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Thursday, June 9, 2016

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था...... 'कहकशाँ’ में आज छाया की माया



कहकशाँ - 11
छाया गांगुली, इब्राहिम अश्क़, भूपेन्द्र सिंह 
"नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है छाया गांगुली की आवाज़, इब्राहिम अश्क़ के बोल और भूपेन्द्र सिंह का संगीत।




मुज़फ़्फ़र अली की एक फ़िल्म आई थी "गमन"। फ़ारूख शेख और स्मिता पाटिल की अदाकारियों से सजी इस फ़िल्म में कई सारी दिलकश गज़लें थीं। यह तो सभी जानते हैं कि मुज़फ़्फ़र अली को संगीत का अच्छा-ख़ासा इल्म है, विशेषकर ग़ज़लों का। इसलिए उन्होंने गज़लों को संगीतबद्ध करने का ज़िम्मा उस्ताद अली अकबर ख़ाँ के शागिर्द जयदेव वर्मा को दिया। और मुज़फ़्फ़र अली की दूरगामी नज़र का कमाल देखिए कि इस फ़िल्म के लिए "जयदेव" को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया। भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में अब तक केवल तीन ही संगीतकार हुए हैं जिन्हें तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (रजत कमल) पाने का गौरव प्राप्त है: जयदेव, ए आर रहमान और इल्लैया राजा। हाँ तो हम "गमन" की गज़लों की बात कर रहे थे। इस फ़िल्म की एक गज़ल "आप की याद आती रही रात भर", जिसे "मक़दू्म मोहिउद्दिन" ने लिखा था, के लिए मुज़फ़्फ़र अली को एक नई आवाज़ की तलाश थी और यह तलाश हमारी आज की फ़नकारा पर खत्म हुई। इस गज़ल के बाद तो मानो मुज़फ़्फ़र अली इस नई आवाज़ के दीवाने हो गए। यूँ तो मुज़फ़्फ़र अली अपनी फ़िल्मों (गमन, उमराव जान) के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कम ही लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि इन्होंने कई सारी ही ग़ज़लों को संगीतबद्ध भी किया है। "रक़्स-ए-बिस्मिल","पैग़ाम-ए-मोहब्बत", "हुस्न-ए-जानां" ऐसी ही कुछ ख़ुशकिस्मत ग़ज़लों की एलबम हैं, जिन्हें मुज़फ़्फ़र अली ने अपनी सुरों से सजाया है। बाकी एलबमों की बात कभी बाद में करेंगे, लेकिन "हुस्न-ए-जानां" का ज़िक्र यहाँ लाज़िमी है। अमिर ख़ुसरो का लिखा "ज़िहाल-ए-मस्कीं" न जाने कितनी ही बार अलग-अलग अंदाज़ में गाया जा चुका है, यहाँ तक कि "ग़ुलामी" के लिए गुलज़ार साहब ने इसे एक अलग ही रूप दे दिया था, लेकिन कहा जाता है कि इस गाने को हमारी आज की फ़नकारा ने जिस तरह गाया है, जिस अंदाज में गाया है, वैसा दर्द वैसा ग़म-ए-हिज्र आज तक किसी और की आवाज़ में महसूस नहीं होती। ऐसी है मुज़फ़्फ़र अली की परख और ऐसा है इस फ़नकारा की आवाज़ का तिलिस्म!

उस फ़नकारा के नाम से पर्दा हटाने के पहले मैं आज की गज़ल से जुड़े एक और हस्ती के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। आज की ग़ज़ल को साज़ों से सजाने वाला वह इंसान ख़ुद एक कामयाब ग़ज़ल-गायक है। गज़लों से परे अगर बात करें तो कई सारे फ़िल्मी-गानों को उन्होंने स्वरबद्ध किया है। एक तरह से वे गु्लज़ार के प्रिय रहे हैं। "दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात-दिन", "नाम गुम जाएगा", "एक अकेला इस शहर में", "हुज़ूर इस क़दर भी न इतराके चलिए" कुछ ऐसे ही मकबूल गाने हैं, जिन्हें गुलज़ार ने लिखा और "भूपिन्दर सिंह" ने अपनी आवाज़ दी। जी हाँ, हमारी आज की गज़ल के संगीतकार "भूपिन्दर सिंह" जी ही हैं। तो अब तक हम ग़ज़ल के संगीतकार से रूबरू हो चुके है, अब इस महफ़िल में बस ग़ज़लगो और गायिका की ही कमी है। दोस्तों, मुझे उम्मीद है कि मैने गायिका की पहचान के लिए जो हिंट दिए थे, उनकी मदद से आपने अब तक गायिका का नाम जान ही लिया होगा। आप हैं "छाया गांगुली"। छाया गांगुली से जुड़ी मैंने कई सारी बातें आपको पहले ही बता दी हैं, अब उनके बारे में ज़्यादा लिखने चलूँगा तो आलेख लंबा हो जाएगा। इसलिए अच्छा होगा कि मैं अब ग़ज़ल की ओर रूख़ करूँ।

कई साल पहले "नाज़ था ख़ुद पर मगर ऐसा न था" नाम से ग़ज़लों की एक एलबम आई थी। आज हम उसी एलबम की प्रतिनिधि गज़ल आपको सुना रहे हैं। प्रतिनिधि ग़ज़ल होने के कारण यह तो साफ़ ही है कि उस ग़ज़ल के भी बोल यही है..."नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था" । इस सुप्रसिद्ध गज़ल के बोल लिखे थे "इब्राहिम अश्क़" ने। कभी मौका आने पर "इब्राहिम अश्क" साहब के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे, अभी अपने आप को बस इस गज़ल तक ही सीमित रखते हैं। इस गज़ल की ख़ासियत यह है कि बस चार शेरों में ही पूरी दुनिया की बात कह दी गई है। गज़लगो कभी खुद पर नाज़ करता है, कभी जहां की तल्ख निगाहों का ब्योरा देता है तो कभी अपने महबूब पर गुमां करता है। भला दूसरी कौन-सी ऐसी गज़ल होगी जो चंद शब्दों में ही सारी कायनात का जिक्र करती हो। शुक्र यह है कि इश्क़-वालों के लिए कायनात बस अपने इश्क़ तक ही सिमटा नहीं है। वैसे इसे शुक्र कहें या मजबूरी, क्योंकि इश्क़-वाले तो ख़ुद में ही डूबे होते हैं, उन्हें औरों से क्या लेना। अब जब औरों को इनकी खुशी न पचे तो ये दुनिया की शिकायत न करें तो क्या करें।

