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Monday, June 15, 2009

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम...तुम रहे न तुम हम रहे न हम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 112

ज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' बड़ा ही ग़मगीन है दोस्तो, क्यूँकि आज हम इसमें एक बेहद प्रतिभाशाली और कामयाब फ़िल्मकार और एक बहुत ही मशहूर और सुरीली गायिका के दुखद अंत की कहानी आप को बताने जा रहे हैं। अभिनेता और निर्माता-निर्देशक गुरुदत्त साहब की एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी 'काग़ज़ के फूल' (१९५९)। इस फ़िल्म से गुरुदत्त को बहुत सारी उम्मीदें थीं। लेकिन व्यावसायिक रूप से फ़िल्म बुरी तरह से पिट गयी, जिससे गुरु दत्त को ज़बरदस्त झटका लगा। 'काग़ज़ के फूल' की कहानी कुछ इस तरह से थी कि सुरेश सिन्हा (गुरु दत्त) एक मशहूर फ़िल्म निर्देशक हैं। उनकी पत्नी बीना (वीणा) के साथ उनके रिश्ते में अड़चनें आ रही हैं क्यूँकि बीना के परिवार वाले फ़िल्म जगत को अच्छी दृष्टि से नहीं देखते। आगे चलकर सुरेश को अपनी बच्ची पम्मी (बेबी नाज़) से भी अलग कर दिया जाता है। तभी सुरेश के जीवन में एक नयी लड़की शांति (वहीदा रहमान) का आगमन होता है जिसमें सुरेश एक बहुत बड़ी अभिनेत्री देखते हैं। सुरेश उसे अपनी फ़िल्म 'देवदास' में पारो का किरदार देते हैं और रातों रात शांति एक मशहूर नायिका बन जाती हैं। लोग सुरेश और शांति के संबधों को लेकर अफ़वाहें फैलाते हैं जिसका असर सुरेश की बेटी पम्मी तक पड़ती है। पम्मी के अनुरोध से शांति फ़िल्म जगत छोड़ देती है और एक स्कूल टीचर बन जाती है। शांति के चले जाने से सुरेश को भारी नुकसान होता है और फ़िल्म जगत से अलग-थलग पड़ जाता है। इंडस्ट्री उसे भूल जाता हैं और वो बिल्कुल अकेला रह जाता है। अपनी अनुबंधों (कॉन्ट्रेक्टों) के कारण शांति को फ़िल्मों में वापस आना तो पड़ता है लेकिन वो सुरेश की कोई मदद नहीं कर पाती क्यूँकि सुरेश तो बरबादी की तरफ़ बहुत आगे को निकल चुका होता है। आख़िरकार अपने बीते हुए स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए सुरेश अपनी स्टूडियो मे निर्देशक की कुर्सी पर बैठे-बैठे दम तोड़ देता है। यह फ़िल्म गुरुदत्त की सब से बेहतरीन फ़िल्म मानी जाती है जिसे बाद में 'वर्ल्ड क्लासिक्स' में गिना जाने लगा। लेकिन दुखद बात यह है कि जब यह फ़िल्म बनी थी तो फ़िल्म बुरी तरह से फ़्लाप हो गयी थी। और आज जब भी यह फ़िल्म किसी थियटर में लगती है तो 'हाउसफ़ुल' हुए बिना नहीं रहती। तक़नीकी दृष्टि से भी यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म रही। रोशनी और छाया के ज़रिये कैमरे का जो काम इस फ़िल्म में हुआ है वह सचमुच जादूई है। ब्लैक ऐंड वाइट में इससे बेहतर सिनीमाटोग्राफी संभव नहीं। तभी तो फ़िल्म के सिनेमाटोग्राफर वी. के. मूर्ती को उस साल का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। आज फ़िल्म निर्देशन और निर्माण के पाठ्यक्रम में इस फ़िल्म को शामिल किया जाता है। फ़िल्म के संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गाने लिखे थे कैफ़ी आज़मी ने। 'काग़ज़ के फूल' के पिट जाने का असर गुरु दत्त पर इतना ज़्यादा हुआ कि इस फ़िल्म के बाद उन्होने फ़िल्में निर्देशित करना ही छोड़ दिया। उनकी अगली महत्वपूर्ण फ़िल्म 'साहब बीवी और ग़ुलाम' को अबरार अल्वी ने निर्देशित किया था। गुरुदत्त लगातार मानसिक अवसाद से भुगतने लगे, और १९६४ में एक रात नशे की हालत में उन्होने ख़ुदकुशी कर ली। केवल ४० वर्ष की आयु में एक बेहतरीन फ़िल्मकार का दुखद अंत हो गया।

