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Thursday, December 22, 2016

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं.. ताहिरा सैय्यद ने कुछ यूँ आवाज़ दी दाग़ की दीवानगी और मस्तानगी को



कहकशाँ - 26
ताहिरा सय्यद की आवाज़ में दाग़ दहलवी का कलाम  
"ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है ताहिरा सय्यद की आवाज़ में दाग़ दहलवी का कलाम।




कोई नामो-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना,
तख़ल्लुस 'दाग़' है और आशिकों के दिल में रहते हैं।

"कौन ऐसी तवाएफ़ थी जो ‘दाग़’ की ग़ज़ल बग़ैर महफिल में रंग जमा सके? क्या मुशाअरे, क्या अदबी मजलिसें, क्या आपसी सुहबतें, क्या महफ़िले-रक्स, क्या गली-कूचें, सर्वत्र ‘दाग़’ का ही रंग ग़ालिब था।" अपनी पुस्तक "शेर-ओ-सुखन: भाग ४" में अयोध्या प्रसाद गोयलीय ने उपरोक्त कथन के द्वारा दाग़ की मक़बूलियत का बेजोड़ नज़ारा पेश किया है। ये आगे लिखते हैं: 

मिर्ज़ा ‘दाग़’ को अपने जीवनकाल में जो ख्याति, प्रतिष्ठा और शानो-शौकत प्राप्त हुई, वह किसी बड़े-से-बड़े शाइर को अपनी ज़िन्दगी में मयस्सर न हुई। स्वयं उनके उस्ताद इब्राहिम ‘ज़ौक़’ शाही क़फ़समें पड़े हुए ‘तूतिये-हिन्द’ कहलाते रहे, मगर १०० रू० माहवारी से ज़्यादा का आबो-दाना कभी नहीं पा सके। ख़ुदा-ए-सुख़न ‘मीर’, ‘अमर-शाइर’ ‘गा़लिब’ और ‘आतिश’-जैसे आग्नेय शाइरों को अर्थ-चिन्ता जीवनभर घुन के कीड़े की तरह खाती रही। हकीम ‘मोमिन शेख़’, ‘नासिख़’ अलबत्ता अर्थाभाव से किसी क़द्र निश्चन्त रहे, मगर ‘दाग़’ जैसी फ़राग़त उन्हें भी कहाँ नसीब हुई? जागीर मिलने और उच्च पदवियों से विभूषित होने के अतिरिक्त १५०० रू० मासिक वेतन, राजसी ठाट-बाट और नवाब हैदराबाद के उस्ताद होने का महान गौरव मिर्जा़ ‘दाग़’ को प्राप्त था। सच मानिए तो १९-वीं शताब्दी का अन्तिम युग ‘दाग़’ युग था।

दाग़ की ख्याति का यह आलम था कि उनकी शिष्य मण्डली में सम्मलित होना बहुत बड़ा सौभाग्य एवं गौरव समझा जाता था। हैदराबाद-जैसे सुदूर प्रान्त में ‘दाग़’ के समीप जो शाइर नहीं रह सकते थे, वे लगभग शिष्य संशोधनार्थ ग़ज़लें भेजते थे। ‘दाग़’ का शिष्य कहलाना ही उन दिनों शाइर होने का बहुत बड़ा प्रमाणपत्र समझा जाता था। मिर्जा दाग़ के जन्नत-नशीं होने के बाद एक दर्जन से अधिक शिष्य अपने को ‘जा-नशीने-दाग़’ (गुरुका उत्तराधिकारी शिष्य) लिखने लगे। नवाब ‘साइल’ मिर्जा ‘दाग़’ के दामाद भी थे और शिष्य भी। अतः बहुत बड़ी संख्या उन्हीं को ‘जानशीने-दाग़’ समझती थी। ‘बेखुद’ देहलवी, ‘बेखुद’ बेख़ुद’ बदायूनी, ‘आगा’ शाइर क़िज़िलबाश, ‘अहसन’ मारहरवी’, ‘नूह’ नारवी, भी अपने को ‘जानशीने-दाग़’ लिखने में बहुत अधिक गर्व का अनुभव करते हैं; और किसी कि मजाल नहीं जो उन्हें इस गौरवास्पद शब्द से वंचित कर सके। वास्तविक उत्ताधिकारी कौन है, इस प्रश्न को सुलझाने के लिए वर्षों वाद-विवाद चले हैं।

कहा जाता है कि दाग़ के २००० से अधिक शागिर्द थे। इन शागिर्दों में दो ऐसे भी शागिर्द रहे हैं, जिन्हें उत्तराधिकारी कहे जाने का कोई शौक़ या कोई जिद्द नहीं थी, लेकिन इन्हीं दोनों ने दाग़ का नाम सबसे ज्यादा रोशन किया है। उनमें से एक थे जिगर मुरादाबादी, और दूसरे थे मोहम्मद अल्लामा इक़बाल। इक़बाल अपनी कविताएँ डाक द्वारा ‘दाग़’ देहलवी को संशोधनार्थ भेजा करते थे। महज २२ वर्ष की आयु में ही इक़बाल ऐसी दुरूस्त गज़लें लिखने लगे थे कि मिर्ज़ा दाग़ को भी उनकी काबिलियत का लोहा मानना पड़ा था। दाग़ ने उनकी रचनाएँ इस टिप्पणी के साथ वापस करनी शुरू कर दी कि रचनाएँ संशोधन की मोहताज नहीं हैं।

अभी ऊपर हमने दाग़ के सुपूर्द-ए-खाक होने की बातें कीं, लेकिन इससे पहले जो चार दिन की ज़िंदगी होती है या फिर जन्म होता है, उसका ज़िक्र भी तो लाजिमी है। तो दाग़ का जन्म नवाब मिर्ज़ा ख़ान के रूप में २५ मई १८३१ को हुआ था। इन्होंने बस दस वर्ष की अवस्था से ही ग़ज़ल पढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। १८६५ में वे रामपूर चले गए। रामपुर में इनकी मक़बूलियत का हवाला देते हुए हज़रत ‘नूह’ नारवी लिखते हैं कि -"मुझसे रामपुर के एक सिन-रसीदा (वयोवृद्ध) साहब ने ज़िक्र किया कि नवाब कल्ब अली खाँ साहब का मामूल था कि मुशाअरे के वक़्त कुछ लोगों को मुशाअरे के बाहर महज़ इस ख्याल बैठा देते थे कि बाद में ख़त्म मुशाअरा लोग किसका शेर पढ़ते हुए मुशाइरे से बाहर निकलते हैं। चुनाव हमेशा यही होता था कि ‘दाग़’ साहब का शेर पढ़ते हुए लोग अपने-अपने घरों को जाते थे।" २४ साल रामपुर में व्यतीत करने के बाद दाग़ १८९१ के आस-पास हैदराबाद चले गए। यहीं पर १७ फरवरी १९०५ को इन्होंने अंतिम साँसें लीं।

