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Monday, December 3, 2012

सलमान खान की दबंग -२ का दबंग संगीत

प्लेबैक वाणी -27 -संगीत समीक्षादबंग - २


दबंग का द्रितीय संस्करण सलमान खान की एक बहुप्रतीक्षित फिल्म है और शायद वर्ष २०१२ की अंतिम बड़ी फिल्म भी. पिछले संस्करण की तरह इस फिल्म से भी रिकॉर्ड तोड़ सफलता की उम्मीद की जा रही है. इस बार फिल्म के निर्देशन का जिम्मा संभाला है अरबाज़ खान ने. संगीत है पहले संस्करण के ही साजिद वाजिद का और गीतकार हैं समीर. 

लगता है जब फिल्म का संगीत सोचा गया तो बेहद प्रमुखता से इस बात का ख्याल रखा गया कि अल्बम के गीतों की संख्या, उनकी ध्वनि और यहाँ तक कि गायक गायिका का चुनाव भी उसी सफल पैमाने को ध्यान में रखकर तय किया गया होगा. अब पहले ही गीत को लें. ‘दगाबाज़ रे’ में फिर एक बार राहत फ़तेह अली खान और श्रेया की आवाजें महकी है और इस गीत की ध्वनि भी ‘तेरे मस्त मस्त दो नैन’ जैसी ही है. मगर फिर भी गीत बेहद मधुर है. सुरीली आवाजों और नशीली धुन के साथ साथ दो बातें और हैं जो इस गीत को पहले गीत की तरह से कमियाबी दे सकता है. एक तो समीर के शब्द सुन्दर और मिटटी से जुड़े हुए हैं और दूसरा साजिद वाजिद का संगीत संयोजन कमाल का है. पहले और दूसरे अंतरे के दरमियाँ सितार और हारमोनियम के मधुर पीस रचे गए हैं, जो लाईव साजिंदों ने बजाये हैं. बहुत दिनों बाद ऐसा संयोजन सुनने को मिला है.

पहले संस्करण में नायक जिनका नाम इन्स्पेक्टर चुलबुल पांडे था उनके थाने में एक गीत फिल्माया गया था ‘हमको पीनी है’, उसी तर्ज पर यहाँ है ‘पाण्डेय जी सीटी’. इस गीत में मलाईका के दिखने की सम्भावना है. गीत की धुन पारंपरिक (पिंजड़े वाली मुनिया) से ली गयी है. मस्ती से सराबोर ये गीत भी श्रोताओं को खूब भाएगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. 

अब दबंग के ‘मुन्नी बदनाम’ को भला कौन भूल सकता है. यहाँ मलाईका की जगह नज़र आयेगीं करीना कपूर. जहाँ उस गीत में ‘झंडू बाम’ का प्रचार था यहाँ ये बन गया है ‘फेविकोल का मजबूत जोड़’. शब्दों में समीर ने खासी शरारत भरी है और ममता शर्मा ने जम कर मेहनत की है गीत को मजेदार बनाने में. लगता नहीं की ये गीत ‘मुन्नी’ जैसी कमियाबी उठा पायेगा पर अगर नृत्य संयोजन भी सटीक हुआ तो लोकप्रिय अवश्य ही होगा. ‘मुन्नी’ दबंग के पहले संस्करण के अतिथि संगीतकार ललित शर्मा की उपज थी तो यहाँ इस आईटम का जिम्मा भी आत्मविश्वास से भरे साजिद वाजिद ने ही उठाया है और कहना गलत नहीं होगा कि मुन्नी के पैमाने पर ये गीत कुछ कमजोर भी नहीं है. 

पहले संस्करण में सोनू निगम और श्रेया का गाया एक खूबसूरत युगल गीत भी था जिसकी टक्कर में यहाँ है ‘सांसों में’ जहाँ सोनू का साथ देनी उतरी है तुलसी कुमार. जाहिर है टी सीरीस का जोर है. हालाँकि तुलसी निराश नहीं करती. गीत मधुर है मगर धीरे धीरे ही इसका असर श्रोताओं के जेहन में उतरेगा. 

