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Sunday, June 21, 2020

राग मालगुंजी : SWARGOSHTHI – 467 : RAG MALGUNJI








स्वरगोष्ठी – 467 में आज

काफी थाट के राग – 11 : राग मालगुंजी

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की वायलिन पर राग मालगुंजी और लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत सुनिए






उस्ताद अलाउद्दीन खान 
लता मंगेशकर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मालगुंजी को चुना है। श्रृंखला की आज की इस कड़ी में राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने राग मालगुंजी चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आपको आज हम सबसे पहले राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझाने के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन पर बजाया राग मालगुंजी सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



राग मालगुंजी के मुख्य स्वर हैं; रे, नि॒, सा, रे, ग, म। इनसे इस राग का प्रारम्भिक दर्शन हो जाता है। इस राग को राग रागेश्वरी और राग बागेश्री का मिश्रण माना जाता है। आरोह में कहीं-कहीं रागेश्वरी तो अवरोह में कहीं-कहीं बागेश्री का आभास होता है। संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार इस राग की प्रकृति न गम्भीर है और न तरल है। वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व, उलझन की स्थितियों में इस राग के स्वर संवेदनात्मक रूप में प्रेरणा तथा मनोबल को सुदृढ़ करने के साथ-साथ उन कष्टदायक स्थितियों का समाधान करने में सहयोगी सिद्ध हो सकते हैं। उलझनों तथा मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थितियों के साथ-साथ इनके प्रभावानुसार उत्पन्न मनोभौतिक समस्याओं; उच्चरक्तचाप का बढ़ना, भूंख न लगना, अनिद्रा आदि का उपचार इस राग से सम्भव हो सकता है। राग मालगुंजी के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपके लिए मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। यू-ट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत इस दुर्लभ वीडियो का अब आप रसास्वादन करें।

राग मालगुंजी : वायलिन वादन : उस्ताद अलाउद्दीन खाँ


राग मालगुंजी का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध निषाद का प्रयोग अति अल्प किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। आरोह में पंचम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का अनुकूल समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। सामान्यतः आरोह में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद का अति अल्प प्रयोग केवल तार सप्तक के साथ आरोह में किया जाता है। मन्द्र सप्तक के आरोहात्मक और अवरोहात्मक दोनों प्रकार के स्वरों में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान केवल कोमल निषाद प्रयोग करते हैं, शुद्ध निषाद लगाते ही नहीं। पंचम स्वर आरोह में वर्जित है और अवरोह में अल्प है। धैवत से मध्यम को आते समय पंचम का कण लिया जाता है। शुद्ध निषाद का अल्पत्व, कोमल निषाद की अधिकता, मध्यम स्वर का बहुत्व और पंचम स्वर का अल्पत्व तथा लगभग राग बागेश्री के समान चलन होने के कारण इसे बागेश्री अंग का राग कहा जाता है। राग मालगुंजी का वादी-संवादी क्रमशः मध्यम और षडज होने के कारण इसे रात्रि 12 बजे के बाद गाना-बजाना चाहिए, किन्तु इसे रात्रि 12 बजे से पूर्व गाया-बजाया जाता है। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं; राग मालगुंजी पर आधारित एक फिल्मी गीत। इसे हमने वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से लिया है। लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत उस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग मालगुंजी के साथ राग खमाज का स्पर्श भी हुआ है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग मालगुंजी : “घर आ जा घिर आई बदरा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – छोटे नवाब




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 467वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगलगीत में किन गायको के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 27 जून, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 469 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 465 वें अंक में हमने आपको 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पटदीप, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “ स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की ग्यारहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मालगुंजी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन पर बजाया राग मालगुंजी सुना। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में हमने प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट   http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मालगुंजी : SWARGOSHTHI – 467 : RAG MALGUNJI : 21 जून, 2018



Sunday, March 22, 2020

राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 461 : RAG BHIMPALASI






स्वरगोष्ठी – 461 में आज


काफी थाट के राग – 5 : राग भीमपलासी


विदुषी गंगूबाई हंगल से भीमपलासी की एक रचना और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी गंगूबाई हंगल
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग भीमपलासी पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी गंगूबाई हंगल से राग भीमपलासी में निबद्ध एक रचना का रसास्वादन करा रहे हैं और फिर इसी राग पर आधारित 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म “नौबहार” से भक्ति और विरह भाव को उकेरता एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इस फिल्म के संगीतकार रोशन हैं।