दाग़ के बारे में और जानने के लिए चलिए अब हम निदा फ़ाज़ली साहब की शरण में चलते हैं:

दाग़ के पिता नवाब शम्सुद्दीन ने अपनी बंदूक से देश प्रेम में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी को उड़ा दिया था। नवाब साहब को फाँसी दी गई और उनकी पत्नी अपने पाँच साल के बेटे को रामपुर में अपनी बहन के हवाले करके, जान बचाने के लिए इधर-उधर भागती रहीं। जहाँ उन्हें मदद मिली वहाँ-वहाँ इसकी क़ीमत उन्हें अपने शरीर से चुकानी पड़ी, जिसके नतीजे में दाग़ के एक भाई और बहन अंग्रेज़ नस्ल से भी हुए। यह अभागिन महिला आख़िर में, आख़िरी मुग़ल सम्राट के होने वाले जानशीन मिर्ज़ा फखरू के निकाह में आई। यह १८५७ से पहले का इतिहास है। महल में आने के बाद माँ को रामपुर में छोड़े हुए बेटे की याद आई और किस्मत, बदकिस्मत बेटे को रामपुर से लालकिले में ले आई। १८५७ से एक साल पहले मिर्जा फखरू का देहांत हुआ और उसके बाद माँ और बेटा दोनों फिर से बेघर हो गए. दाग़ उस वक़्त शायर बन चुके थे। मशहूर हो चुके थे। शायरी ने उस समय के रामपुर नवाब को उन पर मेहरबान बनाया और उन्होंने फिर से घर-बार बसाया।

रामपुर में हर साल एक मेला लगता था, जिसमें देश की मशहूर तवायफ़ें अपने गायन और नृत्य का प्रदर्शन करती थीं। उन तवायफों में एक नवाब साहब के भाई की प्रेमिका थी। दाग़ का दिल उसी पर आ गया। उनका नाम था मुन्नी बाई हिजाब। मुहब्बत की दीवानगी में पत्नी के मना करने के बावजूद नवाब साहब के नाम दाग़ ने खत लिख डाला: "नवाब साहब आपको ख़ुदा ने हर ख़ुशी से नवाज़ा है, मगर मेरे लिए सिर्फ़ एक ही ख़ुशी है और वह है मुन्नी बाई।"

नवाब तो दाग़ की शायरी के प्रशंसक थे, उन्होंने मुन्नी बाई के ज़रिए ही उत्तर भेजा। लिखा था - "दाग़ साहब, हमें आपकी ग़ज़ल से ज़्यादा मुन्नी बाई अजीज़ नहीं है।" मुन्नी बाई दाग़ साहब की प्रेमिका के रूप में उनके साथ रहने लगीं। लेकिन जब मन में धन का प्रवेश हुआ तो मन बेचारा बंजारा बन गया और मुन्नी बाई उन्हें छोड़ के चली गईं। इसी बेवफ़ाई पर शायद दाग़ ने यह शेर कहा था:

तू जो हरजाई है अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही और नहीं, और सही

लखनवी और देहलवी अंदाज़ की शायरी का सम्मिश्रण दाग की शायरी में बखूबी नज़र आता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये दो अंदाज़ हैं क्या और इनमें अंतर क्या है। इसी प्रश्न का जवाब देवी नागरानी आर०पी०शर्मा "महर्षि" से पूछ रही हैं: (साभार: साहित्य कुंज) "देहलवी शायरी में प्रेमी का उसके सच्चे प्रेम तथा दुख-दर्द का स्वाभाविक वर्णन होता है, जब कि लखनवी शायरी अवध की उस समय विलासता से प्रभावित रही। अतः उसमें प्रेम को वासना का रूप दे दिया गया तथा शायरी प्रेमिका के इर्द -गिर्द ही घूमती रही। वर्णन में कृत्रिमता एवं उच्छृंखलता से काम लिया गया। अब लखनवी शायरी में सुधार आ गया है।" ये तो हुई अंतर की बात, लेकिन अगर इनमें मेल-मिलाप जानना हो तो दाग़ के इन शेरों से बढ़कर और मिसाल नहीं मिल सकते:

ग़म से कहीं निजात मिले चैन पाएं हम,
दिल ख़ूं में नहाए तो गंगा नहाएं हम

ख़ूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना, जो पता एक ने जाना तेरा

दाग़ के बारे में आज हमने बहुत कुछ जाना। महफ़िल तभी सफ़ल मानी जाती है जब शेरों के साथ-साथ शायर की भी दिल खोलकर बातें हो। आज की महफ़िल भी कुछ वैसी ही थी। इसलिए मैं मुतमुईन होकर ग़ज़ल की और बढ़ने को बेकाबू हूँ। चलिए तो अब आज की ग़ज़ल से रूबरू हुआ जाए। इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सजाया है मल्लिका पुखराज की सुपुत्री ताहिर सैय्यद ने, जो खुद ही बेमिसाल आवाज़ की मालकिन रही हैं। तो लीजिए पेश-ए-ख़िदमत है आज की ग़ज़ल, जिसमें दाग़ ज़ाहिद से यह दरख्वास्त कर रहे हैं कि ये प्यार में पागल मस्ताने और दीवाने आदमी हैं, इसलिए इन्हें बुरा न कहा जाए:

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं 
तुझ से लिपट पड़ेंगे, दीवाने आदमी हैं 

गै़रों की दोस्ती पर क्यों ऐतबार कीजे 
ये दुश्मनी करेंगे, बेगाने आदमी हैं 

तुम ने हमारे दिल में घर कर लिया तो क्या है 
आबाद करते, आख़िर वीराने आदमी हैं 

क्या चोर हैं जो हम को दरबाँ तुम्हारा टोके
कह दो कि ये तो जाने-पहचाने आदमी हैं




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्व दीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, November 10, 2016

अपने पडो़सी दिल से भीनी-भीनी भोर की माँग कर बैठे गोटेदार गुलज़ार साहब, आशा जी एवं राग तोड़ी वाले पंचम दा



कहकशाँ - 23
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"भीनी भीनी भोर आई..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकला एक नगमा 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



