी का जो दुर्लभ नग़मा आज के लिए हमने चुना है वह है फ़िल्म 'निर्मोही' से। १९५२ में मदन मोहन के संगीत में इंटर्नेट से उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुल ४ फ़िल्में परदर्शित हुईं थीं - अंजान, आशियाना, ख़ूबसूरत, और निर्मोही। 'निर्मोही' का निर्माण 'शीतल मूवीज़' के बैनर तले हुआ था, जिसके निर्देशक थे बृज शर्मा। सज्जन, नूतन, अमरनाथ, लीला मिश्रा अभिनीत यह फ़िल्म बड़ी बजट की फ़िल्म नहीं थी। शायद यही वजह थी कि मदन मोहन के रचे और लता जी के गाए इस फ़िल्म के गीतों को आज लोग कुछ भूल से गए हैं। लता जी ने इस फ़िल्म में कई गीत गाए, जिन्हे अलग अलग गीतकारों ने लिखे। लता जी की आवाज़ में पी. एन. रंगीन के लिखे दो गीत थे इस फ़िल्म में - "अब ग़म को बना लेंगे जीने का सहारा, दिल टूट गया छूट गया साथ हमारा" और "ये कहे चांदनी रात सुना दो अपने दिल की बात, आई रुत मस्तानी आई रुत मस्तानी"। उद्धव कुमार का लिखा गीत था "कल जलेगा चाँद सारी रात, रात भर होती रहेगी आग़ की बरसात"। लेकिन आज हम जिस गीत को सुनवा रहे हैं उसे लिखा है इंदीवर साहब ने - "दुखियारे नैना ढ़ूंढे पिया को, निसदिन करें पुकार"। इस गीत में "दुखियारे नैना" की धुन कुछ कुछ मदन मोहन साहब की ही फ़िल्म 'देख कबीरा रोया' की "मेरी वीणा तुम बिन रोये" की तरह सुनाई देती है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित यह गीत फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने का एक अनमोल नगीना है। ऐसे न जाने लता - मदन मोहन के कितने गीत होंगे जिन्हे आज हम ज़्यादा याद नहीं करते, लेकिन जब भी कभी इन्हे सुनते हैं बस इनमें डूब से जाते हैं। भविष्य में लता-मदन मोहन के कमचर्चित गीतों पर एक शृंखला प्रस्तुत करने की हम ज़रूर कोशिश करेंगे, फिलहाल सुनिए आज का यह अनमोल गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. साहिर है गीतकार लता के गाये इस दुर्लभ गीत के.
२. एस डी बर्मन की धुन से सजे इस गीत बूझकर पाईये 3 अंक.
३. इस प्रेरणात्मक गीत की पहली पंक्ति में शब्द है -"राही".

पिछली पहेली का परिणाम -
बिलकुल सही गीत है पूर्वी जी आपके ३१ शानदार अंक हो गए है और आप दूसरे स्थान पर हैं अब.....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, September 28, 2009

मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा सिंगार है....लता जी का हँसता हुआ चेहरा संगीत प्रेमियों के लिए ईश्वर का प्यार है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 216

ज २८ सितंबर का दिन फ़िल्म संगीत के लिए एक बेहद ख़ास दिन है। क्यों शायद बताने की ज़रूरत नहीं। लता जी को ईश्वर दीर्घायु करें, उन्हे उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें, लता जी के जन्मदिन पर हम तह-ए-दिल से उन्हे मुबारक़बाद देते हैं। आज है साल २००९। आज से ८० साल पहले १९२९ को लता जी का जन्म हुआ था मध्य प्रदेश के इंदौर में। दोस्तों आज मौका है लता जी के जन्मदिन का, तो क्यों ना आज हम उन्ही से जानें उनकी जनम के बारे में। एक बार अमीन सायानी ने लता जी का एक इंटरव्यू लिया जिसमें उन्होने लता जी को कई 'कॊन्ट्रोवर्शियल' सवालों के जाल से घेर लिया था, लेकिन लता जी हर बार जाल को चीरते हुए बाहर निकल आईं थीं। उन सवालों में से एक सवाल यह भी था - "कुछ लोगों का ख़याल है कि कुछ सस्पेन्स सा आप ने क्रीएट किया हुआ है कि आप कहाँ पैदा हुईं थीं। कुछ कहते हैं गोवा में पैदा हुईं थीं, कुछ कहते हैं धुले में, कुछ इंदौर में, तो कुछ कहीं और का बताते हैं। तो आप बताइए कि आप कहाँ पैदा हुईं थीं?" लता जी का बेझिझक जवाब था - "नहीं, इसमें कोई सस्पेन्स नहीं है अमीन भाई, मेरा जनम इंदौर में हुआ है, क्योंकि मेरी मौसी वहाँ रहती थीं, और मेरी माँ जब, मतलब मैं पेट में थीं तो वहाँ गई, मौसी के वहाँ, पहला जो बच्चा होता है वो अपने मायके में होता है, तो वहाँ नहीं जा सकी जहाँ मेरी नानी रहती थीं, क्योंकि छोटा सा गाँव था, तो वो फिर इंदौर गईं और इंदौर में सिख मोहल्ले में मेरा जनम हुआ। और वहाँ वकील का बाड़ा था वह। मेरे पिताजी गोवा के थे, माँ धुले की तरफ़ छोटा सा गाँव है, और मेरी माँ की जो माँ थीं वो गुजराती नहीं थीं पर पिताजी गुजराती थे, मेरे नाना गुजराती थे, और उनको महाराष्ट्र से बड़ा प्यार था, महाराष्ट्र की भाषा से, और वो मराठी बोलते थे, गुजराती बहुत कम बोलते थे। और मैं सिख मोहल्ले में पैदा हुई, इसलिए मेरे बाल लम्बे हैं (यह कहकर लता जी ज़ोर से हँस पड़ीं)।"