कुछ लोगों का मानना है कि 'काग़ज़ के फूल' की कहानी गुरुदत्त के निजी जीवन से मिलती जुलती थी। उनकी पसंदीदा अभिनेत्री कुछ हद तक कारण बनीं उनके पारिवारिक जीवन में चल रही अशांति का। एक तरफ़ गुरुदत्त का मानसिक अवसाद और दूसरी तरफ़ गीता दत्त का नर्वस ब्रेकडाउन। कुल मिलाकर उनका घर संसार महज़ एक सामाजिक कर्तव्य बन कर रह गया। पति के देहांत के बाद गीता दत्त और भी ज़्यादा दुखद पारिवारिक जीवन व्यतीत करती रहीं। उनकी निजी ज़िंदगी भी उनकी वेदना भरे गीतों की तरह हो गयी थी। वे संगीत निर्देशिका भी बनना चाहती थीं, लेकिन २० जुलाई १९७१ को उनका यह सपना हमेशा के लिए टूट गया - वक़्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम...। गीताजी भी हमेशा के लिए चली गयीं और पीछे छोड़ गयीं अपने असंख्य अमर गीत। मृत्यु से केवल दो वर्ष पहले उन्होने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में शिरक़त की थीं जिसमें उन्होंने कुछ ऐसे शब्द कहे थे जो उस समय उनकी मानसिक स्थिति बयान करते थे। जैसे कि "सपनों की उड़ान का कोई अंत नहीं, कोई सीमा नहीं, न जाने यह मन क्या क्या सपने देख लेता है। जब सपने भंग होते हैं तो कुछ और ही हक़ीक़त सामने आती है।" अपने पति को याद करते हुए वो कहती हैं - "अब मेरे सामने है फ़िल्म 'प्यासा' का रिकार्ड, और इसी के साथ याद आ रही है मेरे जीवन की सुख भरी-दुख भरी यादें, लेकिन आपको ये सब बताकर क्या करूँगी! मेरे मन की हालत का अंदाज़ा आप अच्छी तरह लगा सकते हैं। इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक थे मेरे पतिदेव गुरु दत्त जी। मेरे पतिदेव सही अर्थ में कलाकार थे। वो जो कुछ भी करते बहुत मेहनत और लगन से करते। फ़िल्मों के ज़रिए अपने विचारों को व्यक्त करते। आज अंतिम गीत भी मैं अपने पतिदेव की फ़िल्म 'साहब बीवी और ग़ुलाम' से सुनवाने जा रही हूँ। इस गीत के भाव पात्रों से भी ज़्यादा मेरे अपने भावों से मिलते-जुलते हैं।" पता है दोस्तों कि उन्होने 'साहब बीवी और ग़ुलाम' फ़िल्म के किस गीत को सुनवाया था? जी हाँ, "न जायो सैयाँ छुड़ा के बैयाँ"। लेकिन आज हम आपको सुनवा रहे हैं "वक्त ने किया क्या हसीं सितम"। यह गीत गीताजी की सब से यादगार गीतों में से एक है। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' श्रद्धांजली अर्पित कर रही है फ़िल्म जगत के इस सदाबहार फ़नकार दम्पति को जिन्होंने फ़िल्म जगत में एक ऐसी छाप छोड़ी है कि जिस पर वक़्त का कोई भी सितम असर नहीं कर सकता। गुरु दत्त और गीता दत्त की स्मृति को हिंद-युग्म की तरफ़ से श्रद्धा सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. गीत के दो वर्जन हैं - लता और रफी की एकल आवाजों में.
२. इस फिल्म में थे धर्मेन्द्र और शर्मीला टैगोर. संगीत शंकर जयकिशन का.
३. मुखड़े में शब्द है -"सपने".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी को बधाई। इनका स्कोर 2 से 4 हो गया है। स्वप्न मंजूषा जी, राज जी और पराग जी, आपकी शिकायत लाज़िमी है, हमने इसके स्वरूप को बदलने के बारे में विचार किया था, लेकिन ब्लॉगर तकनीक की अपनी सीमाओं की वज़ह से यह सम्भव नहीं हो पा रहा। जल्द ही कोई न कोई और रास्ता निकालेंगे। अपना प्रेम बनाये रखें। फिलहाल तो सबसे पहले जवाब देने का ही गेम खेलते हैं। मंजु जी को भी बधाई।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Tuesday, April 28, 2009

जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी...रफी साहब पूछ रहे हैं गीता दत्त से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 64

पुराने ज़माने की फ़िल्मों में नायक-नायिका की जोड़ी के अलावा एक जोड़ी और भी साथ साथ फ़िल्म में चलती थी, और यह जोड़ी हुआ करती थी दो हास्य-कलाकारों की। जॉनी वाकर एक बेहद मशहूर हास्य अभिनेता हुआ करते थे उन दिनो और हर फ़िल्म में निभाया हुआ उनका चरित्र यादगार बन कर रह जाता था। उन पर बहुत सारे गाने भी फ़िल्माये गये हैं जिनमें से ज़्यादातर रफ़ी साहब ने गाये हैं। जॉनी वाकर के बेटे नासिर ख़ान ने एक बार कहा भी था कि उनके पिता के हाव भाव की नक़ल गायिकी में रफ़ी साहब के सिवाय और दूसरा कोई नहीं कर पाता था। कुछ उदहारण देखिये रफ़ी साहब और जॉनी भाई की जोड़ी के गानों की "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये", "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ", "ऑल लाइन किलियर", "जंगल में मोर नाचा किसी ने ना देखा", "ये दुनिया गोल है", और "मेरा यार बना है दुल्हा" इत्यादि। ऐसी ही एक और फ़िल्म आयी थी 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' जिसमें जॉनी वाकर और कुमकुम पर एक बहुत ही मशहूर युगल-गीत फ़िल्माया गया था और जिसमें रफ़ी साहब के साथ गीत दत्त ने आवाज़ मिलाई थीं। कुछ मज़ेदार सवालों और उनके शरारती जवाबों को मिलाकर मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को बड़े ही मज़ेदार अंदाज़ में लिखा था। और ओ. पी. नय्यर साहब ने भी वैसा ही संगीत दिया जैसा कि इस गीत की ज़रूरत थी। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पेश है "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी"। फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह गीत 'रोमांटिक कॉमेडी' की एक अद्‍भुत मिसाल है।