गुलज़ार और पंचम - ये दो नाम दो होते हुए भी एक से लगते हैं और जब भी इन दोनों का नाम साथ में आता है तो सुनने वालों को मालूम हो जाता है कि कुछ नया कुछ अलबेला पक के आने वाला है बाहर। अभी-अभी पतीला खुलेगा और कोई मीठी-सी नज़्म छलकते हुए हमारे कानों तक पहुँच जाएगी। ये दोनों फ़नकार एक-दूसरे के पूरक-से हो चले थे। कैसी भी घुमावदार सोच हो, किसी भी मोड़ पर बिन कहे मुड़ने वाले मिसरे हों या फिर किसी अखबार की सुर्खियाँ ही क्यों न हो, गुलज़ार के हरेक शब्द-नुमा ईंट का जवाब पंचम अपने सुरों के पत्थर (अजीब उपमा है.. यूँ होना तो फूल चाहिए, लेकिन मुहावरा बनाने वाले ने हमारे पास कम ही विकल्प छोड़े हैं) से दिया करते थे। और जवाब ऐसा कि "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे"; गुलज़ार के शब्द जहाँ शिखर पर ही मौजूद रहे, वहीं उसी के इर्द-गिर्द पंचम अपनी पताका भी लहरा आएँ, तभी तो दोनों की जोड़ी आजतक प्यार और गुमान से याद की जाती है। 

लेकिन यह जोड़ी ज़्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। गुलज़ार को राह में अकेले छोड़कर पंचम दूसरी दुनिया में निकल लिए। पंचम के गुज़रने का असर गुलज़ार पर किस हद तक पड़ा, इसका अंदाज़ा पंचम की याद में लिखे गुलज़ार के इस नज़्म से लगाया जा सकता है:

याद है बारिशों का दिन, पंचम 

याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में 
धुंध से झांककर निकलती हुई 
रेल की पटरियां गुज़रती थीं 
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम 
जैसे दो पौधे पास बैठे हों 
हम बहुत देर तक वहां बैठे 
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे 
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन 
उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा 
देर तक पटरियों पर बैठे हुए 
रेल का इंतज़ार करते रहे 
रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ 
और तुम, यूं ही दो क़दम चलकर 
धुंध पर पांव रखके चल भी दिए 

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'...

पंचम की क्षति अपूर्णीय है, जितना गुलज़ार के लिए उतना ही संगीत के अन्य साधकों के लिए भी। मैंने जब यह "आलेख" लिखना शुरू किया था तो यह सोचा नहीं था कि मेरी लेखनी पंचम को याद करने में डूब जाएगी, लेकिन भावनाओं का वह सैलाब बह निकला कि न मैं खुद को रोक पाया, न अपनी लेखनी को। बात जब गुलज़ार और पंचम की हो रही है तो क्यों न आज अपनी महफ़िल को इन्हीं दोनों की एक नज़्म से सजाया जाए। 

हम आज की नज़्म तक पहुँचें, इससे पहले एक और फ़नकार से आपका परिचय कराना लाजिमी हो जाता है, मुआफ़ कीजिएगा, फ़नकार नहीं.. फ़नकारा। इन फ़नकारा के बिना गुलज़ार-पंचम की जोड़ी में उतनी जान नहीं, जो कि इनकी तिकड़ी में है। यह फ़नकारा कोई और नहीं, बल्कि पंचम दा की अर्धांगिनी आशा भोसले जी हैं, जिन्हें सारी दुनिया आशा ताई के नाम से पुकारती है। गुलज़ार साहब, पंचम दा और आशा ताई की तिकड़ी ने फिल्मों में एक से बढ़ कर एक गीत दिए हैं। चंद नाम यहाँ पेश किए देता हूँ: --'क़तरा क़तरा‍ मिलती है', 'मेरा कुछ सामान', 'आंकी चली बांकी चली', 'आऊंगी एक दिन आज जाऊं', 'बड़ी देर से मेघा बरसा', 'बेचारा दिल क्‍या करे', 'छोटी सी कहानी से', ’घर जाएगी तर जाएगी’, ’ये साये हैं ये दुनिया है’... यह फेहरिश्त और भी बहुत लंबी है, लेकिन मेरे हिसाब से इतने उदाहरण ही काफी हैं। 

न सिर्फ़ फिल्मों में बल्कि इनकी तिकड़ी का कमाल "एलबमों" में भी नज़र आता है। "एलबमों" की बात करने पर जिस एलबम की याद सबसे पहले आती है, वह है "दिल पड़ोसी है"। इस एलबम को आशा ताई के जन्मदिन पर यानि कि ८ सितम्बर को १९८७ में रीलिज किया गया था। इसमें में कुल चौदह गाने हैं। आज आपको हम इस एलबम से "भीनी भीनी भोर आई" सुनवाने जा रहे हैं। अगली कड़ी में हम एलबम के बाकी गानों से रूबरू होंगे। इस गाने के बारे में हम कुछ कहें, इससे अच्छा होगा कि क्यों न इसके कारीगरों से ही इसके बनने की कहानी सुन लें। "संगीत सरिता" कार्यक्रम के अंतर्गत "मेरी संगीत यात्रा" लेकर आ रहे हैं "गुलज़ार साहब, पंचम दा एवं आशा ताई"..

पंचम दा: आशा जी, आपको याद है कोई गीत जो आपने काफ़ी मेहनत से गाया होगा?

आशा जी: हाँ, एक गीत आपने राग तोड़ी में बनाया था। वैसे तोड़ी में "धा" से पंचम लगाना चाहिए, पर फिल्मी गीत में अगर पूरा का पूरा राग वैसे हीं रख दिया जाए तो उस राग पर आधारित सभी गीत एक जैसे हीं लगेंगे। थोड़ी-बहुत चेंज करके अगर गीतों को ढाला जाए तो एक नयापन भी आता है और सुनने में भी अच्छा लगता है।

गुलज़ार साहब: हाँ सही बात है, अगर "क्लासिकल म्युज़िक" को मिसाल बनाकर कोई फिल्म बन रही है तब अलग बात है।

पंचम दा: गुलज़ार, आप को याद है "भीनी भीनी भोर".. "दिल पड़ोसी है" एलबम का ये पहला गाना रखा था हमने?

आशा जी: गुलज़ार भाई, आपने इस गाने में "गोटा" शब्द का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया था।

गुलज़ार साहब: सोने की चमक की "उपमा" हमारे फिल्मी गीतों में काफ़ी पाई जाती है, कभी आग से, कभी धूप से। लेकिन हर चीज़ जो चमकती है वह सोना नहीं होती (तीनों हँसते हैं), हमारे यहाँ शादी में गोटेदार चुनरी देखने को मिलती है, तो उसी से मैंने यह लिया था।

आशा जी: लेकिन आपने तो बादल को गोटा लगाया था ना?