शीर्षक गीत में एक बार फिर मूल धुन को जैसा का जैसा ही रखा गया है बस फ्रेम में आवश्यक सुधार कर दिया गया है. गायक भी एक बार फिर सुखविंदर सिंह ही हैं. समीर ने यहाँ मौका देखकर हिंदी के कुछ अच्छे शब्द जैसे दुर्जन, दुष्कर्मी, आदि जड़ दिए हैं. दरअसल समीर ने इस पैटर्न नुमा संगीत में एक नयी लहर भरी है अपने अच्छे शब्द चयन से. 

कुल मिलाकर दबंग २ का संगीत अपेक्षा अनुरूप ही है. रेडियो प्लेबैक इण्डिया दे रहा है इसे ३.७ की रेटिंग.                


Monday, November 26, 2012

तेज तड़कों के बावजूद रूहदारी नहीं है खिलाडी ७८६ के गीतों में

प्लेबैक वाणी -26 -संगीत समीक्षा - खिलाड़ी 786
साल खत्म होने को है ओर सभी प्रमुख सितारे इस साल को एक यादगार मोड पर छोड़कर आगे बढ़ने के उद्देश्य से इन त्योहारों के मौसम में अपनी सबसे खास फिल्म को लेकर मैदान में उतरते हैं. शाहरुख, अजय देवगन, ओर आमिर के बाद अक्षय कुमार की बहुप्रतीक्षित खिलाडी ७८६ भी प्रदर्शन को तैयार है. १९९२ में प्रदर्शित अब्बास मस्तान की ‘खिलाडी’ अक्षय कुमार के लिए वरदान साबित हुई थी. जिसके पश्चात अक्षय खिलाडी श्रृंखला में ढेरों फ़िल्में कर चुके हैं, इनमें से अधिकतर कामियाब रहीं है. खिलाडी ७८६ के संगीतकार हैं हिमेश रेशमिया. गीतकार हैं शब्बीर अहमद, समीर ओर खुद हिमेश. आईये जांचें कैसा संगीत हैं फिल्म खिलाडी ७८६ का संगीत.

यो यो हनी सिंह के रैप से शुरू होता है पहला गीत ‘लोनली’, जिसके बाद हिमेश मायिक सँभालते हैं ओर उनका साथ देती है हम्सिका अय्यर. गीत में हनी सिंह का रैप हिस्सा ही प्रभावित करता है, वैसे हिमेश ने गीत को सँभालने के लिए अपने पुराने हिट गीत की एक पंक्ति को भी उठा लिया है (तेरी याद साथ है). शब्द साधारण है.

‘बलमा’ गीत कहने को विरह का गीत है जिसमें पंचम की झलक साफ़ सुनी ओर महसूस की जा सकती है (महबूबा महबूबा). श्रेया ने हालाँकि गीत में काफी उर्जा भरी है जिनके सामने श्रीराम फीके लगे हैं. पर ये गीत भी दिल में नहीं उतर पाता अफ़सोस.

‘लॉन्ग ड्राईव’ अल्बम के लिए फिर से कुछ उम्मीद जगाता है. गायक के रूप में मिका का चुनाव बहतरीन है जिनकी गायकी ने इस गीत में जबरदस्त उठान दिया है. धुन भी बढ़िया है. रिदम हल्का और मधुर है, और शब्द ठीक ठाक है. अब देखना ये है कि गीत अक्षय पर जचता है या नहीं क्योंकि सुनने में ये रणबीर या शाहिद जैसे किसी स्टार के लिए बना लगता है. 

‘सारी सारी रात’ यक़ीनन हिमेश सरीखा गीत है, वोयलीन के पीस से दर्द को उभारा गया है. नयेपन के अभाव में भी ये गीत अल्बम के अन्य गीतों से कुछ बेहतर अवश्य है. 

खुद हिमेश अगले गीत में अपने दो पसंदीदा शिष्यों विनीत और अमन थिरका के साथ पार्टी मूड में उतरते हैं जिसको नाम दिया गया है ‘हुक्का बार’. अब किसी का प्यार हुक्का बार कैसे बन जाता है ये अपनी समझ से तो बाहर है. न शब्द न धुन न गायिकी कुछ भी दिल के करीब से भी होकर नहीं गुजरती.

दबंग और सिंघम में जैसे नायक के किरदार को स्थापित किया गया था शीर्षक गीतों से, ठीक वैसे ही यहाँ के शीर्षक गीत में ‘खिलाडी भैया’ को स्थापित किया गया है. पिछले सभी गीतों में इस खिलाडी को जिस रूप में दर्शाया गया था, यहाँ उसका विष्लेषण बिल्कुल उल्टा है. बेस गिटार रह रह कर ‘हुड हुड दबंग’ की याद दिलाता रहता है. यहाँ गीत के शब्दों में कुछ मूड रचने की कोशिश अवश्य की गयी है.