इश्क-वालों ने किए जब अलहदा हैं रास्ते,
राह-भर में खार किसने बोए इनके वास्ते।

तो लीजिए आप सबके सामने पेश-ए-ख़िदमत है आज की ग़ज़ल, लुत्फ़ लें और अगर अच्छी लगे तो हमारे चुनाव की दाद दें:

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था,
आईने में जब तलक देखा न था।

शहर की महरूमियाँ मत पूछिये,
भीड़ थी पर कोई भी अपना न था।

मंजिलें आवाज़ देती रह गईं,
हम पहुँच जाते मगर रस्ता न था।

इतनी दिलकश थी कहाँ ये ज़िंदगी,
हमने जब तक आपको चाहा न था।




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, September 14, 2010

ज़िंदगी का फलसफा समझा कर माधोलाल कीप वाकिंग की जोरदार एवं असरदार अपील की है नायब राजा ने

ताज़ा सुर ताल ३५/२०१०


सुजॊय - सभी दोस्तों को हमारा नमस्कार! दोस्तों, आज हम एक ऐसी फ़िल्म के गीतों की चर्चा करने जा रहे हैं जो पैरलेल सिनेमा की श्रेणी में आता है। कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो व्यावसायिक लाभों से परे होती हैं, जिनका उद्देश्य होता है क्रीएटिव सैटिस्फ़ैक्शन। ये फ़िल्में भले ही सिनेमाघरों में ज़्यादा देखने को ना मिले, लेकिन अच्छे फ़िल्मों के दर्शक इन्हें अपने दिलों में जगह देते हैं और एक लम्बे समय तक इन्हें याद रखते हैं।

विश्व दीपक - लेकिन यह अफ़सोस की भी बात है कि आज फ़िल्मों का हिट होना उसकी मारकेटिंग पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गया है। पैसे वाले प्रोड्युसर हर टीवी चैनल पर अपनी नई फ़िल्म का प्रोमो बार बार लगातार दिखा दिखा कर लोगों के दिमाग़ पर उसे बिठा देते हैं और एक समय के बाद लोगों को भी लगने लगता है कि वह हिट है। गीतों को भी इसी तरह से आजकल हिट करार दिया जाता है। लेकिन जिन प्रोड्युसरों के पास पैसे कम है, वो इस तरह के प्रोमोशन नहीं कर पाते, जिस वजह से उनकी फ़िल्म सही तरीक़े से लोगों तक नहीं पहुँच पाती। जब लोगों को मालूम ही नहीं चल पाता कि ऐसी भी कोई फ़िल्म बनी है, तो उन्हें उस फ़िल्म के ना देखने पर दोष तो नहीं दिया जा सकता।

सुजॊय - बिलकुल सही बात है। अब पिछले दिनों हमारे सजीव सारथी जी से ही मुझे पता चला कि 'माधोलाल कीप वाकिंग्‍' नाम से भी कोई फ़िल्म आई है। उन्होंने कहा कि बहुत दिनों के बाद किसी फ़िल्म ने उन्हें रुलाया है। झूठ नहीं बोलूँगा, लेकिन मैंने इस फ़िल्म का नाम सुन ही नहीं था। अब इसमें ग़लती मेरी है या इस व्यवस्था की, इस तर्क में नहीं जाउँगा, लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि अगर सजीव जी इस फ़िल्म की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करते तो शायद आज हम किसी और फ़िल्म के गानें लेकर उपस्थित हुए होते।

विश्व दीपक - तो दोस्तों, जैसा कि आपने पढ़ा, आज हम आपको सुनवा रहे हैं 'माधोलाल कीप वाकिंग' फ़िल्म के गानें। इस फ़िल्म की चर्चा हम आगे जारी रखेंगे, पहले इस फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं।

गीत - नैना लागे तोसे (भुपेन्द्र)


सुजॊय - हमारी यह ख़ुशक़िस्मती है कि 'ताज़ा सुर ताल' में भुपेन्द्र जैसे गायक की आवाज़ हम शामिल कर सके हैं। हम बात कर रहे थे पैरलेल सिनेमा की, इस संदर्भ में यह बताना ज़रूरी है कि 'टाइम्स म्युज़िक' समय समय पर इस तरह की फ़िल्मों के संगीत को बढ़ावा देने के लिए सामने आता रहा है, और 'माधोलाल कीप वाकिंग्‍' के गीतों को जारी करने का ज़िम्मा भी इसी कंपनी ने लिया है। इस फ़िल्म का निर्माण ड्रीमकट्स के बैनर तले हुआ है और निर्देशक हैं जय टैंक। संगीत का पक्ष सम्भाला है नवोदित संगीतकार जोड़ी नायब और राजा ने। इस पहले गीत को सुनकर ही आप ने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि इस ऐल्बम से हम अच्छी उम्मीद रख सकते हैं। और जब भुपेन्द्र, मिताली, अल्ताफ़ राजा, और राजा हसन जैसे गायकों ने गीत गाए हों तो निश्चित रूप से आशाएँ बढ़ जाती हैं।

विश्व दीपक - बहुत दिनों के बाद भुपेन्द्र जी की आवाज़ किसी फ़िल्मी गीत में सुन कर बहुत ही अच्छा लगा, और बड़ी बात तो यह है कि ७१ वर्ष की आयु में भी कितना अच्छा उन्होंने इस गीत को निभाया है। वही मख़मली आवाज़, वही सुरीलापन, गीत को सुनते हुए जैसे वही 'किनारा' और 'परिचय' के गानें एक दम से याद आ गए। बहरर्हाल यह बता दें कि इस गीत को लिखा था सानी अस्लम ने। नवोदित संगीतकार नायब-राजा ने अच्छा कैची ट्युन सोचा है इस गीत के लिए और यक़ीनन यह गीत उन्हें बहुत आगे ले जाएगी।

सुजॊय - इस गीत के कुल तीन वर्ज़न हैं। पहला वर्ज़न भुपेन्द्र की आवाज़ में जिसका शीर्षक रखा गया है 'माधोलाल्स थीम'; दूसरा वर्ज़न है 'वाइफ़्स थीम', जिसे परवीना ने गाया है। आइए यह वर्ज़न यहाँ पर अब सुन लिया जाए।

गीत - नैना लागे तोसे (परवीना)