गुलज़ार साहब: मुझे लगता था कि गोटे की जो चुनरी है वो बहुत हीं खूबसूरत है। आशा जी, आपने कहा कि पंचम ने तोड़ी का "चलन" बदला, मुझे तो हमेशा हीं इसके चाल-चलने पर शक़ रहा है (तीनों ठहाका लगाते हैं), आपने कहा कि इन्होंने अपना चलन बदला! (हँसी ज़ारी है)

पंचम दा: यह सुबह का गाना था, इसमें हमने मुर्गियों की आवाज़ डाली थी, बहुत सारे "साउंड इफ़ेक्ट्स" थे कि जिससे सुबह का "वातावरण" सामने आए, एक आदत हो चुकी थी, अब आप इसे चलन कहिये, ऐसे कोई राग बन जाता हओ, "मूड" बन जाता है।

तो आपने देखा कि माहौल कितना खुशगवार हो जाता था, जब ये तीनों एक जगह आ जुटते थे। जब बातचीत इतनी सुरीली है तो संगीत के बारे में क्या कहा जाए! चलिए तो फिर हम भी राग तोड़ी में मुर्गिर्यों की बांग के बीच गुलज़ार साहब के "गोटे" का मज़ा लेते हैं और इस तिकड़ी को फिर से याद करते हैं (वैसे अगली कड़ी भी इसी तिकड़ी और इसी एलबम को समर्पित है):

भीनी भीनी भोर आई
भीनी भीनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भीनी भीनी भोर आई...

माथे सुनहरी टीका लगाये
पात पात पर गोटा लगाये
गोटा लगाई
सात रंग की जाई आई
भीनी भीनी भोर आई...

ओस धुले मुख पोछे सारे
आँगन लेप गई उजियारे
उजियारे उजियारे
सा रे ग मा धा नि
जागो जगर की बेला आई
भीनी भीनी भोर आई...

भीनी भीनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भीनी भीनी भोर आई
भीनी भीनी भोर आई


’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, June 9, 2016

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था...... 'कहकशाँ’ में आज छाया की माया



कहकशाँ - 11
छाया गांगुली, इब्राहिम अश्क़, भूपेन्द्र सिंह 
"नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है छाया गांगुली की आवाज़, इब्राहिम अश्क़ के बोल और भूपेन्द्र सिंह का संगीत।




मुज़फ़्फ़र अली की एक फ़िल्म आई थी "गमन"। फ़ारूख शेख और स्मिता पाटिल की अदाकारियों से सजी इस फ़िल्म में कई सारी दिलकश गज़लें थीं। यह तो सभी जानते हैं कि मुज़फ़्फ़र अली को संगीत का अच्छा-ख़ासा इल्म है, विशेषकर ग़ज़लों का। इसलिए उन्होंने गज़लों को संगीतबद्ध करने का ज़िम्मा उस्ताद अली अकबर ख़ाँ के शागिर्द जयदेव वर्मा को दिया। और मुज़फ़्फ़र अली की दूरगामी नज़र का कमाल देखिए कि इस फ़िल्म के लिए "जयदेव" को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया। भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में अब तक केवल तीन ही संगीतकार हुए हैं जिन्हें तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (रजत कमल) पाने का गौरव प्राप्त है: जयदेव, ए आर रहमान और इल्लैया राजा। हाँ तो हम "गमन" की गज़लों की बात कर रहे थे। इस फ़िल्म की एक गज़ल "आप की याद आती रही रात भर", जिसे "मक़दू्म मोहिउद्दिन" ने लिखा था, के लिए मुज़फ़्फ़र अली को एक नई आवाज़ की तलाश थी और यह तलाश हमारी आज की फ़नकारा पर खत्म हुई। इस गज़ल के बाद तो मानो मुज़फ़्फ़र अली इस नई आवाज़ के दीवाने हो गए। यूँ तो मुज़फ़्फ़र अली अपनी फ़िल्मों (गमन, उमराव जान) के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कम ही लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि इन्होंने कई सारी ही ग़ज़लों को संगीतबद्ध भी किया है। "रक़्स-ए-बिस्मिल","पैग़ाम-ए-मोहब्बत", "हुस्न-ए-जानां" ऐसी ही कुछ ख़ुशकिस्मत ग़ज़लों की एलबम हैं, जिन्हें मुज़फ़्फ़र अली ने अपनी सुरों से सजाया है। बाकी एलबमों की बात कभी बाद में करेंगे, लेकिन "हुस्न-ए-जानां" का ज़िक्र यहाँ लाज़िमी है। अमिर ख़ुसरो का लिखा "ज़िहाल-ए-मस्कीं" न जाने कितनी ही बार अलग-अलग अंदाज़ में गाया जा चुका है, यहाँ तक कि "ग़ुलामी" के लिए गुलज़ार साहब ने इसे एक अलग ही रूप दे दिया था, लेकिन कहा जाता है कि इस गाने को हमारी आज की फ़नकारा ने जिस तरह गाया है, जिस अंदाज में गाया है, वैसा दर्द वैसा ग़म-ए-हिज्र आज तक किसी और की आवाज़ में महसूस नहीं होती। ऐसी है मुज़फ़्फ़र अली की परख और ऐसा है इस फ़नकारा की आवाज़ का तिलिस्म!

उस फ़नकारा के नाम से पर्दा हटाने के पहले मैं आज की गज़ल से जुड़े एक और हस्ती के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। आज की ग़ज़ल को साज़ों से सजाने वाला वह इंसान ख़ुद एक कामयाब ग़ज़ल-गायक है। गज़लों से परे अगर बात करें तो कई सारे फ़िल्मी-गानों को उन्होंने स्वरबद्ध किया है। एक तरह से वे गु्लज़ार के प्रिय रहे हैं। "दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात-दिन", "नाम गुम जाएगा", "एक अकेला इस शहर में", "हुज़ूर इस क़दर भी न इतराके चलिए" कुछ ऐसे ही मकबूल गाने हैं, जिन्हें गुलज़ार ने लिखा और "भूपिन्दर सिंह" ने अपनी आवाज़ दी। जी हाँ, हमारी आज की गज़ल के संगीतकार "भूपिन्दर सिंह" जी ही हैं। तो अब तक हम ग़ज़ल के संगीतकार से रूबरू हो चुके है, अब इस महफ़िल में बस ग़ज़लगो और गायिका की ही कमी है। दोस्तों, मुझे उम्मीद है कि मैने गायिका की पहचान के लिए जो हिंट दिए थे, उनकी मदद से आपने अब तक गायिका का नाम जान ही लिया होगा। आप हैं "छाया गांगुली"। छाया गांगुली से जुड़ी मैंने कई सारी बातें आपको पहले ही बता दी हैं, अब उनके बारे में ज़्यादा लिखने चलूँगा तो आलेख लंबा हो जाएगा। इसलिए अच्छा होगा कि मैं अब ग़ज़ल की ओर रूख़ करूँ।