‘तू हूर परी’ में बहतरीन गायक, गायिकाओं की फ़ौज है जो इस साधारण से गीत को सुनने लायक बना ही देते हैं. अल्बम के सभी गीतों का निर्माण स्तर बेहतरीन है पर काश कि यही बात गीतों के स्तर के बारे में भी कही जा सकती. मेरी राय में हिमेश आज के दौर के बेहतरीन संगीतकारों में से एक हैं, मगर उनसे अच्छा काम निकलवाने के लिए निर्माता निर्देशक को सूझ बूझ दिखानी पड़ती है. अब इस फिल्म में तो कहानी भी उनकी है और निर्माता भी वो खुद है. यानी रोक टोक की गुन्जायिश एकदम बारीक. हो सकता है कि उनके जबरदस्त चाहने वालों को मेरी बात बुरी लगे, पर मुझे तो खिलाडी ७८६ के संगीत ने बेहद निराश किया है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस अल्बम को १.९ की रेटिंग.              



Monday, November 12, 2012

प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा - जब तक है जान

प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा - जब तक है जान 

“तेरी आँखों की नमकीन मस्तियाँ, तेरी हँसी की बेपरवाह गुस्ताखियाँ, तेरी जुल्फों की लहराती अंगडाईयाँ, नहीं भूलूँगा मैं...जब तक है जान...”, दोस्तों सिने प्रेमी भी यश चोपड़ा और उनकी यादगार फिल्मों को वाकई नहीं भूलेंगें...जब तक है जान...यश जी की हर फिल्म उसके बेहतरीन संगीत के लिए भी दर्शकों और श्रोताओं के दिलो जेहन में हमेशा बसी रहेगीं.

उन्होंने फिल्म और कहानी की जरुरत के मुताबिक अपने गीतकार संगीतकार चुने, मसलन आनंद बख्शी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जबरदस्त सफलता के दौर में उन्होंने एल पी के साथ साहिर की जोड़ी बनायीं “दाग” के लिए और परिणाम जाहिर है उत्कृष्ट ही रहा. वहीँ उन्होंने आनंद बख्शी को मिलाया शिव हरी से और अद्भुत गीत निकलवाये. स्क्रिप्ट लेखक जावेद अख्तर को गीतकार बनाया. खय्याम को “कभी कभी” और उत्तम सिंह को “दिल तो पागल है” के रूप में वो व्यावसयिक कामयाबी दिलवाई जिसके के वो निश्चित ही हकदार थे. मदन मोहन की बरसों पुरानी धुनों को नयी सदी में फिर से जिंदा कर मदन जी को आज के श्रोताओं से रूबरू करवाया.

ये सब सिर्फ और सिर्फ यशी जी ही कर सकते थे. वो कभी पंचम और गुलज़ार के साथ संयुक्त रूप से काम नहीं कर पाए मगर अपनी अंतिम फिल्म में उन्होंने गुलज़ार को टीम-अप किया आज के पंचम यानी ए आर रहमान के साथ. रहमान और गुलज़ार यूँ तो पहले भी मिले हैं और “दिल से”, “साथिया” और “गुरु” जैसी बेमिसाल सौगातें दे चुके हैं, मगर जब साथ हो यश जी का तो उम्मीदें और भी कई गुना बढ़ जाती हैं, आईये देखें कैसा है यश जी की अंतिम फिल्म “जब तक है जान” का संगीत. 

अल्बम रब्बी शेरगिल की रूहानी आवाज़ से खुलता है. वो जब “छल्ला गली गली रुल्दा फिरे...” गाते हैं तो सीधे दिल में उतर जाते हैं. “बुल्ला की जाणा मैं कौन...” गाकर धडकनों में गहरे समाये पंजाबी सूफी गायक रब्बी शेरगिल से बेहतर शायद ही कोई इस गीत के साथ न्याय कर पाता. गिटार की स्वरलहरियों पर थिरकते गुलज़ार के शब्द श्रोताओं को एक अलग ही यात्रा में ले चलते हैं. रहमान की धुन और संगीत संयोजन भी कमाल का है. सुन सुनकर भी मन न भरने वाला है ‘छल्ला’ गीत.