विश्व दीपक - और अब लगे हाथ 'डॉटर्स थीम' भी सुन लें, जिसे मिताली सिंह ने गाया है। धुन तो वही है, लेकिन इन तीनों के शब्दों में फेर बदल है। और मज़े की बात है कि भुपेन्द्र ने 'माधोलाल्स वर्ज़न' गाया था, इस हिसाब से 'वाइफ़्स थीम' मिताली से गवाया जाना था :-), लेकिन मिताली से बेटी वाला वर्ज़न गवाया गया। आइए सुन लेते हैं मिताली की आवाज़ में यह वर्ज़न।

गीत - नैना लागे तोसे (मिताली)


सुजॊय - शास्त्रीय रंग में रंगे इन तीनों गीतों को सुन कर एक अच्छी फ़ीलिंग सी आ रही है। फ़िल्म तो नहीं देखी मैंने, लेकिन इस गीत को सुन कर फ़िल्म के बारे में एक अच्छा फ़ील सा आ रहा है। मौका मिला तो ज़रूर देखूँगा। और आइए अब बढ़ते हैं आगे। भुपेन्द्र, मिताली और परवीना के बाद अब अल्ताफ़ राजा की आवाज़ की बारी। बिलकुल अल्ताफ़ साहब के अंदाज़ का गाना है "फ़लसफ़ा ये ज़िंदगी का कोई भी ना अब तक समझा"। उनके पहले के ग़ैर फ़िल्मी गीतों में वो जिस तरह से बीच बीच में शेर कहते थे, ठीक वैसे ही इस गीत के शुरु में उसी अंदाज़ में वो कहते हैं "ये मसअला ही ऐसा था कि हल ना कर सका, ऐ ज़िंदगी मैं तुझको मुकम्मल ना कर सका"।

विश्व दीपक - इस गीत को भी सानी अस्लम ने लिखा है। वैसे आपको बता दें कि इस फ़िल्म में दो गीतकार हैं, दूसरे गीतकार हैं साहिल फ़तेहपुरी। और फ़िल्म के मुख्य किरदारों में हैं सुब्रत दत्त, नीला गोखले, प्रणय नारायण, स्वर भास्कर और वर्णिता अगवाले। बहुत दिनों के बाद अल्ताफ़ राजा की आवाज़ में इस गीत को सुन कर भी उतना ही अच्छा लगेगा जितना भुपेन्द्र के गीत को सुन कर लगा है, ऐसा हमारा ख़याल है, आइए सुनते हैं।

गीत - फ़लसफ़ा ये ज़िंदगी का


सुजॊय - वाह! स्वीट ऐण्ड सिम्पल जिसे कहते हैं। साज़ों की ज़्यादा तामझाम नहीं है, हारमोनियम की विशुद्ध धुन एक अरसे के बाद सुनने को मिली है। इस दार्शनिक गीत के बोल भी विचारोत्तेजक हैं, और एक निराशावादी होते हुए भी जैसे एक संदेश दे जाते हैं जीवन के प्रति। एक आम आदमी के जीवन की कहानी को कितने सीधे सरल तरीके से कहा है गीतकार सानी अस्लम ने कि "लम्बे सफ़र की ख़ातिर युं तो सब के सब आते हैं, कई मुसाफ़िर रस्ते में ही चुप से उतर जाते हैं, उड़ जाता है रूह का पंछी मिल जाए मौका जो ज़रा सा"।

विश्व दीपक - वाक़ई एक छाप छोड़ने वाला गीत है और एक बार सुनने के बार एक और बार सुनने का दिल करता है। नायब और राजा ने भी इस गीत के लिए ऐसी धुन चुनी है जो सुनने वाले को उस पर टिकाए रखती है। बेशक़ यह गीत अल्ताफ़ राजा के असंख्य चाहनेवालों को ही नहीं, बल्कि अच्छे गीत-संगीत के क़द्रदानों को भी ख़ूब भाएगा। इस गीत की खासियत ही है अल्ताफ़ राजा का अंदाज़-ए-बयाँ। यह पूरी तरह से उन्हीं का गीत है जिसे कोई दूसरा नहीं गा सकता। आइए अब अगले गीत पर आते हैं जो कि एक क़व्वाली है अस्लम साबरी और साथियों की अवाज़ों में।

सुजॊय - इस क़व्वाली की शुरुआत अल्ताफ़ राजा के स्टाइल में एक शेर से होती है, लेकिन अल्ताफ़ राजा की आवाज़ में नहीं। ख़ुद ही सुनिए और इस क़व्वाली का मज़ा लें।

गीत - ख़ुदा के वास्ते


विश्व दीपक - "दर्द सीने में तो आँखों में समुंदर देखा, ज़िंदगी हमने तेरा कैसा मुक़द्दर देखा", इस शेर से क़व्वाली की शुरुआत होती है। अस्लम साबरी, जो एक मशहूर क़व्वाल हैं, उनके बारे में और क्या कहें, वो तो इसे ख़ूबसूरत अंजाम देंगे ही, लेकिन तारीफ़ नायब और राजा की करनी ही पड़ेगी जिन्होंने इस फ़िल्म में एक से एक उम्दा गीत रचा है।

सुजॊय - इस क़व्वाली की ख़ासियत यह है कि यह ना तो सूफ़ी या धार्मिक अंदाज़ का है और ना ही यह हुस्न-ओ-इश्क़ की कव्वाली है, बल्कि यह इंसानियत की क़व्वाली है, और यह प्रेरणा देती है कि जो पिछड़े वर्ग हैं उनके लिए हमें कुछ करना चाहिए, हर इंसान समान है, "ख़ुदा के वास्ते मिटा दे फ़ासले"। बहुत दिनों के बाद ऐसी क़व्वाली सुनने को मिली है, बल्कि ऐसा भी कह सकते हैं कि इस तरह की क़व्वाली कभी फ़िल्मों में आई ही नहीं है।

विश्व दीपक - फ़िल्म 'सरफ़रोश' में जो क़व्वाली थी "ज़िंदगी मौत ना बन जाए", उसमें भी कुछ कुछ ऐसी बात थी, लेकिन उसमें मुल्क की बात थी, इसमें इंसानियत की बात है। हैट्स ऒफ़ टू सानी अस्लम फिर से एक नायाब रचना के लिए।

सुजॊय - कुल मिलाकर अब तक जितने भी गीत हमने सुनें हैं हर के गीत के लिए मेरा "थम्प्स अप"! आइए अब अगले गीत की ओर बढ़ा जाए। यक़ीनन यह गीत भी हमें निराश नहीं करेगा।

गीत - ये धरती


विश्व दीपक - राजा की आवाज़ में यह गीत था, लेकिन इसकी धुन तो बिलकुल "सूरज की गरमी से तपते हुए तन को" गीत जैसी ही लगी। लेकिन अंतरे की धुन बिलकुल अलग है। पता नहीं उस धुन का इस्तेमाल क्यों किया गया जब कि नायब-राजा बहुत अच्छा ही काम कर रहे थे, एक और ऒरिजिनल धुन बनाना क्या बहुत ज़्यादा मुश्किल काम था?