कई साल पहले "नाज़ था ख़ुद पर मगर ऐसा न था" नाम से ग़ज़लों की एक एलबम आई थी। आज हम उसी एलबम की प्रतिनिधि गज़ल आपको सुना रहे हैं। प्रतिनिधि ग़ज़ल होने के कारण यह तो साफ़ ही है कि उस ग़ज़ल के भी बोल यही है..."नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था" । इस सुप्रसिद्ध गज़ल के बोल लिखे थे "इब्राहिम अश्क़" ने। कभी मौका आने पर "इब्राहिम अश्क" साहब के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे, अभी अपने आप को बस इस गज़ल तक ही सीमित रखते हैं। इस गज़ल की ख़ासियत यह है कि बस चार शेरों में ही पूरी दुनिया की बात कह दी गई है। गज़लगो कभी खुद पर नाज़ करता है, कभी जहां की तल्ख निगाहों का ब्योरा देता है तो कभी अपने महबूब पर गुमां करता है। भला दूसरी कौन-सी ऐसी गज़ल होगी जो चंद शब्दों में ही सारी कायनात का जिक्र करती हो। शुक्र यह है कि इश्क़-वालों के लिए कायनात बस अपने इश्क़ तक ही सिमटा नहीं है। वैसे इसे शुक्र कहें या मजबूरी, क्योंकि इश्क़-वाले तो ख़ुद में ही डूबे होते हैं, उन्हें औरों से क्या लेना। अब जब औरों को इनकी खुशी न पचे तो ये दुनिया की शिकायत न करें तो क्या करें।

इश्क-वालों ने किए जब अलहदा हैं रास्ते,
राह-भर में खार किसने बोए इनके वास्ते।

तो लीजिए आप सबके सामने पेश-ए-ख़िदमत है आज की ग़ज़ल, लुत्फ़ लें और अगर अच्छी लगे तो हमारे चुनाव की दाद दें:

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था,
आईने में जब तलक देखा न था।

शहर की महरूमियाँ मत पूछिये,
भीड़ थी पर कोई भी अपना न था।

मंजिलें आवाज़ देती रह गईं,
हम पहुँच जाते मगर रस्ता न था।

इतनी दिलकश थी कहाँ ये ज़िंदगी,
हमने जब तक आपको चाहा न था।




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, May 26, 2016

इसी को प्यार कहते हैं.. प्यार की परिभाषा बता रहे हैं हसरत जयपुरी और हुसैन बंधु



कहकशाँ - 10
हसरत जयपुरी और हुसैन बंधु  
"इसी को प्यार कहते हैं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गीतकार व शायर हसरत जयपुरी की लिखी नज़्म हुसैन बन्धुओं की आवाज़ों में।



ग़ज़लों की दुनिया में ग़ालिब का सानी कौन होगा! कोई नहीं! है ना? फिर आप उसे क्या कहेंगे जिसके एक शेर पर ग़ालिब ने अपना सारा का सारा दीवान लुटाने की बात कह दी थी? "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता।" इस शेर की कीमत आँकी नहीं जा सकती, क्योंकि इसे ख़रीदने वाला ख़ुद बिकने को तैयार था। आपको पता न हो तो बता दूँ कि यह शेर उस्ताद मोमिन खाँ ’मोमिन’ का है। अब बात करते हैं उस शायर की, जिसने इस शेर पर अपना रंग डालकर एक रोमांटिक गाने में तब्दील कर दिया। न सिर्फ़ इसे तब्दील किया, बल्कि इस गाने में ऐसे शब्द डाले, जो उससे पहले उर्दू की किसी भी ग़ज़ल या नज़्म में नज़र नहीं आए थे - "शाह-ए-खुबां" (इस शब्द-युग्म का प्रयोग मैंने भी अपने एक गाने "हुस्न-ए-इलाही" में कर लिया है) एवं "जान-ए-जानाना"। दर-असल ये शायर ऐसे प्रयोगों के लिए "विख्यात"/"कुख्यात" थे। इनके गानों में ऐसे शब्द अमूमन ही दिख जाते थे, जो या तो इनके ही गढ़े होते थे या फिर न के बराबर प्रचलित। फिर भी इनके गानों की प्रसिद्धि कुछ कम न थी। इन्हें यूँ ही "रोमांटिक गानों" का बादशाह नहीं कहा जाता। बस इनसे यही शिकायत रही थी कि ये नामी-गिरामी और किंवदंती बन चुके शायरों के शेरों को तोड़-मरोड़कर अपने गानों में डालते थे (जैसा कि इन्होंने "मोमिन" के शेर के साथ किया), जबकि दूसरे गीतकार उन शेरों को जस-का-तस गानों में रखते थे/हैं और इस तरह से उन शायरों को श्रद्धांजलि देते थे/हैं। मेरे हिसाब से "गुलज़ार" ने सबसे ज्यादा अपने गानों में "ग़ालिब", "मीर", "जिगर" एवं "बुल्ले शाह" की रचनाओं का इस्तेमाल किया है, लेकिन उन शायरों के लिखे एक भी हर्फ़ में हेर-फेर नहीं किया, इसलिए कोई भी सुधि श्रोता/पाठक इनसे नाराज़ नहीं होता। हमारे आज के शायर ने यही एक ग़लती कर दी है, इसलिए मुमकिन है कि जब भी ऐसी कोई बात उठेगी तो ऊँगली इनकी तरफ़ खुद-ब-खुद ही उठ जाएगी। खैर छोड़िये, हम भी कहाँ आ गए! हमें तो अपने इस रोमांटिक शायर से बहुत कुछ सुनना है, बहुत कुछ सीखना है और इनके बारे में बहुत कुछ जानना भी है।

बहुत देर से हम "इस" और "ये" के माया-जाल में फँसे थे, तो इस जाल से बाहर निकलते हुए, हम यह बता दें कि जिनकी बात यहाँ की जा रही है, वे और कोई नहीं राज कपूर साहब के चहेते जनाब "हसरत जयपुरी" हैं। ये क्या थे, चलिए यह जानने के लिए हम कुछ चिट्ठों को खंगाल मारते हैं (साभार: लाईव हिन्दुस्तान, सुरयात्रा, पत्रिका, ड्रीम्स एवं कविताकोश)

१५ अप्रैल, १९१८ को जन्मे हसरत जयपुरी का मूल नाम इक़बाल हुसैन था। उन्होंने जयपुर में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद अपने दादा फिदा हुसैन से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की। बीस वर्ष का होने तक उनका झुकाव शेरो-शायरी की तरफ होने लगा और वह छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे। वर्ष १९४० मे नौकरी की तलाश में हसरत जयपुरी ने मुंबई का रुख़ किया और आजीविका चलाने के लिए वहाँ बस कंडक्टर के रुप में नौकरी करने लगे। इस काम के लिए उन्हे मात्र ११ रुपये प्रति माह वेतन मिला करता था। इस बीच उन्होंने मुशायरा के कार्यक्रम में भाग लेना शुरू किया। ऐसे ही एक मुशायरे मे उन्होंने मजदूरों के बीच अपनी कविता "मजदूर की लाश" पढ़ी, जिसे पृथ्वीराज कपूर ने भी सुना। उनकी काबिलियत से प्रभावित होकर वे उन्हें पृथ्वी थिएटर ले आए और राज कपूर से मिलने की सलाह दी। राज कपूर ने उनकी कविता "मैं बाजारों की नटखट रानी" सुनकर अपनी दूसरी फिल्म "बरसात" के गीत लिखने का ऑफर दे दिया। १५० रूपए माहवार पर उनकी नौकरी पक्की हो गई। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फिल्म बरसात से ही संगीतकार शंकर जयकिशन ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी।