गुलज़ार लिखते हैं “रात तेरी बाहों में कटे तो सुबहें हल्की हल्की लगती है, आँख में रहने लगे हो क्या तुम, क्यों छलकी छलकी लगती हैं...” श्रेया और मोहित की मधुरतम आवाजों में अगला गीत “साँस” वाकई साँसों में बसने वाला है. यश जी रोमांस के बादशाह माने जाते हैं और उनकी फिल्मों ने हमें कई यादगार रोमांटिक गीत दिए हैं, जिनकी धुनें और संयोजन में श्रोताओं की प्रेम के महक गुंथी मिलती है अपनी मिटटी की खुश्बू में, निश्चित ही ‘साँस’ उसी श्रृंखला में एक और खूबसूरत इजाफा करती है.

अगला गीत “इश्क शावा” एक कदम थिरकाने वाला स्ट्रीट डांस सरीखा गीत है. धुवें से भरी मेंडोलिन की सुरंगिनियों को ताल देते राघव माथुर और शिल्पा राव की युगल आवाजें. गीत का अरेबिक फ्लेवर झुमाने वाला है. वैसे तो ऐसे गीत अपने नृत्य संयोजन के कारण अधिक लोकप्रिय होते हैं पर ‘इश्क शावा’ केवल सुनने के लिहाज से भी बेहतरीन है.

अगला गीत मेरा सबसे पसंदीदा है. यूँ भी हर्षदीप कौर की आवाज़ गजब की है उस पर धुन में मिठास के साथ साथ गहरा दर्द भी है जो गुलज़ार के शब्दों में और भी मुखर होकर बिखरता है. गीत के आरंभ में हर्षदीप का आलाप गीत पर यश जी की मोहर साफ़ दर्शाती है. रहमान –गुलज़ार की जोड़ी का एक और यादगार नगमा.

एक नयी उर्जा का संचार है अगले गीत में जिसे गाया है नीति मोहन ने. “जिया रे” खुद से प्यार करने को मजबूर कर देगा आपको. स्वार्थी होने में कोई बुराई बिल्कुल नहीं है, दरअसल जो खुद से प्यार नहीं कर सकता और किसी और और से भी भला कैसे प्यार कर सकता है. गीत के इसी भाव को बहुत खूब शब्द दिए हैं गुलज़ार ने, गीत मधुर है और दिलचस्प भी.

जावेद अली का गाया शीर्षक गीत शुरू में सुनने में कुछ अजीब लगता है पर यकीन मानिये एक दो बार सुनने के बाद ये आपकी जुबाँ पे अवश्य चढ जायेगा. दरअसल ये फिल्म की शीर्षक कविता का ही संगीतमय रूप है. मूल कविता को आवाज़ दी है शाहरुख खान ने. कविता बेहद सुन्दर है पर चूँकि कवि कोई और नहीं गुलज़ार हैं तो थोड़ी सी उम्मीदें और बढ़ जाती है. शाहरुख का अंदाज़ बेमिसाल है और परदे पर इसे देखने के बाद श्रोताओं के ये और अधिक पसंद आएगा यक़ीनन.

‘जब तक है जान’ इस साल की बहतरीन एल्बमों में से एक है. हर गीत एक लाजवाब नगीने जैसा. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस अल्बम को ४.८ की रेटिंग. दिवाली की रोशनियों को जगमगायिये, सुनिए सुनाईये रेडियो प्लेबैक इंडिया. दीपावली मुबारक       




Monday, November 5, 2012

प्लेबैक वाणी - सन ऑफ़ सरदार



प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा - सन ऑफ़ सरदार 


दिवाली करीब है और बड़ी फ़िल्में तैयार है दर्शकों के मनोरजन के लिए. इस दिवाली पर देवगन प्रोडक्शन की बहुप्रतीक्षित ‘सन ऑफ सरदार’ प्रदर्शित हो रही है, यश राज फिल्म्स की ‘जब तक है जान’ के साथ. आईये आज चर्चा करते हैं ‘सन ऑफ सरदार’ के संगीत की. देवगन ने अपनी इस बड़ी फिल्म के लिए विश्वास के साथ जिम्मा सौंपा है हिमेश रेशमिया के कन्धों पर. फिल्म कोमेडी और एक्शन का संगम है जाहिर है गीत संगीत में भी भरपूर मस्ती की गुन्जायिश है. आईये देखें कि कैसा है ‘एस ओ एस’ का संगीत.