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही पता चलता है 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' सन् १९५५ की फ़िल्म थी जो बेहद कामयाब रही। १९५४ में फ़िल्म 'आर-पार' की अपार कामयाबी के बाद अगले ही साल गुरु दत्त ने अपने ही बैनर तले 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' बनाई और ख़ुद नायक बने और मधुबाला बनीं नायिका। इस हास्य फ़िल्म के ज़रिए गुरु दत्त देश में चल रही सामाजिक और राजनैतिक अवस्था को परदे पर लाना चाहते थे और कुछ हद तक कामयाब भी रहे। गीत-संगीत के लिए भी वही टीम बरक़रार रही जो 'आर-पार' में थी, यानी कि नय्यर और मजरूह साहब, और गायकों की सूची में शमशाद बेग़म, गीता दत्त और महम्मद. रफ़ी। प्रस्तुत गीत ओ. पी नय्यर के संगीत में गुरु दत्त साहब का सब से पसंदीदा गीत रहा है, यह बात ख़ुद नय्यर साहब ने एक बार विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में कही थी। उन्होने उसी कार्यक्रम में यह भी कहा था कि गुरु दत्त साहब ने एक बार कहा था कि "O.P. Nayyar translates lyrics into music". यह एक संगीतकार के लिए बहुत बड़ी तारीफ़ थी। तो लीजिए गुरु दत्त, नय्यर और मजरूह साहब, रफ़ी साहब और गीता दत्त, तथा जॉनी वाकर और कुमकुम को याद करते हुए आज का यह गुदगुदानेवाला गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओपी नय्यर, शम्मी कपूर और मोहम्मद रफी की तिकडी.
२. मजरूह साहब के दिलकश बोल.
३. मुखड़े में शब्द है - "मस्त मस्त"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी, सुमित जी और सलिल जी, एकदम सही जवाब.....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Thursday, March 19, 2009

बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 27

चौदहवीं का चाँद, 1960 की एक बेहद चर्चित फिल्म. गुरु दत्त के इस फिल्म में वहीदा रहमान की खूबसूरती का बहुत ही सुंदर उल्लेख हुया था इस फिल्म के शीर्षक गीत में, जिसे आप प्रायः सुनते ही रहते हैं कहीं ना कहीं से. इसी फिल्म से एक ज़रा कम सुना सा एक अनमोल गीत आज हम पेश कर रहे हैं 'ओल्ड इस गोल्ड' में. लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत है "बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं, घर की बर्बादी के आसार नज़र आते हैं". अब तक गुरु दत्त ओ पी नय्यर और एस डी बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ ही काम कर रहे थे. चौदहवीं का चाँद के लिए जब उन्होने संगीतकार रवि को 'फोन' करके यह कहा कि वो उनकी अगली फिल्म में उन्हे बतौर संगीतकार लेना चाहते हैं तो रवि साहब को यकीन ही नहीं हुआ. गुरु दत्त साहब ने रवि साहब से यह भी पुछा कि शक़ील बदायूनीं को अगर गीतकार लिया जाए तो कैसा हो. रवि को ज़रा संदेह था कि शायद शक़ील साहब नौशाद को छोड्कर बाहर गाने ना लिखें. लेकिन शक़ील साहब ने गुरु दत्त के निवेदन को ठुकराया नहीं और रवि साहब से मिलकर बाहर जाते हुए शक़ील साहब ने उनसे कहा की "मैने बाहर कहीं काम नहीं किया है, मुझे संभाल लेना".

चौदहवीं का चाँद एक 'ब्लाकबस्टर' साबित हुई. इस फिल्म के बाद रवि और गुरु दत्त में काफ़ी दोस्ती भी हो गयी. उन दिनों 'इंडस्ट्री' में एक ऐसी बात चली थी की गुरु दत्त अपनी फिल्म के गीतकार और संगीतकार के काम में बहुत दखलंदाजी करते हैं. लेकिन विविध भारती को दिये एक 'इंटरव्यू' में रवि साहब ने साफ इनकार करते हुए कहा था कि उन्होने कभी ऐसा महसूस नहीं किया. इस फिल्म के गीत संगीत ने भी अपना कमाल दिखाया. शक़ील और रवि ने जैसे उस वक़्त के लखनऊ शहर के माहौल को ज़िंदा कर दिखाया था गीत संगीत के ज़रिए. शेर-ओ-शायरी भरे नग्मों, कोठों का गीत संगीत, और "मिली खाक में मोहब्बत" जैसे दर्द भरे नग्मों ने लोगों को अपनी ओर पूरी सफलता से आकर्षित किया. पुरस्कारों की दौड में भी यह फिल्म पीछे नहीं रही. मोहम्मद रफ़ी और शक़ील बदायूनीं को इस फिल्म के शीर्षक गीत के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. बिरेन नाग को सर्बश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया. तो पेश है आज के 'ओल्ड इस गोल्ड' में लताजी की आवाज़. इस गाने के संगीत संयोजन में सारंगी के सुरीले प्रयोग पर ज़रूर ध्यान दीजिएगा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र की संगीत में किशोर के मनमौजी अंदाज़.
२. गीत का एक संस्करण आशा ने भी गाया है.
३. मुखड़े में शब्द है -"@#%" हा हा हा.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी लगातार शतक पे शतक मार रहे हैं, आचार्य जी, मनु जी, पी एन साहब, सुमित जी सब के सब "फॉर्म" में लौट आये हैं. वाह ....जय हो.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Wednesday, January 28, 2009