लता जी के जन्मदिन पर हम उनकी शुभकामना करते हुए उनके जिस दुर्लभ गीत को प्रस्तुत करने जा रहे हैं वह है १९५२ की फ़िल्म 'शीशम' का। इस शृंखला में आप दस संगीतकारों के संगीतबद्ध किए दस बेहद दुर्लभ गीत सुन रहे हैं, तो आज के कड़ी के संगीतकार हैं रोशन। गीत इंदीवर का लिखा हुआ है। फ़िल्म 'शीशम' बनी थी 'अनिल पिक्चर्स' के बैनर तले। किशोर शर्मा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नासिर ख़ान और नूतन। इसके पिछले साल, १९५१ में फ़िल्म 'मल्हार' में लता-मुकेश के गाए सुपरहिट गीत "प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम" के बाद 'शीशम' में रोशन ने एक बार फिर से लता-मुकेश से गवाया "सपनों में आना छेड़ छेड़ जाना सीखा कहाँ से मेरे बलम ने"। इस फ़िल्म में भी कई गीतकारों ने गीत लिखे जैसे कि इंदीवर, ज़िया सरहदी, उद्धव कुमार, नज़ीम पानीपती और कैफ़ इर्फ़ानी। आज का गीत है "मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा सिंगार है, तू है जब तक ज़िंदगी में ज़िंदगी से प्यार है"। बेहद मीठा और सुरीला गाना है यह। सोचने वाली बात है कि क्या कमी रह गई होगी इस गीत में जो यह गीत बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हुआ, और ना ही आज कहीं से सुनाई देता है। आज लता जी के जन्मदिन पर उनकी तारीफ़ में भी हम इसी गीत के मुखड़े के आधार पर यही कहेंगे कि 'लता जी, आपकी आवाज़ ही फ़िल्म संगीत का सिंगार है, और जब तक आप के गाए गीत हमें कहीं ना कहीं से सुनाई देते रहेंगे, हम सब युंही जीते रहेंगे।" इससे ज़्यादा आपकी तारीफ़ में और क्या कहें!



मुस्कराहट तेरे होठों की मेरा सिंगार है
तू है जब तक ज़िन्दगी में ज़िन्दगी से प्यार है ।

मैनें कब मांगी मुहब्बत कब कहा तुम प्यार दो
प्यार तुमको कर सकूं इतना मुझे अधिकार दो
मेरे नैया की तुम्हारे हाथ में पतवार है ।

मेरे काजल में भरा है रंग तेरी तस्वीर का
सामने है तू मेरे एहसान है तक्दीर का
तेरी आँखों में बसाया मैनें इक संसार है ।


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मदन मोहन की तर्ज पर लता के गाये इस गीत को बूझिये और जीतिए ३ अंक.
२. एक बार फिर गीतकार हैं इन्दीवर.
३. मुखड़े में शब्द है -"निसदिन"

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी ६ अंकों पर पहुँच गए हैं आप....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 27, 2009

मैं हूँ कली तेरी तू है भँवर मेरा, मैं हूँ नज़र तेरी तू है जिगर मेरा...लता का एक दुर्लभ गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 215

ता मंगेशकर के गाए कुछ भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों पर आधारित हमारी विशेष शृंखला आप इन दिनों सुन रहे हैं 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। अब तक आप ने कुल ४ गानें सुने हैं जो ४० के दशक की फ़िल्मों से थे। आइए आगे बढ़ते हुए प्रवेश करते हैं ५० के दशक में। सन् १९५१ में एक फ़िल्म आयी थी 'सौदागर'। 'वेस्ट हिंद पिक्चर्स' के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नासिर ख़ान और रेहाना। पी. एल. संतोषी के गीत थे और सी. रामचन्द्र का संगीत। दोस्तों, इससे पहले हम ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पी. एल. संतोषी और सी. रामचन्द्र के जोड़ी की बातें भी कर चुके हैं और 'शिन शिना की बबला बू' फ़िल्म के गीत "तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोये" सुनवाते वक़्त संतोषी साहब और रेहाना से संबंधित एक क़िस्सा भी बताया था। अगर आप ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हाल ही में क़दम रखा है तो उस आलेख को यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। इस गीत के अलावा पी. एल. संतोषी, सी. रामचन्द्र और लता जी की तिकड़ी का जो एक और गीत हमने आप को यहाँ सुनवाया है वह है फ़िल्म 'सरगम' का "वो हम से चुप हैं हम उनसे चुप हैं"। ये दोनों ही गीत अपने ज़माने के बेहद मशहूर गीतों मे से रहे हैं। लेकिन आज इस तिकड़ी के जिस गीत को हम पेश कर रहे हैं वह इन गीतों से अलग हट के है। 'सौदागर' फ़िल्म के इस गीत के बोल हैं "मैं हूँ कली तेरी तू है भँवर मेरा, मैं हूँ नज़र तेरी तू है जिगर मेरा"। लता और सखियों की आवाज़ों में इस गीत को सुनते हुए, इसके रीदम को सुनते हुए आप को सी. रामचन्द्र का वह मशहूर गीत "भोली सूरत दिल के खोटे" ज़रूर याद आ जायेगा, इन दोनों गीतों के बीट्स एक जैसे ही हैं। गोवन लोक संगीत की छटा इस गीत में बिखेरी है चितलकर साहब ने।

लता जी ने सी. रामचन्द्र के संगीत में ५० के दशक में बेशुमार गानें गाए हैं। लेकिन पता नहीं किसकी नज़र लग गई कि इन दोनों में कुछ ग़लतफ़हमी सी हो गई और दोनों ने एक दूसरे के साथ काम करना बंद कर दिया कई सालों के लिए। चलिए आज वही दास्तान आप को बताते हैं ख़ुद लता जी के शब्दों में जिन्हे उन्होने अमीन सायानी के एक इंटरव्यू में कहा था।