राग भीमपलासी में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर; सा, ग(कोमल), म, प, नि(कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर; सां, नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर क्रमशः मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। इस राग में चूँकि वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है, इस दृष्टि से इसे उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए और दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 से दिन के 12 बजे के बीच गाना या बजाना चाहिए परन्तु व्यवहार में ऐसा होता नहीं। अपवाद रूप में यह पूर्वांग प्रधान राग मान लिया जाता है और दिन के पूर्व अंग में ही गाया या बजाया जाता है। राग भीमपलासी के गायन और वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। इससे पूर्व उन्होने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ सवाई गन्धर्व से संगीत में दक्षता प्राप्त की और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। उन्हें भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मविभूषण’ से अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2002 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हो गया था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वर में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग दिया है।

राग भीमपलासी : “गरवा हरवा डारो री...” : तीनताल : विदुषी गंगूबाई हंगल


राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। आज के अंक के लिए हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म “नौबहार” का एक गीत चुना है। फिल्म का कथानक एक अमीर, किन्तु नेत्रहीन युवक (अशोक कुमार) और एक गरीब मालिन (नलिनी जयवन्त) की प्रेमकथा पर केन्द्रित है। फिल्म का जो गीत हमने चुना है, वह राग भीमपलासी पर आधारित है। दरअसल यह गीत मीरा का एक भक्तिपद है, जिसके बोल हैं; “ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...”। फिल्म के प्रसंग के अनुसार गीतकार शैलेन्द्र ने इस भक्तिपद के अन्तरों में परिवर्तन किये हैं। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है। लता मंगेशकर के अलावा फिल्म में तलत महमूद और राजकुमारी की आवाज़ में कई मनभावन गीत हैं। वर्ष 1967 में इस गीत; “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” को अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में चुना था। यह एक सदाबहार गीत सिद्ध हुआ। इस गीत के लिए राग भीमपलासी के स्वर इतने सटीक सिद्ध हुए कि वर्षों बाद जब गुलज़ार ने 1979 में अपनी फिल्म “मीरा” के संगीत निर्देशन का दायित्व पण्डित रविशंकर को दिया था और इसी मीरापद का चुनाव अपनी फिल्म के लिए भी किया था। पण्डित रविशंकर ने इस पद को राग तोड़ी में बाँधा था और वाणी जयराम से गवाया था। गीत के लिए स्वर चुनते समय पण्डित जी की ही टिप्पणी थी; ‘रोशन ने इस पद को राग भीमपलासी का ऐसा आवरण दे दिया है कि वह धुन दिमाग से निकलती ही नहीं’। लता मंगेशकर के स्वर में फिल्म “नौबहार” के इस गीत को सुनिए, साथ ही रोशन के अविस्मरणीय संगीत की सराहना कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म - नौबहार



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 461वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 28 मार्च, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 463 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 459वें अंक में हमने आपको 1971 में प्रदर्शित फिल्म “पराया धन” से एक राग आधारित होली गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – शिवरंजनी (राग काफी का भी स्पर्श) दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे और आशा भोसले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से किसी भी प्रतिभागी के तीनों उत्तर सही नहीं मिले। डॉ. किरीट छाया के तीन में से केवल एक उत्तर ही सही है, अतः उन्हें केवल एक अंक ही मिलते हैं। शेष प्रतिभागियों को दो उत्तर सही होने पर प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग भीमपलासी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में पहले हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल से राग भीमपलासी में निबद्ध एक रचना का रसास्वादन कराया और फिर इसी राग पर आधारित 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म “नौबहार” से भक्ति और विरह भाव को उकेरता एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया। भक्त कवयित्री मीराबाई के इस पद का आंशिक परिवर्तन सत्येन्द्र अथईया ने किया है। फिल्म के संगीतकार रोशन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 461 : RAG BHIMPALASI : 22 मार्च, 2020 