सुजॊय - ख़ैर, राजा की आवाज़ में इस गीत को सुन कर अच्छा लगा, ३ मिनट ४५ सेकण्ड्स का यह गाना था और एक बार फिर से संदेशात्मक बोल, "ज़रा सी तुझपे मुसीबत जो आए, तो मेरी तरफ़ तुमने आँखें दिखाए, कभी ग़ौर से देखो सूरज को मेरे, जो ख़ुद को जला कर अंधेरे मिटाये"। पार्श्व में बजने वाले सीन्थेसाइज़र के बीट्स ने भी गीत को अच्छा सहारा दिया है।

विश्व दीपक - और अब इस ऐल्बम का अंतिम गीत। गीत, ग़ज़ल, क़व्वाली के बाद अब हार्ड रॊक की बारी गायक राजा हसन की आवाज़ में। जी हाँ, वही राजा हसन जो हाल में रियल्टी शो से उभरे हैं। राजा हसन ज़्यादातर दूसरे क़िस्म के गानें गाते रहे हैं, उनसे इस तरह का रॊक नंबर गवाना भी अपने आप में एक प्रयोग है। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है और इस बार गीतकार साहिल फ़तेहपुरी हैं। बस यही कह सकते हैं कि इस ऐल्बम का जिस तरह से एक सुरीली शुरुआत हुई थी, वैसा ही एक रॊकिंग समापन हो रहा है। लीजिए इस आख़िरी गीत को भी सुन लीजिए।

सुजॊय - इस ऐल्बम में "राजा" शब्द बार बार आया है, एक बार सिर्फ़ राजा, एक बार अल्ताफ़ राजा, और एक बार राजा हसन। अल्ताफ़ राजा की तो बात अलग है, लेकिन क्या राजा और राजा हसन भी दो अलग अलग नाम हैं? पहले पहले मुझे लगा कि संगीतकार नायब-राजा के राजा हीं राजा हसन हैं। लेकिन जब एक ही ऐल्बम पर एक बार राजा और एक बार राजा हसन के नाम से दो अलग अलग गीत आए हैं तो निश्चित ही ये अलग अलग शख्सियत होंगे। आइए यह गीत सुना जाए।

गीत - माधोलाल कीप वाकिंग


सुजॊय - अब और ज़्यादा कुछ कहने को नहीं बचा है मेरे लिए, मुझे जो गानें अच्छे लगे हैं वो हैं "नैना लागे (भूपेन्द्र), "फ़लसफ़ा ये ज़िंदगी का" तथा "ख़ुदा के वास्ते"। और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग्ग।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, गानों में जिस रूह की जरूरत होती है, मेरे हिसाब से गीतकार, संगीतकार और गायक-गायिकाओं ने अपनी तरफ़ से उसमें थोड़ी भी कमी नहीं होने दी है। आपको तो पता हीं होगा कि किसी भी गीत में मेरा सबसे ज्यादा ध्यान उसके बोलों पर होता है, और जिस गीत के बोल मुझे प्रभावित कर जाते हैं, वह गीत खुद-ब-खुद मेरा पसंदीदा हो जाता है। अमूमन हर समीक्षा में मैं शब्दों के पैमानों पर हीं गीत या एलबम को तौलता हूँ.. इसलिए तो बोल न पसंद आने पर या फिर यह महसूस होने पर कि गीतकार ने मेहनत नहीं की है, बल्कि महज़ "कन्नी काटा" है या "खानापूर्ति" की है, मैं आपके दिए हुए रेटिंग से कुछ अंक हटा भी देता हूँ। मुझे खुशी है कि इस एलबम में वैसा कुछ करने की नौबत नहीं आएगी.. इसलिए आपके दिए हुए रेटिंगे को बरकरार रखते हुए मैं एक बार फिर से सजीव जी का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिनकी बदौलत हम इस नायाब एलबम को सुन सकें। तो चलिए इन्हीं सब बातों और गानों के साथ हम आज की समीक्षा समाप्त करते हैं। अगली बार कौन-सी एलबम होगी , यह तो मुझे भी नहीं पता... लेकिन इतना यकीन दिलाता हूँ कि आप सबों के लिए हम कुछ अच्छा हीं चुन कर लाएँगे... तब तक लिए इज़ाज़त दीजिए..

आवाज़ रेटिंग्स: माधोलाल कीप वाकिंग: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १०३- भूपेन्द्र ने एक फ़िल्म में एक युगल गीत गाया था जिसके बोल थे "मुझे प्यार से आवाज़ देना मेरा नाम लेकर"। आपको बताना है फ़िल्म का नाम और किस गायिका के साथ यह युगल गीत उन्होंने गाया था।

TST ट्रिविया # १०४- "दरसल मेरी पैदाइश नागपुर की है, मेरे पिताजी रत्नागिरि से ताल्लुख़ रखते हैं, जो कोंकण कोस्ट में हैं, जहाँ के अल्फ़ोन्सो आम बहुत मशहूर है। और हमारी माताजी फ़र्रुख़ाबाद से ताल्लुख़ रखती हैं। मम्मी का नाम है रबी रूपलता और पिताजी का नाम है इब्राहिम इक़बाल।" तो दोस्तों, बताइए कि ये कौन से फ़नकार अपने माता पिता के बारे में बता रहे हैं?