‘कभी कभी मेरे दिल में ख़याल (सवाल) आता है...’ को मजाकिया अंदाज़ में उठाते हैं खुद अजय देवगन जिसके बाद अमन तिरखा और हिमेश मायिक सँभालते हैं. ये एक पैप्पी गीत है हालाँकि रिदम उतना कदम थिरकाने वाला नहीं है फिर भी देसी ठाठ के इस गीत में मनोरजन भरपूर है.



मिका और भव्या पंडित की दमदार आवाजों में अगला गीत अल्बम की जान है “रानी तू मैं राजा” की धुन सुनते ही मन में बस जाने वाली है. संगीत संयोजन धडकनों में थिरकन पैदा करने वाला है. शब्द भी जानदार चुने हैं समीर ने. और गीत का नृत्य संयोजन कमाल का है. यक़ीनन एक चार्ट बस्टर गीत.



“पों पों” गीत में रेशमिया, अमन तिरखा, और विकास भल्ला की मिली जुली आवाजों में एक मर्दाना कैफियत का गीत है. मस्ती से भरपूर इस गीत में धुन फिर एक बार कैची (catchy) है. शायद लंबे समय तक ये गीत लोगों को याद न रहे पर संजय दत्त की उपस्थिति इस गीत को तत्काल कमियाबी अवश्य दे सकती हैं.



‘तू कमाल दी कुडी’ गीत एक और पंजाबी भांगड़ा गीत है, जिसे विनीत सिंह और ममता शर्मा ने गाया है. विनीत की आवाज़ में अब काफी जोश भी दिखता है, हमारे श्रोताओं को याद होगा कि किस तरह शुरू से ही हिमेश ने विनीत न सिर्फ प्रोत्साहन दिया बल्कि उन्हें बड़ी फिल्मों में बहतरीन मौके भी दिए. गीत हालाँकि कुछ बहुत अलग या नया सा नहीं लगता है पर अल्बम के अन्य गीतों के अनरूप ही कदम थिरकाने वाला है



अन्य दो गीत कुछ अलग मिजाज़ के हैं “बिछडन” राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ में है जो हिमेश के पुराने राग आधारित गीतों की याद दिलाता है. संगीत संयोजन हमेशा की तरह खूबसूरत है. आतिफ असलम का गाया ‘ये जो हल्की हल्की’ सबसे अलग ध्वनि का है जहाँ बेस गिटार का खूबसूरत इस्तेमाल है. कुल मिलकर ‘एस ओ एस’ का संगीत मनोरजन से भरपूर है. तेज रिदम के गीतों में मेलोडी का पुट भी है. हाँ नयेपन का अभाव अवश्य है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस अल्बम को ३.६ की रेटिंग     




Monday, October 15, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (२०) आइय्या , और आपकी बात-- बोल्ड थीम के अनुरूप ही बोल्ड है "आइय्या" का संगीत


संगीत समीक्षा -  आइय्या

दोस्तों पिछले सप्ताह हमने बात की थी अमित त्रिवेदी के “इंग्लिश विन्गलिश” की और हमने अमित को आज का पंचम कहा था. अमित दरअसल वो कर सकते हैं जो एक श्रोता के लिहाज से शायद हम उनसे उम्मीद भी न करें. उन्होंने हमें कई बार चौंकाया है. लीजिए तैयार हो जाईये एक बार फिर हैरान होने के लिए.

जी हाँ आज हम चर्चा कर रहे उनकी एक और नयी फिल्म “आइय्या” का, जिसमें वो लौटे हैं अपने प्रिय गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के साथ. मुझे लगता है कि अमिताभ भी अमित के साथ जब मिलते हैं तो अपने श्रेष्ठ दे पाते हैं. आईये जानें की क्या है आइय्या के संगीत में आपके लिए.

हाँ वैधानिक चेतावनी एक जरूरी है. दोस्तों ये संगीत ऐसा नहीं है कि आप पूरे परिवार के साथ बैठ कर सुन सकें. हाँ मगर अकेले में आप इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं. वैसे बताना हमारा फ़र्ज़ था बाकी आप बेहतर जानते हैं.