"मेरा दुश्मन कोई नहीं है, ना ही मैं किसी की दुश्मन हूँ। पर इतने सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स के साथ जब हम काम करते हैं, इतने लोग मिलते हैं रोज़, तो कहीं ना कहीं छोटी मोटी बात हो जाती है। उनके (सी. रामचन्द्र) साथ क्या हुआ था कि एक रिकार्डिस्ट थे जो मेरी पीठ पीछे कुछ बात करते थे। मुझे मालूम हुआ था और वो जिसने मुझे बताया था वो आदमी मुझे बहुत ज़्यादा प्यार करता था, कहता था 'मैं सुन नहीं सकता हूँ लता जी, वो आप के बारे में बात ऐसी करते हैं'। और मेरी रिकार्डिंग थी सी. रामचन्द्र की जो उसी स्टुडियो में। अन्ना को कहा कि 'अन्ना, मैं इस रिकार्डिस्ट के पास रिकार्डिंग नहीं करूँगी क्योंकि ये मेरे लिए बहुत ख़राब बात करता है। जब मैं गाउँगी मेरा मन नहीं लगेगा यहाँ और मैं जब गाती हूँ मेरे दिमाग़ को अच्छा लगना चाहिए, सुकून मिलना चाहिए कि भई जो गाना मैं गा रही हूँ, अच्छा लग रहा है, तभी गाना अच्छा बन सकता है।' उनको पता नहीं क्या हुआ, उन्होने कहा कि 'लता, तुम अगर नहीं गाओगी तो मैं भी अपने दोस्त को नहीं छोड़ सकता हूँ, मैं तुम्हारी जगह किसी और को लाउँगा'। मैने कहा कि 'बिल्कुल आप ला सकते हैं, किसी को भी ले आइए'। और मैने वह काम छोड़ दिया, पर मेरा उनका झगड़ा ऐसा नहीं हुआ। मैने वह गाना, मतलब रिहर्सल किया हुआ, मैं छोड़ के चली आई और उन्होने फिर किसी और से वह गाना लिया, और वह एक मराठी गाना था। तो वह गाना होने के बाद, उस समय उनके पास काम भी बहुत कम था, और फिर बाद में मेरी उनकी बात नहीं हुई, मुलाक़ात नहीं हुई, कुछ नहीं। और फिर अगर उनका मेरा इतना झगड़ा हुआ होता तो फिर वो मेरे पास दोबारा "ऐ मेरे वतन के लोगों" लेकर आते? तो झगड़ा तो था ही नहीं। "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए वो मेरे घर आए बुलाने के लिए, वो और प्रदीप जी, दोनों ने आ कर कहा कि 'यह गाना तुमको गाना ही पड़ेगा'। मैने कहा 'मैं गाउँगी नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं, रिहर्सल करना पड़ेगा, दिल्ली जाना पड़ेगा'। पर उस गाने के लिए प्रदीप जी ने बहुत ज़ोर लगाया। प्रदीप जी ने यहाँ तक कहा कि 'लता, अगर तुम यह गाना नहीं गाओगी तो फिर मैं यह गाना दूँगा ही नहीं।' तो उनका दिल नहीं तोड़ सकी मैं।"

तो दोस्तों, ये बातें थीं लता जी की कि किस तरह से उनके और अन्ना के बीच में दूरियाँ बढ़ी और किस तरह से "ऐ मेरे वतन के लोगों" ने सुलह भी करवा दिया। तो आइए अब लता और अन्ना की सुरीली जोड़ी के नाम सुनते हैं आज का यह गीत, जिसके लिए हम विशेष रूप से आभारी हैं अजय देशपाण्डे जी के जिन्होने इस गीत को हमें उपलब्ध करवाया, सुनिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. संगीतकार रोशन के लिए गाया लता ने ये गीत..बूझने वाले को मिलेंगें २ के स्थान पर ३ अंक.
२. इस फिल्म में कलाकार थे नासिर खान और नूतन.
३. मुखड़े में शब्द है -"सिंगार".

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह पराग लगातार २ सही जवाब और आपका स्कोर पहुंचा है ३६ पर...बधाई...हमारे और धुरंधर सब कहाँ चले गए भाई....सभी को नवमी, दुर्गा पूजा और दशहरे की ढेरों बधाईयाँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, September 26, 2009

इतना भी बेकसों को न आसमान सताए...पंडित गोविन्दराम के सुरों के लिए स्वर मिलाये लता ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 214

"मुझसे चलता है सर-ए-बज़्म सुखन का जादू,
चांद ज़ुल्फ़ों के निकलते हैं मेरे सीने से,
मैं दिखाता हूँ ख़यालात के चेहरे सब को,
सूरतें आती हैं बाहर मेरे आइने से।

हाँ मगर आज मेरे तर्ज़-ए-बयाँ का ये हाल,
अजनबी कोई किसी बज़्म-ए-सुखन में जैसे,
वो ख़यालों के सनम और वो अलफ़ाज़ के चांद,
बेवतन हो गए अपने ही वतन में जैसे।

फिर भी क्या कम है, जहाँ रंग ना ख़ुशबू है कोई,
तेरे होंठों से महक जाते हैं अफ़कार मेरे,
मेरे लफ़ज़ों को जो छू लेती है आवाज़ तेरी,
सरहदें तोड़ के उड़ जाते हैं अशार मेरे।

तुझको मालूम नहीं या तुझे मालूम भी हो,
वो सिया बख़्त जिन्हे ग़म ने सताया बरसों,
एक लम्हे को जो सुन लेते हैं तेरा नग़मा,
फिर उन्हें रहती है जीने की तमन्ना बरसों।