Sunday, January 19, 2020

राग व थाट मारवा : SWARGOSHTHI 452 : RAG & THAT MARVA






स्वरगोष्ठी - 452 में आज


मारवा थाट के राग - 1 : राग मारवा


उस्ताद राशिद खाँ से मारवा का खयाल और लता मंगेशकर से फिल्म “साज और आवाज़” का गीत सुनिए




उस्ताद राशिद खाँ
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “मारवा थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार बारह समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट मारवा है। इस श्रृंखला में हम मारवा थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए पहले इस श्रृंखला में हम मारवा थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में मारवा थाट के जनक अथवा आश्रय राग मारवा पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ द्वारा इस राग में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुनवाएँगे। 1966 में प्रदर्शित फिल्म – साज और आवाज़ से खुमार बाराबंकवी का लिखा, लता मंगेशकर औरे साथियों का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया एक गीत; “पायलिया बाँवरी बाजे...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।


राग मारवा इसी नाम से प्रचलित मारवा थाट का आश्रय राग है। मारवा थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, ध, नि । अर्थात मारवा थाट में ऋषभ कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग मारवा, ‘मारवा’ थाट का आश्रय राग है, जिसमे ऋषभ कोमल और मध्यम तीव्र होता है, किन्तु पंचम स्वर वर्जित होता है। यह षाडव- षाडव जाति का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में छह स्वरों के प्रयोग होते हैं। राग मारवा के आरोह स्वर हैं; सा, रे ग, म॑(तीव्र), ध, नि, ध, सां तथा अवरोह के स्वर हैं, सां, नि, ध, म॑(तीव्र), ग, रे(कोमल), सा होता है। इसका वादी स्वर ऋषभ तथा संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग का गायन-वादन दिन के चौथे प्रहर में उपयुक्त माना जाता है। अब हम आपको राग मारवा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ। राग मारवा उदासी भाव का राग होता है। द्रुत खयाल की बन्दिश के बोल हैं- ‘गुरु बिन ज्ञान न पावे...’

राग मारवा : “गुरु बिन ज्ञान न पावे...” : उस्ताद राशिद खाँ



भारतीय संगीत में रागों के गायन-वादन का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने अनेक सिद्धान्तों प्रतिपादन किया है। आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के राग मारवा के बारे में चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर के अन्त में ही सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों का समय आता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार मध्यम स्वर के प्रकार से सन्धिप्रकाश रागों का निर्धारण भी किया जा सकता है। सन्धिप्रकाश काल उस समय को कहा जाता है, जब अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है। यह स्थिति चौबीस घण्टे की अवधि में दो बार उत्पन्न होती है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश और सायंकालीन सन्धिप्रकाश; जिसे गोधूलि बेला भी कहते हैं। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम स्वर की तथा सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में रागों में तीव्र मध्यम की प्रधानता होती है। भैरव, कलिंगड़ा, जोगिया आदि प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम और मारवा, श्री, पूरिया आदि सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। दिन के चौथे प्रहर के एक ऐसे ही राग मारवा का उदाहरण आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। अन्य रागों की तुलना में राग मारवा शुष्क और चंचल प्रकृति का राग है। इस राग में विलम्बित खयाल और मसीतखानी गतें कम प्रचलित हैं। इस राग का प्रयोग करते समय तानपूरे का प्रथम तार मन्द्र निषाद में मिलाया जाता है, क्योंकि इस राग में शुद्ध मध्यम और पंचम दोनों स्वर वर्जित होते हैं। अब हम आपको राग मारवा पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म है- ‘साज और आवाज़’, जिसके गीतों को नौशाद ने संगीतबद्ध किया था। इस फिल्म का जो गीत हम आपको सुनवा रहे हैं, उसे लता मंगेशकर व साथियों ने स्वर दिया था। इसके गीतकार हैं, खुमार बाराबंकवी। फिल्म में यह गीत सायरा बानो और साथियों के नृत्य पर फिल्माया गया था। आइए, सुनते हैं यह गीत और राग मारवा के स्वरों को पहचानने का प्रयास करते हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मारवा : “पायलिया बाँवरी बाजे...” : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म – साज और आवाज़