TST ट्रिविया # १०५- क़व्वाली की बात चली है आज और आवाज़ अस्लम साबरी की है, तो बताइए कि वह कौन सी क़व्वाली थी जिसे लता मंगेशकर ने फ़रीद साबरी और सईद साबरी के साथ मिल कर गाया था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "फ़लक तक चल साथ मेरे" (टशन)
२. 'इश्क़ क़यामत'।
३. "क्यों आगे पीछे डोलते हो भँवरों की तरह" (गोलमाल)

Friday, October 9, 2009

मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे...कबीर से बुनकरी सिखना चाहते हैं गुलज़ार और भुपि

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५२

की महफ़िल कुछ खास है। सबब तो समझ हीं गए होंगे। नहीं समझे?... अरे भाई, भुपि(भुपिन्दर सिंह) और गुलज़ार साहब की जोड़ी पहली बार आज महफ़िल में नज़र आने जा रही है। अब जहाँ गुलज़ार का नाम हो, वहाँ सारे बने बनाए ढर्रे नेस्तनाबूत हो जाते हैं। और इसी कारण से हम भी आज अपने ढर्रे से बाहर आकर महफ़िल-ए-गज़ल को गुलज़ार साहब की कविताओं के सुपूर्द करने जा रहे हैं। उम्मीद करते हैं कि हमारा यह बदलाव आपको अटपटा नहीं लगेगा। तो शुरू करते हैं कविताओं का दौर... उससे पहले एक विशेष सूचना: हमें सीमा जी की पसंद की गज़लों की फ़ेहरिश्त मिल गई है और हम इस सोमवार को उन्हीं की पसंद की एक गज़ल सुनवाने जा रहे हैं। शामिख साहब ने २-३ दिनों की मोहलत माँगी है, हमें कोई ऐतराज नहीं है...लेकिन जितना जल्द आप यह काम करेंगे, हमें उतनी हीं ज्यादा सुहूलियत हासिल होगी। शरद जी, कृपया फूर्त्ति दिखाएँ, आप तो पहले भी इस प्रक्रिया से गुजर चुकें हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय के पिछले अंक(जून २००८) में गुलज़ार साहब की कलम ने पांच शहरों की तस्वीरें उकेरी हैं, कविताओं के माध्यम से शहरों के चरित्र को पेश किया है..

प्रस्तुत हैं शहरनामे के कुछ अंश..
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बम्बई

बड़ी लम्‍बी-सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पाँव जमीं पर हैं
समन्‍दर छोड़ती है, न समन्‍दर में उतरती है
ये नगरी बम्‍बई की...
जुराबें लम्‍बे-लम्‍बे साह‍िलों की, पिंडलियों तक खींच रक्‍खी है
समन्‍दर खेलता रहता है पैरों से लिपट कर
हमेशा छींकता है, शाम होती है तो 'टाईड' में।

यहीं देखा है साहिल पर
समन्‍दर ओक में भर के
'जोशान्‍दे' की तरह हर रोज पी जाता है सूरज को
बड़ा तन्‍दरुस्‍त रहता है
कभी दुबला नहीं होता!
कभी लगता है ये कोई तिलिस्‍मी-सा जजीरा है
जजीरा बम्‍बई का...

किसी गिरगिट की चमड़ी से बना है आसमाँ इसका
जो वादों की तरह रंगत बदलता है
'कसीनो' में रखे रोले (Roulette) की सूरत चलता रहता है!
कभी इस शहर की गर्दिश नहीं रुकती
बसे 'बियेरिंग' लगे हैं
किसी 'एक्‍सेल' पे रक्‍खा है।

तिलिस्‍मी शहर के मंजर अजब है
अकेले रात को निकलो, सिया साटिन की सड़कों पर
तिलिस्‍मी चेहरे ऊपर जगमगाते 'होर्डिंग' पर झूलते हैं
सितारे झाँकते हैं, नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूँढने पड़ते हैं
पातालों में गुम होकर।

यहाँ जीना भी जादू है...
यहाँ पर ख्‍वाब भी टाँगों पे चलते है
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी में रक्‍खे मूंग के दाने
चटखते है तो जीभें उगने लगती हैं
यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अक्‍सर...कुछ नहीं बचता
सभी चाटे हुए पत्‍तल हवा में उड़ते रहते हैं
समन्‍दर रात को जब आँख बन्‍द करता है, ये नगरी
पहन कर सारे जेवर आसमाँ पर अक्‍स अपना देखा करती है

कभी सिन्‍दबाद भी आया तो होगा इस जजीरे पर
ये आधी पानी और आधी जमीं पर जिन्‍दा मछली
देखकर हैराँ हुआ होगा!!

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मद्रास (चेन्नई)

शहर ये बुजुर्ग लगता है
फ़ैलने लगा है अब
जैसे बूढ़े लोगों का पेट बढ़ने लगता है

ज़बां के ज़ायके वही
लिबास के सलीके भी....
.....

ख़ुशकी बढ़ गयी है जिस्म पर, ’कावेरी’ सूखी रहती है

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कोलकता

कभी देखा है बिल्डिंग में,
किसी सीढ़ी के नीचे
जहां मीटर लगे रहते हैं बिजली के
पुराने जंग आलूदा...
खुले ढक्कन के नीचे पान खाये मैले दांतों की तरह
कुछ फ़्यूज़ रक्खे हैं
...
बेहया बदमाश लड़के की तरह वो
खिलखिला के हंसता रहता है!

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दिल्ली - पुरानी दिल्ली की दोपहर

सन्‍नाटों में लिपटी वो दोपहर कहां अब
धूप में आधी रात का सन्‍नाटा रहता था।

लू से झुलसी दिल्‍ली की दोपहर में अक्‍सर...
‘चारपाई’ बुनने वाला जब,
घंटा घर वाले नुक्‍कड़ से, कान पे रख के हाथ,
इस हांक लगाता था- ‘चार... पई... बनवा लो...!’
ख़सख़स की टट्यों में सोये लोग अंदाज़ा कर लेते थे... डेढ़ बजा है!
दो बजते-बजते जामुन वाला गुज़रेगा
‘जामुन... ठंडे... काले... जामुन...!’
टोकरी में बड़ के पत्तों पर पानी छिड़क के रखता था
बंद कमरों में...
बच्‍चे कानी आंख से लेटे लेटे मां को देखते थे,
वो करवट लेकर सो जाती थी

तीन बजे तक लू का सन्‍नाटा रहता था
चार बजे तक ‘लंगरी सोटा’ पीसने लगता था ठंडाई
चार बजे के पास पास ही ‘हापड़ के पापड़!’ आते थे
‘लो... हापड़... के... पापड़...’
लू की कन्‍नी टूटने पर छिड़काव होता था
आंगन और दुकानों पर!

बर्फ़ की सिल पर सजने लगती थीं गंडेरियां
केवड़ा छिड़का जाता था
और छतों पर बिस्‍तर लग जाते थे जब
ठंडे ठंडे आसमान पर...
तारे छटकने लगते थे!