जिस घड़ी डूब के आहंग में तू गाती है,
आयतें पढ़ती है साज़ों की सदा तेरे लिए,
दम ब दम ख़ैर मनाते हैं तेरी चंग़-ओ-रबाब,
सीने नए से निकलती है दुआ तेरे लिए।

नग़मा-ओ-साज़ के ज़ेवर से रहे तेरा सिंगार,
हो तेरी माँग में तेरी ही सुरों की अफ़शाँ,
तेरी तानों से तेरी आँख में रहे काजल की लक़ीर,
हाथ में तेरे ही गीतों की हिना हो रखशाँ।"

बरसों पहले शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने कुछ इसी तरह से बाँधा था उस गायिका के तारीफ़ों का पुल जिनकी आवाज़ कानों में ही नहीं बल्कि अंतरात्मा में मिसरी घोल देती है, जिसे सुन कर मन की हर पीड़ा दूर हो जाए, जिस आवाज़ की शीतल छाँव के नीचे बैठ कर इंसान ज़िंदगी की दुख तकलीफ़ों को पल में भूल जाए, और जिस आवाज़ की सुरगंगा में नहाकर मन पवित्र हो जाए, ६ दशकों से हवाओं में अमृत घोलती आ रही उस गायिका को आप और हम लता मंगेशकर के नाम से जानते हैं।

'मेरी आवाज़ ही पहचान है' शृंखला के तहत इन दिनों आप सुन रहे हैं लता मंगेशकर के गाए गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे भूले बिसरे नग़में जो बेहद दुर्लभ हैं और जिन्हे हमें उपलब्ध करवाया है नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे जी ने, जिनका हम दिल से आभारी हैं। उनके भेजे हुए गीतों में से आज की कड़ी के लिए हम ने जिस गीत को चुना है वह है सन्‍ १९४९ की फ़िल्म 'भोली' का। दोस्तों, कल जो गीत आप ने सुना था वह गीता बाली पर फ़िल्माया गया था, और संयोग वश आज का गीत भी उन्ही का है। फ़िल्म 'भोली' के मुख्य कलाकार थे प्रेम अदीब और गीता बाली। मुरली मूवीज़ के बैनर तले बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था राम दर्यानी ने। पंडित गोबिन्दराम थे इस फ़िल्म के संगीतकार और गानें लिखे आइ. सी. कपूर ने। पंडित गोबिन्दराम गुज़रे ज़माने के उन प्रतिभाशाली संगीतकारों में से हैं जिनकी आज चर्चा ना के बराबर होती है। क्या आप जानते हैं कि संगीतकार सी. रामचन्द्र जिन दो संगीतकारों से प्रभावित हुए थे उनमें से एक थे सज्जाद हुसैन और दूसरे थे गोबिन्दराम। पंडित गोबिन्दराम ने अपनी फ़िल्मी यात्रा शुरु की थी सन् १९३७ में। फ़िल्म थी 'जीवन ज्योति'। ४० के दशक के शुरुआती सालों में उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं १९४१ की 'हिम्मत' और १९४३ की तीन फ़िल्में - 'आबरू', 'सलमा', और 'पगली'। जब गोबिन्दराम के श्रेष्ठ फ़िल्मों का ज़िक्र होता है तो 'भोली' और 'माँ का प्यार' फ़िल्मों का ज़िक्र किए बग़ैर बात ख़तम नहीं समझी जा सकती। 'माँ का प्यार' भी इसी साल, यानी कि १९४९ में बनी थी और इस फ़िल्म में भी लता जी के गीत थे। नूरजहाँ के अंदाज़ में लता जी ने इस फ़िल्म के गीत गाए और पहली बार यह साबित भी कर दिया था कि वो कितनी भी ऊँची पट्टी पर गा सकती हैं। 'माँ का प्यार' फ़िल्म का लता जी का गाया हुआ एक प्रसिद्ध गीत है "तूने जहाँ बना कर अहसान क्या किया है"। लेकिन आज हम सुनने जा रहे हैं फ़िल्म 'भोली' से एक दर्दीला गीत, "इतना भी बेक़सों को ना आसमाँ सताए, के दिल का दर्द लब पे फ़रियाद बन के आए", सुनिए!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. 3 अंकों के लिए बूझिये लता का गाया ये गीत.
२. इस नाम की कम से कम दो फिल्में बाद में बनी एक में अमिताभ थे नायक संगीत रविन्द्र जैन का था तो दूसरी फिल्म में थे राज कुमार और दिलीप कुमार.
३. मुखड़े में शब्द है -"भंवर".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी बोनस अंकों का फायदा देखिये....आप सीधे ३३ अंकों पर पहुँच गए हैं...यानी मंजिल के कुछ और करीब. शरद जी और पूर्वी जी दिखाईये ज़रा सी और फुर्ती जी....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 25, 2009

चाहे चोरी चोरी आओ चाहे चुप चुप आओ....सुनिए लता का ये दुर्लभ अंदाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 213

जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लता मंगेशकर के गाए हुए कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीतों की एक बेहद ख़ास शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। १९४७ और १९४८ की दो फ़िल्मों के गीत सुनने के बाद आज हम एक साल और आगे बढ़ते हैं, यानी कि १९४९ में। लता जी के संगीत सफ़र का शायद सब से महत्वपूर्ण साल रहा होगा यह। क्यों ना हो, 'महल', 'बरसात', 'बाज़ार', 'एक थी लड़की', 'लाहौर', और 'बड़ी बहन' जैसी फ़िल्मों में एक से एक सुपरहिट गीत गा कर लता जी एक दम से अग्रणी पार्श्व गायिका बन गईं। उनके इस तरह से छा जाने पर जैसे फ़िल्म संगीत की धारा ने एक नया मोड़ ले लिया हो! इन तमाम फ़िल्मों के संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश, शंकर जयकिशन, विनोद, श्यामसुंदर, और हुस्नलाल भगतराम। १९४९ में फ़िल्म जगत की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगतराम के संगीत से सज कर कुल १० फ़िल्में प्रदर्शित हुईं, जिनके नाम हैं - अमर कहानी, बड़ी बहन, बलम, बंसरिया, हमारी मंज़िल, जल तरंग, जन्नत, नाच, राखी, और सावन भादों। 'बड़ी बहन' में तो लता जी के गाए "चले जाना नहीं" और "चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है" ने सफलता के कई झंडे गाढ़े, लेकिन फ़िल्म 'बंसरिया' का एक गीत ज़रा कम सुना सा रह गया। जिस गीत की हम बात कर रहे हैं, उसे भी कुछ कुछ "चुप चुप खड़े हो" के अंदाज़ में ही बनाया गया था, लेकिन इसे वह कामयाबी नहीं मिली जितना की उस गीत को मिली थी। फ़िल्म 'बंसरिया' का प्रस्तुत गीत है "चाहे चोरी चोरी आओ चाहे छुप छुप आओ, पर हमको पिया आज ज़रूर मिलना"। फ़िल्म 'बंसरिया' का निर्माण 'निगारिस्तान फ़िल्म्स' ने किया था, जिसे निर्देशित किया राम नारायण दवे और मुख्य भूमिकाओं में थे रणधीर और गीता बाली। फ़िल्म के गानें लिखे मुल्कराज भाकरी ने।

दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले आइए लता जी के बारे में कुछ ऐसे कलाकारों के उद्‍गार जान लेते हैं जो आज के इस दौर के कलाकार हैं। इस नई पीढ़ी के कलाकारों के दिलों में भी लता जी के लिए उतनी ही इज़्ज़त और सम्मान है जितने कि पिछले सभी पीढ़ियों के दिलों में हुआ करती है। ये तमाम बातें हम विविध भारती के अलग अलग 'जयमाला' और 'सरगम के सितारे' कार्यक्रमों से मिला-जुला कर प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रसून जोशी - मुझे याद है कि बचपन में एक प्रतियोगिता में मैने इस गीत को गाने की कोशिश की थी, लेकिन बीच में ही मैं बेसुरा हो गया और गा नहीं पाया। तब मुझे अहसास हुआ कि यह गीत कितना मुश्किल है और लता जी ने इसे कितनी आसानी से गाया है। यह गीत है "रसिक बलमा", बहुत सुंदर गीत है, बहुत सुंदर संगीत है, और इस गीत को सुनकर आप समझ सकते हैं कि लता जी लता जी क्यों है!!!

सोनू निगम - मुझे याद है वह १ अप्रैल १९९९ का दिन था, यानी कि 'अप्रैल फ़ूल्स डे'। लता जी पहले पहले गा रही थी ("ख़ामोशियाँ गुनगुनाने लगी"), और मुझे उनके ख़तम होने के बाद गाना था। वो गाने का अपना पोर्शन ख़तम कर जब बाहर आयीं तो मुझे कहने लगीं कि उन्होने मेरा 'सा रे गा मा पा' शो टी.वी पर देखा था जिसमें मैने तलत महमूद साहब का गाया एक गीत गाया था और वह उन्हे बहुत पसंद आया था। फिर उन्होने कहा कि वो मुझे सुनना चाहती हैं जब मैं अपना हिस्सा रिकार्ड करूँ। लेकिन उस दिन काफ़ी देर हो गई थी, इसलिए उन्हे निकलना पड़ा। उस दिन का एक्स्पेरियन्स मेरे लिए एक बहुत 'फ़ैन्टास्टिक एक्स्पेरियन्स' था।

श्रेया घोषाल - एक बार मैं किसी स्टुडियो में रिकार्डिंग कर रही थी, और वहाँ पर एक रिकार्डिस्ट को यह पता था कि मैं लता जी की बहुत बड़ी फ़ैन हूँ। नसीब से उस दिन लता जी भी उसी स्टुडियो में उपस्थित थीं। वो संगीतकार के साथ बैठी हुईं थीं। उस रिकार्डिस्ट ने मुझे कहा आ कर कि लता जी आई हुईं हैं, क्या मैं मिलना चाहूँगी? मैने कहा 'औफ़कोर्स'। फिर वो मुझे लता जी के पास ले गए। मैं कभी नहीं भूल सकती उस दिन को। लता जी के चेहरे पर एक नूर है। उनकी ऊंचाई ज़्यादा नहीं है लेकिन उनमें एक कमाल का व्यक्तित्व है। उनके सामने मैं गूँगी हो गई और एक शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला। तब वो बोलीं 'श्रेया, मैने तुम्हारी एक इंटरव्यू देखा है, मैं माफ़ी चाहती हूँ लेकिन तुम्हारी बंगला प्रोनन्सिएशन अच्छा नहीं है।' मुझे इतनी ख़ुशी हुई यह सोच कर कि मुझ जैसी नई और छोटे सिंगर को उन्होने सुना है और मेरे बारे में इतना कुछ नोटिस भी किया है। वो महान हैं। फिर वहाँ बैठे संगीतकार ने मुझे कहा कि अभी अभी लता जी मेरी तारीफ़ कर रहीं थीं। यह सुनकर तो मैं सातवें आसमान पर उड़ने लगी। इससे ज़्यादा मैं क्या माँग सकती हूँ!