बरकरार है आज भी ओ पी नैयर के संगीत का मदभरा जादू

जीनिअस संगीतकार ओ पी नैयर की दूसरी पुण्यतिथि पर विशेष -

१९५२ में एक फ़िल्म आई थी, -आसमान, जिसमें गीता दत्त ने एक बेहद खूबसूरत गीत गाया था -"देखो जादू भरे मोरे नैन..." यह संगीतकार ओ पी नैयर की पहली फ़िल्म थी, जो पहला गाना इस फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड हुआ था वो था "बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे..." गायक थे सी एच आत्मा साहब. दो अन्य गीत सी एच आत्मा की आवाज़ में होने थे जो नासिर पर फिल्माए जाने थे और ४ अन्य गीत, गीता ने गाने थे जो नायिका श्यामा पर फिल्मांकित होने थे. फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से आखिरी एक गीत जो फ़िल्म की सहनायिका पर चित्रित होना था उसके बोल थे "जब से पी संग नैना लगे...". नैयर ने इस गीत के लिए लता जी को तलब किया पर जब लता जी को ख़बर मिली कि उन्हें एक ऐसा गीत गाने को कहा जा रहा है जो नायिका पर नही फिल्माया जाएगा (ये उन दिनों बहुत बड़ी बात हुआ करती थी) उनके अहम् को धक्का लगा. वो उन दिनों की (और उसके बाद के दिनों की भी) सबसे सफल गायिका थी. लता ने ओ पी के लिए इस गीत को गाने से साफ़ इनकार कर दिया और जब नैयर साहब तक ये बात पहुँची, तो उन्होंने भी एक दृढ़ निश्चय किया, कि वो अपने कैरिअर में कभी भी लता के साथ काम नही करेंगें. ज़रा सोचिये इंडस्ट्री में कौन होगा ऐसा दूसरा, जो अपनी पहली फ़िल्म में ऐसा दबंग फैसला कर ले और लगभग दो दशकों तक जब तक भी उन्होंने फिल्मों में संगीत दिया वो अपने उस फैसले पर अडिग रहे. उस वक्त वो मात्र २५ साल के थे और पहली और आखिरी बार उन्होंने "जब से पी संग..." गीत के लिए चुना गायिका राजकुमारी को.

बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे (सुनिए ओ पी का सबसे पहला रेकॉर्डेड गीत)


हालांकि “आसमान” और उसके बाद आयी “छम छमा छम” और “बाज़”, तीनों ही फिल्में बुरी तरह पिट गई. पर गायिका गीता रॉय (दत्त) ने इस नए संगीतकार के हुनर को पहचान लिया था, उन्होंने गुरु दत्त से जब वो अपनी पहली प्रोडक्शन पर काम शुरू करने वाले थे ओ पी की सिफारिश की. गीता के आग्रह को गुरु टाल नही पाये और इस तरह ओ पी को मिली "आर पार". इस फ़िल्म ने नैयर ने गीता के साथ मिलकर वो गीत रचे कि आज तक जिनके रिमिक्सिस बनते और बिकते हैं. और इसी के साथ हिन्दी फिल्मों को मिला एक बेमिसाल संगीतकार. “आर पार” के बाद गुरु दत्त प्रोडक्शन के साथ नैयर ने अपनी हैट ट्रिक पूरी की मिस्टर और मिसिस ५५ (१९५५), और सी ई डी (१९५६) से. अब उनका सिक्का चल निकला था.

सुनिए गीता की मदभरी आवाज़ में "हूँ अभी मैं जवां..."


वो जिनके गीत आज भी हमें दौड़ भाग भरी इस जिंदगी में सकून देते हैं, उस ओ पी नैयर साहब के जीवन मगर फूलों की सेज नही रही कभी, कुछ स्वभाव से भी वो शुद्ध थे, खरे को खरा और खोटे को खोटा कहने से वो कभी नही चूकते थे. शायद यही वजह थी कि उनकी फिल्मी दुनिया में बहुत कम लोगों के साथ पटरी बैठी, यहाँ तक कि उनकी सबसे पसंदीदा गायिका गीता दत्त और आशा के साथ भी एक मोड़ पर आकर उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया.

उनके दर्द को ही शायद आवाज़ दे रहे हैं मुकेश यहाँ -


स्कूल कॉलेजों में कभी उनका मन नही लगा था. मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्हें लाहोर रेडियो में गाने का अवसर मिला. १० वर्ष की उम्र में वो संगीतकार बन गए पंजाबी फ़िल्म “धुलिया भट्टी” से जिसमें सी एच आत्मा का गाया गीत जिसे एच एम् वी ने रीलीस किया था "प्रीतम आन मिलो..." सुपर हिट साबित हुआ, इस फ़िल्म में उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी की. बँटवारे के बाद वो मुंबई आ गए. १९५२ में "आसमान" से शुरू हुआ संगीत सफर १९९३ में आई "जिद्द" फ़िल्म के साथ ख़तम हुआ. इस A टू Z के बीच ७३ फिल्में आई और ओ पी नैयर अपने कभी न भूल सकने वाले, गुनगुने, दिल के तार बरबस छेड़ते गीतों के साथ संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा के लिए कैद हो गए. "आखों ही आखों में इशारा हो गया..." क्या ये गीत अपने बनने के आज लगभग ५०-५२ सालों के बाद भी उतना ही तारो ताज़ा नही लगता आपको, भाई हमें तो लगता है -



कितनी अजीब बात है कि आल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गीत ब्रोडकास्ट करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था यह कहकर कि इनके बोल और धुन युवा पीढी को पथभ्रमित करने वाले हैं. हँसी आती है आज सोच कर भी (निखिल भाई गौर कीजिये, आप अकले नही हैं). बाद में रेडियो सीलोन पर उनके गीतों को सुनने की बढती चाहत से हार कर ख़ुद मंत्री महोदय को इस अंकुशता को हटाने के लिए आगे आना पड़ा. मात्र ३० साल की उम्र में उन्हें “रिदम किंग” की उपाधि मिल गई थी. उन्होंने संगीतकार के दर्जे को हमेशा ऊँचा माना और एक लाख रुपये पाने वाले पहले संगीत निर्देशक बने. १९५७ में आई "नया दौर" संगीत के आयाम से देखें तो उनके सफर का "मील का पत्थर" थी. शम्मी कपूर के आने के बाद तो ओ पी नैयर के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म संगीत भी जैसे फ़िर से जवान हो उठा. मधुबाला ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वो अपना पारिश्रमिक उन निर्माताओं के लिए कम कर देंगीं जो ओ पी को संगीतकार लेंगें. मधुबाला की ६ फिल्मों के लिए ओ पी ने संगीत दिया. वो उन दिनों के सबसे मंहगे संगीतकार होने के बावजूद उनकी मांग सबसे अधिक थी. फ़िल्म के शो रील में उनका नाम अभिनेताओं के नाम से पहले आता था. ऐसा पहले किसी और संगीतकार के लिए नही हुआ था, ओ पी ने ट्रेंड शुरू किया जिसे बाद में बहुत से सफल संगीतकारों ने अपनाया.