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न्यूयार्क

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने

अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं, गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये

तुम्हारे शहर में गरचे..
बहुत सब्ज़ा है, कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं, फूलों से भरे हैं

कोई भंवरा मगर देखा नहीं भंवराये उन पर

मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक, वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं

तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग, इमारत खूबसूरत है, बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं

मगर ए दोस्त जाने क्यों..
सभी तन्हा से लगते हैं
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है..

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तो कैसी लगी आपको ये कविताएँ? अच्छी हीं लगी होंगी, इसमें किसी शक की गुंजाईश नहीं है। तो इन कविताओं के बाद अगर हम सीधे आज की नज़्म की ओर रूख कर लें तो महफ़िल-ए-गज़ल का उद्देश्य सफ़ल नहीं होगा। हमारी यही कोशिश रहती है कि हम फ़नकारों की ज़िंदगी के कुछ अनछुए हिस्से आपके सम्मुख प्रस्तुत करते रहें। तो उसी लहज़े में पेश हैं गुलज़ार साहब के बारे में खुद उनके और उनके साथ काम कर चुके या कर रहे फ़नकारों के ख्याल (सौजन्य:बी०बी०सी०) जब मैंने पहला गाना लिखा, उस वक़्त मैं बहुत इच्छुक नहीं था. बस एक के बाद दूसरा कदम लिया. फिर मैं शामिल हो गया बिमल रॉय के साथ असिस्टेंट के तौर पर. उन्हीं के यहां 'प्रेम पत्र' बन रही थी. उसमें मैंने सावन की रातों में ऐसा भी होता है’ लिखा. फिर 'काबुलीवाला' बन रही थी. उसमें मैंने लिखा - गंगा आए कहां से गंगा जाए कहां से – बस यही करते करते में फ़िल्म इंडस्ट्री में शामिल हो गया। शायरी का शौक़ था शेर कहने का शौक था. शायरी अच्छी लगती है. जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं – इट इज़ फर्स्ट लव. शायरी मेरा पहला इश्क़ है.

"क्या नुस्ख़ा है किसी गानें को हिट करने का"- इस प्रश्न के जवाब में गुलज़ार साहब ने कहा "मुझे यूं लगता है और बड़ी निजी-सी राय है ये मेरी. इसे अगर जांच-भाल के भी देखें...कि जो किसी गाने के पॉपुलर होने का सबसे अहम अंग है - वो मेरे ख़याल में धुन है. उसके बाद फिर दूसरी चीज़ें आतीं हैं – आवाज़ भी शामिल हो जाती है औऱ अल्फ़ाज़ भी शामिल हो जाते हैं. लेकिन मूलत धुन बहुत अहम है."

गुलज़ार निर्देशित 'अंगूर' की अभिनेत्री मौसमी चटर्जी बताती हैं कि "गुलज़ार एक बेहतरीन गीतकार हैं। मुझे उनका 'ख़ामोशी' के लिए लिखा गाना "प्यार को प्यार ही रहने दो" बेहद पसंद है। गुलज़ार मेरी सास को उर्दू सिखाते थे और उनसे बांग्ला सीखते थे।

गुलज़ार के साथ 'बंटी और बबली', 'झूम बराबर झूम' फ़िल्में करने वाले शंकर महादेवन ने बीबीसी को बताया- कजरारे कंपोज़ करने के बाद हम गुलज़ार साहब से मिले. उन्होंने गाना सुनने के बाद कहा कि उन्हें इसमें ख़तरा दिख रहा है. मैंने पूछा – क्या? उन्होंने कहा कि इस गाने के बहुत बड़ा हिट होने का ख़तरा है. जो उन्होंने कहा वो एकदम सही हुआ.’ महादेवन कहते हैं कि गुलज़ार से मिलना एक सुखद अनुभव है और उनके साथ काम करना का तजुर्बा ज़िंदगी भर उनके साथ रहेगा
गुलज़ार साहब के बारे में जितना भी लिखा जाए कम है। कभी मौका मिलेगा(और मिलेगा हीं) तो हम उनके बारे में और भी बातें करेंगे। अभी बस इतना हीं...

अब वक्त है आज की नज़्म का लुत्फ़ उठाने का। यूँ तो यह नज़्म बड़ी हीं सीधी मालूम पड़ती है, जिसमें गुलज़ार साहब एक जुलाहे से वह तरकीब सीखना चाहते हैं, जिससे वो भी टूटे हुए रिश्तों को बुन सकें। लेकिन अगर आप गौर करेंगे तो महसूस होगा कि गुलज़ार किसी साधारण-से जुलाहे से बात नहीं कर रहे, बल्कि "कबीर" से मुखातिब हैं। वही कबीर जिन्होंने परमात्मा से अपना रिश्ता जोड़ लिया है। है ना बड़ी अजीब-सी बात? आप खुद देखिए:

मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे!

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो

तेरे उस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुनकर की
देख नहीं सकता है कोई

मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं
मेरे यार जुलाहे




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-___ लेकर
और हम टूट गये काँच के प्यालों की तरह


आपके विकल्प हैं -
a) सनम, b) इलाही, c) मसीहा, d) खुदा

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "गुनाह" और शेर कुछ यूं था -

इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के...

"फ़ैज़" साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचानकर बाजी मारी सीमा जी ने। उसके बाद आपने कुछ शेर भी पेश किए:

इसे गुनाह कहें या कहें सवाब का काम
नदी को सौंप दिया प्यास ने सराब का काम (शहरयार)

अब ना माँगेंगे ज़िन्दगी या रब
ये गुनाह हम ने एक बार किया (गुलज़ार)

दिल में किसी के राह किये जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किये जा रहा हूँ मैं (जिगर मुरादाबादी)

सीमा जी के बाद महफ़िल को खुशगवार किया शरद जी और शन्नो जी। ये रहे आप दोनों के स्वरचित शेर(क्रम से):

तेरी जिस पर निगाह होती है
उसे जीने की चाह होती है
दिल दुखा कर किसी को हासिल हो
कामयाबी गुनाह होती है।

निगाह भर के उन्हें देखने का गुनाह कर बैठे
सरे आम ज़माने ने फिर मचाई फजीहत ऐसी।

वैसे आप दोनों ने एक काम कमाल का किया है, अपने-अपने शेर में "निगाह" का इस्तेमाल करके आपने ५०-५० का गेम खेल लिया...मतलब कि या निगाह हो या गुनाह जवाब तो सही रहेगा :)