सुनिधि चौहान - लता जी तो भगवान हैं। तो उनके मुख से सिर्फ़ मेरा नाम निकलना ही बहुत बड़ी बात है। तो अगर वो मेरी तारीफ़ करती हैं तो इससे बड़ी बात मेरे लिए और कोई हो नहीं सकती। उनको तो मैं शुक्रिया अदा भी नहीं कर सकती। यही बोलूँगी कि अगर वो मुझे चाहती हैं तो बस उनका आशिर्वाद रहे और मैं अपनी तरफ़ से उनको निराश नहीं करूँगी। उनकी अगर उम्मीदें हैं मुझ से तो मैं ज़रूर कोशिश करूँगी। शुरु से ही उनके साथ एक अजीब सा रिश्ता रहा है, 'मेरी आवाज़ सुनो' के टाइम से, जब मैने ट्राफ़ी उनके हाथ से ली थी। कौम्पिटिशन में हिस्सा ही इसलिए लिया था कि एक दिन लता जी के दर्शन हो जाए। दिल्ली से थी तो मेरे लिए तो सपना सा था कि उनको छू के देखूँ कि वो कैसी दिखती हैं सामने से, और सोचा भी नहीं था कि जीतूँगी, बस यह कोशिश थी कि काफ़ी राउंड्स क्लीयर कर लूँ और मेगा फ़ाइनल तक पहुँच जाऊँ ताकि लता जी से मिल सकूँ। जीती तो ख़ुशी का कोई अंदाज़ा ही नहीं था, फिर उनका मुझे ट्राफ़ी देना, मेरे आँसू पोंछ कर मुझसे बोलना कि 'अगर तुमको किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो मैं हूँ'। मेरे लिए तो उससे बड़ा दिन ही नहीं था, सब से बड़ा ज़िंदगी का दिन वह था, और उसके बाद, वो सब हो जाने के बावजूद मेरी हिम्मत भी नहीं होती कि उनको फ़ोन करूँ, बात करूँ, तो दीदी से आज तक इतने सालों में मेरे ख़याल से ३ या ४ बार बात की होगी।

महालक्ष्मी अय्यर - अब मैं एक ऐसी गायिका का गाया गीत सुनाने जा रही हूँ जिनका गाना जितना सुरीला है उनकी बातें उससे भी मीठी। मेरे इस 'सिंगिंग लाइन' में आने का एक कारण भी वो ही हैं। जी हाँ, लता मंगेशकर जी। मैं हमेशा चाहती हूँ कि अगर लता जी के ५००० गानें हैं तो मेरा सिर्फ़ एक गाना उनके जैसा
हो।

तो दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में लता जी के ज़िक्र के द्वारा हमने गुज़रे दौर और आज के दौर का संगम महसूस किया। यानी कि गुज़रे दौर के लता जी का गाया गीत बज रहा है और साथ में इस दौर के फ़नकारों के दिलों में लता जी के लिए प्यार और इज़्ज़त के चंद अंदाज़-ए-बयाँ आप ने पढ़े। कल कौन सा गीत बजने वाला है उसका आप अंदाज़ा लगाइए नीचे दिए गए पहेली के सुत्रों से, और अब मुझे आज के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का एक बेहद दर्द भरा नगमा.
२. पंडित गोविन्दराम और आई सी कपूर थे इस गीत में गीत-संगीत के जोडीदार.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आसमाँ"

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है बेहद मुश्किल पहेली थी कल वाली....चलिए कोई बात नहीं आज कोशिश कीजिये....शुभकामनाएँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 24, 2009

अब कोई जी के क्या करे जब कोई आसरा नहीं...दर्द में डूबी लता की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 212

"कुछ लोगों के बारे में कहा जाता है कि फ़लाना व्यक्ति इतनी भाग्यशाली है कि मिट्टी को भी हाथ लगाए तो वह सोना बन जाती है। कुमारी लता मंगेशकर के लिए यह बात शत प्रतिशत सही बैठती है। कितनी ही नगण्य संगीत रचना क्यों न हो, लता जी की आवाज़ उसे ऊँचा कर देती है।" दोस्तों, ये अल्फ़ाज़ थे गुज़रे दौर के बहुत ही प्रतिभाशाली और सुरीले संगीतकार एस. एन त्रिपाठी साहब के। 'मेरी आवाज़ ही पहचान है' शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का हम हार्दिक स्वागत करते हैं। दोस्तों, अगर मदन मोहन और लता जी के साथ की बात करें तो आम धारणा यही है कि मदन साहब ने लता जी को पहली बार सन् १९५० की फ़िल्म 'अदा' में गवाया था और तभी से उनकी जोड़ी जमी। जी हाँ यह बात सच ज़रूर है, लेकिन क्या आपको पता है कि सन् १९४८ में लता जी और मदन मोहन ने साथ साथ एक युगल गीत रिकार्ड करवाया था? चलिए आप को ज़रा तफ़सील से आज बताया जाए। हुआ युं कि मास्टर विनायक ने लता को काम दिलाने के लिए संगीतकार ग़ुलाम हैदर साहब के पास ले गए। हैदर साहब लता की आवाज़ और गायकी के अंदाज़ से इतने प्रभावित हुए कि वो उसे अपनी अगली फ़िल्म 'शहीद' में गवाने की ख़ातिर फ़िल्मिस्तान के एस. मुखर्जी के पास ले गए। लेकिन मुखर्जी साहब ने यह कह कर लता को रीजेक्ट कर दिया कि उसकी आवाज़ बहुत पतली है उस ज़माने की वज़नदार गायिकाओं के सामने। उसी वक़्त सब के सामने मास्टर ग़ुलाम हैदर ने यह घोषणा की थी कि एक दिन यही पतली आवाज़ इस इंडस्ट्री पर राज करेगी। उनकी यह भविष्यवाणी पत्थर की लक़ीर बन कर रह गई। ख़ैर, हैदर साहब लता को फ़िल्म 'शहीद' में तो नहीं गवा सके, और 'शहीद' के गाने चले गए सुरिंदर कौर, ललिता देयोलकर और गीता राय के खाते में। लेकिन हैदर साहब ने इस फ़िल्म के लिए लता और मदन मोहन की आवाज़ों में एक युगल गीत रिकार्ड किया जो कि भाई बहन के रिश्ते पर आधारित था। एस. मुखर्जी ने इस गीत को फ़िल्म में रखने से इंकार कर दिया और इसलिए फ़िल्म के ग्रामोफ़ोन रिकार्ड पर भी यह गीत जारी नहीं हुआ।