फ़िल्म १२ o clock का ये गीत सुनिए -"कैसा जादू..." (गौर कीजियेगा इसमें जब गायिका "तौबा तौबा" बोलती है सुनने वालों के दिल में एक अजीब सी कसक उठती है, यही ओ पी का जादू था)


एक साल ऐसा भी आया जब ओ पी की एक भी फ़िल्म नही आई. वर्ष १९६१ को याद कर ओ पी कहते थे -"मोहब्बत में सारा जहाँ लुट गया था..". दरअसल ओ पी अपनी सबसे पसंदीदा पार्श्व गायिका (आशा) के साथ अपने संबंधों की बात कर रहे थे. १९६२ में उन्होंने शानदार वापसी की फ़िल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना" से. इसी दशक में उन्होंने "फ़िर वही दिल लाया हूँ"(१९६३), काश्मीर की कली (१९६४, और "मेरे सनम(१९६५) जैसी फिल्मों के संगीत से शीर्ष पर स्थान बरकरार रखा. एक बार वो शर्मीला टैगोर पर फिल्माए अपने किसी गीत पर उनके अभिनय से खुश नही थे, उन्होंने बढ़ कर शर्मीला को सलाह दे डाली कि मेरे गीतों आप बस खड़े रहकर लब नही हिला सकते ये गाने हरकतों के हैं आपको अपने शरीर के हाव भावों का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा. शर्मीला ने उनकी इस सलाह को गांठ बाँध ली और अपनी हर फ़िल्म में इस बात का ख़ास ध्यान रखा. ओ पी का सीमित संगीत ज्ञान कभी भी उनके आडे नही आया फ़िल्म "बहारें फ़िर भी आयेंगीं" के गीत "आपके हसीं रुख पे...." के लिए उन्होंने सारंगी का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया.

रफी साहब की आवाज़ में पेश है "आपके हसीन रुख पे..."


पर दशक खत्म होते होते अच्छे संगीत के बावजूद उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगी. रफी साहब से भी उनके सम्बन्ध बिगड़ चुके थे. गुरु दत्त की मौत के बाद गीता ने ख़ुद को शराब में डुबो दिया था और १९७२ में उनकी भी दुखद मौत हो गई, उधर आशा के साथ ओ पी के सम्बन्ध एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा था. ये उनके लिए बेहद मुश्किल समय था. फ़िल्म "प्राण जाए पर वचन न जाए" में आशा ने उनके लिए गाया "चैन से हमको कभी....". अगस्त १९७२ में आखिरकार ओ पी और आशा ने कभी भी साथ न काम करने का फैसला किया और उसके बाद उन्हें कभी भी एक छत के नीचे एक साथ नही देखा गया. १९७३ में जब आशा को अपने इसी गीत के लिए फ़िल्म फेयर मिला तब वो वहां मौजूद नही थी (ऐसा उन्होंने जानकर ही किया होगा). ओ पी ने उनकी तरफ़ से पुरस्कार ले तो लिया, पर घर लौटते वक्त उन्होंने उस ट्रोफी को अपनी कार से बाहर फैंक दिया. कहते हैं उसके टूटने की गूँज आखिरी दम तक उन्हें सुनाई देती रही. जाहिर है, उसके बाद भी उन्होंने काम किया (लगभग १५० गीतों में) अलग अलग गायिकाओं को आजमाया, पर वो जादू अब खो चुका था. कहने को जनवरी २८, २००७ तक ओ पी जीवित रहे पर संगीतकार ओ पी नैयर को तो हम बहुत पहले ही कभी खो चुके थे….

"चैन से हमको कभी ...." (यकीनन ये आशा जी के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है..महसूस कीजिये उस दर्द को जो उन्होंने आवाज़ में घोला है)


(जारी...)



Friday, October 31, 2008

देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं...

सचिन देव बर्मन साहब की ३३ वीं पुण्यतिथि पर दिलीप कवठेकर का विशेष आलेख -

सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है, जो हम जैसे सुरमई संगीत के दीवानों के दिल में अंदर तक जा बसा है. मेरा दावा है कि अगर आप और हम से यह पूछा जाये कि आप को सचिन दा के संगीतबद्ध किये गये गानों में किस मूड़ के, या किस Genre के गीत सबसे ज़्यादा पसंद है, तो आप कहेंगे, कि ऐसी को विधा नही होगी, या ऐसी कोई सिने संगीत की जगह नही होगी जिस में सचिन दा के मेलोड़ी भरे गाने नहीं हों.

आप उनकी किसी भी धुन को लें. शास्त्रीय, लोक गीत, पाश्चात्य संगीत की चाशनी में डूबे हुए गाने. ठहरी हुई या तेज़ चलन की बंदिशें. संवेदनशील मन में कुदेरे गये दर्द भरे नग्में, या हास्य की टाईमिंग लिये संवाद करते हुए हल्के फ़ुल्के फ़ुलझडी़यांनुमा गीत. जहां उनके समकालीन गुणी संगीतकारों नें अपने अपने धुनों की एक पहचान बना ली थी, सचिन दा हमेशा हर धुन में कोई ना कोई नवीनता देने के लिये पूरी मेहनत करते थे.