इनके बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख साहब। महफ़िल की शम्मा बुझने तक आपने महफ़िल को आबाद रखा। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,
मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है (मुनव्वर राणा)

चलना अगर गुनाह है अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिल सिला चले (अनाम)

उम्र जिन की गुनाह में गुज़री
उन के दामन से दाग़ ग़ाइब है (राजेन्द्र रहबर)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, June 18, 2009

दिल एक फूल है इसे खिलने भी दीजिए......पेश है एक जोड़ी कमाल की

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२२

ह कोई फ़िल्मी किस्सा नहीं है, ना हीं किसी लैला-मजनू, हीर-रांझा की दास्तां, लेकिन जो भी है, इन-सा होकर भी इनसे अलहदा है। सुदूर पश्चिम का "मुंडा" और हजारों कोस दूर पूरब की एक "कुड़ी" , वैसे "कुड़ी" तो नहीं कहना चाहिए क्योंकि यह एक पंजाबी शब्द है और लड़की ठहरी बंगाली, लेकिन क्या करूँ मेरा "बांग्ला" का अल्प-ज्ञान मुझे सही शब्द मुहैया नहीं करा रहा, इसलिए सोचा कि जिस तरह उस फ़नकारा ने शादी के बाद अपना "बंगाली उपनाम" त्याग कर "पंजाबी उपनाम" स्वीकार कर लिया, उसी तरह उसने "कुड़ी" होना भी स्वीकार कर लिया होगा, इसलिए "कुड़ी" कहने में कोई बुराई नहीं है।हाँ तो बात की शुरूआत "पंजाब" से करते हैं। "गेहूँ और धान" की लहलहाती फ़सलों के बीच ६ फ़रवरी १९४० में अमृतसर में जन्मे इस फ़नकार की शुरूआती तालीम अपने पिता प्रोफ़ेसर नाथा सिंह से हुई थी, जो खुद एक प्रशिक्षित गायक और संगीतकार थे। वहीं हमारी फ़नकारा ने "बांग्लादेश" की एक संगीतमय परिवार में जन्म लिया था, जन्म से थी तो वो "मुखर्जी" लेकिन आगे चलकर इन्हें "सिंह" होना पड़ा। इन्होंने पाँच साल की कच्ची उम्र से हीं संगीत की साधना शुरू कर दी थी। कहते हैं कि संगीत की सच्ची साधना तब हीं हो सकती है, जब आप अपने दिन के पूरे २४ घंटे बस उसी पर न्योछावर कर दें। लेकिन कुछ लोगों में ऐसी लगन होती है कि वे "संगीत" के साथ-साथ और भी कुछ "साध" लेते है। हमारी फ़नकारा की कहानी भी कुछ ऐसी हैं है। इन्होंने मुंबई के एस०एन०डी०टी० महाविद्यालय से "एम०फिल०" की डिग्री हासिल की है, जो अपने आप में एक मुकाम है।

१९७७ में रीलिज हुई "गुलज़ार" की फ़िल्म "किनारा" में एक गाना है "नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ हीं पहचान है, ग़र याद रहे"। यूँ तो इस गाने के बोल हीं ऐसे हैं कि हर फ़नकार की ज़िंदगी और प्रतिभा का सही परिचय मिल जाता है, लेकिन हमारे आज के फ़नकार के लिए इस गाने का कुछ अलग हीं महत्व है। स्वर-कोकिला "लता मंगेशकर" के साथ पंचम दा की धुनों पर इस फ़नकार की मखमली आवाज़ जब गूँजती है तो संगीत को एक अलग हीं नशा और बोलों को एक अलग हीं अर्थ मिल जाता है। अपनी गायकी के प्रारंभिक दिनों में इन्होंने "आल इंडिया रेडिया, दिल्ली" में कई सारे कार्यक्रम दिए....इसके साथ-साथ ये "दिल्ली दूरदर्शन" से भी जुड़े थे। १९६४ में इनकी किस्मत तब चमकी , जब संगीतकार "मदन मोहन" ने इन्हें रेडियो पर सुना और तुरंत हीं मुंबई (तब कि बंबई) आने की फ़रमाईश कर दी। इनकी आवाज़ से "मदन मोहन" साहब इतने प्रभावित हुए कि इन्हें "चेतन आनंद" की आने वाली फ़िल्म "हक़ीकत" में "मोहम्मद रफ़ी" साहब के साथ "होके मज़बूर मुझे उसने बुलाया होगा" गाने का न्यौता मिल गया। किसी भी फ़नकार के लिए इससे बड़ी शुरूआत क्या हो सकती है कि पहले हैं गाने में आप "गायकी के ध्रुवतारा" के साथ माइक्रोफ़ोन शेयर करें।इतना बड़ा प्लेटफ़ार्म मिलने के बावजूद बाकी के फ़नकार्रों की तरह इनकी किस्मत में भी संघर्ष करना लिखा था। "हक़ीकत" के बाद कई सारी छोटी-मोटी फ़िल्मों मे इनके गाने आए लेकिन किसी भी गाने ने सुल्युलायड पर अपना असर नहीं छोड़ा। इसलिए इन्होंने सोचा कि कुछ नया हीं क्यों न किया जाए। इन्होंने पंचम दा का आर्केस्ट्रा ज्वाईन कर लिया और उनके कई सारे गानों में गिटार पर धुन छेड़ी। "दम मारो दम", "चुरा लिया है", "एक हीं ख्वाब"- न जाने ऐसे कितने हीं गिटार-बेस्ड गाने थे, जो इनकी ऊँगलियों के कमाल से शिखर तक पहुँच गए। अब जब इन्होंने वाद्य-यंत्रों के सहारे संगीत की दुनिया में कदम रख हीं लिया था तो फिर "संगीतकार" बनने में क्या देर थी। "अर्ज़ किया है", "एक हसीं शाम" जैसी सुमधुर गीतों को संगीतबद्ध करके इन्होंने इस क्षेत्र में भी अपने कदम जमा लिए।