राजकपूर के कहने पर शंकर जयकिशन ने हसरत जयपुरी को एक धुन सुनाई और उसपर उनसे गीत लिखने को कहा। धुन के बोल कुछ इस प्रकार थे- "अंबुआ का पेड़ है वहीं मुंडेर है आजा मेरे बालमा काहे की देर है" शंकर जयकिशन की इस धुन को सुनकर हसरत जयपुरी ने गीत लिखा "जिया बेकरार है छाई बहार है आजा मोरे बालमा तेरा इंतज़ार है"। वर्ष १९४९ में प्रदर्शित फिल्म बरसात में अपने इस गीत की कामयाबी के बाद हसरत जयपुरी रातोंरात बतौर गीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की कामयाबी के बाद राजकपूर, हसरत जयपुरी (शैलेन्द्र भी) और शंकर जयकिशन की टीम ने कई फिल्मों मे एक साथ काम किया। इनमें आवारा, श्री 420, चोरी चोरी, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, तीसरी कसम, दीवाना, एराउंड द वर्ल्ड, मेरा नाम जोकर, कल आज और कल जैसी फिल्में शामिल है। यह जोड़ी १९७१ तक अनेक फिल्मो में साथ काम करती रही, "मेरा नाम जोकर " के फेल होने और जयकिशन के निधन होने के बाद राज कपूर ने इस टीम को छोड़ दिया और अपनी नयी टीम आनंद बक्षी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ बना ली, लेकिन अपनी फ़िल्म "राम तेरी गंगा मैली" में हसरत को वापस ले आये, जहाँ हसरत ने "सुन साहिबा सुन" लिखा, लेकिन राज कपूर की मौत के बाद हसरत का फिल्मी सफ़र थम सा गया था, फिर भी वे कुछ संगीतकारों के साथ काम करते रहे।

हसरत जयपुरी को दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष १९६६ में फिल्म सूरज के गीत "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है" के लिए दिया गया। वर्ष १९७१ मे फिल्म अंदाज में "जिंदगी एक सफर है सुहाना" गीत के लिए भी वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। हसरत जयपुरी वर्ल्ड यूनिवर्सिटी टेबुल के डाक्ट्रेट अवार्ड और उर्दू कान्फ्रेंस में जोश मलीहाबादी अवार्ड से भी सम्मानित किए गए। फिल्म मेरे हुजूर में हिन्दी और ब्रज भाषा में रचित गीत झनक झनक तोरी बाजे पायलिया के लिए वह अम्बेडकर अवार्ड से सम्मानित किए गए। 

अपने गीतों से कई वर्षों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार १७ सिंतबर, १९९९ को संगीतप्रेमियों को रोता और तनहा छोड़कर चला गया।

इन जानकारियों के बाद आज की नज़्म की ओर रुख करें, उससे पहले बड़ी ही मज़ेदार बात आपसे बाँटने का जी कर रहा है। २८ जुलाई, २००९ को सुजॉय जी ने अपने "ओल्ड इज गोल्ड" पर हमें एक गीत सुनाया था "ये मेरा प्रेम-पत्र पढ़कर" और उस आलेख में लिखा था कि "हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा!" और इतना कहते-कहते सुजॉय जी रूक गए थे। तो दर-असल बात ये है कि "हसरत" साहब ने यह गीत अपने महबूबा के लिए ही लिखा था। यह रही पूरी कहानी: लगभग बीस साल की उम्र में उनका राधा नाम की हिन्दू लड़की से प्रेम हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने प्यार का इज़हार नहीं किया। उन्होंने पत्र के माध्यम से अपने प्यार का इजहार करना चाहा, लेकिन उसे देने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाए। वह लड़की उनकी प्रेरणा बन गई और उसी को कल्पना बनाकर वे जीवनभर शायरी करते रहे। बाद में राजकपूर ने उस पत्र में लिखी कविता 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना...' का इस्तेमाल अपनी फिल्म संगम के लिए किया। नाकाम एकतरफ़ा प्रेम क्या-क्या न करवा देता है.. कोई हम जैसों से पूछे!! चलिए इसी बहाने एक शायर तो मिला हमें!

आज हसरत साहब की जिस नज़्म को लेकर आए हैं, उसे आवाज़ें दी हैं मुहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन, यानि कि "हुसैन बंधुओं" ने।  हुसैन बंधुओं ने इस रोमांटिक"-से नज़्म को किस कशिश से गाया है, इसका अंदाज़ा बिना सुने नहीं लगाया जा सकता। इसलिए आइये हम और आप डूब जाते हैं "प्यार के इस सागर" में और जानते हैं कि "प्यार कहते किसे हैं"। हुसैन बन्धुओं के बारे में विस्तार से हम किसी और अंक में चर्चा करेंगे।

नज़र मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

जबाँ ख़ामोश है लेकिन निग़ाहें बात करती हैं
अदाएँ लाख भी रोको अदाएँ बात करती हैं।
नज़र नीची किए दाँतों में उंगली को दबाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

छुपाने से मेरी जानम कहीं क्या प्यार छुपता है
ये ऐसा मुश्क है ख़ुशबू हमेशा देता रहता है।
तुम तो सब जानती हो फिर भी क्यों मुझको सताती हो?
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे प्यार का ऐसे हमें इज़हार मिलता है
हमारा नाम सुनते ही तुम्हारा रंग खिलता है
और फिर साज़-ए-दिल पे तुम हमारे गीत गाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे घर में जब आऊँ तो छुप जाती हो परदे में
मुझे जब देख ना पाओ तो घबराती हो परदे में
ख़ुद ही चिलमन उठा कर फिर इशारों से बुलाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।






’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, April 28, 2016

अखियाँ नु चैन न आवे....नुसरत बाबा का रूहानी अंदाज़ आज 'कहकशाँ’ में




कहकशाँ - 8
नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें 
"अब तो आजा कि आँखें उदास बैठी हैं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है जुदाई के रंग में सराबोर दो रचनाएँ, पहली नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ की आवाज़ में और दूसरी मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में।