इसीलिये, उनके बारे में सही ही कहा है, देव आनंद नें (जिन्होने अपने लगभग हर फ़िल्म में - बाज़ी से प्रेम पुजारी तक सचिन दा का ही संगीत लिया था)- He was One of the Most Cultured & and Sophisticated Music Director,I have ever encountered !
हालांकि गीतकार जावेद अख्त़र नें उनके साथ काम नहीं किया लेकिन वे भी कायल थे सचिन दा की धुनों के रेंज से - चलती का नाम गाड़ी - सुजाता - गाईड़ - अभिमान.

शायद इसीलिये वे फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी. अपने १९४६ (शिकारी ) से शुरु हुए और त्याग (१९७७) तक के फ़िल्मी संगीत के सफ़र में ८९ फ़िल्मों के लिये लगभग ६६६ गीतों के संगीत रचना करते हुए देव आनंद, गुरुदत्त, हृषिकेश मुखर्जी, विजय आनंद, शक्ति सामंत आदि सशक्त निर्माताओं के साथ काम किया.

गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.

संगीत के कंपोज़िशन के साथ ही वाद्यों के ओर्केस्ट्राइज़ेशन की भी बारीकीयां उन्हे पता थी.एक दिन किसी कारणवश एक की जगह दो वायोलीन वादक रिकॊर्डिन्ग में बजा रहे थे, तो दादा नें कंट्रोल केबिन से साज़ों के हुजूम में से यह बात पकड़ ली.उन्होने कहा, मैं एक ही वायोलीन का इफ़ेक्ट चाहता हूं.

वे इस बात को मानते थे, और अपने बेटे राहुल को भी उन्होने यह बात बडे़ गंभीरता से समझाई थी कि हमेशा कुछ नया सृजन किया करो, ताकि लोगों में यह आतुरता बनी रहे, कि अब क्या. जब तीसरी मंज़िल फ़िल्म के लिये पंचम ने सभी गीत लगभग वेस्टर्न स्टाईल से दिये तो दादा बेहद खुश हुए. वे धोती कुर्ता ज़रूर पहनते थे मगर मन से बडे आधुनिक या मोडर्न थे.

पंचम से वे बेहद प्यार करते थे. एक दिन जब वे कहीं टहल रहे थे तो बच्चों के किसी समूह में से एक ने कहा- देखो, वे आर डी बर्मन के पिताजी जा रहे हैं. वे उस दिन बडे खुश होकर सब को पान खिलाने लगे (वे जब खुश होते थे तो सब को पान खिलाया करते थे)

किसी कारणवश प्यासा के समय उनकी बातचीत लता से बंद हो गयी थी. तो उन्होने आशा से गाने गवाये, मगर बाद में पंचम की वजह से वह रुठना खत्म हुआ.

सचिन दा से समय तक गीत पहले लिखे जाते थे, बाद में धुन बनाई जाती थी. दादा इतने नैसर्गिक कम्पोज़र थे कि मिनटों में धुन बना लेते थे, और इसीलियी उन्होने यह प्रथा पहली बार डाली कि पहले धुन बनेगी बाद में उसपर बोल बिठाये जायेंगे. साहिर, मजरूह और शैलेंद्र के साथ उनके कई गीत बनें, मगर देव आनंद नें नीरज, हसरत और पं. नरेन्द्र शर्मा से भी कई गीत लिखवाये जो हिन्दी में साहित्यिक वज़न रखते थे. पं. नरेन्द्र शर्मा से तो वे बडे़ खुश रहते थे क्योंकि वे भी मिनटों में कोई भी गीत रच लेते थे, वह भी बहर में, और विषय से बाबस्ता.

प्यासा फ़िल्म में गुरुदत्त नें उनसे एक गीत बिना किसी साज़ के भी बनवाया और रफ़ी से गवाया था. (तंग आ चुके है कश्मकशे जिंदगी से हम- जो बाद में फ़िल्म लाईट हाऊस में एन.दत्ता के निर्देशन में आशा नें भी गाया). साहिर की एक काव्य संग्रह 'परछाईयां' से उन्होने कुछ चुनिंदा रचनायें चुनी और सचिन दा से धुन बनवाई. जैसे जिन्हे -नाज़ है हिन्द पर वो कहां है, जाने वो कैसे लोग थे - फ़िल्म के बाकी गानो में आपको सचिन दा के अंदाज़ के गानें मिले होंगे- सर जो तेरा चकराये, हम आप की आंखों में आदि. मगर आपनें भी सुन ही लिया है, कि दूसरे गीत कितने अलग ढंग से संगीत बद्ध किये दादा नें.

अभी अभी साहिर की भी पुण्यतिथि थी. यह फ़िल्म उनके गुरुदत्त और सचिन दा के जोडी़ का एक काव्यात्मक ऊंचाई प्राप्त करने वाला कमाल ही था, जो प्यासा के बाद दादा और साहिर के मनमुटाव के बाद टूट गया. सचिन दा का बोलबाला तब इतना बढ़ गया था कि गुरुदत्त को कागज़ के फ़ूल फ़िल्म के समय दोनों में से जब एक को चुनना पडा़ तो उन्होने दादा को ही चुना.

किशोर कुमार को एक अलग अंदाज़ में गवाने का श्रेय भी दादा को ही जाता है. उन्होंनें देव आनंद के लिये किशोर कुमार की आवाज़ को जो प्रयोग किया वह इतिहास बन गया. बाद में राजेश खन्ना के लिये भी किशोर की आवाज़ लेकर किशोर को दूसरी इनिंग में नया जीवन दिया, जिसके बाद किशोर नें कभी भी पीछे मुड़ कर नही देखा.

उसके बावजूद, सचिन दा ने देव आनंद के लिये हमेशा ही किशोर से नहीं गवाया, बल्कि रफ़ी साहब से भी गवाया, जैसे जैसे भी गाने की ज़रूरत होती थी. तीन देवियां में - ऐसे तो ना देखो, और अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब, तेरे घर के सामने में तू कहां , ये बता और छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा,गाईड़ में तेरे मेरे सपने और गाता रहे मेरा दिल, आदि.