"गुलज़ार" की हीं फ़िल्म "परिचय" के गानों "बीती ना बिताए रैना" और "मितवा न बोले" से इन्होंने "गायकी" की सुरीली राहों पर रि-इंट्री की। फिर तो पुरस्कारों और सराहनाओं का दौरा शुरू हो गया। "गुलज़ार" के तो ये इतने प्रिय हो गए कि लगभर हर फ़िल्म में इनका गाना होना लाज़िमी था। "दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात दिन", "एक अकेला इस शहर मे" ,"हुज़ूर इस कदर भी न इतराके चलिए" ,"एक हीं ख्वाब कई बार देखा है मैने", "बादलों से काट-काट के", "आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं" ,"मचल कर जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू", "फूले दाना दाना फूले बालियाँ" -जैसे गीत न सिर्फ़ "गुलज़ार" को अमर करते हैं,बल्कि इन गीतों को गाने वाले इस शख्स की भी मकबूलियत और "अमरत्व" में बढोतरी करते है। जब इनकी इतनी बात हो हीं गई तो क्यों ना इनके नाम पर पड़े पर्दे को हटा दिया जाए। हम गज़ल-गायकी के उस सितारे की बात कर रहे हैं,जिन्हें कुछ लोग "भुपिन्दर" कहते हैं तो कुछ "भुपि"। "गुलज़ार" के "चाँद परोसा है" को संगीतबद्ध करने वाले "भूपिन्दर सिंह" साहब की गायकी को संबल देने वाली आज की फ़नकारा का जिक्र भी तो लाजिमी है। भला कौन होगा जिसने "भूपिन्दर-मिताली" की जोड़ी का नाम न सुना हो। न जाने कितनी हीं गज़लों और गीतों की फ़ेहरिश्त इनके नाम से आबाद है। इनकी गूँजती-सी आवाज़ "साहिल","शबनम","शरमाते-शरमाते", "आप के नाम", "अर्ज़ किया है" ,"एक आरज़ू", "कुछ इंतज़ार है", "तू साथ चल", "नशेमन", "गुलमोहर", "रात गुलाबी" और न जाने ऐसी कितनी हीं एलबमों में सुनी जा सकती हैं। चूँकि गुलज़ार इनके प्रिय रहे हैं इसलिए "वो जो शायर था" और "चाँद परोसा है" में कुछ अलग-सी हीं बात है। वैसे भी "गुलज़ार" साहब का नाम आते हीं मुझे न जाने क्या हो जाता है। य़ूँ तो आज की गज़ल किसी और एलबम से है,लेकिन मैं "चाँद परोसा है" से कुछ पंक्तियाँ आपसे शेयर करना चाहता हूँ। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

कोसा-कोसा लगता है,
तेरा भरोसा लगता है।
रात ने अपनी थाली में,
चाँद परोसा लगता है।


कभी यह गज़ल भी आपको सुनाएँगे, आज एक अलग हीं गज़ल की बारी है। "द ग्रेट गज़ल्स: भुपिन्दर एंड मिताली" एलबम से ली गई इस गज़ल में प्यार-मोहब्बत की बड़ी हीं दिलचस्प बातें कहीं गई हैं,कहीं एक गुजारिश है तो कहीं फिर एक अपनापन। आप खुद देखिए और गज़ल में छुपी भावनाओं का लुत्फ़ उठाईये:

अपना कोई मिले तो गले से लगाईये,
क्या-क्या कहेंगे लोग उसे भूल जाईये।

पहले नज़र मिलाईये फिर दिल मिलाईये,
मिल जाए दिल से दिल तो गले से लगाईये।

दिल एक फूल है इसे खिलने भी दीजिये,
आए अगर हँसी तो ज़रा मुस्कुराईये।

सावन की रूत नहीं है तो आ जाएगी अभी,
बाहों में आके आप ज़रा झूल जाईये।

दमभर में पास दिल के चले आएँगे मगर,
खुद को भी ऐतबार के काबिल बनाईये।

हँसकर मिले कोई तो मिलो उससे टूटकर,
ऐसी घड़ी में दिल न किसी का दुखाईये।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

एक हमें ___ कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं...

आपके विकल्प हैं -
a) आशिक, b) परवाना, c) आवारा, d) बंजारा

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली पहेली का सही शब्द था -आँख. और शेर कुछ यूँ था -

कहकहा आँख का बरताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आये कैसे...

शरद जी ने के बार फिर सही जवाब दिया सबसे पहले और जो शेर अर्ज किया वो कुछ यूं था -

कभी आँखों से अश्कों का खज़ाना कम नहीं होता
तभी तो हर खुशी, हर ग़म में हम उसको लुटाते हैं

रजिया राज जी महफ़िल में आई पर सही जवाब नहीं दे पायीं इस बार...कोई बात नहीं...पर सुमित जी इस बार नहीं चूके, एक शेर भी याद दिला गए -

अगर आँखे मेरी पुरनम नही है
तो तुम ये ना समझना गम नही है

आशीष जी ने न सिर्फ सही जवाब दिया बल्कि उपरोक्त शेर के ग़ज़लकार का नाम भी बता दिया. जी हाँ वसीम बरेलवी, और शुक्रिया जनाब उनके इन दो शेरों को हम सब के साथ बाँटने का, आप भी गौर फरमायें -

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

वाह जनाब समां बांध दिया आपने, पूजा जी आपने सही कहा, सलमा जी ने उन दिनों जैसे सब पर जादू सा कर दिया था. रचना जी भूल चूक मुआफ...आपका जवाब एकदम सही है और आपका शेर भी बहुत बढ़िया -

आँखों से बह के ख्वाब तेरी हथेली सजा गए
लिखा है गैर का नाम वहां चुपके से बता गए

तपन जी, निर्मला कपिला जी, और शामिख फ़राज़ जी आप सब का भी महफिल में आना अच्छा लगा, मनु जी नियमित रहते हैं पर इस बार नहीं दिखे, आचार्य सलिल जी भी काफी दिनों से नदारद हैं, नीलम जी और शन्नो जी की खट्टी मीठी नोंक झोंक भी बहुत दिनों से नहीं हुई, कहाँ हैं आप सब ? महफ़िल का हाजरी रजिस्टर आप सब की खोज में निकल चुका है. स्वप्न मंजूषा जी देखिये इस बार आप छूटते छूटते बची, आपने भी इस बेहद मशहूर शेर की याद दिला कर "ऑंखें" नम से कर दी-

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा...

जी हाँ दोस्तों वक़्त गुजरता है गुजर जायेगा, बस ऐसे ही कुछ पल याद रह जायेंगें, जो हमने और आपने प्यार से बाँटे हैं. ये प्यार यूहीं बना रहे इसी उम्मीद के साथ अगली महफिल तक के लिए इजाज़त.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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