अब तो आजा कि आँखें उदास बैठी हैं,
भूलकर होश-औ-गुमां बदहवास बैठी हैं।

इश्क़ की कशिश ही ऐसी है कि साजन सामने हो तो भी कुछ न सूझे और दूर जाए तब भी कुछ न सूझे। इश्क़ की तड़प ही ऐसी है कि साजन आँखों में हो तो दिल को सुकूं न मिले और दिल में हो तो आँखों में कुछ चुभता-सा लगे। रूह तब तक मोहब्बत के रंग में नहीं रंगता जब तक पोर-पोर में साजन की आमद न हो। लेकिन अगर दिल की रहबर "आँखें" ही साजन के दरश को प्यासी हों तो बिन मौसम सावन न बरसे तो और क्या हो। यकीं मानिए सावन बारहा मज़े नहीं देता :

आँखों से अम्ल बरसे जो दफ़-अतन कभी,
छिल जाए गीली धरती, खुशियाँ जलें सभी।

बाबा नुसरत ने कुछ ऐसे हीअ भावों को अपने मखमली आवाज़ से सराबोर किया है। "बैंडिट क्वीन" से यह पंजाबी गीत आप सबके सामने पेशे खिदमत है। लेकिन उससे पहले नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ साहब के बारे में चन्द अलफ़ाज़ पेश है। ख़ास तौर से क़व्वाली को घर घर पहुँचाने और नए ज़माने के लोगों में इसे दिल-अज़ीज़ बनाने में उनका ख़ास योगदान रहा। उनकी आवाज़ की ख़ास बात यह है कि उनकी रूहानी आवाज़ सुनते हुए एक अलग ही दुनिया में हम पहुँच जाते है, और दिल चाहने लगता है कि गाना बस चलता ही जाए, चलता ही जाए! 13 अक्टुबर 1948 में पाक़िस्तान के फ़ैसलाबाद (जो पहले ल्यालपुर था) में जन्मे नुसरत अपने वालिद फ़तेह अली ख़ाँ के पाँचवीं औलाद थे। छह भाई बहनों में सिर्फ़ उन्होंने मौसिक़ी को आगे बढ़ाया। वैसे शुरुआती दिनों में उनके वालिद नहीं चाहते थे कि वो इस क़व्वाली गायन में आए क्योंकि इसे समाज में ऊँची निगाह से नहीं देखा जाता था। लेकिन नुसरत के जुनून और क़व्वाली के लिए इश्क़ को देख कर वालिद को उनके सामने झुकना पड़ा। तबले से शुरू करने के बाद नुसरत ने रागदारी और बोल बन्दिश की तालिम ली। 1964 में वालिद के इन्तकाल के बाद उनके चाचा मुबारक़ अली ख़ाँ और सलामत अली ख़ाँ ने उनकी तालीम को पूरा होने में उनकी मदद की। यह सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि नुसरत साहब का पहला परफ़ॉरमैन्स था उनके वालिद के मज़ार पर, मौक़ा था वालिद का चेहलुम (चेहलुम यानी कि मुसलमानों में किसी की मौत के बाद चालीसवाँ दिन)। उस दिन वालिद की जुदाई में उनके गले से जो सुर निकले थे, शायद वो ही सुर उनके साथ हमेशा रहा, और शायद यही वजह है कि जुदाई के नगमें उनकी आवाज़ पाकर रूहानी बन जाते हैं। फिर चाहे वह "तेरे बिना नहीं जीना मर जाना" हो या "अखियाँ नु चैन न आवे"।






शायर वो क्या जो न झाँके ख़ुद के अंदर में,
क्या रखा है ख़ल्क-खुल्द, माह-ओ-मेहर में?

साहिर ने प्यासा में कहा है: "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" । इस सुखन के हर एक हर्फ़ से कई मायने निकलते हैं, जो ज़िंदगी को सच्चाई का आईना दिखाते हैं। एक मायना यह भी निकलता है कि "अगर बशर (इंसान) को अपनी ख़ुदी पर यकीं न हो, अपनी हस्ती का दंभ न हो, तो चाहे उसे सारी दुनिया ही क्यों न मिल जाए, इस मुक़ाम को हासिल करने का कोई फायदा नहीं।" जब तक इंसान अपने अंदर न झाँक ले और अपनी ताक़त का ग़ुमां न पाल ले, तवारीख़ गवाह है कि उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। जो इंसान अपने दिल की सुनता है और ख़ुद के बनाए रास्तों पर चलता है, उसे सारी दुनिया एक तमाशे जैसी लगती है और सारी दुनिया को वह कम-अक्ल से ज़्यादा कुछ नहीं। फिर सारी दुनिया उसे नसीहतें देनी शुरू कर देती है। सच ही है:

मेरी ख़ुदी से रश्क़ जो मेरा ख़ुदा करे,
नासेह न बने वो तो और क्या करे।

मिर्जा असदुल्लाह ख़ाँ "ग़ालिब" ने कहा है-

"मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।"

ग़ालिब की इस ग़ज़ल को कई सारे गुलूकारों ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आईये आज हम इस ग़ज़ल को "मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में सुनते हैं और महसूस करते हैं कि इस ग़ज़ल के एक-एक शेर में कितनी कहानियाँ छिपी हुई हैं।









’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


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प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, March 24, 2016

"रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा...", होली में आज सराबोर हो जाइए प्रेम-रंग में



कहकशाँ - 5
मन्ना डे, योगेश, श्याम सागर की एक रंगरेज़ रचना
"रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है होली के इस ख़ास मौक़े पर मन्ना डे की आवाज़ में योगेश की एक रचना।




गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग ही होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है। अरे-अरे डरिये मत.. मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा; जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर ज़रिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे ही हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो या फिर "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में ही अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है, उनके गाये शास्त्रीय-संगीत आधारित रचनाओं की तो बात ही छोड़ दीजिए!

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। 2005 में रीलिज़ हुई "सावन की रिमझिम में" नाम के एक ऐल्बम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी ऐल्बम से है। वैसे मैंने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस ग़ैर-फिल्मी ऐल्बम या ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम सागर ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया"। वैसे इस ऐल्बम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऐसे भी पल होते हैं..." । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है भला!

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब ख़ुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब ख़ुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब ही ऐसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी ही कुछ बातें कही गई हैं। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा भी कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।

दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है, जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम ख़ुद ही प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाइये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों ही ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के, अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नजरिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो, प्रेम है रंग वो,
चढ़ जाए तो रंग ना दूजा चढ़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....