खैर बढते हैं अल्बम के पहले गीत की तरफ. ८० के डिस्को साउंड के साथ शुरू होता है “ड्रीमम वेकपम” गीत, जो जल्दी ही दक्षिण के रिदम में ढल जाता है. पारंपरिक नागास्वरम और मृदंग मिलकर एक पूरा माहौल ही रच डालते हैं. ये गीत आपको हँसता भी है गुदगुदाता भी है और कुछ श्रोता ऐसे भी होंगें जो इसे सुनकर सर पीट लेंगें. पर हमारी राय में तो ये गीत बहुत सुनियोजित तरीके से रचा गया है जिसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है. शब्दों में जम कर जम्पिन्गम- पम्पिन्गम किया है अमिताभ ने. गायिका सौम्या राव की आवाज़ और अदायगी जबरदस्त है. यकीनन तारीफ के लायक. शरारती शब्द, जबरदस्ती गायकी और उत्कृष्ट संगीत संयोजन इस गीत को तमाम अटकलों के बावजूद एक खास पहचान देते हैं.

अगला गीत सवा डॉलर कुछ हद तक शालीन है, इसे आप अपने बच्चों के साथ बैठकर भी सुन सकते हैं...पर देखा जाए तो ये अल्बम का सबसे “आम” गीत लगता है, सरल लावनी धुन पर थिरकती सुनिधि की आवाज़. “ड्रीमम वेक्पम” के अनूठे अंदाज़ के बाद ये अच्छा और साफ़ सुथरा गीत कुछ कमजोर सा लगता है.

अगले ही गीत से अमित – अमिताभ की ये जोड़ी पूरे जोश खरोश के साथ अपने शरारतों में लौट आते हैं. ये फिल्म का शीर्षक गीत है. फिर एक बार चेता दें बच्चों से दूर रखें इस गीत को....मगर दोस्तों क्या जबरदस्त संयोजन है अमित त्रिवेदी का. एक एक पीस सुनने लायक है. “अगा बाई” गीत में न सिर्फ अमिताभ के शब्द चौंकते हैं, श्यामली खोलगडे और मोनाली ठाकुर की आवाजों में गजब की ऊर्जा और उत्तेजना है जो अश्लील नहीं लगती कहीं भी. निश्चित ही ये गायिकाएं श्रेया और सुनिधि को जबरदस्त टकर देने वाली हैं. अगा बाई एक मस्त मस्त गीत है...एकदम लाजवाब.

अगला गीत “महक भी” में अमित लाये शहनाई के स्वर. गीत शुरू होने से पहले ही अपने सुन्दर वाध्य संरचना से आपको खुद से बाँध लेते हैं. श्रेया की मखमली आवाज़ और पार्श्व में बजती शहनाई...वाह एक बेहद खूबसूरत गीत, मधुर और सुरीला.

 अब देखिये, फिर एक बार सुरीली फुहार के बाद लौटते हैं अमित और अमिताभ अपने शरारत भरी एक और रचना लेकर. यक़ीनन इसे सुनकर आप हँसते हँसते पेट पकड़ लेंगें. इस गीत में कुछ अश्लील सी कोमेडी है, स्नेह कंवलकर और खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने बेहद चुटीले अंदाज़ में निभाया है इस गीत को. अब आप को लिज्जत पापड़ के विज्ञापन को देखकर हँसी आये तो इल्जाम दीजियेगा इस गीत को. और क्या कहें.... 

“वाकडा” अलबम का अंतिम गीत है जो दक्षिण के दुल्हे और महाराष्ट्रीयन दुल्हन के मेल के आंकड़े का वाकडा समझा रहा है. गीत सामान्य है मगर शब्द सुनने को प्रेरित करते हैं अमिताभ के. कुल मिलकर “आइय्या” का संगीत बेहद अलग किस्म का है. या तो आप इसे बेहद पसदं करेंगें या बिल्कुल नहीं.

रेडियो प्लेबैक इंडिया इसे इसके नयेपन के लिए दे रहा है ४.३ की रेटिंग.


एक सवाल - गीत "व्हाट टू डू" की थीम पर कुछ वर्षों पहले एक और गीत आया था, वो भी काफी हिलेरियस था, रितेश देखमुख पर फिल्माया वो गीत कौन सा था याद है आपको ? बताईये हमें अपनी टिप्पणियों में 

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

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