उनके गीतों में जो लोकगीतों की महक थी वह उत्तर पूर्व भारत के भटियाली, सारी औत धमैल आदि ट्रेडिशन से उपजी थी. उनकी आवाज़ पतली ज़रूर थी मगर दमदार और एक विशिष्ट लहजे की वजह से पृष्ठभूमि में गाये जाने वाले गीतों के लिये बड़ी सराही गयी.

और एक बात अंतिम, सचिन दा के सहायक के रूप में भी जयदेव (वर्मा) जो एक अच्छे सरोद वादक और गिटारिस्ट भी थे, का शास्त्रीय अनुभव भी मिला और पंचम की वजह से गानों में ताल वाद्यों के अलग अलग प्रयोग भी सुनने को मिले, वह एक अलग विषय है.

'बड़ी सूनी सूनी सी है, ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ' इस गीत के रिकॊर्डिंग के दो दिन बाद ही वे हमें छोड़ कर चले गये और गाने के बोल सार्थक कर गये.

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर

(उपर के चित्र में है दादा अपनी पत्नी मीरा के साथ, मध्य में देव आनंद और आर डी बर्मन के साथ और नीचे है किशोर कुमार के साथ)

सुनते हैं सचिन दा के स्वरबद्ध किए कुछ गीत. हमने कोशिश की है कि इस संकलन में सचिन दा के संगीत खजाने में से हर रंग के कुछ गीत समेटे जायें. काम बेहद मुश्किल था, हम कितने सफल हुए हैं ये आप सुनकर बतायें.



Friday, October 10, 2008

गुरु दत्त , एक अशांत अधूरा कलाकार !


महान फिल्मकार गुरुदत्त की पुण्यतीथी पर एक विशेष प्रस्तुति लेकर आए हैं दिलीप कवठेकर


कुछ दिनों पहले मैंने एक सूक्ति कहीं पढ़ी थी -

To make simple thing complicated is commonplace.
But ,to make complicated things awesomely simple is Creativity.

गुरुदत्त की अज़ीम शख्सियत पर ये विचार शत प्रतिशत खरे उतरते है. वे महान कलाकार थे , Creative Genre के प्रायः लुप्तप्राय प्रजाति, जिनके सृजनात्मक और कलात्मक फिल्मों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा.

आज से ४४ साल पहले १० अक्टुबर सन १९६४ को, उन्होंने अपने इस कलाजीवन से तौबा कर ली. रात के १ बजे के आसपास उनसे विदा लेने वाले आख़िरी शख्स थे अबरार अल्वी. उनके निधन से हमें उन कालजयी फिल्मों से मरहूम रहना पडा, जो उनके Signature Fims कही जाती है.


वसंथ कुमार शिवशंकर पदुकोने के नाम से इस दुनिया में आँख खोलने वाले इस महान कलाकार नें एक से बढ़कर एक ऐसी फिल्मों से हमारा त,अर्रूफ़ करवाया जो विश्वस्तरीय Masterpiece थीं. गुरुदत्त नें गीत संगीत की चासनी में डूबी, यथार्थ से एकदम नज़दीक खट्टी मीठी कहानियों की पर बनी फ़िल्मों से, उन जीवंत सीधे सच्चे संवेदनशील चरित्रों से हमें मिलवाया,जिनसे हम आम ज़िन्दगी में रू-ब-रू होते है. परिणाम स्वरूप हम मंत्रमुग्ध हो, उनके बनाए फिल्मी मायाजाल में डूबते उबरते रहे.

गुरुदत्त अपने आपमें एक संपूर्ण कलाकार बनने की पूरी पात्रता रखते थे. वे विश्व स्तरीय फ़िल्म निर्माता और निर्देशक थे. साथ ही में उनकी साहित्यिक रूचि और संगीत की समझ की झलक हमें उनके सभी फिल्मों में दिखती ही है. वे एक अच्छे नर्तक भी थे, क्योंकि उन्होंने अपने फिल्मी जीवन का आगाज़ किया था प्रभात फिल्म्स में एक कोरिओग्राफर की हैसियत से. अभिनय कभी उनकी पहली पसंद नही रही, मगर उनके सरल, संवेदनशील और नैसर्गिक अभिनय का लोहा सभी मानते थे .(उन्होने प्यासा के लिये पहले दिलीप कुमार का चयन किया था).वे एक रचनात्मक लेखक भी थे, और उन्होंने पहले पहले Illustrated Weekly of India में कहानियां भी लिखी थी.

संक्षेप में , वे एक संपूर्ण कलाकार होने की राह पर चले ज़रूर थे. मगर, उनके व्यक्तित्व में एक अधूरापन रहा हर समय, एक अशांतता रही हर पल, जिसने उन्हें एक अशांत, अधूरे कलाकार और एक भावुक प्रेमी के रूप में, दुनिया नें जाना, पहचाना.

देव साहब जो उनके प्रभात फिल्म कन्पनी से साथी थे, जिन्होंने नवकेतन के बैनर तले अपनी फिल्म 'बाजी' के निर्देशन का भार गुरुदत्त पर डाला था, नें अभी अभी कहीं यह माना था की गुरुदत्त ही उनके सच्चे मित्र थे. जितने भावुक इंसान वे थे, उसकी वजह से हमें इतनी आला दर्जे की फिल्मों की सौगात मिली, मगर उनकी मौत का भी कारण वही भावुकता ही बनी .

उनकी व्यक्तिगत जीवन पर हम अगर नज़र डालें तो हम रू-बी-रू होंगे एक त्रिकोण से जिसके अहाते में गुरुदत्त की भावनात्मक ज़िंदगी परवान चढी.