चाहते हुए भी ग़ुलाम हैदर 'शहीद' में लता को नहीं गवा पाए, लेकिन उन्हे बहुत ज़्यादा इंतज़ार भी नहीं करना पड़ा। उसी साल, यानी कि १९४८ में बौम्बे टाकीज़ ने बनाई फ़िल्म 'मजबूर'। और इसमें बात बन गई। ग़ुलाम हैदर के संगीत में लता के गाए इस फ़िल्म के गानें नज़रंदाज़ नहीं हुए, और लता को मिला अपना पहला लोकप्रिय गीत गाने का मौका। याद है ना आपको इस फ़िल्म का "दिल मेरा तोड़ा, हाए कहीं का न छोड़ा तेरे प्यार ने"! हिंदू-मुसलिम प्रेम कहानी पर आधारित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे श्याम और मुनव्वर सुल्ताना। नई नई आज़ादी का जश्न मनाते हुए इस फ़िल्म में लता और मुकेश ने गाए "अब डरने की बात नहीं अंग्रेज़ी छोरा चला गया"। यह गीत भी पसंद की गई। लेकिन दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला है लता जी के कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीतों को सुनने का, इसलिए हम आज इस 'मजबूर' फ़िल्म से चुन लाए हैं एक ऐसा गीत जिसे बहुत कम सुना गया और आज तो बिल्कुल नहीं सुनाई देता है कहीं से भी। यह गीत है "अब कोई जी के क्या करे जब कोई आसरा नहीं, दिल में तुम्हारी याद है और कोई इल्तिजा नहीं"। गीतकार नज़ीम पानीपती ने इस गीत को लिखा था। इससे पहले की आप यह गीत सुनें, क्यों ना अमीन सायानी द्वारा लता जी के लिए उस इंटरव्यू का एक अंश पढ़ लें जिसमें लता जी ने मास्टर ग़ुलाम हैदर से उनकी पहली मुलाक़ात का ज़िक्र किया था। "मैं १९४५ में बम्बई आयी, मैं नाना चौक में, एक जगह है जहाँ हम लोग रहने लगे। हमारी कंपनी में एक कैमरामैन थे, वो मेरे पास आए, कहने लगे कि एक म्युज़िक डिरेक्टर हैं जिन्हे नई सिंगर की ज़रूरत है। तो तुम अगर गाना चाहो तो चलो। हरिशचंद्र बाली उनका नाम था। उनको मैने गाना सुनाया तो उनको बहुत अच्छा लगा। जब उनके गाने मैं रिकार्ड कर रही थी तब एक एक्स्ट्रा सप्लायर होते हैं ना हमारी फ़िल्मों में, वो एक आया, उसने मुझे आ के कहा कि कल तुम फ़िल्मिस्तान में आना, मास्टर ग़ुलाम हैदर आए हैं, उन्होने तुमको बुलाया है। जब मै मास्टर जी को मिलने गई तो उन्होने कहा कि तुम गाना सुनाओ। मैने एक गाना उनका सुनाया, उनकी ही पिक्चर का का कोई गाना। ग़ुलाम हैदर से मैने एक बात सीखी थी कि बोल बिल्कुल साफ़ होनी चाहिए और दूसरी बात यह कि जहाँ पर 'बीट' आता है, थोड़ा सा ज़ोर देना ताकी गाना एक दम उठे।" तो दोस्तों आज की इस कड़ी में लता जी के साथ साथ मास्टर ग़ुलाम हैदर, मदन मोहन, एस. एन. त्रिपाठी, और थोड़ी बहुत हरिशचंद्र बाली की भी बातें हो गईं, तो चलिए अब इस दुर्लभ गीत को सुना जाए, जिसे हमें उपलब्ध करवाया नागपुर के अजय देशपाण्डे जी ने, जिनके हम बेहद आभारी हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का एक और दुर्लभ गीत.
२. गीतकार हैं मुल्कराज भाकरी.
३. हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में बने इस गीत को "चुप चुप खड़े हो" वाले अंदाज़ में बुना गया है.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी वाह एक दम सही जवाब ...३ अंक जुड़े आपके खाते में, पराग जी आपने जिस गीत की याद दिलाई वो भी गजब का है

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, September 23, 2009

दूर जाए रे राह मेरी आज तेरी राह से....खेमचंद प्रकाश के लिए गाया लता ने ये बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 211