’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’ 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, February 18, 2016

"ये खेल होगा नहीं दुबारा...", मरहूम निदा फ़ाज़ली को खिराज के साथ शुरुआत ’कहकशाँ' की






कहकशाँ - 1
मरहूम निदा फ़ाज़ली को खिराज 
"ये खेल होगा नहीं दुबारा..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज इसके पहले एपिसोड में पेश है हाल ही में दुनिया-ए-फ़ानी को अल्विदा कहने वाले मरहूम शायर निदा फ़ाज़ली की याद में उन्हीं की लिखी एक नज़्म जगजीत सिंह की आवाज़ में।




तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नहीं आया,

मुझे मालूम था, तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा में गिर के टूटा था।

मेरी आँखें
तुम्हारी मंज़रों में क़ैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वहीं हैं
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी।

कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज़ कलम उठाता हूँ,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूँ|

बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम|

तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें ज़िन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना।

आज हम जिस शायर की नज़्म सुनने और सुनाने जा रहे हैं, ये पंक्तियाँ उन्होंने ह लिखी थी और वो भी अपने अब्बा की मौत पर। किसी वजह से वे अपने अब्बा की मैय्यत में शरीक़ नहीं हो पाए थे। अब्बा उनके दिल के कितने करीब थे, यह तो नहीं पता, लेकिन इतना पता है कि जो किसी अपने की मौत में अपनी मौत को देख लेता है, उससे फिर कोई भी जस्बात अछूती नहीं रह जाती। वह शायर है, वह सबकुछ लिख सकता है, जिसे लिखने में बाकी लोग कतराते हैं। वही शायर जब बच्चों की मार्फ़त यह कहता है तो बवाल खड़े हो जाते हैं:

बच्चा बोला देख के मस्जिद आलीशान
मालिक तेरे एक को इतना बड़ा मकान।

वह शायर, जिसे लोग "निदा फ़ाज़ली" कहते हैं और जिसका असल नाम "मुक़तदा हसन" है, हिन्दुस्तानियों के लिए "बर्तोल्त ब्रेख्त" हो जाता है। जानकारी के लिए बता दें कि ब्रेख्त हिटलर के समकालीन थे। हिटलर ने जब बहुत से तत्कालीन लेखकों की किताबों को अपने खिलाफ पाकर बैन किया तो पता नहीं कैसे ब्रेख्त की किताब छूट गई। ब्रेख्त ने हिटलर को ख़त लिखा और कहा कि मैं भी आपके बहुत खिलाफ हूँ, मेरी भी किताबें आप बैन कीजिए, वरना इतिहास यही समझेगा कि मैं या तो आपके पक्ष में था या इतना महत्वपूर्ण नहीं था कि आप मेरी किताबें बैन करें। अपने विचारों, अपनी नज्मों के कारण निदा ने भी बहुत दिन तक बाल ठाकरे का अघोषित प्रतिबंध झेला है। ब्रेख्त की तरह निदा भी अपने मन के शायर हैं, गजलें उन्होंने कही जरूर हैं, पर जिन विषयों पर वो शायरी करते हैं, वो विषय ग़ज़ल का नहीं है। (सौजन्य: वेबदुनिया) निदा साहब से जब यह पूछा गया कि उनकी शायरी की शुरूआत कैसे हुई तो उनका जवाब कुछ यूँ था: मेरे वालिद अपने ज़माने के अच्छे शायर थे। नाम था 'दुआ डबाइवी'। उनके अशआर मुझे ज़ुबानी याद थे। यही अशआर सुना-सुनाकर मैं क़ॉलेज में अपने दोस्तों से चाय पिया करता था। कभी-कभी तो नाश्ते का इंतिज़ाम भी हो जाया करता था। उनके अशआर सुनाते-सुनाते ख़ुद भी शे'र कहने लगा। 


निदा साहब यूँ तो क्रांतिकारी विचारों के शायर थे लेकिन आज हम उनसे वह किस्सा सुनना चाहेंगे जिसके
कारण उनका फिल्मों में आना हुआ। उस मज़ेदार घटना को याद करते हुए वे कहते हैं: जब मैं मुंबई आया तो मैने धर्मवीर भारती के "धर्मयुग" में लिखना शुरू कर दिया, उसके बाद मै "ब्लिट्ज़" में लिखने लगा। उसी दौरान कभी "धर्मयुग" में तो कभी "ब्लिट्ज़" में तो कभी किसी रेडियो स्टेशन में मुझे मैसेज़ मिलने लगे कि "मैं आप से मिलना चाहता हूँ- कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है। मैं कमाल अमरोही से मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब २ बजे, वो स्टाईलिश आदमी थे, वो एक लफ़्ज़ भी अंग्रेजी का बोलते नहीं थे और वो भाषा बोलते थे जो आज से ५० साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वो भाषा बंबई आकर भूल गया था। मैंने कहा "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। तो वो बोले- "तशरीफ़ रखिए, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है"- ये उनका स्टाईल था, "मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुक़म्मल शायर की ज़रूरत है", मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त आफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुक़म्मल शायर समझ रहे हैं। बोले- "जी, मुझे आपसे कुछ नगमात तहरीर करवाने हैं"। मैने कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताइये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है, तो वो बोले कि "इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं ज़ाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी और फिल्मी शायरी अलग होती है। इल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरे मिज़ाज़ की शिनाख्त बहुत ज़रूरी है, जाँ निसार अख्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गए थे, लेकिन वो अल्लाह को प्यारे हो गए। इतना कहने के बाद उन्होंने सिचुएशन सुनाई- "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मल्लिका-ए-आलिया रज़िया सुल्तान, यानि हमारी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में खरामा-खरामा चली आ रही है, जिसे देखकर हमारा आलया कासी खैरमक़दम के लिए आगे बढ़ता है।" मेरे कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, मैं कुछ देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टेंट ने कहा कि इसका मतलब है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं और आलया कासी मतलब कैमरा उनकी तरफ़ बढ रहा है। इसके बाद मैंने उस फिल्म के आखिरी दो गाने लिखे। लेकिन उस फिल्म के बनने में इतना वक्त लगा कि कमाल साहब के गुडविल ने फिल्म-इंडस्ट्री में मुझे मशहूर कर दिया कि कोई ऐसा है जिससे कमाल अमरोही गाने लिखवा रहे हैं।

निदा साहब के बारे में और भी बहुत कुछ है कहने को, लेकिन आज बस इतना ही। अब वक्त है आज की नज़्म सुनवाने का। यह नज़्म मेरी पसंदीदा नज़्मों में से एक है। जहाँ एक तरफ़ निदा साहब के मासूम अल्फ़ाज़ हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ जगजीत सिंह जी की मखमली आवाज़। आप खुद देखिए:

ये ज़िन्दगी,
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है।

ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है।

बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा।

सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ,
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा,
ये खेल होगा नहीं दुबारा।

ये खेल होगा नहीं दुबारा॥







’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुतकर्ता : सुजॉय चटर्जी 


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