ये त्रिकोण के बिन्दु थे गीता दत्त , वहीदा रहमान और लेखक अबरार अल्वी , जिन्होंने गुरुदत्त के जीवन में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई.

गीता दत्त रॉय, पहले प्रेमिका, बाद में पत्नी.सुख और दुःख की साथी और प्रणेता ..
वहीदा रहमान जिसके बगैर गुरुदत्त का वजूद अधूरा है, जैसे नर्गिस के बिना राज कपूर का. जो उनके Creative Menifestation का ज़रिया, या केन्द्र बिन्दु बनीं.
और फ़िर अबरार अल्वी, उतने ही प्रतिभाशाली मगर गुमनाम से लेखक, जिन्होंने गुरुदत्त के "आरपार" से लेकर "बहारें फ़िर भी आयेंगी" तक की लगभग हर फ़िल्म्स में कहानी, या पटकथा का योगदान दिया.



आज भी विश्व सिनेमा का इतिहास अधूरा है गुरुदत्त के ज़िक्र के बगैर. पूरे जहाँ में लगभग हर फ़िल्म्स संस्थान में ,जहाँ सिनेमा के तकनीकी पहलू सिखाये जाते है, गुरुदत्त की तीन क्लासिक फिल्मों को टेक्स्ट बुक का दर्जा हासिल होता है. वे है " प्यासा ", " कागज़ के फ़ूल ", और "साहिब , बीबी और गुलाम ".

इनके बारे में विस्तार से फ़िर कभी..

गुरुदत्त नें अपने फिल्मी कैरियर में कई नए तकनीकी प्रयोग भी किए.
जैसे, फ़िल्म बाज़ी में दो नए प्रयोग किए-

1, १०० एमएम के लेंस का क्लोज़ अप के लिए इस्तेमाल पहली बार किया - करीब १४ बार. इससे पहले कैमरा इतने पास कभी नही आया, कि उस दिनों कलाकारों को बड़ी असहजता के अनुभव से गुज़रना पडा. तब से उस स्टाईल का नाम ही गुरुदत्त शॉट पड़ गया है.

२. किसी भी फ़िल्म्स में पहली बार गानों का उपयोग कहानी कोई आगे बढ़ाने के लिए किया गया.

वैसे ही फ़िल्म ' काग़ज़ के फूल ' हिन्दुस्तान में सिनेमा स्कोप में बनी पहली फ़िल्म थी. दरअसल , इस फ़िल्म के लिए गुरुदत्त कुछ अनोखा ,कुछ हटके करना चाहते थे , जो आज तक भारतीय फ़िल्म के इतिहास में कभी नही हुआ.

संयोग से तभी एक हालीवुड की फ़िल्म कंपनी 20th Century Fox नें उन दिनों भारत में किसी सिनेमास्कोप में बनने वाली फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म की थी और उसके स्पेशल लेंस बंबई में उनके ऑफिस में छूट गए थे. जब गुरुदत्त को इसका पता चला तो वे अपने सिनेमाटोग्राफर वी के मूर्ति को लेकर तुंरत वहाँ गए, लेंस लेकर कुछ प्रयोग किये , रशेस देखे और फ़िर फ़िल्म के लिए इस फार्मेट का उपयोग किया.

चलिए अब हम इस फ़िल्म के एक गाने का ज़िक्र भी कर लेते है -

वक्त नें किया क्या हसीं सितम .. तुम रहे ना तुम , हम रहे ना हम...

गीता दत्त की हसीं आवाज़ में गाये, और फ़िल्म में स्टूडियो के पृष्ठभूमि में फिल्माए गए इस गीत में भी एक ऐसा प्रयोग किया गया, जो बाद में विश्वविख्यात हुआ अपने बेहतरीन लाइटिंग की खूबसूरत संयोजन की वजह से.

आप ख़ुद ही देख कर लुत्फ़ उठाएं .



गुरुदत्त इस क्लाईमेक्स की सीन में कुछ अलग नाटकीयता और रील लाईफ़ और रियल लाईफ का विरोधाभास प्रकाश व्यवस्था की माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे. ब्लेक एंड व्हाईट रंगों से नायक और नायिका की मन की मोनोटोनी ,रिक्तता , यश और वैभव की क्षणभंगुरता के अहसास को बड़े जुदा अंदाज़ में फिल्माना चाहते थे.

जिस दिन उन्होंने नटराज स्टूडियो में शूटिंग शुरू की, तो उनके फोटोग्राफर वी के मूर्ति नें उन्हें वेंटिलेटर से छन कर आती धूप की एक तेज़ किरण दिखाई, तो गुरुदत्त बेहद रोमांचित हो उठे और उनने इस इफेक्ट को वापरने का मन बना लिया. वे मूर्ति को बोले,' मैं शूटिंग के लिए भी सन लाईट ही वापरना चाहता हूँ क्योंकि वह प्रभाव की मै कल्पना कर रहा हूँ वह बड़ी आर्क लाईट से अथवा कैमरे की अपर्चर को सेट करके नहीं आयेगा. '

तो फ़िर दो बड़े बड़े आईने स्टूडियो के बाहर रखे गये, जिनको बडी़ मेहनत से सेट करके वह प्रसिद्ध सीन शूट किया गया जिसमें गुरु दत्त और वहीदा के बीच में वह तेज रोशनी का बीम आता है. साथ में चेहरे के क्लोज़ अप में अनोखे फेंटम इफेक्ट से उत्पन्न हुए एम्बियेन्स से हम दर्शक ठगे से रह जाते है एवं उस काल में, उस वातावरण निर्मिती से उत्पन्न करुणा के एहसास में विलीन हो जाते है, एकाकार हो जाते है.

और बचता है .., गुरुदत्त के प्रति एक दार्शनिक सोच...,मात्र एक विचार , एक स्वर...

वक्त नें किया क्या हसीं सितम...

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर

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