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 452वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित एक ऐतिहासिक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1-  इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2-  इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3-  इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार, 25 जनवरी, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 454 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 450वें अंक में हमने आपसे पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था, अतः इस अंक में हम सही उत्तर और विजेताओं के नाम प्रकाशित नहीं कर रहे हैं। अगले अंक में हम पहेली क्रमांक 451 का सही उत्तर और विजेताओं के नाम प्रकाशित करेंगे। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “मारवा थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने मारवा थाट के आश्रय अथवा जनक राग मारवा का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ इस राग में निबद्ध एक खयाल का रसास्वादन किया। राग मारवा के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर और साथियों के स्वर में फिल्म “साज और आवाज़” एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम मारवा थाट के एक जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर अपना लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग व थाट मारवा : SWARGOSHTHI 452 : RAG & THAT MARVA : 19 जनवरी, 2019

Sunday, March 3, 2019

राग भूपाली : SWARGOSHTHI – 409 : RAG BHUPALI






स्वरगोष्ठी – 409 में आज


कल्याण थाट के राग – 7 : राग भूपाली


विदुषी किशोरी अमोनकर से भूपाली में खयाल और लता मंगेशकर से इस राग में पिरोया गीत सुनिए





विदुषी किशोरी अमोनकर
लता मंगेशकर और सुधीर फड़के
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के सातवें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक और जन्य राग ‘भूपाली” पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में एक खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” से लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। संगीतकार सुधीर फड़के ने इस गीत को राग भूपाली के स्वरों का आधार दिया है।

कल्याण थाट के अन्य रागों में एक प्रमुख जन्य राग भूपाली है। यह औड़व-औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान होता है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पहले हिस्से में होता है। इन्हीं स्वरों को यदि उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए यह राग देशकार हो जाता है। इस राग में ध्रुवपद, खयाल और तराना गाया जाता है। राग भूपाली में ठुमरी नहीं गायी जाती। कुछ पुराने संगीतज्ञ इस राग में पंचम और ऋषभ स्वर की संगति करते है, किन्तु अधिकतर ऐसा नहीं करते। दक्षिण भारतीय संगीत में इस राग के समतुल्य राग मोहनम् होता है। अब हम आपको राग भूपाली के स्वरों में एक खयाल रचना सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने की विदुषी किशोरी अमोनकर। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं; “जब से तुम संग लागली प्रीत...”। आप राग भूपाली की इस रचना का रसास्वादन कीजिए।

राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत…” : विदुषी किशोरी अमोनकर


राग भूपाली, कल्याण थाट का जन्य राग माना जाता है। संगीत के ग्रन्थों में यह राग भूप या भोपाली नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। राग भूपाली का समप्रकृति राग देशकार है। दोनों रागों की जाति औड़व-औड़व होती है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है, जबकि राग देशकार का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह दोनों राग क्रमशः पूर्वांग और उत्तरांग वादी होते हैं। राग भूपाली का सम्बन्ध कल्याण थाट से होता है, किन्तु राग देशकार बिलावल थाट से सम्बन्धित होता है। रात्रि का पहला प्रहर राग भूपाली के गायन-वादन का और दिन का दूसरा प्रहर राग देशकार के गायन-वादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होता है। अब हम आपको राग भूपाली के स्वरों में पिरोया एक मधुर फिल्मी गीत - ‘ज्योतिकलश छलके...’ सुनवाते हैं। यह गीत 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘भाभी की चूड़ियाँ’ से है, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इसके संगीतकार सुधीर फडके और गीतकार हैं पण्डित नरेन्द्र शर्मा। लीजिए, अब आप राग भूपाली में पिरोया यह मधुर फिल्मी गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भूपाली : “ज्योतिकलश छलके...” : लता मंगेशकर : फिल्म – भाभी की चूड़ियाँ



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 409वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1963 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका और गायक के युगल स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 मार्च, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 411 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली का सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 407 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “मेरा साया” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – नन्द, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की सातवीं कड़ी में आज आपने राग “भूपाली” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” से लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया गया। संगीतकार सुधीर फड़के ने इस गीत को राग भूपाली के स्वरों का आधार दिया है। इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछले अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भूपाली : SWARGOSHTHI – 409 : RAG BHUPALI : 3 मार्च, 2019

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