२८ सितंबर १९२९। मध्य प्रदेश के इंदौर में जन्म हुआ था एक बच्ची का। कहा जाता है कि गंगा नदी शिव जी की जटा से इस धरती पर उतरी थी, पर सुर की गंगा तो स्वर्ग से सीधे इस बच्ची के गले में उतर गई और तब से लेकर आज तक हम सब को अपनी उस आवाज़ के बारिश से भीगो रही है जिस आवाज़ की तारीफ़ में कुछ कहना सिवाय वक़्त के बरबादी के और कुछ भी नहीं है। दोस्तों, कितने ख़ुशनसीब हैं वो लोग जिनका जन्म इस बच्ची के जन्म के बाद हुआ। अफ़सोस तो उन लोगों के लिए होता है जो इस सुर गंगा में नहाए बिना ही इस धरती से चले गए। ये बच्ची आगे चलकर बनी ना केवल इस देश की आवाज़, बल्कि युं भी कह सकते हैं कि ये आवाज़ है पिछली सदी की आवाज़, इस सदी की आवाज़, और आगे आनेवाली तमाम सदियों की आवाज़। फ़िल्म संगीत में हम और आप जैसे संगीत प्रेमियों की अपनी अपनी पसंद नापसंद होती है, मगर हर किसी के पसंद की राहें जिस एक लाजवाब मंज़िल पर जा कर मिल जाती हैं, उस मंज़िल का नाम है सुरों की मलिका, कोकिल कंठी, मेलडी क्वीन, सुर साम्राज्ञी, भारत रत्न, लता मंगेशकर। आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रहा है लता जी पर केन्द्रित लघु शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। लता जी के गाए गीतों में से दस लाजवाब गीतों को चुनना अकल्पनीय बात है। इसीलिए हम इस शृंखला के लिए वह राह इख़्तियार नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम वह राह चुन रहे हैं जिसमें हैं लता जी के गाए कुछ भूले बिसरे और बेहद दुर्लभ नग़में, जो शायद ही आज आप को कहीं मिल सके, या कहीं और आप इन्हे सुन सके। और हमारी इसी योजना को साकार करने के लिए सामने आए नागपुर के अजय देशपाण्डे जी, जिन्होने लता जी के गाए दुर्लभतम गीतों में से १० गानें चुन कर हमें भेजे, जिनमें से ५ गीत हैं ख़ुश रंग और ५ गीत हैं कुछ ग़मज़दा क़िस्म के। हम तह-ए-दिल से उनका शुक्रिया अदा करते हैं क्योंकि उनके इस सहयोग के बिना इस शृंखला की हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

लता मंगेशकर के गाए भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों की बात करें तो लता जी के संगीत सफ़र की शुरुआती सालों में, यानी कि ४० के दशक में उन्होने कुछ ऐसे फ़िल्मों में गानें गाए थे जो बहुत ज़्यादा चर्चित नहीं हुए। उस ज़माने में पंजाबी शैली में गाने वाली तमाम वज़नदार आवाज़ों वाली गायिकाओं के गाए गीतों के बीच लता की धागे से भी पतली आवाज़ कहीं दब कर रह गई। अपने पिता की अकाल मृत्यु की वजह से १२ साल की लता ने अपने परिवार का ज़िम्मा अपने कंधों पर लिया और इस फ़िल्मी दुनिया में पहली बार क़दम रखा। साल था १९४२ और फ़िल्म थी मास्टर विनायक की मराठी फ़िल्म 'पहली मंगलागौर', जिसमें उन्होने बाल कलाकार का एक चरित्र निभाया और इसी फ़िल्म में उनका पहला गीत भी रिकार्ड हुआ। इस मराठी गीत के बोल थे "सावन आला तरु तरु ला बांगू हिंदोला"। उसके बाद लता ने कुछ और फ़िल्मों में अभिनय किया और कुछ गानें भी गाए। किसी हिंदी फ़िल्म में उनका गाया पहला गीत था सन् १९४६ की फ़िल्म 'सुभद्रा' का, जिसमें उन्होने शांता आप्टे के साथ मिलकर गाया था "मैं खिली खिली फुलवारी", जिसके संगीतकार थे वसंत देसाई साहब और जिस फ़िल्म में लता ने अभिनय भी किया था। प्लेबैक की अगर बात करें तो किसी अभिनेत्री के लिए लता का गाया हुआ पहला गीत था १९४७ की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' का "पा लागूँ कर जोरी रे, श्याम मोसे न खेलो होरी"। इसी साल, यानी कि १९४७ की आख़िर में एक गुमनाम फ़िल्म आयी थी 'आशा'। फ़िल्म कब आयी और कब गई पता ही नहीं चला। शायद देश विभाजन की अफ़रा-तफ़री में लोगों ने इस फ़िल्म की तरफ़ ध्यान नहीं दिया होगा! और इस फ़िल्म में लता का गाया गीत भी गुमनामी के अंधेरे में खो गया। आज लता जी पर केन्द्रित इस शृंखला की शुरुआत हम इसी फ़िल्म 'आशा' के एक गीत से कर रहे हैं। मेघानी निर्देशित इस फ़िल्म के नायक थे रामायण तिवारी। फ़िल्म के संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश, जिन्होने लता को दिया था सही अर्थ में उनका पहला सुपरहिट गीत "आयेगा आनेवाला", फ़िल्म 'महल' में। तो लीजिए दोस्तों, फ़िल्म 'आशा' का गीत प्रस्तुत है, जिसके बोल हैं "दूर जाए रे राह मेरी आज तेरी राह से"। लेकिन हम यही कहेंगे कि हमारी राहों में लता जी की आवाज़ युगों युगों तक एक विशाल वट वृक्ष की तरह शीतल छाँव प्रदान करती रहेंगी, अपनी आवाज़ की अमृत गंगा से करोड़ों प्यासों की प्यास बुझाती रहेंगी... सदियों तक।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का ये दुर्लभ गीत.
२. गीतकार हैं नजीम पानीपती.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आसरा".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी शानदार वापसी है, बधाई....३ अंकों के सतह खाता खुला है आपका फिर एक बार. दिलीप जी आपने जिन दो गीतों का जिक्र किया है वो भी आपको जल्दी सुनवायेंगें. पूर्वी जी और पराग जी यदि शरद जी और स्वप्न जी इस स्तिथि से भी आप लोगों से आगे निकल जाते हैं तो ये वाकई शर्म की बात होगी, इसलिए कमर कस लीजिये....नाक मत काटने दीजियेगा :) अर्चना जी हर रोज नज़र आया करें....हम हाजरी रजिस्टर रखते हैं यहाँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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